बसुला, बसूला
लकड़ी छीलने, तोड़ने या गढ़ने का एक औजार।
संज्ञा
[सं. बासि + ला]

बसूली
छोटा बसूला।
संज्ञा
[हिं. बसूला]

बसेंड़ा
पतला बाँस।
संज्ञा
[हिं. बाँस + ड़ा]

बसे
वास किया, रहे।
क्रि. अ.
[हिं. बसना]
इहिं बिधि बन बसे रघुराइ। डासि कै तृन भूमि सोवत, द्रुमनि के फल खाइ ९-६०।

बसेरा
बसने या रहनेवाला।
वि.
[हिं. बसना]

बसेरा
रात को यात्री के टिकने का स्थान।
संज्ञा

बसेरा
रात को पक्षियों के रहने का स्थान।
संज्ञा
बसेरा करना - (१) रहना, निवास करना। (२) घर बनाकर बसना। बसेरा लेना - रहना, वास करना। बसेरा देना - (१) ठहराना। (२) आश्रय देना।

बसेरा
बसने या रहने का भाव, आबाद होना।
संज्ञा

बसेरी
रहनेवाला, निवासी।
वि.
[हिं. बसेरा]

बसेरो, बसेरौ
वह स्थान जहाँ टिककर रात बितायी जाती है, बासा।
संज्ञा
[हिं. बसेरा]
बसेरौ करै - डेरा डाले, निवास करे, ठहरे। उ. - बहुतै करौ उद्यम परिहरै। निर्भय ठौर बसेरौ करै-३-१३। कीन्हौ बसेरौ - घर बनाकर बस गये। उ. - कहा भयौ जो देश द्वारका कीन्हो दूर बसेरौ। लियो बसेरो - वास किया, रहे। उ. - कब हरि बालक भए गर्भ कब लियो बसेरौ।

बस्ती
आबादी।
संज्ञा
[सं. वसति]

बस्ती
जनपद।
संज्ञा
[सं. वसति]

बस्तु
चीज, वस्तु।
संज्ञा
[सं. वस्तु]

बस्त्र
कपड़ा।
संज्ञा
[सं. वस्त्र]

बस्य
वश में, अधीन।
वि.
[सं. वश्य]
(क) रीछ कीस बस्य करौं, रामहि गहि ल्याऊँ ९-११८। (ख) जो जिहिं भाव भजै, प्रभु तैसे। प्रेम बस्य दुष्टनि कौं नसे -३९१। (ग) आइ पहूँच्यौ काल बस्य, पग इतहिं चलायौ-५८९।

बस्यौ
बसा, रहा, निवास बनाया।
कि. अ.
[हि. बसना]
जनम तौ बादिहिं गयौ सिराइ। हरि सुमिरन नहिं गुरु की सेवा, मधु्बन वस्यौ न जाइ १-१५५।

बस्यौ
सुख लूटा, आनंद मनाया, मौज उड़ायी।
क्रि. अ.
[हि. बसना]
ज्यौं विट पर-तिय सँग बस्यौ, (रे) भोर भए भई भीति-१-३२५।

बहँगा
बड़ी बहँगी।
संज्ञा
[सं. वहन +अंग]

बहँगी
बोझा ढोने की काँवर।
संज्ञा
[हिं. बहँगा]

बहक
मद में चूर होकर की गयी बात।
संज्ञा
[हि. बहकना]

बसैं
बसते हैं।
क्रि. अ.
[हिं बसना]
मन बसै - ध्यान में बने रहते हैं। उ - सूरदास मन बसैं तोतरे वचन बर-१०-१५१।

बसैंगे
वास करेंगे, रहेंगे।
क्रि. अ.
[हिं. बसना]
आजु बसैंगै रैनि तुम्हारे प्रान पियारी ही तुम बाम-१९२९।

बसैया
बसने या रहनेवाला।
वि.
[हिं. बसना]
कबहुँ कहत हरि माखन खायो, कौन बसैया कहत गाँव री।

बसैहैं
बसायेंगे, जन-पूर्ण करेंगे।
क्रि. स.
[हिं. बसाना]
नंदहुँ तैं ये बड़े कहैहैं फेरि बसैहैं यह ब्रज नगरी-१०-३११।

बसैहै
बसायेगी।
क्रि. स.
[हिं. बसाना]
जाति। पाँति के लोग न देखति, और बसैहै नैरी-१०-३२४।

बसोबास
निवास स्थान।
संज्ञा
[हि. बास+आवास]

बसौं
वास करूँ, रहूँ।
क्रि. अ.
[हिं. बसना]
अपने नाम की बैरख बाँघौं, सुबस बसौं इहिं गाउँ-१-१८५।

बसौंधी
सुगन्धित रबड़ी।
संज्ञा
[हिं. बास + औंधी]

बसौ
रहो, निवास करो।
क्रि. अ.
[हिं. बसना]
पुहुप बेगि पठएँ बनै, जौ रे बसौ ब्रजपालि-५८९।

बस्तर
वस्त्र, कपड़ा।
संज्ञा
[सं. वस्त्र]
तेल लगाइ कियौ रुचि-मर्दन, बस्तर मलि-मलि धोए-१-५२।

बहाइ
देउ बहाइ-बहा दो, प्रवाहित कर दो।
प्र.
(क) प्रथमहि देउ गिरिहि बहाइ-९४३। (ख) मारौ स्याम राम दोउभाइ गोकुल देउ बहाइ-2५७८।

बहाईँ
प्रवाहित कीं।
क्रि. स.
[हिं. बहाना]
परत फिराइ पयोनिधि भीतर, सरिता उलटि बहाईँ ९-१२४।

बहाउ
बहा दे, नष्ट कर दे।
संज्ञा
[हि. बहाव]
काम-क्रोध-बिषाद-तृष्ना सकल जारि बहाउ १-३१४।

बहाऊँ
प्रवाहित करूँ, बहा दूँ।
क्रि. स.
[हिं. बहाना]
(क) पांडव-दल सन्मुख ह्वै धाऊँ, सरिता-रुधिर बहाऊँ-१-२७०। (ख) होइ सनमुख भिरौं, संक नहिं मन धरौं, मारि सब कटक सागर बहाऊँ-९-१२४।

बहाऊ
बहा दिया।
क्रि. स.
[हिं. बहाना]

बहाऊ
मारि बहाऊ-मारकर बहा दिया, नष्ट कर दिया, समाप्त कर दिया, मिटा दिया।
प्र.
भक्त हेत अवतार धरे,सब असुरनि मारि बहाऊ-१०-२२१।

बहादुर
साहसी।
वि.
[फ़ा]

बहादुर
पराक्रमी।
वि.
[फ़ा]

बहादुरी
साहस।
संज्ञा
[फ़ा.]

बहादुरी
पराक्रम।
संज्ञा
[फ़ा.]

बास
आग, अग्नि।
संज्ञा
[सं. वाशिः]

बास
एक अस्त्र।
संज्ञा
[सं. वाशिः]

बास
छुरी, चाकू।
संज्ञा
[सं. वाशिः]

बासकसज्जा
वह नायिका जो श्रृंगार करके शैया सजाकर नायक की प्रतीक्षा करती हो।
संज्ञा
[सं. वासकसज्जा]

बासन
बरतन, पात्र।
संज्ञा
[सं.]
उ०- जल-बासन कर लै जु उठावति, याही मैं तू (= चंद्र) तन धरि आवै-१०-१९१।

बासना
इच्छा।
संज्ञा
[सं. वासना]

बासना
महक।
संज्ञा
[सं. वासना]

बासना
सुगंधित करना।
क्रि. स.
[सं. बास]

बासमती
एक बढ़ि या चावल।
संज्ञा
[हिं. बास+मती]

बासर
दिन।
संज्ञा
[सं. वासर]
(क) रजनीगत बासर मृगतृष्ना रस हरि कौ न चयौ-१७८। (ख) बासर संग सखा सब लीन्हें टेरि न धेनु चरैहौं २६५०।

बासर
प्रातःकाल।
संज्ञा
[सं. वासर]

बासर
प्रातःकाल गाया जानेवाला राग।
संज्ञा
[सं. वासर]

बासव
इंद्र।
संज्ञा
[सं.]

बासवी दिशा
पूर्व दिशा।
संज्ञा
[सं.]

बाससी
कपड़ा, वस्त्र।
संज्ञा
[सं.]

