लकड़ी छीलने, तोड़ने या गढ़ने का एक औजार।
इहिं बिधि बन बसे रघुराइ। डासि कै तृन भूमि सोवत, द्रुमनि के फल खाइ ९-६०।
रात को यात्री के टिकने का स्थान।
रात को पक्षियों के रहने का स्थान।
बसेरा करना - (१) रहना, निवास करना। (२) घर बनाकर बसना। बसेरा लेना - रहना, वास करना। बसेरा देना - (१) ठहराना। (२) आश्रय देना।
बसने या रहने का भाव, आबाद होना।
वह स्थान जहाँ टिककर रात बितायी जाती है, बासा।
बसेरौ करै - डेरा डाले, निवास करे, ठहरे। उ. - बहुतै करौ उद्यम परिहरै। निर्भय ठौर बसेरौ करै-३-१३। कीन्हौ बसेरौ - घर बनाकर बस गये। उ. - कहा भयौ जो देश द्वारका कीन्हो दूर बसेरौ। लियो बसेरो - वास किया, रहे। उ. - कब हरि बालक भए गर्भ कब लियो बसेरौ।
(क) रीछ कीस बस्य करौं, रामहि गहि ल्याऊँ ९-११८। (ख) जो जिहिं भाव भजै, प्रभु तैसे। प्रेम बस्य दुष्टनि कौं नसे -३९१। (ग) आइ पहूँच्यौ काल बस्य, पग इतहिं चलायौ-५८९।
जनम तौ बादिहिं गयौ सिराइ। हरि सुमिरन नहिं गुरु की सेवा, मधु्बन वस्यौ न जाइ १-१५५।
सुख लूटा, आनंद मनाया, मौज उड़ायी।
ज्यौं विट पर-तिय सँग बस्यौ, (रे) भोर भए भई भीति-१-३२५।
मद में चूर होकर की गयी बात।
मन बसै - ध्यान में बने रहते हैं। उ - सूरदास मन बसैं तोतरे वचन बर-१०-१५१।
आजु बसैंगै रैनि तुम्हारे प्रान पियारी ही तुम बाम-१९२९।
कबहुँ कहत हरि माखन खायो, कौन बसैया कहत गाँव री।
बसायेंगे, जन-पूर्ण करेंगे।
नंदहुँ तैं ये बड़े कहैहैं फेरि बसैहैं यह ब्रज नगरी-१०-३११।
जाति। पाँति के लोग न देखति, और बसैहै नैरी-१०-३२४।
अपने नाम की बैरख बाँघौं, सुबस बसौं इहिं गाउँ-१-१८५।
पुहुप बेगि पठएँ बनै, जौ रे बसौ ब्रजपालि-५८९।
तेल लगाइ कियौ रुचि-मर्दन, बस्तर मलि-मलि धोए-१-५२।
देउ बहाइ-बहा दो, प्रवाहित कर दो।
(क) प्रथमहि देउ गिरिहि बहाइ-९४३।
(ख) मारौ स्याम राम दोउभाइ गोकुल देउ बहाइ-2५७८।
परत फिराइ पयोनिधि भीतर, सरिता उलटि बहाईँ ९-१२४।
काम-क्रोध-बिषाद-तृष्ना सकल जारि बहाउ १-३१४।
(क) पांडव-दल सन्मुख ह्वै धाऊँ, सरिता-रुधिर बहाऊँ-१-२७०।
(ख) होइ सनमुख भिरौं, संक नहिं मन धरौं, मारि सब कटक सागर बहाऊँ-९-१२४।
मारि बहाऊ-मारकर बहा दिया, नष्ट कर दिया, समाप्त कर दिया, मिटा दिया।
भक्त हेत अवतार धरे,सब असुरनि मारि बहाऊ-१०-२२१।
वह नायिका जो श्रृंगार करके शैया सजाकर नायक की प्रतीक्षा करती हो।
उ०- जल-बासन कर लै जु उठावति, याही मैं तू (= चंद्र) तन धरि आवै-१०-१९१।
(क) रजनीगत बासर मृगतृष्ना रस हरि कौ न चयौ-१७८।
(ख) बासर संग सखा सब लीन्हें टेरि न धेनु चरैहौं २६५०।
प्रातःकाल गाया जानेवाला राग।
रहने की क्रिया या भाव, निवास।
(क) देवहूति कह, भक्ति सो कहियै। जातैं हरि-पुर बासा लहियै-३-१३।
(ख) करहु मोहिं ब्रज रेनु देहु बृंदाबन बासा-४९२।
स्थिति, उपस्थिति, विद्यमानता।
सर्ब तीर्थ कौ बासा तहाँ, सूर हरि-कथा होवै ज़हाँ-१-२२४।
बासी कढ़ी में ज्यादा उबाल आता है - वृद्धावस्था में अधिक काम-वासना होती है (व्यंग्य)।
बासी मुँह - प्रातःकाल बिना कुछ खाये-पिये।
आठ नाग राजाओं में से दूसरा जिसको 'नेति' बनाकर समुद्र-मंथन किया गया था।
कह्यौ भगवान, अब बासुकी ल्याइयै...नेति करि अचल कौं सिंधु नायौ-८-८।
वासुदेव के पुत्र श्रीकृष्ण।
सुगंधित और लच्छेदार रबड़ी।
बासौंधी सिखरनि अति सोंधी २३२१।
बाहँ लै - सहारा देकर, हाथ पकड़कर, आश्रय में लेकर।
उ. - (क) बचन बाँह लै चलौ गाँठि दै, पाऊँ सुख अति भारी-१-१४६।
(ख) नूपुर-कलरव मनु हंसनि-सुत रचे नीड़ दै बाँह बसाये-१० १०४।
यान या सवारी हाँकने वाला, सारथी।
कह पांडव कैं घर ठकुराई, अर्जुन के रथ-बाहक-१-१९।
वह जिस पर कोई चीज चढ़ायी जाय।
भीतर' या 'अंदर' का, उलटा।
तु जिहिं हित नहिं बाहर आवै। सो हमसों कहि क्यों न सुनावै-१- २२६।
(ख) नाहिन मीन जियत जल बाहर जो घृत मैं सजियो-३१४७।
बाहर-बाहर - बिना किसी को सूचित किये।
ब्रह्म का सगुणरूप, ब्रह्म के अवतार।
(क) बाहाँजोरी निकसे कुंज तैं।
(ख) राजत हैं दोउ बाहाँजोरी दंपति अरु ब्रज बाल।
घर से दूर, अन्य किसी जगह पर।
जाति-पाँति सबकी हौं जानौं, बाहिर छाक मँगाई। ग्वालनि के सँग भोजन कीन्हौं, कुल कौं लाज लगाई-१- २४४।
तुम जो कहति हौ मेरो कन्हैया, गंगा कैसो पानी। बाहिर तरुन किसोर बयस बर, बाट घाट कौ दानी-१०-३११।
सुजन-बंधु ते भई बाहिरी अब कैसे वै करत बड़ाई - पृ. ३४२ (१०)।
छरीदार बैराग बिनोदी, झिरकि बाहिरै कीन्हें-१-४०।
कहत पसारे बाहीं - हाथ उठाकर, दृढ़ता पूर्वक, पूर्ण विश्वास और निश्चय के साथ।
उ. - अजहूँ चेति, कह्यौ करि मेरौ, कहत पसारे बाहीं। सूरदास सरबरि को करिहै, प्रभु-पारथ द्वै नाहीं-१-२६९।"
भए भस्म कछु बार न लागी, ज्यौं ज्वाला पट चीर। सूरदास प्रभु आपु बाहुबल कियौ निमिष मैं कीर-९-१५८।
बाहेर जिनि कबहूँ खैये सुत, डीठि लगैगी | काहू-१००४।
करत बिंग ते बिंग दूसरी जुक्त अलंकृत माहीं।
(क) चिबुक मध्य मेचक रुचि राजत बिंद कुंद रदनी-पृ. ३१६ (५४)।
(ख) कंठश्री दुलरी बिराजति चिबुक स्यामल बिंद-पृ. ३४४ (२९)।
गोल बड़ा टीका, बड़ी बिंदी।
(क) मृगमद-बिंदा तामैं राजै। निरखत ताहि काम सत लाजै-३-१३।
(ख) मसि-बिदा दियौ भ्रू पर-१०-९२।
राधा की सखी एक गोपी का नाम।
इंदा बिंदा राधिका स्यामा कामा नारि-११०२।
माथे पर लगाने का गोल छोटा टीका।
स्याम हृदय अति बिसाल माखन-दधि बिंदु-जाल-१०- २७५।
भाल तिलक मसि बिंदु बिराजत, सोभित सीस लाल चौतनियाँ-१०-१०६।
बड़ी बिंदी, बिंदा, गोल टीका।
(क) कठुला कंठ बज्र केहरि-नख, मसि बिंदुका सु मृग-मद भाल-१०-८४।
(ख) लट कनि मोहन मिस-बिंदुका तिलक भाल सुखकारी !
(ग) गोरोचन कौ तिलक निकटहीं काजर बिदुका लाग्यौ री-१०-१३९।
बंदन बिंदुली भाल की भुज आप बनाए-३१३९।
मथुरा का निकटवर्ती एक उपनगर जो श्रीकृष्णचन्द्र का क्रीड़ास्थल होने के कारण उनके भक्तों के लिए एक तीर्थ है।
(कान्ह) मनिमय कनक नंद कैं आँगन बिंब पकरिबैं धावत-१०-११०।
(क) गति मराल अरु बिंब अधर-छबि, अहि अनूप कबरी-९-६३।
(ख) मनौ सुक फल बिंब कारन, लेन बैठ्यौ आइ-१०-२३४।
बुंद या धार के रूप में छोड़ना।
व्यर्थ और अँधाधुंध खर्च करना।
जिसके प्रियजन का वियोग हुआ हो, वियोगी।
बिकट रूप अवतार धरयौ जब सो प्रहलाद बचाऊ-१०-२२१।
भृकुटी बिकट निकट नैनन के राजत अति बर नारि।
नित-प्रति सबै उरहने के मिस आवत हैं उठि प्रात। अनसमुझे अपराध लगावति बिकट बनावति बात-१०-३२६।
किसी के हाथ बिकना - (१) दास होना।
(२) आसक्त होना।
चले सब मिलि जाइ देख्यौ अगम तन बिकरार-४२७।
कियौ जुद्ध अतिहीं बिकरार-१-२७६।
गोसुत-गाइ फिरत बिकरार-१०५५।
व्याकुल, घबराया हुआ, बेचैन।
(क) बारह बरष नींद है साधी, तातैं बिकल सरीर-९-१४५।
(ख) मीड़त हाथ सकल गोकुलजन बिरह बिकल बेहाल-2५३६।
(क) यह सुनि तरुनी बिकलानी-११६१।
(ख) निठुर बचन सुनि स्याम के जुवती बिकलानी - पृ. ३४१ (४)।
(ग) धरनी परे अचेत नहीं सुधि सखी देखि बिकलानी-2२०८।
फिरि सब चले अतिहिं बिकलाने-१०६०
प्रसन्न या प्रफुल्लित होना।
विकसित हुए, खिल गये, फूले।
रबि-छबि कैधौं निहारि, पंकज बिकसाने-६४२।
जो राजा-सुत होइ भिखारी, लाज परे ते जाइ बिकाने-१-२१७।
जसुमति हाथ बिकाने - यशोदा के वश में हो गये, उसके अनुचर या सेवक हो गये।
उ. - सूरदास प्रभु भाव-भक्ति के, अति हित जसुमति हाथ बिकाने-३८०।
हाथ बिकानौ - दास हो गया हूँ, गुलाम हूँ।
उ. - (क) अब हौं माया-हाथ बिकानौ। परबस भयौ, पसू ज्यौं रजु-बस, भज्यौ न श्रीपति रानौ-१-४७।
(ख) नंद-नंदन-पद-कमल छाँड़ि कै मायाहाथ बिकानौ-१-६३।
(ग) तदपि सूर मैं भक्तबछल हौं, भक्तनि हाथ बिकानौ-१-२४३।
हाथ बिकान्यौ - वशीभूत हो गया, मुग्ध हो गया, दास हो गया।
उ. - ठाढ़े स्याम रहे मेरे आँगन तब ते मन उन हाथ बिकान्यौ-१४६०।
प्रानन के बदले न पाइयत सेंति बिकाय सुजस की ढेरी-2८५२।
हाथ बिकायौ - दास हो गया, वश में हो गया।
उ. - द्विजकुल-पतित अजामिल बिषयी, गनिका हाथ बिकायौ-१-१०४।
सागर सूर भर्यौ बिकार-जल, बधिक-अजामिल बापी-१-१४०।
कमलनैन की लीला गावत कटत अनेक बिकार-2-२।
खिला दे, प्रस्फुटित कर दे।
पाहन-बीच कमल बिकसावै, जल मैं अगिनि जरै-१०१०५।
खिलते हैं, विकसित होते हैं, फूलते हैं।
(क) चलि सखि, तिहि सरोवर जाहिं। जिहिं सरोवर कमल कमला, रवि बिना बिकसाहि-१-३३८।
(ख) पाहन बीच कमल बिकसाहीं जल मैं अगिनि जरै।
कलुषी अरु मन मलिन बहुत मैं सेंत-मेंत न बिकाउँ-१-१२८।
(क) सूरदास स्वामी के बिछुरे कौड़ी भरि न बिकात-2५४१।
(ख) सुजस बिकात बचन के बदले क्यों न बिसाहत आजु-2८५१।
चित्त बिकात - चित्त वशीभूत हो जाता है।
उ. - इक सायक इक चाप चपल अति चिबुक मैं चित्त बिकात-१६८२।
अति मुग्ध हो गयीं, वशीभूत हो गयीं।
(क) स्याम अंग जुवती निरखि भुलानीं। कोउ निरखति कुंडल की आभा, इतनेहिं माँझ बिकानी-६४४।
(ख) उन मो तन मैं उन तन चितयो तब ही ते उन हाथ बिकानी-८५०।
(ग) बिबस भइ तनु न सँभारै री गोरस सुधि बिसरि गई आपु बिकानी बिनु मोलै-११८४।
(घ) बिकानी हरि-दुख की मुसकानी-११९७।
सहसौ फन फनि फुंकरै, नैकु न तिन्हैं बिकार-५८९।
कामी, वासनावाला, दुष्ट मनोवृत्ति का।
रे रे अंध बीसहू लोचन, पर-तिय-हरन बिकारी। सूनै भवन गवन तैं कीन्हौ, सेष-रेख नहि टारी-९-१३२।
बिगड़े हुए या विकृत रूपवाला।
दोष से, ऐब से, बुराई से, अवगुण से।
जौ प्रभु मेरे दोष बिचारै। करि अपराध अनेक जन्म लौं, नख-सिख भरौ बिकारैं-१-१८३।
जिस (छंद) के चारों चरणों में समान अक्षर या मात्राएँ न हों।
छितरा दिये, इधर-उधर फैला दिये।
चोली, चीर, हार बिखराए। आपुन भागि इतहिं कौं आए-७९९।
तोड़े-फोड़ेंगे, इधर-उधर फैलायँगे, तितर-बितर करेंगे, छितरायँगे।
जिन पुत्रनिहि बहुत प्रतिपाल्यौ, देवी-देव मनैहै। तेई लै खोपरी बाँस दै सीस फोरि बिखरैहैं-१-८६।
जिसे सब जानते हों, प्रसिद्ध।
(क) जनम-मरन-काटन कौं कर्तरि तीछन बहु बिख्यात-१-९०।
(ख) तिनके काज अंस हरि प्रगटे ध्रुव जगत बिख्यात।
(ग) दच्छ के उपजीं पुत्री सात। तिनमें सती नाम बिख्यात-४-४।
ऊधौ, जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहै-३१०५।
बल, शौर्य या शक्ति की अधिकता, पराक्रम।
करि दंडवत बिनय उच्चारी। तुम अनंत बिक्रम बनवारी-७-२।
बेचे जाने की क्रिया या भाव।
(क) सुमिरत तुम आए तहँ त्रिभुवन बिख्याता-१-१२३।
(ख) रिष्यमूक परबत बिख्याता-९-६८।
स्वामी या रक्षक की आज्ञा या अधिकार में न रह जाना।
बहाती हैं, प्रवाहित करती हैं।
जो रस ब्रह्मादिक नहिं पावै। सो रस गोकुल गलिनि बहावैं -१०-३।
बहि जाइ-दूर हो जाय, नष्ट हो जाय (स्त्रियों की गाली)।
(क) छाँड़ि देहु बहि जाइ मथानी सौंहदिवावति छोरहु आनी-३९१।
(ख) हार बहि जाइ अति गई अकुलाइ कै सुत के नाउँ इक उहै। मेरैं-१५८६।
बहि गयो - गया-बीता है, तुच्छ है।
ऐसो को बहि गयो प्रजा ह्वै बसै तुम्हारैं-१०१४।
बहुत जल्दी क्रुद्ध हो जानेवाला, जरा सी बात में बिगड़ जाने या लड़ पड़नेवाला।
जो गत हो गया हो, जो बीत चुका हो।
उगत अरुन बिगत सर्वरी, ससांक किरन हीन -१०- २०५।
(क) करि बल-बिगत उबारि दुष्ट तैं, ग्राह ग्रसत बैकुंठ दियौ-१२६।
(ख) प्रमुदित जनक निरखि अंबुज-मुख बिगत नयन मन पीर।
जैहैं बिगरि-खराब हो जायँगे, अच्छे नहीं रहेंगे।
जैहैं बिगरि दाँत ये आछे-१०-२२२।
बिगरि परे विद्रोही हो गये।
(क) ए (नैन) मेरे होहिं नहीं सखि हरि-छबि बिगरि परे - पृ. ३३२ (१९)।
(ख) मधुकर, ए मन बिगरि परे-३१५०।
"(क) कृपा-सिंधु, अपराध अपरिमित, छमौ, सूर तैं सब बिगरी-१-११५।
(ख) जग मैं जनमि, पाप बहु कीन्हें, आदि-अंत लौं सब बिगरी-१-११६।"
वह बात जो बिगड़ गयी हो, बात जो नष्ट हो रही हो।
दीनानाथ अब बारि तुम्हारि। पतित उधारन बिरद जानि कै, बिगरी लेहु सँवारि-१-११८।
बिगड़ जाय, नष्ट हो जाय, खराब हो जाय।
माधौ जू, जौ जन तैं बिगरै। तउ कृपाल, करुनामय केसव, प्रभु नहिं जीय धरै-१-११७।
दुरवस्था को प्राप्त होगा, अच्छी दशा न रहेगी।
सब वे दिवस चारि मन-रंजन अंतकाल बिगरैगौ-१-७५।
बिगड़ गया, दुरवस्था को प्राप्त हुआ, बुरी दशा को पहुँच गया।
तन माया, ज्यौ ब्रह्म कहावत, सूर सु मिलि बिगरौ-१-२२०।
बिगलित कच कुस काँस पुलिन पर पंक जु काजल सारी-2७२८।
खिलती है, प्रस्फुटित होती है।
चमकती है, प्रकाशित होती है।
ईषद हास दंत-दुति बिगसति, मानिक-मोती धरे जनु पोइ-१०-२१०।
सोरह कला को ससि कुहुँ बिगसाऊँ-2२५८।
रूप, गुण या उपयोगिता नष्ट करना।
दोष ला देना, दूषित कर देना।
घोष-सरोज भए हैं संपुट, होइ दिनमनि बिगसावहु-३१८७।
बिगसित गोपी मनहुँ कुमुद सर रूप-सुधा लोचन-पुट घटकनि-६१८।
नापने का एक मान जो बीस बिसवे का होता है।
दुबधा या असमंजस में पड़ना।
संकट या कठिनाई में पड़ना।
नष्ट करता है, विनाशता है।
कमल-नयन कौं कपट किए माई, इहिं ब्रज आवै जोइ। पालागौं बिधि ताहि बकी ज्यौं, तू तिहिं तुरत बिगोइ-१०-५६।
नष्ट किया, बिगाड़ा,विनाश किया।
निसि दिन फिरत रहत मुँह बाए, अहमिति जनम बिगोइसि–१-३३३।
सूर सनेह करै जो तुमसौं सो पुनि आप बिगोऊ-३३५३।
किते दिन हरि-सुमिरन बिनु खोए। पर-निंदा रसना के रस करि, केतिक जनम बिगोए-१-५२।
कहा बिगार कियौ हम वाको ब्रज काहे अवतार दियो री-१४०६।
(क) सूर स्याम बिनु ब्रज पर बोलत हठि अगिलेउ जनम बिगारत-2८४९।
(ख) ज्ञानी लोभ करत नहिं कबहूँ, लोभ बिगारत काजा-१० उ०-2७।
काम जो बिना मजदूरी दिये या पाये जबरदस्ती कराया या किया जाय।
याकैं बस मैं बहु दुख पायौ, सोभा सबै बिगारी-१-१७३।
वह काम जो बिना मजदूरी दिये या पाये जबरदस्ती किया या कराया जाय।
पाँच-पचीस साथ अगवानी, सब मिलि काज बिगारे-१-१४३।
भ्रष्ट करता है, कुमार्ग में लगाता है, बिगाड़ता है।
तुव सुत कौं पढ़ाई हम हारे। आपु पढ़ै नहिं, और बिगारै-७-२।
मैं अपनौ सब काज बिगार्यौ-४-१२।
सूरदास अब होत बिगूचन, भजि लै सारंगपानि-१-३०४।
विघ्न, बाधा, रुकावट, अड़चन, व्याघात।
(क) राख्यौ गोकुल बहुत बिघन तै कर नख पर गोबर्धन धारी-१-२२।
(ख) पांडु-सुत के बिघन जेते गए टरि टरि टरि-१-३०९।
उन तौ करी पाछिले की गति गुन तोर्यौ बिच धार-१-१७५।
भ्रम या बहकावे में डालना।
हरि, तुव माया को न बिगोयौ-१-४३।
नष्ट किया, विनाश किया, बिगाड़ा।
(क) इहिं राजस को-को न बिगोयौ। हिरनकसिपु, हिरनाच्छ आदि दै , कुंभकरन कुल खोयौ-१-५४।
(ख) रंचक सुख कारन तैं, अंत क्यौं बिगोयौ।-१-३३०।
(ग) सूर लोभ कीनो सो बिगोयौ-१० उ०-2७।
अबला कहा जोग मत जानै मनमथ ब्यथा बिगोयो–२५८२।
तंग करती है, दुख देती है, पीड़ा पहुँचाती है।
सील-सँतोष सखा दोउ मेरे, तिन्हैं बिगोवति भारी–१-१७३।
बिताती है, व्यतीत करती है, काटती है।
कबहुँ भवन कबहूँ आँगन हवै ऐसै रैनि बिगोवति-१९४९।
नष्ट करती है, बिनाशती है, बिगाड़ती है।
(क) एकनि लै मंदिर चढ़ै, एकनि बिरचि बिगोवै (हो)-१-४४।
(ख) राजहि जाहि सनक अरु संका बिरचै ताहि बिगोवै-2२७५।
इहै बहानो कारि लियो हरि मन अनुराध्यो-१५४१।
सो (रस) यह परम उदार मधुप ब्रज बीथिनि माँझ बहायो-2९९८।
बहाता है, दूर करता है, अलग करता है।
बंधन कर्म कठिन जे पहिले, सोऊ काटि बहावत-२-१७।
प्रथम बहाइ देउ गोबर्धन ता पाछे ब्रज खोदि बहावहि-९४७।
(क) ब्रज के लोगन धोइ बहावहु -९७०।
(ख) गाइ गोप ब्रज सबै बहावहु-१०४६।
केतिक बिच मथुरा औ गोकुल आवत जो हरि नहीं-2७९७।
खेल मच्यौ ब्रज के बिच भारी-2४०८।
(मुँह) बिराना या चिढ़ाना।
इहिं बिधि उच्च-अनुच तन धरि-धरि देस-बिदेस बिचरतौ-१-२०३।
व्याकुल या विचलित हो गये।
आतुर ह्वै धाईं उत नागरि इत बिचले सब ग्वाल-2४२७।
जौ सीता सत तैं बिचलै तौ श्रीपति काहि सँभारै-६-७८।
झगड़नेवालों के बीच में पड़कर झगड़ा निबटानेवाला, मध्यस्थ।
बीच-बचाव करनेवाला, मध्यस्थ।
राधा आधा देह स्याम की तू उनकी बिचवानी-१४८४।
जौ पै यहै बिचार परी। तौ कत कलि-कलमष लूटन कौं, मेरी देह धरी-१-२११।
को तु, को यह, देखि बिचार-६-५।
सोचते हो, गौर करते हो, विचार रहे हो।
(क) मोकौं मुक्ति बिचारत हौ प्रभु, पचिहौ पहर-घरी-१-१३०।
(ख) तुमहिं देखि मैं अति सुख पायौ, तुम जिय कहा बिचारत-१०- २६५।
करत बिचार-सोचते हैं, ध्यान करते हैं।
सुक-सारद से करत बिचारा। नारद से पावहिं नहिं पारा-१०-३।
करति बिचारा-विचार करती है।
नर-नारी घर घर सबै इह करति बिचारा-१० उ०-८१।
रहीं बिचारि-बिचारि - सोच-सोच कर रह गयीं।
हम नहीं घर गईं तबते रहीं बिचारि बिचारि-११६९।
(क) इन पतितनि मो अपति बिचारी-१-२४८।
(ख) सुरपति तब यह देखि बिचारी ६-५।
विचारकर, सोचकर, गौर करके।
(क) दुरबासा दुरजोधन पठयौ पांडव-अहित बिचारी-१-१२२।
(ख) अंतहु सिखवन सुनहु हमारी कहियत बात बिचारी-३३१३।
जाति बिचारी - सोच-विचार या समझा जा सकता है।
सूरदास स्वामी की महिमा कापै जाति बिचारी-३८९।
मारग छाँड़ि कुमारग सौं रत बुधि बिपरीति बिचारी।
बाँध्यौ बैर दया भगिनी सौं, भागि दुरी सु बिचारी-१-१७३।
गीध, ब्याध, गनिकारु अजामिल, ये को आहिं बिचारे-१-१७९।
विचार करें, ध्यान दें, सोचें।
जौ प्रभु, मेरे दोष बिचारै-१-१८३।
हाँसी मैं कोउ नाम उचारै। हरि जू ताकौं सत्य बिचारै-६-४।
जीतैं जीति भक्त अपनैं के, हारैं हारि बिचारौं-१-२७२।
विचार करो, सोचो, ध्यान दो।
प्रभु, मेरे गुन-अवगुन न बिचारौ-१-१११।
दीन, असहाय, अनाथ, बेचारा।
पतितनि मैं बिख्यात पतित हौं, पावन नाम तुम्हारौ। बड़े पतित पासंगहु नाहीं, अजामिल कौन बेचारौ-१-१३१।
हरि जू की आरती बनी। अति बिचित्र रचना करि राखी, परति न गिरा गनी-2-२८।
(पलँग, खाट तखत आदि को ) जमीन पर फैलाता है।
टूटी छानि, मेघ जल बरसै, टूटो पलँग बिछइयै-१-२३९।
बिछाने को प्रवृत्त करना या प्रेरणा देना।
(सेज पर बिस्तर) आदि बिछाया, (सेज) तैयार की।
पौढ़िये मैं रचि सेज बिछाई-१०-२४२।
उर मनि-माला पहिराई, बसन बिचित्र दिये-१०-२४।
श्रृंगार का एक हाव जिसमें किंचित श्रृंगार से ही पुरुष का मुग्ध होना वर्णित हो।
चित्त शांत या संयत न रहना।
(विस्तर या कपड़े को) जमीन पर फैलाता है।
(जमीन पर बिस्तर अदि) फैलावें।
इह जोग कथा ओढ़ैं कि बिछावैं-३४४२।
पैर की उँगलियों में पहनने के छल्ले।
पग जेहरि बिछिअन की झमकनि चलत परस्पर बाजत-पृ. ३१३ (२६)।
पैर की उँगलियों में पहनने का छल्ला।
पैर की उँगलियों में पहनने का छल्ला।
छुद्रघंटिका पग नूपुर जेहरि बिछिया सब लेखौ-११२०।
छरी की तरह का एक शस्त्र।
बिछुड़ते ही, अलग होते ही।
(क) रघुनाथ पियारे, आजु रहौ (हो)।...। बिछुरत प्रान पयान करैंगे, रहौ आजु पुनि पंथ गहौ (हो)-९-३३।
(ख) हरि बिछुरत फाट्यौ न हियौ-2५४५।
बिछुड़ने या अलग होने का भाव।
(क) यह सुनि भूप तुरत तनु त्याग्यौ, बिछरन ताप तयौ-९-४६।
(ख) जुग-जुग जनम मरन अरु बिछरनसब समुझत मत भेव-१-१००।
(ग) बिछुरन-मिलन रच्यौ बिधि ऐसौ, यह संकोच निवारौ-2६५३।
(घ) कहाँ वह प्रीति कहाँ वह बिछुरन कहाँ मधुबन की रीति-2७१६।
(क) बिछुरी मनौ संग तैं हिरनी-९-७२।
(ख) जौ पै पतिब्रता ब्रत तेरैं, जीवति बिछुरी काइ-९-७७।
(क) बिछुरे श्री बृजराज आजु इन नैननि की परतीति गई-३५३७।
(ख) सूरदास स्वामी के बिछुरे लागे प्रेम झई-2७७३।
बिछुड़ जाने पर, अलग होने पर।
(क) जग मैं जीवत ही कौ नातौ। मन बिछरैं तन छार होइगौ, कोउ न बात पुछातौ-१- ३०२। (ख) सूरदास रघुपति के बिछुरैं मिथ्या जनम भयौ-९-४६।
सूरदास याही ब्रत मेरे हरि मिलि नहिं बिछुरौं-३०२७।
पीछे ललिता आगे स्यामा प्यारी ता आगे पिय मारग फूल बिछावत जात-2०६८।
मारग सुमन बिछावहीं पग निरखि तिहारे-2०६७।
( क ) सूरदास हरि बोलि भक्त कौं, निरबाहत गहि बहियाँ-९-१९।
(ख) बहियाँ पकरि सूर के प्रभु की नंद की सौंह दिवाइ-३१६६।
बहिरी पति सों बात करै सो तैसोइ उत्तर पावै-३०२६।
[सं. बधिर, प्रा. बहिर, हिं. बहरा]
बहिरौ सुनै, मूक पुनि बोले-१-१।
(ख) बहिरो तान स्वाद कहा जानै गूँगो खात मिठास ३३३६।
जिसका प्रिय बिछुड़ गया हो, विरही।
बिछुड़ने की क्रिया या भाव।
बिछुड़ गयी है, वियोग हुआ है।
अहो बिहंग, कहौ अपनौ दुख, पूछत ताहि खरारि। किहिं मति मूढ़ हत्यौ तनु तेरौ, किधौं बिछोही नारिं-९-६५।
भड़क गयी, बिझुक गयी, डराने लगी, मारने दौड़ी।
ब्यानी गाइ बछरुवा चाटति, हौं पय पियत पतूखिनि लैया। यहै देखि मोकौं बिजुकानी, भागि चल्यौ कहि दैया-दैया-१०-३३५।
विष्णु के पार्षद जो ब्रह्मशाप से असुर हो गये थे।
जय अरु बिजय पारषद दोइ। बिप्र-सराप असुर भए सोइ-१०-२।
हाथ का एक आभूषण, अंगद, बाजूबंद।
कुच कंचुकी हार मोतिनि अरु भुजन बिजयठे सोहत-१०७९।
(आकाश में चमकनेवाली) चपला।
बिडुरत बिझुकि जानि रथ ते मृग जनु ससंकि ससिलंगर सारे-१३३३।
खान-पान-परिधान मैं (रे) जोबन गयौ सब बीति। ज्यौं बिट पर-तिय सँग बस्यौ ( रे ) भोर भए भई भीति-१-३२५।
उड़द की पीठी और पेठे की बड़ी, कुम्हड़ौरी।
(क) इंद्रजीत लीन्ही तब सक्ती, देवनि हहा करयौ। छूटी बिज्जु-रासि वह मानौ, भूतल बंधु् परयौ-९-१४४।
हँसत दसननि चमक बिज्जुल लसति कठिन कठोर-पृ. ३१० (३)।
गोद लिए जसुदा नंद-नंदहिं। पीत झँगुलिया की छबि छाजति, बिज्जुलता सोहति मनु कंदहि-१०-१०७।
सो आगे की महरि बिटनियाँ कहा करै वह मान-१८७६।
एक बिटिनियाँ संग मेरे ही, कारैं खाई ताहि तहाँ री-६९५।
[सं. विष्णु, महा. बिठोबा]
पंढरपुर की प्रधान देवमूर्ति जिसे जैन तीर्थंकर की और हिन्दू विष्णु की मूर्ति मानते हैं।
[सं. विष्णु, महा. बिठोबा]
भयभीत होकर (पशु का) बिचकना।
(पशु को) भयभीत करके बिचकाना।
बिडरि चले घन प्रलय जानि कै, दिगपति दिग-दंतीनि सकेलत-१०-६३।
भीर भई सुरभी सब बिडरीं मुरली भली सम्हारी-६९३।
बिडरे गज-जूथ सील, सैन-लाज भाजी-६५०।
वह निसंक अतिहिं ढीठ, बिडरै, नहिं भाजै-९-९६।
भयभीत होता है, विचलित होता है।
अजामिल द्विज सौं अपराधी, अंतकाल बिडरै। सुत सुमिरत नारायन-बानी, पार्षद धाइ परै-१-८२।
घूँघट पट बागर (बागुर) ज्यौं बिडवत जतन करत ससि हारे-2१९०।
निकट बुलाइ बिठाइ, निरखि मुख, अंचर लेत बलाइ-९-८३।
बिडरत बिझुकि जानि रथ ते मृग जनु ससंकि ससि लंगर सारे–१३३३।
धर्म-सत्त मेरे पितु-माता, ते दोउ दिये बिडारी-१-१७३।
जनम सिरानौ अटकैं-अटकैं। राज-काज सुत-बित की डोरी, बिनु बिबेक फिर्यो भटकैं-१-२९२।
बस्ती से बाहर की भूमि जहाँ नित्यक्रिया के लिए लोग जाते हों।
दूर या अलग करना , त्यागना।
बह जाऊँगी, धारा के साथ प्रवाहित हो जाऊँगी।
अब हौं जाइ जमुन जल बहिहौं-2७० १।
होत कहा अबकैं पछिताऐं, बहुत बेर बितई-१-२९९।
भारत जुद्ध बितत जब भयौ। दुरजोधन अकेल रहि गयौ-१-२८९।
खेलत में तुम बिरह बढ़ायौ गई कहा बितताइ-पृं. ३१२ (२०)।
मैं तौ चकित भई हौं सुनि कै, अति अचरज यह बात। सूर स्याम गारुड़ी कहाँ कौ, कहँ आई बिततात-७५३।
व्याकुल, अधीर या संतप्त होना, बिलखना।
बिलखने लगी, व्याकुल हुई, संतप्त हुई।
(क) कोउ निरखति दुति चिबुक चारु की, सूर तरुनि बिततानी-६४४।
(ख) रोवति महरि फिरति बिततानी-७५९।
(ग) घर-घर तरुनी सब बिततानी - पृं. ३३८ (७५)।
फिरत लोग जहँ तहँ बितताने-१०५०।
अपने सुख ब्रज जन बितताये-१०५६।
सूरज प्रभु बितपन्न कोकगुन ताते हरिहर ध्यावत-१५९४।
बिताते हैं, व्यतीत करते हैं।
(क) कल्प समान एक छिन राघव, क्रमक्रम करि हैं बितवत-९-८७।
(ख) जब तैं रूप ठगौरी लागी, जुग समान पल बितवत-७३०।
दिवस बितवति सकल जन मिलि कथति गुन बलबीर-३४७९।
(क) काहू सौं यह कहि न सुनाई। उहाँ जाइ सब रैनि बिताई।
(ख) नृपति निज आयु इहिं बिधि बिताई-८-१६।
रिषि मग-जोवत वर्ष बितायौ-९-५।
अंतर्यामी यहौ न जानत जो मो उरहि बिती-१० उ०-१०३।
कछु बालापन ही मैं बीतै। कछु बिरधापन - माहिं बितीतै-७-२।
मेरौ कह्यौ मानिहै नाहीं ऐसे हीं भ्रुमि भ्रुमि द्योस बितैहै-११९२।
गोपीजन बिथकित ह्वै चितवर्ति सब ठाढ़ी-४४१।
सूर अमर ललनागन बिथकीं अमरलोक बिसारी।
समुझाई समुझत नहीं सिख दै बिथक्यो गाउँ-११८२।
बिथराइ दियौ - अलग-अलग करके बिखरा दिया।
हार तोरि बिथराइ दियो-१०५१।
धर बिधंसि नल करत किरषि हल, बारि, बीज बिथरै-१-११७।
इहिं ढोटा ले ग्वाल भवन मैं कछु बिथरयौ कछु खायौ-१०-३३९।
(क) बिनु गोपाल बिथा या तन की कैसैं जाति कटी-१-९८
(ख) ब्यावर बिथा न बंध्या जानै-३४४२।
सोभित चिकुर ललाट बदन पर कुंचित कुटिल अलक बिथुराई-2११६।
बिथुरि अलक रहीं मुख पर बिनहिं बपन सुभाइ-१०-२२५।
वर्तमान या उपस्थित (होने पर या होकर)।
(क) फोर्यो नयन, काग नहिं छाड़्यौ सुरपति के बिदमान-९-८३।
(ख) जिहिं बल बिप्र तिलक दै माथ्यौ, रच्छा करी आप बिदमान-१०-१२७।
मेरी बज्र की छाती बिदरि करि नहिं जाति-2५४३।
आधनिक वरार प्रदेश का प्राचीन नाम। प्रसिद्धि है कि इस प्रदेश को यह संज्ञा इसी नाम के एक राजा के कारण मिली थी।
कीर-कपोत-मीन-पिक-सारँग-केहरि-कदली छबि बिदली। सूरदास प्रभु पास दुहावति, धनि-धनि श्री बृषभानु-लली-१०-७३९।
साधु-साधु कहि श्रीमुख बानी। बिदा भए इहिं भाँति बखानी-३९१।
दीजै बिदा, जाउँ घर अपनै, काल्हि साँझ की आई-१०-१६।
वह धन जो बिदा के समय मिले।
सूरदास प्रभु मान धर्यो दृढ़, धरनी नखत बिदारति-पृ. ३१२ (१७)।
हिरनकसिपु की देह बिदारी-१-२८।
केतिक जीव कृपिन मम बपुरौ, तजै कालहू प्रान। सूर एक हीं बान बिदारैं, श्री गोपाल की आन-१-२७५।
कहौ तौ असुर लँगूर लपेटौं, कहौ तौ नखनि बिदारौं-९-१०७।
हिरनकसिपु बपु नखनि बिदार्यो-१०-२२१।
उपस्थित, विद्यमान, वर्तमान।
माधौ जू, मन हठ कठिन पर्यो। जद्यपि बिद्यमान सब निरखत, दुःख सरीर भर्यो-१-१००।
संदीपन-सुत तुम प्रभु दीने, बिद्या-पाठ करयौ-१-१३३।
नष्ट करके, नाश करके, विध्वंस करके।
धर बिधंसि नल करत किरषि हल, बारि, बीज बिथरै। सहि सन्मुख तउ सीत-उष्न कौं, सोई सुफल करै-१-११७
धारा में प्रवाहित होइए, डूब जाइए
कबहुँक उपजै जिय में ऐसी जाइ जमुन बहिए-2८९२।
दियो बहिकाई-भुलावे में डाल दिया।
काहू इन्हैं दियो बहकाई -१०४१।
सूर स्याम हमको बिरमावत खीझति बहिनी माई-११४४।
(क) जब ते गंग परी हरि पग तें बहिबो नहीं निवारै - ३१८९
(ख) अब न देह जरि जाइ सुर इन नैनन को बहिबो-३४१४।
(ग) सूर स्याम हम कहैं कहाँ लगि बचन लाज बहिबो-३४१५।
प्रसिद्ध, ज्ञात, अवगत, जानी हुई।
(क) जीव न तजै स्वभाव जीव कौ लोक बिदित दृढ़ताई.-१-२०७।
(ख) जौ नाहीं अनुसरत नाम जग, बिदित बिरद कत कीन्हौं-१-२११।
दो दिशाओं के बीच का कोना।
रघुपति कहि प्रिय नाम पुकारत। हाथ धनुष लीन्हें, कटि भाथा, चकित भए दिसि-बिदिसि निहारत-९-६२।
इहिं बिधि उच्च-अनुच तन धरि-धरि देस-बिदेस बिचरतौ-१-२०३।
जिसे शरीर का ध्यान या उसकी चिंता हो।
(क) कंसराइ जिय सोच परी। कहा करौं, काकौं ब्रज पठवौं, बिधना कहा करी-१०-४८।
(ख) बड़ौ निठुर बिधना यह देख्यौ। जब तैं आजु नंदनंदन छबि बार-बार करि देख्यौ-६४३।
सूरजदास भरम जनि भूलौ करि बिधना सौं हेत-१-३२२।
थके चरन सुनि सूर मनो गुन मदन बान बिधये री-१३४८।
जैसे बधिक अधिक मृग बिधवत राग रागिनी ठानि-३२५०।
सूरदास बिपरीत बिधातैं यहि तनु फेरि ठटे-३०६९।
जोरि कर बिधि सौं मनावति आसीसै दै नाम-2५५५।
(क) इहि बिधि इहिं डहके सबै, जल-थल-नभ जिय जेते (हो)-१-४४।
(ख) अब भ्रम-भँवर पर्यो ब्रजनायक निकसन की सब बिधि की १-२१३।
(ग) स्रवन सुजस सारंग-नाद बिधि, चातकबिधि मुख नाम-2-१२२।
मनहीं मन अनुमान कियौ यह बिधिना जोरी भली बनाई–७६१।
ब्रह्मा की सवारी (हंस) का भोजन, मोती।
बिधि-बाहन-भच्छन की माला, राजत उर पहिराए-४१७।
विधि से, विधिपूर्वक,पद्धति के अनुसार।
बैठे नंद करत हरि-पूजा बिधिवत और बहु भाँति-१०-२६०।
बिकसति ज्योति अधर-बिच, मानौ बिधु मैं बिज्जु उज्यारी-१०-९१।
जैसे मगन नाद-रस सारँग, बधत बधिक बिन बान-१-१६६।
विनती या प्रार्थना करनेवाला।
(क) सूरदास बिनती कह बिनवै, दोषनि दहे भरी-१-१३०।
(ख) बिनती करत डरत करुनानिधि, नाहिँन परत रह्यौ-१-१६२।
बीनने पर निकला हुआ कूड़ा करकट।
बिनय कहा करै सूर, कूर, कुटिल कामी-१-१२४।
उडुपति सों बिनवति मृग नैनी-१० उ०-९३।
कहत बचन बिचारि बिनवहु सोधि हो मन माँहि-३२७५।
विनय करती है, प्रार्थना करे, बिनती करे।
(क) सूरदास बिनती कह बिनवै, दोषनि देह भरी-१-१३०।
(ख) सूर कर जोरि अंचल छोरि बिनवँ, बचैं ए आजु बिधि इहै माँगे-2५०३।
नष्ट होता है, नाश या बरबाद होता है।
पुनि कह्यौ, जीव दुखित संसार। उपजत-बिनसत बारंबार-७-२।
नाश, ध्वंस, मिटना, बरबादी।
चोर न चित चोरी तजै(रे) सरबस सहै बिनास-१-३२५।
नष्ट करने, नाश करने, बिगाड़ने।
काहे कौं छल करि-करि आवत, धर्म बिनासन मोर-९.८३।
(क) सुनि देवकी को हितू हमारे। असुर कंस अपबंस बिनासन, सिर ऊपर बैठे रखवारे.-१०१०।
(ख) सूरदास प्रभु दुष्ट बिनाशन गोकुल ते मथुरा आए-2५९८।
बिनु बदलैं उपकार करत हैं स्वारथ बिना करत मित्राई-१-३।
सरन आए की प्रभु, लाज धरिऐ। सध्यौ नाहिं धर्म सुचि, सील, तप, ब्रत कछु, कहा मुख लै तुम्हैं बिनै करिऐ-१-११०।
पकवान या भोजन का भाग जो गणेश जी के लिए निकाल दिया जाता है।
प्रमोद, परिहास, हँसी, आनन्द।
सुत-तनया-बनिता-बिनोद-रस इहिं जुर-जरनि जरायौ-१-१५४।
आनंदी, जिसका स्वभाव आमोद-प्रमोद का हो।
छरीदार बैराग बिनोदी झिरकि बाहिर कीन्हें-१-४०।
अबिनाशी बिनशै (बिनसै) नहीं, सहज जोति परगास-३४४३।
बीनने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
(क) रोवन लागे कृष्न बिनानी। जसुमति आइ गई लै पानी-१०-५७।
(ख) पाहन सिला निरखि हरि डार्यौ, ऊपर खेलत कृष्न बिनानी-१०-७८। कबहुँक आर करत माखन की कबहुँक भेष दिखाइ बिनानी।
(ग) भवन-काज को गई नँदरानी। आँगन छाँड़े स्याम बिनानी-३९१।
चितै रहे तब नंद जुवति-मुख मन-मन करत बिनानी-१०-२५६।
बिपता, बिपति, बिपत्त, बिपत्ति, बिपत्ती
विरोध-भावना, प्रतिकूलता की भावना।
मंत्री काम क्रोध निज दोऊ अपनी अपनी रीति। दुबिधा दुंद रहै निसिबासर, उपजावत बिपरीति-१-१४१।
बहु नग लगे जराव की अँगिया, भुला बहु्टनी बलय संग को।
बहुत अच्छा - (१) ऐसा ही किया जायगा (स्वीकृति सूचक) (२) अच्छी बात है, समझ लेंगे (धमकाना)। बहुत करके - (१) प्रायः, बहुधा।(२) अधिक संभव तो यही है। बहुत-कुछ - (१) अधिकांश। (२) पर्याप्त, यथेष्ट। बहुत खूब - (१) बहुत बढ़िया (आश्चर्यसूचक)। (२) बहुत अच्छा (स्वीकृतिसूचक)। बहुत है - कुछ नहीं है (व्यंग्य)।
(क) तुम प्रभू मोसौं बहुत करी-१-११६।
(ख) सूर रहे समुझाइ बहुत, पै कैकइ-हठ नहिं जाइ-९-३०१।
(क) बहुतक जन्म पुरीष-परायन, सूकर-स्वान भयौ -१-७८।
(ख) बहुतक तपसी पचि-पचि मुए-४-९।
ता रिस मैं मोहिं बहुतक मारयो-2१-१५१।
उलटी रीति-नीति या पद्धति।
तिनकी बड़ी बिपरीति। जिम्मे उनके, माँगैं मोतैं, यह तौ बड़ी अनीति-१-१४३।
कहँ मेरौ कान्ह, कहाँ तुम ग्वारिनि, यह बिपरीत न जानी-१०-३११।
पूर्णता को पहुँचना,चरम उत्कर्ष।
प्रगट पाप-संताप सूर अब, कापर हठै गहौं ? और इहाँउ बिवेक-अगिनि के बिरह-बिपाक दहौं-३-२।
नव-धनु, नील सरोजबरन बपु, बिपुल बाहु, केहरि कल-काँधे-९-५८।
अप्रसन्न या क्रुद्ध होना, बिगड़ना।
या सपने कौ भाव सिया सुनि, कबहुँ बिफल नहिं जाइ-९-८३।
फलरहित, जिसमें फल न लगें।
मुरली सुनत अचल चले। द्रवित ह्वै जल झरत पाहन बिफल बृक्ष फले-पृ. ३४७ (५४)।
[सं. विवर+हिं. नि. (प्रत्य.)]
भुज भुजंग, सरोज नैननि, बदन बिधु जित लरनि। रहे बिबरनि, सलिल, नभ, उपमा अपर दुरि डरनि-१०-१०९।
(क) कामी, बिबस कामिनी कैं रस, लोभ लालसा ब्यापी-१-१४०।
(ख) तहाँ परासर रिषि चलि आए। बिबस होइ तिहिं कैं मद छाए.-१-२२९।
निराहार जलपान बिबर्जित-१००२।
करत बिबस्त्र द्रुपद-तनया कौं सरन सब्द कहि आयौ-१-१९०।
एक रोग जिसमें तलुए का चमड़ा फटने से घाव हो जाते हैं।
अबिहित बाद-बिबाद सकल मत इन लगि भेष धरत-१.५५।
बिबुधनि मन तर मान रमत ब्रज, निरखत जसुमति सुख-छिन-पल-घरि-१०-१२०।
रावण का भाई जिसने लंका की विजय में श्रीराम की सहायता की थी।
रावन तुरत बिभूति लगाए, कहत आइ, भिच्छा दै माई–९.५९।
हरिहर संकर नमो, नमो। अहिसायी, अहिअंग-बिभूषन, अमित दान, बल-बिष-हारी-१०-१७१।
सजाने की क्रिया या भाव, अलंकरण।
सुरभि रेनु-तन, भस्म विभूषित, बृष-बाहन, बन-बृथचारी-१०-१७२।
तोड़ने या भंग करने का भाव या क्रिया।
रजक मारि कै दंड बिभंज्यो खेल करत गज प्रान लियो-2६१६।
(क) रोर कै जोर तैं सोर घरनी कियौ, चल्यौ द्विज द्वारिका-द्वार ठाढ़ौ। जोरि अंजलि मिले, छोरि तंदुल लए, इन्द्र के बिभव तैं अधिक बाढ़ौ-१-५।
(ख) तीनि लोक बिभव दियौ तंदुल के खाता-१-१२३।
माखन पिंड बिभागि दुहुँ कर, मेलत मुख मुसुकाइ-१०-१७८।
कनक-कुंडल-स्रवन बिभ्रम कुमुद निसिं सकुचाइ-१०-३५२।
बेद बिमल नहिं भाख्यौ-१-१११।
पारथ बिमल बभ्रुबाहन कौं सीस-खिलौना दीनौ-१.२९।
सुर अरु असुर कस्यप के पुत्र। भ्रात-बिमात आपु मैं सत्रु-३-९।
देवताओं का यान जो आकाश में चलता है।
मुग्ध, आकृष्ट या आसक्त हुई।
नाद सुनि बनिता बिमोहीं बिसारे उर-चीर-६५८।
मृत पुण्यात्माओं को स्वर्ग ले जाने के लिए आनेवाला कल्पित यान।
सुवा पढ़ावत जीभ लड़ावति ताहि बिमान पठायौ-१-१८८।
पाछे चढ़ो बिमान मनोहर बहुरो जदुपति होत अँधेरौ-2५३२।
मान या प्रतिष्ठाहीन, गर्व-गौरवहीन।
जिहिं बल कमठ-पीठि पर गिरिधरि सजल सिंधु मथि कियौ बिमान-१०-१२७।
जो किसी के प्रतिकूल हो, विरोधी।
(क) मानी हार बिमुख दुरजोधन, जाके जोधा हे सौ भाई-१-२४।
(ख) दान-धर्म बहु कियौ भानु-सुत,सो तुव विमुख कहायौ-१-१०४।
जो अनुरक्त न हो, जिसने मन न लगाया हो, उदासीन।
(क) ऐसैहिं जनम बहुत बौरायौ। बिमुख भयौ हरि-चरन-कमल तजि, मन संतोष न आयौ-१-२७।
(ख) तुमहिं बिमुख रघुनाथ, कौन बिधि जीवन कहा बनै-९-५३।
मोहनेवाली, ध्यान आकृष्ट करनेवाली।
उर बनमाल बिचित्र बिमोहन,भृगु - भँवरी भ्रम कौं नासै-१-६९।
(धन) जो ब्याज पर लगा या लगाने को हो।
नैंकु बियोग मीन नहिं मानत, प्रेम-काज बपु हारयौ-१-२१०।
[सं. द्वितीय, प्रा. वीय, हिं. वियौ]
(क) सूरदास प्रभु भक्त-बछल हैं, उपमा कौं न बियौ-१-३८।
(ख) इनतैं नहिं प्रभु और बियौ-१-८५।
सृष्टि रचनेवाला, ब्रह्मा, विधाता।
सिव-बिरंचि, सुर-असुर, नाग-मुनि,सूतौ जाँचि मन आयौ-१-२००।
जो सांसारिकता में लीन न रहता हो, वैरागी, संसार से उदासीन।
(क) बिषयी भजे, बिरक्त न सेए, मन धन-धाम धरे-११९८।
(ख) कौरव-पति ज्यौं बन कौं गयौ। धर्मपुत्र बिरक्त पुनि भयौ-१-२८४।
रचकर, बनाकर, निर्माण करके।
(क) एकनि लै मंदिर चढ़ै, एकनि बिरचि बिगोवै (हो )-१-४४।
(ख) बर सिंगार बिरचि राधा जू चली सकल ब्रज-बालिका-८०९।
हिसाब-किताब लिखने की पुस्तक।
(क) सूर पतित जौ झूठ कहत है, देखौ खोजि बही-१-१३७।
(ख) अहंकार पटवारी कपटी झूठी लिखत बही-१-१८५।
बही में चढ़ना (टँकना) - हिसाब में लिख लिया जाना।
बही में चढ़ाना (टाँकना) - हिसाब में लिखना।
(क) मनु बरषत भादौं मास नदी घृत-दूध बही-१०- २४।
मारी मारी फिरी, भटकती घूमी।
(क) घर तजिकै कोऊ रहत पराये मैं तबहीं ते फिरति बही री-१८६।
(ख) सूरदास इन लोभिनि के संग बन-बन फिरति बही - पृ.३३२ (१५)।
हिसाब-किताब लिखने की पुस्तक।
बहुत (संख्यावाचक), एक से अधिक, अनेक।
जनम-मरन-काटन कौं कर्तरि तीछन बहु विख्यात-१- ९०।
साँझ भई घर आवहु प्यारे।...। सूर स्याम कछु करौ बियारी, पुनि राखौं पौढ़ाइ-१०-२२६।
ब्याने या बच्चा देनेवाली।
तेरी सौं, मेरी सुनि मैया, अबहिं बियाहन जैहों-१०-१६३।
रचि-बिरचि - सजधजकर, बना-सँवारकर।
रचि-बिरचि मुख-भौंह-छबि लै चलति चित्त चुराइ-१-५६।
रहयौ मन सुमिरन कौ पछितायौ। यह तन राँचि-राँचि करि बिरच्यौ,कियौ आपनौ भायौ-१-६७।
जो सांसारिकता में लिप्त न हो, विरक्त, वैरागी.