बासा
रहने की क्रिया या भाव, निवास।
संज्ञा
[सं. वास, हिं. बास]
(क) देवहूति कह, भक्ति सो कहियै। जातैं हरि-पुर बासा लहियै-३-१३। (ख) करहु मोहिं ब्रज रेनु देहु बृंदाबन बासा-४९२।

बास
स्थिति, उपस्थिति, विद्यमानता।
संज्ञा
[सं. वास, हिं. बास]
सर्ब तीर्थ कौ बासा तहाँ, सूर हरि-कथा होवै ज़हाँ-१-२२४।

बासित
सुगंधित किया हुआ।
वि.
[सं. वासित]

बासी
बहुत देर का पकाया हुआ।
वि.
[हिं. बासस् या बास]

बासी
बहुत समय का रखा हुआ।
वि.
[हिं. बासस् या बास]

बासी
बहुत पहले का तोड़ा हुआ।
वि.
[हिं. बासस् या बास]

बासी
जो हराभरा न हो।
वि.
[हिं. बासस् या बास]
बासी कढ़ी में ज्यादा उबाल आता है - वृद्धावस्था में अधिक काम-वासना होती है (व्यंग्य)। बासी मुँह - प्रातःकाल बिना कुछ खाये-पिये।

बासी
रहने-बसनेवाला।
वि.
[सं. वासिन्]

बासु
निवास। निवास-स्थान।
संज्ञा
[हिं. बास]

बासु
निवास-स्थान।
संज्ञा
[हिं. बास]

बासुकि, बासुकी
आठ नाग राजाओं में से दूसरा जिसको 'नेति' बनाकर समुद्र-मंथन किया गया था।
संज्ञा
[सं. वासुकि]
कह्यौ भगवान, अब बासुकी ल्याइयै...नेति करि अचल कौं सिंधु नायौ-८-८।

बासुदेव
वासुदेव के पुत्र श्रीकृष्ण।
संज्ञा
[सं. वासुदेव]

बासू
वासुकि नाग।
संज्ञा
[सं. वासुकि]

बासू
निवास
संज्ञा
[हिं. बास]

बासू
निवास स्थान।
संज्ञा
[हिं. बास]

बासौंधी
सुगंधित और लच्छेदार रबड़ी।
संज्ञा
[हिं. बास + औंधी]
बासौंधी सिखरनि अति सोंधी २३२१।

बाहँ
हाथ, बाहु, भुजा।
संज्ञा
[सं. बाहु]
बाहँ लै - सहारा देकर, हाथ पकड़कर, आश्रय में लेकर। उ. - (क) बचन बाँह लै चलौ गाँठि दै, पाऊँ सुख अति भारी-१-१४६। (ख) नूपुर-कलरव मनु हंसनि-सुत रचे नीड़ दै बाँह बसाये-१० १०४।

बाहक
यान या सवारी हाँकने वाला, सारथी।
संज्ञा
[हिं. वाहक]
कह पांडव कैं घर ठकुराई, अर्जुन के रथ-बाहक-१-१९।

बाहकी
पालकी ढोनेवाली।
संज्ञा
[सं. बाहक + ई]

बाहन
सवारी।
संज्ञा
[सं. वाहन]

बाहन
वह जिस पर कोई चीज चढ़ायी जाय।
संज्ञा
[सं. वाहन]

बाहना
ढोना, लादना, चढ़ाना।
क्रि. स.
[सं. वहन]

बाहना
(शस्त्र) चलाना।
क्रि. स.
[सं. वहन]

बाहना
(वाहन) हाँकना।
क्रि. स.
[सं. वहन]

बाहना
पकइना।
क्रि. स.
[सं. वहन]

बाहना
बहाना, प्रवाहित करना।
क्रि. स.
[सं. वहन]

बाहना
हल चलाना।
क्रि. स.
[सं. वहन]

बाहनी
सेना।
संज्ञा
[सं. वाहिनी]

बाहर
भीतर' या 'अंदर' का, उलटा।
क्रि. वि.
[सं. बाह्य]
तु जिहिं हित नहिं बाहर आवै। सो हमसों कहि क्यों न सुनावै-१- २२६। (ख) नाहिन मीन जियत जल बाहर जो घृत मैं सजियो-३१४७।
बाहर-बाहर - बिना किसी को सूचित किये।

बाहर
अन्य स्थान पर।

बाहर
प्रभाव, संबंध आदिसे परे।

बाहरजामी
ब्रह्म का सगुणरूप, ब्रह्म के अवतार।
संज्ञा
[सं. बाह्ययामी]

बाहरी
जो घर का न हो, पराया।
वि.
[हिं. बाहर]

बाहरी
अपरिचित।
वि.
[हिं. बाहर]

बाहरी
केवल बाहर का, ऊपरी।
वि.
[हिं. बाहर]

बाहाँजोरी
हाथ में हाथ डाल कर।
क्रि. वि.
[हिं. बाँह+जोड़ना]
(क) बाहाँजोरी निकसे कुंज तैं। (ख) राजत हैं दोउ बाहाँजोरी दंपति अरु ब्रज बाल।

बाहिज
ऊपर से, देखने में।
संज्ञा
[सं. बाह्य]

बाहिनी
सेना।
संज्ञा
[सं . वाहिनी]

बाहिनी
सवारी, यान।
संज्ञा
[सं . वाहिनी]

बाहिनी
नदी।
संज्ञा
[सं . वाहिनी]

बाहिर
भीतर' या ‘अंदर का उलटा।
क्रि. वि.
[हिं. बाहर]

बाहिर
घर से दूर, अन्य किसी जगह पर।
क्रि. वि.
[हिं. बाहर]
जाति-पाँति सबकी हौं जानौं, बाहिर छाक मँगाई। ग्वालनि के सँग भोजन कीन्हौं, कुल कौं लाज लगाई-१- २४४।

बाहिर
ऊपर से देखने में।
तुम जो कहति हौ मेरो कन्हैया, गंगा कैसो पानी। बाहिर तरुन किसोर बयस बर, बाट घाट कौ दानी-१०-३११।

बाहिरी
व्यक्त, अपरिचित जैसी।
वि.
[हिं. बाहर]
सुजन-बंधु ते भई बाहिरी अब कैसे वै करत बड़ाई - पृ. ३४२ (१०)।

बाहिरैं
बाहर की ओर।
क्रि. वि.
[हिं. बाहर]
छरीदार बैराग बिनोदी, झिरकि बाहिरै कीन्हें-१-४०।

बाहीं
हाथ, बाँह, भुजा।
संज्ञा
[हिं. बाँह]
कहत पसारे बाहीं - हाथ उठाकर, दृढ़ता पूर्वक, पूर्ण विश्वास और निश्चय के साथ। उ. - अजहूँ चेति, कह्यौ करि मेरौ, कहत पसारे बाहीं। सूरदास सरबरि को करिहै, प्रभु-पारथ द्वै नाहीं-१-२६९।"

बाहु
भुजा, हाथ।
संज्ञा
[सं.]

बाहुज
जो बाहु से उत्पन्न हो।
वि.
[सं.]

बाहुबल
पराक्रम, वीरता।
संज्ञा
[सं.]
भए भस्म कछु बार न लागी, ज्यौं ज्वाला पट चीर। सूरदास प्रभु आपु बाहुबल कियौ निमिष मैं कीर-९-१५८।

बाहुमूल
कंधे और बाँह का जोड़।
संज्ञा
[सं.]

बाहुयुद्ध
कुश्ती।
संज्ञा
[सं.]

बाहुल्य
अधिकता।
संज्ञा
[सं.]

बाहेर
अंदर' या ‘भीतर' का उलटा।
क्रि. वि.
[हिं. बाहर]
बाहेर जिनि कबहूँ खैये सुत, डीठि लगैगी | काहू-१००४।

बाहेर
पद संबंध आदि से च्युत।
क्रि. वि.
[हिं. बाहर]

बाह्‌‍मन
ब्राह्मण।
संज्ञा
[सं.]

बाह्य
बाहर का, बाहरी।
वि.
[सं.]

बाहयाचरण
दिखावा, आडंबर।
संज्ञा
[सं.]

बिंग
व्यंग्य।
संज्ञा
[सं. व्यंग्य]
करत बिंग ते बिंग दूसरी जुक्त अलंकृत माहीं।

बिंग
ताना।
संज्ञा
[सं. व्यंग्य]

बिंजन
भोजन के पदार्थ।
संज्ञा
[सं. व्यंजन]

बिंद
पानी की बूँद।
संज्ञा
[सं. विंदु]

बिंद
भँवों के बीच का स्थान।
संज्ञा
[सं. विंदु]

बिंद
वीर्य की बूंद।
संज्ञा
[सं. विंदु]

बिंद
बिंदी।
संज्ञा
[सं. विंदु]
(क) चिबुक मध्य मेचक रुचि राजत बिंद कुंद रदनी-पृ. ३१६ (५४)। (ख) कंठश्री दुलरी बिराजति चिबुक स्यामल बिंद-पृ. ३४४ (२९)।

बिंद
माथे का गोल तिलक।
संज्ञा
[सं. विंदु]

बिंदा
गोल चिन्ह या बिंदु।
संज्ञा
[सं. विंदु]

बिंदा
गोल बड़ा टीका, बड़ी बिंदी।
संज्ञा
[सं. विंदु]
(क) मृगमद-बिंदा तामैं राजै। निरखत ताहि काम सत लाजै-३-१३। (ख) मसि-बिदा दियौ भ्रू पर-१०-९२।

बिंदा
राधा की सखी एक गोपी का नाम।
संज्ञा
[सं. वृन्दा]
इंदा बिंदा राधिका स्यामा कामा नारि-११०२।

बिंदी
शून्य, सिफर।
संज्ञा
[सं. विंदु]

बिंदी
छोटा गोल टीका।
संज्ञा
[सं. विंदु]

बिंदी
माथे पर लगाने का गोल छोटा टीका।
संज्ञा
[सं. विंदु]

बिंदु
बूँद
संज्ञा
[हिं. बूँद]
स्याम हृदय अति बिसाल माखन-दधि बिंदु-जाल-१०- २७५।

बिंदु
गोल टीका, बिंदा।
संज्ञा
[सं. विंदु]
भाल तिलक मसि बिंदु बिराजत, सोभित सीस लाल चौतनियाँ-१०-१०६।

बिंदुलि, बिंदुली
बिंदी।
संज्ञा
[हिं. बिंदी]

बिंदुका
बड़ी बिंदी, बिंदा, गोल टीका।
संज्ञा
[सं. विंदु]
(क) कठुला कंठ बज्र केहरि-नख, मसि बिंदुका सु मृग-मद भाल-१०-८४। (ख) लट कनि मोहन मिस-बिंदुका तिलक भाल सुखकारी ! (ग) गोरोचन कौ तिलक निकटहीं काजर बिदुका लाग्यौ री-१०-१३९।

बिंदुरी, बिंदुली
बिंदी।
संज्ञा
[सं. विंदु]

बिंदुरी, बिंदुली
माथे का छोटा गोल टीका।
संज्ञा
[सं. विंदु]
बंदन बिंदुली भाल की भुज आप बनाए-३१३९।

बिंद्राबन
मथुरा का निकटवर्ती एक उपनगर जो श्रीकृष्णचन्द्र का क्रीड़ास्थल होने के कारण उनके भक्तों के लिए एक तीर्थ है।
संज्ञा
[सं. वृंदावन]

बिंध, बिध्य
विध्य पर्वत।
संज्ञा
[सं. विंध्याचल]

बिंधना
बींधा या छेदा जाना।
क्रि. अ.
[सं. वेधन]

बिंधना
फँसना, उलझना।
क्रि. अ.
[सं. वेधन]

बिंधिया
मोती छेदनेवाला।
संज्ञा
[हिं. बींधना]

बिंब, बिंबा
प्रतिबिंब, छाया।
संज्ञा
[सं. बिंब]
(कान्ह) मनिमय कनक नंद कैं आँगन बिंब पकरिबैं धावत-१०-११०।

बिंब, बिंबा
प्रतिमूर्ति।
संज्ञा
[सं. बिंब]

बिंब, बिंबा
कुँदरू नामक लाल फल।
संज्ञा
[सं. बिंब]
(क) गति मराल अरु बिंब अधर-छबि, अहि अनूप कबरी-९-६३। (ख) मनौ सुक फल बिंब कारन, लेन बैठ्यौ आइ-१०-२३४।

बहाना
प्रवाहित करना।
क्रि. स.
[हिं. बहना]

बहाना
प्रवाह के साथ छोड़ देना।
क्रि. स.
[हिं. बहना]

बहाना
बुंद या धार के रूप में छोड़ना।
क्रि. स.
[हिं. बहना]

बहाना
हवा चलाना।
क्रि. स.
[हिं. बहना]

बहाना
व्यर्थ और अँधाधुंध खर्च करना।
क्रि. स.
[हिं. बहना]

बहाना
फेंक देना , पास न रखना।
क्रि. स.
[हिं. बहना]

बहाना
बहुत सस्ता बेच देना।
क्रि. स.
[हिं. बहना]

बहाना
झूठ बोलकर टालना, हीला।
संज्ञा
[फ़ा. बहानः]

बहाना
झूठी बात।
संज्ञा
[फ़ा. बहानः]

बहाना
निमित, कारण।
संज्ञा
[फ़ा. बहानः]

बिंब, बिंबा
चंद्र या सूर्य-मंडल।
संज्ञा
[सं. बिंब]

बिंब, बिंबा
झलक, आभास।
संज्ञा
[सं. बिंब]

बिंब, बिंबा
बाँबी।
संज्ञा
[हिं बाँबी]

बिंबित
जिसकी छाया पड़ती हो।
वि.
[सं.]

बि
दो।
वि.
[सं. द्वि]

बिआज
ब्याज।
संज्ञा
[हिं. ब्याज]

बिआधि
रोग, व्याधि।
संज्ञा
[सं. व्याधि]

बिआधु
बहेलिया, ब्याध।
संज्ञा
[सं. व्याध]

बिआना
बच्चा जनना।
क्रि. स.
[हिं. ब्याना]

बिआस
कथा कहनेवाला।
संज्ञा
[सं. व्यास]

बिआस
व्यास देव।
संज्ञा
[सं. व्यास]

बिआहना
विवाह करना।
क्रि. स.
[हिं. ब्याहना]

बिओग
बिछोह, वियोग।
संज्ञा
[सं. वियोग]

बिओगी
जिसके प्रियजन का वियोग हुआ हो, वियोगी।
वि.
[सं. वियोगी]

बिकट
विकराल, भयंकर, डरावना।
वि.
[सं. विकट]
बिकट रूप अवतार धरयौ जब सो प्रहलाद बचाऊ-१०-२२१।

बिकट
वक्र, टेढ़ा।
वि.
[सं. विकट]
भृकुटी बिकट निकट नैनन के राजत अति बर नारि।

बिकट
कठिन, मुश्किल।
वि.
[सं. विकट]
नित-प्रति सबै उरहने के मिस आवत हैं उठि प्रात। अनसमुझे अपराध लगावति बिकट बनावति बात-१०-३२६।

बिकना
बेचा जाना, बिक्री होना।
क्रि. अ.
[सं. विक्रय]
किसी के हाथ बिकना - (१) दास होना। (२) आसक्त होना।

बिकरम
पराक्रम।
संज्ञा
[सं. विक्रम]

बिकरम
विक्रमादित्य।
संज्ञा
[सं. विक्रम]

बिकरार
भयानक, डरावना।
वि.
[सं. विकराल]
चले सब मिलि जाइ देख्यौ अगम तन बिकरार-४२७।

बिकरार
घोर, घमासान।
वि.
[सं. विकराल]
कियौ जुद्ध अतिहीं बिकरार-१-२७६।

बिकरार
ब्याकुल, बेचैन, विकल।
वि.
[फा. बेकरार]
गोसुत-गाइ फिरत बिकरार-१०५५।

बिकराल
भयानक।
वि.
[सं. विकराल]

बिकल
व्याकुल, घबराया हुआ, बेचैन।
वि.
[सं. विकल]
(क) बारह बरष नींद है साधी, तातैं बिकल सरीर-९-१४५। (ख) मीड़त हाथ सकल गोकुलजन बिरह बिकल बेहाल-2५३६।

बिकलाई
बेचैनी।
संज्ञा
[सं. विकल + आई]

बिकलाना
घबराना।
क्रि. अ.
[सं. विकल]

बिकलाना
व्याकुल या बेचैन करना।
क्रि. स.
[सं. विकल]

बिकलानी
व्याकुल हुई।
क्रि. स.
[हिं. बिकलना]
(क) यह सुनि तरुनी बिकलानी-११६१। (ख) निठुर बचन सुनि स्याम के जुवती बिकलानी - पृ. ३४१ (४)। (ग) धरनी परे अचेत नहीं सुधि सखी देखि बिकलानी-2२०८।

बिकलाने
व्याकुल होकर।
क्रि. अ.
[हिं. बिकलाने]
फिरि सब चले अतिहिं बिकलाने-१०६०

बिकली
व्याकुलता।
संज्ञा
[हिं. बिकल]

बिकवाना
बेचने को प्रवृत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. बिकना]

बिकवाल
बेचनेवाला।
संज्ञा
[हिं. बेचना]

बिकसना
फूलना, खिलना।
क्रि. स.
[सं. विकसन]

बिकसना
प्रसन्न या हर्षित होना।
क्रि. स.
[सं. विकसन]

बिकसाना
खिलना, फूलना।
क्रि. अ.
[हिं. बिकसना]

बिकसाना
प्रसन्न या प्रफुल्लित होना।
क्रि. अ.
[हिं. बिकसना]

बिकसाना
खिलाना
क्रि. स.
[हिं. बिकसना]

बिकसाना
प्रसन्न करना।
क्रि. स.