रे मन, गोबिंद के ह्व रहिये। इहिं संसार अपार बिरत ह्वै, जम की त्रास न सहियै-१-६२।
सांसारिकता से जी हटना, विरक्ति, वैराग्य।
(क) अजहूँ लौ मन मगन काम सौं बिरति नाहिं उपजाई-१-१८७।
(ख) जौ तू सूर सुखहिं चाहत है, तो करि बिषय बिरति-१-३००।
(ग) बाल दसा अवलोकि सकल मुनि, जोग-बिरति बिसरावै-१०-९७।
निरर्थक, व्यर्थ, वृथा, बेकाम।
(क) बिरथा जन्म लियौ संसार-१-२९४।
(ख) बिरथा जनम गँवायौं-७६५।
(क) बिरध भऐं कफ कंठ बिरोध्यौ-१-३२९।
(ख) एक बिरधकिसोर-बालक एक जोबन जोग-१०-२६।
कछु बालापन ही मैं बीतै। कछु बिरधापन माँहि बितीतै-१-२।
बढ़ती है, वृद्धि को प्राप्त होती है।
कहयौ सुक श्रीभागवत बिचारि। हरि की भक्ति जुगै जुग बिरधै, आन धर्म दिन चारि-2-२।
जो वृद्ध हो, जो बूढ़ा हो।
सिसु, किसोर, बिरधौ तनु होइ। सदा एकरस आतम सोइ-७-२।
मैं तो अपनी कही बड़ाई। अपने कृत तै हौं नहिं बिरमत, सुनि कृपालु जदुराई-१-२०७।
हमहिं छाँड़ि बिरमहिं कुबजा सँग, आए न रिपु रन जीति-३०५४।
कोउ गए ग्वाल गाइ बन घेरन, कोउ गए बछरू लिवाइ।...। सूर स्याम तहँ बैठि बिचारत, सखा कहाँ बिरमाइ-५००।
कहाँ लौं रखिए मन बिरमाई-2८०५।
(क) अरुझि काम की बेलि सौं कौने बिरमाए.-
(ख) को जानै काहे ते सजनी कहुँ बिरहिनि बिरमाए-2८५४।
(ग) सीतल पंथ जोवति हम निसिदिन कित बिरहिनि बिरमाए-३०८३।
शांति पाते हैं, धीरज होता है।
सूरस्याम पहिले गुन सुमिरिहि प्रान जात बिरमायो-2८४०।
ठहर जाते हैं, रुक जाते हैं।
भीतर तैं बाहर लौं आवत।...। अहुँठ पैग बसुधा सब कीनी, धाम अवधि बिरमावत-१०-१२५।
जेहि जु अंग अवलोकन कीन्हौ सो तन-मन तहँ ही बिरमावत-2३४७।
आराम करते हैं, विश्राम करते हैं, सुस्ताते हैं।
पदुम-बास सुगंधसीतल लेत पाप नसाहिं।….। सघन-गुंजत बैठि उन पर भौंरहूँ बिरमाहिं-१-३३८।
सूरदास स्वामी सौं कहियौ, अब बिरमाहिं नहीं-९-९१।
तातैं बिरमि रहे रघुनंदन, करि मनसा-गति पंग-९-२३।
कोई-कोई, इक्का-दुक्का, एकआध।
(क) हरि, हरि-भक्त एक, नहिं दोइ। पै यह जानत बिरला कोइ-१-२९०।
(ख) नटवत करत कला सकल, बूझै बिरला कोइ-2-३६।
धोखे ही बिरवा लगाइ कै काटत नाहिं बहोरी-३३४८।
बाग या स्थान,जहाँ छोटे पौधे लगे हों।
मीड़त हाथ सकल गोकुल जन बिरह बिकल बेहाल-2५३६।
विरह भी,विरह की स्थिति भी।
ऊधौ, बिरहौ प्रेम करै-३३५८।
भीषम, द्रोन, करन दुरजोधन, बैठे सभा बिराज-१-२५५।
(क) भाल-तिलक मसि-बिंदु बिराजत-१०.१०६।
(ख) हृदय हरि-नख अति बिराजत-१०-२३४
शोभित होने की क्रिया या भाव।
यहै शब्द सुनियत गोकुल मैं मोहनरूप बिराजत-६२२।
रविबंसी भयौ रैवत राजा। ता सम जग दुतिया न बिराजा-९-४।
शोभित है, शोभा देते हैं, विराजते हैं।
(क) लंका राज विभीषन राजैं, ध्रुव आकास बिराजैं-१-३६।
(ख) उर पर पदिक कसुम बनमाला, अंगद खरे बिराजैं-४५१।
ब्रह्म का वह स्थूल स्वरूप जिसके अंदर संपूर्ण विश्व है।
इक-इक रोम बिराट किए तन कोटि-कोटि ब्रह्मांड-४८७।
जो अपने से अलग हो, पराया।
सूरदास गोपिनि परतिज्ञा छवहिं न जोग बिरान-३३५७।
भिन्न, दूसरी, परिवर्तित, बदली हुई।
नाहिं रही कछु सुधि तन-मन की, भई जु बात बिरानी-१-३०५।
दूसरों के, अन्य व्यक्ति के।
भक्ति बिनु बैल बिराने ह्वैहौ-१-३३१।
को है अपने कौन बिराने-१०४१।
बाप रिसाइ माइ घर मारै हँसै बिरानो लोग री-१२०३।
साँझ की बिरियाँ बिरद भई सखी री-६०५।
(क) सूर कूर कहै मेरी बिरियाँ, बिरद कितै बिसरायौ-१-१८८।
(ख) सूर की बिरियाँ निठुर भए प्रभु मोतैं कछु न सर्यौ-
पीरे पान-बिरी मुख नावति-५१४।
बहुत अधिक, अधिक मात्रा में।
भ्रमत-भ्रमत बहुतै दुख पायौ, अजहुँ न टेव गई -१-२९९।
दाउँ-घात बहुतै कियौ, मरत नहीं जदुराइ-५८९।
कमलनयन के कारन सजनी अपनो सो जतन रही बहुतै करि-2८१३।
अनेक स्त्रियों से प्रेम रखनेवाला।
नंदसुवन बहुनायकी अनतहिं रहे जाई-2१५९।
मार्ग रोकना या अवरुद्ध करना।
पलित केस, कफ कंठ बिरुँध्यौ, कल न परति दिन-राती-१०-११८।
क्रुद्ध या अप्रसन्न होकर।
कब तुमकौं मैं बोलि बुलाई। केहि कारन तुम धाई आईं। यह सुनि बहुरि चली बिरुझाई-३९१।
झगड़ती या अप्रसन्न होती हैं।
हठ करति बिरुझातिं तब जिय जननि जानति बारि-७७७।
क्रुद्ध होकर,बिगड़कर, झुँझलाकर।
को निरदई रहै तेरैं घर, को तेरैं सँग बैठै आनी। सुनहु सूर कहि-कहि पचिहारीं, जुवती चलीं घरनि बिरुझानी-३६८।
बार-बार सुत सों बिरुझानी-१०१०।
रूठ गये, खीझे, झगड़ने लगे, उलझने लगे।
बरजत-बरजत बिरुझाने। करि क्रोध मनहिं अकुलाने-१०-१८३।
सूर स्याम बिरुझाने सोए-१-१९६।
(क) मेरौ आजु अतिहिं बिरुझानौ-१०-१९७।
(ख) साँझहिं तैं अतिहीं बिरुझानौ-१०-२००।
लागी भूख, चंद मैं खैहौं, देहि-देहि रिस करि बिरुझावत-१०-१८८।
खीझना, झुँझलाना, मचलना, झगड़ना, अप्रसन्न होना।
खीझता, मचलता या रूठता है।
जो बालक जननी से बिरुझै माता ताको लेइ मनाइ-९७९।
रूठ जायेगा, बिगड़ जायेगा, बिरुझावेगा।
मेरे लाल के प्रेम खिलौला, ऐसौ को लै जैहै री।...। आवतहीं लै जैहै राधा, पुनि पाछैं पछितैहै री। सूरदास तब कहति जसोदा, बहुरि स्याम बिरुझैहै री-७११।
सविस्तार गुण-कथन, यश-वर्णन, प्रशंसा।
दीन कौ दयाल सुन्यौ, अभय-दानदाता। साँची बिरुदावली, तुम जग के पितु-माता-१-१२३।
जो विरोधी है, प्रतिकूल, जो अनुकूल न हो।
बेद-बिरुद्ध सकल पांडव-कुल, सो तुम्हरैं मन भायो-१-१०४।
रे रे चपल, बिरूप, ढीठ, तू बोलत बचन अनेरौ-९-१३२।
सूरदास सुनि भक्त-बिरोधी चक्र सुदरसन जारौं-.१-२७२।
विरोध किया, बैर ठाना, द्वेष रखा।
ज्ञान-बिवेक बिरोधे दोऊ, हते बंधु हितकारी-१-१७३।
मुक्ति-हेत जोगी स्रम साधैं, असुर बिरोधैं पावै-१-१०४।
सीतबात-कफ कंठ बिरोधै, रसना टूटै बात-१-३१३।
बिरध भऐं कफ कंठ बिरोध्यौ, सिर धुनि धुनि पछितान्यौ-१-३२९
अब जौ तुम्हरी आज्ञा होइ। छाँडि बिलंब करौं मैं सोइ-४५।
जमीन या दीवार में (चूहे आदि द्वारा) बनाया गया विवर या छेद।
मति हिय बिलख करौ सिय, रघुबर हतिहैं कुल दैयत कौ-९-८४।
विलाप करते हैं, रोते हैं।
हँसैं हँसत, बिलखैं बिलखत हैं, ज्यौं दरपन मैं झाईँ-१-१९५।
अतिही सुन्दर कुमार जसुमति रोहिणि बार बिलखति यह कहति सबै लोचन जल ढोरैं-2६०४।
देखि री देखि हरि बिलखात-३६०।
कबहूँ मग-मग धूरि बटोरत भोजन कौं बिलखात-2-२२।
(क) यह सुनि कै जुवती बिलखानी-2६०६।
(ख) दुसह सँदेस सुनत माधो को गोपीजन बिलखानी-2९८८।
भ्रात-मुख निरखि राम बिलखाने-९-५२।
इंद्र हँस्यौ, हर हिय बिलखान्यौ, जानि बचन कौ भंग-९-१५८।
उग्रसेन की आपदा सुनि-सुनि बिलखावै-१-४।
करति कछू न कानि, बकति है कटु बानि, निपट निलज बैन बिलखि सहूँ-१०-२९५।
बिलखते देखकर, दुखी होने पर।
हँसैं हँसत बिलखै बिलखत हैं ज्यौं दरपन मैं झाईँ-१-२९५।
देखि अक्रूर नर-नारि बिलखे-2५०३।
बिलग मति मानौ ऊधौ प्यारे-पृ. ३१७५।
अब ब्रज सूनो भयौ गिरिधर बिनु गोकुल-मति बिलगानी-2६९६।
हम एक ही संग, एक ही मत सब कोउ, नहि बिलगानी-१८३०।
कबहुँ बिहँसति,कबहुँ बिलपति,सकुचि रहति लजाइ-६७८।
त्रेता जुग एक पत्नी ब्रत किए सोऊ बिलपति छोरी-2८६३।
बहुत व्याकुल और दुखी होना।
(क) हरषवंत ह्वै चले तहाँ तैं मग मैं बिलम न लाई-९-१०२।
(ख) आवहु बेगि बिलम जनि लावहु, गैया दुरि गई-४४३।
नेक करहु अब जिनि बिलमाई.-१००४।
बिलमि रहे - रुक गये, ठहरे, रम गये।
(क) माधव बिलमि बिदेस रहे।
(ख) कहाँ धौं बिलमि रहे, नैन मरत दरसन की साधौ-१८०९।
जहाँ जहाँ दुहि बन चराइ, मरत तहाँ बिललाइ-३४२४।
सूर स्याम हैं पलक धाम मैं लखि चित कत बिललाउ-३४७२।
व्याकुल होकर असंबद्ध बातें कहती है, बिलखती है, दुखी होती है, रोती है।
(क) पाँच बरष को मेरौ नन्हैया, अचरज तेरी बात। बिनहीं काज साँटि लै धावति, ता पाछैं बिललात-१०-२५७।
(ख) धेनु फिरत बिललाति बच्छ थन कोउ न लगावै-५८९।
भवन ते बिछुरे मीन मकर बिललाते-३४६१।
बहुत दुखी होकर असंबद्ध बातें करना या बकना।
मद से चर हो आपे में न रहना।
बहकाइ दई (दियो)-भुलावे में डाल दिया है।
(क) कौन बहकाइ दई है तुमकौं, ताहि पकरि लै जाहि-१५३।
(ख) नई रीति इन अबै चलाई। काहू इन्हें दियौ बहकाई।
अंबरीष कौँ साप देन गयौ, बहुरि पठायौ ताकौ-१-११३।
आइ गए तिहिं समय कन्हाई। बाहँ गही लै तुरत दिखाई। तनक-तनक कर, तनक अँगुरियाँ। तुम जोबन भरीँ नवल बहुरियाँ-७९९।
[सं. बधूटी, बधूटिका, प्रा. बहूडिआ]
लौटी, वापस आयी, फिर कर आयी।
आइ अजिर निकसी नँदरानी, बहुरी दोष मिटाइ-५४०।
अनेक रूप धारण करने वाला, बहुतों के रूप धारण करनेवाला।
बिलखा, दुखी हुआ, विलाप किया।
नष्ट करने को प्रवृत्त करना,
(क) निसि दिन बिषय-बिलासनि बिलसत फूटि गईं तब चारयौ-१-१०१।
(ख) इंद्रासन बैठे सुख विलसत दूर किये भुव-भार।
(ग) जो रस नंदजसोदा बिलसत, सो नहिं तिहूँ भुवनियाँ-१०-२३८।
विशेष रूप से शोभित होता है, बहुत भला जान पड़ता है।
सूरदास स्वामी की लीला, अति प्रताप बिलसत नँदरैया-१०-११५।
राम रस रचौ मिलि संग बिलसहु सबै-बिहँसि हरि कह्यौ यों निगम बानी-पृ. ३४३(२१)।
लोचन सफल करौ प्रभु अपने हरि मुखकमल देखि बिलसात-१० उ०.५९।
भोग करो, काम में लाओ, उपभोग करो।
बिधि संजोग टरत नहिं टारैं, बन दुख देख्यो आनि। अब रावन घर बिलसि सहज सुख, कह्यौ हमारौ मानि-९-७७।
भोग करें, काम में लाएँ, बरतें।
कै तन देउँ मध्य पावक के, कै बिलसै रघुराइ-९-७७।
जीवै तौ सुख बिलसै जग मैं की रति लोकनि गावै-९-१५२।
नष्ट होते हैं, रह नहीं जाते, विलीन होते हैं।
बारि मैं ज्यौं उठत बुदबुद लागि बाइ बिलाइ-१-३१६।
पूर्व पाप सब गए बिलाई-४-१२।
लुप्त हुआ, अदृश्य हुआ। छिप गया।
फोर्यो नयन, काग नहिं छाड़्यौ सुरपति के बिदमान। अब वह कोप कहाँ रघुनन्दन, दससिर-बेर बिलान-९-८३।
बिलखकर रोना, क्रंदन,रुदन।
घरी इक सजन-कुटुँब मिलि बैठैं, रुदनबिलाप कराहीं-१-३१९।
मन सुवा तन पींजरा, तिहिं माँझ राखै चेत। काल फिरत बिलार-तनु धरि, अब घरी तिहिं लेत-१-३११।
जैसैं घर बिलाव के मूसा, रहत बिषय-बस वैसौ-2.१४।
भरति रंग रति नागरि राजति मानहु उमँगि बिलावल फोरी-2४०६।
(क) अपनै-अपनै रस-बिलास काहू नहिं चीन्हौ-३९४।
(ख) सूरदास ग्वारिनि सँग मिलि हरि लागे करन बिलास-४१०।
सुख भोगनेवाला, विनोद प्रिय।
सो प्रभु घर-घर घोष-बिलासी-३९१।
(दुख, पीड़ा आदि से व्याकुल होकर) जमीन पर लेटना।
[सं. बैदूर्य, प्रा. बेलुरिय, हिं.बिल्लौर]
[सं. बैदूर्य, प्रा. बेलुरिय, हिं.बिल्लौर]
मानहुँ बिवर गए चलि कारे तजि केचुरि भए निररे री-पृ. ३२७ (६०)।
गुथी या उलझी वस्तु का सुलझना।
उलझे बालों को सुलझाना या सुलझवाना।
ह्याँ तुम बिवश भए हौ ऐसे ह्वाँ तौ वै बिवशानी-2२०८।
देहु बिबाहि - विवाह कर दो।
हलधर कौं तुम देहु बिवाहि-९-४।
माया बिषम भुजंगिनि कौ बिष-2-३२।
जहाँ न काहू कौ गम, दुसह दारुन तम, सकल बिधि बिषम, खल-मल खानि-१-७७।
माया बिषम भुजंगिनि कौ बिष उतर्यो नाहिंन तोहि-2-३२।
वर्णित या विवेचित प्रसंग।
वह जिसे इंद्रियाँ ग्रहण करें।
तू तौ बिषया-रंग रँग्यौ है-१-६३।
खरिक मिले की गोरस बेंचत की बिषहर तें बाँची-१४३८।
इच्छा पूरी न होने का खेद या दुख।
(क) काम-क्रोध-विषाद-तृष्ना, सकल जारि बहाउ-१-३१४।
(ख) ताकौ बिषम बिषाद अहो मुनि मौपै सह्यौ न जाई-९-७।
कोउ गावत, कोउ मुरलि बजावत कोउ बिषान, कोउ बेनु-४४८।
बिषै-भोग सब तन मैं होइ-७.२।
अनेक रूप धारण करनेवाला, बहुरूपिया।
अनेक रूप धारण करने में समर्थ।
[हि. पुं. बहुरंगा + ई [प्रत्य.]
नाथ अनाथनि ही के संगी। दीन दयाल परम करुनामय, जन-हित हरि बहुरंगी-१-२१।
[हि. पुं. बहुरंगा + ई [प्रत्य.]
[हि. पुं. बहुरंगा + ई [प्रत्य.]
[हिं. बहुरना (बहुरि =फिरकर)]
अब कैं तौ आपुन लै आयौ, बेर बहुर की और-१-१४६।
[सं. व्याघुट, प्रा. बाहुड़ +ना]
[सं. व्याघुट, प्रा. बाहुड़ +ना]
उरहन देत ग्वालि जे आई। तिंन्हैं दियौ जसुदा बहुराई-३९१।
भई अबार गाइ बहुरावहु, उलटावहु, दै हाँक-४६४।
बिसखपरा, बिसखापर, बिसखोपड़ा
भूषन बिबिध बिषद अंबर जुत सुंदर स्याम सरीर-९-२६।
बृंदा बिपिन बिषद जमुना-तट, सुचि ज्यौनार बनाई-४१६।
भोग-विलास में रत रहनेवाला।
सुत-तिय धन की सुधि बिसमरै-३-१३।
गोबिंद गुन उर ते नहिं बिसरत-2७४१।
[सं. विस्मरण, प्रा. बिम्हरण, बिस्सरण]
भुला दिया, ध्यान में रखा।
(क) अपनी को चालै सुनि सूरज पिताजननि बिसराई-३०१९।
(ख) कबहुँक स्याम करत यहाँ कौ मन कैधौं चित्त सुध्यौ बिसराई-३११८।
अहंकार तैं तुम बिसराए-१-२०८।
भुलाना, ध्यान में न रखना।
भुला दी, ध्यान में नहीं रखी विस्मरण कर दी।
देव-काज की सुधि बिसरानी-१००१।
किसी के साथ सुख भोगनेवाली।
मुरली बजाय बिसरावत भौना-2४२१।
सुंदर स्याम कृपालु दयानिधि कैसे हो बिसरावति-३१२८।
भुलाने वाले, ध्यान छुड़ानेवाले।
(क) महा पतित कुल तारन, एक नाम अधःजरन, दारुन दुख बिसरावन-१०-२५१।
(ख) बेगि सुबचन सुनाइ मधुप जी मोहिं ब्यथा बिसरावन-३१०१।
ग्वाल सखा कर जारि कहत हैं, हमहिं ...स्याम तुम जनि बिसरावहु-४५०।
सूर स्याम अति चतुर कहावत चतुराई बिसरावहुगे-१९७८।
हरि सौं प्रीतम क्यों बिसराहि-2७५७।
ध्यान बिसर्जन कियौ नंद जब मूरति आगै नाहीं-१०-२६३।
जिसका ठीक न हो कि कब क्या करेगा या करायेगा।
शतरंज, चौपड़ आदि खेलने का खानेबना कपड़ा या पट्ठा।
भुलाते हैं। ध्यान से हटाते हैं।
जे नख-चंद्र महामुनि नारद पलक न कबहुँक बिसारत-१३४२।
भुला दी, ध्यान से हटा दी।
श्रीपति हूँ की सुधि बिसारी याही अनुराग-६५३।
भुला दिये, ध्यान से हटा दिये।
(क) जे पद-पदुम परसि ब्रजभामिनि सरबस दै सुत-सदन बिसारे-१.९४।
(ख) नाद सुनि बनिता बिमोहीं, बिसारे उर-चीर-६५८।
लागे हैं बिसारे बान स्याम बिनु युग याम घायल ज्यौं घूमैं मनौ बिषहर खाई है-2८२७।
भए अति अरुन बिसाल कमल-दल-लोचन मोचत नीर-९-१४५।
बिसासिन, बिसासिनि, बिसासिनी
जिस पर विश्वास न किया जा सके, विश्वासघातिनी।
जिस पर विश्वास न किया जा सके, विश्वासघाती।
तुम देखे बहु स्याम बिसासी-१८१२।
सुजस बिकात बचन के बदले क्यों न बिसाहत आजु-2८५१।
मोल लेने की क्रिया, खरीद।
मोल लेने की क्रिया, खरीद।
लाज बेंचि कूबरी बिसाही सँग न छाँड़त एक घरी-2६७७।
खाते समय किसी वस्तु का अंश नाक की ओर चढ़ जाना।
मधुबन बसत आस हुती सजनी, अब मरिहैं जु बिसूरी-१० उ.-८२।
तुम पुनि कहत स्रवन नहिं समुझत, दुख अति मरत बिसूरे-३०४२।
विशेष रीति से कहना या वर्णन करना।
प्रायः, बहुत करके, अक्सर।
अनेक भाषाएँ बोलने में समर्थ।
समूह में से अधिकांश का मत।
सिव सौं बोली बचन बिसेषि-४-५।
बढ़ाकर कहना या वर्णन करना।
विस्तार से कही या की वर्णन की।
गर्भ परीच्छित रच्छा करी। सोई कथा सकल बिस्तरी-१.२८९।
इंद्री दासी सेवा करैं। तृप्ति न होइ, बहुरि बिस्तरैं-४-१२।
जाकौ जस सब जग बिस्तरयौ-६-४।
बढ़ा-चढ़ा रूप, विस्तार से कहा या वर्णन किया हुआ रूप।
जय अरु बिजय कथा नहिं कछुवै दसमुख-बंध बिस्तार १-२१५।
देखि तरु सब अति डराने हैं बड़े बिस्तार-३८७।
ऐसौ नीप-बृच्छ बिस्तारा, चीर हार धौं कितिक हजारा-७९९।
सुमिरत नाम, दुपद-तनया कौ पट अनेक बिस्तारयौ-१-१७।
विस्तार के साथ आरंभ किया।
बिप्रनि जज्ञ बहुरि बिस्तारयौ-४-५।
हरि हरि हरि हरि सुमिरन करौ। आधे पलकहुँ जनि बिस्मरौ-६-१।
(क) दासी तृस्ना भ्रमत टहल-हित लहत न छिन बिस्राम-१-१५१।
(ख) नंद लिये आवत हरि देखे, तब पायौ बिस्राम-६७९।
विस्वंभर सब जग कौं भरै-2-२०।
बीस बिस्वा - निसंदेह, निश्चय ही।
तौ बिस्वास होइ मन मेरैं-१-१४६।
मनो मुख मृदुल पानि पंकरह गुरु गति मनहुँ मराल बिहंगा-१९०५।
नष्ट करने की क्रिया या भाव।
[सं. विघटन, प्रा. बिहंडन]
[सं. विघटन, प्रा. बिहंडन]
बाल-सखा की बिपति-बिहंडन संकट हरन मुरारे-१० उ.-६०।
[सं. विघटन, प्रा. बिहंडना]
[सं. विघटन, प्रा. बिहंडना]
मंद-मंद हँसना, मुस्कराना।
हँसत नंद गोपी सब बिहँसी-१०-१८०।
(क) जादौपति जदुनाथ खगपति साथ जन जान्यौ बिहबल तब छाँड़ि दियौ थल मैं।
(ख) प्रात खरिकहिं गई आइ बिहबल भई, राधिका कुँवरि कहुँ डस्यौ कारौ-७५१।
घुटुरुनि चलत अजिर महँ बिहरत, मुख मंडित नवनीत-१०-९७।
सब निसि याही भाँति बिहाइ-४-१२।
(क) भरत गयौ बन राज बिहाइ-६-२।
(ख) अंसुमान मुनि राज बिहाइ, गंगा हेतु कियौ तप जाइ-९-९।
आधी रात के बाद गाया जानेवाला एक राग।
रात को गाया जानेवाला एक राग।
बीतता है, व्यतीत होता है।
सुनहु स्याम तुम बिनु उन लोगनि जैसे दिवस बिहात-३४६०।
[सं. विभात, प्रा. विहाड, विहाण]
मोह-निसा कौ लेस रह्यौ नहिं भयौ बिबेक-बिहान-2-३३।
चिरई चुहचुहानी चंद की ज्योति परानी रजनी बिहानी प्राची पियरी प्रबान की-१६०९।
सूरदास प्रभु जान देहु अब बहुरि कहौगे कालि बिहाने-११३६।
सूरदास गोबर्धन पूजा कीने कर फल लेहु बिहाने ९५१।
सूरदास ऐसे लोगन को नाउँ न लीजै होत बिहानै-१५००।
देखि-देखि किलकत दँतियाँ द्वै राजत क्रीड़त बिबिध बिहार-१०-८४।
तिन युवती बन बननि बिहारे-2४५९।
(क) सूरदास प्रभु मन हरि लीन्हौं हँसत ही ग्वारिनि भई बिहाला-१०३४।
(ख) तरुनाई तनु आवन दीजे कित जिय होत बिहाला-१०३८।
(क) बारि-बिहीन मीन ज्यौं ब्याकुल त्यौं ब्रजनारि सबै।
(ख) सूरदास सोभा क्यौं पावै, पिय बिहीन धनि मटकैं-१-२९२।
(क) जादौपति जदुनाथ, छाँड़ि खगपति-साथ जानि जन विह्वल, छुड़ाइ लीन्हौ पल मैं-८-५।
(ख) बिह्वल तन-मन , चकृत भई सो, यह प्रतच्छ सुपनाए-९-३१।
ज्यौं कुज्वारि रस बींधि हारि गथु सोचति पटकि चिती-१० उ०-१०३।
नैना-बींधे दोऊ मेरे-पृ. ३२५ (४७)।
जमीन की एक नाप जो ३०२५ वर्ग गज की, और एकड़ के पाँचवें भाग के बराबर होती है।
[सं. विग्रह, प्रा. बिग्गह]
किसी परिधि, सीमा, वस्तु आदि का मध्य भाग।
बीच खेत - सबके देखते देखते।
बीच-बीच में - (१) रह-रह कर।
(२) थोड़ी-थोड़ी दूर पर।
धन्य हो धन्य हो तुम घोष नारी। मोहि धोखा गयौ, दरस तुमको भयौ तुमहिं मोहिं देखौ री बीच भारी।
बीच करना - (१) लड़नेवालों को रोकना।
(२) झगड़ा निबटाना।
उ. - बीच करन जो आवै कोऊ ताको सौंह दिवाऊँ-१५१२।
बीच न कियो - रक्षा नहीं की, बचाया नहीं।
उ. - बीच न काहू तब कियौ (जब) दूतनि दीन्हीं मार-१- ३२५।
बीच पड़ना - (१) अन्तर या परिवर्तन हो जाना।
(२) झगड़ा निबटाने के लिए मध्यस्थ बनना।
बीच डालना (पारना) - अन्तर, भेद या परिवर्तन करना।
बीच में पड़ना - (१) मध्यस्थ होना।
(२) जिम्मेदार या प्रतिभू बनना।
बीच रखना - दुराव या भेद रखना।
बीच में कूदना - दूसरे के काम में व्यर्थ ही पड़ना।
किसी को बीच में देना - मध्यस्थ या साक्षी बनाना।
किसी को बीच में रखकर कहना - उसकी शपथ खाकर कहना।
दो वस्तुओं के बीच का अन्तर या अवकाश।
पायौ बीच इंद्र अभिमानी हरि बिनु गोकुल आयौ-2८२०।
तुमसौं उनसौं बीच नहीं कछू तुम दोऊ बर नारि-१४२२।
बीच ही में, लगभग मध्य भाग में, आधी दूर पर।
मगन हौं भव-अंबुनिधि मैं कृपासिंधु मुरारि।….। थक्यौ बीच बिहाल विह्वल, सुनौ करुना-मूल। स्याम, भुज गहि काढ़ि लीजै, सूर ब्रज कैं कूल-१-९९।
(क) निकसे खंभ-बीच हैं नरहरि, ताहि अभयपद दीन्हौ-१-१०४।
(ख) पाहन-बीच कमल बिकसावै, जल में अगिनि जरै-१-१०५।
कहत हे, आगे जापिहैं राम। बीचहिं भई और की औरै परयौ काल सौं काम-१-५७।
सखा कहत हैं स्याम खिसाने।...। बीचहिं बोलि उठे हलधर तब याके माइ न बाप-१०-२१४।
बिया या दाना जिससे पौधा-अंकुरित होता है।
(क) बीज मन माली मदन चुर आलबाल बयौ-३३०७।
(ख) जैसो बीज बोइए तसौ लुनिए लोग कहत सब बावरी-३३३१।
स्वँग बनाने या नकल करनेवाला।
अस्तुति करत अमर-गन बहुरे, गए आपनैँलोक-५७९।
गए सु गए फेरि नहिं बहुरे का धौं जियहि धरी-१० ३३२ (१४)।
[हिं. बहुरना (बहुरि=फिरकर )]
(क) अब मेरो-मेरी करि बौरे, बहुरौ बीज बयौ-१- ७८।
(ख) कब वह मुख बहुरौ देखौंगी कब वैसौ सचु पैहौं-2५५०।
किसी कार्य की सिद्धि का गुर।
एक दिशा मनो मकर चाँदिनी, एक दिशा सघन बीजरी ऐसे हरि मन मोहैं-पृ. ३१६ (५७)।
किसी बीजमंत्र का पहला अक्षर।
(क) निसि अँधेरी, बीजु चमकै, सघन बरसै मेह-१०-५।
(ख) चमकत बीजु सैल कर मंडित गरजि निसान बजायो-2८४०।
विष्णु के अवतार एक देवता जिनका मंदिर पंढरपुर में है।
बीड़ा उठाना-१) किसी काम को करने का निश्चय करना।
(२) तत्पर होना।
बीड़ा डालना (रखना) - (१) किसी काम को करने का दायित्व लेने के लिए उपस्थित जन-समूह को चुनौती-सी देना।
बीड़ा उठानेवाला,कार्य-संपादन का भार लेनेवाला।
व्यतीत होते हैं, समय बीतता है, वक्त कटता है।
(क) दिन बीतत माया कैं लालच, कुल-कुटुंब कैं हेत-१-१२५।
(ख)-छिन इक माहिं कोटि जुग बीतत नर की केतिक बात-१-३१३।
भारत युद्ध होइ जब बीता। भयो जुधिष्ठिर अति भयभीता-१-२६१।
भयौ अकाज अर्द्धनिसि बीती, लछिमनकाज नसायौ-९-१५५।
हमरे मन की सोई जानै जापै बीती होई ३२०९।
घटित या मन पर पड़ी हुई बात का प्रभाव।
ऊधौ सों समुझाइ प्रगट करि अपने मन की बीती-2९४२।
(क) जनमत मरत बहुत जुग बीते, अजहूँ लाज न आइ-१-३१७।
(ख) कछु दिन पत्र भक्ष करि बीते कछू दिन लीन्हौ पानी।
बीतने पर, व्यतीत होने पर, समाप्ति के बाद।
भारत के बीतैं पुनि आयौ। लोगनि सब बृत्तांत सुनायौ-१-२८४।
बीतते हैं, व्यतीत होते हैं।
बाद-बिबाद सबै दिन बीतैं, खेलत ही अरु खात-2-२२।
सूर स्याम के बस्य भए जेहि बीतै सो जानै-पृ.३२७ (६४)
पड़ेगी, संघटित होगी। बीतैगी तबहीं जानौगे महा कठिन है नेह-३०६८।
उलटा नाम जपत अघ बीत्यौ मुनि उपदेस करायौ।
(क) बरन-बरन पट परत पाँवड़े, बीथिनि सकल सुगंध सिंचाई-९.१६९।
(ख) बारक इन बीथिनि ह्वै निक से मैं दूरि झरोखनि झाँक्यौ-2५४६।
नैना बीधे दोऊ मेरे-ना० २८९७।
बिनती करता हूँ, प्रार्थना करता हूँ।
गौरि गनेस्वर बीनऊँ (हो) देवी सारद तोहिं-१०-४०।
ब्रजबनिता मृग सावक नैनी बीनति कुसुमकली-2०७१।
(क) सूरदास की बीनती कोउ लै पहुँचावै-१-४।
(ख) सूरदास की यहै बीनती दस्तक कीजै माफ-१-१५३।
(ग) सूरदास की बीनती नीकैं पहुँचाऊँ-९-४२।
कठिन-कठिन कलि बीनि करत न्यारी प्यारी के चरन कोमल जानि सकुच अति गड़िबेहि डरात-2०६८।
काव्य के नौ रसों में एक जिसमें रक्त, मांस आदि का वर्णन रहता है।
तुम्हैं पहिचानति नाहीं बीर-९-८६।
सबै ब्रज है जमुना कैं तीर। कालिनाग के फन पर निरतत संकर्षन कौ बीर-५७५।
हाथ पहुँची बीर कंगन जरित मुँदरी भ्राजई।
एक छोटा लाल कीड़ा जिसके मखमली रोएँ होते हैं।
शिव जी के एक गण जो उनके पुत्र और अवतार माने जाते हैं। इनकी उत्पत्ति शिव जी के मुख से दक्ष प्रजापति का यज्ञ नष्ट करने के लिए हुई थी। सूरदास जी ने इनकी उत्पत्ति शिव जी की जटा से लिखी है।
सिव ह्वै क्रोध इक जटा उपारी। बीरभद्र उपज्यौ बलभारी-४-५।
जेंइ उठे अँचवन लियौ, दुहुँकर बीरा देत-४३७।
बीरा दीन्हौ - कार्य-भार सौंपा।
उ. - यह सुनि नृपति हरष मन कीन्हौं, तुरतहिं बीरा दीन्हौं-१०-६१।
बीरा लै आयौ - कार्य-संपादन करने का भार लिया।
उ. - बीरा लै आयौ सन्मुख तैं, आदर करि नृप कंस पठायौ-५९१।
वह फूल-फल जो देव-प्रसाद-रूप में भक्तों को दिया जाता है।
कह अपनी परतीति नसावत, मैं पायौ हरि हीरा। सूर पतित तबहीं उठिहै, प्रभु जब हँसि देहौ बीरा-१-१३४।
तब बीरी तनक मुख नायौ-१०-१८३।
शरीर की सात धातुओं में से एक जिसका निर्माण सबके अन्त में होता है।
रुद्र कौ बीर्य खसि के परयौ धरनि पर, मोहिनी रूप हरि लियौ दुराई-८-१०।
संख्या में दस का दूना हो।
[सं. विंशति, प्रा. वीशति, बीसा]
श्रेष्ठ, उत्तम। बीसहूँ बिसौ-निश्चय ही।
[सं. विंशति, प्रा. वीशति, बीसा]
जपत अठारहो भेद उनईस नहिं बीसहुँ बिसौ तै सुखहिं पैहै-१२७८।
ब्याहौ बीस धरौ दस कुबिजा अंतहु स्याम हमारे-३३४२।
बेसन के दस-बीसक दोना-३९६।
बीस (स्त्री या पुरुष)। कबहुँक मिलि दस-बीसक धावति लेति छिंड़ाइ मुरलि झकझोरी २४०३।
आठ संवत्सरों के तीन विभागों-पहली, ब्रह्म बीसी; दूसरी, विष्णु; और तीसरी रुद्र बीसी-में से कोई एक।
कहि राधा, किन हार चुरायो।...। सुमना बहुला चंपा जुहिला ज्ञाना भाना भाउ-१५८०।
एक गाय जिसने वृंदावन के बहुलावन में व्याघ्र के साथ सत्य व्रत का निर्वाह किया था।
वृंदावन के ८४ बनों में एक जहाँ बहुला गाय ने व्याघ्र के साथ सत्य वचन का निर्वाह किया था।
बकुल, बहुलि, बट कदम पै ठाढ़ी ब्रजनारी-१८२२।
वचन' का एक भेद जो एक से अधिक वस्तुओं का बोधक होता है (व्याकरण)।
जो सम या सुगम न हो, विकट।
नाग-नर-पसु सबनि चाह्यौ सुरसरी कौ बुंद-९-१०।
किसी चीज पर बनी, पड़ी या कढ़ी छोटी गोल बिंदी।
उर बघनहाँ, कंठ कठुला, झँडूले बार, बेनी लटकन मसि-बंदा मुनि-मनहर-१०-१५१।
एक मिठाई जो बेसन की बूँदों से बनायी जाती है।
[हिं. बूँद+एला (प्रत्य.)]
जी (दिल) का बुखार निकालना - दुख, शोक आदि की बात कहकर जी शान्त करना।
व्यक्ति जो अवस्था में बड़ा हो।
(अग्नि) बुझती या शांत होती है।
दारुन दुख दवारि ज्यौं तृन-बन, नाहिनँ बुझति बुझाई-९-५२।
जलती हुई चीज का जलना बंद हो जाना।
तपी या गरम चीज का ठंढा होना।
किसी गरम चीज का पानी में डालने से ठंडा होना।
उमंग या उत्साह में कमी आना।
तृप्ति या संतोष का अनुभव होना, शांत होना।
माधौ, नैंकु हटको गाइ।….। अष्ट-दस-घट नीर अँचवति, तृषा तउ न बुझाइ-१-५६।
मुख तन चितै, बिहँसि हरि दीन्हौ, रिस तब गई बुझाइ-१०-२९७।
(क.) बार बार बुझाइ हारी भौंह मोपर तानति-पृ. ३२६ (५४)।
(ख) ज्ञान बुझाइ खबरि दै आवहु एक पंथ द्वै काज-2९२५।
अग्नि बुझाने या, शांत करने से।
दारुन दुख दवारि ज्यौं तृन-बन नाहिनँ बूझति बुझाई-९-५२।
सूर स्याम लिए हँसति जसोदा नंदहिं कहति बुझाई-१०-१८९।
जोग सिखाये क्यों मन मानै क्यौंऽब ओसकन प्यास बुझाई-३३१०।
दुख, क्रोध आदि के आवेग में कमी हुई।
नैननि निरखि दुख निमेष न खंडित प्रेम ब्यथा न बुझाई-2९७६।
बुझाने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
सुनहु सूर अधरन रस अँचवो दुहुँ मन तृषा बुझाऊँगो-१९४४।
बुझा दे-बुझाने दे, शांत करने दे।
गोपालहिं माखन खान दै।...। गहि बहियाँ हौं लैकै जैहौं, नैननि तपति बुझान दै-१०-२७४।
जलती चीज की आग ठंढी करना।
तपी हुई धातु आदि को पानी में डालकर ठंढा करना।
किसी चीज को तपाकर उसका गुण पानी में लाने के लिए उसे पानी में डालना।
आवेग, उत्साह आदि शांत करना।
निसि-दिन दुखित मनोरथ करि करि, पावत हूँ तृष्ना न बुझानी-१-१४९।
(क) लोचन तृप्त भए दरसन तैं उर की तपति बुझानी-७७८।
(ख) ग्वालिनि बिकल देखि प्रभु प्रगटे हर्ष भयो तन तपति बुझानी-८४७।
आवेग या उत्तेजना में कमी हुई।
यह सुनि सुनि रिस कछुक बुझानी-१०४५।
काम-क्रोध-मद-लोभ-अगिनि तैं कहूँ न जरत बुझायौ-१-१५४।
बुझावन लागे-पूछने या बुझने लगे।
फल कौ नाम बुझावन लागे हरि कहि दियो अमोरि-2३७७।
पग तर जरत न जानै मूरख, घर तजि घूर बुझावै-2-१३१
चतुर काम फँग परे कन्हाई अब धौं इनहिं बुझावै को री-१५९३।
(क) करति स्नान सब प्रेम बुड़की देहि।
(ख) चकृत होइ नीर तैं बहुरि बुड़की देइ-2५७०।
कुढ़कर या झुँझलाकर बड़-बड़ाना।
राखौं नहीं इन्हैं भूतल मैं गोकुल देउँ बुड़ाई-९००।
पानी में गोता देकर प्राण लेना।
जो प्रतिमा की तरह चुप-चाप हो।
(क) बारि मैं ज्यौं उठत बुदबुद, लागि बाइ बिलाइ-१-३१६।
(ख) मनहुँ बुदबुदा उपजत अमी-2३२१।
पानी आदि की गहराई जो थाह या ऊँचाई से अधिक हो।
[हिं. बूढ़ा+आई (प्रत्य.)]
(क) त्राहि त्राहि करि नंद पुकारत, देखत ठौर गिरे भहराई। लोटत धरनि, परत जल भीतर, सूर-स्याम दुख दियौ बुढ़ाई-५४४।
(ख) नंद पुकारत रोइ बुढ़ाई मैं मोहिं छाड़्यौ-५८९।
अब मैं जानी, देह बुढ़ानी। सीस, पाउँ, कर कह्यौ न मानत तन की दसा सिरानी-१-३०५।
बूढ़े हो गये, शक्ति शिथिल या समाप्त हो गयी।
सात दिवस जल बरषि बुढ़ाने-१०६०।
बहुरौ ताहि बुढ़ापौ आवै। इंद्री-सक्ति सकल मिटि जावै-३-१३।
देखि बिधि को कह्यौ, यह बुढ़ायौ-८-८।
बौद्ध-धर्म के प्रवर्तक जो शाक्यवंशी राजा शुद्धोधन की रानी महामाया के गर्भ से जन्मे थे। हिंदू शास्त्रों के अनुसार ये दस अवतारों में नवें, और चौबीस अवतारों में तेईसवें माने जाते हैं।
बासुदेव सोई भयौ, बुद्ध भयौ पुनि सोइ। सोई कल्की होइहै, और न द्वितिया कोइ-2-३६।
चतुराई अंग-अंग भरी है, पूरन ज्ञान न बुद्धि (बुधि) की मोटी-१४७९।
वह जो बौद्धिक कार्य करके जीविकोपार्जन करता हो।
जिस तक बुद्धि न पहुँच सके।
ज्योतिष के नौ ग्रहों में से चौथा जिसकी उत्पत्ति बृहस्पति की स्त्री तारा के गर्भ से और चन्द्रमा के वीर्य से हुई थी। किसी किसी का मत है कि इसने वैवस्वत मनु की कन्या ईला से विवाह किया था जिससे पुरुरवा का जन्म हुआ था।
(क) सूरज कैं बैवस्वत भयौ।….। इला सुता ताकैं गृह जाई।….। बुध कैं आस्रम सो पुनि आयौ। तासौं गंधरब-ब्याह करायौ। बहुरौ एक पुत्र तिन जायौ। नाम पुरुरवा ताहि धरायौ-९-२।
(ख) पँचऐँ बुध कन्या कौ जौ है, पुत्रनि बहुत बढ़ैहैं-१०-८६।
बहु नग लगे इराव की अंगिया भुजा बहूटनि बलय संग को-१०४२।
एक जंगली पेड़ जिसका फल वैद्यक के अनुसार बहुत गुणकारी होता है।
[सं. विभीतक, प्रा. बहेड़अ, हि. बहेड़ा]
बाइबिरंग बहेड़ा हरैँ कहुँ बैल गोंद व्यापारी-११०८।
(क) सीतल मंद सुगंध पवन बहै। रोम-रोम सुखदाई-१८६६।
(ख) जैसी बयारि बहै। तैसी ओढ़िए जू पीठि-2०२५।
घुनो बाँस गत बुन्यौ खटोला, काहू कौ पलँग कनक पाटी को-१०उ०-७१।
महीन पिसी चीज को छिड़कना।
मुसलमानियों का एक ढीलाढाला पहनावा।
झिल्ली जिसमें गर्भ का बालक लिपटा रहता है।
बुरा मानना - (१) अप्रसन्न होना।
(२) बैर रखना।
बुरा-भला-हानि-लाभ।
डाँट-फटकार।
गाली-गलौज।
तातैं बुध हरि-सेवा करैं। हरि-चरननि नितही चित धरैं-९-८।
सात वारों में से एक जो मंगलवार के बाद और वृहस्पतिवार के पूर्व पड़ता है। यह वार बुद्धग्रह का माना जाता है।
बुद्धि, समझ, विचार-शक्ति।
बरज्यौ आवत तुम्हैं, असुर-बुधि इन यह कीनी-३-११।
बुधिवंत पुरुष यह सब सँभारैं-१०उ०-४६।
सूत, ऊन या अन्य तारों से कपड़ा तैयार करने या अन्य कोई वस्तु बिनने की क्रिया या भाव।
बुनने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
बृन्दाबन आदि, ब्रज आदि, गोकुल आदि, आदि बुन्यादि सब अहिर जारौं-५९०।
आदि-बुन्यादि सबै हम जानति काहे को सतरात-११२४।
अपने पास आने को कहकर, निकट बुलाकर।
निकट बुलाइ बिठाइ निरखि मुख, अंचर लेत बलाइ-९-८३।
जोइ जोइ माँग्यौ जिनि, सोइ सोइ पायौ तिनि, दीजै सूरदास दर्स भक्तनि बुलाइकै-१०-३१।
बुलाये, लौटाये, वापस कर लिये।
अस्वत्थामा अस्त्र चलायौ। अर्जुनहूँ ब्रह्मास्त्र पठायौ। उन दोउनि सो भई लराई। अर्जुन तब दोउ लिए बुलाई-१-२८९।
काकैं सत्रु जन्म लीन्यौ है, बूझै मतौ बुलाई-१०-४।
बुलाकर एकत्र करूँ, इकट्ठा करूँ।
तौ बिस्वास होइ मन मेरैं, औरौं पतित बुलाऊँ-१-१४६।
वह लम्बा मोती जिसे स्त्रियाँ नाक में पहनती हैं।
दच्छ प्रजापति जज्ञ रचायौ। महादेव कौं नाहिं बुलायौ-५-४।
(क) दीनदयाल, पतित पावन प्रभु, बिरद बुलावत कैसौ-१-१२९।
(ख) तुम कब मो सौं पतित उधार्यो। काहे कौं हरि बिरद बुलावत, बिन मसकत को तार्यो-१-१३२।
बोलने को प्रेरित करते हैं, बुलवाते हैं।
(नंद) बार-बार बकि स्याम सौं कछु बोल बुलावत–१०-१२२।
खेलन चलौ बालगोविंद। सखा प्रिय द्वारैं बुलावत घोष बालक बृन्द-१०-२१८।
जो अच्छा या उत्तम न हो, खराब।
भैया, बहुत बुरौ बलदाऊ-४८१।
(क) कह्यौ ब्रह्मा सिव-निन्दा जहाँ। बुरौ कियौ तुम बैठे तहाँ–४-५।
(ख) तै जु बुरौ कर्म कियौ, सीता हरि ल्यायौ-९-११८।
बुरौ मानेंगे - अप्रसन्न होंगे।
उ. - नंद बाबा बुरौ मानैगे और जसोदा मैया-४४५।
दीवारों के कोनों पर आगे की ओर निकला हुआ भाग।
पुकारती है, आवाज देकर बुलाती है।
छाक लिए सिर स्याम बुलावति-४५९।
पुकारते हैं, आवाज देकर बुलाते हैं।
कबहुँक लै लै नाम मनोहर धवरी धेनु बुलावते-2७३५।
बाँह उचारि काल की नाई धौरी धेनु बुलावहु-१०-१७९।
निमंत्रण दो, न्योता भेजो।
जसुमति नंदहिं बोलि कह्यौ तब, महर, बुलावहु जाति-१०-८९।
कहते हैं, घोषणा करते हैं।
पतित उधारन बिरद बुलावैं, चारौं बेद पुकारैं-१-१८३।
बुलाता है, पुकारता है, आने को कहता है।
नैन मूँदि, कर जोरि, नाम लै बारहिं बार बुलावै-१०-२४९।
बुलाएगी, अपने पास आने को कहेगी।
कबहुँक कृपावंत कौसिल्या, बधू-बधू कहि मोहिं बुलैहै-९-८१।
पवन बुहारत द्वार सदा संकर कुतवारी-११२८।
झाड़ू देती है, साफ करती है।
द्वार बुहारति फिरति अष्टसिद्धि-१०-३२।
जल जैसे तरल पदार्थ का बहुत ही थोड़ा अंश जो गिरते समय छोटे दाने की तरह जान पड़ता है।
करन-मेघ बान-बूँद भादौंझरि लायौ-१-२३।
बूँद गिरना (पड़ना) - हल्की वर्षा होना। बूँद भर - बहुत थोड़ा।
नान्हीं नान्हीं बूँदन में ठाढ़ो री-८३८।
बेसन के दानों की एक मिठाई।
अपनी योग्यता की धाक जमाने को बातें गढ़ना।
अभ्रक का चूर्ण जो गुलाल में मिलाकर होली में उड़ाया जाता है।
बूका सुरँग अबीर उड़ावत भरि-भरि झोरी-2४०८।
जौ लौं सत-सरूप नहिं सूझत। तौ लौं मृग-मद नाभि-बिसारे, फिरत सकल बन बूझत-2-२५
राजा, इक पंडित पौरि तुम्हारी। अपद-दुपद पसु भाषा बूझत अविगत अल्प अहारी-८-१४।
बार-बार हरि मातहिं बूझत, कहि चौगान कहाँ है-१०-२४३।
सखा बृंद लै तहाँ गए बूझन तेहि लागे-2५७५।
यह तौ नाहिं बदी हम उनसौ बूझहु धौं यह बात-११९०।
जानि-बूझि मैं होत अजान-१-३४२।
जसुदा यह न बूझि कौ काम। कमल नैन की भुजा देखि धौं, तैं बाँधे हैं दाम-३६७।
उठौ महरि कुसलात बूझियै आनन्द उमँगि भरी-2९६२।
ते मोहिं मिले जात घर अपनैं, मैं बूझी तब जाति-१०-३६।
न बूझी बातें - खोज-खबर भी न ली।
ज्यों मधुकर अम्बुज रस चाख्यौ बहुरि न बूझी बातै आइ-३०५३।
अज, अबिनासी, अमर प्रभु, जनमै-मरै न सोइ। नटवर करत कला सकल, बूझै बिरला कोइ-2-३६।
(क) याकै चरित कहा कोउ जानै, बूझौ धौं संकर्षन भैया-१०-३३५।
(ख) जंत्र-मंत्र कह जानै मेरौ। यह तुम जाइ गुनिनि कौं बूझौ, इहाँ करति कत झेरौ-७५३।
सूरदास अब कहति जसोदा, बूझ्यौ सबकौ ज्ञान३३५।
मारी-मारी फिरे, खीजती फिरे।
अपनो चाउ सारि उन लीन्हों तू काहै अब बृथा बहै री-१६६०।
जिनि चरननि छलियौ बलि राजा, नख गंगा जु बहैया-१०-१३१।
(पशुओं को चराने के पश्चात) घर की ओर हाँकता है।
कबहुँक रहसि देत आलिंगन कबहुँक दौरि बहोरति गाई-१३००।
(पशुओं) को चराकर घर की ओर हाँकना।
(क) जद्यपि हो त्रयलोक के ईश्वर परसि दृष्टि चितवति न बहोरी-2८९०।
(ख) धोखे ही बिरवा लगाइ कै काटत नाहिं बहोरी-३३ ८।
लौटाओ, (पशु को) घर की और हाँको।
घर को गाय बहोरो मोहन ग्वालनि टेर सुनाए-९५८।
(भार) लाद कर ले चलता हूँ, भार ढोता हूँ, वहन करता हूँ।
कबहुँक चढ़ौं तुरंग, महागज, कबहुँक भार बहौं-१-१६१।
तहँ के बासी नृपति बुलाइ। बूझ्यौ, तब तिन कही सुनाइ-९-३।
डूबता है, निमज्जित होता है।
(क) मोह-समुद्र सूर बूड़त है, लीजै भुजा पसारि-१.१११।
(ख) सूरदास प्रभु गोकुल बूड़त काहे न लेत उबारे-2७७४।
ताकी कहा कहौं सुनि सूरज बूड़त कुटुँब समेत-2-१५।
मंदराचल समुद्र माँहि बूड़न लग्यौ, तब सबनि बहुरि अस्तुति सुनाई-८.८।
(जल या पानी आदि में) डूबना।
बूड़ि मुए कै कहुँ उठि गए-१-२८४।
सोक-सिंधु बूड़ी नँदरानी-५४७।
डूबता है, निमज्जित होता है।
कबहुँक तृन बूड़ै पानी में, कबहुँक सिला तरै-१-१०५।
डूब गया, निमज्जित हो गया।
सूरदास कहै, सब जग बूड़्यौ, जुग-जुग भक्त तरयो-१.२९१।
प्रेम न रुकत हमारे बूते-३३०५।
(क) कुमुद बृंद सँकुचित भए, भृंगलता भूले-१०.१०२।
(ख) मनौ बेद बंदीजन सूत-बृंद मागध-गन, बिरद बदत जै जै जै जैति कैटभारे-१०-२०५।
वृन्दावन के चंद श्रीकृष्ण।
देखन दै बृदावन-चंदहिं-८०३।
विवरण, समाचार, हाल, सूचना।
भारत के बीतैं पुनि आयौ। लोगनि सब बृत्तांत सुनायौ-१-२८४।
व्यर्थ, निष्फल, निष्प्रयोजन।
(क) सूर प्रभु जिहिं करै कृपा, जीतै सोई, बिनु कृपा जाइ उद्यम बृथाई-८-८।
(ख) आजु कहा उद्यम करि आए। कहै, बृथा भ्रमि भ्रमि स्रम पाए-४-१२।
बारह राशियों में से दूसरी जिसमें १४१ तारे हैं एवं कृत्तिका नक्षत्र के अंतिम तीन पाद, पूरा रोहिणी नक्षत्र और मृगशिरा नक्षत्र के पहले दो पाद हैं।
बृष है लग्न, उच्च के निसिपति, तनहिं बहुत सुख पैहैं-१०-८६।
एक दैत्य का नाम जिसने शुक्राचार्य को अपना पुरोहित बनाया था। शर्मिष्ठा इसकी पुत्री थी।
सत्यभामा के एक पुत्र का नाम।
अर्जुन का वह नाम जो अज्ञातवासकाल में राजा विराट की पुत्री को नाच-गाना सिखाने के लिए रखा गया था।
अघ, बक, बृषभ, बकी, धेनुक हति, भव जलनिधि तै जु उबारे-१-२७।
श्रीराधिका जीके पिता। ये पद्मावती के गर्भ से उत्पन्न सुरभानु के पुत्र थे। पहले ये रावल ग्राम में रहते थे और यहीं राधा का जन्म हुआ था; पश्चात् कंस के उपद्रवों से ऊबकर ये बरसाने जा बसे थे।
बकी, बकासुर, सकट, तृनाब्रत, अघ, प्रलंब, बृषभास। कंस-केसि कौं वह गति दीनी, राखे चरन निवास-४८७।
वृषल या शूद्र जाति की स्त्री।
(क) क्यों दासी-सुत कैं पग धारे ? ... .। सुनियत हीन, दीन, बृषली-सुत, जाति-पाँति तै न्यारे-१-२४२।
(ख) अजामिल बिप्र कनौज निवासी। सो भयौ बृषली कैं गृहवासी-६-४।
ऊपर से बहुत सी चीजों का एक साथ गिरना।
बान-बृष्टि स्रोनित करि सरिता, ब्याहत लगी न बार-९-१२४।
देव-गुरु जिनके पिता अंगिरस थे और माता श्रद्धा थीं।
जैसैं ब्याल बेंग कौ ढूके बेंग पखारी ताके हो।
घर घर बेंचति फिरति दही री-१०-२९।
नंद ग्राम को मारग बूझै है कोउ दधि बेचनहारी-१२१२।
(क) विद्या बेंचि जीविका करिहौ-४-५।
(ख) लाज बेंचि कूबरी बिसाही संग न छाँड़त एक घरी-2६७७।
बेंचि खाई - खो दी, गवाँ दी।
उ. - पुरुष केरी सबै सोहै कूबरी के काज। सूर प्रभु की कहा कहिए बेंच खाई लाज-2७२७।
गिरती वस्तु को रोकने के लिए नीचे लगाई जानेवाली टेक या चाँड़।
बे ते करना - तिरस्कार के ढंग से बात करना।
एक लता के डंठल की बनी हुई छड़ी।
छोरि उदर तैं दुसह दाँवरी, डारि कठिन कर बेंत-१०-३४९।
बेंत की तरह काँपना - बहुत डर कर काँपना।
स्त्रियों के माथे का एक आभूषण।
नाना बिधि सिंगार बनाये बेंदा दीन्हौ भाल।
बेंदी भाल नैन नित आँजति निरखि रहति तनु गोरी।
(क) गुरुजन में बैठी आये हरि बेंदी सँवारन मिस पाइ लागी-११५४।
(ख) बदन बिंद जराइ की बेंदी ता पर बनै सुधारत-2०८०।
मेरे जिय में ऐसी आवत जमुना जाइ बहौं २७७४।
सूरदास उमँगे दोउ नैना सिंधू प्रवाह बह्यौ-१-२४७।
भ्रम में पड़ा रहा, भटकता फिरा।
धोखैं ही धोखैं बहुत बह्यो-१-३२७।
बच्चों की बाँह का एक चन्द्राकार आभूषण।
जिसे कोई काम न हो, निकम्मा, निठल्ला।
माधौ जू, मोहिं काहे की लाज। जनम-जनम यौं ही भरमायौ, अभिमानी, बेकाज-१-१५०।
(क) हित की कहत कुहित की लागत इहाँ बेकाज अरौ -३०३६।
(ख) रे अलि चपल मूढ़ रस-लंपट कतहिं बकत बेकाज-३१६१।
कतहिं बकत बेकाम काज बिन होहि न ह्याँ तें हातौ-३१३२।
बिना मजदूरी दिये जबरदस्ती लिया गया काम।
बेगार टालना-जैसे-तैसे बेमन से काम पूरा कर डालना।
चटपट, तुरन्त, शीघ्रता से, जल्दी से।
(क) लीजै बेगि निबेरि तुरत हीं सूर पतित कौ टांड़ौ-१-१४६।
(ख) पठवहु बेगि गोहार लगावन सूरदास जिहि नाम-2७२६।
मथुरा जाति हौं बेचन दहियौ-१०-३१३।
बेचनेवाली, वह स्त्री जो कोई वस्तु बेचती हो।
[हिं. बेचना+हारी (प्रत्य.)]
हाट की बेचनहारी - गली-गली बेचनेवाली, क्षुद्र प्रकृति की नारी जो हाट-बाट में (वस्तु) बेंचती फिरती है।
उ. - ब्रज की ढीठी गुवारि, हाट की बेचनहारि सकचै न देत गारि झगरत हूँ।
जिसमें बहुत कम दम या शक्ति हो।
वृक्ष के चारों ओर लगायी गयी बाड़, मेंड़।
लकड़ी, लट्ठों को बाँधने से बना ढाँचा जिस पर बैठकर नदी पार की जा सके।
बेड़ा पार करना (लगाना) - संकट से पार करना।
बेड़ा पार लगना (होना) - संकट से छुटकारा मिलना। बेड़ा डूबना - संकट से नाश हो जाना।
जिसके समान दूसरा न हो, अनुपम।
गेहूँ जौ, चना आदि मिले हुए अनाज।
बेटला, बेटवा, बेटा, बेटौना, बेट्टा
बेटला, बेटवा, बेटा, बेटौना, बेटा
बूझत-स्याम, कौन तू गोरी। कहाँ रहति, काकी है बेटी-६७३।
लोहे की जंजीर जो कैदियों को पहनायी जाती है, निगड़।
जो ठीक ढंग से लगाया या रखा न गया हो।
शीश फूल नामक सिर का गहना।
निस्संकोच कार्य या व्यवहार करनेवाला।
बुन्देलखंड की एक नदी जो भूपाल के ताल से निकलकर जमुना में मिलती है।
भारतीय आर्यों के प्राचीन धार्मिक ग्रंथ जो चार हैं - ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद।
ज्यों अचेत बालक की बेदन अपने ही तन सहिए।
किसी शुभ या धार्मिक कार्य के लिए तैयार की हुई ऊँची भूमि, मंडप।
चलियै बिप्र जहाँ जग-बेदी, बहुत करी मनुहारी-८.१४।
बादले और कलाबत्तू का बना सुनहरा-रूपहला फीता जो साड़ियों में टाँका जाता है।
बाल बाँकना - हानि पहुँचाना, कष्ट देना।
छेदता है, सूराख करता है, भेदता है।
पाहन पतित बान नहिं बेधत रीतो करत निषंग-१-३३२।
अधार-निधि बेधीर करिकै करत आनन हास।
बहुत सनाह समर सर बेधे, ज्यौं कंटक नल नाल-१-२७८।
छेद दे, भेद दे, बेध डाले।
अचरज कहा पार्थ जौ बेधै, तीनि लोक इक बान-१-२६९।
कजरी कौ पय पियहु लाल, जासौं तेरी बेनि बढ़ै-१०-१७४।
गंगा, सरस्वती और यमुना का संगम, त्रिवेणी।
सहस बार जौ बेनी परसौ चंद्रायन कीजै सौ बार। सूरदास भगवंत-भजन बिनु, जम के दूत खरे हैं द्वार-2-३।
सुभ स्रवननि तरल तरौन, बेनी सिथिल गुही-१०-२४।
ताल, मृदंग, झाँझ, इंद्रिनि मिलि, बीना, बेनु बजायौ-१-२०५
जिसमें शील या संकोच न हो।
बेर सूर की निठुर भए प्रभु, मेरौ कछु न सरयौ १-१३३।
(क) प्रभु, हौं बड़ी बेर को ठाढ़ौ। और पतित तुम जैसे तारे, तिनहीं मैं लिखि काढ़ौ-१-१३७।
(ख) मेरे प्रान-जिवन-धन माधौ, बाँधे बेर भई-३८१।
मरती बेर सम्हारन लागे जो कछु गाड़ि धरी-१-७१।
सिव-आहुति-बेरा जब आई। विप्रनि दच्छहिं पूछयौ जाई-४-५।
दूसरों का दुख-दर्द न समझनेवाला, निर्दयी, निष्ठुर।
सूरदास प्रभु दुखित जानिकै छाँड़ि गए बेपीर-2६८६।
(क) आवहु कान्ह, साँझ की बेरिया-१०-२४६।
(ख) ग्वाल-मंडली मैं बैठे मोहन बट की छाँह, दुपहर बेरिया सखनि संग लीने-४६७।
लोहे की जंजीर जो प्रायः कैदियों को पहनाई जाती है, बेड़ी, निगड़।
(क) पांडव सब पुरुषारथ छाँड़्यौ, बाँधे कपट-बचन की बेरी-१-२५१।
(ख) पति अति रोष माँहि मन ही मन, भीषम दई बचन बँधि बेरी-१-२५२।
(ग) प्रीतम भयो पाइ की बेरी-८०७।
सूर मधुप उठि चले मधुपुरी बोरि जोग को बेरो-३४३१।
लकड़ी का लंबा गोल खंड जो रोटी-पूरी बेलने के काम आता है।
बेलन की सहायता से चकले पर रोटी-पूरी आदि को तैयार करना।
पापड़ बेलना - नुसीबतें और कठिनाइयाँ सहकर काम करना या समय काटना।
(२) नष्ट करना।
(२) पानी के छीटें उड़ाना।
एक-छोटा पौधा जिसमें बहुत सुगंधित सफेद फूल लगते हैं।
[सं. विचकिल, प्रा. बिअइल्ल]
बेले के फूल की तरह का एक गहना।
[सं. विचकिल, प्रा. बिअइल्ल]
तेल नापने की चमड़े की कुल्हिया।
बेला भरि हलधर कौ दीन्हौ। पीवत पय बल अस्तुति कीन्हौ-३९६।
लकड़ी-लट्ठों का बना बेड़ा।
सेमर-ढाकहिं काटिकै बाँधौं तुम बैरौ-९-४२।
बेल मँढ़े चढ़ना - किसी काम में अभीष्ट क्रम से पूरी सफलता मिलना।
काम-काज के अवसर पर 'परजा' को दिया जानेवाला धन या नेग।
बेल बढ़ना - वंश - वृद्धि होना।
बेल-बूटेदार रेशमी या मखमली फीता।
लकड़ी, पत्थर आदि का कुछ लम्बा और गोल खंड।
बरनि न जाइ कहाँ लौ बरनौं प्रेम-जलधि वेला बल बोरे।
(क) ते बेली कैसैं दहियत हैं, जे अपनै रस भेइ १-२००।
(ख) फिरत प्रभु पूछत बन द्रुम-बेली-९-६४।
लेनदेन का व्यवहार करनेवाला, महाजन।
टेढ़े, तिरछे, बाँकापन लिये हुए।
ससि-गन गरि रच्यौ बिधि आनन, बाँके नैननि जोहै-१०-१५८।
दुहुँ दिसि सुभट बाँके बिकट अति जुरे मनो दोउ दिसि घटा उमड़ि आई-१० उ०-१।
नरहरि ह्वै हिरनाकुस मार्यौ, काम पर्यौ हो बाँकौ-१-५१३।
(क) बाँह पकरि तू ल्याई काको अति बेशरम गँवारि।
(ख) ऐसे जन बेशरम कहावत-३००९।
बेशर्मी निलज्जता, बेहयाई।
[हिं. बैठाना, गुज. बैसाना]
[हिं. बैठाना, गुज. बैसाना]
नाक में पहनने का एक आभूषण, नथ।
बाँह पकरि तू ल्याइ काकौं, अति बेसरम गँवारि। सूर स्याम मेरे आगे खेलत, जोबन-मद मतवारि-१०-३१४.