बिकसाने
विकसित हुए, खिल गये, फूले।
क्रि. अ.
[हिं. बिकसना]
रबि-छबि कैधौं निहारि, पंकज बिकसाने-६४२।

बिकाने
बिके, बिक गये।
क्रि. अ.
[हिं. बिकना]
जो राजा-सुत होइ भिखारी, लाज परे ते जाइ बिकाने-१-२१७।
जसुमति हाथ बिकाने - यशोदा के वश में हो गये, उसके अनुचर या सेवक हो गये। उ. - सूरदास प्रभु भाव-भक्ति के, अति हित जसुमति हाथ बिकाने-३८०।

बिकानौ
बिका हूँ, बिक गया हूँ।
क्रि. अ.
[हिं. बिकना]
हाथ बिकानौ - दास हो गया हूँ, गुलाम हूँ। उ. - (क) अब हौं माया-हाथ बिकानौ। परबस भयौ, पसू ज्यौं रजु-बस, भज्यौ न श्रीपति रानौ-१-४७। (ख) नंद-नंदन-पद-कमल छाँड़ि कै मायाहाथ बिकानौ-१-६३। (ग) तदपि सूर मैं भक्तबछल हौं, भक्तनि हाथ बिकानौ-१-२४३।

बिकान्यौ
बिक गया।
क्रि. अ.
[हिं. बिकना]
हाथ बिकान्यौ - वशीभूत हो गया, मुग्ध हो गया, दास हो गया। उ. - ठाढ़े स्याम रहे मेरे आँगन तब ते मन उन हाथ बिकान्यौ-१४६०।

बिकाय
बिकती है।
क्रि. अ.
[हिं. बिकाना.]
प्रानन के बदले न पाइयत सेंति बिकाय सुजस की ढेरी-2८५२।

बिकायौ
बिका, बेचा गया।
क्रि. अ.
[हिं. बिकना]
हाथ बिकायौ - दास हो गया, वश में हो गया। उ. - द्विजकुल-पतित अजामिल बिषयी, गनिका हाथ बिकायौ-१-१०४।

बिकार
दोष, बुराई, अवगुण।
संज्ञा
[सं. विकार]
सागर सूर भर्यौ बिकार-जल, बधिक-अजामिल बापी-१-१४०।

बिकार
बिगड़ा हुआ रूप, विकृति।
संज्ञा
[सं. विकार]

बिकार
रोग।
संज्ञा
[सं. विकार]

बिकार
पाप।
संज्ञा
[सं. विकार]
कमलनैन की लीला गावत कटत अनेक बिकार-2-२।

बिकार
कुवासना।
संज्ञा
[सं. विकार]

बिकसावै
खिला दे, प्रस्फुटित कर दे।
क्रि. अ.
[हिं. बिकसाना]
पाहन-बीच कमल बिकसावै, जल मैं अगिनि जरै-१०१०५।

बिकसाहिं, बिकसाहीं
खिलते हैं, विकसित होते हैं, फूलते हैं।
क्रि. अ.
[हिं. बिकसना]
(क) चलि सखि, तिहि सरोवर जाहिं। जिहिं सरोवर कमल कमला, रवि बिना बिकसाहि-१-३३८। (ख) पाहन बीच कमल बिकसाहीं जल मैं अगिनि जरै।

बिकसाहिं, बिकसाहीं
खिलाते हैं।
क्रि. स.
[हिं. बिकसना]

बिकसाहिं, बिकसाहीं
प्रसन्न करते हैं।
क्रि. स.
[हिं. बिकसना]

बिकाउँ, बिकाऊँ
बिक जाऊँ, बिक्री हो जाय।
क्रि. अ.
[हिं. बिकना]
कलुषी अरु मन मलिन बहुत मैं सेंत-मेंत न बिकाउँ-१-१२८।

बिकाऊ
जो बिकने को हो।
वि.
[हिं. बिकना +आऊ]

बिकात
बिकता है।
क्रि. अ.
[हिं. बिकना]
(क) सूरदास स्वामी के बिछुरे कौड़ी भरि न बिकात-2५४१। (ख) सुजस बिकात बचन के बदले क्यों न बिसाहत आजु-2८५१।
चित्त बिकात - चित्त वशीभूत हो जाता है। उ. - इक सायक इक चाप चपल अति चिबुक मैं चित्त बिकात-१६८२।

बिकाना
बेचा जाना।
क्रि. अ.
[हिं. बिकना]

बिकानीं
बिक गयीं।
क्रि. अ.
[हिं. बिकना]

बिकानीं
अति मुग्ध हो गयीं, वशीभूत हो गयीं।
क्रि. अ.
[हिं. बिकना]
(क) स्याम अंग जुवती निरखि भुलानीं। कोउ निरखति कुंडल की आभा, इतनेहिं माँझ बिकानी-६४४। (ख) उन मो तन मैं उन तन चितयो तब ही ते उन हाथ बिकानी-८५०। (ग) बिबस भइ तनु न सँभारै री गोरस सुधि बिसरि गई आपु बिकानी बिनु मोलै-११८४। (घ) बिकानी हरि-दुख की मुसकानी-११९७।

बिकार
हानि, कुप्रभाव।
संज्ञा
[सं. विकार]
सहसौ फन फनि फुंकरै, नैकु न तिन्हैं बिकार-५८९।

बिकारी
कामी, वासनावाला, दुष्ट मनोवृत्ति का।
वि.
[हिं. विकारी]
रे रे अंध बीसहू लोचन, पर-तिय-हरन बिकारी। सूनै भवन गवन तैं कीन्हौ, सेष-रेख नहि टारी-९-१३२।

बिकारी
बिगड़े हुए या विकृत रूपवाला।
वि.
[हिं. विकारी]

बिकारी
बुरा, हानिकारक।
वि.
[हिं. विकारी]
वि.

बिकारी
टेढ़ी पाई।
संज्ञा
[सं. वंक]

बिकारै
दोष से, ऐब से, बुराई से, अवगुण से।
संज्ञा
[सं. विकार+ऐं (प्रत्य.)]
जौ प्रभु मेरे दोष बिचारै। करि अपराध अनेक जन्म लौं, नख-सिख भरौ बिकारैं-१-१८३।

बिकासना
विकसित करना।
क्रि. स.
[सं. विकासन]

बिकासना
फूल खिलाना।
क्रि. स.
[सं. विकासन]

बिकासना
विकसित होना।
क्रि. अ.

बिकासना
(फूल) खिलना।
क्रि. अ.

बिखम
जो दो से न विभाजित हो।
वि.
[सं. विषम]

बिखम
जिस (छंद) के चारों चरणों में समान अक्षर या मात्राएँ न हों।
वि.
[सं. विषम]

बिखरना
फैलना, छितरना।
क्रि. अ.
[सं. विकीर्ण]

बिखराए
छितरा दिये, इधर-उधर फैला दिये।
क्रि. स.
[हिं. बिखराना]
चोली, चीर, हार बिखराए। आपुन भागि इतहिं कौं आए-७९९।

बिखराना
फैलाना, छितराना।
क्रि. स.
[हिं बिखरना]

बिखरैहैं
तोड़े-फोड़ेंगे, इधर-उधर फैलायँगे, तितर-बितर करेंगे, छितरायँगे।
क्रि. स.
[हिं. बिखराना]
जिन पुत्रनिहि बहुत प्रतिपाल्यौ, देवी-देव मनैहै। तेई लै खोपरी बाँस दै सीस फोरि बिखरैहैं-१-८६।

बिखाद
दुख, खेद।
संज्ञा
[सं. विषाद]

बिखान
पशु के सींग।
संज्ञा
[सं. विषाण]

बिखेरना
फैलाना, छितराना।
क्रि. स.
[हिं. बिखरना]

बिख्यात
जिसे सब जानते हों, प्रसिद्ध।
वि.
[सं. विख्यात]
(क) जनम-मरन-काटन कौं कर्तरि तीछन बहु बिख्यात-१-९०। (ख) तिनके काज अंस हरि प्रगटे ध्रुव जगत बिख्यात। (ग) दच्छ के उपजीं पुत्री सात। तिनमें सती नाम बिख्यात-४-४।

बिकैहै
बिकेगी।
क्रि. अ.
[हिं. बिकना]
ऊधौ, जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहै-३१०५।

बिक्रम
बल, शौर्य या शक्ति की अधिकता, पराक्रम।
संज्ञा
[सं. विक्रम]
करि दंडवत बिनय उच्चारी। तुम अनंत बिक्रम बनवारी-७-२।

बिक्रम
विक्रमादित्य।
संज्ञा
[सं. विक्रम]

बिक्रमी
विक्रम-संबंधी।
संज्ञा
[सं. वैक्रमीय]

बिक्री
बेचे जाने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[सं. विक्रय]

बिक्री
धन जो बेचे जाने से मिले।
संज्ञा
[सं. विक्रय]

बिख
जहर।
संज्ञा
[सं. विष]

बिखम
जो सम न हो।
वि.
[सं. विषम]

बिखम
कठिन।
वि.
[सं. विषम]

बिखम
तीव्र, भयंकर।
वि.
[सं. विषम]

बिख्याता
प्रसिद्ध, विख्यात।
वि.
[सं. विख्यात]
(क) सुमिरत तुम आए तहँ त्रिभुवन बिख्याता-१-१२३। (ख) रिष्यमूक परबत बिख्याता-९-६८।

बिगड़ना
खराब होना।
कि. अ.
[सं. विकृत]

बिगड़ना
दोष आ जाना।
कि. अ.
[सं. विकृत]

बिगड़ना
बुरी दशा होना।
कि. अ.
[सं. विकृत]

बिगड़ना
आचरण खराब होना।
कि. अ.
[सं. विकृत]

बिगड़ना
क्रुद्ध होना।
कि. अ.
[सं. विकृत]

बिगड़ना
विद्रोह करना।
कि. अ.
[सं. विकृत]

बिगड़ना
स्वामी या रक्षक की आज्ञा या अधिकार में न रह जाना।
कि. अ.
[सं. विकृत]

बिगड़ना
लड़ाई-झगड़ा होना।
कि. अ.
[सं. विकृत]

बिगड़ना
व्यर्थ खर्च होना।
कि. अ.
[सं. विकृत]

बहाव
बहाती हैं, प्रवाहित करती हैं।
क्रि. स.
[हिं. बहाना]
जो रस ब्रह्मादिक नहिं पावै। सो रस गोकुल गलिनि बहावैं -१०-३।

बहाल
जैसा था वैसा ।
वि.
[फ़ा.]

बहाल
प्रसन्न।
वि.
[फ़ा.]

बहाव
बहने का भाव ।
संज्ञा
[हि. बहना]

बहाव
प्रवाह।
संज्ञा
[हि. बहना]

बहाव
बहती हुई धारा।
संज्ञा
[हि. बहना]

बहिः
बाहर।
अव्य.
[सं. बहिस्]

बहि
बह कर, नष्ट होकर।
क्रि. अ.
[हिं. बहना]

बहि
बहि जाइ-दूर हो जाय, नष्ट हो जाय (स्त्रियों की गाली)।
प्र.
(क) छाँड़ि देहु बहि जाइ मथानी सौंहदिवावति छोरहु आनी-३९१। (ख) हार बहि जाइ अति गई अकुलाइ कै सुत के नाउँ इक उहै। मेरैं-१५८६।

बहि
बहि गयो - गया-बीता है, तुच्छ है।
ऐसो को बहि गयो प्रजा ह्वै बसै तुम्हारैं-१०१४।

बिगड़ना
सतीत्व नष्ट होना।
कि. अ.
[सं. विकृत]

बिगड़ैल
बहुत जल्दी क्रुद्ध हो जानेवाला, जरा सी बात में बिगड़ जाने या लड़ पड़नेवाला।
वि.
[हिं. बिगड़ना]

बिगड़ैल
हठी।
वि.
[हिं. बिगड़ना]

बिगड़ैल
बुरे आचरणवाला।
वि.
[हिं. बिगड़ना]

बिगत
जो गत हो गया हो, जो बीत चुका हो।
वि.
[सं. विगत]
उगत अरुन बिगत सर्वरी, ससांक किरन हीन -१०- २०५।

बिगत
रहित, विहीन।
वि.
[सं. विगत]
(क) करि बल-बिगत उबारि दुष्ट तैं, ग्राह ग्रसत बैकुंठ दियौ-१२६। (ख) प्रमुदित जनक निरखि अंबुज-मुख बिगत नयन मन पीर।

बिगर
बिना, रहित।
क्रि. वि.
[अ. बगैर]

बिगरना
बिगड़ना।
क्रि.अ.
[हिं. बिगड़ना]

बिगराइल, बिगरायल
क्रोधी।
वि.
[हिं बिगड़ैल]

बिगराइल, बिगरायल
हठी।
वि.
[हिं बिगड़ैल]

बिगराइल, बिगरायल
बुरे आचरणवाला।
वि.
[हिं बिगड़ैल]

बिगरि
बिगड़ कर।
क्रि. अ.
[हिं. बिगड़ना]

बिगरि
जैहैं बिगरि-खराब हो जायँगे, अच्छे नहीं रहेंगे।
प्र.
जैहैं बिगरि दाँत ये आछे-१०-२२२।

बिगरि
बिगरि परे विद्रोही हो गये।
(क) ए (नैन) मेरे होहिं नहीं सखि हरि-छबि बिगरि परे - पृ. ३३२ (१९)। (ख) मधुकर, ए मन बिगरि परे-३१५०।

बिगरी
बिगड़ गयी, नष्ट हो गयी।
क्रि. अ.
[हिं. बिगड़ना]
"(क) कृपा-सिंधु, अपराध अपरिमित, छमौ, सूर तैं सब बिगरी-१-११५। (ख) जग मैं जनमि, पाप बहु कीन्हें, आदि-अंत लौं सब बिगरी-१-११६।"

बिगरी
वह बात जो बिगड़ गयी हो, बात जो नष्ट हो रही हो।
संज्ञा
दीनानाथ अब बारि तुम्हारि। पतित उधारन बिरद जानि कै, बिगरी लेहु सँवारि-१-११८।

बिगरै
बिगड़ जाय, नष्ट हो जाय, खराब हो जाय।
क्रि. अ.
[हिं. बिगड़ना]
माधौ जू, जौ जन तैं बिगरै। तउ कृपाल, करुनामय केसव, प्रभु नहिं जीय धरै-१-११७।

बिगरैगौ
दुरवस्था को प्राप्त होगा, अच्छी दशा न रहेगी।
क्रि. अ.
[हिं. बिगड़ना]
सब वे दिवस चारि मन-रंजन अंतकाल बिगरैगौ-१-७५।

बिगरौ
बिगड़ गया, दुरवस्था को प्राप्त हुआ, बुरी दशा को पहुँच गया।
क्रि. स.
[हिं. बिगड़ना]
तन माया, ज्यौ ब्रह्म कहावत, सूर सु मिलि बिगरौ-१-२२०।

बिगलना
सड़ना - गलना।
क्रि. अ.
[सं. बिगलन]

बिगलना
सूखना।
क्रि. अ.
[सं. बिगलन]

बिगलना
शिथिल होना।
क्रि. अ.
[सं. बिगलन]

बिगलना
अलग होना।
क्रि. अ.
[सं. बिगलन]

बिगलित
रूखा-सूखा।
[हिं. बिगलना]
बिगलित कच कुस काँस पुलिन पर पंक जु काजल सारी-2७२८।

बिगसति
खिलती है, प्रस्फुटित होती है।
क्रि. अ.
[हिं. बिकसना]

बिगसति
चमकती है, प्रकाशित होती है।
क्रि. अ.
[हिं. बिकसना]
ईषद हास दंत-दुति बिगसति, मानिक-मोती धरे जनु पोइ-१०-२१०।

बिगसना
विकास को प्राप्त करना।
क्रि. अ.
[हिं. विकसना]

बिगसना
कली खिलना।
क्रि. अ.
[हिं. विकसना]

बिगसना
मन प्रसन्न होना।
क्रि. अ.
[हिं. विकसना]

बिगसाऊँ
प्रकाशित करूँ।
क्रि. स.
[हिं. बिकसाना]
सोरह कला को ससि कुहुँ बिगसाऊँ-2२५८।

बिगाड़
लड़ाई-झगड़ा।
संज्ञा
[हिं. बिगड़ना]

बिगाड़ना
रूप, गुण या उपयोगिता नष्ट करना।
क्रि. स.
[सं. विकार]

बिगाड़ना
दोष ला देना, दूषित कर देना।
क्रि. स.
[सं. विकार]

बिगाड़ना
बुरी दशा को पहुँचा देना।
क्रि. स.
[सं. विकार]

बिगाड़ना
कुमार्ग में लगा देना।
क्रि. स.
[सं. विकार]

बिगाड़ना
सतीत्व नष्ट करना।
क्रि. स.
[सं. विकार]