नाक में पहनने की छोटी नथ।
कच खुबि आँधरि काजर कानी नकटी पहिरै बेसरि-३०२६।
तुरत मोहिं गोकुल पहुँचावहु,-यह कहि कै सिसु बेष धरयौ-१०-८।
छाया हुआ, घिरा हुआ, लिपटा हुआ।
मुक्त-माल बिसाल उर पर, कछु कहौं उपमाइ। मनौ तारा-गननि बेष्ठित गगन निसि रहयौ छाइ-१०-२३४।’
बेसन मिलै सरस मैदा सौं अति कोमल पूरी है भारी-१०-२४१।
बरी, बरा, बेसन, बहु भाँतिनि, ब्यंजन बिबिध अगनियाँ.-१०-२३८।
स्वीकृति-सूचक शब्द, स्वीकार है।
(क) काम-क्रोध-मद-लोभ-महाभय, अहनिसि नाथ, रहत बेहाल-१-१२७।
(ख) मीड़त हाथ सकल गोकुल जन बिरह बिकल बेहाल-2५३६।
(ग) मुरछि परी धरनी बेहाला-३४०८।
एक पौधा जिसके फल की तरकारी बनती है।
बैंगन के टकड़े को बेसन में लपेटकर बनायी गयी पकौड़ी।
त्राहि-त्राहि द्रौपदी पुकारी, गई बैकुंठ अवाज खरी १-२४९।
बानप्रस्थ आश्रम में रहनेवाला यति।
बैठने का स्थान, चौपाल, अथाई।
वह आसन या पीठ जिस पर बैठा जाय।
(क) अति आदर करि बैठक दीन्हों-१२८५।
(ख) हृदय माँह पिय घर करौं री नैनन बैठक देउँ-१२१५।
(ग) गई भवन भीतर लिए तहँ बैठक दीन्हों–२१८२।
मूर्ति, खम्भे आदि की चौकी।
कनक-भूमि पर कर-पग-छाया यह उपमा इक राजति। करि-करि प्रतिपद प्रतिमनि बसुधा कमल बैठकी साजति-१०-११०।
मूर्ति, खंभे आदि की चौकी।
बैठत-उठत - उठते-बैठते, हर समय।
उ. - बैठत-उठत सेज सोवत मैं कंस डरनि अकुलात-१०-१२।
बैठने की क्रिया, भाव या ढंग।
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]
बैठना-उठना-(१) समय बिताना।
(२) साथ या संगत में रहना।
उठ-बैठना - (१) जाग जाना।
(२) लेटा न रहना।
किसी खाली जगह में ठीक तरह से जमना।
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]
घुली हुई चीज का तल में इकट्ठा हो जाना।
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]
धारण करते हो, रखते हो, वहन करते हो।
सूर पतित कौं ठौर नहीं, तौ बहत बिरद कत भारौ-१-१३१।
(वायु) संचालित होती है, (वायु) चलती है।
बहत पवन, भरमत ससि-दिनकर, फनपति सीस न डुलावै-१-१६३।
बहता है, प्रवाहित होता है।
चहुँ दिसि कान्ह्-कान्ह करि टेरत अँसुवन बहत पनारे-३४४६।
सूर प्रभु कौ ध्यान चित धरि अतिहि काहे। बहति।
बहती गंगा में हाथ धोना (पाव पखारना) - ऐसी चीज या अवसर से लाभ उठाना जिससे सब लाभ उठा रहे हों।
दाऊ जू कहि, हँसि मिले, बाँह गही बैठाइ-४३१।
अरघासन दै प्रभु बैठाए-९-६७।
किसी स्थान पर ठीक से जमना।
धुली हुई वस्तु को तल पर इकट्ठा करना।
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]
किसी स्त्री का पत्नी के समान रहने लगना।
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]
बैठने की क्रिया, भाव या ढंग।
धन्य यह मिलनि धन्य यह बैठनि धन्य अनुराग नहीं रुचि थोरी-पृ. ३१० (४)।
(ख) लोचन भए पखेरू माइ।….। मोर मुकुट टाटी मानौं यह बैठनि ललित त्रिभंग-2८९० (ना.)।
नीचे की ओर जाना, धँस जाना।
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]
चलता हुआ कार्य-व्यापार बिगड़ जाना।
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]
पकाने पर चावल का गीला हो जाना।
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]
राजा का वह सेवक जो स्तुति-पाठ कर उन्हें जगाता था।
(अश्विनि-सुत) कह्यौ, हम जज्ञ-भाग नहिं पावत। बैद्य जानि हमकौं बहरावत-९-३।
किलकि-किलकि बैन कहत मोहन मृदु रसना-१०-९०।
बाहिर बाँधि सुतहिं बैठारौ। मथति दही माखन तोहिं प्यारौ-३९१।
बैठाने की क्रिया, भाव या ढंग।
पाइन परि सब बधू महरि बैठावन रे-१०-२५।
हाथहिं पर तोहिं लीन्हे खेलै नैंकु नहीं धरनी बैठावै-१०-१९१।
स्थित या आसीन होने का भाव, कार्य या ढंग।
ध्रुव खेलत-खेलत तहँ आए। गोद बैठिबे कौं पुनि धाए-४-९।
सुनि देवकी को हितू हमारे। असुर कंस अपबंस बिनासन, सिर ऊपर बैठे रखवारे-१०-१०।
स्थित हों, आसीन हों, बैठें।
मेरैं संग आइ दोउ बैठैं, उन बिनु भोजन कौने काम-१०-२३५।
यम के द्वार के पास की एक कल्पित पौराणिक नदी।
कार्य-व्यापार चलता न रहने देना।
फेंक या चलाकर किसी स्थान पर पहुँचाना।
जमीन में गाड़ना या जमाना।
किसी स्त्री को पत्नी के रूप में रख लेना।
बहुरौ गोद माँहि बैठार। कह्यौ, पढ़ेकहबिद्या-सार-2।
तोहिं बैठारिहौं नाव मैं हाथ गहि, बहुरि हम ज्ञान तोहिं कहि सुनावै-८-१६।
भेंट रूप में भेजी गयी मिठाई।
बैर काढ़ना (निकालना) - बदला लेना।
बैर काढ़त - बदला लेता है।
उ. - यहि बिधि सब नवीन पायौ ब्रज काढ़त बैर दुरासी। बैर ठहना (ठानना) - दुर्भाव रखना।
बैर ठयौ - दुर्भाव हो गया है।
उ. - कालि नहीं यहि मारग ऐहौं, ऐसौ मोसौं बैर ठयौ। बैर डालना विरोध पैदा करना। बैर पड़ना - शत्रु बनकर कष्ट पहुँचाना।
बैर परै - शत्रु बन जाय, विरोध करे।
उ. - (क) जाकौं मनमोहन अंग करै। ताकौ केस खसै नहिं सिर तैं जौ जग बैर परै-१- ३७।
(ख) कुटुंब बैर मेरे परे बैरिनि बैरि सिसुपाल-४१८८ (ना.)।
बैर बढ़ाना - दुर्भाव उत्पन्न करना।
बैर बढ़ैहै - दुर्भाव उत्पन्न करेगी।
उ. - सुनहु सूर रस छकी राधिका बातन बैर बढ़ैहै-१२६३।
बैर बढ़ैहौ - दुर्भाव उत्पन्न करोगी।
उ. - आवत जात रहत याही पथ मोसौं बैर बढ़हौ। बैर बिसाहना (मोल लेना) व्यर्थ ही शत्रु बना लेना।
बैर मानना - दुर्भाव या द्वेष रखना।
बैर लेना - बदला लेना।
बैर लेहु - बदला लो।
उ. - भ्राता-बैर लेहु तुम जाइ-७- २।
लैहौं बैर - बदला लूँगा।
उ. - लैहौं बैर पिता तेरे को जैहै कहाँ पराई।
सेना का झंडा, ध्वजा, पताका।
सोई करौ जु बसतै रहियै, अपनौ धरियै नाउँ। अपने नाम की बैरख बाँधौ, सुबस बसौं इहिं गाउँ-१-१८५।
मानौ बैराग पाइ, सकल सोक-गृह बिहाइ, प्रेम-मत्त फिरत भृत्य, गुनत गुन तिहारे-१०-२०५।
वैष्णव साधुओं का एक वर्ग।
जो भक्तनि सौं बैर करत है, सो बैरी निज मेरौ-१-२७२।
व्यक्ति जो शत्रुता या द्वेष रखता हो।
रंगभूमि मैं कंस पछारौं धीसि बहाऊँ बैरी-१०-१७६।
विरोचन का पुत्र, राजा बलि।
जज्ञ करत बैरोचन कौ सुत, बेद-बिहित बिधि-कर्मा-१-१०४।
प्रभु जू, यौं कीन्हीं हम खेती।...। काम-क्रोध दोउ बैल बली मिलि, रज-तामस सब कीन्हौ। अति कुबुद्धि मन हाँकनहारे, माया जूआ दीन्हौ-१-१८५।
मूर्ख या बुद्धिहीन व्यक्ति।
सूर्य के एक पुत्र का नाम।
सूरज कैं बैवस्वत भयौ। सुत-हित सो बसिष्ठ पै गयौ-९-२।
(क) हम तुम सब बैस एक, को कारौं को अगरौ-१०-३३६।
(ख) जिन कीन्हे मोहन सुबस बैस ही थोरी-४२८६ (ना.)।
बैस चढ़ै - युवावस्था को प्राप्त हो, जवानी आए।
कजरी कौ पय पियहु लाल, जासौं तेरी बेनि बढ़ैं। जैसै देखि और ब्रज बालक, त्यौं बल-बैस चढ़ै-१०-१७४।
अवध का पश्चिमी प्रान्त जहाँ बैस क्षत्रियों की बस्ती थी।
ठाली बैसी है - कोई काम-धाम नहीं है, निठल्ली है।
उ. - ऐसी को ठाली बैसी है तो सौं मूड़ लड़ावै-३२८७।
जनम सिरानौ ऐसैं। कै घर-घर भरमत जदुपति बिनु, कै सोवत, के बैसैं-१-२९३।
सोई तिथि-बार-नछत्र-लगन-ग्रह सोइ जिहिं ठाट ठयौ। तिन अंकनि कोउ फिरि नहिं बाँचत गत स्वारथत समयौ-१-२९८।
(क) कर्म-कागद बाँचि देखौ, जौ न मन पतियाइ-१-२१६।
(ख) तब उन बाँचि सुनाई -२९७८।
देहौं छाँडि राखिहौं यह ब्रत हरि हितु बीजु बहुरि को बैहौं-2५२४।
बोने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
बीज जमाइए, उगाइये, पैदा कीजिए।
(क) जैसोइ बोइयै तैसोइ लुनिए, कर्मन भोग अभागे-१-६१।
(ख) जैसौ बीज बोइए तैसौ लुनिए लोग कहत सब बावरी-३३३१।
(क) सूरदास भगवंत-भजन बिनु धरनी जननि बोझ कत मारी ?-१-३४।
(ख) जोग मोट सिर बोझ आनि तुम कत धौं घोष उतारी-३३१६।
कार्यसंपादन का श्रम या कष्ट।
वस्तु या व्यक्ति के संबन्ध-निर्वाह का भार।
भार जो एक बार में लादा जाय।
बोझ उठना- कार्य-भार लिया जा सकना।
बोझ उठाना - कार्य-भार का दायित्व लेना।
बोझ उतरना-कठिन कार्य या दायित्व से छुटकारा पाना।
बोझ उतारना - कठिन कार्य या दायित्व से छुटकारा दिलाना।
(२) ऐसा कार्य करना या स्वयं दायित्व ले लेना, जिससे दूसरे की चिंता दूर हो जाय।
(३) बेमन से काम करके बेगार-सी टालना।
फुसफुसापन, फुसफुसा होने का भाव।
श्रृंगार रस का एक हाब जिसमें संकेत या क्रिया द्वारा मन का भाव जताया जाता है।
पुनि पुनि बोधत कृष्न लिखौ नहिं मेटै कोई-2६२५।
(क) एकनि माथै दूब-रोचना, एकनि कौं बोधति दै धीर-१०-२५।
(ख) सुनहु सूर जसुमति सुत बोधति बिधि के चरित सबै हैं न्यारे-६०८।
सूर प्रभु कियौ बिस्राम सब निसि तहाँ बोधि अक्रूर निज घर पठाए-2५७०।
बोधितरु, बोधिद्रुम, बोधिवृक्ष
गया नगर का पीपल का वह पेड़ जिसके नीचे गौतम बुद्ध ने बुद्धत्व प्राप्त किया था।
जो बुद्धत्व प्राप्त करने का अधिकारी हो, परंतु उसे प्राप्त न कर पाया हो।
सूर यह कहि जननि बोधी, देख्यौ तुमहीं आइ-५८०।
उगाने के लिए बीज को जमीन में छितराना या डालना।
इधर-उधर डालना या छितराना।
कंस, केसि, चानूर, महाबल करि निरजीव जमुनजल बोयौ-१-५४।
अपनौ बोयौ आप लोनिए तुम आपहिं निरुवारौ ३२९४।
कँगूरेदार धुंघरू जो आभूषणों में गूँथा जाता है।
डुबाता है, बोरता है, निमग्न करता है।
यह भव-जल कलिमलहिं गहे हैं, बोरत सहस प्रकारौ-१-२०९।
बोरती, डुबाती या निमग्न करती है।
गोलक नाउ निमेष न लागत सो पलकनि बर बोरति-३४५४।
गर्व सहित आयो ब्रज बोरन, यह कहि मेरी भक्ति घटाई-९९६।
रंग के घोल में डालकर रँगना।
सूर मधुप उठि चले मधुपुरी बोरि जोग को बेरौ-३४३१।
बल समेत निसि बासर बरसह गोकुल बोरि पताल पठावहु-९४७।
सुगंधित जल या रंग में डुबोकर।
रचि स्रक कुसुम सुगंध सेज सजि बसन कुमकुमा बोरि-2८१२।
नील पुट बिच मनौ मोती धरे बंदन बोरि-१०-२२५।
बोरिया-बँधना उठाना ( समेटना) - चलने की तैयारी करना।
धन-जोबन अभिमान अल्प जल, काहे कूर आपनी बोरी-१-३०३।
डुबाकर भिगोई हुई, अच्छी तरह तर की हुई, रस से भरी हुई।
सुठि सरस जलेबी बोरी। जिहिं जेंवत रुचि नहिं थोरी-१०-१८३।
घेवर अति घिरत चभोरे। लै खाँड़ सरस रस बोरे-१०-१८३।
डुबा देने से, बोरने से, निमज्जित करने से।
प्रेम के सिंधु को मर्म जान्यौ नहीं, सूर कहि कहा भयै देह बोरैं-१-२२२।
पानी की बाढ़ में डुबो दूँ,या डुबोकर बहा हूँ।
ब्रज बोरौं प्रलय के पानी-१०२४।
प्रीति नदी महँ पाँव न बोरयौ दृष्टि न रूप परागी-३३३५।
कैसै नाथहिं मुख दिखराऊँ, जौ बिनु देखे जाउँ। बानर बीर हँसैंगे मोकौं, तैं बोरयौ पितु नाउँ-९-७५।
(क) (सुरपति) काग-रूप करि रिषिगृह आयौ। अर्धनिसा तिहिं बोल सुनायौ-६-८।
(ख) बार-बार बकि स्याम सौं कछु बोल बुलावत१०-१२२।
(ग) स्रवन सुनत सुठि मीठे बोल-६३०।
ताना, व्यंग्य, चुभती हुई बात।
ब्रज बसि करके बोल सहौं-2७७४।
लोचन मानत नाहिन बोल-पृ० ३३५ (४५)।
बात, कथन, निश्चय, प्रतिज्ञा।
अब न कौनौ चूक करिहौं यह हमारे बोल-३४७५।
बोल रखना - बात मानकर काम करना, बात या कहा न टालना।
बोल रखायौ - बात नहीं टाली, कहा मान लिया।
उ. - मथन नहीं मोहिं आवई, तुम सौंह दिवायौ। तिहिं कारन मैं आइ कै तुव बोल रखायौ-७१६।
बोलबाला रहना - बात या कहे का आदर होना।
बोलबाला होना - (१) बात या कहे का आदर होना।
(२) प्रताप या भाग्य बढ़ा-चढ़ा होना।
(३) प्रसिद्ध होना। बोल रहना - मान - मर्यादा होना।
उरग तैं बाँचि फिरि ब्रजहिं आयौं-५९०।
कोउ बरसत, कोउ अगिनि जरावत, दई पर्यौ है खोज हमारे। तब गिरधर कर धर्यौ कन्हैया, अब न बाचिहैं मारत जारे-५९५।
(क) दुस्सासन करि बसन छुड़ावत सुमिरत नाम द्रौपदी बाँची-१-१८।
(ख) खरिक मिले की गोरस बेचत की विषहर से बाँची-१४६८।
बच गये, सुरक्षित रहे, चोट नहीं लगी।
भली भई अबकैं हरि बाँचे, अब तौ सुरति सम्हारि-१०-७९।
(क) सुमिरन कथा सदा सुखदायक, बिषधर विषम-विषय-विष बाँचौ-१-८३।
(ख) अब तुम नाम गहौ मन नागर। जातैं काल-अगिनि तैं बाँचौ, सदा रहौ सुखसागर-१-९१।
कछु कुल-धर्म न जानई, रूप सकल जग राँच्यौं (हो)। बिनु देखैं, बिनु ही सुनैं, ठगत न कौऊ बाँच्यौ (हो)-१-४४।
इत-उत देखि द्रौपदी देरी ........। सरबस दै अंबर तन बाँच्यौ, सोउ अब हरत, जाति पति मेरी-१-२५१।
यह बाँछना होइ क्यों पूरन दासी ह्वै बस ब्रज रहिए।
बोल जाना - (१) मर जाना।
(२) बाकी न बचना।
(३) घिस या फट जाना।
(४) दुखी या हैरान होकर हार मान लेना।
(५) सिटपिटा जाना।
(६) दिवाला निकल जाना।
कोई कथन, बात या वचन कहकर।
बोल उठना - एकाएक कुछ कहने लगना
एक बात, शिक्षा की एक-दो बातें।
बोलक इनहू को सुनि लीजै-2९७२।
सामान्य व्यवहार (की भाषा)।
बोलते हैं, मुख से शब्द निकालते हैं।
तमचुर खग-रोर सुनहु, बोलत बनराई-१०-२०२।
ग्वाल सखा ऊँचे चढ़ि बोलत बार बार लै नाम।
बोलती मारी जाना - भय, संकोच आदि के कारण मुँह से शब्द न निकलना।
कुंज किलोल किये बन ही बन सुधि बिसरी उन बोलन की-३२९९।
[सं. ब्रू, 'ब्रूयते', बूर्यते ; प्रा. बुल्लइ]
बोलना-चालना-बातचीत करना। हँसनाबोलना-प्रेमपूर्वक बातें करके प्रसन्न होना।
किसी चीज के ठोंके-पीटे जाने पर आवाज निकलना या ध्वनि होना।
मन मोहनी तोतरी बोलनि, मुनि-मन हरनि सु हँसि मुसुकनियाँ-१०-१०६।
(ख) कुंडल लोल, कपोलनि की छबि, मधुरी बोलनि बरनि न जाई-६१६।
तुम्हरी बोलनि कौन पतीजै ज्यौं भुस पर की भीति-३१६३।
बोलने या बात करने की क्रिया या भाव।
हँसि-बोलनो-सस्नेह हँसने बोलने में।
रमत राम स्याम सँग ब्रज बालक सुख पावत हँसि बोलनो-2२८०।
बुलाया, आने को कहा,आने का निमंत्रण या संदेश भेजा,
सब कुल सहित नंद सूरज प्रभु हित करि तहाँ बुलायो-१० उ०-१०८।
गए ग्वाल तब नंद बोलावन-१००१।
पारथ-तिय कुरुराज सभा मैं बोलि करन चहै नंगी-१-२१।
आई दरजी गयौ, बोलि ताकौ लयौ-2४८४
जौ तुम कहौ कौन खल तारयौ, तौ हौं बोलौं साखी-१-१२२।
तौ हौं अपनी फेरि सुधारौं, बचन एक जो बोलौ-१-१३६।
भोजन करत सखा इक बोल्यौ, बछरू कतहूँ दुरि गये-४३८।
बोता है, उगाता है, बीज जमाता है।
बोवत बबूर दाख फल चाहत, जोवत है फल लागे.-१.६१।
उगाने के लिए बीज जमीन में डालना।
बोने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
बोह लेना - डुबकी या गोता मारना।
बिन बोहनी तनक नहिं दैहौं ऐसेहि छीन लेहु बर सगरौ।
बोलि आयौ - बोल निकला, मुँह से शब्द निकल सके।
बीतैं जाम बोलि तब आयौ, सुनह कंस तव आई सरयौ-१०.५९।
मुँह से निकली हुई आवाज, वाणी।
मीठी बोली - कानों को मधुर या प्रिय लगनेवाली वाणी।
बोली छोड़ना ( बोलना या मारना) - ताना देना।
तब ब्रज बसत बेनु (ख) ध्वनि करि बन बोली अधरातनि-३०२५।
औरै दसा भई छिन भीतर बोले गुनी नगर तैं-७४४
बोलते हैं, उच्चारण करते हैं।
नाम ले लेकर आशीर्वाद देते हैं, बढ़ती मनाते हैं।
बंदीजन-मागध-मूत, आँगन भौन भरे। ते बोलैं लै लै नाउँ, नहिं हित कोउ बिसरै-१०-२४
भवसागर, बोहित बपु मेरौ, लोभ-पवन दिसि चारौ-१-२१३।
पतली टहनी या लता को तरह बढ़कर फैलना।
चक्कर खाता हुआ चलने वाला वायु का भोंका, बगूला, बवंडर।
बौंडर महा भयावन आयौ, गोकुल सबै प्रलय कर मानी। महा दुष्ट लै उड़यौ गुपालहिं, चल्यौ अकास कृष्न यह जानी-१०-७८।
आम के पेड़ में मंजरी या बौर आना।
मूर्ख बनाने, बहलाने या पति फेरने पर।
[हिं. बौराना (ना. प्रत्य.)]
तुम्हरौ प्रेम प्रगट मैं जान्यौ, बौराऐं न बहौंगौ-१०-१९४।
उन्मत्त या विवेकरहित हो जाना।
बाई या पागलपन में बर्राना।
पागल-सा हो जाना, बहकने लगना।
(ईंट, पत्थर आदि का) बूँदों की तरह बरसना।
(रुपया-पैसा) बहुत अधिक देना या लुटाना।
(गाली, कोसना आदि) का बहुत अधिक कहा जाना।
गौतम बुद्ध द्वारा प्रचारित।
गौतम बुद्ध का अनुयायी या उनके धर्म में आस्था रखनेवाला व्यक्ति।
गौतमबद्ध का प्रवर्तित प्रसिद्ध धर्म।
सूर प्रगट गिरि धरयौ बाम कर, हम जानतिं बलि बौना-६०१।
महामुक्ति कोऊ नहिं बाँछै जदपि पदारथ चारी-३३१६।
निरखि लोचन प्रनत मोचन कुँवरि फल बांछो सो पायो-१० उ०,१८।
वह स्त्री जिसके संतान न जन्मी हो।
(क) बाँझ सुत जनै उकठे काठ पल्लवै बिफल तरु फलै बिनु मेघ पानी-2२७३
। (ख) जानै कहा बाँझ ब्यावर दुख-३३२९।
याहू मैं कछु बाँट तुम्हारौ -११२१।
बाँट लेहु-भाग ले लो, हिस्सा कर लो।
बाँट न लेहु सबै चाहत है, यहै बात है थोरी-१०-२६७।
बाँट पड़ना - (१) भाग या हिस्से में आना।
(२) अधिक परिमाण में होना।
पागल हो गयी है, बौरा गयी है।
देखौ री जसुमति बौरानी। घर-घर हाथ दिवावति डोलति, गोद लिए गोपाल बिनानी-१०-२५८।
हम अपने ब्रज ऐसेहिं रहिहै बिरहबाइ बौराने-३२३९।
पागल हो गया, बौराया, सनकी हुआ।
उन्मत्त हुआ, विवेक या बुद्धिरहित हुआ।
बौरे मन्द रहन अटल करि जान्यौ। धन-दारा-सुत-बंधु-कुटुंब-कुल निरखि निरखि बौरान्यौ-१-३१९।
उन्मत्त हुआ, विवेकबुद्धि रहित हुआ।
ऐसैहिं जनम बहुत बौरायौ। बिमुख भयौ हरि-चरन-कमल-तजि, मन संतोष न आयौ .....१-२७।
विवेकहीन किया, मूर्ख बनाया।
किधौं देवमाया बौरायौ किंधौ अनत ही आयौ-१० उ०-६९।
हम जानत परपंच स्याम बातन ही बौरावत-३१३५।
पागल होती है, सनक गयी है।
साँचैहिं सुत भयौ नंद-नायक कैं, हौं नाहीं बौराबति-१०-२३।
मूर्ख बनाती हैं, बहलाती-फुसलाती हैं।
अति विचित्र लरिका की नाई गुर देखाइ बौरावहिं-2९८५।
पागल बना देता है, विवेक-बुद्धिरहित कर देती है।
सोवत सपने मैं ज्यौं संपति, त्यौं दिखाइ बौरावै-१-४२।
(क) कहति कहा ऊधौ सौं तुम बौरी-३००७।
(ख) हम बौरी बकवाद करत हैं-३०९१।
री बौरी, सठ भई मदनबस, मेरै ध्यान चरन रघुराई-९-५६।
(क) तजि अभिमान, राम कहि बौरे, नतरुक ज्वाला तचिबौ-१-५९।
(ख) और उपाई नहीं रे बौरे, सुनि तू यह दै कान-१-३०४।
आई सिखवन भवन पराऐं, स्यानि ग्वालि बौरैया-३७१।
तैयार या बनी हुई तरकारी और साग।
(विभिन्न प्रकार के) भोजन।
(क) षट-रस व्यंजन छाँड़ि रसोई, साग बिदुर-घर खाए.-१-२४४
(ख) बहुत प्रकार किये सब ब्यंजन अमित बरन मिष्टान्न-१०-८९।
असुर-सुता तिहिं ब्यजन डुलावै-९-१७४।
बिना गोपाल और जेहि भावत ते कहिहैं ब्यभिचारी-2४१६।
रुपए का लेन-देन करनेवाला, महाजन।
जिसको भोग-विलास के प्रति आसक्ति हो।
रही ब्याइ-बच्चा जन रही है।
अबहीं एक सखा यह कहि गयौ गाइ रही बन ब्याइ-१५५७।
कियौ ब्याख्यान - व्याख्या की, वर्णन किया।
ब्यासदेव तब करि हरि-ध्यान, कियौ भागवत कौ ब्याख्यान-१-२३०।
यहै जानि गोपाल बँधाए। साप-दग्ध ह्वै सुत कुबेर के, आनि भए तरु जुगल सुहाए। ब्याज रुदन लोचन-जल ढारत, ऊखल दाम सहित चलि आए-३८६।
सूर मूर अक्रूर गयौ लै ब्याज निबेरत ऊधौ-३३७८।
व्याज पर दिया हुआ या दिया जानेवाला धन।
आने-जाने या लेने देने का संबंध।
रीति-नीति, प्रसंग, विवरण।
पारवती-बिवाह ब्यवहार, सूर कह्यौ भागवतऽनुसार-४.७।
(क) हर्षसोक तनु कौ ब्यवहार-५-४।
(ख) सूरदास सिर देत सूरमा सोइ जानै ब्यवहार-2९००।
समष्टि का विशिष्ट और पृथक अंश, समष्टि का विपरीतार्थक।
प्रथम ज्ञान, बिज्ञानक द्वितिय मत, तृतिय भक्ति को भाव। सूरदास सोई समष्टि करि, ब्यष्टि दृष्टि मन लाव-2-३८।
भोग-विलास के प्रति आसक्ति।
पशु-पक्षियों को पकड़ने, बेचने और मारने से जीविका चलानेवाला, बहेलिया।
लोचन भए पखेरू माई।......। सूरदास मन ब्याध हमारौ गृह-बन तैं जु बिसारे-सभा. २८९०।
विरह के कारण अस्वस्थ रहना जो एक संचारी भाव है और पूर्व रोग की दस अवस्थाओं में से भी एक है।
उत्पन्न करना, गर्भ से निकालना।
फैला है, व्याप्त है, वर्तमान है।
रह्यौ घट-घट ब्यापि सोई, जोति-रूप अनूप-2-२७।
प्रभाव डालेगी, असर करेगी, व्यापेगी।
हरि कह्यौ अब न ब्यापि है माया, तब वह गर्भ छाँड़ि जग आया-१-२२६।
किसी पात्र या पदार्थ के भीतर फैलता है अथवा व्याप्त होता है।
(क) जाकौ कामक्रोध नित ब्यापै। अरु पुनि लोभ सदा संतापै।... हरि-माया सब जग संतापै। ताकौ माया-मोह न ब्यापै।......। भक्ति पाइ पावै हरि-लोक। तिन्हैं न ब्यापै हर्षऽरु सोक-३-१३।
(ख) माया, काल, कछु नहिं ब्यापै, यह रस-रीति जो जानै।
जरा अबहिं तोहिं ब्यापै अई। भयउ बृद्ध तब कहेउ सिर नाई।
नाथत ब्याल बिलंब न कीन्हौ-५५७
ब्यायी हुई, जिसने हाल ही में बच्चा जना हो।
ब्यानी गाय बछरुवा चाटति, हौं पय पियत पतूखिनि लैया-१०-३३५।
दूर तक व्याप्त, चारों ओर फैला हुआ।
दूरि गयौ दरसन के ताईं, ब्यापक प्रभुता सब बिसरी-१-११५।
हमारे देहु मनोहर चीर। काँपति, सीत तनहिं अति ब्यापत, हिम सम जमुना-नीर-७९२।
अच्छी तरह फैलकर सब जगह घेर लेना।
ब्यावर बिथा न बंध्या जान-३४४२।
श्रीकृष्ण द्वैपायन जो वेदों के संपादक और श्रीमद्भागवत आदि पुराणों के रचयिता माने जाते हैं।
अन्तर-दाह जु मिट्यो ब्यास कौ इक चित ह्वै भागवत किऐं-१-९।
कहति जननी ब्याह कौं तब रहत बदन दुराइ-४९८।
भाग या हिस्सा करके देते हैं।
सूर स्याम अपने कर लीन्हें बाँटत जूठनि भोग-९३५।
थोड़ा-थोड़ा करके (सबको) देना।
पीसकर, चूर्ण करके, लेप बनाकर।
[हिं. बट्टा या बाट, बाटना]
(क) उरजनि कौं विष बाँटि लगायौ, जसुमति की गति पाई-१-१५८।
(ख) सुन री सखी स्यामसुंदर बिन बाँटि विषम बिष पीजै-2८६४।
भाग या हिस्सा करने (दूसरों को) दिया।
(क) थाती प्रान तुम्हारी मोपै जनमत ही जो दीन्हीं। सो मैं बाँटि दई पाँचनि कौ-१-१९६।
(ख) चारो अंस बाँटि पुनि दिये-६-५।
वितरण करके, (दुसरे को भाग या हिस्सा) देकर।
सिगरोइ दूध पियौ मेरे मोहन, बलहिं न दैहौं बाँटी-१०-२५९।
पूरा-पूरा कार्य होने का हिसाब।
ब्योंत खाना - अनुकूल व्यवस्था होना।
किसी पहनावे के हिसाब से कपड़े को काटता-छाँटता है।
सूर स्वामी अति रिस भीम की भुजा के मिस ब्योंतत बसन ज्यों सुत तन फारयौ।
किसी हिसाब से कपड़े को काटना-छाँटना।
नाप के हिसाब से कपड़ा कटाना-छँटाना।
ब्याहि दयौ - विवाह कर दिया।
रुचि कै अत्रि नाम सुत भयौ, ब्याहि अनसुया सौं सो दयौ-४-२।
हरि, हौं महा अधम संसारी। आन समुझ मैं बरिया ब्याही आसा कुमति कुनारी-१-१७३।
शरीर के किसी अंग का मुरक जाना या मोच खा जाना।
[सं. विकुंचन, प्रा. बिउंचन]
लम्बी गोलाकार लकड़ी जो दरवाजा खुलने से रोकने को लगाई जाती है।
किसी विषय या प्रसंग का पूरा हिसाब।
सूद पर रुपये के लेन-देन का व्यापार।
मैया री, मैं चंद लहौंगो। कहा करौं जलपुट भीतर कौ, बाहर ब्यौंकि गहौंगौ-१०-१९४।
या बिधि को ब्यौपार बन्यौ जग, तासौं नेह लगायौ-१-७९।
(क) यह मारग चौगुनौ चलाऊँ तौ पूरौ ब्यौपारी-१-१४६।
(ख) दीरघ मोल कहयौ ब्यौपारी रहे ठगे सब कौतुक हार-१०-१७३।
प्रसंग, झगड़ा, चक्कर, बन्धन।
श्री भागवत सुनै जो कोइ, ताकौं हरिपद प्रापति होइ। ऊँच-नीच ब्यौरौ न रहाइ। ताकी साखी मैं, सुनि आइ-१-२३०।
कार-बार करनेवाला, व्यापारी।
सूद पर रुपया लेने-देने का व्यापार।
सूद पर रुपया लेने-देने का व्यापार करनेवाला।
जब हरि मुरली अधर धरी। गृह-ब्यौहार तजे आरजपथ, चलत न संक करी-६५९।
ऐसे जनम-करम के ओछे, ओछनि हूँ ब्योहारत-१-१२।
मथुरा और वृन्दावन का समीप वर्ती प्रदेश जब बीकृष्ण ने बाललीलाएँ की थीं श्रीकृष्ण-भक्तों के लिए यह प्रदेश समस्त तीर्थों से बढ़कर है।
ब्रह्मकन्यका, ब्रह्मकन्या
ब्रह्मा की कन्या सरस्वती।
वीर्य को रक्षित रखने की साधना।
ब्रह्म या अद्वैत सिद्धान्त का बोध या उसकी जानकारी।
ब्रह्म का ज्ञाता, अद्वैतवादी।
ब्राह्मण पर श्रद्धा रखनेवाला।
ब्रह्म या ब्रह्मा-संबंधी।
व्रज को धारण करनेवाले, ब्रज में ही व्याप्त, व्रज के रक्षक।
गिरिधर, ब्रजधर, मुरलीधर, धरनीधर-५७२।
अपने कृत तै हौं नहिं बिरमत, सुनि कृपालु ब्रजराई-१.२०७।
जागिए, ब्रजराज-कुँवर, कमलकुसुम फूले-१०-२०२।
व्रज के स्वामी श्री कृष्ण।
(क) लीजै पार उतारि सूर कौं महाराज ब्रजराज-१-१०८।
(ख) और लेहु कछ सुख ब्रजराजा-३९६।
पुण्य-प्राप्ति के उद्देश्य से नियमपूर्वक उपवास करना।
भक्तनि-हित तुम कहा न कियौ। गर्भ परीच्छित रच्छा कीन्ही ; अंबरीष ब्रत राखि लियौ-१-२६।
पतिब्रता जालंधर-जुवती सो पति-ब्रत तैं टारी-१-१०४।
चौदहों भुवनों का समूह,अखिल विश्व, ब्रह्मांड।
अखिल ब्रह्मंड-खंड की महिमा, दिखराई मुख माहि-१०-२५५।
जगत का कर्ता जो सत, चित् और आनन्दस्वरूप माना गया है।
सूर पूरन बह्म निगम नाहीं गम्य तिनहिं अक्रूर मन यह बिचारै-2५५१।
बिदित बिरद ब्रह्मन्य देव, तुम करुनामय सुखदाई-९-७।
खोपड़ी के बीच का छेद जिससे प्राण निकलते माने जाते हैं, ब्रह्मरंध्र।
(क) त्रिकुटी संगम ब्रह्मद्वार भिदि यों मिलिहैं बनमाली।
(ख) ब्रह्मद्वार फिरि फोरि कै निकसे गोकुलराय।
एक नद जो मानसरोवर से निकलकर भारत के पूर्वी प्रदेश से होकर बंगाल की खाड़ी में गिरता है। इसका प्राचीन नाम 'लौहित्य' है।
जिसका यज्ञोपवीत न हुआ हो।
चार वर्णों में सर्वश्रेष्ठ वर्ण।
वेद का भाग जो 'मंत्र' नहीं है।
गुरु-ब्राह्मन अरु संत सुजन के जात न कबहुँ निकेत-2-१५।
सूर्योदय से दो-तीन घड़ी पूर्व का समय।
अखिल ब्रह्मांडपति तिहुँ भुवनाधिपति नीरपति पवनपति अगम बानी-१५२२।
ब्रह्म के तीन सगुण रूपों में एक जो सृष्टि का रचयिता माना गया है, विधाता।
ध्यान धरत महादेव व ब्रह्मा तिनहूँ पै न छटै-१-२६३।
ब्रह्मज्ञान के अनुभव का आनन्द।
सरस्वती और दृशद्वती नदियों के बीच के प्रदेश का नाम।
जिसके दस संस्कार न हुए हों।
बाँधन गये - बंदी बनाने गये।
बाँधन गये बँधाये आपुन-८१५।
सुरनि कही गोकुल प्रगटे हैं पूरन ब्रह्ममुकुन्द-९७५
ब्रह्ममुहूरत, ब्रह्ममुहूर्त
सूर्योदय से एक घण्टा पहले का समय।
ब्रह्ममुहरत भयौ सबेरौ जागे दोऊ भाई।
खोपड़ी के बीच का गुप्त छिद्र जो प्राण निकलने का द्वार माना जाता है।
वह ब्राह्मण जो मरकर प्रेत हुआ हो।
वह सिद्धान्त जिसमें शुद्ध चैतन्य की सत्ता मानी जाय, अद्वैतवाद।
ब्रह्म को जानने की विद्या।
भारत की एक प्राचीन लिपि जिससे नागरी आदि लिपियाँ विकसित हुई हैं।
लजाते हो, लज्जित होते हो।
मोसौं बात सकुच तजि कहिए। कत ब्रीड़त कोउ और बतावौ, ताही के ह्वै रहियै-१-१३६।
देवनागरी वर्णमाला का चौबीसवाँ और पवर्ग का चौथा वर्ण जिसका उच्चारण-स्थान ओष्ठ है।
(क) देवराज मष-भंग जानि कै बरष्यौ ब्रज पर आई-१-१२२।
छाँड़ि मन हरि बिमुखन कौ संग। जिनके संग कुबुद्धि उपजति है, परत भजन में भंग-१-३३२।
टेढ़े होने या झुकने का भाव।
अलक अबिरल चारु हास-बिलास भृकुटी भंग-६२७।
भाँग के रेशे से बना मोटा कपड़ा।
हाव-भाव या कोमल चेष्टाएँ।
(क) इहिं तन छन-भंगुर के कारन, गरबत कहा गँवार-१-८४।
(ख) भ्रम्यौ बहुत लघु धाम बिलोकत छनभंगुर दुखदानी-१-८७।
नाश करनेवाला, तोड़नेवाला, भंजक।
(क) जन-दुख जानि, जमल-द्रुम-भंजन, अति आतुर ह्वै धाए-१-२७।
(ख) रजक-मल्ल चानूरदवानल-दुख-भंजन सुखदाई-१-१५८।
तोड़ने या भंग करने का भाव।
तोड़े, टुकड़े-टुकड़े किये।
नष्ट किये, विनाशे, दूर किये।
सुदामादारिद्र भंजे कुबरी तारी-१-१७६।
भरता भँटा खटाई दीनी-2३२१।
(कागज आदि का)परतों में मोड़ा जाना।
भाँजने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
बिटप भंजि, जमलार्जुन तारे, करि अस्तुति गोबिंद रिझाए-३८६।
तोड़-फोड़ दिया, नष्ट कर दिया, अव्यव्यस्त कर दिया।
अब तौ इन्हें जकरि बाँधौंगी, इहि सब तुम्हरौ गाँव भँडायौ।
[सं. भांडागार, हिं. भंडार]
"(क) तिन हारयौ सब भूमिभँडार। हारी बहुरि द्रौपदी नार-१-२४६
(ख) हारि सकल भंडार-भूमि, आपुन बन-बास लहयौ-१.२४७।"
[सं. भांडागार, हिं. भंडार]
व्यंजन पकाने और रखने का स्थान।
[सं. भांडागार, हिं. भंडार]
[सं. भांडागार, हिं. भंडार]
भंडा फूटना - भेद खुलना। भंडा फोड़ना भेद खोलना।
काहू कै घर करत भँडाई-१०-३४०।
(क) जो माँगौ सो देहुँ तुरतहीं, हीरा-रतन-भँडारी-८-१४।
(ख) तिन हारयौ सब भूमि भँडारी (भँडार)-१-२४६।
भाँड़ों की सी बातचीत या चेष्टा।
रचना की सामग्री या विचार जोड़ना।
बाँधने की रीति, बंधन, गाँठ।
छूटे बंधन अरु पाग की बाँधनि छुटी, लटपटे पेच अटपटे दिये-2००९।
लहरियादार रँगाई के लिए वस्त्र में बाँधा जानेवाला बंधन।
प्राणी के शरीर के ऊपर वह स्थान जहाँ के रोएं और बाल भँवर की तरह घूमे हुए हों।
(क) उर बनमाल बिचित्र बिमोहन, भृगु-भँवरी भ्रम कौं नासै-१-६९।
(ख) उरज भँवरी भँवर मानों मीन मनि की कांति-१४१६।
घुमाना फिराना, चक्कर देना।
हास्य रस की साधारण कविता।
एक पतिंगा जिसकी पूछ लंबी और चार पर झिल्लीदार होते हैं।
बाल अवस्था मैं तुम धाइ। उड़ति भँभीरी पकरी जाइ-३-५।
हिलता-डोलता या चक्कर लगाता है।
चंचल दृग अंचल-पट-दुति-छबि, 'झलकत चहुँ दिसि झालरी। मनु सेवाल कमल पर अरुझे, भँवत भ्रमर भ्रम-चाल री-१०-१४०।
[सं. भ्रमर, पा. भमर, प्रा. भँवर]
[सं. भ्रमर, पा. भमर, प्रा. भँवर]
[सं. भ्रमर, पा. भमर, प्रा. भँवर]
उरज भँवरी भंवर मानो मीन मनि की कांति-१४१६।
मोह-माया के सांसारिक झगड़े।
तीन प्रकार की भिक्षा में से दूसरी जो घूम-घूमकर माँगी जाय।
(क) ज्यौं-भँवरा रस चाखि चाहि कै तहाँ जाइ जहाँ नव तन जानै-2६९८।
(ख) आपुहिं भँवरा आपुहिं फूल-३४०७।
भक्त (भक्तनि) हित तुम कहा न कियौ-१-२६।
भक्तबछल, भक्तबच्छल, भक्तबत्सल, भक्तबत्सल
(क) सूरदास प्रभु भक्त-बछल तुम पावन-नाम कहाए हो-१.७।
(ख) कुसल प्रसननि कहे तुरत मन काम लहि भक्तबत्सल नाम भक्त गावैं-2५८८।
इह सुन के भृगं कह्यौ, नारद आदिक हरि-भक्ता-१८६१।
चक्कर लगानेवाले, घूमने फिरने वाले।
तुम कारे सुफलकसुत कारे, कारे मधुप भँवारे।
एक प्रेम या स्नेह-सूचक संबोधन।
सिंह आगैं, सेष पाछैं, नदी भइ भरिपूरि-१०.५।
जुवति बनि भईं ठाढ़ी और पहिरे चीर-१८५२।
दुहुँधा द्वैं दँतुली भईं, मुख अति छबि पावत-१०-१२२।
(क) पाछे भई सु भई सूर जन, अजहूँ समुझि सँभारि-2-३१।
(ख) तातैं भई यज्ञ की हान-४-५।
हुए, हो गये, प्रतिष्ठित हुए, बने।
(क) कहा कूबरी सील-रूप-गुन ? बस भए स्याम त्रिभंगी-१-२१।
(ख) पारथ के सारथि हरि आप भए हैं-१-२२।
(ग) काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह ये भए चोर तैं साहु-१-४०।
प्राचीनबर्हि भूप इक भए-४-१२।
बिरध भऐं कफ कंठ बिरोध्यौ, सिर धुनि धुनि पछितानौ-१-३२९।
दादुर जल बिनु जिवै पवन भखि, मीन तजै हठि प्रान-३३५७।
कृमि-पावक तेरौ तन भखिहैं,-१-३१९।
स्त्री की योनि या जननेंद्रिय।
इहिं अंतर गौतम गृह आयौ। इंद्र जानि यह बचन सुनायौ।...इक भग की तोहिं इच्छा भई भग सहस्र मैं तोकौं दई-६-८।
भगत-बिरह कौ अति हीं कादर, असुर-गर्ब-बल नासत-2-३१।
भूत-प्रेत उतारनेवाला ओझा।
ईश्वर में श्रद्धापूर्ण अनुराग। इसके नौ भेद हैं-श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पाद सेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन।
जूठे की कछु संक न मानी भक्ष किए सत भाई।
खाने या भक्षण करने योग्य।
बेद-बेदांत उपनिषद अरपै सो भख भोक्ता नाहिं।
एक प्रसिद्ध संस्कृत ग्रंथ जो हिन्दू धर्म का सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ माना जाता है और सभी भारतीय संप्रदायों में मान्य है।
ऐश्वर्य, बल, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य-इन छह गुणों से युक्त।
रस्सी, डोरी आदि से कसकर बंदी बनाना।
रस्सी, डोरी आदि लपेटकर गाँठ लगाना।
बंधन में डालना, कैद करना।
नियम या अधिकार आदि से मर्यादित रखना।
तंद्र - मंत्र आदि से शक्ति या गति बाधित करना।
भगतबछल, भगतबच्छल, भगतबत्सल, भक्तवत्सल
परमारथ सौं बिरत, बिषय-रत, भावभगति नहिं नैंकहु जानी-१-१४९।
प्राग्ज्योतिषपुर का राजा जो नरकासुर का पुत्र था और महाभारत के युद्ध में कौरवों की ओर से लड़ा था।
इत भगदत्त, द्रोन, भूरिस्रव, तुम ( भीष्म ) सेनापति धीर-१-२६९।
बहुत से लोगों के दौड़ने-भागने की क्रिया या भाव।
[सं. भगवत् का बहु. भगवंत]
(क) भक्त सात्विकी सेवै संत। लखै तिन्है मूरति भगवंत-३-१३।
(ख) मानि भगवंतआज्ञा सो आयौ तहाँ...-८-८।
त्रिभुवन-हार सिंगार भगवती सलिल चराचर जाके ऐन-९-१२।
काम पड़ने पर भागनेवाला, कायर।
भाग जाने वाला, भागने को प्रस्तुत।
भग्न भाजन कंठ, कृमि सिर, कामिनी-आधीन-१-३२१।
सूर निरखि मुख सकुचि भगाने-६९५।
मल्ल सुभट परे भगार कृष्ण को परिसाने-2६१३।
सती कह्यो, मम भगिनी सात। सबै बुलाई ह्वै हैं तात-४-५।
सुपनेउ के सुख न सहि सकी नींद जगाइ भगी २७९०।
अयोध्या के एक राजा जो दिलीप के पुत्र थे और जिनकी तपस्या से संतुष्ट होकर गंगा पृथ्वी पर आयी थी।
बहुरि भगीरथ तप बहु कियौ। तब गंगा जू दरसन दियौ-९.९।
सूर स्याम ऐसे तैं देखे मैं जानति दुख दूर भगे-१३१८।
कै बालकनि भगाई जाहिं लै आन भूमि पर-५८९।
सखा सहित बलराम छपाने जहँ-तहँ गए भगाई-१०-२४०।
जोइ लीजै सोई है अपनो जैसे चोर भगात-पृ. ३२४(३२)।
भागने को प्रवृत्त करना, दौड़ना।
(क) अस्वत्थामा भय करि भन्यो-१-२८९।
(ख) कौन कौन को उत्तर दीजै ताते भग्यो अगाऊँ-३४६६।
अचरज से स्तब्ध या हक्काबक्का रह जाना।
लचककर या कुछ लँगड़ाकर चलना।
माधौ, नैकु हटको गाइ।...। और अहित अभच्छ भच्छति, कला बरनि न जाइ-१-५६
बिधि-बाहन-भच्छन की माला, राजत उर पहिराए-४१७।
भच्छि अभच्छ, अपान पान करि, कबहुँ न मनसा धापी.-१-१४०।
भजन-भाव से प्राप्त होनेवाला आनन्द या सुख।
सदैव भजन के आनन्द में ही मग्न रहनेवाला।
यह प्रताप दीपक सुनिरंतर, लोक सकल भजनी-2.२८।
कहियत गुन प्रबीन है राधा क्रोधही में बिष भछ्यो्-2२५९।
भजन करता है, स्मरण करता है, चित्त लगाता है।
(क) सूर कहत जे भजत राम कौं, तिनसौं हरि सौं सदा बनी-१-३९।
वासना का भाव मन में लाता है, वासना के भाव से स्मरण करता या ध्यान लगाता है।
पंजा पंच प्रपंच नारि-पर भजत सारि फिरि मारी-१-६०।
भजत सखनि समेत मोहन देखि ब्याई गाय-४९८।
स्याम भजन बिनु कौन बड़ाई-१-२४।
ऐसा गीत जिसमें देवी-देवता का गुण-गान हो।
जिहिं तन हरि भजिबौ न कियौ। सो तन सूकर-स्वान-मीन ज्यौं, इहिं सुख कहा जियौ-2-१६।
चावल, दही, घी आदि का बना नमकीन भोजन।
सदा सँघाती श्री जदुराइ। भजियै ताहि सदा लव लाइ.-७-२.।
(क) जे जन सरन भजे बनवारी। ते-ते राखि लिए जग जीवन, जहँ जहँ बिपति परी तहँ टारी-१-२२।
(ख) बिषयी भजे, बिरक्त न सेए मन धन-धाम धरे.-१-१९८।
(क) पाँडव पाँच भजे प्रभु चरननि, रनहिं जिताए हैं जदुराई-१-२४।
(ख) सूर सबै तजि हरि-पद भजे-१-२८८।
स्मरण करें, ध्यान लगायें।
और सकल तजि मोकौं भजैं-९-५।
(धनु) बेनु स्रवन सुनि, गोबर्धन तैं, तृन दंतनि धरि चालीं। आई बेगि सूर के प्रभु पै, ते क्यौं भजै जे पाली-६१३।
मनबच-क्रमजौ भजै स्यामकौं, चारि पदारथ देत-१-२९६।
भजहु न मेरे स्याम मुरारी-१-२१२।
कीर पिंजरै गहत अँगुरी ललन लेत भजाइ-४९८।
अब तौ इन्हैं जकरि धरि बाँधौं, इहि सब तुम्हरौ गाउँ भजायौ-१०-३४०।
जाकौ सुजस सुनत अरु गावत जैहै पाप-बृंद भजि भरहरि-१-३१२।
सब तजि भजिऐ नंदकुमार-१-६७।
बंधन बाँधकर रंगा जानेवाला बंधन।
नियत करके, स्थिर करके, ठहराकर |
साँचौ सो लिखहार कहावै। कायाग्राम मसाहत करिकै, जमा बाँधि ठहरावै-१-१४२।
बाँधी मोट पसारि त्रिविध गुन, नहिं कहुँ बीच उतारौ-१-१५२।
अब मैं याहि जकरि बाँधौंगी-१०-३३०।
बँध गया, अटक गया, स्वच्छंद न रहा, प्रतिबंधित हुआ।
माया सबल धाम-धन बनिता बाँध्यौ हौं इहिं साज-१-१०८।
बाँबी पर अहि करत लराई-३९१।
भागती है, शीघ्रता से जाती है।
ज्यौं पति सौं त्रिय रति करै। जैसे सरिता सिंधुहिं भजै-पृ. ३६० (५)।
(क) करौं जतन, न भजौं तुमकौं, कछुक मन उपजाइ-१-४५।
(ख) तुमहिं समान और नहिं दूजौ काहि भजौं हौं दीन-१-१११।
दृढ़ बिस्वास भजौ नँदलालहिं-१-७४।
भजन किया, जपा, स्मरण किया।
अब हौं माया-हाथ बिकानौ। परबस भयौ पसू ज्यौं रजु-बस, भज्यौ न श्रीपति रानौ-१-४७।
नरकौ भज्यौ नाम सुनि मेरो, पीठि दई जमराज-१-९६।
(क) द्वार-कपाट कोट भट रोके-१०-११।
(ख) उठी बहुरि सँभारि भट ज्यौं परम साहस कीन-३४५१।
भाट का काम, भाव या मजदूरी।
कोरी प्रशंसा या चाटुकारी।
खोजता-फिरता है, मारा-मारा घूमता है।
भटकत फिरयौ स्वान की नाईं नैंकु जूठ कैं चाइ-१-१५५।
मारा-मारा फिरता है, व्यर्थ घूमता है।
ऐसौ प्रभू छाँड़ि क्यों भटकै, अजहूँ चेति अचेत-१-२९६।
भटकावे या भुलावे में डालनेवाला।
भटकने या भ्रम में पड़ने वाला।
स्त्रियों के लिए प्रेम और आदरसूचक एक संबोधन।
खोजते फिरना, मारे-मारे घूमना।
व्यर्थ मारे-मारे घुमाना-फिराना।
मारे-मारे फिरकर, व्यर्थ इधर-उधर घूमकर।
श्रीभागवत सुन्यौ नहिं कबहूँ, बीनहिं भटकि मरयौ-१-२९१।
भूली हुई, रास्ता भूल जाने के कारण इधर-उधर घूमती फिरती हुई।
जैहैं भटकी- भटक जायँगी, मार्ग भूलकर इधर-उधर फिरने लगेंगी।
अबकैं अपनी हटकि चरावहु, जैहै भटकी घाली-५०३।
मारे-मारे या भटका-भटका फिरता हुआ।
जनम सिरानौ अटकैं अटकैं। राजकाज, सुतबित की डोरी, बिन बिवेक फिरयो भटकैं-१-२९२।
विशेष आकार-प्रकार का बड़ा चूल्हा।
[सं. भ्राष्ट्र, प्रा. भट्ठ]
लड़ना, झगड़ना और गाली बकना।
गुप्त क्रोध या असंतोष जो विशेष अवसर पर प्रकट किया जाय।
चोरों की तरह लुक छिपकर या आँख बचाकर।
भड़काने के लिए दिया गया झूठा बढ़ावा।
शारीर में गर्मी पहुँचाना।
जल्दी चौकन्ना हो जाने वाला।
भड़' होने का शब्द।
भीड़-भब्बड़ की गड़बड़।
व्यर्थ की बातचीत।
भड़' होने का शब्द।
भीड़-भब्बड़ की गड़बड़।
व्यर्थ की बातचीत।
ब्रज के चौबीस वनों में एक।
श्रीकृष्ण की एक पत्नी जो केकयराज की पुत्री थी।
भद्रा व्याहि आप जब आये, द्वारावती अनंद-सारा. ६५७।
द्वितिया, सप्तमी और द्वादशी तिथियों की संज्ञा।
मथुरा-वृन्दावन के बीच एक स्थान जहाँ चौवों की स्त्रियों से भात माँगकर श्रीकृष्ण द्वारा खाये जाने की बात कही जाती है।
विवाह की एक रीति जिसमें विवाह के एक दिन पूर्व वर और उससे छोटों को कच्ची रसोई खिलायी जाती है।
यात्रा आदि के लिए, वेतन के अतिरिक्त दिया जानेवाला धन।
तुच्छ या हास्यास्पद बात या आचरण।
भादों का, भादों-सम्बन्धी।
सिर, दाढ़ी, मूछ आदि का मुंडन।
राम पै भरत चले अतुराई।...। लीनौ हृदय लगाइ सुर-प्रभु, पूछत भद्र भए क्यौं भाइ-९-५१।
ऊखल सों बाँध्यौ सुत बाँही-३९१।
(क) बा-बा-पति-अग्रज-अंबा के भानुथान सुत हीन हियो री।
(ख) बा-निवास-रिपुधर-रिपु लै सर सदा सूल सुख पेरै। बा-ज्वर नीतन ते सारंग अति बार-बार झर लखै।
बारि मैं ज्यौं उठत बुदबुद लागि बाइ बिलाइ-१-३१६।
भानै मठ कूप बाइ सरवर कौ पानी-९- ९६।
( मुँह ) बा कर, खोलकर, फैलाकर।
मेरे कहै नहीं तू मानति, दिखरावौं मुख बाइ-१०-२५५।
[सं. वार्ता या हिं. बाई ?]
बिडंग नामक औषधि जो पंसारी के यहाँ मिलती है।
बाइ-बिडंग बहेरा हर्रै कहुँ बैल गोंद ब्यापारी-११०८।
बाई चढ़ना - (१) वायु का प्रकोप होना।
(२) घमंड की बातें करना।
बाई पचना (१) वायु का प्रकोप शांत होना।
(२) घमंड टूटना।
बाई पचाना - गर्व चूर करना।
स्त्रियों के लिए आदरसूचक संबोधन।
स्रवन भनक परी ललिता के तान की-१६०९।
उड़ती हुई खबर। नंद-भवन भनक सुनी कंस कहि पठायौ-२४९६।
भद्रा उतरना - हानि होना।
भद्रा लगाना - बाधा या हानि पहुँचाना।
वह मणिजटित सिंहासन जिस पर राज्याभिषेक होता है।
इलावर्त और किंपुरुषा, कुरु और हरिषर्ष केतुमाल। हिरनमै, रमयक, भद्रासन भरतखंड सुखपाल-सारा० ३३।
जँ जँ ध्वनि भनै-पृ. ३४५ (३७)।
अर्क आदि उतारने का बंद मुँह का घड़ा।
अतिहिं पुनीत बिष्नु पादोदक, महिमा निगम पढ़त गुनि चैन। परम पवित्र, मुक्ति की दाता, भागीरथहिं भब्य बर दैन-९.१२।
कहुँ भुज, कहुँ धर, कहुँ सिर लोटत, मानौ मद मतवारौ। भभकत, तरफत स्रोनित मैं तन, नाहीं-परत निहारौ-९-१५९।
भभकि कै दंत ते रुधिर धारा चली छींट छबि बसन पर भई भारी-2५९५।
सबनि मटुकिया रीती देखी तरुनी गई भभरिकै-११६८।
देवमूर्ति के सामने जलनेवाली अथवा यज्ञादि की अग्नि की भस्म जो मस्तक, भुजा आदि पर लगायी जाती है।
भस्म जो शिव जी शरीर में लगाते हैं।
भय खाना, खानो - डरना, भयभीत होना।
यह सब कलिजुग कौ परभाउ। जो नृप कैं मन भयउ-कुभाउ-१-२९०।
(क) भारत जुद्ध होइ जब बीता। भयौ जुधिष्ठिर अति भयभीता-१-२६१।
(ख) मनु रघुपति भयभीत सिंधु पत्नी पयौसार पठाई-९-१२४।
पूर्वो हिंदी में होना' का भूत.।
डर छुड़ानेवाला, भय दूर करनेवाला।
[सं. भयहारिन् , हिं. भयहारी]
गज चानूर हते, दव नास्यौ, ब्याल मथ्यौ, भयहारे १-२७।
(क) सुनि के सिंह भयान अवाज। मारि फलाँग चली सो भाज-५-३।
(ख) तुम बिना सोभा न ज्यौं गृह बिना दीप भयान-३४४७।
(क) भवसमुद्र अति देखि भयानक, मन मैं अधिक डराऊँ-१.१६४।
(ख) अरी मोहिं भवन भयानक लागै माई स्याम बिना-2५४७।
साहित्य के नौ रसों में एक जिसमें भीषण दृश्यों का वर्णन होता है।
राखी पैज भक्त भीषम की, पारथ को सारथी भयौ-१-२६।
शरीर में कुछ गर्मी पहुँचाना।
ताकैं छौना सुन्दर भयौ-५-३।
अति करुना रघुनाथ गुसाईं जुग भर जात घरी।
(क) भू-भरहरन प्रगट तुम भूतल गावत संत-समाज-१-२१५।
(ख) धरनि सीस धरि सेस मरब धर्यो, इहिं (कालिय नाग) भर अधिक सँहार्यौ-५६७।
सत्ताइस नक्षत्रों में दूसरा।
राजा दशरथ के कैकेयी से उत्पन्न पुत्र जो राम से छोटे थे। कैकेयी ने इनके लिए राजा दशरथ से राज्य माँगा और राम को निर्वासित कराया। भरत ने इस कर्म के लिए माता कैकेयी की निंदा की और राम को वापस लौटाने के लिए वे चित्रकूट गये। राम जब लौटने को तैयार न हुए तब वे इनकी पादुकाएँ ले आए और उन्हें ही सिंहासन पर रख कर राम के आने तक अयोध्या का शासन करते रहे। राम के वन से लौटने पर भरत ने राज्य उन्हें सौंप कर अपूर्व त्याग का परिचय दिया।
ऋषभ देव के पुत्र जड़ भरत।
शकुंतला के पुत्र का नाम; प्रसिद्ध है कि इस देश का नाम 'भारत' इन्हीं के नाम पर पड़ा है।
नाट्य शास्त्र' के रचयिता भरत मुनि।
लादता है (लादकर) ढोता है।
अगम सिंधु जतननि सजि नौका, हठि क्रम-भार भरत-१-५५।
जीव मारि कै उदर भरत हैं-2-१४।
दुख भरत - दुख भोगता है कष्ट सहता है।
उ. - (क) मेरे हित इतनौ दुख भरत-१.२२६।
(ख) हम तौ उन बिनु बहु दुख भरत-१० उ. ३७।
नैन भरत पानी - आँसू आ जाते हैं
उ. - मेरे नैन भरत है पानी-2६४९।
हियो भरत - हृदय भरभर आता है।
उ. -मोसौं कहत होहि जिनि ऐसी नैन टरत नहिं भरत हियौ-2६४७।
पृथ्वी के नौ खंडों में से एक जिसका राजा भरत था।
भरत सो भरत खंड कौ राव-५-३।
घारा या प्रवाह में पड़कर उसी के साथ जाने लगना।
बूँद या धार के रूप में लगातार निकलना।
लक्ष्य या स्थान से हट जाना।
बाँभन मारैं नहीं भलाई-१०-५७।
एक प्रसिद्ध गँठीली वनस्पति।
बाँसो उछलना - बहुत प्रसन्न होना।
बाँह थको बायसहिं उड़ावत-2७६९।
बाँह गहना (पकड़ना) - ( १ ) सहारा देना। (२) विवाह करना। बाँह की छाँह लेना - शरण लेना। बाँह चढ़ाना - (१) किसी बात के लिए तैयार होना। (२) लड़ने को मुस्तैद हो जाना। बाँह देना - सहारा देना। देहु बाँह - सहारा, आश्रय और शरण दो। उ. - सुख सोऊँ सुनि बचन तुम्हारे देहु कृपा करि बाँह-१- ५१। दै बाँह - आश्रय देकर, छाया करके। उ. - बर्षत में गोपाल बुलाए अभय किये दै बाँह-९५७। बाँह बुलंद होना - (१) साहसी होना। (२) दानी और उदार होना।
बाँह-बोल - सहायता का वचन।
बल, शक्ति।
बाँह टूटना - सहायक न रह जाना।
(क) बाँहाजोरी निकसे कुंज तें-पृ. ३१५ (४८)।
(ख) बाँहाजोरी कुसुम चुनत दोउ-2८७१।
बैंगन आदि की ऐसी तरकारी जो अच्छी तरह भूनकर और नमक-मिर्च-खटाई डालकर बनायी जाती है।
भरता भँटा खटाई दीनी-2३२१।
(क) काम अति तनु दहत, दीजै सूर हरि भरतार-७६७।
(ख) तजि भरतार और जो भजिए सो कुलीन नहिं होई-पृ. ३४१ (३)।
भरती करना - (२) रखना या सम्मिलित करना।
(२) केवल खाना-पूरी के लिए रखना।
प्रविष्ट होने या प्रवेश पाने का भाव।
किसी रिक्त वस्तु या पात्र में दूसरा पदार्थ डालकर उसे पूर्ण करता।
परतिय-रति अभिलाष निसा-दिन मन-पिटरी लै भरतौ-१-१०३।
श्रीराम के छोटे भाई भरत। ।
नाट्य शास्त्र के रचयिता भरतमुनि।
उतथ्य ऋषि के भाई वृहस्पति का अपनी भावज ममता के गर्भ से उत्पन्न किया हुआ पुत्र जो आगे चलकर गोत्र-प्रवर्तक हुआ।
प्रभु तेरौ बचन भरोसौ साँचौ। पोषन भरन बिसंभर साहब, जो कलपै सो काँचौ-१-३२।
उदर भरन - पेट पालने के लिए।
उ. - भजन बिनु जीवत जैसे प्रेत। मलिन मंदमति डोलत घर - घर उदर भरन कैं हेत-2-१५।
खाली पात्र को कोई चीज डालकर पूर्ण करना।
दो चीजों के बीच की दरज आदि बंद करना।
(बंदूक आदि में) गोली डालना।
(किसी का) घर भरना, भरनो - (किसी को) खूब धन देना।
(किसी के मन में ) बुरी धारणा जमाना।
शरीर का हृष्ट-पुष्ट होना।
अंकम भरनी - गले या छाती से लगाने का भाव या कार्य।
उ. - उमँगि उमँगि प्रभु भुजा पसारत हरषि जसोमति अंकम भरनी-१०- ४४।
बाकी (धन आदि) पा जाने का भाव।
रिक्त स्थान की पूर्ति होना।
क्रोध या अप्रसन्नता होना।
परिश्रम से किसी अंग का दर्द करने लगना।
भटकाता फिरा, मारे मारे घूमा।
माधौ जू मोहि काहे की लाज। जन्म जन्म योहीं भरमान्यौ अभिमानी बेकाज-१-१५०।
भ्रम या चक्कर में डाला, बहकाया।
बिदुर कह्यौ, देखौ हरि-माया। जिन यह सकल लोक भरमाया-१-२८४।
भ्रम में डालते हो, बहकाते हो।
तुम नारायन भक्त कहावत। केहिं कारन हमकौं भरमावत-४.९।
आन जन्तु-धुनि सुनि कत डरपत, मो भुज कंठ लगावहु। जनि संका जिय करौ लाल मेरे, काहे कौं भरमाबहु-१०-१७९।
भ्रम में डालती है,चक्कर में गलती है, बहकाती है।
माया नटी लकुटि कर लीन्हें, कोटिक नाच नचावै।...। तुमसौं कपट करावति प्रभु जू, मेरी बुधि भरमावै-१-४२।
सूर स्याम छबि निरखि कै जुवती भरमाहीं-पृ. ३१९ (८५)।
लख चौरासी जोनि भरमि कै, फिरि वाहीं मन दीनौ-१-६५।
लखि लोचन, सोचै हनुमान। चहुँ दिसि लंक दुर्ग दानवदल, कैसैं पाऊँ जान। -। भरमित भयौ देखि मारुत-सुत दियो महाबल ईस-९-७५।
भटकती है, घूमती फिरती है।
प्रात से सिर धरे मटुकी नंद गृह भरमाइ-१२११।
मारा-मारा फिरता है, भटकता है।
काया हरि कैं काम न आई। ...............। जब लगि स्याम-अंग नहिं परसत, अंधे ज्यौं भरमाई-१-२९५।
(क) राधा हरि के रंगहि राँची, जननी रही जिये भरमाई-१२५२।
(ख) सूरदास राधा की बानी सुनत सखी भरमाई-१२७५।
भ्रम या चक्कर में डाल दिया।
(क) एकनि कह्यौ, याहि मत मारौ। याको सुन्दर रूप निहारौ। केतिक अमृत पिए यह भाई। हरि मति तिनकी यौं भरमाई-७-७
(ख) कोऊ निरखि रही चारु लोचन निमिष भरमाई-१३३८।
भटकाया, व्यर्थ मारे-मारे फिराया।
भ्रम या आश्चर्य में डाल दिया।
अंकुस-कुलिस-बज्र-ध्वज परगट, तरुनी-मन भरमाए-६३१।
हैरान होता है, अचम्भे में आता है।
एक अंग को पार न पावति चकित होइ भरमात-१४२४।
(क) भरम ही बलवंत सबमैं ईसहू के भाइ-१-७०।
(ख) बदन उघारि दिखायौ अपनौ नाटक की परिपाटी। बड़ी बार भई, लोचन उघरे भरम-जवनिका फाटी-१०-२५४।
भरम गँवाना (बिगाड़ना) - भेद खोलना।
मारा मारा फिरता है, भटका है।
(क) पंचनि के हित-कारन यह मन जहँ तहँ भरमत भाग्यो-१-७३।
(ख) जनम सिरानौ ऐसैं ऐसैं। कै घर घर भरमत जदुपति बिनु, कै सोवत, कै वैसे-१-२६३।"
बहत पवन, भरमत ससि-दिनकर फनपति सिर न डुलावै-१-१६३।
लेत भराइ-भर या भरा लेता है।
सुभग कर आनन समीपै मुरलिका इहिं भाइ। मनु उभै अंभोज-भाजन लेत सुधा भराइ-६२७।
बेगिहिं नार छेदि बालक कौ, जाति बयारि भराई.-१०-१६।
भरने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
आजु कान्ह करिहैं अनप्रासन। मनि कंचन के थार भराए, भाँति-भाँति के बासन-१०-८९।
सुनहु सूर कछु मोल लेहिंगे, कछु इक दान भराए-११०९।
रिक्त पात्र को किसी वस्तु से भरने को प्रवृत्त करना।
खाली स्थान को पूरा कराना।
दरज आदि भरने को प्रवृत्त करना।
मारी-मारी फिरोगी, भटकोगी।
तुम जानकी, जनकपुर जाहु। कहा आनि हम संग भरमिहौ, गहबर बन दुख-सिंधु अथाहु-९-३४।
सोच मुख देखि अक्रूर भरमे...२४६६।
(क) फिरि-फिरि जोनि अनंतनि भरम्यौ, अब सुख-सरन पर्यो-१-१५६।
(ख) सुन मैया मैं बृथा भरम्यो बन जो देखो नैननि भरि जोइ-१५७७।
पिल पड़ने या टूट पड़ने को प्रवृत्त करना।
बीस और दो की संख्या या अंक।
[सं. द्वाविंशति, प्रा. बाईसा]
भरने का काम कराना, मरने की प्रवृत्त करना।
जाको सुजस सुगत अरु गावत, जैहै पाप बृंद भजि भरहरि-१.३१२।
भर जाने की क्रिया या भाव।
ब्रह्मादिक, सनकादिक, गगन भरावन रे.-१०-२८।
बाँधो बंदनवार मनोहर कनक कलस भरि नीर भरावहु-१० उ० २३।
लगाकर, (गोद में) लेकर, आलिंगन करके।
पुत्र-कबंध अंक भरि लीन्हौ, धरति न इक छिंन धीर-१-२९।
जब दिन को भरि लेहुँ आजु ही तब छाँड़ौं मैं तुमको.-१०८९।
सिंह आगैं, शेष पाछैं, नदी भइ भरिपूरि १०-५।
भर जाती है, जल-मग्न हो जाती है।
स्वाति बिना ऊसर सब भरियत ग्रीव रंध्र मत कीन्हों-३०३४।
भरे हुए, युक्त, पूर्ण, मग्न लीन।
क्रीड़ा करत तमाल-तरुन-तर स्यामा-स्याम उमँगि रसभरिया-६८८।
बीतेंगे, बीत सकेंगे, बिताये जा सहेंगे।
कैसे कै भरि हैं री दिन सावन के-2८३०।
अब यह ब्यथा कौन बिधि भरिहैं कोऊ देइ बताइ-३११३।
चोरी जाति बेंचि दान सब दिन को भरिहौं-१११६।
पिय पहिलै पहुँची जाइ अति आनन्द भरीं-१०-२४।
जिहिं जिहिं जोनि भ्रम्यौ संकट बस, सोइ सोइ दुखनि भरी-१-७१।
बंदूक आदि में गोली डलवाना।
आज हौं एक-एक करि टरि हौं। कै तुमहीं कै हमहीं, माधौ, अपने भरोसै लरि हौं-१-१३४।
प्रभु तेरो बचन भरोसौ साँचौ। पोषन भरन बिसंभर साहब, जो कलपै सो काँचौ-१.३२।
तातै तुम्हरौ भरोसौ आवै। दीनानाथ पतित-पावन, जस बेद-उपनिषद गावै-१-१२२।
भ्रम में डालते हैं, बहकाते हैं।
अपने हैं ताते यह कहियत स्याम इनहिं भरुहावत हैं-पृ. ३३० (९३)।
रंग भरे - प्रेम, विभोर, उन्मत्त।
उ. - आजु नँद-नँदन रंग भरे। बिबि लोचन सु बिसाल दुहुँनि के चितवत चित्त हरे-६८९।
पलक भरे की ओट न सहती अब लागे दिन जान-२६४७।
जित देखौं मन भयो तितहिं कौ मनौ भरे कौ चोर री-१०-१३९।
रिक्त स्थान या पात्र को पूर्ण अथवा अंशत: भरता है।
(क) अनायास बिनु उद्यम कीन्हैं, अजगर उदर भरै।
(ख) रातै भरै, भरैं पुनि ढारै, चाहै फेरि भरै। -। बागर तैं सागर करि डारै, चहुँ दिसि नीर भरै-१-१०५।
अंग भरै - गोद में लेती है।
उ. - मुख के रेनु झारि अंचल सौं जसुमति अंग भरैं-2८०३।
कन्हैया हालरो हलरोइ। हौं बारी तब इंदु-बदन पर, अति छबि अलस भरोई-१०.५६।
भरिए, किसी पदार्थ को रिक्त स्थान में डालकर उसको पूर्ण कीजिए।
उदर भरीजै - पेट पालिए।
उ. - ऐसै बसिए ब्रज की बीथिनि। ग्वारनि के पनवारे चुनि चुनि, उदर भरोजै सीथिनि-१०- ४९०।
इहिं भरु अधिक सह्यौ अपनैं सिर अमित अंडमय बेष-५७०।
भ्रम में डाला है, बहकाया है।
तुमकौ नद महर भरुहाए। माता गर्भ नहीं तुम उपजे तो कहौ कहाँ ते आए-१७०२।
घमंड करना, गर्व में चूर होना।
उत्तेजित करना, बढ़ावा देना।
घमंड में चूर होकर, अभिमान में भरकर।
अब वै भरुहाने फिरैं कहुँ डरत न माई। सूरज प्रभु मुँह पाइ कै भए ढीठ बजाई-पृ. ३२३ (२०)।
अंकम भरयौ - छाती से लगाया।
पुनि माता के पायनि परयौ। माता ध्रुव कौं अंकम भरयौ-.४-९।
कुंती प्रान तजे धरि ध्यान। जीवन-सहन उनहिं भल जान-१-२८८।
भारता रखनेवाला; वह जिसके पास भाला हो।
संपूर्ण कर दूँ, खाली न रहने दूँ।
काल्हि जाइ अस उद्यम करौं। तेरे सब भंडारनि भरौं-४-१२।
सारे शरीर में लगा हुआ, पुता हुआ, सना हुआ।
धोयो चाहत कीच भरौ पट, जल सौं रुचि नहिं मानौ-१-१९४।
उज्जयिनी के राजा विक्रमादित्य के छोटे भाई जो पत्नी से अत्यधिक प्रेम करते थे; परन्तु एक बार उसको चरित्रहीनता से खिन्न होकर विरक्त हो गये। ये प्रसिद्ध वैयाकरण और कवि थे।
नारद मन की भर्म तोहिं यतनो भरमायौ-३०४७।
(क) तिन कह्यौ, मो मैं एक भलाई। तुम सौं कहौं, सुनौ चित लाई-१-२९०।
(ख) की गोकुल ते गमन कियो तुम इन बातन है नहीं भलाई-पुं.-३४० (९७)।
निसि दिन फिरत रहत मुँह बाए, अहमिति जनम बिगोइसि-१-३३३।
बायीं ओर का, दाहिने की विपरीत दिशावाला।
बाऐं कर बाजि-बाग दाहिन हैं बैठे-१- २३।
सूरदास प्रभु भलैं परे फँद, देउँ न जान भावते जेकैं १०-२८७।
भली बात, उत्तम कार्य, श्रेष्ठ कर्म।
जहाँ गयौ तहँ भलो न भावत, सब कोऊ सकुचानौ-१-१०२।
ऐसौ को ठाकुर, जन-कारन दुख सहि. भलौ मनावै-१-१२२।
यहै जिय जानि कै अंध भव त्रास तैं सूर कामी-कुटिल सरन आयौ-१-५।
संसार का दुख, जन्म-मरण का दुख।
कमलनयन मकराकृति कुंडल देखत ही भव भागै।
भवन सँवारि नारि रस लोम्यौ, सुत, बाहन, जन, भ्रात्र-१.२१६।
सांसारिक माया-मोह के कष्ट।
सांसारिक दुख और कष्ट, जन्म मरण के कष्ट।
सूर हरि कौ सुजस गावौ जाहि मिटि भंव-भार-१-२९४।
संसार को भूषित करनेवाले (परमेश्वर)।
सांसारिक बंधनों से छुड़ानेवाले (परमेश्वर)।
सांसारिक सुख जो अज्ञान और माया-जन्य होते हैं।
[सं. भविष्यत्, हिं.भविष्य]
भविष्य में होनेवाली बात जो पहले से ही बता दी जाय।
(क) सुंदर स्याम गही कवरी कर, मुक्तामाल गही बलबीर। सूरज भष लैबे अप अपनौ, मानहुँ लेत निबेरे सीर-१०-१६१।
(ख) सिंह भष तजि परत तिनुका सुनी बात नई-३१३१।
पूजा के उपरांत मूर्ति को जल में प्रवाहित करने की क्रिया।
भसिंड, भसिंडा, भसींड, भसींडा
अग्निहोत्र की राख जो पवित्र मानी जाती है और जिसे शिव-भक्त मस्तक या शरीर में अथवा साधु सारे शरीर में लगाते हैं।
कहा स्नान कियैं तीरथ के, अंग भस्म, जट-जूटै २.१९।
विवाह के समय बर-बधू द्वारा अग्नि की परिक्रमा।
भाँग खाना, खानो खा जाना, पी जाना, पीना - पागलपन की बातें या काम करना।
घर में भूँजी भाँग न होना - बहुत दरिद्र होना।
भौजने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
कालयवन मुचुंकुद से हरि भस्म करायौ-१०- उ. ३।
वृकासुर' नामक दैत्य जिले शिव जी ने वरदान दिया था कि तू जिसके सर पर हाथ रख देगा, यह भस्म हो जायेगा। पार्वती जी पर मुग्ध होकर जब भस्मासुर शिव जी के ही सर पर हाथ रखने बढ़ा तब-वे भागे और विष्णु ने चतुरता से उसी के सर पर हाथ रखवाकर उसी को भस्म करा दिया।
(क)परि कबंध रथनि तैं उठत मनौ झर जागि-९-१५८।
(ख) त्राहि त्राहि करि नंद पुकारत देखत ठौर गिरे भहराई-५४४।
गिर्यो भहरात सकटा सँहार्यो-१०-६२।
फोरि भाँड़ दधि-माखन खायौ-१०.३१८।
नष्ट-भ्रष्ट करना, तोड़ना-फोड़ना।
मकान, घेरा, स्थान, बख़ार।
जानति हौं गोरस को लैबो याही बाखरि माँझ-१२१४।
अद्भुत एक अनूपम बाग-१६६०।
बाऐं कर बाजि-बाग दाहिन हैं बैठे-१- २३।
बागा मोड़नी - किसी ओर जाने को होना।
अंगे-जैसा एक पहनावा, जामा।
स्थान जहाँ बहुत सी चीजें रखी जायें।
वह जहाँ एक सी अनेक बातें या चीजें हों।
अनाज या सामान रखने का स्थान।
भंडार का अध्यक्ष, भंडारी।
भाड़े में जी (प्राण) देना - किसी के प्रति आसक्ति या प्रेम होना।
भाँड़े भरना - पछताना।
भाँड़े भरति - पछताती है।
उ. - तब तू मारिबोई करति। रिसनि आगे कहि जो आवत अब लै भाँड़े भरति-2६७९।
भारि भाँड़ौ - बहुत अधिक।
उ. - बहुत भरोसौ जानि तुम्हारौ, अघ कीन्हे भरि भाँड़ौ-१. १४६।
भाँत, भाँति, भाँती, भाँते
(क) कौन भाँति हरि, कृपा तुम्हारी, सो स्वामी समुझी न परति-१-११५।
(ख) पय पीवत पूतना निपाती, तृनावर्त इहिं भाँत-५०८।
(ग) द्रुम फूले बन अनगन भाँती-पृ. ३४८ (५)।
(घ) सारँगरिपु-सुत-सुहृदपति बिना दुख पावति बहु भाँते-४६१।
भाँति - भाँति के अनेक प्रकार से।
ताड़ जाना, पहचान लेना, देखकर समझ जाना।
अब कैसैं जैयतु अपनै बल, भाजन भाँजि, दूध दधि पी कै.-१०-२८७।
मागध,सूत, भाँट धन लेत जरावन रे.-१०-२८।
स्वाँग भरकर नाचने-गानेवाला।
भाँयँ भाँयँ-सन्नाटे का शब्द।
विवाह के समय वर-वधू द्वारा की जानेवाली अग्नि की परिक्रमा।
गढ़ना, गढ़कर सुन्दर बनाना।
विवाह के समय वर-वधू का अग्नि की परिक्रमा करना।
भाँवरि सी पारि फिरैं नारि ज्यों पराई-पृ. ३२८ (७०)।
भहरात झहरात दवा (नल) आयौ।...। बरत-बन-बाँस, थरहरत कुस कांस, जरि, उड़त है भाँस, अति प्रबल धायौ-५९६।
आन देव की भक्ति भाइ करि कोटिक कसब करैगी-१-७५।
भरम ही बलवंत सब मैं ईसहू कैं भाइ। जब भगत भगवंत चीन्है, भरम मन तैं जाइ-१-७०।
(क) वृषभ कहयौ तासौं या भाइ-१-२९०।
(ख) दासी-पुत्र होहु तुम जाइ। सूर बिदुर भयौ सो इहिं भाइ-३-५।
(ग) उन दियौ साप ताहि या भाइ-६-५।
ऊँच-नीच ब्यौरौ न रहाइ। ताकी साखि मैं, सुनि भाइ-१-२३०।
कहौं सो कथा, सुनौ चित लाइ। सूर स्याम भक्तनि मन भाइ-१-२३६।
चाचा, फूफा, मौसा, मामा आदि का लड़का।
छाँडि सकुच सब देति परस्पर अपनी भाई गारि-2३९९।
ब्रह्मा मन सो भली न भाई। सूर सृष्टि तब और उपाई-३-७।
कार्तिक शुक्ल द्वितीया, जब बहन, भाई के टीका काढ़ती है।
मित्रता या आत्मीयता का भाव
गोपिकनि लिखि जोग पठयौ भाउ जान न जाइ-2९२९
अनजानै बिधि यह करी, नए रचे भगवान।...। वहै नाउ, वहै भाउ, धेनु बछरा मिलि रब के-४३७।
(क) सबही या ब्रज के लोग चिकनिया मेरे भाएँ घास।
(ख) सरबस दियो आफ्नो उनको तऊ न कछू कान्ह के भाए-३४०३।
मधुबन की मानिनी मनौहर तहीं जाहु जहाँ भाए हो-2९८६।
दुहूँ लोक सुखकरन, हरनदुख, वेद-पुराननि साखि। भक्ति ज्ञान के पंथ सूर ये, प्रेमनिरंतर भाखि-१-९०।
बुधि बिबेक उनमान आपने मुख आई सो भाखी.३४६९।
ग्राह ग्रसत गजराज छुड़ायौ, बेद पुराननि भाखी-५६७।
चारि स्लोक कहे समुझाइ। -। सोई अब मैं तुम सौं भाखे-१.२३०।
जे पदकमल रमा-उर भूषन, बेद भागवत भाखे-५७१।
बाल-बिनोद बचन हित-अनहित बार बार मुख भाखै-१-६०।
दुहुँनि मनोरथ अपनी भाख्यौ, तब श्रीपति बानी उचरी-१-२६८।
जोग-जज्ञ-जप-तप नहिं कीन्हौ, बेद बिमल नहिं भाख्यौ-१-१११।
(क) जज्ञ-भाग नहिं लियौ हेत सौं रिषिरति पतित बिचारै-१-२५।
(ख) रिषि कयौ, मैं करिहौं जहँ जाग हौं तुमहिं अवसि करि भाग-९-७३।
दुख, सुख, कीरति, भाग आपनैं आइ परै सो गहियै-१-६२।
(क) नाहिंन इतनौ भाग जो यह रस, नित लोचन-पुट पीजै-१०-९।
(ख) धनि-धनि महरि की कोख भाग-सुहाग भरी-१०-२४।
(ग ) ऐसे कबहुँ भाग होहिंगे बहुरौ गोद खेलाइ-३४३५।
गणित की 'भाग' करने को किया।
बोलने की शक्ति, वाक्शक्ति।
मनसा-बाचा-कर्म अगोचर सो मूरति नहिं नैन धरी-१-११५।
सिर पर पैर रखकर भागना-बहुत तेज भागना।
सिर पर पैर रखकर भागना-बहुत तेज भागना।
अठारह पुराणों में से एक जो वैष्णवों का मान्य धर्मग्रंथ है। इसे वे महापुराण मानते हैं। इसमें १२ स्कंध, ३१२ अध्याय और १८००० श्लोक हैं। कृष्ण-भक्ति की प्रेमयुक्त कहानियाँ इसमें वर्णित है। सूरदास ने 'सूरसागर' का क्रम इसी ग्रंथ के अनुसार रखा है।
सूर कह्यौ भागवतऽनुसार-४-७।
भागकर, दौड़कर, पलायन करके।
बाँध्यौ बैर दया भागिनी सौं, भागि दुरी सु बिचारी-१-१७३।
अच्छे भाग्यवाली, भाग्यवती।
कुबिजा सी भागिनि को नारी-2६४०।
घर की नारि बहुत हित जासौं, रहति सदा सँग लागी। जा छन हंस तजी यह काया, प्रेत-प्रेत कहि भागी-१७९।
अच्छे भाग्यवाली, भाग्यवती।
तब बोले बलराम मातु तुगतें को भागी-2६२५।
भागीरथ जब बहु तप कियौ। तब गंगा जू दरसन दियौ-९-९।
गंगा नदी जिसको राजा भगीरथ पृथ्वी पर लाये थे।
दौड़े, पलायन किया, चटपट दूर चले गए।
सुनि याके उतपात कौं, सुक सनकादिक भागे (ह.)-१-४४।
ध्रुव आये माता पै भागे-४-८।
नियति, अदृष्ट, किस्मत, तकदीर।
बड़े भाग्य - अच्छे भाग्य से, सौभाग्य से।
उ. - (क) बड़े भाग्य इहिं मारग आये-९- ७०।
(ख) सूरदास प्रभु कहति जसोदा भाग्य बड़े ते पावै-2५४९।
भाग्य के मोटे - अच्छे भाग्य वाले, सौभाग्यशाली।
उ. - बड़े भाग्य के मोटे हौ-2०६१।
जन्मकुंडली में जन्म-लग्न से नवाँ स्थान जहाँ मनुष्य के शुभाशुभ भाग्य का विचार किया जाता है।
भाग्य भवन मैं मकर मही-सुत बहु ऐश्वर्य बढ़हैं-१०.६६।
पंचनि के हित कारन यह मन जहँ-जहँ भरमत भाग्यौ-१-७३।
सुनि कै सिंह भयान अवाज। मारि फलाँग चली सो भाज-५-३।
गये भाज-भाग गये, पलायन कर गये।
और मल्ल मारे शल तोशल बहुत गये सब भाज।
रघुपति-रवि-प्रकास सौं देखों, उड़ुगन ज्यौं तोहिं भाजत-९-१३७।
(क) मेरो मन मतिहीन गुसाईं। सब सुखनिधि पद-कमल छाँडि, स्रम करत स्वान की नाई। फिरत वृथा भाजन अवलोकत, मूनैं सदन अजान-१-१०३।
(ख) रसचरन-अंबुज बुद्धि भाजन लेहि भरि भरि-भरि-१-३०६।
कैसे पावतु भाजन-भागना कैसे हो सकता है, भागने का अवसर कैसे मिल सकता है।
चहुँ दिसि में तनु बिरहा घेरो अब कैसे पावतु भाजन-2८१७।
दौड़ना, भाग जाना, पलायन कर जाना।
[सं. वजन,प्रा. वजन, पुं. हिं. - भजना]
पानी का चढ़ाव से उतार की ओर जाना, 'ज्वार' का उलटा।
नदी के साथ बहकर आयी हुई मिट्टी।
भवन मोहिं भाठी सौं लागत मरति सोच ही सोचन-१५१७।
[सं. भ्राष्ट्र, प्रा. भट्टो]
भाड़ झोंकना - (१) साधारण काम में शक्ति खोना।
(२) व्यर्थ समय खोना।
भाड़ में झोंकना (डालना) - (१) आग में जलाना।
(२) नष्ट करना।
भाड़ में जाय (पड़े) - नष्ट हो जाय हमें परवाह नहीं।
पुरुष को भाजिबे तें मरन है भलो जाई सुरलोक द्वारे उधारे-१० उ.-2१।
(क) तुम तौ तीनि लोक के ठाकुर, तुम तैं कहा दुरइयै ? हम तो प्रेम-प्रीति के गाहक, भाजी साक छकइयै-१-२३१।
(ख) मीठे तेल चना की भाजी। एक मकूनी दै मोहिं साजी-३९६।
बिडरे गज-जूथ सील, सैन-लाज भाजी ६५०।
भाजे नरक नाम सुनि मेरौ, जम दीन्यौ हठि तारौ-१-१३१।
उग्रसेन-सिर छत्र धरयो है, दानव दस दिसि भाजैं १-३६।
ह्रद बिच नाभि, उदर त्रिबलो वर, अवलोकत भव भय भाजै-१-६९।
भोजन किये बिनु भूख क्यों भाजै बिन खाए सब स्वाद-2७७८।
जिसे भाग या विभक्त किया जाय।
(क) हौं अनाथ बैठयो द्रुम-डरिया, पारधि साधे बान। ताकै डर मैं भाज्यौ नाहत, ऊपर ढुक्यो सचान-१-९७।
(ख) प्रथम पूतना इनहि निपाती काग मरत उठि भाज्यो-2५८१।
(क) परस्थौ थार घरयौ मग जोवत, बोलति बचन-रसाल। भात सिरात तात दुख पावत, बेगि चलौ मेरे लाल-१०-२२३।
(ख) घर गोरस जनि जाहु पराए। दूध भात भोजन घृत अंमृत अरु आछौ करि दह्यौ जमाए-१०.३०९।
विवाह की एक रीति जिसमें कन्या के घर जाकर समधी 'भात' खाते हैं।
मनोहर है नैनन की भाति (भांति)। मानहुँ दूरि करत बल अपने सरद कमल की काँति-ना. २४२९।
तीर रखने की चमड़े की थैली जो पीठ पर या कमर में बाँधी जाती है, तरकश, तूणीर।
रघुपति कहि प्रिय नाम पुकारत। हाथ धनुष लीन्हे, कटि भाथा, चकित भए दिसि-बिदिसि निहारत-९-६१।
भादों या भाद्रपद नामक महीना जो सावन और कुआर के बीच में पड़ता है। इस महीने की पूर्णिमा को चंद्रमा भाद्रपद नक्षत्र में रहता है। प्रायः इस महीने में खूब वर्षा होती है।
[सं. भाद्र, पा. भद्दो, हिं. भादों]
(क) करन मेघ बात-बूँद भादौं-झरि लायौ १-२३।
(ख) भादौं की अध राति अँध्यारी-१०-११।
(ग) नैना सावन-भादौं जीते-2७६९।
(क) सूर मधुप निसि कमल-कोश-बस, करौ कृपा-दिन-भान.. १-१००।
(ख) जैसे कमल होत अति प्रफुलित देखत दरसन भान-१-१६९।
(ग) चलत तारे सकल मंडल, चलत ससि अरु भान-१-२३५।
कहि राधा, किन हार चोरायो।..। सुमना बहुला चंपा जुहिला ज्ञाना भाना भाउ १५८७।
रे दसकंध, अंधमति, तेरी आयु तुलानी आनि। सूर राम की करत अवज्ञा, डारै सब भुज भानि-९-७९।
मूरख सुख निद्रा नहिं आवै, लैहैं लंक बीस भुज भानी ९-११६।
नदी किनारे की ऊँची भूमि जहाँ पानी कभी नहीं पहुँचता।
अबिगत-गति जानी न परै।…….। बागर तैं सागर करि डारै, चहुँ दिसि नीर भरै-१-१०५।
(क) सूरदास प्रभु प्यारी राजत आवत भ्राजत बने हैं मरगजे बागे-पृ. ३१५ (४९)।
(ख) नाना रंग गए रँगि बागे-2४४४।
ढोटा एक भयौ कैसैंहु करि, कौन-कौन करवर बिधि भानी-३६८।
दान-धर्म बहु कियौ भानु-सुत, सो तुव बिमुख कहायौ-१-१०४
प्रभु, मेरे गुल-अवगुन न बिचारौ। कीजै लाज सरन आए की, रबि-सुत त्रास निवारौ १-१११।
आपुहिं हरता आपुहिं करता आपु बनावत, आपुहिं भाने-११८७।
अजहूँ सिय सौंपि नतरु बीस भुजा भानै। रघुपति यह पैज करी, भूतल धरि पानै-९-९७।
सरिता चली मिलन सागर को कूल सबै द्रुम भानै-३३३७।
कुमुद चकोर मुदित बिधु निरखत कहा करै लै भानै-३४०४।
[सं. वाष्प, पा. वप्प, हिं. भाप]
बड़े भाई की स्त्री,भौजाई।
खैबे कौं कछु भाभी दीन्हे। श्रीपति श्री मुख बोले। फैंट उपर तैं अंजुल तंदुल बल करि हरि ज खोले-ना . ४२४५।
वह सुधि आवत तोहि सुदामा। जब हम तुम बन गए लकरियन पठए गुरु की भामा-१०- उ.-६६।
जे पद-पदुम परसि ब्रजभामिनि सरबस दै, सुत-सदन बिसारे-१-९४।
गोविंद प्रीति सबन की मानत। जेहि-जेहि भाय करी जिन सेवा अंतरगत की जानत-१-१३।
जो अच्छ लगे, प्रिय, इच्छित।
[हिं. भाना = रुचना, भाया]
(क) जित-जित मन अर्जुन कौ तितहिं रथ चलायौ। कौरो-दल नासि-नासि कीन्हौं जन भायौ-१.२३।
(ख) यह तन राँचि-राँचि करि बिरच्यौ कियौ आपनो भायौ-१-६७।
(ग) बारक मिलैं सूर के प्रभु तौ करौं आपने भायौ-३३८५।
(क) बेद-बिरुद्ध सकल पांडव-कुल, सो तुम्हरैं मन भायौ-१.१०४।
(ख) श्री रुकमिनि के जिय नाहिं भायो-१० उ०-७।
(क) जिहि-जिहिं जानि जन्म जारयौ, बहु जारघौ अघ कौ भार-१६८।
(ख) मोह अघ सिर भार-१.९९।
(ग) कबहुँक चढ़ौं तुरंग, महा गज, कबहुँक भार बहौं-११६१।
(ध) बिरथा जनम लियो संसार। करी कबहुँ न भक्ति हरि की मारी जननी भार-१-२९४।
(ङ) सूरदास प्रभु दुष्ट-निकंदन धरनी भार उतारनकारी-2५८९।
बोझ जो बहँगी में लावा जाय।
घर-घर गोपिन ते कहेउ कर भार जुरावहु।
कर्तव्यपालन का उत्तरदायित्व।
किसी का भार उठाना-उसके पालनपोषण या रख-रखाव का भार अपने ऊपर लेना।
भार उतरना-उत्तरदायित्व से मुक्त होना।
भार उतारना (१) उत्तरदायित्व से मुक्त करना।
(२) बेगार की तरह काम पूरा कर देना। भार डालना (देना)-उत्तरदायित्व सौंपना।
किसी का भार उठाना - उसके पालन-पोषण या रख-रखाव का भार अपने ऊपर लेना।
भार उतरना-उत्तरदायित्व से मुक्त होना।
भार उतारना (१) उत्तरदायित्व से मुक्त करना।
(२) बेगार की तरह काम पूरा कर देना। भार डालना (देना) - उत्तरदायित्व सौंपना।
भारत जुद्ध होइ जब बीता। भयौ जुधिष्ठिर अति भयभीता-१-२६१।
भारत माहिं कथा यह विस्तृत, कहत होइ बिस्तार-१-२६७।
सोवत काली जाइ जगायौ, फिरि भारत हरि कीन्हौं-५७६।
आपुन तरि-तरि औरनि तारत।...। इहिं विधि उपलै तरत पात ज्यौं, जदपि सैल अति भारत-९.१२३।
भारवाह, भारवाहक, भारबाहि, भारवाही
पृथ्वी का भार उतारने वाले (भगवान विष्णु और उनके अवतार)।
गयो कूदि हनुमंत जब सिंधु पारा। सेल के सांस लागे कमठ पाठि सौं, धँसे गिरिबर सबै तासु भारा-९-७६।
आइ घर जो नंद देखे, तरु गिरे दोउ भारि-३८७।
जन प्रहलाद प्रतिज्ञा पाली, कियौ बिभीषन राजा भारी-१-३४।
पेट भारा हीना - अपच होना। पर भारी होना - गर्भिणी होना। सिर भारी होना सिर में दर्द होना। आवाज (गला) भारी होना - गला पड़ जाना या बैठ जाना।
(क) यहि अतंर जुवती सब आई बन लाग्यो कछु भारी-१०८२।
(ख) स्याम बिन भई सरद-निसि भारी-१० उ०-९७।
(क) बचन बाँह से चलौं गाँठि दै, पाऊँ सुख अति भारी-१-१४६।
(ख) हँसे सबै कर तारी दै दै आनन्द कौतुक भारी १०-७५।
जिसका निर्वाह करना कठिन हो, दूभर।
(क) काम-क्रोध-मद-लोभ-मोह-बस, अतिहिं किए अध भारे-१-२७।
(ख) कुरुपति अंध मोह बस तिनको देत सदा दुख भारे-३४९४।
जीव जल-थल जिते, बेष धरि धरि तिरे, अटत दुरगम अगम अचल भारे-१-१२०।
(क) सूर पतित कौं ठोर नहीं, तौ बहत बिरद कत भारौ-१-१३१।
(ख) मदनदूत मोहि बात सुनाई इन में भर्यौ महारस भारौ-११२२।
नाद मुद्रा विभूति भारी करौ रावर भेस-३४१३।
माखन ले दाउनि कर दीन्हौ, तुरत मथ्यौ, मीठौ अति भार्यौ-४०७।
सूर स्याम जन के सुखदायक बँधे भाव रजु रंग-2५९।
आजु बाची मौन धरि जो सदा होत बचाउ - -१२८३।
(माया) बिनु देखे समुझे सुने जग ठगत, न कोऊ बाचे हो-पृ. ३४९ (५९)।
[सं. वत्स, प्रा.बच्छ, हिं - बाछा]
[सं. वत्स, प्रा.बच्छ, हिं - बाछा]
( क ) सूरदास प्रभु दोउ जननी मिलि, लेहिं बलाई बोलि मुख बाछे-५०७।
(ख) भवन जाहु तुम मेरे बाछे-१०१४।
बाज सों टूटि गजराज हाँकत परयौ मनौ गिरि चरन धरि लपकि लीन्हे-2५९०।
बाज आना - (१) खो देना।
(२) अलग रहना।
न आयौ बाज - दूर न हटा, अलग न हुआ, आदत, न छोड़ी, संबंध न तोड़ा।
उ. - (क) और पतित आवत न आँखितर, देखत अपनौ साज। तीनौं पन भरि ओर निबाह्यौ, तऊ न आयौ बाज-१९६।
(ख) माया सबल धाम-धन-बनिता, बाँध्यौ हौं इहिं साज। देखत सुनत सबै जानत हौं, तऊ न आयौ बाज १-१०७।
बाज करना - रोकना, मना करना।
बाज रखना - रोक लेना।
बाज रहना - दूर रहना।
एक प्रत्यय जो ‘रखने', 'खेलने', 'करने आदि का अर्थ देता है।
अधर दसन रसना रस बानी, स्रवन नैन अरु भाल-६४३।
भाले या तीर की गाँसी या नोक।
जब वह सुरति होत उर अंतर लागति काम बान की भाली-१० उ०-७९।
कहा री कहौं कछु कहति न बनि आवै लगी मरम की भाली री-८४६।
भाव उतरना - दर या दाम घटना। भाव चढ़ना - दर या दाम बढ़ जाना।
देवी-देवता के प्रति श्रद्धा-भक्ति।
(क) बहुत भाव करि भोजन अर्प्यौ-९३५।
नायक के दर्शन से नायिका के मन में उपजनेवाला विकार।
आंतरिक अनुभव को शारीरिक चेष्टा द्वारा व्यक्त करना।
भाव देना - शारीरिक चेष्टा से मन का भाव प्रकट करना।
भाव दै गयी - मनोभाव या मनो कामना सूचित कर गयी।
उ. - स्याम कौ भाव दै गयी राधा। नारि नागरि न काहु लख्यौ कोऊ नहीं, कान्ह कछु करत है बहुत अनुराधा।
भाव बताना - (१) नखरे के साथ हाथ - पैर हिलाना।
(२) आंतरिक भाव सूचित करना।
बुद्धि का गुण जिससे धर्म आदि का ज्ञान होता है।
रुचिकर लगता है, प्रिय होता है।
सुधारस जेहि स्वाद चाख्यौ तिनहिं और न भावई.-३२६०।
भली लगनेवाली, रुचिकर, प्रिय।
आजु सा बात बिधाता कीन्ही, मन जो हुती अति भावति-१०-२३।
मोसौं तुम मुँह की मिलवत हौ भावति है वह प्यारी -१८६४।
(क) बालबिनोद भावती लीला, अनि पुनीत मुनि भाषी-१०-४।
(ख) एक-एक ते गुन-रूप उजागरि स्याम भावती प्यारी-११८५।
(ग) तुमते को है भावती हृदय बपाऊँ-१८६८।
(ब) बाकी भावती बात चलाइहौं-2२०९।
(क) सूर स्याम की भावती कहै कहौ कहा री-१५३२।
(ख) सूर-प्रभु-भावती के सदा रसभरे नैन भरि भरि प्रिया रूप चोरै-पृ० ३१७ (६४)।
(क) होड़ाहोड़ी सनहिं भावते किए पाप भरि पेट-१-१४६
(ख) सूरदास प्रभु भलैं परे फँद, देउँ न जान भावते जी के-१०-२८७।
अच्छा लगनेवाला, जो भला लगे, भानेवाला।
चरन धोइ चरनोदक लीन्हौ, कह्यौ माँगु मन-भावन-८-१३।
[सं. भ्रातृजाया, हिं. भौजाई]
अच्छा लगता है, रुचता है, पसंद आता है।
(क) जहाँ गयौ तहँ भलौ न भावत, सब कोऊ सकुचानौ-१-१०२।
(ख) गरब गोबिंदहिं भाक्त नाहीं-2-२३।
(ग) उपवन बन्यौ चहूँघा पुर के अति ही मोकों भावत-2५५९।
लागी भावन-भली लगने लगी है।
सूर सुरति क्यों होति हमारी लागी नीको भावन-2०६९।
(तब) लादि पंकज कढ्यौ बाहिर, भयौ ब्रज-मन-भावना-५७७।
वह अलंकार जिसमें भूत और भावी बातें प्रत्यक्षवत् यर्णित हों।
भावी ही के, भवितव्यता हो के।
कह्यौ, सुतनि-सुधि आवति कबहीं? कह्यौ, भावियै कैं बस सबहीं.-१-२८४।
(ख) सूरदास प्रभु भाविहि के बस मिलत कृपा कै अति सुख देवै-2६४१।
भविष्य में होनेवाली बात, भवितव्यता होनी।
भावी काहूसौं न टरै। कहँ वह राहु, कहाँ वह रवि-ससि आनि सँजोग परै। भावी कैं बस तीन लोक हैं, सुर नर देह धरै-१-२६४।
भाट बोलै बिरद नारी बचन कहैं मन भावनी-१० उ०.२४।
तेहि देखे त्रय ताप नासै ब्रज-बधू-मन-भावनो-2२८०।
भाव-भक्ति कछ हृदय न उपजी, मन विषया मैं दीनौ-१-६५
नैन मूँदि कर जोरि बोलायौ। भाव-भक्ति सों भोग लगायौ।
संज्ञा (शब्द) जिससे किसी पदार्थ का गुण, धर्म आदि सूचित हो।
एक अलंकार जिसमें कई भावों की संधि हो।
वह वर्णन-रीति जिसमें दो विरुद्ध भावों की संधि का वर्णन रहता है।
नाहिंन कछू सुहात तुमहिं बिन कानन भवन न भावहिं-३४२७।
(क) रिपु कच गहत द्रुपद-तनया जब सरन-सरन कहि भाषी-१-२७।
(ख) ऐसी भाँति नृपति बहु भाषी। सुनि जड़ भरत हृदय महँ राखी-५-४।
सूरदास प्रभु दीन बचन यौँ हनूमान सौं भाषैं-९-१४६।
ठाढ़े आधान भए देव-देव भाषै-2६१९।
रसना इहई नेम लियो है और नहिं भाषौं मुख बैन-2७६८।
(रिसि ) कह्यौ, सर्प है भाष्यौ मोहिं। सूर्य रूप तूहौ नृप होहि-६-७।
जिसके मन में भावों का उदय बहुत शीघ्र हो, जो सहज ही द्रवित हो जाय।
(क) सुकृती-सुचि-सेवकजन काहि न जिय भावै-१-१२४।
(ख) प्रातहिं उठत तुम्हारे कान्ह को माखन-रोटी भावै-2७०७।
(ग) नहिंन सोहात कछु हरि तुम बिनु कानन भवन न भावै-३४२३।
समझ में, बुद्धि के अनुसार।
प्रान हमारे थात (?) होत हैं तुमरे भावै हाँसी-३०६३।
भावै परौ आजु ही यह तन भाव रहौ अमान-2-३३।
(क) महादेव कौं भाषत साधु-४-५।
(ख) बार-बार संकर्षन भाषत लेत नहीं ह्याँते गज टारी-2५८९।
निबाहौ बाँह गहे की लाज। द्रुपद-सुता भाषति नँदनंदन, कठिन बनी है आज-१-२५५।
बाजत नगर बाजने जहँ तहँ और बजत घरियार-2५६२।
बजता है, बाजे से शब्द निकलता है, बाजा बोलता है।
हरि, हौं सब पति-तनि कौ राजा।
निंदा पर-मुख पुरि रह्यौ जग,यह निसान नित बाजा-१-१४४।
वह स्थान जहाँ सभी चीजें बेचने की दुकानें हों।
बाजार गर्म होना - खूब बिक्री या लेनदेन होना।
निश्चित वार, तिथि आदि को लगने वाली हाट या पैंठ।
बाऐँ कर बाजि-बाग दाहिन हैं बैठे-१- २३।
जन-साधारण में प्रचलित बोली का रूप।
आधुनिक हिंदी जिसका जन्म सन् १००० के आस-पास हुआ माना जाता है और जिसको राजस्थानी ब्रजभाषा, अवधी, खड़ीबोली आदि जन-बोलियों के लिए (संस्कृत की तुलना में) 'भाषा' कहा जाता है।
ब्यास कहे सुकदेव सौं द्वादस स्कंध बनाइ। सूरदास सोइ कहे पद भाषा करि गाइ-१-२२५।
अपने भुज दंडन कर गहिये बिरह-सलिल मैं भासी।
भिंगाना, भिंगानो, भिजाना, भिंजानो
एक पौधे की फली जिसकी तरकारी बनती है।
बनकौरा पिंडीक चिचिंड़ी, सीप पिड़ारू कोमल भिंडी-३९६।
भिखारिणि, भिखारिणी भिखारिन, भिखारिनी
और देव सब रंक-भिखारी, त्यागे बहुत अनेरे-१-१७०।
भिगाना, भिगानो, भिगोना, भिगोनो
रावन तुरत बिभूति लगाए, कहत आइ, भिच्छा दै माई-९-५९।
मूँग-पकौरा पनौ पतबरा। इक कोरे इक भिजे गुरबरा-३९६।
भिजोना, भिजोनो, भिजोवना, भिजोवनो
बल्लभ-संप्रदायी मंदिर में मूर्ति के निकट रहनेवाला पुजारी।
भेदने, छेदने या नाश करने वाले।
मधु कैटभ मथन, मुर भौम केसी भिदन कंस कुलकाल अनुसाल हारी-१०3०-५०।
रोमनि रोमनि भिदि गयौ सब अँग अंग पगी-१५०३।
भिन-भिन' शब्द या ध्वनि करना।
(किसी पर) मक्खियाँ भिनकना - बहुत दुर्बल और दीन - मलीन होना।
भिनभिन' शब्द या ध्वनि करना।
सबेरा, प्रभात, प्रातःकाल।
(क) उठौ नँदलाल भयौ भिनुसार, जगावति नंद की रानी-१०-२०८।
(ख) बारहिं बार जगावति माता, अंबुजनैन भयौ भिनुसार-४०३।
बिष्नु, रुद्र, बिधि, एकहिं रूप। इन्हैं जानि मति भिन्न स्वरूप-४-५।
( दुर्गन्ध आदि से) सर चकराना।
सोभित सुभट प्रचारि पैज करि भिरत न मोरत अंग-९५७।
सब कहत भिरहु स्याम सुनत रहत सदा नाम हारि-जीति घर ही की कौन काहि मारै-2६००।
रुद्र भगवान अरु बान सांबुक भिरे राम कुंभाउ माँड़ी लड़ाई-१० उ०-३५।
होइ सनमुख भिरौं, संक नहिं धरौं, मारि सब कटक सागर बहाऊँ-९-१२९।
ज्यौं सहगमन सुंदरी कैं सँग, बहु बाजन हैं बाजत-९१३०।
चहुँ दिसि ते दल-बादल उमड़े, सूने लागे बाजन–१०३० - उ०-९६।
जो (बाजा) बजने से ठीक हो।
पंच की भीख सूर बल-मोहन, कहति जसोमति माई-४५५
अति ही सीत भीत भीजत तनु गिरि कर क्यों न धरी-३२००।
भीग गयी, गीली या तर हो गयी, आर्द्र या सराबोर हो गयी।
(क) नैन सलिल भीजी सब सारी-पृ. ३५३ (९२)।
(ख) या गोकुल के चौहटे रँग भीजी ग्वालिनि-2४०५।
(आँख) मूँदना या बंद करना।
तहँ भिल्लनि सौं भई लराई। लूटे सब, बिन स्याम सहाई-१-२८६।
भीलनी शबरी जिसके बेर श्रीरामचन्द्र ने सरुचि खाए थे।
भिल्लिनि के फल खाए भाव सौं खाटे मीठे-खारे-१-२५।
बन कोरा पिंडीक चिचींड़ी। खीय पिंडारू कोमल भींड़ी-८३१।
भीत में दौड़ना - शक्ति से बाहर काम करना।
बिन ही भीत चित्र किन कीनो किन नभ हठ करि घाल्यो झोरी-३०२८।
भीत बिना चित्र बनाना - वे सिर पैर की या उल्टी - सीधी बात करना।
जबतैं जनम लियौ जग भीतर तब तैं तिहिं प्रतिहार्यौ-१.३३६।
भीतर का कुआँ - उपयोगी, परन्तु सबके काम न आ सकनेवाली वस्तु।
उ. - सूरदास प्रभु तुम बिन जोबन घर भीतर को कूप।
भीतर पैठना - तत्व की बात जानने का प्रयत्न करना।
भीतर ही भीतर - मन ही मन में।
वल्लभ-संप्रदायी मंदिरों के वे पुजारी जो मूर्ति के निकट रहते हैं।
दसन दामिनि ज्योति उर पर माल मोती, ग्वाल-बाल सब आवैं रंग भीजे-2३५२।
(भीगती) भीगते हैं, गीले होते हैं।
(क) पाहन तारे, सागर बाँध्यौ तापर चरन न भीजै-९-१२६।
(ख) बूँद परत रँग ह्वैहै फीको, सुरँग चूनरी भीजै-७३१।
पुलकित या प्रेममग्न हो जाते हैं।
गदगद सुर, पुलक रोम, अंक प्रेम भीजै-१-७२।
बेगि साँवरे पाइँ धारिये सूर के स्वामी नतरु भीजैगो पियरौ पट आवत है पिय मेहरा-2००१।
ठाढ़े रहौ आँगन ही हो पिय जौलौं मेह न नखशिख भीजौ-2००२।
स्थान जहाँ पान की खेती होती है।
भीड़ चीरना - झुंड हटाकर मार्ग बनाना। भीड़ छँटना - जन-समूह का एकत्र न रह जाना।
ज्यौं बिट पर-तिय सँग बस्यौ, भोर भए भई भीति-१-३२५।
नंदनंदन ब्रत छाँड़िकै को लिखि पूजै भीति-३४४३।
भुस पर की भिति - दृढ़ आधार न होने के कारण बहुत जल्दी ढा जाने या नष्ट हो जानेवाली चीज।
उ. - सूरदास प्रभु तुम्हरे मिलन बिनु भई भुस पर की भिति-2७१६।
भीत बिन कह चित्र देखै रही दूती हेरि २०४३।
भीति (के) बिना चित्र करना (बनाना) - बे सिर-पैर की या आधार-रहित बात करना। भिति बिन चित्र करत - बे सिर-पैर की बातें करते हो।
उ. - तात रिस करत भ्राता कहै मारिहौं, भौति बिन चित्र तुम करत रेखा-१२४६।
चंद की दुति गई, पहै पीरी भई सकुच नाहीं दई अतिहि भीती-१६१०।
मग्न, निमग्न, लीन, डूबा हुआ।
दुष्टनि दुख, सुख संतनि दीन्हौ, नृप-ब्रत पूरन कीन। रामचन्द्र दसरथहिं बिदा करि सूरदास रसभीन-९-२६।
भर या समा जाना, लीन होना।
युक्त, लीन, डूबी हुई, निमग्न।
चलत चरन गहि रहि गई गिरि खेद सलिल भय भीनी-३४४९।
युक्त, लीन, डूबे हुए, निमग्न।
(क) नवल निकुंज नवल रस दोऊ राजत हैं रँग भीने-पृ० ३१५ (४६)।
(ख) दुरत न डर नख गात लाल रँग भीने हो-2४०१।
अति सुकुमार डोलत रस-भीनौ-2-१०।
लीन या मग्न हो गया, समा गया।
सूरदास स्वामीपन तजि कै सेवक पन रस भीन्यौ-८-१५।
गोरे गात मनोहर उरजन लसत फुलेल कंचुकी भीन्ही-2२९५।
भीम के हाथी - भीमसेन द्वरा फेंके गये हाथी जो आज भी आकाश में घूमते माने जाते हैं।
तात्पर्य उस व्यक्ति या पदार्थ से है जो एक बार छूटकर फिर न मिले।
उ. - अब मन भयौ भीम के हाथी सुपने अगम अपार-१० उ०.८४।
सूर स्याम कौ जसुमति टेरति बहुत भीर है हरि न भुलाहिं-९१९।