बिगाड़ना
स्वभाव खराब करना।
क्रि. स.
[सं. विकार]

बिगाड़ना
बहकाना।
क्रि. स.
[सं. विकार]

बिगाड़ना
व्यर्थ खर्च करना।
क्रि. स.
[सं. विकार]

बिगाना
पराया।
वि.
[फा. बेगाना]

बिगसाना
खिलना, फूलना।
क्रि. अ.
[हिं. बिकसना]

बिगसाना
प्रसन्न होना।
क्रि. अ.
[हिं. बिकसना]

बिगसाना
प्रकाशित होना।
क्रि. अ.
[हिं. बिकसना]

बिगसाना
खिलाना।
क्रि. स

बिगसाना
प्रकाशित करना।
क्रि. स

बिगसावहु
खिलाओ, बिकसित करो।
क्रि. स.
[हिं. बिकसाना]
घोष-सरोज भए हैं संपुट, होइ दिनमनि बिगसावहु-३१८७।

बिगसित
प्रसन्न, खिली हुई।
वि.
[हिं. बिकसना]
बिगसित गोपी मनहुँ कुमुद सर रूप-सुधा लोचन-पुट घटकनि-६१८।

बिगहा
नापने का एक मान जो बीस बिसवे का होता है।
संज्ञा
[हिं. बीघा]

बिगाड़
बिगड़ने की क्रिय या भाव।
संज्ञा
[हिं. बिगड़ना]

बिगाड़
दोष, बुराई।
संज्ञा
[हिं. बिगड़ना]

बिगूचना, बिगूतना
दुबधा या असमंजस में पड़ना।
क्रि. अ.
[सं. विकुंचन]

बिगूचना, बिगूतना
संकट या कठिनाई में पड़ना।
क्रि. अ.
[सं. विकुंचन]

बिगूचना, बिगूतना
दबाया या पकड़ा जाना।
क्रि. अ.
[सं. विकुंचन]

बिगूचना, बिगूतना
दबोचना, धर दबाना।
क्रि. स.
[सं. विकुंचन]

बिगोइ
नष्ट करता है, विनाशता है।
क्रि. स.
[हिं. बिगोना]
कमल-नयन कौं कपट किए माई, इहिं ब्रज आवै जोइ। पालागौं बिधि ताहि बकी ज्यौं, तू तिहिं तुरत बिगोइ-१०-५६।

बिगोइसि
नष्ट किया, बिगाड़ा,विनाश किया।
क्रि. स.
[हिं. बिगोना]
निसि दिन फिरत रहत मुँह बाए, अहमिति जनम बिगोइसि–१-३३३।

बिगोउ, बिगोऊ
नष्ट करे, विनाश करे।
क्रि. स.
[हिं. बिगोना]
सूर सनेह करै जो तुमसौं सो पुनि आप बिगोऊ-३३५३।

बिगोए
नष्ट किये, बिगाड़ दिये।
क्रि. स.
[हिं. बिगोना]
किते दिन हरि-सुमिरन बिनु खोए। पर-निंदा रसना के रस करि, केतिक जनम बिगोए-१-५२।

बिगोना
नष्ट या विनाश करना।
क्रि. स.
[स विगोपन]

बिगोना
छिपाना, दुराना।
क्रि. स.
[स विगोपन]

बिगाना
अनजान।
वि.
[फा. बेगाना]

बिगार
दोष, बुराई।
संज्ञा
[हिं. बिगाड़]
कहा बिगार कियौ हम वाको ब्रज काहे अवतार दियो री-१४०६।

बिगारत
नष्ट करती है।
क्रि. स.
[हिं. बिगाड़ना]
(क) सूर स्याम बिनु ब्रज पर बोलत हठि अगिलेउ जनम बिगारत-2८४९। (ख) ज्ञानी लोभ करत नहिं कबहूँ, लोभ बिगारत काजा-१० उ०-2७।

बिगार
काम जो बिना मजदूरी दिये या पाये जबरदस्ती कराया या किया जाय।
संज्ञा
[हिं. बेगार]

बिगारना
बिगाड़ना।
क्रि. स.
[हिं. बिगड़ना]

बिगारि, बिगारी
नष्ट कर दी।
क्रि. स.
[हिं. बिगाड़ना]
याकैं बस मैं बहु दुख पायौ, सोभा सबै बिगारी-१-१७३।

बिगारि, बिगारी
वह काम जो बिना मजदूरी दिये या पाये जबरदस्ती किया या कराया जाय।
संज्ञा
[हिं. बेगार]

बिगारे
बिगाड़ दिये, नष्ट किये।
क्रि. स.
[हिं. बिगाड़ना]
पाँच-पचीस साथ अगवानी, सब मिलि काज बिगारे-१-१४३।

बिगारै
भ्रष्ट करता है, कुमार्ग में लगाता है, बिगाड़ता है।
क्रि. स.
[हिं. बिगाड़ना]
तुव सुत कौं पढ़ाई हम हारे। आपु पढ़ै नहिं, और बिगारै-७-२।

बिगार्‌‌‌यौ
नष्ट कर दिया।
क्रि. स.
[हिं. बिगाड़ना]
मैं अपनौ सब काज बिगार्यौ-४-१२।

बिगास
फैलाव, विस्तार।
संज्ञा
[सं. विकास]

बिगास
(फूल का) खिलना।
संज्ञा
[सं. विकास]

बिगास
उन्नत दशा को पहुँचना।
संज्ञा
[सं. विकास]

बिगिर
बिना, रहित।
क्रि. वि.
[अ. बगैर]

बिगुन
जिसमें गुण न हो।
वि.
[सं. विगुण]

बिगुरचिन
बाधा, कठिनाई।
संज्ञा
[हिं. बिगूचना]

बिगुरदा
एक तरह का हथियार।
संज्ञा
[देश.]

बिगुर्चन
बाधा, कठिनाई।
संज्ञा
[हिं. बिगूचन]

बिगूचन, बिगूचनि
दुबिधा, असमंजस।
संज्ञा
[हिं. बिगूचन]

बिगूचन, बिगूचनि
कठिनाई, बाधा।
संज्ञा
[हिं. बिगूचन]
सूरदास अब होत बिगूचन, भजि लै सारंगपानि-१-३०४।

बिग्रह
शरीर।
संज्ञा
[सं. विग्रह]

बिग्रह
कलह, विरोध।
संज्ञा
[सं. विग्रह]

बिग्रह
विभाग।
संज्ञा
[सं. विग्रह]

बिग्रह
युद्ध।
संज्ञा
[सं. विग्रह]

बिग्रह
देव-मूर्ति।
संज्ञा
[सं. विग्रह]

बिघटना
तोड़ना-फोड़ना।
क्रि. स.
[सं. विघटन]

बिघन, बिघिन
विघ्न, बाधा, रुकावट, अड़चन, व्याघात।
संज्ञा
[सं. विघ्न]
(क) राख्यौ गोकुल बहुत बिघन तै कर नख पर गोबर्धन धारी-१-२२। (ख) पांडु-सुत के बिघन जेते गए टरि टरि टरि-१-३०९।

बिघनहरन, बिघिनहरन
बाधा दूर करनेवाला।
वि.
[सं. विघ्नहरण]

बिघनहरन, बिघिनहरन
गणेश, गणपति।
संज्ञा
[सं. विघ्नहरण]

बिच
मध्य भाग, बीच।
संज्ञा
[हिं. बीच]
उन तौ करी पाछिले की गति गुन तोर्यौ बिच धार-१-१७५।

बिगोना
तंग या दुखी करना।
क्रि. स.
[स विगोपन]

बिगोना
भ्रम या बहकावे में डालना।
क्रि. स.
[स विगोपन]

बिगोना
बिताना, व्यतीत करना।
क्रि. स.
[स विगोपन]

बिगोयो, बिगोयौ
भ्रम में डाला, बहकाया।
क्रि. स.
[हिं. बिगोना]
हरि, तुव माया को न बिगोयौ-१-४३।

बिगोयो, बिगोयौ
नष्ट किया, विनाश किया, बिगाड़ा।
क्रि. स.
[हिं. बिगोना]
(क) इहिं राजस को-को न बिगोयौ। हिरनकसिपु, हिरनाच्छ आदि दै , कुंभकरन कुल खोयौ-१-५४। (ख) रंचक सुख कारन तैं, अंत क्यौं बिगोयौ।-१-३३०। (ग) सूर लोभ कीनो सो बिगोयौ-१० उ०-2७।

बिगोयो, बिगोयौ
तंग या दुखी किया।
क्रि. स.
[हिं. बिगोना]
अबला कहा जोग मत जानै मनमथ ब्यथा बिगोयो–२५८२।