प्रेम मगन गावत गंध्रब गन ब्यौम बिमाननि भार-५७५।
(क) हरै बलकार बिना को पर। सारंगपति प्रगटे सारंग तैं, जानि दीन पर भीर-१-३३१।
(ख) जब-जब भीर परी संतन कौंचक्र सुदरसन तहाँ सँभारयौ-१-१४।
(ग) जहँ-जहँ भीर पर भक्तनि कौ तहाँ-तहाँ उठि धाऊँ-१-२४४।
दुखित द्रौपदी जानि जगतपति, आए खगपति त्याग। पूरे चीर भीरु-तन-कृष्ना, ताके भरे जहाज-१-२२५।
भील जाति की स्त्री, भीलनी।
शबरी जिसे श्रीरामचंद्र जी ने तारा था।
अजामील अरु भीलि गनिका, चढ़े जात बिमान-१-२३५।
अजामिल बिप्र कनौज-निवासी। सो भयौ बृषली कैं गृहबासी।….। ता भीलिनि कैं दस सुत भए। पहिले पुत्र भूलि तिहिं गए-६-४।
सितार का पहला तार जो लोहे का होता है।
घर घर ते मिष्ठान्न चले लै भाँति-भाँति बहु बाजन बाज-९२०।
पाइनि नूपुर बाजई, कटि किंकिनि कूजै -१०-१३४।
बजता है, बाजे से शब्द निकलता है।
महामोह के नूपुर बाजत, निंदासब्द - रसाल-१-१५३।
(बाजे) बजाकर। (बाजेगाजे) बजा बजाकर।
बाजते नीसान - डंके की चोट पर।
उ. - है हरि-भजन कौ परमान। नीच पावैं ऊँच पदवी, बाजते नीसान-१- २३५।
भीर परैं भीषम-प्रन राख्यौ, अर्जुन कौ रथ हाँक्यौ-१-११३।
राजा भीष्मक जो रुक्मिणी के पिता थे।
कुदनपुर को भोषम राई-१० उ०-७।
राजा शांतनु के, गंगा के गर्भ से उत्पन्न पुत्र देवव्रत जो भीष्म पितामह के नाम से प्रसिद्ध हैं।
विदर्भ के एक राजा जो रुक्मिणी के पिता थे।
रुक्मिणी जो श्रीकृष्ण की पटरानी थी।
पवन पानि घनसारि सुमन दै दधि-सुत-किरन भानु भै भुंजैं-2७२१।
( क ) दाता-मुक्ता, हरता-करता, बिस्वंभर जग जानि। ताहि लगाइ माखन की चोरी, बाँध्यौ जसुमति रानि-४८७।
(ख) मैं कर्ता मैं भुक्ता मोहिं बिनु और न कोई-१० उ०-४७।
भुगताने की क्रिया, भाव या मूल्य।
सुख-भोग, भोजन का सुख या रस।
भोग भुगति भूलेहु भखनहिं, भरी बिरह बैराग-३१२५।
(क) डसी री स्याम भुअंगम कारे-७४७।
(ख) भूलि न उठत जसोदा जननी मनो भुअंगम डासी-३४३९।
ऊखल चढ़ि, सींके कौ लीन्हौ, अनभावत भुइँ मैं ढरकायौ-१०-३३१।
भुइँघरा, भुइँधरा, भुइँ हरा
मैया, कबहिं बढ़ैगो चोटी ? .....। तू जो कहति बल की बेनी ज्यों, ह्वैहै लाँबी-मोटी। काढ़त-गुहत न्हवावत जैहै नागिनि सी भुईं लोटी-१०-१७५।
भुजा उठाना (टेकना) - प्रण करना।
भूनी हुई (बिना रसे की) तरकारी।
[सं. सृष्ट, प्रा. भुट्ठी]
दोनों हाथों का बंधन जिसमें बाँधकर गले था छाती से लगाया जाता है।
हम तौ पाप कियो भुगतै को पुण्य प्रगटि कियौ निठुर हियो री-१४०६।
भुजंगिनि, भुजंगिनी, भुजंगी
माया बिषम भुजंगिनि कौ बिष, उतरचौ नाहिंन तोहि-2.३२।
(क) उरगइंद्र उनमान सुभग भुज-१-६९।
(ख) स्याम, भुज गहि काढ़ि लीजै, सूर ब्रज कैं कूल-१-९९।
भुज भरि गले लगाकर।
उ. - (क) भुज भरि धरि अँकवारि बाँह गहि कै झकझोरयौ-१०२६।
(ख) भुज भरि मिलनि उडत उदास ह्वै गत स्वारथ समए-2९९२।
तेज धूप या तपी जमीन पर जलना।
बड़े सिक्के के छोटे सिक्के मिलना।
अस्पष्ट स्वर में बड़बड़ाना।
बड़े सिक्के को छोटे से बदलना।
सूरदास प्रभु रसिक सिरोमनि भरई राधिका भोरी।
छिनछिन बिरस करति है सुंदरि क्यों बहरत मन मोर-2२१४।
दुख की बात भूलकर चित दूसरी और लगना।
बहलाकर, भुलावे में डालकर।
सबै सखा बैठे रहौ, मैं देखौं घौं जाइ। बच्छ-हरन जिय जानि प्रभू, आपु गए बहराइ-४९२।
आवै, मन बहराइ - मन बहला आवे, (घूम-घाम कर) चित्त प्रसन्न कर ले।
मैं पठवत अपने लरिका को आवै मन बहराइ ५१०।
बहलायी हुई, जिसे भुलावे में डाला गया हो।
जनु सुरभी बन बसतिं बच्छ बिनु, परबस पसुपति की बहराई-१०-१६९।
उरहन देन ग्वालि जे आईं। तिन्हैं जसोदा दियौ बहराई।
ऊबी हुई बात से चित्त हटाकर दूसरी ओर लगाना।
सूरदास मन रहत कौन बिधि बदन बिलोकनि बाजु-३२३५।
बाहु टाड़ कर कंकन बाजूबँद एते पर तौकी -११२०।
(किसी चूर्ण-पदार्थ को) छिड़ककर, भुरभुराकर।
अरुन अधर-छबि दमन बिराजत, जब गावत कल मंदन। मुक्ता मनौ नीलमनिमय-पुट, धरे भुरकि बर बंदन-४७६।
भुरकुस निकलना - ( १ ) इतनी मार पड़ना कि हड्डी पसली चूर-चूर हो जाय।
(२) नष्ट होना।
भुरकुस निकालना - मारते-मारते हड्डी पसली चूर-चूर कर देना।
(२) नष्ट करना।
दबने-कुचलने से बिगड़ी दशा वाला।
भरता करना ( कर देना) - दबाकर या मार-पीटकर चूर-चूर कर देना।
तरकारी जो बैंगन आदि को आग में भूनकर बनती है।
हल्के आघात से ही चूर-चूर हो जानेवाला।
तुम भुरये हौ नंद कहते हैं तुमसौं ठोटा। दधि-ओदन के काज देह धरि आए छोटा।
भ्रम में पड़ा हुआ, भूला हुआ।
जनम साहिबी करत गयौ।…| कुबुधिकमान चढ़ाइ कोप करि, बुधि-तरकस रितयौ। सदा सिकार करत मृग-मन कौ, रहत मगन भुरयौ-१६४।
फुसलाती हैं, भुलावा देती हैं।
ओढ़नि आनि दिखाई मोकौं, तरुनिनि की सिखई बुधि ठानी। घर लै लै मेरौ सुत भुरवहिं, ये ऐसी सब दिन की जानी-६९५।
बहलाया, फुसलाया, भ्रम में डाला।
अति हीं चतुर कहावत राधा बातन ही हरि क्यों न भुराये-१४५३।
कुंतल कुटिल भँवर भामिनि वर मालति भुरै लई।-तजत न गहरु कियो तिन कपटी जानि निरास भई-३३०८।
भूलूँगा, बहलाने-फुसलाने में आऊँगा।
मैं अपनी सब गाय चरैहौं। प्रात होत बल के सँग जैहौं तेरे कहे न भुरैहौं।
भ्रम या भुलावे में डालना।
लेहु-लेहु गोपाल कोऊ दहयौ दई भुलाइ-१२११।
देति भुलाइ-भ्रम में डालती है, धोखा देती है।
उ.-सूर प्रभु की सबल माया देति मोहिं भुला-१-४५।
रहे भुलाई-भूले रहे, (सब कुछ) भुला बैठे।
जेंवत छाक गाइ बिसराई। सखा श्रीदामा कहत सबनि सौं, छाकहि मैं तुम रहे भुलाई-४७१।
सप्त रसातल सेषासन रहे तब की सुरति भुलाऊ-१०-२२१।
सुरसरी-सुवन रनभूमि आए। बान-बरषा लगे करन अति क्रुद्ध ह्वै, पार्थ-अवसान तब सबु लाए-१-२७१।
भूल गयी, विस्मरण हो गयी, बिसर गयी।
(क) चिंता कीन्हैं भूख भुलानी नींद फिरति उचटी-१-९८।
(ख) सुरपति-पूजा तुमहि भुलानी-१००१।
भटक गये हो, राह भूल गये हो।
स्याम तुमहिं ह्याँ कौ नहिं पठए तुम हौ बीच भुलाने-३००६।
सुत-बित बनिता प्रीति लगाई, झूठे भरम भुलानौ-१-३२९।
सुधि न रही, होश में न रहा, घबरा गया।
कमल सकटनि भरे ब्याल मानौ। स्याम के बचन सुनि, मनहिं मन रह्यौ गुनि, काठ ज्यौं गयौ घुनि, तनु भुलानौ-५९०।
भूल गया, विस्मृत कर दिया।
पुर-नर-मुनि मोहित सब कीन्हे सिवहिं समाधि भुलान्यो-१८५७
(मार्ग) भुला दिया, (राह) भूल गया।
कब धौं गयो संग हरि के वह कीधौं पंथ भुलान्यौ-१४७१।
अपनपौ आपुन ही मैं पायौ.....। ज्यौं कुरंग-नाभी कस्तूरी, ढूँढ़त फिरत भलायौ-४-१३।
भूल जाता है, विस्मृत हो जाता है।
बृन्दाबन मोकौं अति भावत।......। कामधेनु, सुरतरु सुख जितने, रमा सहित बैकुंठ भुलावत-४४९।
(क) जीव कर्म करि बहु तन पावै। अज्ञानी तिहिं देखि भुलावै-५-४।
(ख) सूरदास प्रभु देखि देवि सुर-नर-मुनि-बुद्धि भुलावै-१०-१२६।
सूर स्याम को जसुमति टेरति बहुत भीर है हरि न भुलाहि-९१९।
जब हरि मुरली अधर धरत।....खग मोहैं मृग-जूथ भुलाहीं, निरखि मदन-छबि धरत-६२०।
सघन बृन्दाबन अगम अति, जाइ कहुँ-न भुलाहु-६१०।
खाइ न सकै खरचि नहिं जानै ज्यौं भुवंग सिर रहत मनी-१-३९।
(क) गइ मुरछाइ, परी धरनी पर, मनौ भुवंगम खाई-१०-५२।
(ख) ज्यों केंचुरी भुवंगम त्यागत मात-पिता यों त्यागे-पृ० ३३९ (८९)।
(ग) माई री मोहिं डस्यौ भुवंगम कारो।
लेन मीन भुवंगिनी भुअ नासिका थल बीच-१३५१।
भूमि और सूर्य के बीच का लोक, अंतरिक्ष लोक।
कंपै भुव वर्षा नहिं होहि-१-२८६।
तुम हर्ता तुम कर्ता एकै, तुम हौ अखिल भुवन के साँई-2५५८।
भुवन चौदह खुरनि खूँदति सुधौं कहा समाइ-१-५६।
चौदह की संख्या का द्योतक शब्द।
येई हैं श्रीपति भुवनायक येई हैं कर्ता संसार-४९७।
जो रस नंद-जसोदा बिलसत, सो नहिं तिहूँ भुवनिया-१०-२३८।
[सं. भूपाल, प्रा.भुआल, हिं. भुआल]
(क) रावन पै लै गए सकल मिलि, ज्यौं लुब्धक पसु जाल। करूवौ बचन स्रवन सुनि मेरौ, अति रिस गही भुवाल-९१०४।
(ख) कालिंदी कैं कूल बसत इक मधुपुरि नगर रसाला। कालनेमि अरु उग्रसेन-कुल उपज्यौ कंस भुवाला-१०-४।
रविबंसी भयौ रैवत राजा। ता सम जग दुतिया न बिराजा। ता गृह जन्म रैवती लयौ। ताकौं लैसो ब्रह्मपुर गयौ।......। ब्याह-जोग अब सोई आहि। रैवत ब्याह कियो भुवि आइ। आप कियौ तप बन मैं जाइ~-९-४।
टूटे कंधऽरु फूटी नाकनि, कौ लौं धौं भुस खैहौ-१-३३१।
भुस पर की (मी) भीत - शीघ्र नष्ट हो जानेवाली वस्तु, अस्थायी और अविश्वसनीय बात।
उ. - (क) तुम्हरी बोलनि कौन पतीजै ज्यौं भुस पर की भीति-३१६३।
(ख) बिनु गोविंद सक्ल सुख सुन्दरि भुम पर की सी भीत-१० उ०-७५।
कह्यौ पवन को भुस भयौ - बात तत्काल उड़ गयी, किसी ने बात पर ध्यान ही नहीं दिया।
उ. - मेरौ कह्यौ पवन को भुस भयौ गावत नंदकुमार-३४८४।
भुस फटकै - व्यर्थ के कार्य में श्रम नष्ट करे, निरर्थक कार्य में शक्ति लगाये।
उ. - सूर स्याम तजि को भुस फटके मधुप तुम्हारे हेति-३२५६।
भोजन किये बिनु भूव क्यौं भाजै बिन खाए तब स्वाध-2७७८।
ऊँचे चढ़ि दसरथ लोचन भरि सुत-मुख देखे लेत। रामचन्द्र से पुत्र बिना मैं भूँजब क्यौं यह खेत-९-३९।
(क) संकर कौ मन हर्यो कामिनी, सेज छाँड़ि भू सोयौ-१-४३।
(ख) भू-भर-हरन प्रगट तुम भूतल गावत संत-समाज-१-२१५।
कीर नासा इंद्र धनु भू भँवर सी अलकावली।
जाकौं दीनानाथ निवाजैं। भवसागर मैं कबहुँ न झूकै, अभय निसाने बाजैं - १- ३६।
नक बेसरि बंसी के संभ्रम भौंह मीन अकुलात। मनु ताटंक कमठ घूँघट उर जाल बाँझि अकुलात।
सीस धरि श्रीकृष्न लीने चले गोकुल बाट -१०- ५।
बाट करना - मार्ग या रास्ता बनाना।
बाट करि - मार्ग बनाकर, रास्ता खोलकर। जीत्यौ जरासंध बाँधि छोरी। जुगल कपाट बिदारि बाटि करि लतनि जही संधि जोरी-१० उ. ५२ बाट जोहना (देखना, निहारना) - प्रतीक्षा करना।
बाट पड़ना - (१) मार्ग में तंग करना या पीछे पड़ना।
(२) डाका पड़ना, हरण होना।
बाट पारना - डाका डालना, हरण करना।
बाट लगाना - (१) मार्ग दिखाना।
(२) ढंग बताना।
(३) मूर्ख बनाना।
सृष्टि-रचना के मूत उपकरण जो पाँच माने गये हैं.-पृथ्वी, वायु, जल, अग्नि और आकाश।
भूत-दया-प्राणीमात्र के प्रति दया।
क्रिया का वह रूप जो व्यापार की समाप्ति का सूचक हो।
कुत्ते का भों-भों शब्द करना।
अपुनपौ आपुत ही बिसरयौ। जैसे स्वान काँच-मदिर मैं, भ्रभि-भ्रमि भूकिं मरयौ-2-२६।
(क) चिंता कोन्ह भूख भुलानी-१-९८।
(ख) अति प्रचंड पौरुष बल पाऐं केहरि भूख मरै-१-१०५।
भूख मरना - खाने की इच्छा न रह जाना।
भूख लगना - खाने की इच्छा होना।
भूख से (भूखों) मरना - योजन न मिलने ले कष्ट उठाना या मरना।
मचला अकलैमूल, पातर, खाउँ खाउँ करै भूखा-१-१८६।
भूखा रहना - उपवास करना। भूखाप्यासा - बिना खाये - पिये।
भूखे छिन न रहत मन मोहन-१०-२३१।
वह शास्त्र जिससे पृथ्वी की प्राकृतिक बातों का ज्ञान होता है।
पृथ्वी पर रहने वाले प्राणी।
वे पिशाच या दैत्य जो रुद्र के अनुचर तथा अत्यन्त कुरूप और क्रूर माने जाते हैं।
संकर प्रगट भए भृकुटी तें, करी सृष्टि निर्मान। भूत-प्रेत बैताल रचे बहु दौरे बिधि कौ खान-सारा. ६५।
(किसी बात का) भूत उतरना - (इस बात के लिए) जरा भी उत्साह न रह जाना।
(किसी बात का) भूत चढ़ना (सवार होना)(किसी बात के लिए ) जी - जान से जुट जाना।
भूत चढ़ना ( सवार होना) - बहुत क्रोध होना।
भूत उतरना - (१) क्रोध शांत होना।
(२) उत्साह शेष न रहना।
भूत बनना - (१) बहुत कुद्ध होना।
(२) बहुत आवेश में होना भूत बनकर लगना (पीछे पडना ) - किसी तरह पीछा न छोड़ना।
भूत का पकवान ( की मिठाई ) - (१) ऐसी चीज जिसका अस्तित्व न हो पर जो भ्रम से सच्ची प्रतीत हो।
(२) सहज ही मिला हुआ धन या ऐश्वर्य जो अनायास नष्ट भी हो जाय।
भक्त-बत्सल कृपानाथ असरन-सरन, भार-भूतल हरन, जस सुहायौ-१-११९।
भूतलराइ, भूतलराई, भूतलराउ, भूतलराऊ
मतौ यह पूछत भूतलराइ-१-२६९।
वह विद्या जिससे प्रेत,पिशाच, कुग्रह आदि जनित मानसिक रोगों का निदान हो।
भूमि या पृथ्वी से उत्पन्न।
करुनामय जब चाप लियौ कर, बांधि सुदृढ़ कटि-चीर। भूभृत सीस नमित जो गर्बगत, पावक सींच्यौ नीर-९-२६।
भूमि होना - पुथ्वी पर गिरना।
तिन हारयौ सब भूमि-भँडार-१-२४६।
सेमर फूल सुरँग अति निरखत मुदित होत खगभूप-१-१०२।
कहन लगे सब सूरप्रभु सौं होहु इहाँ भूपाल-2५७१।
वाल्हीक का चंद्रवंशी राजा जो सोमदत्त का पुत्र था। महाभारत के युद्ध में यह दुर्योधन की ओर से लड़ा और अर्जुन द्वारा मारा गया था।
[सं. भूरिश्रवस्, हिं. भूरिश्रवा]
इत भगदत्त द्रोन भूरिश्रव तुम सेनापति धोर-१-२६९।
पियरी, भौरी, गोरी, गैनी, खैरी, कजरी जेती। दुलही, फुलही, भौंरी, भूरी, हाँकि ठिकाई तेती-४५५।
प्रहार होगा, आघात पड़ेगा, चोट लगेगी।
लादत, जोतत लकुट बाजिहै, तब कहैं मूड़ दुरैहौ -१-३३१।
बाजी मारना - दाँव जीतना।
बाजी ले जाना - किसी बात में आगे बढ़ जाना।
सूर एक पौ नाम बिना नर फिरि-फिरि बाजी हारी-१-६०।
कै कहुँ रंक, कहूँ ईस्वरता, नट-बाजीगर जैसे -१-२९३।
वह भवन जिसमें एक ही जैसे अनेक द्वारों के कारण मार्ग भूल जाय।
भूलि रहे-धोखे में पड़ गये।
भूलि रहे अति चतुर चितै चित कौन सत्य कछु मर्म न पावत-१० उ.-५।
भूलि करौ नहिं ऐसे काम - कदापि वैसा काम न करना।
उ. - अब पर घर की सौंह करत है भूलि करौ नहिं ऐसे काम-2०२३।
(क) तू जननी अब दुख जनि मानहिं। रामचंद्र नहिं दूरि कहूँ, पुनि भूलिहु चित चिंता नहिं आनहिं-९-९५।
(ख) भूलिहु जिनि आवहिं इहि गोकुल तपत तरनि सम चंद।
भूल के कोई काम करना - अनजान या धोखे में कोई काम करना।
भूल के (भी) कोई काम न करना - वह काम कदापि न करना, उस काम को न करने का पक्का निश्चय कर लेना।
आसक्त हो गयीं, मुग्ध हो गयी।
गोपी तजि लाज, सँग स्याम-रंग भूलीं-६४२।
भूल जाय, ध्यान न रखे, पता न पावे, विस्मरण कर दे।
ज्यौं मृगा कस्तूरि भूलै, सु तौ ताके पास-१-७०।
भूला हुआ ही, भ्रम में पड़ा।
तुम बिनु सुलोइ भूलौ डोलत-१-१७७।
भूला हुआ, भ्रम में पड़ा हुआ।
तुम बिनु भूलोइ भूलौ डोलत-१-१७७।
याद न रहा, विस्मृत हुआ, ध्यान न रहा।
भुल्यौ भ्रम्यौ तृषातुर मृग लौं, काहूँ सम्र न गँवायौ-१-२०१।
भ्रम में पड़ गया, धोखे में आ गया।
(क) अब हौं माया-हाथ बिकानौ।...। हिंसा-मद-ममता रस भूल्यौ, आसा हीं लपटान्यौ-१-४७।
(ख) दीन जन क्यौं करि आवै सरन ? भूल्यौ फिरत सकल जल-थल मग, सुनहु न ताप-भय-हरन-१-४८।
शोभा बढ़ानेवाली वस्तु या व्यक्ति।
पृथ्वी के देवता, ब्राह्मण।
बिलनी' (कीड़ा) जो दूसरे कीड़ों के ढोले को पकड़ कर इस तरह 'भिनभिन' करता है कि वह भी उसी की तरह हो जाता है।
(क) कहूँ ठौर नहिं चरन-कमल बिनु, भृंगी ज्यौं दसहूँ दिसि धावै-१-२३३।
(ख) भृंगी री; भजि स्यामकमल-पद, जहाँ न निसि कौ त्रास-१-३३९।
बिलनी' कीड़ा जो दूसरे कीड़ों को भी अपना जैसा बना लेता है।
भृकुटी कुटिल, अरुन अति लोचन, अगिनि-सिखा-मुख कह्यौ फिराई-९-५६।
(ख) भृकुटि पर मसि-बिंदु सोहै सकै सूर न गाइ-१२०-2५।
एक प्रसिद्ध मुनि जो शिव जी के पुत्र माने जाते हैं और जिनके वंश में परशुराम जन्मे थे। प्रसिद्धि है कि इन्होंने विष्णु की छाती में, उनकी सहनशीलता की परीक्षा के उद्देश्य से, लात मारी थी। विष्णु के सब अवतारों की छाती पर इस चिह्न का बना रहना माना गया है।
वै पथ बिकल चकित अति आतुर भर्मत हेतु दियौ। भृति बिलबि पृष्टि दै स्यामा स्यामै स्याम बियौ-३४७४।
तब पहिचानि जानि प्रभु को भृतु परम सुचित मन कीन्हीं-2९७१।
मंत्री-भृत्य-सखा-मो सेवक यातैं कहत सुजान-सारा. ५४६।
जिसको आँखों की पुतलियाँ टेढ़ी तिरछी रहती हों।
( क ) चारि पदारथ दिए, सुदामा तंदुल भेंट धरयौ-१-१३३।
(ख) ते सब पतित पायेँ-तर डारौं, यहै हमारी भेंट-१-१४६।
(क) अब लगि प्रभु तुम बिरद बुलाए भई न मोसौं भेंट। तजौ बिरद कै मोहिं उधारौ, सूर कहै कसि फेंट-१-१४५।
(ख) नृपति के रजक सौं भेंट मग मैं भई, कह्यो, दै बसन हम पहिरि जाहीं-2५८४।
धाइ-धाइ द्रुम भेंटइ ऊधौ छाके प्रेम-३४४३।
जिन रघुनाथ-फेरि भृगुपति-गति डारी काटि तहीं-९-९१
विष्णु की छाती पर भृगु की लात का चिह्न।
(क) माथे मुकुट सुभग पीतांबर उर साभित भृगु-रेखा हो।
(ख) तट भुजदड भौंर भृगुरेखा चंदन चित्रिच रंगत सुंदर।
भृगु मुनि का चरण-चिह्न जो विष्णु की छाती पर है।
उर अरु ग्रीव बहुरि हिय धारै। तापर कौस्तुभ मनिहिं बिचारै। तहँ भृगुलता, लच्छमी जान। नाभि कमल चित धारै ध्यान-३-१३।
जोइ भावै सोइ करहु तुम, लता सिला, द्रुम, गेहु। ग्वाल गाइ कौ भृत करौ, मानि सत्य ब्रत एहु-४९२।
सिर के भीतर का गूदा, मगज।
भेजा खाना - बकबक से तंग करना।
भेजा, एक स्थान से दूसरे तक जाने को प्रेरित किया।
रिषि सिष्यहि भेज्यौ समुझाइ। नृप सौं कहि तू ऐसी जाइ-१-२९०।
एक प्रसिद्ध चौपाया, गाडर।
विरोधी पक्ष में परस्पर द्वेष उत्पन्न करना।
मनो इन सकुल अबहीं यहि बन इन भुज भरि भेंटोंगो गोपालहिं-2४८३।
ते बेली कैसै दहियत हैं जे अपनै रस भेइ.-१-२००।
किसी वस्तु या व्यक्ति के जाने का आयोजन करना, रवाना करना।
बाहिर तरुन किसोर बयस बर, बाट-घाट का दानी -१०-३११।
कूच बिष बाटि लगाय कपट करि बालघातिनी परम सुहाई।
अंगारों या उपलों पर सिकी मोटी छोटी रोटी, अंगाकड़ी, लिट्टी।
दूध, बरा, उत्तम दधि बाटी, गाल मसूरी की रुचि न्यारी-१०-२२७।
भेंटत आँसू परे पोठि पर, बिरह-अगिनि मनु जरत बुझाए-९-१६८।
भेंट करते हैं, चढ़ाते हैं।
नंद करत पूजा, हरि देखत। घंट बजाइ देव अन्हवायौ, दलचंदन लै भेंटत-१०-२६१।
(क) भारतादि दुरजोधन, अर्जुन, भेंटन गए द्वारिकापुरी-१-२६८।
(ख) जुवतिन सबै कामबपु भेंटन कूँ ललचाय-सारा. ५१५।
श्रीदामा आदि सकल ग्वालनि को मेरे हित भैंटिबों-2९४२।
(क) किशोरी अँग अँग भेंटो स्यामहिं-१७०१।
(ख) रुकमिनि राधा ऐसैं भेंटी। जैसे बहुत दिननि की बिछुरी एक बाप की बेटी-४२९१।
भेंट की, गले या छाती से लगाया, मिले।
जथाजोग भेंटे पुरबासी, गए सूल, सुख-सिंधु नहाए-९-१६८।
सूर स्याम ज्यों उछँगि लई मोहिं यों मैं हूँ हँसि भेंटोंगी-पृ० ३५२ (७९)।
(क) अपुनपौ आपुनही मैं पायौ। सब्दहिं सब्द भयौ उजियारी, सतगुरु भेद बतायौ.-४-१३।
(ख) मन इनसौं मिलि भेद बतायौ बिरह फाँस गरे डारी-पृ. ३२६ (५७)।
(ग) घर को भेद और के आगे क्यौं कहिबे कौं जाही-१९००।
(घ) कहा मन मैं घालि बैठी भेद मैं नहिं लखि सकी २२५९।
छाक लिए सिर स्याम बुलावति। ढूँढ़त फिरति ग्वारिनी हरि कौं, कितहूँ भेद न पावति-४५९।
(क) बग-बगुली अरु गीध-गीधिनी आइ जनम लियौ तैसौ। उनहूँ कै गृह सुत दाता हैं, उन्हें भेद कहु कैसौ-2-१४।
(ख) भेद चकोर कियौ ताहू मैं बिधु प्रीतम रिपु भान-.३३५७।
इते पर हस्तकानि गति छबि नृत्य भेद अपार-पृ० ३५१ (७७)।
मनोभाव जानने के लिए पैनी दृष्टि से देखना।
छेदकर, भेदन करके, विदीर्ण करके।
धनि जननी जो सुभटहिं जावै ...। मरै तो मंडल भेदि भानु कौ, सुरपुर जाइ बसावै-९-१५२।
भेदिआ सौं भेद कहिबो छेद सौं छाती परौ-३२६०।
बड़ई का ’बरमा’' जिससे काठ में छेद किया जाता है।
मनोभाव जानने के लिए तीव्र दृष्टि से देखा।
प्रभु जागे, अर्जुन-तन चितयौ। कब आये तुम, कुसल खरी। ता पाछै दुर्योधन भेद्यौ, शिर-दिसि तै मन गर्व धरी-१-२६८।
बड़ा ढोल या नगाड़ा, दुंदुभी।
(क) घुरत निसान, मृदंग-संख धुनि, भेरि-झाँझ-सहनाइ-९-२९।
(ख) बाजन बाजै गहगहे, बाजैं मंदिर भेरि-१०.४०।
कान्ह कुँवर कौ कनछेदन है, हाथ सोहारी भेली गुरु की १८-१९०।
जुग-जुग जनम, मरन अरु बिछुरन, सब समुझत मत-भेव। ज्यौं दिनकरहिं उलूक न मानत, परि भाई यह टेव-१-१००।
कपड़े, गहने आदि से अपने को सजाना।
अबिहित बाद-बिवाद सकल मत इन लगि भेष धरत-१-५५।
भेष बनायौ - शरीर धारण किया, अवतार लिया।
उ. - नर तन सिंह बदन बपु कीन्हौ जन लगि भेष बनायौ-१-१९०।
वहाँ भेषज नाना बिधि को अरु मधुरिपु से हैं बैद-३०१३।
अति सुगंध मर्दन अँग अँग ठनि बनि बनि भूषन भेषति-१५२६।
संख-चक्र-गदा-पद्म बिराजत, अति प्रताप सिसु-भेषा-१०-४।
बनावटी रूप रंग और पहनावा।
(क) भनी मात-पिता बंधव गुरु-गुरुजन यह कहैं मोसौं-१२२१।
(ख) भैनी देखि देति मोहिं गारी काहें कुलहि लजावति-१५१६।
मातु-पिता भैया मिले, (२) नई रुचि नई पहिचानि-१-३२५।
एक दैत्य जो दुर्गा जी द्वारा मारा गया था।
मैस का नर, भैंसा; यह यम का वाहन माना गया है।
सूरदास भगवंत-भजन बिनु, मनौ ऊँट-वृष भैसौ-2-१४।
कत हौ सीत सहति ब्रत-सुंदरि, ब्रज' पूरन सब भै री-७८७
(क) नागनि के काटैं बिष होइ। नारी चितवत नर रहै भोइ.-९-२।
त्यों जिय रहै बिषय-रस भोइ-१० उ०-१२७।
लाल सों रति मानी जानी कहे देत नैना री रंग भोए-2११२।
तुम दाता अरु तुमहिं भोकमा हरता-करता तुमहीं सार-९३६।
वे तान्त्रिक और वाममार्गी जो एक चक्र में बैठकर देवी का पूजन और मद्यपान करते हैं।
परै भहराइ भभकंत रिपु धाइ सौं, करि कदन रुधिर भैरौं अघाऊँ-९-१२९।
जिस पर किसी भूत-प्रेत का आवेश आता हो।
मूकू, निंद, निगोड़ा, भोंड़ा, कायर, काम बनावै-१-१८६।
भोंतरा, भोंतला, भोंथरा, भोंथला
जिसकी धार तेज न हो, कुंद।
निर्घिन, नीच कुलज, दुर्बुद्धी, भोंदू, नित को रोऊ-१-१८६।
गुरुजन तेउ इहाँ इनि त्यागी मेरे बाटे परयौ जँजाल-पृ. ३२९ (८४)।
पाप-पुण्य का फल जो सहा या भोगा जाता है, प्रारब्ध।
अब कैसै पैयत सुख माँगे। जैसोइ बोइयै तैसोइ लुनिए, कर्मन भोग अभागे-१-६१।
काग हंसहिं संग जैसी कहाँ दुख कहूँ भोग-2९११।
देवी-देवता को चढ़ाया जानेवाला खाद्य, नैवेद्य।
(क) पट अंतर दै भोग लगायौ-१०-२६१।
(ख) गिरि गोबर्धन देवन को मनि सेवहु ताकौ भोग चढ़ाई-९१३।
सुख-दुख का अनुभव करना, भुगतना।
इन्द्रियों का सुख भोगनेवाला।
सूर स्याम ब्रज जुवतिनि भोगी-१८४५।
सूर स्याम आपुन ही भोगी-१०२५।
भौंरा भोगी बन भ्रमै (रे) मोद न मानै ताप-१-३२५।
अबरक का चूर्ण जो होली में गुलाल के साथ उड़ाया जाता है।
लिप्त, लीन या निमग्न होना।
काग-सृगाल-स्वान कौ भोजन तू कहै मेरौ मेरो१-३४०।
करि भोजन अवसेस जज्ञ कौ त्रिभुवन भूख हरी-१-१६।
स्थान जहाँ मूल्य देकर भोजन किया जाय।
एक वृक्ष जिसकी छाल प्राचीन काल में ग्रंथ-लेखन के काम में आती थी।
(क) सो ब्रज मैं माखन कौ भोगी-५९९।
(ख) सूर-स्याम मेरौ माखन-भोगी तुम आवतिं बेकाज-७७५।
नंद-भवन मैं कान्ह अरोगैं। जसुदा ल्यावैं षटरस भोगैं-३९६।
सुख-विलास का स्थान या प्रदेश
मर्त्यलोक जहाँ पाप-पुण्य का फल दुख-सुख के रूप में भोगना होता है।
श्रीकृष्ण के एक ग्वाल सखा का नाम।
अर्जुन, भोजऽरु, सुबल, सुदामा, मधुमंगल इक ताक-४६४।
भ्रम में पड़ना, बहकाया जाना।
धोखा देकर, भ्रम में डालकर।
सखी री, मुरली लीजै चोरि।...। ना जानौं कछु मेलि मोहिनी राखे अंग अंग भोरि-६५७।
महा मोहिनी मोहि आतमा-अपमारगहिं लगावै।........। ज्यों दूती पर-बधू भोरि कै लै परपुरुष दिखावै-१-४२।
(क) देखी हरि मथति ग्वालि दधि ठाढ़ी।….| दिन थोरी, भोरी, अति गोरी, देखत ही जु स्याम भए चाढ़ी-१०-३००।
(ख) सूरदास अबला हम भोरी गुर-चैटी ज्यौं पागी-३३३५।
आरज पंथ छिड़ाय गोपिकन अपने स्वारथ भोरी-2८६३।
(क) सूर स्याम उनको भाए भोरे हमको निठुर मुरारी-पृ. ३३० (९१)।
(ख) सुनियत हुए तैसई देखे सुंदर सुमति सूभोरे-2९७१।
(ग) ऊधौ, तुम सब साथी भोरे-३१७६।
अबोध, अनजान, अपरिपक्य अवस्था के।
(क) कहाँ रहत काके वै ढोटा बृद्ध तरुन की वो हैं भोरे-१२३८।
(ख) की गोरे की कारे रँग हरि की जोबन की भोरे-१२६०।
किलकि किलकत हँसत, बाल सोभा लसत, जानि यह कपट, रिपु आयौ भोरैं-१०-६२।
कहा भयौ तेरे भवन गए जो पियौ तनक लै भोरै-१०-३२१।
कह जानै मेरौ, बारौ भोरौ, झुकी महरि दै-दै मुख गारि-१०-३०४।
लीन हुआ, लिप्त या निमग्न हुआ।
लिप्त, लीन, युक्त, निम्मग्न।
(क) भ्रम-भोयौ मन भयौ पखावज, चलत असंगत चाल-१-१५३।
(ख) ब्रह्मा महादेव सुर सुरपति नाचत फिरत महारस भोयो.-१-५४।
खान-पान-परिधान मैं (रे) जोबन गयौ सब बीति। ज्यों बिट पर-तिम सँग बस्यौ (रे) भोर भए भई भीति-१-३२५।
(ख) भोर भयो जागे नँदलाल-2५७१।
हँसत परस्पर आपु में चली जाहिं जिय भोर।
सूर प्रभु की निरखि सोभा भई तरुनी भोर-१३५५।
भ्रम में डालने (से),बहकाने से।
सूरदास लोगन के भोरए काहे कान्ह अब होत पराए।
शीघ्र ही संतुष्ट हो जानेवाले, शिव, महादेव।
सिव कौं सबनि कियौ सनमान। भोलानाथ लियौ सब मान-४-५।
कबहुँ सेज कर झारि सँवारति कबहुँ मलयरज भोवति-१९४९।
अधिक वर्षा आदि से नदी का पानी बढ़ना।
लकड़ी का काम करनेवाला, बढ़ई।
कन्हैया हालरु रे। गढ़ि-गुढ़ि ल्यायौ बाढ़ई, धरनी पर डोलाइ, बलि हालरु रे।...। इक लख माँगै बाढ़ई, दुइ लख नंद जु देहिं, बलि हालरु रे -१०-४७।
बढ़ गयी, वृद्धि को प्राप्त हुई।
(क) कहा भयौ जौ संपति बाढ़ी, कियौ बहुत घर घेरौ-१-२६६।
(ख) नैननि न बिचारि परत देखत रुचि बाढ़ी-१०-२०१।
घर की बाढ़ी - घर ही में बढ़ चढ़ कर बातें करने वाली।
उ. - ग्वालिनि है घर ही की बाढ़ी -७७४।
एक खिलौना जो डोरी लपेट कर नचाया जाता है।
[सं. भ्रमर, पा. भमर, प्रा. भँवर]
इत आवत दै जात देखाई ज्यौं भौंरा चकडोर।
हिंडोले की मयारी में लगी लकड़ी जिसमें डोरी बाँधी जाती है।
[सं. भ्रमर, पा. भमर, प्रा. भँवर]
हिंडोरना माई झूलत गोपाल।.....। भौंरा मयारिनि नील मरकत खँचे पाँति अपार।
भौंरों के मँडराने की किया या भाव।
जिस पशु के रोओं या बालों का घुमावदार चक्र हो, जिसके स्थान आदि के विचार से पशु के गुण-दोष का निर्णय किया जाय।
घुमावदार रोओं या बालों के चक्र वाली गाय।
पियरी, मौरी, गोरी, गैनी, खैरी, कजरी, जेती। दुलही, फुलही, भौंरी, भूरी, हाँकि, ठिकाई तेती-४४५।
विवाह के समय वर-वधू द्वारा अग्नि की परिक्रमा।
तेज बहते हुए पानी में पड़ने वाला चक्कर, भँवर, आवर्त।
कब लगि फिरिहौं दीन बह्यो ? सुरति-सरित-भ्रम भौंर लोल मैं, मन परि तट न लह्यौ-१-१६२।
रसभरे अंबुजनि भीतर भ्रमत मानौ भौंर-१३६४।
[सं. भ्रमर, पा. भमर, प्रा. भँवर]
भौंरा भोगो बन भ्रमै मोद न मानै ताप-१-३२५।
[सं. भ्रमर, पा. भमर, प्रा. भँवर]
तेरी कोऊ कहा करैगौ धौं लरिहै हमसों भौजाई.-८५५।
पाँच भूतों से बना हुआ, पार्थिव, सांसारिक।
भौतिक देह जीव अभिमानी देखत ही दुख लायौ।
तब इक-पुरुष भौंह तै भयो-३-७।
भौह चढ़ाना (तानना) - अप्रसन्न होना, बिगड़ना।
भौंह तनत - कुद्ध या अस्न्न होते हैं।
उ. - बदत काहू नहीं निधरक निदरि मोहिं न गनत। बार-बार बुझाइ हारी भौंह मो पर तनत।
भौंह चलाना - भौंह मटका कर संकेत करना।
भौंह चलावै - भौंहें मटकाकर संकेत करता है।
उ. - ठठकति चल मटकि मुँह मोरे बंकर भौंह चलावै-८७६।
भौंह जोहना - खुशामद करना।
भौंह ताकना - रुख या मनोभाव परखना।
आजु बिधाता मति मेरी गई भौन कान बिरमाई-2५३८
मुरली बजाय बिसरावत भौना-2४२१।
(क) नील, सेत अरुपीत, लाल मनि लटकन भाल लुनाई। सनि, गुरुअसुर, देवगुरु मिलि मनु भौम सहित समुदाई --१०-१०८।
( ख ) मुक्ता-बिद्रम-नील-पीत भनि, लटकत लटकन भाल री। मानौ सुक्र भौम-सनि गुरु मिलि, ससि कै बीच रसाल री---१०-१४०।
(क) सिसु होइ भौमासुर तहाँ आयौ काहू जान न पाइ-2३७८।
(ख) सत्यभामा सहित बैठे हरिंगरुड़ पर भौमासुर नगर गए तुरत धाई.-१० उ०-३१।
सूर सुज्ञान सुनावति अबलनि सुनत होत मति भ्रंस-३०४९।
कौन बिरक्त अधिक नारद तैं, निसि दिन भ्रमत फिरै-१-३५।
घूमता-फिरता हुआ, चक्कर काढता।
चक्र सौं भ्रमत चकृत भए देखि सब चहुँधा देखिए नंद ढोटा-2५९१।
तेरो दोष नहीं भ्रमती तू जहीं तहीं नदी डोंगर बन बन पात-पाता.-१५४६।
भ्रम में पड़े हुए व्यक्ति।
तुम सर्वज्ञ, सबै बिधि पूरन, अखिल भुवन निज नाथ तिन्हैं छाँड़ि यह सूर महा सठ, भ्रमत भ्रमनि कैं साथ-१-१०३।
भ्रमरगुफा-हृदय का स्थान-विशेष।
कृष्ण-काव्य का अंश-विशेष जो कृष्ण-सखा उद्धव के योगोपदेश के उत्तर में ब्रज-बालाओं की उन उक्तियों से युक्त है जो ’भ्रमर' को संबोधित करके कही गयी है।
भ्रम या धोखे में पड़ना, भटकना।
भान या धोखे में पड़ गयी है।
भ्रम या धोखे में पड जाते हैं।
जसुदा मदन-गुपाल सोवावै। देखि सयन-गति त्रिभुवन कंपै, ईस बिरंचि भ्रमावै-१०.६५।
सूर नगर-चौरासी भ्रमि-भ्रमि धर-धर कौ जु भयौ-१-६४
जिसे भ्रम या धोखा हो गया हो।
जैसे लुबधति कमल-कोश में भ्रमरा की भ्रमरी-पृ. . ३२९ (८९)।
भ्रमर पंक्ति, भ्रमर समूह।
वायु मंडल जो सदैव घूमता रहता है।
भ्रम में पड़ जाती है, चकित हो जाती है।
जौन जराइ जु जगमगाइ रहे देखत दृष्टि भ्रमाइ-१० उ०-६।
संस्कृत का एक प्रसिद्ध कवि।
बात को आँचल (गाँठ) में बाँधना- सदैव ध्यान रखना। बात उठाना - (१) कड़ी बातें सह लेना। (२) वचन का निर्वाह करना। (३) वचन न मानना। बात उलटना - (१) बात का जवाब देना। (२) कहकर फिर बदल जाना। बात कहते - तुरंत, तत्काल। बात कह न पाना - (१) प्रभुता, महत्ता आदि से इतना अभिभूत होना कि कुछ कह न पाना। उ. - सूर देखि वा प्रभुता उनकी कहि न आवै बात-2७८०। (२) इतना सरल या भोला होना कि बात का जवाब भी न दे पाना। (३) इतना मूर्ख होना कि उत्तर भी न दे पाना। बात करना - (१) किसी के बोलते समय बीच ही में बोल उठना। (२) आरोप या कथन का खंडन करना। बात के टेकी - वचन का निर्वाह करनेवाला। उ. - एतो अलि उनहीं के संगी अपनि बात के टेकी-३२८८। बात कान में पड़ना-सुनना। बात की बात में - तुरंत, तत्काल। बात खाली जाना - कथन का माना न जाना। बात गढ़ना - झूठी बात कहना। बात गढ़त - झूठी बात कहता है। उ. - झूठैं कहत स्याम अंग सुन्दर बात (बातैं) गढ़त बनावत। बात घूँटना या पीना (घूँट या पी जाना) - (१) बात सुनकर भी ध्यान न देना। (२) अनुचित बात सुनकर भी उत्तर न देना। बात चबा जाना - कहते-कहते रुक जाना या दूसरे ढंग से कहने लगना। (मन में) बात जमना (बैठना) - कथन सत्य जान पड़ना। (मन में) बात जमाना (बैठाना) - निश्चय कराना कि कथन सत्य ही है। बात टालना - (१) पूछी हुई बात का उत्तर न देकर और बातें करने लगना। (२) कही हुई बात के अनुसार कार्य न करना। बात टूटना - पूरा वाक्य न बोल पाना। उ. - सीत-बात कफ कंठ बिरोधै, रसना टूटै बात १- ३१३। बात दुहराना - बात का उलटकर जवाब देना। बात न पूछना - बहुत तुच्छ समझकर बात तक न करना। बात न करना - घमंड के मारे न बोलना। बात नीचे डालना - (१) अपनी बात का खंडन होने देना। (२) दूसरे की बात का खंडन करना। बात पकड़ना - (१) बात या कथन में दोष निकालकर कायल करना। (२) तर्क-कुतर्क करना। (किसी की बात पर जाना (१) कथन का बुरा-भला मानना। (२) कथन के अनुसार चलना। बात पलटना ( बदलना।) - एक बात कहकर फिर कुछ और कहना। बात पूछना - (१) सुख सुविधा का ध्यान रखना। (२) आदर-सत्कार करना। बात पुछातौ - ध्यान नहीं देता, परवाह नहीं करता। उ. - जग में जीवित हो को नातौ। मन बिछरैं तन छार होइगौ, कोउ न बात पुछातौ-१- ३०२। न पूछ बात - जरा भी ध्यान नहीं देता। उ. - मीन बियोग न सहि सकै, नीर न पूछै बात-१- ३२५। बात फूटना - बोलना, कहना। बात फेंकना - ताना मारना। बात फेरना - कही हुई बात को पूरा न करके कुछ और तात्पर्य समझना। बात बढ़ना - वाद-विवाद हो जाना। बात बढ़ाना - वाद-विवाद करना। बड़ी बात - अनुचित या अनुपयुक्त कथन। उ. - छोटै मुँह बड़ी बात कहत, अबहीं मरि जैहै-५८९। बात बनाना - (१) झूठी - सच्ची बातें गढ़ना, हीला-हवाला करना। (२) व्यर्थ की बातें बकना। (३) चापलूसी या खुशामद करना। (४) डींग हाँकना। बात बनावन कौं है नीकौ खूब झूठी-सच्ची बातें गढ़ता है, झूठ बोलने में बहुत कुशल है। उ. - बात बनावन कौं है नीकौ, बचन-रचन समुझावै-१-१८६। बात बनाइ - झूठ बोलकर। उ. - कोई कहै बात बनाई पचासक उनकी बात जो एक-३३६४। बात बनाई - झूठ बोली। उ. - सूर स्याम मन हर्यौ तुम्हारौ हम जानी इह बात बनाई-११८६। बहुत बनावत बात - खूब झूठ-सच बोलते हो। उ. - तुम जो राजनीति सब जानत बहुत बनावत बात। बात बात में - (१) प्रत्येक कथन में। (२) हर बार। बात मारना - ताना मारना। बात में बात निकालना - व्यर्थ के दोष दिखाना। (किसी की) बात रखना - (१) कहा मान लेना। (२) इच्छा पूरी कर देना। (अपनी) बात रखना - (१) जैसा कहा हो, वैसा ही करना। (२) हठ पकड़ना। बात लगना - किसी की बात का बुरा मानना। बात लगाना - (१) निंदा करना। (२) अनुचित बात का बुरा मानकर चिंतित या दुखी रहना। बात (बातें) छाँटना (बघारना) - (१) बहुत बोलना। (२) बहुत बढ़-चढ़कर बोलना। (३) डींग हाँकना। बात (बातें, मिलाना - 'हाँ' में ‘हाँ' मिलाना, समर्थन करना, चाटुकारी करना। सीधे बात न कहना - गर्व या अभिमान का व्यवहार करना। सूधैं कहत न बात - गर्व या अभियान के कारण सज्जनता से बोलता भी नहीं। उ. - हौं बड़ हौं बड़ बहुत कहावत सूधैं कहत न बात-2- २२। बात (बातें) सुनना अनुचित कथन भी सहन करना। बातें सुनाना - भला-बुरा कहना। बात में आना - दूसरे के कथन पर विश्वास कर लेना। बात (बातों) की झड़ी बाँधना - बराबर बोलते जाना। बात (बातों) का धनी जो केवल बातें बनाने में ही कुशल हो, करे-धरे कुछ नहीं। बात (बातों) पर जाना - (१) बात पर ध्यान देना। (२) कहने के अनुसार चलना बात (बातों) में उड़ाना - (१) हँसी में ही टाल देना। (२) बहानेबाजी करना। बात (बातों) में फुसलाना (बहलाना, समझाना) - खाली बातों से ही संतुष्ट कर देना। बात (बातों) में लगाना - दूसरी ओर से ध्यान हटाने के लिए रुचिकर प्रसंग छेड़कर बातें करने लगना।
चर्चा, प्रसंग, बिषय, जिक्र।
बात आना (उठना, चलना छिड़ना) - चर्चा चलाना।
बात उठाना (चलाना, छोड़ना) - चर्चा चलना।
बात उठावति - चर्चा चलाती है।
उ. - अब समझी मैं बात सबनि की झूठे ही यह बात उठावति-१२५०।
बात चलावत - चर्चा करते हैं।
उ. - फिरि फिरि नृपति चलावत बात। कहौ सुमंत कहाँ तैं पलटे प्रान जिवन कैसे बन जात-९- ३८।
(किसी की) बात चलाना - (किसी का) दृष्टांत या उदाहरण देना।
बात चालना - चर्चा चलाना।
बातैं चाली - चर्चा छेड़ी।
उ. - ऊधौ, कत ये बातैं चालीं। कछु मीठी कछु मधुरी हरि की, ते उर-अंतर साली-३८२३।
बात पड़ना - प्रसंग छिड़ जाना। बात फेरना चालू विषय को किसी कारण से समाप्त करके नया प्रसंग छेड़ना।
बात मुँह पर लाना - चर्चा या प्रसंग छेड़ बैठना।
प्रसिद्ध या प्रचलित प्रसंग, किवदंती, प्रवाद।
बात उड़ना - किसी बात का प्रसिद्ध हो जाना।
बात उड़ी है - चर्चा फैल गयी है।
उ. - झूठी ही यह बात उड़ी है, राधा कान्ह कहत नर-नारी।
(किसी पर) बात आना - किसी को दोष या कलंक लगना। बात फैलना (बहना) किसी विषय का प्रसिद्ध हो जाना।
बात बहानी - चारों ओर चर्चा फैल दी है।
उ. - जो हम सुनति रहीं सो नाहीं। ऐसी ही यह बात बहानी।
बात फैलाना (बहाना) - किसी विषय को सब पर प्रकट कर देना।
(किसी पर) बात रखना (लगाना, लाना) - किसी पर दोष या कलंक लागाना।
बात का बतंगड़ करना - (१) छोटी सी बात को खूब बढ़ा-चढ़ाकर कहना।
(२) छोटी सी घटना को व्यर्थ ही बहुत पेचीदा बना देना।
बात ठहरना - मामला तय हो जाना।
बात पर धूल डालना - किसी घटना या झगड़े को भुलाने का यत्न करना।
बात बढ़ना - जरा सी घटना या प्रसंग का झगड़े का रूप लेना।
बात बढ़ाना - मामूली बात पर झगड़ा कर बैठना।
बात बनना (सँवरना) (१) काम सिद्ध होना।
(२) संयोग या घटना का अनुकूल होना।
बात बनाना (सँवारना) - (१) का सिद्ध करना।
(२) संयोग या परिस्थिति को अनुकूल करना।
बात-बात पर (में) - हर काम में।
बात बिगड़ना - काम चौपट ही जाना, असफलता मिलना।
बात बिगाड़ना - काम चौपट करना, असफल करना।
स्थिति, दशा, प्राप्त संयोग।
वार्तालाप, संलाप, कथोपकथन।
संबंध आदि निश्चित करने का वार्तालाप।
बात ठहरना - संबंध का निश्चित होना।
बात लगाना - संबंध का प्रस्ताव करना।
बात लाना - विवाह का प्रस्ताव लाना।
भौंरा भोगी बन भ्रमै (रे) मोद न मानै ताप। सब कुसुमनि मिलि रस करै, (पै) कमल बँधावै आप-१-३२५।
(क) जिहिं-जिहिं जोनि भ्रम्यौ संकट-बस, सोइ सोइ दुखनि भरी-१-७१।
(ख) भूल्यौ भ्रम्यौ तृषातुर मृग लौ, काहूँ स्रम न गँवायौ-१-२०१।
अनुचित या भ्रष्ट आचार-विचार।
ईमानदारी से काम न करने का व्यवहार।
भ्रम या धोखे में पड़ा हुआ।
मनि कुंडल मकराकृत तरुन तिलक भ्राजै-१४६५।
(क) बृषभासुर-बत्सासुर मारयौ, बल-मोहन दोउ भ्रात-५०८।
(ख) मुकुट कुंडल पीत पट छबि अनुज भ्राता स्याम-2५६५।
भवन सँवारि, नारि रस लोभ्यौ, सुत, बाहन, जन, भ्रात्र-१-२१६।
एक दैत्य जिसे श्रीकृष्ण ने मारा था।
भ्रम अरु केसी इहाँ पछारयौ-३४०९।
(क) लटकन लटकत ललित भाल पर, काजर-बिंदु भ्रुव-ऊपर री-१०-९८।
(ख) अंजन दोउ दृग भरि दीन्हौ। भ्रुव चारु चखौड़ा कीन्हौ-१०-१८३।
चूमति कर पग अधर-भ्रू लटकति लट चूमति-१०-७४।
काल डरत भ्रू-भंग की आँची-१-१८।
दुलहिनि बृषभानु-सुता अंग अंग भ्राज-पृ.३४९(६०)।
हाथ पहुँची बीर कानन जटित मुँदरी भ्राजई। ...। अँग अंग भूषन सुरस ससि पूरनकला मानों भ्राजई-१० उ०-2४।
(क) लटकन सीस, कंठ मनि भ्राजत, मनमथ कोटि बारनैं गै री-१०-५५
(ख) डगमगात गिरि परत पानि परु, भुज भ्राजत नँदलाल.-१०-११४।
(ग) राजभूषन अंग भ्राजत अहीर कहत लजात-2६७२।
देवनागरी वर्णमाला का पचीसवाँ व्यंजन जो होंठ और नासिका से उच्चरित होता है।
सिर के बालों के बीच की माँग।
(क) गोरे भाल लाल सेंदुर छबि मुक्ताबर सिर सुभग मंग को-१०४२।
(ख) इन बिरहिनि मैं कहूँ तू देखी सुमन गुहाए मंग-३२२३।
सकुचत फिरत जो बदन छिपाए, भोजन कहा मँगइए.-१-२३९।
धेनु जे संकल्प राखीं लईं ते गनाइ कै....... मागध मंगन जन लेत मन भाइ कै--२६२८।
कुछ समय के लिए माँग कर लेले का भाव।
कुछ समय के लिए माँग कर ली गयी वस्तु।
विवाह-पूर्व की एक रीति जिसमें सम्बन्ध पक्का किया जाता है।
नवसत साज सिंगार नागरि मारगमय भूषन मंगनो.-2२८०।
इस ग्रह के नाम पर पड़ा 'बार'।
शुभ या पूजन-संबंधी कार्य।
धूप दीप नैवेद्य साजि कै मंगल करे बिचारी-2५८७।
मंगल अवसर पर रखा जानेवाला पानी भरा घड़ा।
शुभ दिवस पर अथवा प्रसन्नता के अवसर पर गाया जानेवाला गीत।
गुन गावत मंगलगीत मिलि दस-पाँच अली-१०-२४।
मंगल अवसर पर रखा जाने वाला जल का घड़ा।
शुभ दिवस पर अथवा प्रसन्नता के अवसर पर किये जानेवाले नृत्य, गीत आदि हर्ष-सूचक कृत्य।
(क) ह्य-गय-रतन हेम-पाटंबर आनँद मंगलचारा-१०-४।
(ख) कमलनयन मधुपुरी सिधारे मिटि गयौ मंगलचार-2६८७।
(ग) कनक कलस प्रति पौर बिराजत मंगलचार बधाई-सारा. ३९५।
पद्य जो शुभ कार्यारम्भ के पूर्व मंगल कामना से पढ़ा जाता है।
अशुभ या अप्रिय बात को शुभ या प्रिय रूप में कहने का ढंग।
सोमवार और बुधवार के बीच का वार, भौमवार।
तागा जो देव-प्रसाद-रूप में गले में या कलाई पर बाँधा जाता है।
श्लोक या छन्द जो मंगल की कामना से किसी कार्य के आरम्भ में पढ़ा जाता या ग्रंथ के आदि में लिखा जाता है।
जिसकी जन्म लग्न के अनुसार चौथे, आठवे या बारहवें स्थान में मंगल बैठा हो।
माँगने में दूसरे को प्रवृत्त करना।
दूसरे को खरीद कर लाने के लिए प्रवृत्त करना।
सिर के बालों के बीच की माँग।
स्याम अलक बिच मोती दुति मंगा-१७६२।
बुलवा ली, मँगवा ली, लौटवा ली।
(क) मैं खेई हो पार कौं तुम उलटि मँगाई.-९-४२।
(ख) घसि चदन चारु मँगाइ बिप्रनि तिलक करे-१०-२४।
(ग) पँचरँग सारी मँगाइ बधूजननि पैहराइ-१०-९५।
बुलवाया है, बुलवा भेजा है।
हम तुमको सुख-काज मँगाए-१००५।
माँगने के लिए दूसरे को प्रवृत्त करना।
दूसरे को कुछ खरीद कर लाने के लिए प्रवृत्त करना।
पँचरँग सारी बहुत मँगाय-2४१०।
बैठि एकांत मंत्र दृढ़ कान्हा राम-कृष्न दोउ बंधु मँगायौ-2४७७।
लाने को प्रवृत्त करता है।
फूले फिरत नंद अति मुख भयौ, हरषि मँगावत फूल-तमोल-१०-९४।
लाने को प्रवृत्त करती है।
बार-बार रोहिनि कौं कहि कहि पलिका अजिर मँगावति है-१०-७३।
कह्यो पकरि मँगावन-पकड़ मँगवाने को कहा है.
बल मोहन को नाम धरयौ, कह्यौ पकरि मगावन-५८९।
कहा बिदुर की जाति-बरन है, आइ साग लियौ मँगो-१-२१।
जिसके साथ मँगनी होकर विवाह-संबंध पक्का हुआ हो।
धन्य दान धनि कान्ह मँगैया धन्य सूर तृन द्रुम बन डारि-११८१।
चंचलअधर चरन-कर चंचल मंचल अंचल गहत बकोटनि-१०-१८७।
घर के बाढ़-घर ही में लंबी-चौड़ी हाँकने वाले।
उ. - (क) घर के बाढ़े रावरे बातैं कहत बनाइ-११२९।
(ख) अब जाने घर के बाढ़े हौ तुम ऐसे कहा रहे मुरझाई - २२६१।
बढ़े, वृद्धि को प्राप्त हो।
जाके पूजे बाढ़ै गोधन-१०१५।
बढ़ा, वृद्धि को प्राप्त हुआ।
गावत गुन सूरदास, बाढ़यौ जस भुव-अकास, नाचत त्रैलोक-नाथ माखन के काजै-१०-१४६।
राजा बलि का पुत्र जिसकी पुत्री अनिरुद्ध को ब्याही थी।
जो मान लिया गया हो, स्वीकृत।
खाइ जाइ मंजार काज एको नहिं आवै-११४१।
बिल्ली जिसका रास्ता काट जाना अशकुन समझा जाता है।
आइ अजिर निकसो नँदरानी बहुरी दोष मिटाइ। मंजारी आगै ह्वै आई पुनि फिरि आँगन आइ-५४०।
यात्रा में ठहरने का स्थान, पड़ाव।
मकान, मन्दिर आदि का खण्ड।
एक लता जिसकी जड़ और डंठल से लाल रंग बनता है।
मानहुँ मीन मँजीठ प्रेम रँग तैसेही गहि जैहै – २०३३।
ढिग जरित भरि मंजीर इत-उत चरन पंकज रंग-2२८९।
काँसे की छोटी कटोरियों की जोड़ी जिससे (संगीत में) ताल दी जाती है।
बाजत हुड़क मँजीरा नूपुर नाना भाँति नचायौ-सारा० ४०७।
मंजु मेचक मृदुल तनु अनुहरत भूषन भरनि १०-१०९।
मंजुल तारनि की चपलाई चित चतुराइ करसै री-१०-१३७।
दाँत साफ करने का कोई चूर्ण।
आम, तुलसी जैसे वृक्षों में फूलों या फलों के स्थान में एक सींक में लगनेवाले दाने।
पुहुप मंजरी मुक्तन माला अँग अनुराग धरे-६८९।
माँजने या मँजाने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
मँझार, मँझारि, मँझारी, मँझारे
(क) सभा मँझार दुष्ट दुस्सासन द्रौपदि आनि धरी-१-१६।
(ख) इंद्र एक दिन सभा मँझारि। बैठ्यौ हुतौ सिंहासन डारि-६-५।
(ग) सब जादव सौं कह्यौ बैठिकै सभा मँझारी-१० उ०-१०५।
(घ) इक दिन बैठे सभा मँझारे-४-५।
तुम्हरैं भजन सबहिं सिंगार। जो कोउ प्रीति करै पद-अंबुज, उर मंडत निरमोलक हार-१-४१।
प्रमाण आदि देकर किसी कथन की पुष्टि करना।
प्रमाण आदि देकर सिद्ध करना।
ऊपर से छाया और चारों ओर से खुला स्थान।
उत्सव, आयोजन आदि के लिए बनाया गया सुसज्जित स्थान।
(क) नव फूलन के मंडप छाए-१७०३।
(ख) लग्न लै जु बरात साजी उनत मंडप छाइ-१० उ०१३।
मंडल बाँधकर या चारों ओर छाकर घेर लेना।
मंडल बाँध कर या चक्कर काट कर उड़ता है।
हंस को मैं अंस राख्यौ काग कत मँडराइ-१० उ०-१३।
मंडल या घेरा बाँधकर उड़ने की क्रिया या भाव।
मंडल बाँध कर या चक्कर काटकर उड़ना।
चारों ओर घूमना, परिक्रमा करना।
आस-पास घूमती या चक्कर काटती रहती है।
देखहु जाइ और काहू को हरियर सबै रहत मँडरानी-१०५७।
झाँझ ताल सुर मँडरे रँग हो हो होरी-2४१०।
मंडल बाँधना - (१) गोलाई में चक्कर काटना।
(२) चारों ओर छा जाना या घेरना।
बादलों आदि के कारण चंद्रमा या सूर्य के चारों ओर दिखायी देने वाला घेरा।
किसी वस्तु या अंग का गोल भाग।
चलित कुंडल गंडमंडल-१-३०७।
मथुरा मंडल भरत खंड निज धाम हमारो-१८६१।
यज्ञादि के विधान-सूचक वैदिक वाक्य।
ग्वाल मंडली में बैठे मोहन-४६७।
पुहुप मंडली तापर छायो-१००१।
विभूषित, अलंकृत, सजे हुए।
(क) ज्यौं माखी मृग-मद मंडित तन परिहरि पूय परै-१-१९८३
(ख) मुख मंडित रोरी रंग-१०-२४।
(ग) गो-रज मंडित केस-४७८।
वे शब्द या वाक्य जिनका जाप विभिन्न देवताओं को संतुष्ट करने अथवा विभिन्न कामनाओं की पूर्ति के लिए किया जाता है।
(क) माया मंत्र पढ़त मन निसि दिनि-१-४९।
(ख) धन्य ऐसौ गुरू कान के लागत ही मंत्र दै आजु ही वह लखायौ-१२६८।
मंत्र-जंत्र (यंत्र)-जादू-टोना।
साधन मंत्र-जंत्र उद्यम बल ये सब डारौ धोइ-१-२६२।
(क) थकित भए कछ मंत्र न फुरई, कीन्हें मोह अचेत-१-२९।
(ख) जातै रहै छत्रपन मेरौ, सोइ मंत्र कछु कीजै-१-२६९।
(ग) मंत्रिनि नीकौ मंत्र बिचारचौ-९-९८।
जल जो मंत्र के प्रभाव से युक्तहो।
मंत्र पढ़ कर पवित्र किया हुआ।
जो मंत्र के प्रभाव से संस्कृत हो।
बात में आना - छल-कपट का व्यवहार न समझकर धोखा खा जाना।
झूठ या बनावटी बचत, बहाना।
बचन, निश्चय, प्रतिज्ञा, वादा।
बात का धनी (पक्का, पूरा) - दृढ़निश्चयी, ढ्रुढ़प्रतिज्ञ।
बात का कच्चा (हेठा) - बात का निर्वाह न करनेवाला।
बात पक्की करना - परस्पर दृढ़ निश्चय करना।
बात पक्की होना - दृढ़ निश्चय होना।
(अपनी) बात रखना - अपना निश्चय या वचन पूरा करना।
बात हारना - वचन देना, प्रण करना।
वचन का विश्वास या उसकी प्रतीति।
बात जाना - विश्वास न रह जाना।
बात खोना - विश्वास खोना।
बात बनी रहना - विश्वास बना रहना।
बात हेठी होना - विश्वास न रह जाना।
बात खोना - मान-र्मयादा नष्ट कर देना।
बात जाना - मान-मर्यादा नष्ट हो जाना।
बात बनना - मान-र्मयादा बनी रहना।
बात बना लेना - मान-मर्यादा प्रतिष्ठित कर लेना।
बात बिगड़ना - मान-मर्यादा न रह जाना।
बात बिगाड़ना - मान-मर्यादा नष्ट कर देना।
बात रखना (रख लेना) - मान-मर्यादा की रक्षा कर लेना।
बात रहना ( रह जाना) - मान-मर्यादा बनी रह जाना।
गुण, योग्यता, स्थिति संबंधी कथन।
बात खुलना (फूटना) - भेद ज्ञात होना।
राजकाज में परामर्श देनेवाला, सचिव
(क) मंत्री ज्ञान न औसर पावै कहत बात सकुचातौ-१-४०।
(ख) मंत्री काम-क्रोध निज दोऊ अपनी अपनी रीति-१-१४१।
(ग) पोच पिसुन लस दसन सभासद प्रभु अनंग मंत्री बिन भीति-2२२३।
झाड़फूँक या तंत्र-मंत्र जानने वाला।
लीन होकर या अवगाहन करके तत्वों की खोज करना।
कैकेयी की दासी जिसके कहने से उसने राम को वन भिजवाया था।
डुलत नहिं द्रुम-पत्र बेली थकित मंद समीर-६५८।
अहं ममता हमैं सदा लागी रहै, मोह मद-क्रोध जुत मंद कामी.-८-१६।
(क) अरुन अधर छबि दसन बिराजत जब गावत कल मंदन-१८४१।
(क) बसत सुरसरी तीर मंदमति कूप खनावै-2-९।
(ख) मलिन मंदमति डोलत घर घर उदर भरन कै हेत-2-१५।
एक पर्वत जिससे समुद्र मथा गया था।
(क) मथि समुद्र सुर-असुरन कै हित मंदर जलधि धसाऊ-१०-२२१।
( ख ) मंदर डरत सिंधु पुनि काँपत फिरि जनि मथन करै-१०-१४२।
मंदर पर्वत जिससे समुद्र मथा गया था।
बासुकी नेति अरु मंदराचल रई.-८-८।
नंद-नारि-आनन छुवै मंदहि-१०-१०७।
(क) तब पूछ्यौ , कुरपति है कहाँ ? कह्यौ, पांडु-सुत-मंदिर जहाँ-१-२८४।
(ख) सुंदर नंद महर कै मंदिर-१०-३२।
मुक्ति आनि मंदे मो मेली-३१४४।
मंदो परयो सिधाउ अनत लै यहि निर्गुन मत तेरौ-३१४३।
रावण की पटरानी जो मय दानव की पुत्री थी।
गंगा की वह धार जो स्वर्ग में मानी गयी है।
चित्रकूट के पास की वह नदी जो ‘पयस्विनी' कहलाती है।
संगीत में स्वर का एक भेद।
मगर या घड़ियाल नामक जलजंतु जो कामदेव की ध्वजा का चिन्ह और गंगा का वाहन है।
सुधा-सर जनु मकर क्रीड़त-६२७।
भाग्य भवन मैं मकर महीसुत बहु ऐश्वर्य बढ़ैहै-१०-८।
मनहुँ खेलत हैं परस्पर मकरध्वज द्वै म न-३५३।
वह समय जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है।
मोर मुकुट मकराकृत कुंडल-५०७।
बाबा नंद जसोदा मइया मिले सबन हित आइ-३४४४।
एक प्रत्यय जो तद्रूप, विकार प्राचुर्य आदि के अर्थ में शब्दांत में जुड़ता है।
(क) पद-नख-चंद चकोर बिमुख मन खात अँगार मयी-१-२९९।
(ख) उठि न गई हरि संग तबहिं तें ह्वै न गई सखि स्याममई-2५३७।
(ग) पाती लिखत बिरह तनु ब्याकुल कागर ह्वै गयौ नीर मई-३४१७।
मुकुट या मौर जो दूल्हे के सिर पर पहनाया जाता है।
एक प्रसिद्ध कीड़ा जो जाला तान कर दूसरे कीड़े फँसाती और उन्हें खाकर जीवित रहती है।
इमारत जिसमें किसी की कब हो, रौजा, मजार।
(क)-कृष्न पद मकरंद पावन और नहिं सरबरन-१- ० ३०८।
(ख) इच्छा सौं मकरंद लेत मनु अलि गोलक के वेष री-१०-१३६।
कलेजे पर मक्खन मला जाना - बहुत सुख - संतोष होना।
जीती मक्खी निगलना - जानूबझ कर अनुचित कार्य या पाप करना।
नाक पर मक्खी न बैठने देना - अभिमान के कारण किसी को अपने ऊपर एहसान करने का अवसर न देना।
मक्खी की तरह निकाल ( फेंक ) देना - ऐसा अलग करना कि किसी प्रकार का संबंध न रखना।
मक्खी छोड़ हाथी निगलना - छोटी भूल से बचकर घोर पाप करना।
मक्खी मारना - खाली या निठल्ला रहना।
बातैं न पूछना - खोज - खबर न लेना।
न पूछी बातैं - खोज-खबर तक न ली।
उ. - ज्यों मधुकर अंबुज रस चाख्यो बहुरि न पूछी बातैं आइ-३०५३।
बातैं बनाना - झूठी-सच्ची बातें करना।
कहा बनावत बातैं - क्यों झूठी-सच्ची बातें करते हो।
उ. - फिरि-फिरि कहा बनावत बातैं-३१२१।
बातैं मिलाना - प्रसन्न करने के लिए सुहाती बातें करना।
बातैं मिलवति जोरि - प्रसन्न करने के लिए सुहाती बातें गढ़गढ़ कर कहता है।
उ. - मैं जानति उनके ढँग नीके बातैं मिलवति जोरि-८६७।
बात चलाना - नया प्रसंग या विषय छेड़ना, चर्चा चलाना।
बातैं चालीं - चर्चा छेड़ी।
उ. - ऊधौ, कत ये बात चालीं। कछु मीठी कछु करुई हरि की अन्तर में सब साली-३८२३।
कहत अलि तेरे मुख बातौ-३३१९।
कहा एतौ बाद ठानै देखि गोपी भोग-३१२६।
हुज्जत, विवाद, तर्क-कुतर्क।
बाद करति अबही रोवहुगी बार-बार कहि दई दई-१०४७।
मिथ्या बाद-बिवाद छाँड़ि दै, काम-क्रोध-मद-लोभहि परिहरि-१-३१२।
चने और गेहूँ अथवा मटर के आटे की रोटी।
मीठे तेल चना की भाजी। एक भकनी दै मोहिं साजी।
झाँकति झपति झरोखा बैठो कर मोड़त ज्यौं मखियाँ-2७६६।
(क) भूल्यौ फिरत सकल जल-थल-मग-१-४८।
(ख) नैननि मग निरखि बदन सोभा रस पीजै-2७९९।
मग जोहना - प्रतीक्षा करना।
मग जोवत - आसरा देखता है, प्रतीक्षा करता है।
उ. - (क) परस्यौ थाल धरयो, मग जोवत-१०- २२३।
(ख) अवधि गनत इकटक मग जोवत तब ए इत्यो नहिं झूखी-३०२९।
(ग) कबहुँ कहत ब्रजनाथ बन गए जोवत मग भई दृष्टि झाँवरी-३४४८।
वह 'गण' जिसमें तीन गुरु होते हैं।
(क) आनँद मगन राम गुन गावै-१-३९।
(ख) सुत कुबेर के मत्त मगन भए विषै रस नैननि छाए-१-७
(क) जैसे मगन नाद-रस सारँग बधत बधिक बिन बान-१-१६९।
(ख) मम सरूप जो सब घट जान। मगन रहै तजि उद्यम आन-३-१३।
काहि उठाइ गोद करि लीजौ करि करि मन मगना-2५४७।
अगर-मगर करना-टाल-टूट करना।
जैसे फिरत रंध्र मगु कँगुरी तैसे मैंहु फिराऊँ.-पृ. ३११ (११)।
भव अगाध जल मग्न महा सठ तजि पद कल रह्यौ-१-२०१।
मानौ नव धन ऊपर राजत मधवा धनुष चढ़ाई-१०-१०८।
फिरि आए हस्तिनपुर पारथ मघवाप्रस्थ बसायो।
मच-मच’ शब्द करके दबना, झटके से हिलना।
किसी चीज को इस तरह दबाना कि ’मच-मच' शब्द हो।
झटके से या झोंका देकर हिलाते या झूले के पेंग भरते हैं।
(क) कबहुँ रहँसत मचत लै सँग एक एक सहेलि-2२७८।
(ख) यह सुनि हँसत मचत अति गिरिधर डरत देखि अति नारि-2२८२।
झोंका या झटका देकर हिलाती या झूले के पेंग भरती है।
कोउ संग मचति कहत कोउ मचिहौं उपजी रूप अगाध २२८२।
शोर-गुल के साथ काम शुरू होना।
मच-मच' शब्द करके या झोंके से हिलना।
दबना या दबाना जिससे मच-मच' शब्द हो।
जिद्दी, हठीला, अड़ पर डटा रहने वाला।
मचला अकलैमूल पातर खाउँ खाउँ कर भूखा-१-१८६।
मचलने की क्रिया-या भाव, मचल।
किसी को मचलने के लिए प्रवत्त करना।
मचलि जाइगी-जिद करने लगेगी, हठ पकड़ लेगी।
अबहिं मचलि जाइगी तब पुनि कैसे मोसौं जाति बुझाई-१२५७।
नाचत बृद्ध तरुन अरु बालक गोरस कीच मचाई.-१०-२१।
बालक सब नंदहि सँग धाए ब्रज-घर जहँ तहँ सोर मचाई-५४४।
शिकार खेलने के लिए पेड़ पर बनाया गया ऊँचा स्थान।
[सं. मंच+ हिं. आन, हिं.मचान]
[सं. मंच+ हिं. आन, हिं.मचान]
शोर-गुल के साथ काम शुरू करना।
(शोर-गुल) फैला दिया, (हुल्लड़) किया।
ब्रज बीथिनि पुर गलिनि घरै घर घाट-बाट सब सोर मचायौ-१०-३४०।
फिरत जहाँ तहाँ दुंद मचावत ३७७।
कोउ संग मचति कहति कोउ मचिहौं उपजौ रूप अगाध.-2२८२।
कुमकुम कीच मची धरनी पर-2४१०।
अब जिनि मचौ पाँय लागति हौं मोकौं देहु उतारि-2२८२।
मच्छ-बास ताकी सब हरी-१-१२९।
विष्णु का पहला अवतार जिसमें शरीर का निचला भाग रोहू मछली जैसा और ऊपरी मनुष्य का था।
मच्छ कच्छ बाराह बहुरि नरसिंह रूप धरि-2-३६।
शांतनु की पत्नी सत्यवती जो व्यास जी की माता थी।
सत्यवती मच्छोदरि नारी। गंगा-तट ठाढ़ी सुकुमारी-१-२२९।
ब्रज घर-घर सुख सिंधु मच्यौ री-६०६।
कह्यौ, मछ बचन किहिं भाँति भाष्यौ-८-१६।
(गाड़ी आदि) खींचकर ले चलना।
(हाथ या वार) उठना या चलना।
(क) वै कहियत उडुराज अमृत मैं तजि स्वभाव मोंहि बहनि बहत-2८५८।
(ख) तुम कहियत उडुराज अमृतमय तजि सुभाउ बर्षत कह बहनी-१० उ०-९३।
बोझा ढोने या छोटामोटा काम करने वाले।
काम के पारिश्रमिक स्वरूप मिलने वाला धन।
लैला' का प्रसिद्ध प्रेमी।
मजा चखाना - अपराध या अनुचित व्यवहार का दण्ड देना।
( किसी चीज का ) मजा पड़ना - चसका लगना।
मजा उड़ाना (लूटना) - सुख भोगना। मजा किरकिरा होना - सुख में बाधा पड़ना।
मजा आ जाना - हँसी - दिल्लगी का प्रसंग उपस्थित होना। मजा देखना ( लेना) - तमाशा देखना।
मजाक उड़ाना - उपहास करना।
मानत नहीं लोक मर्यादा हरि के रंग मजा-११७३।
एक लता जिसके डंठलों से लाल रंग तैयार होता है।
सीचिय मजीठ जैसी निकट काटी पाई.-३२०९।
करि कुंभ कुंजर बिटप भारी चमर चारु मजीर।
काँसे की ठोस कटोरियों की जोड़ी जिसको बजाकर संगीत में ताल दी जाती है।
जिसमें मजा या आनन्द मिलता हो।
हड्डी या नली के भीतर का भेजा या गूदा।
डूबता हुआ, जो डूबने की स्थिति में हो।
अब मोहिं मज्जत क्यों न उबारो-१-२०९।
काम की अपूर्णता की स्थिति।
मझधार में छोड़ना - ( १) अधूरे काम को छोड़ना।
(२) बीच में ही छोड़ देना।
[सं. मध्य, प्रा. मज्झ+ ला]
बीच या मँझधार में घँसाना।
मझार, मझारि, मझारी, मझारे
[सं. मध्य, प्रा.मज्झ + हिं. आर, हिं. मशार]
[सं. मध्य, प्रा. मज्झ + इयारा]
मुकुट लटकि अरु भृकुटी मटक देखौ कुंडल की चटक सौं अटकि परी दुगनि लपट-८३९।
लटकि निर्खन लग्यौ मटक सब भूलि गयौ हटक ह्वैकै गयौ गटकि सिला सो रह्यौं मीचु जाती-2६०९।
अंग लचकाते या मटकाते (ही )।
मटकत गिरी गागरी सिर तें-८६६
मुकुट लटकनि भृकुटि मटकन धरे नटवर अंग-१७४२।
अंग लचकाकर नखरे के साथ चलना।
नेत्र, भृकुटी आदि अंगों को ऐसे चलाना जिससे लचक या नखरा जान पड़े।
(क) मोर पंख सिर-मुकुट की मुख-मटकनि की बलि जाउँ-४५१।
(ख) रसिक रंग भौंहनि की मटकनि-५१८।
नेत्र, भृकुटि आदि अंगों का नखरे के साथ संचालन करना।
नखरे के साथ अंग चमकाती है।
चमकति चलै बदन मटकावै ऐसी जोबन जोरी-१६२१।
गहि पटकि पुहुमि पर नेक नहिं मटकियो दंत मनु मृनाल से ऐंचि लीन्हे-2५९६।
[हिं. मट्ठर=मंद+फा. गश्त]
[हिं. मट्ठर=मंद+फा. गश्त]
पिस्ता दाख बदाम छुहारा खुरमा खाझा गूँझा मटरी-८१०।
मटिआना, मटिश्रानो, मटियाना, मटियानो
मिट्टी से माँजना या मलना।
मटिआना, मटिश्रानो, मटियाना, मटियानो
उतर न देत मोहिनी मौन ह्वै रही री सुनि सब बात नैकहूँ न मटकी।
भुकुटी, नेत्र, हाथ आदि अंग चमका कर या चमकाने लगी।
( क ) मुख मुख हेरि तरुनि मुसकानी नैन सैन दै दै सब मटकी-११०५।
(ख) बात करत तुलमी मुख मैले सयन दै मुँह मटकी-१३०१।
नैना बहुत भाँति हटके। बुधि बल छल उपाइ करि थाकी नेक नहीं मटके-पृ.३३६ (५२)।
मटकने या नखरे दिखाने (से)।
सूरदास सोभा क्यौ पावै पिय बिहीन धनि मटकैं-१-२९२।
स्याम सलोने रूप में अरी मन अरयौ। ऐसे ह्वै लटक्यौ तहाँ ते फिरि नहिं मटक्यौ बहुत जतन मैं करयो-१४८९।
पटक्यौ भूमि फेरि नहिं मटक्यौ लीन्हें दंत उपारी-2५९४।
सौ बातनि की एक बात - सारे वाद-विवाद या वार्तालाप का सारांश या तात्पर्य केवल इतना ही है।
उ. - (क) सौ बातनि की एकै बात। सूर सुमिरि हरि-हरि दिन रात-2- ५।
(ख) सौ बातनि की एक बात। सब तजि भजौ जानकीनाथ-७- २।
बातनि हीं - बातों-बातों में, अनायास।
उ. - . अजामील बातनि हीं तार्यौ हुतौ जु मोतैं आधौ-१-१३९।
धाए गजराज-काज, केतिक यह बाता-१-१२३।
धृग तव जन्म जियन धृग तेरौ, कही। कपट मुख बाता-९-४९।
कपड़े या रुई की बटी हुई सलाई के आकार की बत्ती जो दीपक में जलाने के काम आती है, बत्ती।
हरि जू की आरती बनी।….। मही सराव, सप्त सागर घृत, बाती सैल घनी-2.२८।
(क) आरि करत मटुकी गहि मोहन बासुकि संभु डरै-१०-१४२।
(ख) कोरी मटुकी दहयौ जमायौ-३४६।
किसी उत्सव के लिए बनाया गया स्थान, मंडप।
मंच।
(१) किसी उत्सव के लिए बनाया गया स्थान, मंडप।
चौपरि जगन मई जुप बीने-१-६०।
इहाँ हुती मेरा तनिक मड़ैया का नृप आनि छरयौ-१० उ.-६८।
बाजे के मुँह पर चमड़ा लगाना।
मढ़ आना - (बादल का) घिर आना।
सब दल होहु हुपिया-चलहु मठ घेरहिं जाई.-१० उ०-८।
(क) जेहरि पगज करयौ गाढ़े मनो मंद मंद गति यह मतंग की-१०४१।
(ख) बारन छाँडि देत किन हमको तू जानन मतंग मतवारो-2५९०।
सबै समर्पो सूरदास कौं यह साँचौ मत मेरौ-१-२६६।
मत उपाना - सम्मति स्थिर करना।
अबिहित बाद बिवाद सकल मत इन लगि भेष धरत-१-५५।
बेद पुरान भागवत गीता सब कौ यह मत सार १६८।
सूरदास प्रभ हरि न मिलै तो घर ते भला मढ़ी-2७९४।
लिपटवा दूँ, चढ़वा दूँ, मढ़ा दूँ।
सूरदास सोने कै पानी मढ़ौं चोंच अरु पाँखि-९-१६४।
सुन्दर, सुहावने, दर्शनीय।
तिनहू माँझ अधिक छबि उपजत कमलनैन मणियारे-३१७५।
किसी को जबरदस्ती कोई दायित्व सौंपना या किसी पर दोषादि आरोपित करना।
किसी को मढ़ने के काम में प्रवृत्त करना।
पँचरंग रेसम लगाउ, हीरा मोतिनि मढ़ाउ बहु बिधि जरि करि जराउ ल्याउ रे बढ़ैया-१०-४१।
मढ़ने के काम में प्रवृत्त करना।
खुर तांबै, रूपै पाठि. सनै सांग मढ़। दीन्हीं द्विजनि अनेक हरषि असीस पढ़ीं-१०-२४।
(क) त्य गति प्रान निरखि साटक-धतु गति-मति विकल सरीर-१-२९।
(ख) आजु बिधाता मति मेरी गई भौन काज बिरमाई-2५३८।
(ग) मल्लजुद्ध अति कंस कुटिल मति छल करि इअँ हँक रे-2 ५६९।
पारथ भीषम सौं मति पाइ-१-२७६
(क) दुर वह्यौ, मनि करौ अन्य इ-१.८।
(ख) कि अत डरय, महिं मति सापै, व्याकुल बचन वहंत-९-८३।
स्वयंभु के दुतिय पुत्र उत्तानपाद मति धी-बारा, ७१।
धूर्त मति, दुष्टता, कुटिलता।
गेंद दियैं ही पै बनै छाँड़ि देहु मति-धूत-५८९।
[सं. मत्त+वाला,हिं. मतवाला]
[सं. मत्त+वाला,हिं. मतवाला]
जनु जल सोखि लयो से सविता जोबन गज मतवार-2०६२।
[सं. मत्त+वाला,हिं. मतवाला]
सूर स्याम मेरे आगैं खेलत जोबन-मत-मतवारि-१०-३१४।
मतवारे, मतवारो, मतवाले, मतवालो
(क) बारन छाँड़ि देत किन हमकौ तू जानत मतंग मतवारो-2५९०।
(ख) रहु रहु मधुकर मधु मतवारे-2९९०।
काहे कौ बादिहि बकति बावरी मानत कौन मते अब तेरे-पृ.३३१ (३)।
(क) मतो यह पूछत भूतलराइ-१-२६९।
(ख) यामैं कछू खरचियतु नाहीं अपनो मतो न दीजै-2९०६।
(ग) बैठि असुर सब सभा रुक्म सों मतौ बिचारयौ-१० उ०-८।
(क) सुत कुबेर के मत्त मगन भए बिषै रस नैननि छाए (हो)-१-७।
(ख) लट लटकनि मनु मत्त मधुपगन मादक मधुहिं पिए-१०-९९।
व्यर्थ,निष्फल, निष्प्रयोजन।
[सं. वादि, हिं. वादि = हठ करके]
(क) माया-मद मैं मत्त, कत जनम बादि ही हारै -१-६३।
(ख) छिन न चिंतत चरन अंबुज, बादि जीवन जाइ-१-३१५।
(ग) बादि अभिमान जनि करौ कोई-८-१०।
जनम तौ बादिहिं गयौ सिराइ-१-१५५।
मरा या उन्मत्त होने का भाव।
मत्था टेकना - प्रणाम करना। मत्था मारना - बहुत सोंच - विचार या उलझन करना।
(क) दोन्हा सभा बनाय गंडु की मय माय गत अत। ताकूँ देख भ्रमे दुर्योधन महा माह मतिमत-७५९।
(ख) त्रियाचरित मतिमत न समुझत उठि प्रछालि मुख धावत-९-३१।
गोध्यौ दुष्ट हेम तस्कर ज्यौं अति आतुर मतिमंद-१-१०२।
अब तो सहाय करौ तुम मेरी, हौं पामर मतिहीनी.-सारा. ७६६।
काठ का वह दंड जिससे दही मथा जाता है।
जब मोहन कर गही मथानी-१०-१४४।
ज्ञान-कथा को मथि मन देखौ ऊधौ बहु धोपी।
मथि मृगमद-मलय कपूर माथै तिलक किए-१०-२४।
(क) अघ-अरिष्ट केसी काली मथि दावानलहिं पियौ-१-१२१।
(ख) धनुष तोरि गज मारि मल्ल मथि किए निडर जदुबंस-३०१८।
नित प्रति सहस मथानी मथिऐ, मेघ-सब्द दधि-माट घमर कौ-१०-३३३।
ब्रज में यमुना के दाहिने किनारे पर बसा एक नगर जिसे मधु नामक दैत्य ने बसाया था जिससे उसका नाम 'मधुपुर' पड़ा। मथुरा की गणना सात पुरियों में है। कंस की यही राजधानी थी और श्रीकृष्ण ने यहीं उसका वध किया था।
मारि कंस केसी मथुरा मैं मेट्यौ सबै दुराजैं-१-३३।
मथनहारि सब ग्वारि बुलाई-५२०।
एक ही क्रिया बार-बार करना।
घूमि रहे जित तित दधि मथना सुनत मेघ ध्वनि लाजै री।
वह मटका जिसमें दही मथा जाता है।
माखन चोरि फोरि मथनी को पीवत छाछ पराई सारा.-७४९।
नंद जू के बारे कान्ह छाँड़ि दै मथनियाँ-१०-१४५।
यहैं कहि भए अँतरधान तब मत्स्य प्रभु, बहुरि नृप आपनौ कर्म साध्यौ-८-१६।
मथने या बिलोने की क्रिया या भाव।
( क ) को कौरव-सिंधु मथन करि या दुख पार उतरिहै-१-२९।
(ख) मंदर डरत, सिंधु पुनि काँपत, फिरि जनि मथन करै-१०-१४२।
मधुकैटभ-मथन मुर भौम केसी भिदन कंस कुल काल भनुसाल हारी।
सिंधु मनौ इह घोष उजागर। मथनहार हरि रतनकुमार-१०३७।
बज्रनाभ मथुरापति कीन्हौ-१-२८८।
गज चानूर हते दव नास्यौ, ब्याल मथ्यौ भयहारे-१.२७।
तुरत मथ्यौ दधि माखन आछौ खाहु देउँ सो आनि-४९४।
मतवाले हाथी के मस्तक से बहनेवाला मद या दान।
मजदूर कारीगर आदि का समूह।
मनु मदन धनु-सर सँधाने, देखि घन-कोदंड-१-३०७।
मतवाले हाथी की कनपटी से बहनेवाला द्रव्य, दान।
सत्यवती मच्छोदरि नारी। गंगा तट ठाढ़ी सुकुमारी। तहाँ परासर रिषि चलि आए। बिबस होइ तिहिं कैं मद छाए-१-२२९।
भोजन करत माँगि घर उनकैं राजमान-मद धारत-१-१२।
मद पर आना - (१) युवा होना।
(२) उमंग पर आना।
(३) कामोन्मत्त होना।
मद गजराज द्वार पर ठाड़ो हरि कहेउ नेक बचाय।
मदनगोपाल देखियत हैं सब अब दुख-सोक बिसारी-2५६६।
जब तुम मदनमोहन करि टेरौ इहि सुनि कै घर जाऊँ।
गरल ग्रीव, कपाल उर इहिं भाइ भए मदनारि-१०-१६९।
बादल उठना (घिरना, चढ़ना) - घटा घिरना।
बादल गरजना - मेघों का शब्द होना।
बादल छँटना (फटना) - घटा का घिरा न रह जाना, मेघों का छितर-बितर हो जाना।
बादल (बादलों) से बात करना - बहुत ऊँचा होना।
या देही कौ गरब करत धन-जोबन के मदमात-2-२२।
ज्यौं गज जूथ नेक नहिं बिछुरत सरद मदन मदमातौ-३३१९।
जोबन मदमाती इतराती बेनि ढुरति कटि लौं छबि बाढ़-१०-३००।
ब्रज पर मदर करत है काम-१० उ.-९८।
(क) अंबर हरत द्रुपदतनया की दुष्ट सभा मधि लाज सम्हारी-१-२२।
(ख) लोह तरैं मधि रूपा लायौ-७-७।
(ग) कमल मधि अलि उड़त ३६०।
अब तो हैं हम निपट अनाथ। जैसें मधु तोरे की माखी त्यौं हम बिन ब्रजनाथ-2६९३।
माखन मधु मिष्ठान महर लै दियौ अक्रूर के हाथ-2५३४।
एक दैत्य जिसको मारने से विष्णु का नाम 'मधुसूदन' पड़ा।
(क) धरनीधर बिधि बेद उधारयौ मधु सौं शत्रु हयौ-2२६४।
(ख) एई माधो जिन मधु मारे री-2५६८।
चारौ भ्रात मिलि करत कलेऊ मधु मेवा पकवाना।
अंग सुभग सजि ह्वै मधु मूरति नैननि माँह समाऊँ-१०-४९।
जिहिं मधुकर अंबुज-रस चाख्यौ क्यौं करील फल भाडै-१-६८।
सुनि मधुकरि भ्रम तजि कुमुदनि कौ राजिवबर की-आस-१-३३९।
भिक्षा जिसमें केवल पका हुआ भोजन हो।
मधु और कैटभ नामक दो दैत्य जो विष्णु द्वारा मारे गये थे।
पिउ पद कमल कौ मकरंद। मलिन मति मन-मधुप परिहरि बिषय नीरस मंद-९-१०।
निसि दै द्वार कपाट सदल बधु मधुपति प्यावत परम चैन-१९७७।
(क) कुंचित केस सुबंधु सुबसु मनु उड़ि आए मधुपन के टोल-१३३०।
(ख) बिन बिकसे कल कमल कोष तै मनु मधुपनि की माल-१०-२०७।
दही, घी, जल, शहद और शकर का घोल जो देवता पर चढ़ाया जाता है।
(क) कालिंदी कैं कूल बसत इक मधुपुरि नगर रसाला-१०-२।
(ख) धनि कालिंदी मधुपुरी दरसन नासै पापु-४९२।
मधुबन तुम कत रहत हरे-ना. ३८२८।
(क) गोपालहिं राखहु मधुबन जात-2५३१।
(ख) मधुबन सब कृतज्ञ धरमीले-ना. ४२१२।
हनु, तै सबकौ काज सँवारयौ। .....। तरहिं गमन कियौ सागर तैं बीचहिं बाग उजारयौ। कीन्हौ मधुबन चौर चहूँदिसि माली जाइ पुकारयौ.-९-१०३।
अर्जुन भोजऽरु सुबल सुदामा मधुमंगल इक ताक-४६४।
समाधि की अवस्था जिसमें रज और तम गुणों के छूट जाने पर केवल सतगुण के प्रकाश का अनुभव होता है।
(क) ज्यौं मधुमाखी सँचति निरंतर बन की ओट लई-१-५०।
(त्र) ज्यौं घेरि रही मधुमाखि मिलि झूमक हो-2४११।
जो सुनने में मीठा जान पड़े।
महा मधुर प्रिय बानी बोलत साखामृग तुम किहिं के तात-९-६९।
मधु' दैत्य को मारनेवाले विष्णु।
(क) सूरदास अब क्यौं बिसरत है मधुरिपु कौ परितोष-पृ. ३३२ (१८)।
(ख) वहाँ भेषज नाना बिधि को अरु मधुरिपु से हैं बैद-३०१३।
जो सुनने में प्रिय या रुचिकर लगे।
तारी दै दै गावहीं मधुरं मृदु बानी-१०-१३४।
(क) सकुच सहित मधुरे करि बाल-७००।
(ख) मधुरे दोउ रोवन लागे-2६२५।
(ग) अस्तुति करी बहुत नाना बिधि मधुरे बेनु बजाये-सारा ०४८९।
जसुमति मधुरै गावैं-१०-४३।
यह कहि कहि मधुरै सुर गावति केदारौ-१०-१९७।
(ख) मधुरैं सुर गावत-१०-२४२।
(ग) करत चले मधुरैं सुर गान-४३८।
प्रेमी-प्रेमिका का मिलन-स्थल।
मधु' दैत्य को मारनवाले विष्णु।
मधु' नामक दैत्य को मारनेवाले विष्णु।
मिथ्यावाद उपाधि रहित ह्वै बिमल-बिमल जस गावत-१- ३६०।
बादत बड़े सूर की नाईं अबहीं लेत हौं प्रान।
बादति है बिनु काज ही बृथा बढ़ावति रारि-५८९।
[सं. वारिद, विपर्यय से 'बादरि’]
(क) बादर-छाँह, धूम - धौराहर, जैसे थिर न रहाहीं-१- ३१९।
(ख) और सकल मैं देखे-ढूँढे, बादर की सी छाहीं-१- ३२३।
बीच में पड़कर झगड़ा या विवाद मिटानेवाला।
प्रिय के अपराध पर कुछ मान करके शीघ्र ही प्रसन्न हो जानेवाली नायिका।
विरोध या तर्क-वितर्क करना।
माला या सुमिरनी की गुरिया।
जोलौं मन-कामना न छूटै-2-१९।
जो कल्पित या गढ़ा हुआ हो।
मध्यान, मध्यान्ह, मध्याह्न
नृप, तुम हमसौं करौ लराई। कह्यो करौं मध्यान बिताई-९-१३।
एक प्रसिद्ध वैष्णव आचार्य जिनका समय बारहवीं शताब्दी है।
मन-बानी कौं अगम अगोचर सो जानै जो पावै-१-२।
अंतःकरण की चार वृत्तियों में वह वृत्ति जिससे संकल्प-विकल्प होता है।
(किसी से ) मन अटकना (उलझना) - प्रेम होना।
मन अटक्यौ - प्रेम हो गया।
उ. - ता दिन ते मधुकर, मन मटक्यौ बहुत करी निकरै निकारयौ-३०३५।
मन आना ( में आना ) - जँचना, समझ पड़ना।
मन आई - इच्छा हुई, जँच गई।
उ. - (क) नृपति रहूगन कैं मन आई। सुनियै ज्ञान कपिल सौं जाई-५- ४।
( ख ) जमुना तीर आजु सुख कीजै यह मेरैं मन आई-५८१।
कहा मन आनी - यह क्या सूझी? ऐसा अनुचित विचार क्यों किया है ?
उ. - इंद्र देखि इरषा मन मन लायौ। करिकै क्रोध न जल बरसायौ। रिषभदेव तबहीं यह जानी। कह्यो, इंद्र यह कहाँ मन आनी-५- २।
मन करना - इच्छा करना।
करत इहाँ को मन - यहाँ आने की इच्छा करते हैं।
उ. - कबहुँक स्याम करत इहाँ को मन कैंघौ चित सुध्यो बिसराई-३११८।
मन का (कौ) - प्रिय या रुचिकर।
उ. - तेरे मन कौ यहाँ कौन है-१०- ३२०।
मन (का) खराब होना - (१) मन फिरना।
(२) अप्रसन्न होना।
(३) बीमार होना।
मन चलना - इच्छा होना।
चलत कहाँ मन - मन कहाँ-कहाँ या किधर-किधर दौड़ता है।
उ. - चलत कहाँ मन और पूरी तन जहाँ कछु लैन न दैन-४९१।
मन चुराना (चोराना) - मोह लेना, मुग्ध कर लेना।
मन लियौ चुराइ - मन मुग्ध कर लिया।
उ. - कब देखौं वह मोहन मूरति जिन मन लियौ चुराई-६७९।
चोरत मन - मन मुग्ध करते हैं।
उ. - कछु दिन करि दधि - माखन चोरी अब चोरत मन मोर-७७६।
मन टूटना - (१) निराश या हताश होना।
(२) चारों ओर वेग से दौड़ना या लपकना।
मन दसहूँ दिसि टूटै - दसों दिशाओं में मन दौड़ता या लपकता है।
उ. - करनी और कहै कछु और मन दसहूँ दिसि टूटै-१-१९।
मन ढरना - प्रेम या अनुराग होना।
मन ढरयो - प्रेम हो गया, मन मुग्ध हो गया।
उ. - रूपहीन कुलहीन कबरी तासौं मन जो ढरयो-३०९२।
मन देना - (१) मन लगाना।
(२) ध्यान देना।
मन दीनौं - मन लगाया।
उ. - भाव - भक्ति कछु हृदय न उपजी मन बिसया मैं दीनौं-१-६५।
(किसी पर) मन धरना - (१) ध्यान देना।
(२) मन लगाना।
मन न धारै - चित्त नहीं लगाता है।
उ. - सूरदास स्वामी मनमोहन तामें मन न धरै-४८३।
मन तोड़ना - (१) निराश या हताश करना।
(२) निराश या हताश होना, साहस छोड़ना।
मनहिं तोरै - साहस छोड़ देता है।
उ. - कहुँ रसना सुनत स्रवन देखत नयन सूर सब भेद गुन मनहिं तोरै।
मन बँधना - मुग्ध, आसक्त या लीन होना।
मन बँध्यौ - मुग्ध, आसक्त या लीन हुआ।
उ. - सूरदास प्रभु को मन सजनी, बँध्यौ राग की डोरि-६५७।
मन (में) बसना - अच्छा लगना, रुचिकर होना।
उ. - सूरदास मन बसै तोतरे बचन बर-१०१५१।
मन बाँधना - मुग्ध, आसक्त या लीन करना।
मन बाँध्यौ - मुग्ध या आसक्त हुआ।
उ. - कनक कामिनी सौं मन बाँध्यौ-१- ७४।
मन वश में करना - मुग्ध या आसक्त कर लेना।
बस कीन्हौ मन मेरौ - मेरा मन मुग्ध या आसक्त कर लिया है।
उ. - रिसहिं उठी जहराइ, कह्यौ, यह बस कीन्हौं मन मेरौ-१९९९।
मन बिगड़ना - (१) मन का हटना या उदासीन होना।
(२) कै या मचली जान पड़ना।
(३) झुंझलाना, क्रुद्ध होना।
(४) चित अस्वस्थ होना।
मन बढ़ना - साहस या उत्साह बढ़ना।
मन बुझना - चित्त में उमंग या उत्साह न होना।
मन बूझना - मन की थाह लेना।
मन बढ़ाना - उत्साह था साहस बढ़ाना।
मन बढ़ायौ - उमंग या उत्साह बढ़ाकर
उ. - दियौ सिर पाँव नृपराउ ने महर को आप पहरावनी सब दिखाए। अतिहिं सुखपाइ कै लियौ सिर नाइ कै हरषि नँदराइकै मन बढ़ायौ।
मन (का) बूझना (मानना) - चित्त में शांति या संतोष होना।
मन का मारा - खिन्न या दुखित चित्त वाला।
मन का मैला - खोटा, कपटी।
मन की मन में रहना - इच्छा पूरी न होना।
मन के लड्डूखाना - कोरी कल्पना का आनन्द लेना, व्यर्थ की या असंभव आशा पर प्रसन्न होना।
मन खोलना - रहस्य प्रकट कर लेना।
मन चलना - इच्छा होना।
मन (को) टटोलना - मन की थाह लेना।
मन डोलना - (१) चित्त का चंचल हो जाना।
(२) लोभ हो आना, नियत डोलना।
मन डोलाना - (१) चित्त को चंचल करना।
(२) नियत डुलाना, लोभ करना।
मन न डोलावै - चित्त को चंचल न करे।
उ- भोजन करत गह्यौ कर रुक्मिनि सोइ देहु जो मन न डोलावै।
मन देना - (१) ध्यान लगाना।
(२) लीन या मुग्ध होना।
मन फटना (फिर जाना) - घृणा या चिढ़ हो जाना।
मन फिराना (फेरना) - चित्त हटाना।
मन बहलाना - दुख भुलाने का प्रयत्न करना, खिन्न चित्त को प्रसन्न करना।
मन भरना - (१) विश्वास होना।
(२) तृप्ति, संतोष या समाधान होना।
मन भर जाना - (१) अघा जाना, तुप्त हो जाना।
(२) इच्छा या प्रवृत्ति न रह जाना।
मन भाना - भला था रुचिकर लगना।
मन भारी करना - खिन्न या उदास होना।
मन मानना - (१) तृप्ति, संतोष या समाधान होना।
(२) निश्चय या विश्वास होना।
( ३ ) भला या रूचिकर लगना, भा जाना।
(४) प्रेम या अनुराग होना।
मन मानत - संतुष्ट होता है।
उ. - क्यों मन मानत है इन बातन-३०२५।
कैसे मन मानै - कैसे संतोष हो सकता है?
उ. - मधुकर कहि कैसैं मन मानै। जिनकौं इक अनन्य बत सूझै, क्यौं दूजौ उर आनै - ना. ४३३३।
मन मान्यौ - अनुराग हो गया।
उ. - (क) सखी री, स्याम सौं मन मान्यौ। नीकै करि चित कमल नैन सौं घालि एकठाँ सान्यौ-१२०२।
(ख) नंदलाल सौं मेरौ मन मान्यौ कहा करैगौ कोई री.-१२०३।
मन मिलना(१) प्रेम होना।
(२) मित्रता होना।
मन में आना - (१) प्रतिक्रिया - स्वरूप किसी विचार या भाव का उत्पन्न होना।
(२) जान या समझ पड़ना।
(३) भला या रुचिकर लगना।
मन न आये - प्रतिक्रिया - स्वरूप कोई भाव जाग्रत न हुआ।
उ. - तासों उन कटु बचन सुनाये। पै ताके मन कछु न आये। मन नहिं आवे - समझ या जान नहीं पड़ता।
उ. - यह तनु क्यों ही दियौ न जावे। और देत कछु मन नहिं आवे।
मन में आनना - सोचना, विचार करना।
मन में जमना (१) उचित जान पड़ना।
(२) ध्यान में आना।
मन में ठानना - दृढ़ संकल्प करना।
मन में धरना - (१) प्रकट न करना।
(२) स्मरण रखना।
(३) ध्यान देना, श्रद्धा या विश्वास रखना।
न मन मैं धरै - ध्यान नहीं देता है, श्रद्धा या विश्वास नहीं रखता है।
उ. - जज्ञ सराध न कोऊ करै। कोऊ धर्म न मन मैं धरै-१- २९०।
मन मैं यह धरी - यह निश्चय या संकल्प किया है !
उ. - पै तुम बिनती बहु बिधि करी। तातै मैं मन मैं यह धरी-६.५।
मन में बैठना - (१) ठीक जान पड़ना।
(२) ध्यान में आना।
मन में रखना - (१) प्रकट न करना।
(२) स्मरण रखना।
मन में भरना - हृदयंगम करना।
मन में लाना - सोचना, विचार करना।
मन में मानना - ध्यान देना, परवाह करना।
मन मैं नहिं मान्यौ - कुछ परवाह था चिंता न की, ध्यान न दिया।
उ. - छाक खाय जूठन ग्वालन की कछु मन मैं नहिं मान्यौ - सारा. ७५०।
मन मारना - (१) खिन्न या उदास होना।
(२) इच्छा या उमंग को दबाना।
मन मानि - खिन्न या उदास होकर।
उ. - भवन ही मन मारि बैठी सहज सखी इक आई।
मन मारे - खिन्न, उदास।
उ. - (क) आए नंद घरहिं मन मारे-५४१।
(ख) प्रिया-बियोग फिरत मारे मन परे सिंधु तट आनि।
मन मारैं - खिन्न या उदास होता है।
उ. - भूसुत सत्रु थान किन हेरत लखत मोहिं मन मारैं।
मन मसना - मन हरना।
मूसे मन - मेरा मन रूपी धन हरकर।
उ. - जात कहाँ बलि बाँह छँड़ाये मूसे संपति मेरी (मनसंपति सब मेरी)-१५०६।
मन मिलना - (१) समान स्वभाव होना।
(२) मित्रता या प्रेम होना।
मन को मोहना - चित्त लुभाना या आकृष्ट करना।
मन (को) मैला करना - खिन्न या अप्रसन्न होना।
(किसी से) मन मोटा होना - अनबन होना।
(किसी का) मन मोटा होना - विरक्त या तटस्थ होना।
मन मोड़ना (१) चित्त को दूसरी ओर लगाना।
(२) विरक्त या तटस्थ रहना।
(किसीका) मन रखना - इच्छा या कामना पूरी करना।
मन राखे काम - इच्छा पूरी करना ही उचित है।
उ. - उनहीं को मन राखे काम-१९९४।
मन (में) रखना - ध्यान में बसाना।
मन राखत - ध्यान में रखते हैं।
उ. - जिहि जिहिं भाँति ग्वाल सब बोलत, सुनि स्रवननि मन रखत-४९३।
मन लगना - (१) तबियत लगना।
(२) ध्यान बना रहना।
(३) प्रेम या अनुराग होना।
नहिं मन लागत - जी नहीं लगता है, तबियत घबराती है।
उ. - (क) नैंकहूँ कहूँ मन न लागत काम धाम बिसारि-७७७।
(ख) नेक नहीं घर मों मन लागत-११७५।
मन लग्यो (लाग्यौ - प्रेम या अनुराग हुआ।
उ. - (क)जाकौ मन लाग्यो नंदलालहिं ताहिं और नहिं भावै-2-१०।
(ख) सूरदास चित ठौर नहीं कहुँ मन लाग्यो नँदलाहिं सौं-११८०।
(ग) मेरो मन रसिक लग्यौ नँदलालहिं झखत रहत दिन रातौ-३११६।
मन लगाना - (१) ध्यान देना, सोचना, विचारना।
(२) जी बहलाना, विनोद करना।
(३) प्रेम या अनुराग करना।
मन नहिं अनत लगावै - दूसरी ओर ध्यान नहीं देता, कुछ और सोचता ही नहीं।
उ. - ऐसे सूर कमल लोचन बिनु मन नहिं अनत लगावै हो.-2८०४।
मन लाना - (१) जी लगाना, ध्यान देना।
(२) प्रेम करना आसक्त होना।
मन लायौ - प्रेम किया।
उ. - मूरत, त पर - तिय मन लायो, इंद्रानी तजिकै ह्याँ आयौ-६- ८।
मन से उतरना - (१) आदर भाव न रह जाना।
(२) याद न रहना।
मन से उतारना - आदर - भाव न रखना।
(२) भुलाना, याद न रहना।
मन हरना - मोह लेना, मुग्ध करना।
मन हरि लियौ - मुग्ध कर लिया।
उ. - मन हरि लियौ मुरारि-७६४।
मन हरेउ - मन मुग्ध हो गया।
उ. - सूरदास मेरौ मन वाकी चितवन देखि हरेउ री।
मन हरयौ - मन मुग्ध कर लिया, मोह लिया।
उ. - सूर स्याम मन हरयौ तुम्हारौ हम जानो इह बात बनाई-११८६।
(किसी का) मन हाथ में करना (लेना) मन वश में करना।
मन ही मन - चुपचाप, भीतर ही भीतर, बिना कुछ कहे - सुने।
उ - (क) फरकत बदन उठाइ कै मन ही मन भावै-१०- ७२।
(ख) रिसनि रहो झहराइ कै मन ही मन बाम --2१२६।
मन हरा होना - चित्त प्रसन्न होना।
मन हारना - साहस छोड़ना, उत्साह न रह जाना।
मन करना - इच्छा करना। मन माना - इच्छानुसार।
मन माने की बात - अपनी - अपनी रुचि या इच्छा है।
उ. - ऊधौ मन माने की बात। दाख छुरा छाड़ि कै बिष कीरा बिस खात - ता० ४६३९।
मन होना - इच्छा होना, जो चाहना।
(क) घर डर बिसरेउ बढ़ेउ उछाह। मनचीते हरि पायो नाह।
(ख) सूर स्याम दासी सुख सोवहु भयौ अभय मन चीत्यौ-2८८४।
लटकन सीस कंठ मनि भ्राजत मनमथ कोटि वारनै गै री-१०-५५।
मनमानै सोऊ कहि डारौ-३००४।
मनचाहा काम करनेवाला, स्वेच्छाचारी।
सुखदायी, परंतु कल्पित बात।
(क) मनवांछित फल सबहिन पायौ-सारा, १६५।
(ख) माँगो सकल मनोरथ अपने मनबांछित फल पायो-सारा. ३६८।
जो मन को रुचे या भला लगे।
सूरदास प्रभु रसिक सिरोमनि कियौ कान्ह ग्वालिनि मनभायौ।
चरन धोइ चरनोदक लीनौ, कह्यौ माँगु मनभावन-८.१३।
(क) जुग जुग जीवहु कान्ह सबही मन भावन रे।
(ख) हित कै चित की मानत सबके जिय की जानत सूरदास मनभावन-१०-२५१।
भाट बोलै बिरद नारी बचन कहैं मनभावनी।
मन को मोहने या लुभानेवाला, चित्ताकर्षक।
(क) जाकौ मनमोहन अंग करै-१- ३७।
(ख) स्यामा स्याम मिले ललितादिहि सुख पावत मनमोहनो-२२८०।
मनमाना काम करनेवाला, स्वेच्छाचारी।
मन को आनंदित करने वाला, मनोरंजक।
(क) सिवबिरंचि खंजन मनरंजन छिन छिन करत प्रबेस-१-३३९।
(ख) खंजन मनरंजन न होहिं ए कबहीं नहिं अकुलात-2७७७।
काकी भूख गई मनलाड़ू सो देखहु चित चेत-३२५६।
जल लेकर संकल्प करके दान करना।
इच्छा, कामना, अभिलाषा, मनोरथ।
(क) सूरदास ज्यौं मन तें मनसा अनत कहूँ नहिं जावै।
(ख) सूर प्रभु कौ दरस दीजै नहीं मनसा और-३३८३।
मनसा-बाचा-कर्म अगोचर सो मूरति नहिं नैन धरी-१-११५।
(क) पांच कमल मधि जगल कमल लखि मनसा भई अपंग।
(ख) सूर हरि की निरखि सोभा भई मनसा पंग-६२७।
मनसा पाप लगै नहिं कोइ-१-२९०।
संकल्प आदि पढ़कर या पढ़ाकर दान आदि कराना।
मनसानाथ मनोरथ पूरन सुख निधान जाकी मौज घनी-१.३९।
मन-बहलाव के लिए जाने का स्थान।
तब को इंदु सम्हारि तुरत ही मनसिज साजि लियौ-३४७४।
रैता पैता मना मनसुखा हलधर संगहिं रैहौं-४१२।
मिलि ही में बिपरीत करी बिधि होत दरस को बाधो-2७५८।
रोका या दबाया जानेवाला, विवश।
अचरज कहा पार्थ जौ बेधै, तीन लोक इक बान-१-२६९।
(क) बेनी लटकन मसिबंदा मुनि-मनहर-१०-१५१।
(ख) बिनय बचननि सुनि कृपानिधि चले मनहर चाल-१०-२१८।
मन हरने की क्रिया या भाव।
जिसको करने की आज्ञा न हो, वर्जित।
मना (मन) रे, माधव सौं करि प्रीति-१-३२५।
श्री कृष्ण का सखा एक गोप।
रैता पैता मना मन सुखा हलधर सहिं रहौं-४१२।
प्रसन्न कीजिए, मान मोचन कीजिए।
अति रिस कृष ह्वै रही किसोरी करि मनुहारि मनाइये-१६८८।
(क) यह औसर कब ह्वैहै फिरि कै पायौ देव मनाई-१०-१८।
(ख) जा सुख कौं सिव-गौरि मनाई तिय-ब्रत-नेम अनेक करी-१०-८०।
सेवा-पूजा से प्रसन्न करूँ।
स्तुति या प्रार्थना करूँ।
पुनि-पुनि देव मनाऊँ-सारा० ७८०।
दूसरे को मानने या स्वीकारने को प्रवृत्त करना।
रूठे हुए को प्रसन्न या संतुष्ट करने के लिए अनुनय विनय या मीठी-मीठी बातें करना।
मनोरथ पूरा करने के लिए देवी-देवता आदि की पूजा, सेवा या प्रार्थना करना।
स्तुति या प्रार्थना करना।
मनोरथ पूरा करने के लिए देवी-देवता की प्रार्थना की।
मुदित ह्वै गई गौरि मंदिर जोरि करि बहु बिधि मनायौ-१० उ०-१८।
मीठी-मीठी बातें करके रूठे हुए को प्रसन्न करता है।
ससि कौं देखि आइ हठि ठानी, करि मनुहार मनावत-सारा. ४३९।
प्रार्थना या स्तुति करती हैं।
ब्रज-जुवती स्यामहिं डर लावतिं। बारंबार निरखि कोमल तनु कर जोरहिं बिधि कौं जु मनावतिं-३९०।
स्तुति या प्रार्थना करती है।
कबहुँक कुल देवता मनावति-१०-११५।
मनोरथ पूर्ण करने के लिए प्रार्थना करती है।
(क) यह कहि कहि देवता मनावति।
(ख) जोरि कर बिधि सों मनावति असीसै दै नाम-2५६५।
हौं करि रही कंठ में मनिआ निर्गुन कहा रसहिं ते काज-३३५२।
मानौं मनिधर मनि ज्यौं छाँड़्यौ फन तर रहत दुराए-६७५।
मनिमय भूमि नंद के आलय-१०-१२१।
कंठी या माला में पिरोया जानेवाला दाना।
अपने हाथ पोहि पहिरावत कान्ह कनक के मनियाँ-2८ ७९।
मोती या गजमोती आदि जो कठुला आदि में पिरोया जाय।
कठुला कंठ मंजु गज मनियाँ-१०-१०६।
हौं करि रही कंठ में मनियाँ (मनिआ) निर्गुन कहा रसहिं ते काज-३३५२।
मनियार, मनियारा, मनियारो, मनियारौ
रूठे हुए को प्रसन्न करने की क्रिया या भाव; मनाने के लिए।
(क) स्याम मनावन मोहिं पठाई-2०२२।
स्तुति या प्रार्थना करने की क्रिया या भाव।
मीठी-मीठी बातें कहकर रूठे हुए को मनाते हैं।
हम नाहिंन कमला सी भोरी करि चातुरी मनावहिं.-2९८५।
मनोरथ पूर्ण करने के लिए देवी-देवता की प्रार्थना करो।
वह देवता मनावहु सब मिलि तुरत कमल जा देइ पठाइ-५३१।
स्तुति या प्रार्थना करती हैं।
ब्रज जुवती हरि चरन मनावैं-६३१।
मनोरथ पूर्ण करने के लिए देवी-देवता की प्रार्थना या स्तुति करती है।
(क) सूरदास ऐसे प्रभु तजि कै घर-घर देव मनावै-१-३१।
(ख) कबहिं घुटुरुवनि चलहिंगे कहिविधिहिं मनावै-१०-७४।
ऐसौ को ठाकुर जन-कारन दुख सहि भलौ मनावै-१-१२२।
सर्प के मस्तक से प्राप्त (कल्पित) मणि।
निरखति रहौं फनिग की मनि ज्यौं-१०-२९६।
मनियार, मनियारा, मनियारो, मनियारौ
[सं. मणिकार, प्रा. मनियार]
कहा काँच संग्रह के कीने हरि जो अमोल मनी-८९४।
खाइ न सकै खरवि नहिं जानै ज्यौं भुवंग-सिर रहत मनी-१-३९।
तिहूँ लोक के धनी मनी तुमही को सो है-१० उ०-८।
ब्रह्मा के 'स्वायम्' आदि वे चौदह पुत्र जिनसे 'मानव' जाति का आरंभ माना जाता है।
(क) पुनि दच्छादि प्रजापति भए। स्वयंभुव सो आदि मनु जए-३-८।
(ख) स्वायंभू मनु के सुत दोइ-४-८।
कह्यौ तिन तुम्हैं हम मनुष जानत नहीं।
अबकी बेर मनुष्य देह धरि कियौ न कछ उपाइ-१-१५५।
(क) मनु संचित भू-भार उतारन चपल भए अकुलाए-१-२७३।
(ख) मनु मदन धनु-सर सँवाने-१-३०७।
जगहित जनक-सुता मनुरंजन-९८२।
यह हित मनैं कहत सूरज प्रभु इहिं कृति कौ फल तुरत चखैहौं-७-५।
मनाकर, बिनती-प्रार्थना करके।
जिन पुत्रनिहिं बहुत प्रतिपाल्यौ देवीदेव मनैहैं-१-८६ .
मनायंगे, बिनती-प्रार्थना करेंगे।
मेरे मारत काहि मनैहैं.-१०२४।
सकल सुख की सीव कोटि मनोज सोभा हरनि-१०-१०९।
हिंदुओं का एक प्रसिद्ध धर्म शास्त्र जिसके रचयिता 'मनु' माने जाते हैं।
अप्रसन्नता या मान दूर करने के लिए की गयी खुशामद या विनय।
(क) तुम्हरै हेत लियौ अवतार। अब तुम जाइ करौ मनुहार-७-२।
(ख) ससि कौं देखि आर हरि टानी करि मनुहार मनावति-सारा.४३९।
(ग) करि मनुहार, कोसिवै कैं डर भरि-भरि देति जसौदा मात-१०-३३१।
बिदा करे निज लोक कौं इहि बिधि करि मनुहार-४९२।
करि मनुहारि (मनुहारी) - (१) मीठो बातें कह कहकर, खुशासन करके, मनाकर।
उ. - (क) करि मनुहारि कलेऊ दीन्हौ-१०-१६३।
(ख) करि मनुहारि उठाइ गोद लै बरजति सुत कौं मात-१०- ३२६।
करति मनुहरि - बिनती या प्रार्थना करती है।
उ - सबै करति मनुहारि उधौ, कहियो हो जैसे गोकुल आवैं करी (कोल्ही) मनुहारी - बिनती - प्रार्थना की।
उ - (क) चलियै विप्र जहाँ जग बेदी बहुत करी मनुहारी-८-१४।
(ख) उन सबकी कीन्ही मनुहारी-१० उ०-१०५।
चितैबौ छाँड़ि दै री राधा। हिलि-मिलि खेलि स्याम सुंदर सौं, करति काम कौ बाधा-७२१।
आजु ही प्रात इक चरित देख्यो नयो तबहिंतें मोहिं यह भई बाधा।
जिसके कार्य या साधन में बाधा पड़ी हो।
(क) परम पंकज अति मनोहर सकल सुख के करन-१-३०८।
(ख) तुम बिछुरत घनस्याम मनोहर हम अबला सरधाते-पृ. ४६०।
मनोहर होने का भाव, सुंदरता।
सूरदास भगवत-भजन दिनु मनौ ऊँट-बृष-भैंसौ-2-१४।
कामना पूर्ण होने पर पुण्य कार्य विशेष करने का संकल्प देवी-देवता के समक्ष करना, मानता, मन्नत।
रूठे हुए को मनाने का भाव या कार्य।
मननानाथ मनोरथदाता हौ प्रभु दीनदयाल-१-१८९।
मनसानाथ मनोरथ पूरन सुख-निधान जाकी मीज घनी-१.३९।
चित्र जो कार्तिक में गोबर से दीवार पर बनाकर पूजे जाते हैं।
मनोरा झूमक-एक गीत जो फागुन में गाया जाता है और जिसके अंत में मनोरा भूमक' पद्य रहता है।
गोकुल सकल स्वालिनी ही घर घर खेलै फागु मनरा झूमक रो-2४०१।
वह विचार या भाव जो मन की अवस्था-विशेष में उत्पन्न हो।
वह शास्त्र जिसमें मन की वृत्तियों का विवेचन हो।
(क) सखी संग की निरखति यह छबि भईं ब्याकुल मन्मथ की ढाढ़ी-७३६।
(ख) अबला कहा जोग मत जानैं मन्मथ ब्यथा बिगोयौ-३४८२।
इकहत्तर चतुर्युगी का काल जो ब्रह्मा के एक दिन के चौदहवें भाग के बराबर होता है।
(क) करौ मन्वंतर लौं तुम राज-७-२।
(ख) मन्वंतर लौं कियौ जेहि राज-११-३।
महाराज, तुम तो हो साधु। मम मन्या तैं भयौ अपराध-९.३।
(क) हिंसा-मद ममता-रस भूल्यौ आसाहों लपटानौ-१-४७।
(ख) ममता घटा, मोह की बूंदै-१-२०९।
(क) सुत-कलत्र कौं अपनौं जानै अरु तिनसौं ममत्व बहु ठानै-३-१३।
(ख) रिषभ ममत्व देह कौ त्याग-५-२।
मामा' के स्थान या संबंध का।
मुख-मयंक मधु पियत करत कसि ललना तऊ न अघाति-१९२३।
राम की सेना का एक बानर अधिनायक।
एक प्रसिद्ध दानव जो बड़ा शिल्पी था।
मय मायामय कोट सँवारौ-७-७।
खोवा मय मधुर मिठाई-१०-१८३।
एक ऋषि जो पराशर के शिष्य थे और जिनसे विष्णु पुराण कहा गया था।
कहौ मयत्रेय सौं समुझाइ, यह तुम बिदुरहिं कहियौ जाइ-३.४।
त्रिया-चरित् मयमंत (मतिमंत) न समुझत ९-३१।
(क) बाबा नंद झखत किहिं कारन यह कहि मया मोह अरुझाई-५३१।
(ख) हम पर बबा मया करि रहियौ सुन अपनी जिय जान-2६५८।
(ग) हौं तौ धाइ तिहारे सुत की मया करत ही रहियो-2७०७।
(क) गुरुजन बिच मैं आँगन ठाढ़ी अति हित दरसन दियौ मया करि-१४६१।
(ख) कहिधौं मृगी मया करि हमसौं कहिधौं मधुप मराल-१८०८।
(ग) धन्य स्याम बृंदाबन कौ सुख संत मया तैं जान्यौ-१८५७।
वह डंडा जिस पर हिंडोले की रस्सी लटकायी जाती है।
(क) कंचन खंभ मयारि मरुवा डाड़ी खचि हीरा बिच लाल प्रबाल-१०-८४।
(ख) खंभ जंबुन दि सुबिद्रुम रची रुचिर मयारि-2२८९।
सोभित सुमन मयूर चंद्रिका नील नलिन तनु स्याम-१०-१५४।
लागत चंद-मयूष सु तौ तनु लता-भवन रंध्रनि मग आये-१५६२।
बारंबार नंद कैं आँगन लोटत द्विज आनंद मयौ-१०-२५०।
याहिं मारि तोहिं और बिबाहौं अग्र-सोच क्यौं मरई-१०-४।
गूढ़ार्थ, गूढ़ उद्देश्य, विशेष आशय।
खर कौं कहा अरगजा लेपन मरकट भूषन अंग-१-३३२।
(क) यौं लपटाइ रहे उर उर ज्यौं मरकत मनि कंचन मैं जरिया-६८८।
(ख) करौं न अंजन धरौं न मरकत मृगमद तनु न लगाऊँ-2१५०।
दला-मला, मसला या गींजा हुआ।
दली-मली, मसली या गींजी हुई।
(क) अंग मरगजी पटोरी राजति-१२३२।
(ख) नागरि अंग मरगजी सारी-१५६७।
(ग) सीधे अरगजी अरु मरगजी सारी-१५८२।
दला-मला, मसला या गींजा हुआ।
(क) सूरदास प्रभु प्यारी राजत आबत भ्राजत बने हैं मगजे बागे-पृ. ३१५ (४९)। ,
(ख) सिथिल अंग मरगजे अंबर अतिहिं रूप भरे-१९२१।
(ग) हरबराइ उठि आइ प्रात तें बिथुरो अलक अरु बसन मरगजै-११८३।
वह घाट या स्थान जहाँ मुर्दे फूँके जाते हों, श्मशान, मसान।
बिनती करत मरत हौं लाज-१-९६।
मरत असुर चिकार पारयौ-४२७।
(क) सौ जोजन मरजाद सिंधु को पल मैं राम बिलोयौ-१-४३।
(ख) मनु मरजाद उलंबि अधिक बल उमँगि चली अति सुंदरताई-६१६।
आइ सृगाल सिंह बलि चाहत यह मरजाद जात प्रभु तेरी-९.९३।
कलि-मरजाद जाइ नहिं कही-१-२३०।
जो भरने के समीप हो, मरणासन्न।
पृष्ट कौ गर्दि मरदि कै चानूर चुरकुट करयौ2६०९
तात मरल सिय हरन राम बन-बपु धरि बिपति भरै-१-२६४।
(किसी के लिए ) मरना - बहुत दुख सहना।
(किसी पर) मरना - आसक्त होना।
मरना पचना - बहुत दुख सहना।
(किसी) बात पर (के लिए) मरना - किसी कारण बहुत दुख सहना।
अत्यधिक लज्जा या संकोच होना।
सजीवता या तेजी न रह जाना।
पानी मरना - पानी का दीवार या नींव आदि में घँसना।
(२) दोष या कलंक आना।
खेल में गोटी या गुइयाँ का पिटना या हारना।
वेग का दबना या शाँत होना।
मरने की क्रिया या भाव, मरण।
तातैं साध-संग नित करना। जातैं मिटै जन्म अरु मरना-३-१३।
मरता, मृत्यु को प्राप्त होता।
पुनि जीतौ पुनि मरतौ-१-२०३।
अध मरदन बक बदन बिदारन-९५४।
मति भई मरनी-मरने की इच्छा हुई।
सूर प्रभु के बचन सुनत, उगिनि कहयौ, जाहि अब क्यौं न, मति भई मरनी-५५१।
मृत्यु पर किया जानेवाला क्रिया-कर्म।
अपने मरबे ते न डरत है पावक पैठिजरै-2८०८।
(क) मैं मतिहीन मरम नहिं जान्यो परयौं अधिक करि दौर-१-४६।
(ख) खोजत नाल किती जुग गयौ। तौहू मैं कछु मरम न लयौ २.३७।
तत्व या रहस्य जानना-समझना।
टूटी-फूटी चीज को ठीक करने की क्रिया या भाव।
दवा की तरह घाव पर लगाया जानेवाला गाढ़ा लेप।
जादवन को प्रलय सुनि वे मरहिंगी अकुलाइ-११-४।
प्रथमहिं कमल कंस कौं दीजै डारहु हमहिं मराई-५३८।
(क) मनौ मधुर मराल-छौना किंकिनी कल राव-१०-३०७।
(ख) मनौ मधुर मराल छौना बोलि बनै सिहात-१०.१८४।
खूझा मरुआ कुद सौं कहै गाद पसारी-१८२२।
कंचन खंभ मयारि मरुआ (मरुवा) डाँड़ी खचित हीरा बिच लाल प्रबाल-१०.८४।
मनौं हौं ऐसे ही मरि जैहौं-2५५०।
इहिं लाजनि मरिऐ सदा, सब कोउ कहत तुम्हारी (हो)-१-४४।
(क) सप्तम दिन मरिबौ निरधार-१-२९०।
(ख) एक दाइँ मरिबो नंदनंदन के काजनि २८७२।
(क) मरियत लाज पाँव पतितनि मैं हौं अब कहौ घटि कातैं-१-१३७।
(ख) इनि बातनि के मारे मरियत-३२०२।
लाजन मरियै - अत्यंत ही लज्जित होइए।
उ. - करियै कहा लाजन मरियै जब अपनी जाँघ उधारी-१-१७३।
मरेंगे, मृत्यु को प्राप्त होंगे।
मो देखत लछिमन क्यौं मरिहैं मोकौं आज्ञा दीजै-९-१४८।
भऐं अपमान उहाँ तू मरि-४-५।
जो मरिहौं तो सुरपुर जैहौं-६-५।
ऐसौ चरित तुरतही कीन्हौं कुँवरि हमारी मरी जिवाई-७६१।
एक ऋषि जो ब्रह्मा के मानसिक पुत्र और सप्तर्षियों में एक माने गये हैं।
ब्रह्मा सुमिरन करि हरि नाम। प्रगटे रिषय सप्त अभिराम। भृगु, मरीचि, अंगिरा बसिष्ठ। अत्रि, पुलह, पुलस्त्य अति सिष्ठ-३-८।
एक ऋषि जो कश्यप के पिता थे।
रिषि मरीचि कश्यप उपजायौ-३-९।
मरुव, मरुवा, मरुवो, मरुवौ
फूले बेल निवारी फूल मरुवो मोगरो सेवती-2४०५।
मरुव, मरुवा, मरुवो, मरुवौ
लकड़ी जिसमें हिंडोला लटकाया जाता है।
कंचन के खंभ मयारि मरुवा डाँड़ी खचित हीरा बिच लाल प्रबाल-१०-८४।
मृत्यु को प्राप्त होऊँगा।
रामचंद्र के हाथ मरूँगौं परम पुरुष फल जान्यौ-सारा. २६३।
मरु करि (करि कै) - बड़ी कठिनता से।
मरूर, मरूरा, मरूरो, मरूरौ
मरूर (मरूरो या मरूरौ) देना - ऐंठना, उमेठना।
दियौ मरूर - ऐंठ, उमेठ या मरोड़ दिया।
उ. - मुख पर पवन परस्पर सुखवत गहे पानि पिय जूरो। बूझति जानि मन्मथ चिनगी फिरि मानो दियौ मूरूर-2२८५।
अति प्रचंड पौरुष बल पाऐं केहरि भूख मरै-१.१०५।
रुद्र भगवान अरु बान सांबुक भिरे कुंभाउ माँड़ी लराई-१० उ.-३५।
(क) या छबि की पटतर दीबे कौं सुकबि कहा टकटो है? देखत अंग-अंग-प्रति बानक, कोटि मदन-मन छोहै-१०-१५८।
(ख) तुमहीं देखि लेहु अँग बानक एते पर क्यौं सही परै-2०१७।
(ग) एक बयक्रम एकहिं बानक रूप-गुन की सींव-2०७२।
(घ) आयु बिषमता तजि दोऊ सम भ बानक ललित त्रिभंग-३३२७।
किसी बात का निश्चय करता या ठानता है।
मेरे हृदय नाहिं आवत हौ, हे गुपाल, हौं इतनी जानत। कपटी, कृपन, कुचील,कुदरसन, दिन उठि बिसय बासना बानत-१-२१७।
याहि लागि को मरै हमारे बृंदाबन चरनन सौं ठेली-३१४४।
ऐंठने या उमेठने की क्रिया या भाव।
मरोड़ खाना - चक्कर खाना।
मन में मरोड़ करना - कपट या दुराव करना।
मरोड़ की बात - छल कपट या घुमाव फिराव की बात।
मरोड़ खाना - उलझन में पड़ना।
अंग मरोड़ना - अँगड़ाई लेना।
दृग या भौंह मरोड़ना - (१) आँख से इशारा करना।
(२) नाक - भौं चढाना।
ऐंठकर तोड़ देना या नष्ट कर देना।
हाथ मरोड़ना - हाथ मलना या पछताना।
पेट की पीड़ा जिसमें ऐठन सी जान पड़ती है।
भौंह मरोरत - नाक-भौं चढ़ाता है।
उ. - बदन सकोरत भौंह मरोरत नैननि मैं कछु टोना-१०३७।
(क) घीचि मरोरि दियौ कागासुर मेरैं ठिग फटकारी-१०-६०।
(ख) बाँह मरोरि जाहुगे कैसे मैं तुमको नीके करि चीन्हे-१५०७।
गुदी चाँपि लै जीभ मरोरी-१०-५७।
करत मरोरो - खींचातानी करता है। उ. - नख शिख लौं चित चोर सकल अँग चीन्हें पर कत करत मरोरी-१५०६।
भौंह मरारै - आँख से कनखी मारता है। उ. - भौंह मरोर मटकि कैसे जमुना रोकत घाट-2४१३।
(क) तेल लगाइ कियौ रुचि मर्दन-१-५२।
(ख) आदर बहुत कियौ जादव पति मर्दन करि अन्हवायो-१० उ०-६५।
शरीर में तेल, उबटन आदि मलना या लगाना।
(क) अति सुगंध मर्दन अँग-अँग, ठनि बनि-बनि भूषन भेषति।
(ख) अँग मर्दन करिबे कौ लागी उबटन तेल धरी-पृ.३३९ (८६)।
द्वंद्व युद्ध में परस्पर घस्सा लगाना।
अधमर्दन विधि गर्बहत करत न लागी बार-४३७।
मरोड़यो, मरोड़यौ , मरोरयो, मरोरयौ
भौंह मरोरयौ - नाक-भौं चढ़ायी।
उ. - अधर कंप रिस भौंह मरोरयौ मन ही मन गहरानी-१८६५।
गिरि कर धारि इन्द्र मद मर्द्यौ दासति सुख उपजाए-१-२७।
(क) प्रेम के सिंधु कौ मर्म जान्यौ नहीं, सूर कहा भयौ देह बोरैं-१-२२२।
(ख) ताकौ कछू न पायौ मर्म-१२१२।
शरीर का वह स्थान जहाँ चोट पहुँचने से अधिक पीड़ा होती है।
भेद या रहस्य का जाननेवाला।
गूढ़ाशय या तत्व समझने्वाला।
हृदय पर आघात पहुँचानेवाला।
हृदय पर आघात करने या चोट पहुँचानेवाला।
हृदय पर आघात पहुंचाने वाली बात।
हृदय, कंठ आदि कोमल अंग जहाँ चोट लगने से प्राणी मर तक सकता है।
हृदय को छूनेवाला, मार्मिक।
(क) मनहु प्रेम समुद्र सूर सुख लै उपटित मर्याद-2४०७।
(ख) मनहुँ सूर दोउ सुभग सरोवर उमँगि चले मर्यादा डारि-2७९५।
(क) सूर स्याम मिलि लोक बेद की मर्यादा निदरी-पृ० ३३६ (५०)।
(ख) पय पीवत जिन हती पूतना स्रुति-मर्यादा फोरी-2८६३।
सदन जाहु मर्यादा है कह्यौ न काहे मानति-पृ. ३१७ (६२)।
जातुधानि-कुच-गर मर्षत तब तहाँ पूनँता पाई-१-२१५।
घुसललान साधुओं का एक वर्ग।
राख्यो हो जठर महिं स्रोनित सौं सानि। जहाँ न काहू कौ गम, दुसह दारुन तम, सकल बिधि अगम खल मल खानि-१-७७।
रुविर मेद मल-मूत्र कठिन कुच उदर-गंध गंधात-2 २४।
एक तरह का बढ़िया महीन कपड़ा।
वह मास जिसमें संक्रांति न पड़े; इसे 'अधिक मास' भी कहते हैं।
एक पर्वत जो पशिचपी घाट में है और जहाँ चंदन बहुत होता है।
जद्यपि मलय बृच्छ जड़ काटै कर कुठार पकरै। तऊ सुभाव न सीतल छाँड़े, रिपु-तन-जाप हर-१-११७।
निंदत मूढ़ मलय चंदन कौं, राख अंग लपटावै-2-१३।
पश्चिमी घाट का वह पर्वत जहाँ चंदन अधिक होता है।
मलय पर्वत जो पशिचमी घाट में है और जहाँ चंदन बहुत होता है।
मलय पर्वत से आने वाली वायु।
मल या दोष में रुचि रखने वाला।
वा पट पीत की फहरानि। कर धरि चक्र चरन की धावनि नहिं बिसरति वह बानि-१-२७९।
करति कछु, न कानि, बकति है कटु बानि निपट निलज बैन बिलख हूँ।
(क) जित देखति तित कोऊ नाहीं, टेरि कहति मृदु बानी-१-२५०।
(ख) गर्ग कही यह बानी-१०२५६।
डंडा जिस पर चढ़ और उतर कर कसरत की जाती है।
[सं. मल्ल+हिं. खंभा, हिं. मलखम]
दलना-मलना-(१) पीसकर चूर्ण करना।
(२) रगड़ना, मसलना।
हाथ मलना-(१) पछताना।
(२) क्रोध प्रकट करना।
क्रोध या आवेश में हाथ से रगड़ना।
साज्यौ दही अधिक सुखदाई। ता ऊपर-पुनि मधुर मलाई-2३२१।
मलने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
मुरली मलार बजावहिंगे-2८८९।
गावत मलारी सुराग रागिनी गिरिधरन लाल छवि सोहनो-2२८०।
(क) तेल लगाइ कियो रुचि मर्दन बस्तर मलि मलि धोए-१-५२।
(ख) हंस उज्जल' पंख निर्मल अंग मलि माल न्हाहिं-१-३३८।
पिउ पद-कमल को मकरंद। मलिन मति मनमधुर परिहरि, बिषय नीरस मंद-९-१०।
भजन बिनु जीवत जैसे प्रेत। मलिन मंदमति डोलत घर-घर उदर भरन कै हेत-2-१५।
प्राची अरुनानी धानि किरनि उज्यारी नभ छाई उडुगन चंद्रमा मलिनता लई-पृ. ३०० (८)।
जमुना पुलिन मल्लिका मनोहर सरद सुहाई जामिनी-१७३४।
सूरदास-प्रभु सोए कन्हैया हलरावति मल्हरावति है-१०-७३।
(क) मिली कुबिजा मलै लैकै सो भई अरधंग-2६७२।
(ख) मृग-मद मलै परस तनु तलफ़त जनु बिषम बिष पिए-३४५९।
मलोला (मलोले) आना - दुख या पछतावा होना।
मलोला (मलोले) खाना - दुख सहना।
दिल का मलोला (के मलोले) निकालना - बकझक कर दुख दूर करना।
(क) रजक मल्ल चानूर दवानल दुखभंजन सुखदाई-१-१५८।
(ख) कुवलिया मल्ल मुष्टिक चानूर से कियो मैं कर्म यह अति उदासा-2५५१।
(क) दरस मलीन दीन दुरबल अति तिनकौं मैं दुखदानी-१-१२९।
(ख) अति मलीन बृषभ सुकुमारी-३४२५।
बिधु मलीन रवि प्रभास गावत नर-नारी-१०-२०२।
मलिन’ होने का भाव, मैलापन।
बालकेलि गावति मल्हावति सुप्रेम भर-१०-१५१।
जसोदा हरि पालनैं झुलावै। हलराबै, दुलराइ मल्हावै जोइ-सोइ कछु गावै-१०-४३।
सामान।
पीक्ष।
दिल का गुबार।
पेड़ जो दुर्ग के प्राकार पर होते हैं।
मवासी तोड़ना - (१) किला तोड़ना।
(२) जीतना, विजय पाना।
गोरस चुराइ खाइ बदन दुराइ राखै मन न धरत बृंदावन कौ मवासी-१०४४।
किले के प्राकार पर लगे वृक्ष।
जहाँ तहाँ होरी जरै हरि होरी है। मनहुँ मवासे आगि अहो हरि होरी है-2४२३।
भूमि मशान बिदित ए गोकूल मनहु धाइ खाइ-2७००।
(क) देवराज मष भंग जानि कै बरष्यो ब्रज पर आई-१-१२२।
(ख) सगरराज मष पूरन कियौ-९-९।
[सं. मष्ठ, प्रा. मष्ट =मटठा]
मष्ट करना - चुप रहना, मुँह न खोलना।
मष्ट करि ( करु ) - चुप रह, बोल मत, मुँह मत खोल।
उ. - (क) मष्ट करू, हँसैगे लोग, अँकवारि भरि भुजा पाई कहाँ स्याम मेरै-१०.३०७।
(ख) सुनिहैं लोग मष्ट अबहूँ करि, तुमहिं कहाँ की लाज-७७५।
मष्ट करो (करौ) - चुप रहो, बोलो मत।
उ. - अबला कहा दशा दिगंबर, मष्ट करौ पहिचाने-३००६।
मष्ट धारना - चुप्पी साधना।
रहौ मष्ट धारे - चुप रहो, मौन साधो।
उ. - कहा पिय कहत सुनिहै बात पौरिया, जाय कैहै, रहौ मष्ट धारे-2६२४।
मष्ट मारना - चुप रहना।
मूँछ निकलने के पहले की रोमावली।
मस भींजना (भीजना) - (१) मूछ की रेखा दिखाई पड़ना।
(२) युवावस्था आना।
छूछी मसक पवन पानी ज्यौं तैसेई जन्म विकारी हो।
बाहर करते है, निकालते हैं।
अलग करते हैं, (समाज से) पृथक् करते हैं।
कह्यो, हम जज्ञ-भाग नहिं पावत। वैद्य जानि हमकौं बहरावत-९-३।
बहलाती या भुलावे में डालती है।
बातै बूझति यौं बहरावति-३४८५।
वल्लभसंप्रदायी मंदिरों के छोटे कर्मचारी जो मंदिर के बाहर रहते हैं।
माला-तिलक मनोहर बाना लै सिर छत्र धरै-६-६।
बुनावट का तागा जो आड़े ताने में भरा जाता है, भरनी।
(किसी वस्तु के लिए) मुँह बाना - उसे प्राप्त करने की इच्छा होना।
बाण चलाने की विद्या या रीति।
[हिं. बाण + फा. प्रत्य. आवरी]
(क) निरखि पतंग बानि नहि छाँड़त, जदपि जोति तनु तावत-१- २१०।
(ख) सबै जोरि राखति हित तुम्हरैं मैं जानति तुम बानि-४९४।
(ग) इहै करिहौं और तजिहाँ परी ऐसी बानि-८९५।
(घ) सूपनखा ताड़का सँहारी स्याम सहज यह बानि।
तुम कब मासौं पतित उधारयौ। काहे को प्रभु बिरद बुलावत बिन मसकत को तारयौ-१-१३२।
खिंचाव या इबाव से कपड़े के तंतु तोड़ना।
खिंचाव या दबाव से कपड़े के तंतु टूटना।
वरन मसकि धरनी दली उरग गयौ अकुलाइ-५१९।
लंपट ढीठ, गुमानी ढूँडक महा मसखरा रूखा-१-१८६।
मुसलमानों का नमाज पढ़ने का स्थान।
अमीरों के बैठने की गद्दी।
एक स्थान पर एक मास रहने वाला (साधु)।
एक व्यक्ति के पास एक मास रहनेवाली (वेश्या)।
लेख का पहला या कच्चा रूप।
मच्छरों से बचने के लिए पलँग के चारों ओर लटकायी जाने वाली जाली (जालीदार कपड़ा)।
शरीर पर उभरा हुआ मूँग, सरसों या बेर के बराबर दाना।
मसान जगाना - श्मशान पर बैठकर शव या मुरदे की सिद्धि करना।
मसान जगायो (जगायौ) - श्मशान पर शव की सिद्धि की या करने लगे।
उ. - हम तौ जरि-बरि भस्म भए तुम आनि मसान जगायौ-६०६३।
मसान पड़ना - बहुत सन्नाटा हो जाना।
श्मशान वासिनी, डाकिनी, पिशाचिनी आदि।
पुहुमि पत्र करि सिंधु मसानी गिरि मसि कौं लै डारै-१-१८३।
(क) कागद धरनि करै द्रुम लेखनि जल-सायर मसि घोरै-१-१२५।
(ख) लोचन-जल कागद मसि मिलिकै हवै गई स्यामस्याम की पाती-2९७७।
काजल का टीका या दिठौना जो नजर से बचाने के लिए बच्चों के मुख पर लगाया जाता ह।
उर बधनहा कंठ कठुला झँडूले बार। बेनी लटकन मसिबुन्दा मुनिमनहार।
काजल का टीका या दिठौना जो बच्चों को नजर से बचाने के लिए उनके मुख पर लगाया जाता है।
मसू करके - बड़ी कठिनाई से।
दाँतों के ऊपर-नीचे का माँस।
मूँग मसूर उरद चनदारी-३९६।
अरु तैसियै गाल मसूरी-१०-१८३।
कीजै कहा चाव अपनी कत इहाँ मसूसन भरिए-2२७५।
रावन के दस मस्तक छेदे सर गहि सारँगपानि-१-१३५।
मस्ती उतरना (झड़ना)-मस्ती दूर होना। मस्ती उतारना (झाड़ना)-मस्ती दूर करना।
घुटुरुनि चलत अजिर महँ बिहरत-१०-९७।
पहिरि बिबिध पट मोलन महँगा-2४०२।
(क) मथतिं नंद-गृह सहस मथानी। ताकैं सुत चोरी की बानी-३९।
(ख) यह नहिं भली तुम्हारी बानी-१००१।
अंगीकृत या ठानी हुई रीति या चाल।
(क) जानिहौं अब बाने की बात। मोसौं पतित उधारौ प्रभु जौ, तौ बदिहौं निज तात-१-१७९।
(ख) असुर-सँहारन, भक्तनि-तारन, पावन पतित कहावत बाने-३८०।
अंग-अंग सब सुभट सहायक बने बिबिध भूषन बाने बर-१९०६।
इनके गुन कैसे कोउ जानैं। औरै करत-और धरि बानै-७९९।
बाना' नामक हथियार फेरनेवाला।
[हिं. बान + ऐत (प्रत्य.)]