बिगोयो, बिगोयौ
छिपाया, दुराया।
क्रि. स.
[हिं. बिगोना]

बिगोवति
तंग करती है, दुख देती है, पीड़ा पहुँचाती है।
क्रि. स.
[हिं. बिगोना]
सील-सँतोष सखा दोउ मेरे, तिन्हैं बिगोवति भारी–१-१७३।

बिगोवति
बिताती है, व्यतीत करती है, काटती है।
क्रि. स.
[हिं. बिगोना]
कबहुँ भवन कबहूँ आँगन हवै ऐसै रैनि बिगोवति-१९४९।

बिगोवै
नष्ट करती है, बिनाशती है, बिगाड़ती है।
क्रि. स.
[हिं. बिगोना]
(क) एकनि लै मंदिर चढ़ै, एकनि बिरचि बिगोवै (हो)-१-४४। (ख) राजहि जाहि सनक अरु संका बिरचै ताहि बिगोवै-2२७५।

बहानो, बहानौ
बहाना, हीला।
संज्ञा
[हिं. बहाना]
इहै बहानो कारि लियो हरि मन अनुराध्यो-१५४१।

बहायो, बहायौ
प्रवाहित किया।
क्रि. स.
[हिं. बहाना]
सो (रस) यह परम उदार मधुप ब्रज बीथिनि माँझ बहायो-2९९८।

बहार
वसंत ऋतु ।
संज्ञा
[फ़ा.]

बहार
आनंद, प्रफु्ल्‍लता।
संज्ञा
[फ़ा.]

बहार
यौवन का विकास।
संज्ञा
[फ़ा.]

बहार
शोभा, सुंदरता।
संज्ञा
[फ़ा.]

बहारना
झाड़ू देना।
क्रि. स.
[हि. बुहारना]

बहावत
बहाता है, दूर करता है, अलग करता है।
क्रि. स.
[हि. बहाना]
बंधन कर्म कठिन जे पहिले, सोऊ काटि बहावत-२-१७।

बहावहि
धारा में प्रवाहित कर दो
क्रि. स.
[हिं. बहाना]
प्रथम बहाइ देउ गोबर्धन ता पाछे ब्रज खोदि बहावहि-९४७।

बहावहु
धारा में प्रवाहित कर दो।
क्रि. स.
[हिं. बहाना]
(क) ब्रज के लोगन धोइ बहावहु -९७०। (ख) गाइ गोप ब्रज सबै बहावहु-१०४६।

बिच
अंतर, दूरी।
संज्ञा
[हिं. बीच]
केतिक बिच मथुरा औ गोकुल आवत जो हरि नहीं-2७९७।

बिच
में, अंदर।
क्रि. वि.
खेल मच्यौ ब्रज के बिच भारी-2४०८।

बिचकना
भड़कना, चौंकना।
क्रि. अ.
[अनु.]

बिचकना
(मुँह का) टेढ़ा होना।
क्रि. अ.
[अनु.]

बिचकाना
(मुँह) बिराना या चिढ़ाना।
क्रि. अ.
[अनु.]

बिचच्छन
निपुण, पंडित।
वि.
[सं. विलक्षण]

बिचरतौ
चलता-फिरता, घूमता।
क्रि. अ.
[हिं. बिचरना]
इहिं बिधि उच्च-अनुच तन धरि-धरि देस-बिदेस बिचरतौ-१-२०३।

बिचरना
घूमना - फिरना।
क्रि. अ.
[सं. विचरण]

बिचरना
यात्रा करना।
क्रि. अ.
[सं. विचरण]

बिचलना
चंचल होना, हिलना-डोलना।
क्रि. अ.
[सं. विचलन]

बिचलना
साहस छोड़ना।
क्रि. अ.
[सं. विचलन]

बिचलना
कहकर मुकरना।
क्रि. अ.
[सं. विचलन]

बिचला
बीच का, बीचवाला।
वि.
[हिं. बीच]

बिचलाना
हिलाना-डोलाना।
क्रि. स.
[सं. विचलन]

बिचलाना
तितर-बितर करना।
क्रि. स.
[सं. विचलन]

बिचलाना
चित्त डिगाना।
क्रि. स.
[सं. विचलन]

बिचले
व्याकुल या विचलित हो गये।
क्रि. अ.
[हिं. बिचलना]
आतुर ह्वै धाईं उत नागरि इत बिचले सब ग्वाल-2४२७।

बिचलै
विचलित हो, हट जाय।
क्रि. अ.
[हिं. बिचलन]
जौ सीता सत तैं बिचलै तौ श्रीपति काहि सँभारै-६-७८।

बिचवई
झगड़नेवालों के बीच में पड़कर झगड़ा निबटानेवाला, मध्यस्थ।
संज्ञा
[हिं. बीच]

बिचवई
मध्यस्थता।
संज्ञा

बिचवान, बिचवाना
बीच-बचाव करनेवाला, मध्यस्थ।
संज्ञा
[हिं. बीच+वान]

बिचवानी
मध्यस्थता करने वाली।
संज्ञा
[हि बिचवान]
राधा आधा देह स्याम की तू उनकी बिचवानी-१४८४।

बिचहुत
अंतर।
संज्ञा
[हिं. बीच]

बिचहुत
संदेह।
संज्ञा
[हिं. बीच]

बिचार
संकल्प, ध्यान, विचार।
संज्ञा
[सं. विचार]
जौ पै यहै बिचार परी। तौ कत कलि-कलमष लूटन कौं, मेरी देह धरी-१-२११।

बिचार
विचारकर।
क्रि. अ.
[हिं. बिचारना]
को तु, को यह, देखि बिचार-६-५।

बिचारत
सोचते हो, गौर करते हो, विचार रहे हो।
क्रि. अ.
[हिं. बिचारना]
(क) मोकौं मुक्ति बिचारत हौ प्रभु, पचिहौ पहर-घरी-१-१३०। (ख) तुमहिं देखि मैं अति सुख पायौ, तुम जिय कहा बिचारत-१०- २६५।

बिचारना
सोचना।
क्रि. अ.
[सं. विचार]

बिचारना
प्रश्न पूछना।
क्रि. अ.
[सं. विचार]

बिचारा
सोचा, ध्यान किया।
क्रि. अ.
[हिं. बिचारना]

बिचारा
करत बिचार-सोचते हैं, ध्यान करते हैं।
प्र.
सुक-सारद से करत बिचारा। नारद से पावहिं नहिं पारा-१०-३।

बिचारा
करति बिचारा-विचार करती है।
प्र.
नर-नारी घर घर सबै इह करति बिचारा-१० उ०-८१।

बिचारा
निरीह, असहाय।
वि.
[हिं. बेचारा]

बिचारा
ध्यान, संकल्प।
संज्ञा
[हिं. विचार]

बिचारि
सोचकर।
क्रि. अ.
[हिं. बिचारना]

बिचारि
रहीं बिचारि-बिचारि - सोच-सोच कर रह गयीं।
प्र.
हम नहीं घर गईं तबते रहीं बिचारि बिचारि-११६९।

बिचारी
विचार किया,सोचा।
क्रि. अ.
[हिं. बिचारना]
(क) इन पतितनि मो अपति बिचारी-१-२४८। (ख) सुरपति तब यह देखि बिचारी ६-५।

बिचारी
विचारकर, सोचकर, गौर करके।
क्रि. अ.
[हिं. बिचारना]
(क) दुरबासा दुरजोधन पठयौ पांडव-अहित बिचारी-१-१२२। (ख) अंतहु सिखवन सुनहु हमारी कहियत बात बिचारी-३३१३।

बिचारी
जाति बिचारी - सोच-विचार या समझा जा सकता है।
प्र.
सूरदास स्वामी की महिमा कापै जाति बिचारी-३८९।

बिचारी
विचार करनेवाला।
संज्ञा
[सं. विचारिन्]
मारग छाँड़ि कुमारग सौं रत बुधि बिपरीति बिचारी।

बिचारी
दीन, निरीह, असहाय।
वि.
[हिं. बेचारा]
बाँध्यौ बैर दया भगिनी सौं, भागि दुरी सु बिचारी-१-१७३।

बिचारे
दीन, गरीब, निस्सहाय।
वि.
[फा. बेचारा]

बिचारे
तुच्छ, हीन।
वि.
[फा. बेचारा]
गीध, ब्याध, गनिकारु अजामिल, ये को आहिं बिचारे-१-१७९।

बिचार
विचार करें, ध्यान दें, सोचें।
क्रि. अ.
[हिं. बिचारना]
जौ प्रभु, मेरे दोष बिचारै-१-१८३।

बिचार
मानते या समझते हैं।
क्रि. अ.
[हिं. बिचारना]
हाँसी मैं कोउ नाम उचारै। हरि जू ताकौं सत्य बिचारै-६-४।