[हिं. बान + ऐत (प्रत्य.)]
[हिं. बान + ऐत (प्रत्य.)]
(क) बाजि मनोरथ, गर्ब मत्त गज, असत-कुमत रथ-सूत। पायक मन, बानैत अधीरज, सदा दुष्टमति दूत-१-१४१।
(ख) जहाँ बरन बरन बादर बानैत अरु दामिनि करि करि बार-१० उ०-2।
सदा प्रबीन हमारे तुम हौ तुमतैं नहीं महंत-2९२१।
(क) ऐसौ को अपने ठाकुर कौं इहि बिधि महत घटावै-१-१९२।
(ख) बचन कठोर कहत कहि दाहत अपनो महत गवाँवत-३००८।
आए हरि यह बात सुनतहीं धाइ लए जसुमति महतरिया-१०-२४६।
महतारी सुत दोउवै मग रोकत जाइ-१०७०।
मातु पितु गुरु जननि जान्यो भली खाई महति-११८९।
बृंदाबन ब्रज कौ महतु कापै बरन्यौ जाइ।
जो कोउ काज करै बिन बूझे पेलि महत्त हरी री.-पृ. ३२७ (६७)।
पचीस तत्वों में से तीसरा जिससे अहंकार की उत्पत्ति होती है।
त्रिगुन प्रकृति तै महत्तत्व महत्तत्व तैं अहंकार-2-३६।
नाच-रंग या मनोविनोद का स्थान।
जाकै संग सेत बँध कीन्हौं अरु जीत्यौ महभारथ-१-२८७।
एक आदरसूचक शब्द या संबोधन।
श्रीकृष्ण के पालक नंद जिनके लिए सम्मान सूचक शब्द 'महर' का प्रयोग किया जाता है।
पहुँचे जाइ महर मंदिर मैं मनहिं न संका कीनी-१०-४।
(ख) माखन-मधु-मिष्टान्न महर लै दियौ अक्रूर के हाथ-३५३४।
राजा सौं अर्जुन सिर नाइ। कह्यौ, सुनौ बिनती महराइ-१-२८६।
(क) गोकुल मैं आनंद होत है मंगल धुनि महराने टोल-१०-९४। (ख) तुमको लाज होत की हमको बात पर जो कहुँ महराने-११३६।
स्त्रियों के लिए एक आदरसूचक संबोधन।
यशोदा जिनके लिए आदरसूचक 'महरि' का प्रयोग बराबर किया गया है।
(क) जागी महरि पुत्र-मुख देख्यौ, आनंद तूर बजायौ-१०-४।
(ख) महरि पुत्र कहि सोर लगायो तरु ज्यों धरनि लुटाइ-2५३३।
श्रीकृष्ण जो नंदमहर के पुत्र थे।
राधा जो बृषभानु महर की पुत्री थी।
सुनत बुलाइ महल ही लावै सुफलक-सुत गयौ धाइ-2४६५।
सुन्दर छोटा महल, महल जैसी सुन्दर कुटी।
एक अनूपम भाल बनावति एक परस्पर बेनी गूँथति भ्राजत कुंज-महलियाँ-2०७२।
कोटिक करै एक नहिं मानौ सूर महा कृतधन कौं-१-९।
बहुत अधिक शोर, कोलाहल या हलचल।
मथने का काम, भाव या मजदूरी।
अंगीकृत धर्म, रीति या स्वभाव।
(क) राम भक्त - बत्सल निज बानौ। जाति, गोत, कुल, नाम गनत नहिं रंक होय कै रानौ-१-११।
(ख) भक्तबछल बानौ है मेरौ, बिरुदहिं कहा लजाऊँ-१०- ४।
(क) बीचहिं बोलि उठे हलधर तब याके माय न बाप-१०- २१४।
(ख) बड़े-बाप के पूत कहावत, हम वै बसत इक बगरी-१०- ३१९।
बाप - दादा-पूर्वज।
बाप तक जाना - माँ-बाप को गाली देना।
बाप बनाना - (१) आदर करना।
(१) चापलूसी करना।
बाप-माँ - पालक, रक्षक।
बड़ा चौड़ा कुआँ या जलाशय, वापी, बावली।
नैन कमल-दल बिसाल, प्रीति-बापिका-मराल, मदन ललित बदन उपर कोटि वारि डारे-१०- २०५।
सागर-सूर बिकार भरयौ जल, बधिक अजामिल बापी-१-१४०।
वै जलहर हम मीन बापुरी कैसे जिवहिं निनारे-१० उ.-८३।
देखौ प्रीति बापुरे पसु की आन जनम मानत नहिं हारि-१८४६।
(क) कहाँ महाउर पाग रँगाई यह सोभा इक न्यारी-१९९१।
(ख) चंचल अंचल कतहिं दुरावति रूप रासि अति मानहु मोन महाउर धोए-2११२।
वह समय जिसमें एक ब्रह्मा की आयु पूरी होता है।
शिव का वह स्वरूप जिससे वे सृष्टि का अंत करते हैं।
महाकाल-रूप शिव की पत्नी जिसके पाँच मुख और आठ भुजाएँ मानी गयी हैं।
वह सर्गबद्ध प्रबंध काव्य जिसमें सभी रसों, ऋतुओं और प्राकृतिक दृश्यों का वर्णन हो।
स्थायी महत्व का श्रेष्ठ काव्य।
रुपये-पैसे का लेन-देन करने वाला।
भलामानुस, सदाचारी व्यक्ति।
मलय तनु मिलि लसति सोमा महाजल गभीर।
सूर प्रभु बस किये नागरि महाजाननिराइ-१७७३।
पचीस तत्वों में तीसरा जिससे अहंकार की उत्पत्ति होती है।
त्रिगुन तत्व ते महातत्व, महातत्व ते अहंकार। मन इंद्रिय सब्दादि पंची ताते किए बिस्तार।
(क) सब सुख निधि हरि नाम महातम पायौ है नाहिंन पहिचानत।
(ख) कमलनैन कौं छाँड़ि महातम और देव कौं ध्यावै-१-१६८।
चौदह भुवनों में पाँचवाँ जो पृथ्वी के नीचे है।
अतल बितल अरु सुतल तलातल और महातल जान। पाताल और रसातल मिलि सातौ भुवन प्रमान-सारा. ३१।
जिसका आशय, आचरण आदि उच्च हो।
ब्रह्मा महादेव तैं को बढ़ तिनकी सेवा कछु न सुधारी-१-३४।
तहँ राजत निज वीर शेषनाग ताकें तर कूरम बरात महाधन धीर-सारा. ३२।
ब्रज-जन-मन कौ महान संतन सुख दिए-४५०।
एक मंत्र जिससे शत्रु के शस्त्र व्यर्थ किये जाते हैं।
हरि सीता लै चल्यौ डरत जिय मानौं रंक महानिधि पाई-९-५९।
परिनिर्वाण जिसके अधिकार केवल बुद्ध गण माने जाते हैं।
महानुभाव निकट नहिं परसे जान्यौ न कृत विधात्र-१-२१६।
महा ब्राह्मण जो मृतक-कर्म का दान लेता है।
महापुरुष सब बैठे देखत केस गहत धरहरि न करी-१-२४९।
नगर या राजप्रासाद के रक्षकों या प्रतिहारों का प्रधान।
बल्लभाचार्य जी की एक उपाधि।
वह काल जब सारी सृष्टि का विनाश होकर केवल जल ही रह जाता है।
अरु पुनि महाप्रलय जब होइ। मुक्ति स्थान पाइहै सोह-४-९।
जगन्नाथ जी का चढ़ा हुआ भात।
देवनागरी वर्णमाला के प्रत्येक वर्ग का दूसरा और चौथा वर्षा (ख, घ, छ, झ, ठ, ढ, थ, ध, फ और भ) जिसके उच्चारण में प्राणवायु का विशेष व्यवहार किया जाता है।
अर्जुन भीम महाबल जोधा-१-२५४।
धरि अवतार महाबल काऊ एकहिं कर मेरो गर्व हरयौ-१०-५९।
वह ब्राह्मण जो मृतक-कर्म का दान ले।
एक प्राचीन भारतीय महाकाव्य।
कौरवों-पांडवों का महायुद्ध।
पंचतत्व-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश।
सम करि गनै महामनि काँचै-2-११।
बौद्धों के तीन संप्रदायों में एक।
जिसका प्रारम्भ कठिनता से हो।
स्पंदन खंडि महारथि खंडौं कपि-ध्वज सहित गिराऊँ-१-२७०।
मदनदूत मोहिं बात सुनाई इनमैं भरचौ महारस भारो-११२२।
लीजै पार उतारि सूर कौं महाराज ब्रजराज-१.१०८।
आचार्य आदि पूज्य व्यक्तियों के लिए आदरसूचक संबोधन।
मेवाड़, चित्तौड़ और उदयपुर के राजाओं की उपाधि।
जैसलमेर, डूँगरपूर आदि राज्यों के राजाओं की उपाधि।
दक्षिणी महाराष्ट्र का निवासी।
माघ पूस या जाड़े की वर्षा।
(क) मानहुँ चंद महावत मुख पर अंकुस बेसरि लावै-८७६।
(ख) माथे नहीं महावत सतगुरु अंकुस ध्यान कर टूटौ-३४०१।
लाख से बना लाल रंग जिससे सौभाग्यवती स्त्रियों पैर रँगती-रँगाती है, यावक।
नाइनि बोलहु नवरंगी (हो) ल्याउ महावर बेग-१०.४०।
महावर' की टिकिया जिससे सौभाग्यवती स्त्रियां पैर रँगती-रँगाती हैं।
जैनियों के चौबीसवेँ और अंतिम जिन या तीथँकर जिन्होंने ईसा से ५२७ वर्ष पूर्व निर्वाण प्राप्त किया था।
राख्यौ हो जठर महिं स्रोनित सौं सानि-१-७६।
(क) डोलत महि अधीर भयौ फनिपति-९-२६।
(ख) गरू भए महि मैं बैठाए-१०-७८।
(क) और कौन समान त्रिभुवन सकल गुन जेहि महिआँ-१७०२।
(ख) कहत-सुनत समुझत मन महिआँ ऊधौ बचन तुम्हारे-३०३६।
(क) कहन लागे मोहन मैया-मैया। नंद महर सौं बाबा बाबा, अरु हलधर सौं भैया-१०-१५५।
(ख) मोसौं कहौ बात बाबा यह, बहुत करत तुम सोच-बिचार-५३०।
साधु के लिए आदरसूचक संबोधन।
बच्चों के लिए प्यार का संबोधन या शब्द।
(क) जासु महिमा प्रगटि केवट धोइ पग सिर धरन-१-३०८।
(ख) सुक की महिमा सुक ही जानै-१-३४१।
(ग) तै सिव की महिमा नहिं लही-४-५।
(क) बिडरति फिरतिं सकल बन महियाँ-६१२।
(ख) सूरदास प्रभु तुमरे दास को आनँद होत ब्रज महियाँ-१००१।
(ग) खेलत हँसत गए बन महियाँ-2३६७।
(घ) कबहुँ कहत वा मुरली महियाँ लै लै बोलत हमरौ नाउँ-३४४८।
रावण का एक पुत्र जो पाताल में रहता था।
तुम्हें मारि महिरावन मारैं देहिं बिभीषन राई-९-१४०।
एक राक्षस जिसे दुर्गा ने मारा था।
एक राक्षस जिसे दुर्गा ने मारा था।
पृथ्वी का पुत्र मंगल ग्रह।
महिसुत गति तजि जलसुत गति लै सिंधु-सुता-पति भवन न भावै-2२४५।
जज्ञ मैं करत तब मेघ बरसत मही-४-११।
(क) ऐसी तू है चतुर बिबेकी पय तजि पियत मही।
(ख) छिरकि लरिकनि मही सौं भरि ग्वाल दए चलाइ-१०-२८९।
(ग) खाटी मही कहा रुचि मानै सूर खवैया घी को-३२५१।
महीन काम - बहुत कारीगरी का काम।
भागधपति बहु जीति महीपति कछु जिय मैं गरबाए-१-१०९।
भाग्य-भवन मैं मकर महीसुत बहु ऐस्वर्य बढ़ैहैं-१०-८६।
डफ बासुरी अरु महु अरि बाजत ताल मृदंग-2३९९।
[सं. महोत्सव, प्रा. महोच्छव]
सूर स्याम जानि चतुराई जेहि अभ्यास महुवरि को।
दही में चावल या आटा पकाकर बनाया जाने वाला एक व्यंजन।
मधुर महेरि सो गोपन प्यारी।
महोच्छव, महोछ, महोछा, महोत्सव
बरस दिवस को महा महोत्सव को आवै को कौन सुनाई-९१३।
(क) प्रगट प्रताप ज्ञान गुरु गम तैं दधि मथि घृत लै तज्यो मह्यौ-2-८।
(ख) मैं मतिहीन मर्म नहिं जान्यौ भूलो मथत महयौ-2८९४।
(क) दोउ भैया जेंवत माँ आगे।
(ख) परसुराम सौं यौं कही माँ कौ बेगि सँहार-९-१४।
सिन के बालों को काढ़कर निकाली गयी रेखा, सीमंत।
माँग-चोटी-केश शृंगार। माँगजली-विधवा।
माँग - कोख से सुखी रहना (जुड़ाना) - स्त्री का सौभाग्य और संतानवती होना।
माँग - पट्टी करना - केशों का शृंगार करना।
माँग पारना (बाँधना) - बाल सँवारना।
(क) माँगत है सूर त्याग जिहिं तन-मन-राता-११२३।
(ख) उलटे न्याउ सूर के प्रभु के बहे जात माँगत उतराई-३०५८।
(क) हरि कहयौ जज्ञ करत तहँ बाम्हन। जाहु उनहिं ढिग भोजन माँगन-८९६।
(ख) परमहंस बिहंग देखतहिं आवत भिक्षा माँगन-३००१।
शुभ अवसर पर गाया जानेवाला गीत।
माँगि पठैहै-मँगवा भेजेगा।
जब चहिहै तब माँगि पठैहै जो कोउ आवत जातो-३१२२।
मुँह माँगे-फल जो तुम पावहु तौ तुम माँनहु मोहिं-९१५।
कामना पूरी करने के लिए याचना करता है।
भक्त अनन्य कछु नहिं माँगै-३-१३।
(क) राजा जल ता रिषि सौं माँग्यौ-१.२९०
(ख) मोहन माँग्यौ अपनो रूप-३१८२।
जो तुम मुँह माँग्यो फल पावहु-१०१६।
माँछर, माँछरी, माँछल, माँछली
रगड़ रगड़कर शरीर के अंगों का मैल छुड़ाना।
‘छैला' बने घूमने वाले लापरवाह व्यक्ति के लिए संबोधन (व्यंग्य)।
बाम कर सौं पकरि, गरुड़ पर राखि हरि, छीर कैं जलधि तट धर्यौ ल्याई-८- ८।
गंगा तट आए श्री राम। तहाँ पषान रूप पग परसे, गौतम रिषि की बाम-९-२०।
तीनि जने सोभा त्रिलोक की, छाँड़ि सकल सुरधाम। सूरदास-प्रभु-रूप चकित भए, पंथ चलत नरबाम-९- ४४।
पहली वर्षा का फेन जो मछली के लिए मादक माना जाता है।
(क) सभा माँझ द्रौपदि पति राखी-१-११३।
(ख) गोकुल माँझ जोग बिस्तारयौ-2९८२।
(ग) सो यह परम उदार मधुप ब्रज बीथिन माँझ बहायौ-2९९८।
(घ) जाप हृदय माँझ हरी-३२००।
वे पीले कपड़े जो वर-वधू को विवाह के दो-तीन दिन पहले हल्दी चढ़ाने पर पहनाये जाते हैं।
पतंग की डोरी को पैना बनाने के लिए बढ़ाया जानेवाला कलक।
डोरी जिस पर यह कलफ चढ़ा हो।
'बाल' में से अनाज के दाने झाड़ना।
अँगिया नील माँड़नी राती निरखत नैन चुराई-१७३९।
(ख) नील कंचुकी माँड़नि लाल। भुजन नवै आभूषन माल-१८२०।
झगड़े का बीच-बचाव करनेवाला।
मानौ नील माँट महँ बोरे लै जमुना जु पखारे।
पकाये हुए चावल या भात का लसदार पानी।
सुनहु सूर हम सों हठ माँडति कौन नफा करि लैहौ-१११८।
बाल' से अन्न के दाने झाड़ना।
एक मुख माँड़हि कुमकुमा मिलि झूमक हो-2४१०।
उ.-और मंत्र कछु डर जनि आनौ आजु सुकपि रन माँड़हि।
किसी अन्न की 'बाल' से दाने झाड़कर।
माँड़ि माँड़ि खरिहान क्रोध कौ पोता भजन भरावै-१-१४२।
रुद्र भगवान अरु बान सांबुक भिरे राम कुंभाउ माँड़ी लराई-१० उ-३५।
सुन री कुल की कानि ललन सों मैं झगरौ माँड़ौगी-१५११।
काकी भूख गयी बयारि भखि बिना दूध-घृत-माड़े।
देखा मैं बालक-बत छाँड़या। एक कहत अंगन दनि माँड़यो-१०५१।
आए भाग द्वारका नीके रच्यो माँड़यो छाय। ब्याह केलि बिधि रची सकल मुख सौंज गनी नहिं जाय।
विवाहादि शुभ कार्यों के लिए छाया जानेवाला मंडप।
एक ऋषि जिन्हें बाल्यावस्था के अपराध के कारण यमराज ने शूली पर चढ़वाया था। इस पर ऋषि ने यमराज को शूद्र हो जाने का शाप दिया था; फलस्वरूप यमराज दासी के गर्भ से पांडु के यहाँ जन्मे और ’विदुर' कहलाये।
माँडव रिषि जब सूली दयौ। तब सो काठ हरौ ह्वै गयौ। माँडव धर्मराज पै आयौ। क्रोधवंत यह बचन सुनायौ।….। दासी पुत्र होहु तुम जाइ। सूर बिदुर भयो सो इहिं भाइ-३-५।
राजा जनक के भाई कुशध्वज की पुत्री जो भरत को ब्याही थी।
मैदे की पतली रोटी जो घी में पकायी जाती है।
एक सूर्यवंशी चक्रवर्ती राजा जिसके पचास कन्याएँ थी।
कह्यौ मांधाता सों जाइ। पुत्री एक देहु मोहिं नाइ ९.।
माई का लाल-उदार स्वभाव वाला।
सखी अथवा बूढ़ी स्त्री के लिए आदरसूचक संबोधन।
(क) जसुमति माई कहा सुत सिखयो हमको जैसे हाल कियौ-८१०।
(ख) सखिरि बोलावधि टेरि दोरि आवहु री माई-2४१९।
(ग) कोऊ-माई आवत है तन स्याम-2९५८।
(घ) सुंदर स्याम कान्ह लिखि पठई आइ सुनो री माई.-2९६।
(क) कहिंधौं मधुप वारि मथि माखन काढ़ि जो भरी कमोरी-३०२८।
(ख) हम अहीर माखन दधि बेचैं सबन टेक पकरी-३१०४।
(ग) पर लिखिलखि जोग पठावत बिसरी माखन चोरी-३१११।
विष्णु का पाँचवाँ अवतार जो उन्होंने राजा बलि को छलने के लिए लिया था।
दीमकों के रहने का मिट्टी का भीटा, बँबीठा।
बामी ताकौं लियौ छिपाइ। तासौं रिषि नहि देइ दिखाइ-९-३।
ज्यों माखी मृगमद मंडित तन परिहरि पूय परै-१-१९८।
अब तो हैं हम निपट अनाथ। जैसे मधु तोरे की माखी त्यौं हम बिन ब्रजनाथ-2६९३।
(क) मागध हत्यौ, मुक्त नृप कीन्हें-१-१७।
(ख) मागध मगध देस तैं आयौ लीन्हें फीज अपार।
मागधपति बहु जीति महीपति कछु जिय मैं घबराए-१-१०९।
मगध की प्राचीन प्राकृत भाषा।
माँह, माँहा, माँहि, माँही, माहें, माहैं
छोटा पूआ जिससे 'विवाहआदि शुभ अवसरों पर कुलदेवी का पूजन किया जाता है।
माइँ (माइँन या माई) में थापना - पितरों के समान आदर करना। माइँन मैं थपिहौं पितरौं के समान आदर करूँगी (करूँगा।
उ. - जब लौं हौं जीवौं जीवन भर सदा नाम तव जपिहौं। दधि-ओदन दोना भरि दैहौं अरु म इँन (पाठां - भाइनि-भाई) मैं थपिहौं-९-१६४।
कबहुँक लछिमन पाइ सुमित्रा माइ-माइ कहि मोहिं सुनैहै-९-८१।
वृद्धा के लिए आदरसूचक संबोधन।
स्त्री के माता-पिता का घर नैहर।
(क) उन तो वह कौन्हीं तब हमसौं ए रतन छँड़ाइ गहावत माटी-३०५६।
(ख) माटी मैं ज्यौं कंचन परै-७-२१।
पाँच तत्वों में 'पृथ्वी' नामक तत्व।
मैदे की छोटी पकी हुई टिकिया को शकर में पाग कर बनायी गयी मिठाई।
बेगि चलि सजि श्रृंगार काढ़ि माठी खगवारौ आइकै साज-2२०२
माघ तुषार जुवति अकुलाहीं ह्याँ कहुं नंद सुवन तौ नाहीं.-१९९।
संस्कृत का एक प्रसिद्ध कवि।
माघ मास से सबंधित, माघ का।
तुरत माच ते धरनि गिरायो २६३१।
शोर-गुल के साथ कार्यारंभ करना।
महा माचल मारिबे की सकुच नाहिंन मोहिं-१-१०६।
मटका जिसमें दही आदि रखा जाता है।
सिर दधि-माखन के माट गावत गीत नए।
(क) मात-पितु के बंद छोरे बासुदेव कुमार-2९७५।
(ख) मात-पिता हित प्रीति निगम पंथ तजि दुख-सुख भ्रम नाख्यो-३०१४।
उमँगि अंगन मात कोऊ बिरध तरुन अरु बाल-2९५४।
निसि दिन स्रम-सेवा कराइ उठि अंत मिले पित-मातनि-३०२५।
कोउ काजर कोउ बदन माड़ती हर्षहिं करहिं कलोल २४२७।
सुमति सुन्दरी परस प्रियारस लंपट माड़ो आरि १३५२।
हमहि मूरख बदति आपु ए ढंग सदति पाइ अब मदति हठ कतहिं माड़ौ-१२६९।
एक कहै प्रिय को मुख माड़ौ। एक कहैं फगुवा लै छाँड़ौ-2४१५।
अँगिया बनी कुचन सो माढ़ी।
एक लाल रत्न, 'लाल', पद्मराग, चुन्नी।
एक ऋषि जो पर्वत पर मौन रहा करते थे जिससे उसका नाम 'ऋष्यमूक' पड़ गया था।
माता पिता-बंधु-सुत तौ लगि जौ लगि जिहिं कौं काम-१-७६।
(क) वे यौवन मद की सब माती कहाँ मेरौ तनक कन्हाई-८६७।
(ख) मुख मृदु बचन बिना सींचे अब जिबहिं प्रेम-रस-माती-2९८०।
(क) जनम-कष्ट तैं मातु दुखित भई-१-२९१।
(ख) ताके बीच बिघ्न करिबे को मातु-पिता पचि हारे.-३०३६।
मातुल को देखि हरि कहयो यो बिहँसि करि पंथ ते टारि गज को महाबत २५९५।
दुइ मृनाल मातुल उभै द्वै कदलीखंभ बिन पात-१६८२।
मातुला, मातुलानी, मातुलि, मातुली
कमलपत्र मातूल चढ़ावै। नयन मूँदि यह ध्यान लगावै।
भाषा जो बालक अपनी माता से सीखता है।
हो हो हो हो लै लै बोलैं। गोरस कैरी माते डोलैं-2४३८।
मेरे जानि गह्यो चाहत हौं फेरिकि मागल मातो-३१३२।
बायँ देना - (१) बचा जाना।
(२) ध्यान न देना।
(३) चक्कर देना।
बायन देना - छेड़-कुछेड़ करना, छेड़ना।
जात बिलै ह्वै छिनक मात्र मैं उघरत नैन किवार-2-३१।
बारह खड़ी' में स्वर-सूचक रेखा जो व्यंजन में लगती है।
माथा कूटना - सिर पीटकर शोक मनाना।
माथा घिसना - (१) नम्रता दिखाना।
(२) खुशामद करना।
माथा खपाना (खाली करना) - बहुत सोचना - विचारना।
माथा झुकाना (टेकना या नवाना) - (१) नम्रता या अधीनता दिखाना।
(२) सविनय प्रणाम करना।
माथा ठनकना - भावी दुख, दुर्घटना आदि को पहले से ही आशंका होना।
माथा धुनना या पीटना सिर पीटकर शोक मनाना।
माथ धरना - अनुकूल आचरण के लिए करना।
माथ थरि - अनुकूल आचरण के लिए स्वीकार करके।
उ. - तात बचन रघुनाथ माथ घरि जब बन गौनि कियो-९- ४६।
माथा-पच्च, या पिट्टन-बहुत बकना या समझाना।
किसी चीज का अगला या ऊपरी भाग।
(क) माथे मोर मुकुट-2९५१।
(ख) ते अब कहत जटा माथे पर बदलो नाम कन्हाई-३१०६।
माथे चढ़ाना या धरना - सादर स्वीकार करना।
माथे धरौ - सादर-सविनय स्वीकार करो।
उ. - मम आयसु तुम माथे धरौ। छल बल तजि मम कारज करौ।
माथे टीका होना - अधिकता था विशेषता होना।
माथे पड़ना - भार या दायित्व आ जाना।
माथे पर चढ़ना - दुलार के कारण धृष्ट हो जाना।
माथे पर बल पड़ना - भुख पर असंतोष या अप्रसन्नता के चिह्न दिखायी देना। माथे भाग होना - भाग्यवान होना।
जाके माथे भागु - जो भाग्यवान है।
उ. - ऊधौ जाके माथे भागु-३०९५।
माथे मढ़ना - जबरदस्ती देना।
माथे मानना - सादर स्वीकार करना।
माथे मानि - सादर स्वीकार करके।
माथे मानी - शिरोधायँ की।
उ. - सूरदास प्रभु के जिय भावै आयसु माथे मान-३२५०।
माथे मारना-उपेक्षा या तिरस्कार के साथ कुछ देना।
(२) भरोसे, सहारे।
सूर वाट जो माथो दीजै चलत आपनी गोहीं-३०५६।
माथौ नायौ - (२) सविनय प्रणाम किया।
उ. - जामवंत अंगद हनू उठि माथो नायौ-९- ७२।
(२) सर झुकाकर अर्थात् सविनय स्वीकार किया।
उ. - तबै साप रिषि सौं नृप पायौ। तब रिषि चरननि माथौ नायौ-६- ७।
कामदेव के पाँच वाणों में एक।
मादा, मादिन, मादिनि, मादी, मादीन
(क) सूर निरखि यह रूप माधुरी नारिकात मन डौ-2५९७।
(ख) अग अंग प्रति अमित माधुरी-६६३।
काव्य का एक गुण जिसमें मधुर वर्णो की योजना रहती है।
माधैया, माधो, माधोया, माधौ
(क) हरि हित मेरो मा्घैया। देहरी चढ़त परत गिरि कर पल्लव जो गहत है री मैया।
(ख) माधौ जू, मन मायाबस कीन्हौ-१-४६।
(ग) दुसह सँदेस सुनत माधो को गोपी-जन बिलखानी-2९८८।
(घ) बरु माघौ मधुबन ही रहते कत जसुदा के आए-३०१९।
राजा पांडु की पत्नी जो नकुल और सहदेव की माता थी।
विष्णु अथवा उनके रामकृष्ण अवतार।
तुम मों से अपराधी माधव केतिक स्वर्ग पठाये हो-१-७३
वैष्णवों के बार मुख्य संप्रदायों में एक जिसके प्रवर्तक मध्वाचार्य थे।
किसी पदार्थ का भार, तौल आदि।
नापने-तौलने आदि का पैमाना।
काको मान-परेखो कीजै बँधी प्रेम की डोरी-३१११।
मान मथना - गर्व चूर करना।
मान मथि - गर्व चूर करके
उ. - इन जरासंध मदअंध मम मान मथि बाँधि बिनु काज बल इहाँ आने।
भोजन करत माँगि घर उनकैं राज-मान मद टारत-१-१२।
हठ करि मान कियौ जब भामिनि तब गहि पाइ परे-६८९।
मान मनाना रूठे हुए को मनाना।
मान मोरना - मान छोड़ देना, प्रसन्न हो जाना।
अनुकूल होना, ठीक मार्ग पर आना।
आदर-सम्मान के योग्य समझना।
रूठकर बैठने का स्थान, कोपभवन।
बैठी जाय एकांत भवन में जहाँ मानगृह चार।
कोटि स्वर्ग सम सुखउ न मानत हरि समीप समता नहिं पावत-३१४२।
मन मानत - समझता है।
उ. - क्यौं मन मानत है इन बातन-३०२५।
सम्मान या प्रतिष्ठा करता है।
मानत गिरि निदत्त सुरपति को-१०३९।
समझता या स्वीकार करता है।
(क) तिनका सौं अपने जन कौ गुन मानत मेरु समान १-८।
(ख) सूरदास ए हटक न मानत लोचन हठी हमारे-३०३६।
(ग) राजिव रवि को दोष न मानत ससि सौं सहज उदास-३२१९।
समझती या स्वीकार करती है।
जानति हौं तुम मानति नाही, तुमहूँ स्याम सँघाती-2९८१
पूजा के दो प्रकारों में एक, पूजा जो मन में ही की जाय।
हिमालय के उत्तरी भाग में स्थित एक झील।
मानसरोवर छाँड़ि हंस तट काग-सरोवर न्हावैं-2-१३।
रूठने और-मनाने की क्रिया या भाव।
मनुष्य होने की अवस्था भाव या गुण, मनुष्यता।
पूजा जो मन ही मन में की जाय, मानसपूजा।
गोवर्धन पर्वत पर स्थित एक सरोवर।
सेवा जो मन ही मन में की जाय।
मनसा और मानसी सेवा, दोउ अगाध करि जानौ-१-२११।
नाम प्रकार कहा रुचि मानहि जो गोपाल उपासी-३१०९।
मानहिंगी उपकार रावरौ करौ कृपा बलबीर-७९२।
मानहुँ बहुरि बिचारि कछू मन सुफलकसुत आयौ ब्रज आज-2९६८।
बायाँ देना - (१) बचा जाना।
(२) छोड़ना, त्यागना।
बायाँ पैर पूजना - बचने के लिए हार मान लेना।
बायें होना - (१) रुष्ट होना।
(२) विरुद्ध होना।
मैं कहौं सो सत्य मानहु-३११९।
मुँह माँगे फल जो तुम पावहु तो तुम मानहु मोहिं-९१५।
मेरे कहे बिलग मानहुगे कोटि कुटिल लै जोरै-३१७६।
समझ लिया। वाक्य-मान लिया कि।
ऐसौ सूरदास जन हरि कौ सब अधमनि मैं मानी-१-१२९।
चक्की के ऊपरी पाट की लकड़ी जिसके छेद में कीली रहती है।
मानी हार बिमुख दुरजोधन जाके जोधा हे सौ भाई-१-२४।
(ख) सूर स्याम को बेगि मिलावहु हारि आपनी मानी-१६६६।
अनुकूल आचरण के लिए स्वीकार की।
(क) अब तो यह बात मन मानी-१.८७१
(ख) स्याम कही सोई सब मानी। पूजा की विधि हम अब जानी-१०२७।
आयसु माथे मानो - आज्ञा शिरोधार्य की।
उ. - सूरदास प्रभु के जिय भावै आयसु माथे मानी-३२४९।
स्याम कहत, पूजा गिरि मानी-९३३।
नायक जो नायिका से अपमानित होकर खीझ गया हो।
मानापमान परम परितोषन सुस्थल थिति मन राख्यौ-३०१४।
सो सुहृद मानि ईस्वर अंतर जानि-१-७७।
अपनो चूक मानि उर अंतर अब लागी दुख पावन-३१९६।
(क) बहुत भाव करि भोजन अर्प्यौ, इह सब मानि लई मैं तेरी-९३५।
(ख) सेवा मानि लई हरि तेरी-१४५७।
मनि मानिक पाटंबर अंबर लेत न बनत विभूत-१०-३६।
यह नायिका जो नायक के अपराध पर रूठ जाय।
मधुबन की मानिनी मनोहर तहीं जाहु जहाँ भाए हो-2९८६।
लोकलाज, कुलकानि मनियै उरियै बंधु पिता महतार-१२२९।
दक्ष या पारंगत समझती हैं।
एक ही संग भई सबै जोबन नई, अब होहु गुरू हम तुमहिं मानै-१२६८।
समझता या ध्यान में लाता है।
(क) कोटिक करै एक नहिं मानै सूर महा कृतधन कौं-१-९।
(ख) सीत-उष्न सुख-दुख नहिं मानै-2 ११।
मनमानै - मान समझ सकता या धैर्य रख सकता है।
उ. - मधुकर, कहि कैसे मन मानै-३१३६।
रुचि मानै - आनंद या स्वाद ले सकता है, पसंद कर सकता है।
उ. - खाटी मही कहा रुचि मानै सूर खवैया घी कौ-३२५१।
आदर या सम्मान का पात्र समझता है।
(क) और न काहू को वह मानै कछु सकुचत बल भैया-८६२।
(ख)-सूरदास इह सब कोउ जानै, जो जाकौ सो ताकौ मानै-१०४२।
(क) मानौं मृगी बन जरति व्याकुल तुरत बरष्यो नीर-2९५५।
(ख) मानों भरे दोउ एकहिं साँचे-३०५१।
(ग) मध्य द्रुम है फूल मानो कवच कंचन चीर-३१८०।
या पै नेकु बिलग जिनि मानौं अँखिया नाहिंन हाथ-३२५८।
समझूँगी, ध्यान दूँगी, परवाह करूँगी।
अब तो इहै वसी री माई नहिं मानौंगी त्राय-१२०४।
सूर स्याम सों मानु करै किन काहे बृथा मरै री-१६५७।
मानुष जनम पोत नकली ज्यौं मानत भजन-बिना निस्तार १-४१।
मनुष्य का, मनुष्य संबंधी।
मनुष्य का, मनुष्य-संबंधी।
आपुनौ कल्यान करि मानुषी तन पाइ-१-३१५।
श्रद्धापूर्वक स्वीकार किये।
दक्ष, कुशल या पारंगत समझे।
रैहौ माने-श्रद्धा-सम्मान का पात्र समझे या मानते रहना।
(क) खड़ो देव गिरिराज गोबर्धन इनै रहौ तुम माने-९३३।
(ख) कान्ह तुम्हारो मोकी जानै। इनको रैहो तुम सब माने-१०३३।
मानौ बग बगदाई प्रथम दिसि आठ-सात-दस नाखै-१-६०।
श्रद्धापूर्वक विश्वास करो।
जो चाहौ ब्रज को कुसलाई तौ गोवर्धन मानौ-९१५।
मानने या स्वीकारने योग्य।
आदर-सम्मान के योग्य, पूज्य।
तुमरे मान्य बसुदेव-देवकी जीव दान इहि दीजै १०-४।
मान्य होने की क्रिया या भाव।
अस्तित्व या अधिकार की स्वीकृति।
तुमरो दरसन पाइ आपनो जन्म सुफल करि मान्यो-2९७१।
संबंध-विशेष को दृष्टि से देखा।
आगै मैं तुमको सुत मान्यौ।
तदनुकूल आचरण के लिए शिरोधार्य किया।
(क) पाप-उजीर कह्यौ सोइ मान्यौ धर्म सुधन लुटयौ-१-६४ !
(ख) अपजस अति नकीब कहि टेरयौ सब सिर आयसु मान्यौ-१-१४१।
मन मान्यौ - प्रेम हुआ है।
उ. - नंदलाल सो मेरो मन मान्यौ कहा करैगो कोई री-१२०३।
दोष या आरोप पर ध्यान न देने का भाव।
मामी पीना - दोष या आरोप पर ध्यान नहीं देती है।
मामी पीवत या पीवै - दोष या आरोप पर ध्यान नहीं देता या देती है। उ. - (क) अहो जसादा महरि पूत की मामी पीवै-१०६२।
(ख) सूर इते पर खुनसनि मरियत ऊबौ पीवन मामी-३०७९।
जै जैकार भयौ भुव मापत तीनि पैड़ भइ सारी-८-१४।
माफ करना - क्षमा करना। माफ कीजै - क्षमा कीजिए।
उ. - सूरदास की बीनती दस्तक कीजै माफ-१-१४३।
भूमि जो कर-रहित दी गयी हो।
जसुमति माय लाल अपने को सुभदिन डाल डुलायो।
किसी बूढ़ी या पूजनीया स्त्री के लिए आदर सूचक संबोधन।
बरुन कुबेर अग्नि जम मारुत स्व बस किये छिन माय।
सो सुख दुहूँ के उर न माय-2३२८।
वह दिनजब विवाह आदि में मातृ-पूजन और पितृ-निमंत्रण होता है।
उस दिन का पूजन तथा कार्य।
(क) हरि, तुव माया को न बिगायौ.-१-४३।
(ख) तुम्हारी माया महाप्रबल जिहिं सब जग बस कीन्हो हो-१-४४।
धरि कै कपट भेष भिक्षुक को दसकंधर तहँ आयौ। हरि लीन्हों छिन में माया करि अपने रथ बैठायौ।
सृष्टि की उत्पत्ति का कारण, प्रकृति।
माया माहिं नित्य लै पावै। माया हरि पद माहिं समावैं।
रावन सौं नृप जात न जान्यो माया बियम सीस पर नाची-१-१८।
(क) उर बघनहाँ, कंठ कठुला, झँडूले बार-१०-१५१
(ख) बड़े बार सीमंत सीस के प्रेम सहित निरुवारति-७०४।
( ग ) सोहत घूँघरवारे बार - पृ. ३१५ (५०)।
बार खसना - बाल बाँका होना, कष्ट मिलना, अनिष्ट होना।
जिनि बार खसै या बार खसो मत - जरा भी कष्ट या अनिष्ट न हो।
उ. - (क) सूर असीस जाइ दैहौं जिनि न्हातहु बार खसै-2७०२।
(ख) हम दिन देति असीस प्रात उठि बार खसो मत न्हातै-३०२४।
जेहि जल तृन पशु बार बूड़ि अपने सँग बोरत। तेहि जल गाजत महाबीर सब तरत अंग नहि डोलत।
मुख चूमति जसुमति कहि बार-४९७।
जिसका उदय हाल ही में हुआ हो।
(क) मृग-स्वरूप मारीच धर्यौ तब, फेरि चल्यौ बारक जो दिखाई-९- ५९।
(ख) बारक जाइबो मिलि माधो-2७५८।
मोह-ममता, आत्मीयता का भाव।
गोकुल रहौ जाहु जनि मथुरा झूठो माया मोह-३०६८।
दृश्य जगत को असत्य और अनित्य मानने का सिद्धांत।
मायावाद' में विश्वास रखने वाला।
प्रबल-संत्र आहै-यह मार। यातै संतौ चलौ सँभार-१.२२९।
नर-बपु धारि नाहिं जन हरि कौं जम की मार सो खैहै.-१-८६।
सुनन द्वारावती मार उत्सव भयौ।
दहिनावर्त देत मनो ध्रुव को मिलि नक्षत्र की मार-2०६२।
आवेग या मनोविकार को रोकना।
किसी वस्तु को यों फेकना कि वह दूसरो से टकरा जाय।
दे मारना - (१) पटकना।
(२) पछाड़ना।
गाल मारना - बढ़-बढ़कर बातें करना।
कुछ पढ़कर मारना - मंत्र पढ़कर कोई चीज किसी लक्ष्य पर फेंकना।
जादू मारना - मंत्र-तंत्र करना।
डींग मारना - बड़ी-बड़ी बातें करना, शेखी बघारना।
मंत्र मारना - जादू करना।
(क) कुसुमित धर्म-कर्म कौ मारग जउ कोउ करत बनाई-१-९३।
(ख) एक कहत मारग नहिं पावति-१०५१।
पाप मारग जिते सबै कीन्हें तिते बच्यौ नहिं कोउ जहँ सुरति मेर-१-११०।
पारग मारना - राह में किसी को लूट लेना।
मारग लगना - चला जाना।
एक तांत्रिक प्रयोग जो इस विश्वास से किया जाता है कि लक्षित व्यक्ति मर जायेगा।
औरन को सरबसु तै मारत आपुन भए अभंगी-2९९७।
मारने की क्रिया या भाव, मारने के लिए।
(क) सिव-बिरंचि मारन कौं धाए यह गति काहू देव न पाई-१.३।
(ख) भव भय हरन असुर मारन हित काल मधुपुरी आयो-2९९९।
धातु आदि को जलाकर उसकी भस्म तैयार करना।
अनुचित रूप से हथिया लेना।
नाटक में किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति के लिए सम्मान सूचक संबोधन।
जिन पय पियत पूतना मारी-३२५०।
एक राक्षस जिसने सोने का मृग बनकर राम और सीता को धोखा दिया था।
मृग-स्वरूप मारीच धरयौ तब फेरि चल्यो बारक जो दिखाई-९-५९।
(क) अब तौ है मारुत को गहिबा का सम मूठ लैहै ३०६५।
(ख) दो मदन मारुत मिलि दसौ दिसि दुहाई-६५०।
मारुततनय, मारुतनंदन, मारुसुत, मारु सुवन
[सं. मारुत+तन्य, नंदन, सुत, सृवन]
भरमित भयौ देखि मारुतसुत दियो महाबल ईस-९ ७५।
मारुततनय, मारुतनंदन, मारुसुत, मारु सुवन
[सं. मारुत+तन्य, नंदन, सुत, सृवन]
मारा मारा फिरना - ध्यर्थ घूमना।
(क) कंस मारि राजा करै आपहु सिर नावै-१-४।
(ख) कंस नृप को मारि, छोड़्यो आपनो पितु मातु-2९७४।
महा माचल मारिबे की सकुच नाहिंन मोहिं-१-१०६।
मारिबोइ, मारिबोई, मारिबौइ, मारिबौई
तब तू मारि बोई करति १-२६६९।
दंड देने के लिए (तुम ) मारना-पीटना।
मेरी सौं तुम याहि मारियौ जबहीं पावौ घात-१०-३३०।
एक राग जो युद्ध के समय गाया जाता है।
दादुर मोर चानक पिक के जन सब मिलि मारू गायो-2८४०।
बहुत बड़ा नगाड़ा या धौंसा।
डारत मारे-मारे या बध किये डालता है।
प्रेम-प्रीति की ब्यथा तप्त तनु सो मोहिं डारत मारे-३२५४।
सूर स्याम को सिखवत हारा मारेहु लाज न आवत-८६५।
श्रीभगवान कृपा जिहिं करै। सूर सो मारै काके मरै-१-२८९।
राखौं नहीं काहु, सब मारौं-१०४३।
अस्वत्थामा न जब लगि मारौ, तब लगि अन्न न मुख मैं डारौ-१-२८८।
करम कौ मारौ-अभागा, भाग्यहीन।
तौ कहौ कहाँ जाइ करुनामय कृपिन करम कौ मारौ-१-१५७।
मृकंड ऋषि' के पुत्र जो तप बल से अमर माने जाते हैं।
मार्कडेय की आयु - दीर्घायु।
मार्गशिर, मार्गशिरस्, मार्गशीर्ष
बाया, फैलाया, विस्तृत किया।
ब्यास-नारि तबहीं मुख बायौ। तब तनु तजि मुख माहिं समायौ-१-२२६।
[सं. वारंबार, हिं. बारंबार]
सती सदा मम आज्ञाकारी। कहति जो या बिधि बारंबारी। दीखति है। कछु होवनहारी-४-५।
(क) घटै पल-पल, बढ़ै छिन-छिन, जात लागि न बार-१- ८८।
(ख) आवौ बेगि न लावौ बार-४- ५।
(ग) बान-बृष्टि सोनित करि सरिता, ब्याहत लगी न बार-९-१२४।
(घ) भए भस्म कछु बार न लागी, ज्यौं ज्वाला पट-चीर-९१५८।
अबकी बार मनुष्य-देह धरि कियौ न कछू, उपाइ-१-१५५।
बार-बार - फिर-फिर, पुनः-पुनः।
बंदी-सूत अति करत कुतूहल बार-१०- २७।
गृह बार - घर-द्वार, वासस्थान, गृहस्थी।
मिथ्या तनु कौ मोह बिसार। जाहु रहौ भावै गृह-बार-३-१३।
मर्मस्थान पर प्रभाव डालनेवाला।
मर्म तक पहुँचने की योग्यता।
(क) धाइ चक्र लै ताहि उबारयौ, मारयौ ग्राह बिहंगा-१.२१।
(ख ) को नृप भयो कंस किन मारयो-३०७९।
रुधिर पान करि आँत माल धरि जय जय सब्द पुकारी।
अल्प चोर बहु माल लुभात संगी सबन धराए।
"माल उड़ाना - (१) धन का अपव्यय करना।
(२) किसी को धन-संपत्ति मार लेना।
माल काटना (चोरना) - (१) किसी के धन से मौज करना।
(२) किसी का धन हड़प लेना।
माल मारना - दूसरे का धन दबा लेना।"
तुम जानत मैं हूँ कछु जानत जा जा माल तुम्हारे-११०६।
मालटाल या मालामात-माल असबाब।
माल उड़ाना - सुस्वादु भोजन करना।
(क) त्यागे फिरत। सकल कुसुमावलि मारति भौंर लए-2९-१।
(ख) फूना माधवो मालती बेलि फूले ही मधुप करत हैं केलि-2४०७।
मालवाई राग गौरी अरु आसावरि राग-2२७९।
(क) तव सुमिरन-छल दुर्भर के हित माला तिलक बनाई-१-२०७।
(ख) केसरि को तिलक मोतिन की माला बृन्दावन को वासी-३०३०।
माला जपना (फेरना) - जप या भजन करना।
जपति फिरी तेरे गुनन की माला - गुणों का स्मरण करती या उनको गातो फिरी।
उ. - कुंज कुंज जपति फिरी तेरे गुनन की माला-१८१७।
सूरदास कुसुमनि सुर बरसत कर संपुट करि मालिका-८०९।
लछिम-सी जँह मालिनि बोलै। बंदनमाल बाँधत डोलै-१०-३२।
बाग के पौधों की देख-रेख और सिंचाई करनेवाला।
[सं. मालिन्, प्रा. मालिय]
की हौं मधुवन चार चहूँ दिसि माली जाइ पुकार्यो-९-१०३।
[सं. मालिन्, प्रा. मालिय]
एक मान जो तोले का बारहवाँ भाग होता है।
(क) कमल-पत्र मालूर-पत्र फल नाना सुमन सुबास ७६६।
(ख) कमल-पत्र मालूर चढ़ावै-७९९।
एक राक्षस जिसके भाई सुमाली की कन्या कैकसी रावण की माता थी।
दियौ पठाइ स्याम निज पुर को मावत सह गजराज।
राति ज्यों अक्रूर दिन अलि मदन दह मधु माषि- ३०४८।
(क) महा कष्ट दस मास गर्भ बसि अधोमुख सीस रहाई-१.३१८।
(ख) आठ मास चंदन पियो-१०-४०।
(ग) चारि मास बर्षा के लीन्हे मुनिहु रहत इक ठौर-३०९०।
मास में एक बार होने वाला।
मीजने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
(क) बरुन-पास ते ब्रजपतिहिं छन माहिं छुड़ावै -१-४।
(ख) चरन सरोवर माहिं मीन मन रहत एक रस रीति-३२२९।
अधिकरण कारकीय चिन्ह, में, पर।
तब मन माहिं आनि बैराग-६-४।
और कौन स्याम त्रिभुवन मैं सकल गुन जेहि माहिआँ-१७०२।
दक्षिण भारत का एक प्राचीन नगर।
बैस संधि सुख तजी सूर हरि गए मधुपुरो माहीं-३२४४।
[सं. मधुर, प्रा. महुर=विष]
[सं. मातृष्वसा, पा. मातुच्छा, प्रा.माउच्छा]
कहा कहत मासी के आगैं जानत नानी-नानन।
(क) हित करि मिलै लेहु गोकुलपति अपने गोधन माहँ.-१५१।
(ख) सूर उहै निज रूा स्याम को है मन माह समान्यौ-३१२७।
चित्त का रुचिकर था मनोरंजक काम में लगाना।
विवाद, झगड़ा, तर्क-वितर्क।
वाद-विवाद या तर्क-वितर्क करना।
मंद सुगंध बयार बहाइ-१० उ०-१४३।
‘बारी' जाति की स्त्री जो शुभ अवसरों पर बंदनवार आदि बाँधती है, मालिन।
अच्छत दूब लिये रिषि ठाढ़े, बारनि बंदनवार बँधाई-१०-१९।
कहुँ नर्तत सब बारबधू और कहुँ गँधरब गुनगान-सारा. ६६८।
[सं . द्वादश, प्रा. वारस, अप. बारह]
बारह बाट करना (घालना) - तितर-बितर या छिन्न-भिन्न कर डालना।
बारह बाट जाना (होना) - छिन्न-भिन्न या नष्ट-भ्रष्ट होना।
अ' से ‘अः' तक के स्वरों की मात्राओं से युक्त व्यंजन रूप।
सूर सकल षट दरसन वै हौं बारहखरी पढ़ाऊँ-३४६६।
दूर होता है. नष्ट हो सकता है।
ये उतपात मिटत इनहीं पै-६००।
न मिटन पाई-चिन्ह बना रहा।
अंकित चिह्न का दूर हो जाना।
आइ अजर निकसी नँदरानी बहुरी दोष मिटाइ-५४०।
या ल क के उपहास आपुन ताहि बरजि मिटाइए-१० उ०-2४।
आँख बंद करने या कराने को प्रवृत्त करना।
आँख मींचने की क्रिया या भाव।
आँख मिचौनी-बालकों का एक खेल जिसमें एक की आँख मूँदी जाती है और बाकी लड़के इधर-उधर छिपते हैं।
मिजाज खराब होना (बिगड़ना) - (१) अप्रसन्नता होना।
(२) चित्त स्वस्थ न होना।
मिजाज खराब करना (बिगाड़ना) - अप्रसन्न करना।
मिजाज में आना - समझ में आना।
मिजाज ठीक (सीधा) होना - (१) दंड आदि मिलने पर सुधार जाना।
(२) प्रसन्न होना।
मिज़ाज (में)आना (होना) - घमंड करना, नखरे दिखाना।
मिजाज न मिलना - घमंड के मारे बात भी न करना।
कृपा करि रारि डारौ मिटाई-८-९।
अपने जिय की खुटक मिटाऊँ-2४५९।
न जात मिटायौं-मानना या स्वीकारना पड़ता है।
यह उपकार न जात मिटायौ-४-९।
सूर सुभेंटि सुदामा हरि दुख दरिद्र मिटारो-१० उ०-७७।
सूर हरि कौ सुजस गावौ जाहि मिटि भव-भार-१-२९४।
और भजे तें काम सरै नहिं, मिटै न भव-जंजार-१-६८।
[सं. मृत्तिका, प्रा. मिट्टिआ]
[सं. मृत्तिका, प्रा. मिट्टिआ]
मिट्टी करना - चौपट या बरवाद करना।
मिट्टी के मोल - बहुत सस्ता।
मिट्टी डालना - (१) छोड़ देना।
(२) दोष को छिपाना।
मिट्टी देना - कब्र में गाड़ना।
मिटटी छ्ने (पकड़ने) से सोना होना - साधारण काम में भी बहुत लाभ होना।
मिट्टी में मिलना - नष्ट होना।
मिट्टी में मिलाना - नष्ट कर देना।
मिट्टी होना - (१) मैला हो जाना।
(२) नष्ट होना।
(३) स्वाद या आनंद रहित होना।
मिट्टी का पुतला (की सूरत)-मानव शरीर। मिट्टी के माधव-भोंदू। मिट्टी खराब होना-दुर्दशा होना।
बालक को यह दोष मिटावति-१०१०।
मिटावन लायक-दूर करने में समर्थ।
तुम बिन ऐसी कौन नंद-सुत यह दुख दुसह मिटावन लायक-९५४।
नाउँ मिटावहि - चिह्न आदि भी न रहने दे।
उ. - इन्द्रहिं पेलि करी गिरि पूजा सलिल बरषि ब्रज नाउँ मिटावहि-९४७।
कहा करत ए बोलत नाहीं पिय, यह खेल मिटावहु-पृ. ३१२ (१३)।
[सं. मृत्तिका, प्रा. मिट्टिआ]
मिट्टी ठिकाने लगना - शव की अंतिम क्रिया हो जाना। मिट्टी ठिकाने लगाना - शव की अंतिम क्रिया करना।
[सं. मृत्तिका, प्रा. मिट्टिआ]
मिट्टी ढढ जाना - अधिक आयु या रोग के कारण शरीर की गठन या बनावट बिगड़ जाना।
अपने मुँह मियाँ - मिट्ठू बनना - अपनी बड़ाई स्वयं करना।
कहा बापुरो कंस मिट्यो तब मन संस करत है जो को-2५५६।
मीठा' का संक्षित रूप जो प्रायः किसी शब्द के पूर्व, यौगिक रूप बनाने को जुड़ता है।
खाने की मीठी चीज, वह जिसमें मीठा पड़ा हो।
(क) खोवामय मधुर मिठाई-१०-१८३।
(ख) मानहुँ मूक मिठाई के गुन कहि न सकत मुख, सीस डुलावत-६४८।
(ग) दई कोटि कलस भरि बारुन बहुत मिठाई पान हो-2४४९।
मीठे होने का भाव, मीठापन।
बहिरौ तान स्वाद कहा जानै गूँगो खात मिठास
उड़द या चने की बरी या बड़ियाँ।
(क) हमसौं-तुमसौं बाल मिताई-१-२९८।
(ख) हम अहीरि मतिहीन बावरी हरकतहू हठि करहिं मिताई-३११८।
(ग) मुख देखे को कौन मिताई-३३१०।
(क) तुम गुन की जैसे मिति नाहिंन, हौं अध कोटि बिचरतौ-१-२०३।
(ख) इत लोभी उत रूप परम निधि कोउ न रहत मिति मानि-१४३०।
रहत अवज्ञा होइ गुनाई चलत न दुखहिं मिती-१० उ.-१०३।
हरहिं मित्रबिंदा चित ध्यायो.-१०- उ०-2८।
मित्रता, मित्र का धर्म, मित्रता का निर्वाह।
(क) हमसौं तुमसौं बाल-मिताई। हमसौं कछु न भई मित्राई.-१-२८९।
(ख) देखि माघौ की मित्राई-2७१८।
दीनो दान बहुत द्विजन कौं राजा मिथिल-नरेस-सारा. २३४।
वर्तमान तिरहुत जहाँ प्राचीन काल में राजा जनक का राज्य था।
मिथ्यावाद विवाद छाँड़ि दै-१-३१२।
सार या आधार हीन, जिसमें वास्तविकता या स्थायित्व न हो।
बल विद्या धन धाम रूप गुन और सकल मिथ्या सौंजाई-१-२४।
संसार को असत्य समझने का सिद्धांत।
मिथ्या बाद उपाधि रहित ह्वै बिमल बिमल जस गावत-2-१७।
आभास जो वास्तविक स्थिति के विरुद्ध हो।
बैठक जिसमें बारह द्वार हों।
एक तरह का सोना (स्वर्ग) जो बहुत बढ़िया होता है।
सूर्य के समान चमक-दमक वाला।
सोहत लोह परसि पारस ज्यौं सुबरन बारहबानि।
हरि के चरित सबै उहि सीखे दोऊ हैं वे बारहबानी-१२८४।
सूरदास प्रभु हम हैं खोटी, तुम तौ बारहबाने हो-३० ०५।
मृदु, मधुर या कोमल हो जाना।
(किसी के) दबाव में आकर बहुत धीरे से बोलना।
नाक से निकलने वाले धीमे या महीन स्वर में।
नाक से धीमें या महीन स्वर में बोलनेवाला।
नाक से धीमे स्वर में बोलना।
[फ़ा. मियाँ + हिं. मिटठू]
अपनी बड़ाई स्वयं करनेवाला।
[फ़ा. मियाँ + हिं. मिटठू]
अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना - स्वयं अपनी बड़ाई करना।
[फ़ा. मियाँ + हिं. मिटठू]
[फ़ा. मियाँ + हिं. मिटठू]
मियाँ मिट्ठू बनना - बिना समझे रटना। मियाँ मिठ्ठू बनाना - बिना समझाए रटाना।
मिरच, मिरचा, मिरची, मिरिच, मिरिचा, मिर्च
(क) तिहि सठ-मिरिच रुचि नाई-१०-१८३।
(ख) बरा कौर मेलत मुख भीतर मिरिच दसन टकटौरे। तीछन लागो नैन भरि आए रोवत बाहर दौरे-१०-२२४।
(ग) हींग मिरच पीपरि अजबाइन ये सब बनिज कहावैं-११०८।
मिरच, मिरचा, मिरची, मिरिच, मिरिचा, मिर्च
ब्रज की भूमि इंद्र तैं मानौ मदन मिलक (मिलिक) करि पाई-2८३६।
दो पदाथों का अंतर मिटकर एक होना।
गुण, आकृति आदि समान होना।
मनसा करि सुमिरत है जब-जब, मिलते तब तबहीं-१.२८३।
मिलन आस तनु प्रान रहत है दिन दस मारग चैहौं-2५५०।
मिलन कहियौ - बराबर वालियों से सप्रेम प्रणाम - नमस्कार आदि कहना, प्रणाम नमस्कार - सूचक मिलना या भेंटना कहना। उ. - या वर प्यारी आवति रहियौ। महरि हमारी बात चलावति ? मिलन हमारौ कहियौ-७२७।
मिलन गए-मिलने, भेंटने या दर्शन करने गये।
जिनकौं मिलन गए पति तेरे सो ठाकुर ये बिदित तुम्हारे-१-२४१।
मिलन न पाई-मिल भेंट न सकी, दर्शन न कर सकी।
नंदनंदन के चलत सखी हे तिनको मिलन न पाई-2५६८।
हेलमेल या प्रेम का व्यवहार रखने वाला।
हेलमेल या प्रेम का व्यवहार।
विवाह की एक रीति जिसमें विवाह के पूर्व अथवा पश्चात कन्या के संन्निकट संबंधियों से गले मिलते और नकद भेंट देते हैं।
मिलने की क्रिया या भाव, भेंट, मिलन।
(क) धन्य यह मिलनि धन्य यह बठनि धन्य अनुराग नहीं यह थोरी-पृ० ३१० (४)।
(ख) वह हिलनि-मिलनि-खिलन की तेरे प्रेम प्रीति जताई-2१०७।
प्रेम-पूर्ण संबंध या व्यवहार; मिलना-जुलना।
जब बारे तब वैसी मिलनी की बड़े भए इहै देखो-३१००।
मिश्रित या सम्मिलित करते हो।
मिलवत कहाँ कहाँ की बातें हँसत कहति अति उर सकुचाई.-११६३।
मुँह ही की हमसों मिलवत - मिलने-भेंटने की कोरी बातें ही करते हो, हमसे मिलने-जुलने की केवल बातें करते हो (हृदय से वैसा नहीं चाहते), मुँह से तो हमसे मिलने-जुलने की बात करते हो (पर मन कहीं और है)। उ. - मुँह ही की हमसों मिलावत जिय बसत जहाँ मन मोहनि-2०१४।
मिश्रित या सम्मिलित करती है।
इधर-उधर की बातें जोड़ती है।
मैं जानति उनके ढंग नीके बातें मिलवति जोरि-८६७।
उतकी इत इत की उत मिलवति समुझसि नाहिंन प्रीति-रीति-2०४६।
मिलवाने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
सलिल कौं सब रंग तजि कै एक रंग मिलाइ-१-७०।
मिलाने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
मिलाने की क्रिया या भाव, मिलावट।
मिलाने के बदले में मिला हुआ धन।
जिहिं तन हरि भजिबौ न कियो। ….। तिन्हैं न मिल्यौ हियौ-2-१६।
कई चीजों का मिला हुआ घोल।
धन-मद-मूढ़नि अभिमानिनि मिलि लोभ लिए दुर्बचन सहै-१-५३।
इह ब्रज भूमि सकल सुर-संतति सो मदन मिलिक करि पाई-2८३६।
जीते जनम बिरोध करि मोकौं मिलिहौ आई-३-११।
मुक्तामाल मिलीं मानौ द्वै सुरसरि एकै संग-६२८।
बेसन मिलै सरस मैदा सौं अति कोमल पूरी है भारी-१०-२४१।
स्वर ठीक करके, सुर मिलाकर।
गौरी राम मिले सुर गावत-५०६।
नीराजन बहु बिधि बारति हैं ललितादि ब्रजनार।
रानी सौं मिलाप तहें भयौ-४-१२।
मिलाये जाने की क्रिया या भाव।
अच्छी चीज में बुरी या एक में दूसरी मिलाता है।
देखौ आइ पूत के करतब दूध मिलावत पानी-१०-३३७।
ऐसो कोऊ नाहिंनै सजनी जो मोहनै मिलावै-2७४५।
मिलते हैं, भेंटते या छाती से लगाते हैं।
बरषत मेह मेदनी के हित प्रीतम हरषि मिलाहीं-2१९४।
दोबारा साफ करके जमायी गयी चीनी।
अगनित तरु-फल सुगंध मृदुल मिष्ट खाटे-९-९६।
माखन मधु मिष्ठान्न महर लै दियौ अक्रूर के हाथ-2५३४।
(क) दधि-मिस आपु बँधायौ दाँवरि-१-२५।
(ख) मिस दिगबिजय चहूँ दिसि गयौ-१-२९०।
(ग) आवति सूर उरहने के मिस-१०-३११।
दोबारा साफ करके जमाई गयी चीनी, मिश्री।
सुंदर स्याम पाहुने के मिसि मिलि न जाहु दिन चार-2७६९।
दोबारा साफ करके जमायी गयी चीनी।
(क) सद दधि-माखन धौं आनी। ता पर मधु मिसिरी सानी-१०-१८३।
(ख) दूध औट्यो आनि, अधिक मिसिती सानि-४४०।
(क) मिस्रो दधि-माखन मिस्रित करि मुख नावत छबि धनिया-१०-२३८।
(ख) घृत मिष्टान्न खीर मिस्रित करि परुसि कृष्न हित ध्यान लगायौ-१०-२४८।
कई दालों का मिला हुआ आटा।
काल्हि धोखैं कान्ह मेरी पीठि मींजी आइ-७८०।
संगीत में एक स्वर से दूसरे पर इस कौशल से जाना कि स्वरों का संबंध तो स्पष्ट हो परंतु कोई व्यवधान न जान पड़े।
हम अस्नान करति जल-भीतर मींड़त पीठि कन्हाई-७७०।
(क) ताकैं मूँड़ चढ़ी नाचति है भीचति नीच नटी-१.९८।
(ख) सिर पर मीच, नीच नहिं चितवत-१-१४९।
कह्यौ, आँखि अब मीचि तू-८-१६।
[सं. मृत्यु, प्रा. मिच्च]
जो पै यह कियो चाहत है मीचु बिरह सर घात-2५०२।
मीचता है, मीचते (ही), मीचते (हुए)।
ठाढ़ी कुँअरि राधिका लाचन मीचत तहँ हरि आए-६७५।
हौं यह जानति बानि स्याम की अँखियाँ मीचै बदन चलावै-१०-२३१।
एक मंजन जिससे दाँत काले होकर सुंदर लगते हैं।
मिस्सी - काल करना - शृंगार करना।
मलता-मसलता है, मलते-मसलते (ही)।
मींजत पीठि प्रीति अति बाढ़ी-७९९।
कुचलना, दलना, मर्दन करना।
मींजि कर - हाथ मल-मलकर, बहुत दुखी होकर।
उ. - यह सुनत जल नैन ढारत मींजि कर पछिताहिं-2६७२।
फिरि देखैं तौ कुँवर कन्हाई मोजत रुचि सौं पीठि-७६८।
कटु-मीठि-कड़ुआ और मीठा, बुरा और भला।
सूर स्याम सुंदर रस अटके नहिं जानत कटु-मीठि-पृ. ३३४ (३६)।
ऊपर से मित्र, भीतर से शत्रु।
ऐसी चोट जो ऊपर से तो दिखायी न दे पर भीतर पीड़ा पहुँचाये।
सूरदास-प्रभु-हरि गुन मीठे नित प्रति सुनियत कान १-१६९।
सबरी कटुक बेर तजि मीठे चाखि गोद भरि लाई-१-१३।
जूठो खइए मीठे कारन-कोई अनुचित काम तभी किया जाय जब उससे कम से कम कोई स्वार्थ या लाभ तो होता हो।
जूठो खइए मीठे कारण आपुहिं खात लड़ात-पृ० ३३१ (६)।
मीठे तेल में, तिल के तेल में।
मीठैं तेल चना की भाजी-३९६।
कर या हाथ मोड़त - हाथ मलता या पछताता है।
उ. - (क) हरि बिनु को पुरवै मो स्वारथ। मोड़त हाथ सीस धुनि ढोरत रुदन करत नृप, पारथ-१- २८७।
(ख) मोड़त हाथ सकल गोकुलजन बिरह बिकल बेहाल-2५३६।
(ग) सूरदास प्रभु तुमहिं मिलन को कर मीड़त पछितात-३३५०।
पलक मीड़त रही - दूर तक देखने के लिए आँख या पलक मलकर तैयार होने के यत्न में लगी रही।
उ. - जौ लगि पानि पलक मोड़त रही तौ लगि चलि गए दूरि-2६९३।
कर मीड़ति पछिताति मनहिं मन क्रम क्रम करि समुझावै-३०९८।
कुचलना, दलना, मर्दन करना।
ताहि कोऊ उपचार न लागत कर मीड़ैं सहचरि पछिताइ-७४८।
(क) गोबिंद गाढ़े दिन के मीत-१-३१।
(ख) सखीरी, काके मीत अहीर-२६८६।
(ग) मधुकर काके मीत भए-२९९२।
सूरदास प्रभु बहुरि कृपा करि मिलहु सुदामा मीते-2८९३।
तिनको कहा परखो कीजै कुबिजा के मीता को-३३७६।
(क) मीन बियोग न सहि सकै (रे) नीर न पूछै बात-१.३२५।
(२) बारहवीं और अंतिम राशि।
(३) बारहवीं और अंतिम लग्न।
कामदेव जिसकी ध्वजा पर मीन अंकित कही गयी है।
मीनकेत अंबुज आनंदित ताते ता हित लहियत-2८५६।
मीन' का गुण, या स्वभाव, मीनपन।
सूरदास मीनता कछ्क जल भरि कबहूँ न छाँड़त-2७७७।
हठ-योग की साधना का रूप जो (जल में मछली के मार्ग के समान) गुप्त रहता है।
मच्छ, कच्छ, बाराह बहुरि नरसिंह रूप धरि-2-३६।
दीनानाथ अब बारि तुम्हारी-१-११८।
हरि भजन की बारि कर लै उबरै तेरौ खेत-१-३११।
सोने के आभूषण आदि पर किया जानेवाला रंगीन काम।
मछली जैसे सुंदर नेत्रवाला।
जिसके नेत्र मछली-जैसे हों।
सूर स्याम के रंगहि राधी टरत नहीं जल तें ज्यौं मीन्ही-१४३६।
मीमांसा शास्त्र का ज्ञाता।
तत्व का विवेचन या निर्णय।
भारतीय छह दर्शनों में दो जो 'पूर्व' और 'उत्तर' मीमांसा कहलाते हैं।
सिर को मूंड़ने की क्रिया।
द्विजातियों में बालक का एक संस्कार जो सामान्यतया पाँचवें वर्ष किया जाता है।
सिकोड़ा या संकुचित किया हुआ।
मुँगैछी, मुँगौछी, मुँगौरी
सिर के बालों का मूँड़ा जाना।
कटे हुए सिरों की माला जो शिव या काली के गले में रहती है।
मुंडमाल सिव-ग्रीवा कैसी।...। मुंडमाल कैसी तव ग्रीवा-१-२२६।
एक लिपि जिसमें मात्राऐ आदि नहीं होती।
मूँड़ने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
धोखे में धन गँवाना, ठगा जाना।
वह जो सिर मुँड़ाकर किसी जोगी का चेला बन गया हो।
जिनके जोग जोग यह ऊधौ ते मुँड़िया बसैं कासी।
स्त्री जिसका सिर मुड़ा हो।
दीवार का ऊपरी भाग जो छत से कुछ उठा रहता है।
दीवार का वह ऊपरी भाग जो छत से कुछ उठा रहता है।
स्त्री जिसका सर मुँड़ा हो।
कुंडल जो जोगी कान में पहनते हैं।
मुँह बनवाना--किसी बड़े कार्य या बड़ी प्राप्ति की पात्रता अपने में लाना (व्यंग्य)।
मुँह बनाना--आकृति से असंतोष सूचित करना।
मुँह बिगाड़ना-(१) चेहरे (विशेषतः शव के चेहरे) की आकृति खराब होना।
(२) चेहरे पर अप्रसन्नता या असंतोष का भाव आना।
(दूसरे का मुँह बिगाड़ना)--बहुत मारना-पीटना।
(अपना ) मुँह बिगाड़ना--असंतोष या अप्रसन्नता का भाव झलकाना।
मुँह बुरा बनाना असंतोष या अप्रसन्नता सूचित करना।
मुँह में कालिख पुतना ( लगना)-बहुत बदनामी होना, कलंक लगना।
मुँह में कालिख पोतना (लगाना) कलंक लगाना, बहुत बदनामी करना।
(अपना) मुँह मोड़ना-(१) उपेक्षा प्रकट करना।
(२) किसी ओर से ध्यान हटा लेना।
(३) अस्वीकार कर देना।
दूसरे का मुँह मोड़ना - पराजित कर हेना।
(किसी के ) मुँह लगना--- (१) किसी का बहुत लाड़-प्यार देखकर शोख या उद्दंड हो जाना।
(२) सवाल-जबाब या तर्क-कुतर्क करना।
मुँह लगाना--(१) लाड़-प्यार करके शोख या उद्दंड बनाना।
(२) ध्यान देना, सहर्ष स्वीकार करना।
मुँह न लगाईं--ध्यान भी न दिया, सर्वथा उपेक्षा की।
उ.---अष्टसिद्धि बहुरी सहँ आई।
रिषभदेव ते मुँह न लगाई-५-२।
मुँह लपेटकर पड़ना (पड़े रहना )-बहुत दुखी हो जाना।
मुँह लाल करना-(१) मुँह पर कई थप्पड़ या चाँटे मारना।
(२) पान से सत्कार करना।
मुँह लाल होना--क्रोध से चेहरा तमतमा जाना।
मुँह सफेद होना-भय या लज्जा से चेहरे का रंग उड़ जाना।
मुँह सिकोड़ना - अप्रसन्नता या असंतोष प्रकट करना।
(अपना) मुँह सुजाना-असंतोष या अप्रसन्नता सूचित करने के लिए मौन हो जाना।
(किसी का) मुँह सुजाना--मुँह पर बहुत थप्पड़ मारना।
मुँह सुर्ख होना-क्रोध से चेहरा उदास हो जाना।
मुँह सूखना--भय, लज्जा या अपमान से चेहरा उदास हो जाना।
किसी वस्तु का ऊपरी खुला हुआ भाग।
मुँह करना-लिहाज या मुरव्वत करना।
मुँह देखे का-ऊपरी मन का, दिखावटी।
मुँह पर जाना-लिहाज या मुरव्वत करना।
मुँह मुलाहषे का - जान-पहचान का।
मुँह रखना-लिहाज या मुरव्वत करना।
(अपना) मुँह तो देखो - अपनी योग्यता या पात्रता का ध्यान तो रखो (व्यंग्य)।
मुँह देखकर बात करना - योग्यता या पात्रता समझकर वैसी ही बात करना।
मुँह पड़ना - हिम्मत या साहस होना।
मुँह तक आना (भरना ) - लबालब भरना।
छोटे मुँह बड़ी बात कहत (कहौ)-अपनी अवस्था, स्थिति या योग्यता को भुलाकर लंबी चौड़ी बातें करता है।
(क) छोटे मुँह बड़ी बात कहत, अबहीं मरि जैहै-५८९।
(ख) छोटे मुँह बड़ी बात कही किनि आपु सँभ रे-१०१६।
उँगली में पहनने का छल्ला।
(क) आज्ञा होइ, देउँ कर मुंदरी, कहौं संदेसौ पति कौ-९-८४।
(ख) लाख मुंदरिया जाइगी कान्ह तुम्हारो मोल-११२७।
(ग) हाथ पहुँची बीर कानन जरित मुंदरी भ्राजई-१० उ०-2४।
हरि तब अपनी आँखि मुँदाई-१०-२४०।
नैंकु धीरज धरौ, जियहिं कोउ जिनि डरौ, कहा इहिं सरौ, लोचन मुँदाए-५९६।
मुँह आना - मुँह में छाले पड़ना।
(१) मुँह का कच्चा - जिसकी बात का विश्वास न हो।
(२) जो किसी बात को गुप्त न रखकर सबसे कह देता हो।
मुँह का कड़ा - उद्दंडता पूर्वक बातें करनेवाला।
मुँह किलना - मुँह से बात या बोल न निकलना !
मुँह कीलना - मुँह से बात न निकालने देना।
मुँह की बात छिनना - जो बात स्वयं कहने जा रहे हों, वही दूसरे के द्वारा कही जाना।
मुँह की बात छीनना - जो दूसरा कहने को हो, वहीं स्वयं कह देना।
मुँह की मक्खी न उड़ा सकना - बहुत ही दुर्बल या अपाहिज होना।
मुँह की मिलाना - मुँह देखी या चापलूसी की बातें करना।
मुँह मिलवत (हौ) - मुँह देखी या चापलूसी की बातें करते हो।
उ. - (क) मोसो तुम मुँह की मिलवत हौ भावति है वह प्यारी-१८६४।
(ख) मुँह ही की हमसौं मिलवत, जिय बसत जहाँ मन मोहनि-2०१४।
मुँह खराब करना - (१) स्वाद बिगाड़ना।
(२) गंदी बात कहना।
मुँह खराब होना - (१) स्वाद बिगइना।
(२) गंदी बातें कही जाना।
मुँह खुलना - (१) बोलना।
(२) उद्दंडता की बात कहने का आदी होना।
मुँह खुलवाना - (१) बोलने को प्रवृत्त करना।
(२) कड़ी या उइंडता की बात कहने को बाध्य करना।
मुँह खोलकर रह जाना - कुछ कहने को होना, पर लज्जा, संकोच या भय से न कह पाना।
मुँह खोलना - (१) बोलना।
(२) बुरी या उद्दंडता भरी बातें कहना !
किसी के मुँह चढ़ना - (१) कोई बात हर समय याद आ जाना।
(२) किसी के प्यार-दुलार के फलस्वरूप उद्दंड हो जाना।
(किसी को) मुँह चढ़ाना - (१) अत्यधिक प्यार दुलार से किसी को उद्दंड था धृष्ट करना।
(२) बहुत प्रिय बनाना।
मुँह चलना - (१) खाया जाना।
(२) व्यर्थ की बातें या दुर्वचन कहा जाना।
मुँह चलाना - (१) भोजन करना।
(२) बोलना।
(३) गाली देना।
(४) काट लेना।
मुँह चिढ़ाना - किसी की आकृति या उसके हाव-भाव की नकल बनाकर हँसी उड़ाना या उसको खिझाना।
मुँह चूम कर छोड़ देना - लज्जित करके छोड़ देना।
मुँह छूना - (१) ऊपरी मन से या नाम मात्र को करना।
(२) दिखावटी बात करना।
मुँह (कड़ुआ) जहर होना - मुँह में कड़ुआहट होना।
मुँह जुठारना (जूठा करना) - बहुत ही कम खाना।
मुँह जोड़ना (जोरना) - कानाफूसी करना।
मुँह डालना (किसी पशु आदि का) खाने के पदार्थ को एक-दो कौर खाकर जूठा कर देना। मुँह तक आना-कहने को होना।
मुँह थकना - बहुत बोलने से थक जाना।
मुँह थकाना - बहुत बोलकर जबान थका देना।
मुँह देना - (१) (किसी पशु आदि का) खाद्य पदार्थ को एक-दो कौर खाकर जूठा कर देना।
(२) बहुत लाड़-प्यार करना।
मुँह न दीजिए - बहुत लाड़ प्यार न कीजिए।
उ. - कबहूँ बालक मुँह न दीजिए मुँह न दीजिए नारि-१०९९।
मुँह पकड़ना - कुछ बोलने न देना।
मुँह पर न रखना - जरा भी न खाना।
मुँह पर बात आना - (१) कुछ कहने की इच्छा होना।
(२) सामने ही या उपस्थिति में कोई प्रसंग उठना या चर्चा चलना।
(३) कुछ कहना।
मुँह पर मोहर करना - बोलने न देना।
मुँह पर लाना - (१) वर्णन करना।
(२) कहने को होना।
मुँह पर हाथ रखना - बोलने न देना।
मुँह पसारकर दौड़ना - कुछ पाने के लालच में आगे बढ़ना।
मुँह पसारकर रह जाना - (१) बहुत चकित या हक्का-बक्का रह जाना।
(२) लज्जित होकर रह जाना।
मुँह पाना - लाड़-प्यार पाना, पार्श्ववर्ती और प्रिय बनना।
मुँह-पेट चलना - कै दस्त होना।
मुँह फटना - (१) मुँह का बहुत ज्यादा खुलना।
(२) चुने आदि से मुँह कट जाना।
मुँह फाड़कर कहना - बेहया बनकर कहना।
मुँह फैलाना - (१) मुँह को बहुत खोलना।
(२) जँम्हाई लेना।
(३) अपनी ही भूल - चूक के होने पर भी निर्लज्जता से हँस देना।
(४) भद्दे ढंग से हँसना।
(५) अधिक प्राप्ति की इच्छा या हठ करना।
मुँह फोड़कर कहना - निर्लज्ज बनाकर कहना।
मुँह बंद करना - बोलने न देना।
मुँह बंद कर लेना - कुछ न बोलना।
मुँह बंद होना - चुप हो जाना।
मुँह बाँधकर बैठना - कुछ न बोलना।
मुँह बांधना (बाँध देना) - बोलने न देना।
मुँह बाना - (१) मुँह को बहुत खोलना या फैलाना।
(२) जम्हाई लेना।
(३) अपनी भूल-चूक होने पर भी निर्लज्जता से हँस देना।
(४) भद्दे ढंग से हँसना।
(५) अधिक प्राप्ति के लिए इच्छा या हठ करना।
फिरत रहत मुँह बाए-अधिकाधिक ( धन की) प्राप्ति के चक्कर में फिरता रहता है।
उ. - निसि दिन फिरत रहत मुँह बाए अहमिति जनम बिगोइसि-१- ३३३।
मुँह बिगड़ना - मुँह का स्वाद खराब होना।
मुँह बिगाड़ना - मुँह का स्वाद खराब करना।
मुँह भर आना - (१) किसी चीज को देखकर ललचा जाना।
(२) जी मिचलाना।
मुँह तक (भरकर) - (१) ऊपर तक, लबालब।
(२) जितना जी चाहे।
(३) भली भाँति।
मुँह भर बोलना - प्यार - सम्मान से बात करना।
मुँह भरना - (१) खिलाना।
(२) रिश्वत देना।
(३) बोलने से रोकना।
मुँह मारना - (१) खाने की चीज में मुँह लगाकर जूठा कर देना।
(२) दाँत से काट लेना।
(किसी का) मुँह मारना - (१) बोलने न देना।
(२) रिश्वत देना।
(३) बढ़कर होना।
मुँह मीठा करना - (१) मिठाई खिलाना।
(२) कुछ देकर प्रसन्न होना।
मुँह मीठा होना - (१) खाने को मिठाई मिलना।
(२) लाभ या प्राप्ति होना।
(३) मँगनी होना।
(बात) मुँह में आना - कहने की इच्छा होना।
मुँह में खून या लहू लगना - चाट या चस्का पड़ना।
मुँह में जबान होना - कहने में समर्थ होना, कहने का साहस होना।
मुँह में तिनका दबाना (लेना) - बहुत दीनता से बोलना।
मुँह में पड़ना - खाने को मिलना।
(बात का) मुँह में पड़ना - मुँह से कुछ कहा जाना।
मुँह में पानी भर आना - (१) कोई आकर्षक, स्वादिष्ट था अच्छी पोज देखकर उसको पाने के लिए बहुत ललचाना।
(२) ईर्ष्या होना।
मुँह में बात करना ( कहना या बोलना ) - इतना धीरे बोलना कि किसी को सुनायी न देना।
मुँह में लगाम देना - समझ-बूझकर बोलना।
मुँह में लगाम न होना - बिना सोचे-समझे जो मुँह में आये कह डालना।
मुँह लगाना - खाना, चखना।
मुँह सँभालना - (१) सोच समझकर मुँह से बात निकालना।
(२) गाली-गलौच न करना।
मुँह सीना-बिलकुल चुप रहना।
मुँह सूखना - बहुत प्यास लगना।
मुँह से दूध की बू आना (टपकना) - वयस्क का बालक-जैसा अनजान बनना।
मुँह से निकालना- कहना।
मुँह से फूटना--कहना (व्यंग्य या खिझलाहट)।
मुँह से फूल झड़ना--(१) सुंदर और प्रिय बातें करना।
(२) असुंदर और अप्रिय बात कहना ( व्यंग्य या खिझलाहट )।
मुँह से बाते छीनन--जो दूसरा कहने जा रहा हो, वह स्वयं कह देना।
मुँह से बात न निघालना--लपजा, क्रोध या अय से कुछ बोल न सकना।
मुँह से भाप (तक) न निकलना-भय के मारे चूँ तक न कर सकना।
मुँह से लार गिरना (चूना, टपकना, बहना) --कोई सुंदर, स्वादिष्ट या आकर्षक वस्तु देखकर उसे पाने को बहुत लालायित होना।
मुँह से लाल उगलना---(१) त्रिय और रुचिकर बात कहना।
(२) अप्रिय और अरुचिकर बात कहना (व्यंग्य या खिझलाहट)।
अपना सा मुँह लेकर रह जाना - लज्जित होकर चुपं या निश्चेष्ट हो जाना।
इतना सा मुँह निकल आना - (१) बहुत सुस्त होना।
(२) हानि, दुख, लज्जा आदि के कारण बहुत उदास होना।
मुँह अँधेरे - बहुत सबेरे।
(किसी के) मुँह आना - किसी से तर्क कुतर्क या गाली - गलौज करना।
मुँह उजला होना - बात या इज्जत बनी रह जाना।
मुँह उजाले (उठे) - बहुत सवेरे।
मुँह उठना - किसी ओर चलने की इच्छा होना।
मुँह उठाये चले जाना - बेधड़क चले जाना।
मुँह उठाकर कहना - बिना सोचे - समझे बक देना।
मुँह उतरना - (१) दुर्बलता या रोग से चेहरा सुस्त होना।
(२) हानि या दुख से उदास हो जाना।
(अपना) मुँह काला करना- अपनी बदनामी करना।
(दूसरे का) मुँह काला करना - उपदेश दे कर त्यागना।
मुँह की खाना - (१) दुर्दशा या बेइज्जती कराना।
(२) मुँहतोड़ उत्तर सुनना।
(३) लज्जित या शर्मिंदा होना।
(४) धोखा खाना।
(५) बुरी तरह पराजित होना।
मुँह के बल गिरना - ठोकर खाना, आघात सहना।
मुँह खोलना - घूँघट या परदा हटाना।
मुँह चढ़ाना - आकृति से अप्रसन्नता या असंतोष प्रकट करना।
मुँह चाटना - खुशामद या चापलूसी करना।
मुँह छिपाना - लज्जा के कारण किसी के सामने न आना।
मुँह झटक जाना - रोग या दुर्बलता से चेहरा सुस्त होना।
मुँह झुलसना - लपट या लू आदि से चेहरा बहुत मलिन हो जाना।
मुँह झुलसाना - (१) लपट या आग से चेहरा फूँकना (गाली)।
(२) शव का दाह-कर्म करना।
(३) कुछ ले देकर झगड़ालू व्यक्ति से पीछा छुड़ाना।
(अपना) मुँह टेढ़ा करना - अप्रसन्नता या असंतोष का भाव चेहरे पर लाना।
( दूसरे का ) मुँह टेढ़ा करना - (१) बहुत मारना - पीटना।
(२) कटु बात कहना या उत्तर देना।
मुँह ढाँकना - किसी संबंधी के मरने पर शोक करना।
(किसी का ) मुँह ताकना - (१) एकटक देखना।
(२) कुछ पाने की आशा से देखना आश्रित था सहारे होना।
(३) विवशता से देखना।
(४) चकित होकर देखना।
मुँह ताकना - काम-काज छोड़ कर चुपचाप बैठा रहना।
मुँह तोड़कर जवाब देना - कटु या चुभती हुई बात कहना।
मुँह तोड़ना - (१) बहुत मारना-पीटना।
(२) कटु या चुभती हुई बात कहना।
मुँह थुथाना - अप्रसन्न या असंतुष्ट होकर किसी से न बोलना।
मुँह दिखाना - सामने आना।
मुँह देखकर उठना - सोकर उठते ही किसी का दर्शन पाना।
मुँह देखकर बात कहना - खुशामद करना।
(किसी का) मुँह देखना - (१) किसी के सामने जाना।
(२) चकित होकर देखना।
(किसी का) मुँह देखकर - (१) किसी के सहारे या बल - बूते पर।
(२) किसी को प्रसन्न या संतुष्ट करने के उद्देश्य से।
मुँह धो रखना - प्राप्ति के संबंध में कोई आशा न रखना (व्यंग्य)।
मुँह न देखना - घृणा या क्रोध के कारण कभी न मिलना-जुलना।
मुँह न फेरना (मोड़ना) - (१) बढ़ता के सामने डटे रहना।
(२) अस्वीकार न करना।
(इतना सा) मुँह निकल आना - (१) रोग या दुर्बलता से चेहरा सुस्त हो जाना।
(२) हानि, दुख या अपमान से उदास हो जाना।
मुँह पर - सामने ही।
मुँह पर चढना-सामना या मुकाबला करना।
मुँह पर थूकना-बहुत अपमानित और लज्जित करना।
मुँह पर नाक न होना-बहुत निर्लज्ज होना।
मुँह पर पानी फिर जाना-(१) चेहरे पर रौनक या तेज आ जाना।
(२) प्रसन्नता या संतोष का भाव प्रकट होना।
मुँह पर फेंकना ( फेंक मारना)-बहुत अप्रसन्न या असंतुष्ट होकर कोई चीज देना।
मुँह पर से बरसना ---आकृति से जान पड़ना या प्रकट होना।
मुँह पर बसंत खिलना ( फूलना)-(१) चेहरा पीला पड़ जाना।
(२) भयभीत या उदास हो जाना।
मुँह पर मारना (मार देना)-बहत असंतुष्ट या अप्रसन्न होकर कोई चीज देना।
मुँह दर मुँह -- आमने-सामने।
मुँह पर मुरदनी छाना (फिरना)-(१) चेहरा पीला पड़ जाना।
(२) भयभीत, लज्जित या उदास होना।
(३) अंत समय निकट होना।
मुँह पर हवाई उड़ना (छूटना)-भय, लज्जा या अपमान से चेहरा बहुत उदास हो जाना।
(किसी का ) मुँह पाना-किसी को अपने अनुकूल समझना, सम्मान और प्रेम का व्यवहार पाना।
मुँह पाइ - लाड़-प्यार और सम्मान पाकर, अनुकूल समझकर।
उ.--नेक ही मुँह पाइ फूला अति गई इतराइ--२६८०।
मुँह पावति - सम्मान और प्रेम का व्यवहार पाती है, अनुकूल समझती है।
उ.--मुँह पावति तब ही लौं आवति और लावति मोहिं--७२३।
मुँह पीट लेना-बहुत अधिक क्रोध, दुख, पराजय या असफलता की स्थिति में होना।
मुँह फक होना--भय या आशंका से चेहरा बहुत उदास हो जाना।
मुँह फिरना (फिर जाना)---सामने से हट या भाग जाना।
मुँह फुलाकर बैठना (फुलाना) - असंतोष या अप्रसन्न होकर चुप बैठना।
मुँह फूँकना-(१) मुँह में आग लगाना (गाली)।
(२) शव का दाह-कर्म करना।
(३) किसी झगड़ालू को कुछ ले देकर हटाना।
मुँह फूलना - असन्नता या असंतोष होना।
(किसी का) मुँह फेरना-पराजित कर देना।
(अपना) मुँह फेरना-(१) उपेक्षा करना।
(२) किसी की ओर से ध्यान हटा लेना।
मुँह बन जाना (बनना)-चेहरे से असंतोष या अप्रसन्नता प्रकट होना।
ऊपर मन से या केवल नाम को कुछ कहना।
जो मन में आ जाय वही बेसमझे-बूझे कह डालने वाला।
शीघ्र ही वश में न आनेवाला, उद्दंड।
मुँहदिखराई, मुँहदिखरावनी,मुँहदिखाई,मुँहदेखनी, मुँहदेखरावनी
नयी वधू का मुँह देखने की क्रिया, भाव या उसके फलस्वरूप दिया जानेवाला धन।
जो हृदय से न हो, दिखावटी, ऊपरी भाव का।
बेसमझे-बूझे जो भी मन में आ जाय, कह देनेवाला।
जिससे रक्त का नहीं, केवल वचन या बात का संबंध हो।
मुँह भरने की क्रिया, भाव या पारिश्रमिक।
तो देखत बलि खाइगो, मुँहमाँगे फल देइ-९०८।
( क ) जो तुम मुँहमाँग्यौ फल पावहु-१०१६।
(ख ) आजु हरि पायौ है मुँह माग्यो-१९७२।
मुँह पर युवावस्था में निकलनेवाली फुंसियाँ।
अबहीं और की और होत कछु लागै बारा।
यहि ब्रज जन्म लियौ कै बारा-१०७०।
[सं . वरयात्रा, प्रा. बरयत्ता]
सजे-धजे समाज की बाजे-गाजे के साथ यात्रा।
[सं . वरयात्रा, प्रा. बरयत्ता]
बैठक जिसमें बारह दर या खंभे हों।
काशी का प्राचीन नाम जो वरुणा और असी नदियों के कारण अथवा 'पवित्र जल वाली' (वर+अनस् +जल) होने के कारण पड़ा था। 'उत्तम रथों वाली' होना भी इस नाम के पड़ने का कारण माना जाता है। 'बनारस' के स्थान पर 'काशी' का उक्त प्राचीन नाम पुनः प्रचलित हो गया है।
बन बारानसि मुक्तिछेत्र है, चलि तोकौं दिखराऊँ-१- ३४०।
हरि-दरसन की साध मुई.-१४३३।
(क) बूड़ि मुए, कै कहुँ उठि गए.-१-२८४।
(ख) अर्जुन कहयौ, सबै लरि मुए-१-२८८।
उनके मुऐं हिऐं सुख होइ-१-२८९।
सूरदास मुकताहल भोगी हंस ज्वारि को चुनही-३०१३।
कही हुई बात या काम से हट जाना, नटना।
कुछ कहकर मुकर जान्नेवाला।
मुकरने या नटने की क्रिया।
चार चरणों की एक कविता जिसके तीन चरणों का आशय दो जगह घट सकता है और चौथे चरण में किसी अन्य आशय को सूचित करके या अन्य पदार्थ का नाम लेकर, कही हुई बात से जैसे 'मुकरा' जाता है।
कही हुई बात या काम से हट जाना।
कहकर मुकर या नट जाने वाला।
लोभी, लौंद, मुकरवा, झगरू, बड़ी पढ़ैलौ, लूटा-१-१८६।
(क) हमैं नंदनंदन मोल लिए। जम के फंद काटि मुकराए, अभय अजाद किए.-१-१७१।
(ख) अस्वत्थामा कौं गहि ल्याए। द्रौपदि, सीस मूँड़ि मुकराए-१-२८९।
मुक्त कराया, छुटकारा दिलाया।
[हिं. मुकराना = मुक्त करना]
(क) ग्राह गहे गजपति मुकरायौ, हाथ चक्र ले धायो-१-१०।
(ख) बरुन पास अजपति मुकरायो-१-१७।
[हिं. मुकराना - मुक्त कराना]
गजहित धावन, जन-सुकरावन, बेद बिमल जस गावत-८-४।
चार चरण की एक कविता जिसके प्रथम तीन चरणों के दो आशय होते हैं और चौथे चरण में एक का नाम लेकर दूसरे से जैसे मुकरा जाता है।
हलके हल्के मुक्के या घूँसे लगाकर शरीर के अंगों की शिथिलता दूर करना।
आटा गूँधकर मुक्कियों से दबाना।
मुकुलित कुसुम नैन निद्रा तजि रूप-सुधा सियराइ-2८११।
(क) मुकुलित कच तन घन कि ओट ह्वै अँसुबन चीर निचोवति-१८००।
(ख) मुकुलित केस सुदेस देखिअत नील बसन लपटाए-१० उ०-३८।
खिलती या बढ़ती हुई (आयु)।
मुकुलित वय नव किसोर-2३६२।
मन बस होत नाहिंनैं मेरौं। ....। कहा करौं यह चरयौ बहुत दिन अंकुस बिना मुकेरैं-१-२०६।
मुक्का (सा) लगना - हृदय पर किसी-अप्रिय बात या कार्य का आघात लगना।
कहि राधा किन हार चोरायो।...। अमला अबला कंजा मुकुता हीरा नीला प्यारी-१५८०।
मुकुलना, मुकुलनो, मुकुलाना, मुकुलानो
मुकुलना, मुकुलनो, मुकुलाना, मुकुलानो
सूरदास प्रभु सब सुख-दाता दीनानाथ मुकुंद मुरारी-१-२२।
(क) कुंडल-मुकुट प्रभा न्यारी-१-६९।
(ख) मुकुट कुंडल पीत पट छबि अनुज भ्राता स्याम-2५६५।
निरखि कोमल चारु मूरति हृदय मुकुता दाम-2५६५।
गूँधे हुए आटे को मुटिठयों से दबाना।
जिसे मुक्ति या मोक्ष मिल गयी हो।
मागध हत्यौ मुक्त नृप कीन्है-१-१७।
कोटि मुक्त वारौं मुसुकनि पर-३१५४।
स्फुट या उद्भट काव्य जो प्रसंग से पूर्ण हो।
खुले हाथ से देनेवाला, बहुत उदार और बड़ा दानी।
भक्त हेत देह धरन, पुहुमी कौ भार हरन जनम जनम मुक्तावन-१०-२५१।
कंचन मुकुट कंठ मुक्तावलि मोर पंख छवि छावै-१५४९।
मूरी के पातन के बदले को मुक्ताहल दैहै-३१०५।
बंधन आदि से छूटने की क्रिया या भाव।
दायित्व आदि से छुटने की क्रिया या भाव।
वह गीत जिसमें बारह महीनों की दशा, स्थिति आदि का वर्णन हो।
जो बारहों महीनों फूलता-फलता हो।
बारहों महीने चलता रहने या होनेवाला।
कुबिजा कमलनैन मिलि खेलत बारहमासी फाग-३०९५।
जन्म-मरण से छूटने का भाव, मोक्ष।
अद्भुत राम-नाम के अंक। धर्म-अँकुर के पावन द्वै दल मुक्ति-नधू ताटंक-१-९०।
मुक्तिक्षेत्र, मुक्तिछेत्र
मुक्तिक्षेत्र, मुक्तिछेत्र
जहाँ मुक्ति प्राप्त हो सके।
बन बारानसि मुक्तिक्षेत्र है-१-३४०।
अपने ही मुख बड़े कहाना - अपनी प्रशंसा स्वयं करना।
अपने ही मुख बड़े कहावत - अपनी बड़ाई आप ही करते हो, अपने मुँह ही मियाँ मिट्ठू बनते हो।
उ. - अपने ही मुख बड़े कहावत हमहूँ जानति तुमकौं-2४९५।
जीवत मुख चितए - मुख देखकर ही जीवित रहता है।
उ. - चिरंजीव रहौ सूर नंद-सुत जीवत-मुख चितए-३१४१।
मुख जोना - आश्रित या सहारे होना।
विषयिनि के मुख जोए - विलास-वासना में ही लिप्त रहा।
उ. - तिलक बनाइ चले स्वामी ह्वै विषयिनि के मुख जोए-१- ५२।
मुख जोवै - मुँह ताकता है।
उ. - समुझि समुझि गृह आरति अपनी धर्मपुत्र मुख जोवै-१- २५९।
(किसी के) मुख न समाना - रोक न पाना, किसी का मुख बंद न कर पाना।
काहू मुख न समाउँ - किसी का मुख बंद नहीं कर पाती।
उ. - सुनि न जात घर घर को घेरा काहू मुख न समाउँ-१२२२।
मुख मोड़ना (मोरना) - मुँह फेर लेना, पूर्व संबंध की जरा भी परवाह न करके बिलकुल ध्यान हटा लेना।
मोरि रहै मुख-मुख मोड़ लेती है, पूर्व संबंध को बिलकुल भुलाकर सर्वथा उपेक्षा करती है।
उ. - चलत न कोऊ संग चलै, मोरि रहै मुख नारि-2- २९।
मोरि मुख - संबंध को सर्वथा भुलाकर, उपेक्षा करके।
उ. - चलत रही चित चोरि, मोरि मुख, एक न पग पहुँचायौ-2- ३०।
अब न बनै मुख मोरै - अब उपेक्षा नहीं कर सकते. अब उपेक्षा करने से काम नहीं बन सकता।
उ. - जुग-जुग बिरद यहै चलि आयौ, सत्य कहत अब हो रे।
सूरदास प्रभु पछिले खेवा अब न बनै मुख मोरे-४८८।
मुख सँभाल कर बोलना - परिस्थिति और व्यक्ति देखकर उचित बात करना।
मुख सँभारि बोलत नहिं बात - परिस्थिति और व्यक्ति देखकर उचित बात नहीं करती, मर्यादा और शिष्टाचार का ध्यान रखकर नहीं बोलती।
उ. - ये सब ढीठ गरब गौरस कैं, मुख सँभारि बोलति नहिं बात-१०- ३०८।
किसी वस्तु के आगे या पहले भानेवाली वस्तु।
कटि पट पीत मेखला मुखरित, पाइनि नूपुर सोहै-४५१।
मुखरित है-(स्वर) निकलता है, बोलता है।
मनु मधुकर बैठ्यौ अंबुज पर मुखरित है सुर भीनौ-सारा० १०५५।
दूसरों के सहारे या आश्रित रहनेवाला, पराश्रित।
मुख-शुद्धि के लिए दतौन आदि करने की क्रिया।
(क) दतवनि लै दोउनि करी मुखारी-४०७।
(ख) करी मुखारी अतुरई-१५४०।
बल्लभ-संप्रदायी मंदिरों में पूजन करने और भोग लगानेवाला व्यक्ति।
लकड़ी की 'जोड़ी' जिसे घुमाकर व्यायाम किया जाता है।
मोह या भ्रम में पड़ा हुआ।
वै किसोर कमनीय मुगध मैं लुबधत हूँ न डरी-१४५०।
मोह या भ्रम में पड़ा हुआ, मूढ़।
सुनु री ग्वारि मुगुध गँवारि-११९१।
जो (बात) धीरे या संकेत से कही जाय, जो (काम) कम खर्चे में चुपचाप कर लिया जाय।
भ्रम या मोह में पड़ा हुआ, मूढ़।
(क) मूरख मुग्ध अजान मूढ़मति नाहीं कोऊ तेरौ-१-३१९।
(ख) ऐसे प्रिय सौ मान करति है तो सौ मुग्ध न दूजी-2२७५।
जो माँगा गया हो, इच्छित, अभीष्ट।
मुखमाँगो पैहौ सूरज प्रभु साहुहिं आनि दिखावहु-३३४०।
मोहित या आसक्त होने का भाव।
नायिका जो युवती तो हो पर जिसमें काम-चेष्टा न हो।
मांधाता का पुत्र जो देवताओं से गहरी निद्रा का वर माँगकर बहुत समय तक एक गुफा में सोता रहा।
जब श्री कृष्ण का पीछा करता हुआ, जरासंध का सहायक कालयवन वहाँ आया, तब श्रीकृष्ण उसे अपना पीताम्बर उढ़ाकर चले गये।
कालयवन ने सोते हुए मुचुकुंद को श्री कृष्ण समझ कर लात मारी।
निद्रा से इस प्रकार जगाये जाने से क्रुद्ध होकर मुचुकुंद ने इस प्रकार कालयवन को देखा कि वह वहीं भस्म हो गया।
उ.-कालजवन मुचुकुंदर्हि सौं हरि भसम करायौ-ना. ४९८१।
आँखि मुचाई-आँख मूँदने का खेल, आँख मिचौनी।
इहँ हरि खेलत आँख मुचाई-३४०९।
धन जो किसी धनराशि से काट लिया गया हो।
बड़े को किया गया अभिवादन।
वेश्या का गान जिसमें वह नृत्य न करे।
'मैं' का रूप जो कर्ता और संबंध के अतिरिक्त अन्य कारकों में विभक्ति लगाने के पूर्व दिया जाता है।
'मैं' का वह रूप जो उसे कर्म और संप्रदान कारकों में प्राप्त होता है।
मुटाई चढ़ना - धन आदि का घमंड होना। मुटाई झाड़ना - घमंड चूर करना।
उतना पूला जो मुट्ठी में आ सके।
छड़ी आदि का मुट्ठी से पकड़ा जानेवाला भाग।
[सं. मुष्टिका, प्रा. मुट्ठिआ]
उतनी चीज जो हथेली बंद करने पर आ सके।
[सं. मुष्टिका, प्रा. मुट्ठिआ]
मुट्ठी एक प्रथम जब लीन्हें खान लगे जदुनाथ-सारा, ८१५।
मुट्ठी में - वश या अधिकार में।
मुट्ठी गरम करना - (१) धन देना।
(२) रिश्वत देना।
मुट्ठी बंद या बंधी होना - भेद या रहस्य प्रकट न होना।
मुट्ठी में रखा होना - पास या समीप होना।
छड़ी आदि का हाथ में पकड़ा जानेवाला भाग।
मुट्ठी में लेकर धीरे धीरे दबना।
मुठी भरि लियौ सब नाइ मुख हीं दियौ सूर प्रभु पियौ दव ब्रज जन बचायो-५९६।
मुड़कने या मुरकने की क्रिया या भाव।
किसी अन्य दिशा की ओर बढ़ना।
जिसके सिर पर बाल न हों, मुंडा।
जिस (स्त्री) के सिर पर बाल न हों, मुंडी।
मुडली पटिया पारि सँवारै कोढ़ी लावै केसरि-३०२६।
मुडवाना, मुडवानो, मुड़वाना, मुड़वानो
बाल मूँड़ने को प्रवृत्त करना।
मुडवाना, मुडवानो, मुड़वाना, मुड़वानो
मुडवाना, मुडवानो, मुड़वाना, मुड़वानो
मुड़ने, झुकने, घूमने या लौटने को प्रवृत्त करना।
जिसमें बहुत सूक्ष्मता हो।
महीन या सूक्ष्म होने का भाव।
साड़ी या दुपट्टे का वह भाग जो सिर पर रहता है।
मुडाना, मुडानो, मुड़ाना, मुड़ानो
सिर के सब बाल साफ कर देना।
वह (साधु, सन्यासी या जोगी) जिसका सिर मुंडा हआ हो।
यह निर्गुन लै ताहि सुनावहु जे मुड़िया बसैं कासी-३१०८।
ग्रीव मुतसिरी तोरि कै अँचरा सों बाँध्यौ-१५४१।
चंदन आँगन लिपाइ मुतियनि चौकें पुराइ-१०-९५।
एक प्राचीन अस्त्र जिसके सिरे पर गोल पत्थर लगा होता था।
सब कालों में बना रहनेवाला।
सेमर-फूल सुरँग अति निरखत मुदित होत खगभूप-१-१०२।
वह परकीया नायिका जो पर पुरुष-प्रीति की आकस्मिक प्राप्ति से सुखी हो।
एक प्राचीन अस्त्र जिसके सिरे पर गोल पत्थर लगा होता था।
मुद्रा अंकित करने का काम।
जिस (वैष्णव) के शरीर पर विष्णु के विभिन्न आयुध अंकित हों।
बनचरकौन देस तैं आयो। कहँ वै राम कहाँ वै लछिमन क्यौं करि मद्रा पायौ-९.८८।
काँच या स्फटिक का बना एक आभूषण जिसे गोरखपंथी साधु कान की लौ के बीच में छेद करके पहनते हैं।
(क) सृंगी मुद्रा कनक खपर लै करिहौं जोगिन भेस-2७५४।
(ख) मुद्रा भस्म बिषान त्वचा मृग व्रज जुवतिन मन भाए-2९९१।
(ग) मुद्रा न्याय अंग-अंग भूषन पति व्रत तें न टरौं-३०२७।
हाथ, पाँव, मुख आदि की कोई स्थिति।
विष्णु के आयुधों के चिन्ह जो वैष्णव अपने शरीर पर गुदवाता है।
हठ योग का विशेष अंग-विन्यास।
विष्णु के आयुधों के चिन्ह जो वैष्णव बाहु तथा अन्य अंगों पर गुदवाते हैं। यह मुद्रा दो प्रकार की होती है-शीतल और तप्त। शीतल मुद्रा चंदन आदि से की जाती है। पर तप्त मुद्रा तपे हुए ठप्पों से सामान्यतया द्वारका में दागी जाती है।
मूँड़यौ मूँड, कंठबन माला मुद्रा-चक्र दिये-१-१७१।
खसि मुद्रावलि चरन अरुझी गिरी धरनि बलहीन-३४५१।
राजति रुचिर कपोल महावर रद मुद्रावलि नाह दई री-2११५।
(क) कनक बलय मुद्रिका मोदप्रद-१-६९।
(ख) अब परतीतिं भई मन मोरै संग मुद्रिका लाए.-९-९०।
कुश की अँगूठी जिसे अनामिका में पहन कर पितृ-कार्य या तर्पण किया जाता है, पवित्री, पैंती।
(क) निसि मुद्रित प्रातहिं ए बिगसत, ए बिगसत दिनराति-१३४९।
(ख) नैन मुद्रित सकुच जैसे उदय ससि जलजात-३१३०।
एक तरह की बड़ी किशमिश या सूखा हुआ अंगूर।
मुनीश, मुनीश्वर, मुनीस, मुनीस्वर
मनु लाल मुनैयनि पाँति पिंजरा तोरि चली-१०-२४।
छोटों के लिए स्नेह सूचक शब्द या संबोधन।
मुयौ असुर सुर भए सुखारी-७-२।
भुने हुए गेहूँ के दानों को गुड़ में मिलाकर बनाया गया लड्डू।
मुरंडा होना - सूखकर काँटा होना।
एक दैत्य जिसे मारने से विष्णु मुरारि' कहलाये।
मधु-कैटभ मथन मुर भौम केसी भिदन कंस कुल काल अनुसाल हारी-१० उ०-५०।
मुड़ने-मुँड़कने की क्रिया या भाव।
मननशील महात्मा, त्यागी, तपस्वी।
मुनि सराप तै भए जमलतरु-१-७।
सूर स्याम की अदभुत लीला नहिं जानत मुनिजनियाँ-१०-८३।
मनु सीपज घर कियौ बारिज पर-१०-९३।
(क) बरषि छबि नव बारिधर तन, हरहु लोचन प्यास १०-२१८।
(ख) हृदय हरिनख अति बिराजत, छबि न बरनी जाइ। मनौ बालक बारिधर नव चंद दियौ दिखाइ-१०-२३४।
वह स्थान जहाँ पेड़ लगाये गये हों, बगीचा।
[सं. वाटी, हि. बाटिका = बगीचा, घेरा, घर]
जगत-जननी करी बारी, मृगा चरि चरि जाइ-९-६०।
लोचन भरि भरि दोऊ माता कनछेदन देखत जिय मुरकी-१०-१८०।
ताल देने का एक बाजा, मुँहचंग।
लोहे पर लगने वाला जंग, मोरचा।
अचेत, बेसुध या बेहोश होना।
सैन्य के लोग पुनि बहुत घायल किये लरयो ध्वजा धरि घर परयो मुरछाइ.-१० उ.-५६।
लगत त्रिसूल इन्द्र मुरछायौ-६-५।
सुनि नंद ब्याकुल ह्वै परे मुरछि धरनी-2६६२।
जो देखे द्रुम के तरे मुरछी सुकुमारी-१७९९।
इहिं बिधि बच सूनाय स्याम घन मुरछे मदन जगावते.-2७३५।
ताल मुरज रबाब बीना किन्नरो रस सार-१७४५।
(क) आनि अँचयौ जल जमुन कौ तबहिं गए मुरझाइ-५०४।
(ख) धरनि परी मुरझाइ जसोदा-५४४।
रहे मुरझाइ-अत्यन्त खिन्न या उदास हो गये हैं।
मदनगुपाल लाल के बिछुरे प्रान रहें मुरझाइ-३१५०।
पय सँग प्रान ऐंचि हरि लीनौ, जोजन एक परी मुरझाई-१०-५१।
गई मुरझाई-बहुत खिन्न या उदास हो गयीं।
ब्रज जुवती अति गई मुरझाई.-११४३।
गए मुरझाई-बहुत खिन्न या उदास हो गये।
सुनत सूर यह बात चकित पिय अतिहिं गए मुरझाई-2०१९
जहाँ खेलन को ठौर तुम्हारे, नंद देखि मुरझात-३४३३।
सूर सकत जैसे लछिमन तत्र बिह्वल होई मुरझान-2७८८।
कुम्हलाना, सूखने पर होना।
मुड़ता या हिलता डोलता है।
इत-उत अंग मुरत झकझोरत-१०-३००।
मुड़ता, हटता, फिरता या लौटता है।
(क) एक ते एक रणबीर जोधा प्रबल मुरत नहिं नेंक अति सबल जी के।
(ख) रुकत न पौन मह,वत पै मुरत न अंकुश मोरे-2८१८।
रति रन जुद्ध जाम तत्र नीके सेज परे उठि पुनि मुरझाने.-१६०७।
मूर्छित, अचेत या बेसुध हो गया।
लगत त्रिसूल इंद्र मुरझायौ-६-५।
पौढ़ि रहे धरनी पर तिरछे बिलखि बदन मुरझायौ-३५६।
सूरदास प्रभु पठै मधुपुरी मुरझि परीं ब्रजबाल-2५४०।
पुनि यह कहति मोहिं परमोधत धरनि गिरी मुरझैया-५६०।
अति बिपरीत भई सुनि सूर प्रभु मुरझ्यो मदन जगायो-१४६७।
एक जाति जो दोने-पत्तल बनाती है।
बारी बँधना-क्रम निश्चित होना।
बारी बाँधना-क्रम निश्चित करना।
बारी-बारी से-क्रमशः।
अबै तनक तू भई सयानी, हम आगे की बारी-१२४४।
कुँवर-कर गह्यौ बृषभानु-बारी-६८४।
भक्त परीच्छित हरि कौ प्यारौ। गर्भ-मँझार हुतौ जब बारी-१- २९०।
(क) सखियनि मंगन गवाइ, बहु बिधि बाजे बजाइ, पौढ़ायौ महल जाइ, बारौ रे कन्हैया-१०- ४१।
(ख) बालक दामिनि मानौ ओढ़े बारौ बारिधर-१०-१५१।
जो हाल ही में उगा या उदित हुआ हो।
उबाने या दुख देने वाली बात से चित्त हटाकर दूसरी ओर लगाना।
उबाने या दुख देने बाली बात से चित हटाकर दूसरी ओर ले जाना।
प्रेम पिये बर बारुनी बलकत बल न सँभार-११८२।
एक तरह का चूर्ण जिसकी गोली बंदूक से चलती है और जिसकी आतिशबाजी आदि बनती है।
(क) परम प्रान-जीवन-धन मेरे तुम बारे-१०- २०५।
(ख) नंद जू के बारे कान्ह छाँड़ि दै मथनियाँ-१०-१४५।
बारे तैं सुत ये ढँग लाए, मनहीं मनहिं सिहात-१०- ३२८।
वारौं ऐसी रिस जो करति सिसु बारे पर-३६२।
बारेक हमैं दिखावौ अपने बालापन की जोरी-१०. . उ.-११५।
बाल बाँका न होना (न बाँकना)–कष्ट या हानि न होना।
न्हात बाल न खसना (खिसना) - कष्ट या हानि न पहुँचना।
बाल पकना - बूढ़ा या अनुभवी होना।
(किसी काम में) बाल पकाना - काम करते-करते बूढ़ा या अनुभवी हो जाना।
बाल बराबर - बहुत महीन।
बाल बराबर न समझना - बहुत ही तुच्छ समझना।
बाल-बाल बचना - कष्ट या विपत्ति आने में जरा सी ही कसर रह जाना।
ब्रह्मा के रोएँ से उत्पन्न साठ हजार ऋषि जिनमें प्रत्येक एक अँगूठे के बराबर था।
बालगुबिंद्, बालगुबिंदा, बालगोबिंद बालगोबिंदा
कृष्ण का बालक-स्वरूप, बाल कृष्ण।
खेलन चलौ बालगोबिंद-१०-११८।
बालकों के प्राणघाती नौ ग्रह।
बालपन, बालपना, बालपनों, बाजपनौ
बालक या अबोध होने का भाव।
बालपन, बालपना, बालपनों, बाजपनौ
बालपनौ गए ज्वानी आवै-७- २।
बाल्यावस्था से ही ब्रह्मचर्य का पालन करनेवाला।
बाल्यावस्था के श्रीकृष्ण, बालकृष्ण, घुटनों के बल चलती श्रीकृष्ण की मूर्ति।
सुभग बालमुकुंद की छबि बरनि कापै जाइ-१०-२२५।
सुनहु सूर ए बालसँघाती प्रेम बिसारि मिले ढरि स्याम-१०६१।
सोलह-सत्रह वर्ष की युवती।
आदि ब्रह्म-जननी सुर-देवी, नाम देवकी बाला। दई बिवाहि कंस बसुदेवहिं, दुख-भंजन, सुख-माला-१०- ४।
बाल-बाला - अलग-अलग, चुपचाप।
बोल बाला होना - आदर-सत्कार होना।
बालापन खेलत ही खोयौ, जुवा बिषय-रस मात-१-११८।
सुग्रीव का बड़ा भाई जो किष्किंधा का राजा था।
बालि छाँड़ि कै सूर हमारे अब नरवाई को लुनै-३१५८।
बालू की दीवार (भीत) - ऐसी चीज जो शीघ्र ही ढह जाय।
[हिं. बालू+साही = अनुरूप]
विष्णु का पाँचवाँ अवतार जो राजा बलि को छलने के लिए अदिति के गर्भ से हुआ था।
विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण।
जसुमति धनि यह कोखि, जहाँ रहे बामन रे-१०-२८।
[सं. द्विपंचाशत, या द्विपण्णासा, प्रा. बिवण्णा]
बावन तोले पाव रत्ती - सभी तरह से ठीक।
बावन वीर - बड़ा वीर।
बड़े चौड़े मुँह का कुआँ जिसमें सीढ़ियाँ बनी हों।
छोटा तालाब, जिसमें सीढ़ियाँ बनी हों।
(क) टेरि-टेरि मैं भई बावरी, दोउ भैया तुम रहे लुकाई-४६२।
(ख) स्याम बिनु कछु न भावै रटत फिरत जैसे बकत बावरी-३४३२।
कहा डर करौं इहिं फनिग कौ बावरी-५५१।
एक तौ लालन लाड़नि लड़ाई दूजो यौवन बावरी-2७४९।
बारन हीं करौ बारन सहित फटकिहौं बावरे बात कहि मुख सँभारौ-2५९०।
रहने-बसने की क्रिया या भाव।
(क) ज्यौं मृगा कस्तूरि भूलै, सु तौ ताकैं पास। भ्रमत हीं वह दौरि ढुँढ़ै, जबहिं पावै बास-१७०।
(ख) जोजन-गंधा काया करी। मच्छ-बास ताकी सब हरी-१- २२९।
(ग) पदुम-बास सुगंध सीतल लेत पाप नसाहिं-१- ३३८।