बिचारौ
मानता-समझता हूँ।
क्रि. अ.
[हिं. बिचारना]
जीतैं जीति भक्त अपनैं के, हारैं हारि बिचारौं-१-२७२।

बिचारौ
विचार करो, सोचो, ध्यान दो।
क्रि. अ.
[हिं. बिचारना]
प्रभु, मेरे गुन-अवगुन न बिचारौ-१-१११।

बिचारौ
दीन, असहाय, अनाथ, बेचारा।
वि.
[हिं. बेचारा]

बिचारौ
तुच्छ, हीन।
वि.
[हिं. बेचारा]
पतितनि मैं बिख्यात पतित हौं, पावन नाम तुम्हारौ। बड़े पतित पासंगहु नाहीं, अजामिल कौन बेचारौ-१-१३१।

बिचित्र
आश्चर्यजनक, विस्मयकारी।
वि.
[सं. विचित्र]
हरि जू की आरती बनी। अति बिचित्र रचना करि राखी, परति न गिरा गनी-2-२८।

बिछइयै
(पलँग, खाट तखत आदि को ) जमीन पर फैलाता है।
क्रि. स.
[हिं. बिछाना]
टूटी छानि, मेघ जल बरसै, टूटो पलँग बिछइयै-१-२३९।

बिछड़ना
अलग होना।
क्रि. अ.
[सं. विच्छेद]

बिछना
बिछाया या फैलाया जाना।
क्रि. अ.
[सं. विस्तरण]

बिछना
बिखेर या छितराया जाना।
क्रि. अ.
[सं. विस्तरण]

बिछना
(मारकर) गिराया जाना।
क्रि. अ.
[सं. विस्तरण]

बिछलना
फिसलना।
क्रि. अ.
[हिं. फिसलना]

बिछलाना
फिसलाना।
क्रि. स.
[हिं. फिसलाना]

बिछवाना
बिछाने को प्रवृत्त करना या प्रेरणा देना।
क्रि. स.
[हिं. बिछाना से प्रे.]

बिछाई
(सेज पर बिस्तर) आदि बिछाया, (सेज) तैयार की।
क्रि. स.
[हिं. बिछाना]
पौढ़िये मैं रचि सेज बिछाई-१०-२४२।

बिछान
बिस्तर, बिछौना।
संज्ञा
[हिं. बिछौना]

बिचित्र
सुंदर।
वि.
[सं. विचित्र]
उर मनि-माला पहिराई, बसन बिचित्र दिये-१०-२४।

बिचेत
अचेत।
वि.
[सं. विचेतस्]

बिचेत
अधीर।
वि.
[सं. विचेतस्]

बिचौनी, बिचौहाँ
मध्यस्थ।
संज्ञा
[हिं. बीच]

विच्छित्ति
श्रृंगार का एक हाव जिसमें किंचित श्रृंगार से ही पुरुष का मुग्ध होना वर्णित हो।
संज्ञा
[सं.]

बिच्छी
एक जहरीला कीड़ा।
संज्ञा
[हिं. बिच्छू]

बिच्छू
एक जहरीला कीड़ा।
संज्ञा
[सं. वृश्चिक]

बिच्छेप
चित्त शांत या संयत न रहना।
संज्ञा
[सं. विक्षेप]

बिच्छेप
विघ्न-बाधा।
संज्ञा
[सं. विक्षेप]

बिछइयै
(विस्तर या कपड़े को) जमीन पर फैलाता है।
क्रि. स.
[हिं. बिछाना]

बिछावै
(जमीन पर बिस्तर अदि) फैलावें।
क्रि. स.
[हिं. बिछावन]
इह जोग कथा ओढ़ैं कि बिछावैं-३४४२।

बिछिअन
पैर की उँगलियों में पहनने के छल्ले।
संज्ञा
[हिं. बिछिआ]
पग जेहरि बिछिअन की झमकनि चलत परस्पर बाजत-पृ. ३१३ (२६)।

बिछिआ
पैर की उँगलियों में पहनने का छल्ला।
संज्ञा
[हिं. बिच्छ+इआ]

बिछिप्त
पागल।
वि.
[सं. विक्षिप्त]

बिछिया
पैर की उँगलियों में पहनने का छल्ला।
संज्ञा
[हिं. बिछिआ]
छुद्रघंटिका पग नूपुर जेहरि बिछिया सब लेखौ-११२०।

बिछुआ
पैर का एक गहना।
संज्ञा
[हिं. बिच्छ]

बिछुआ
छरी की तरह का एक शस्‍त्र।
संज्ञा
[हिं. बिच्छ]

बिछुड़न
अलग होने का भाव।
संज्ञा
[हिं. बिछड़ना]

बिछुड़न
विरह, वियोग।
संज्ञा
[हिं. बिछड़ना]

बिछुड़ना
अलग होना।
क्रि. अ.
[सं. विच्छेद]

बिछुड़ना
वियोग होना।
क्रि. अ.
[सं. विच्छेद]

बिछुरंता
बिछुड़नेवाला।
संज्ञा
[हिं. बिछड़ना + अंता]

बिछुरत
बिछुड़ते ही, अलग होते ही।
क्रि. अ.
[हिं. बिछुड़ना]
(क) रघुनाथ पियारे, आजु रहौ (हो)।...। बिछुरत प्रान पयान करैंगे, रहौ आजु पुनि पंथ गहौ (हो)-९-३३। (ख) हरि बिछुरत फाट्यौ न हियौ-2५४५।

बिछुरन, बिछुरनि
बिछुड़ने या अलग होने का भाव।
संज्ञा
[हिं. बिछड़ना]
(क) यह सुनि भूप तुरत तनु त्याग्यौ, बिछरन ताप तयौ-९-४६। (ख) जुग-जुग जनम मरन अरु बिछरनसब समुझत मत भेव-१-१००। (ग) बिछुरन-मिलन रच्यौ बिधि ऐसौ, यह संकोच निवारौ-2६५३। (घ) कहाँ वह प्रीति कहाँ वह बिछुरन कहाँ मधुबन की रीति-2७१६।

बिछुरना
अलग होना।
क्रि. अ.
[हिं. बिछुड़ना]

बिछुरना
वियोग होना।
क्रि. अ.
[हिं. बिछुड़ना]

बिछुरी
बिछुड़ गयी, अलग हुई।
क्रि. अ.
[हिं. बिछुड़ना]
(क) बिछुरी मनौ संग तैं हिरनी-९-७२। (ख) जौ पै पतिब्रता ब्रत तेरैं, जीवति बिछुरी काइ-९-७७।

बिछुरे
अलग होने या बिछुड़ने पर।
क्रि. अ.
[हिं. बिछुड़ना]
(क) बिछुरे श्री बृजराज आजु इन नैननि की परतीति गई-३५३७। (ख) सूरदास स्वामी के बिछुरे लागे प्रेम झई-2७७३।

बिछुरै
बिछुड़ जाने पर, अलग होने पर।
क्रि. अ.
[हिं. बिछड़ना]
(क) जग मैं जीवत ही कौ नातौ। मन बिछरैं तन छार होइगौ, कोउ न बात पुछातौ-१- ३०२। (ख) सूरदास रघुपति के बिछुरैं मिथ्या जनम भयौ-९-४६।

बिछुरौं
अलग होऊँ।
क्रि. अ.
[हिं. बिछुड़ना]
सूरदास याही ब्रत मेरे हरि मिलि नहिं बिछुरौं-३०२७।

बिछाना
(जमीन पर) फैलाना।
क्रि. स.
[सं. विस्तरण]

बिछाना
बिखराना।
क्रि. स.
[सं. विस्तरण]

बिछाना
(मारकर) लिटाना।
क्रि. स.
[सं. विस्तरण]

बिछायल
बिछौना।
संज्ञा
[हिं. बिछाना]

बिछावत
बिखेरता या बिखराता है।
क्रि. स.
[हिं. बिछाना]
पीछे ललिता आगे स्यामा प्यारी ता आगे पिय मारग फूल बिछावत जात-2०६८।

बिछावन
बिस्तर, बिछौना।
संज्ञा
[हिं. बिछौना]

बिछावना
फैलाना।
क्रि. स.
[हिं. बिछाना]

बिछावना
बिखराना।
क्रि. स.
[हिं. बिछाना]

बिछावना
(मारकर) लिटाना।
क्रि. स.
[हिं. बिछाना]

बिछावहीं
बिखेरते या बिखराते हैं।
क्रि. स.
[हिं. बिछाना]
मारग सुमन बिछावहीं पग निरखि तिहारे-2०६७।

बहियाँ
बाँह, हाथ, भुजा।
संज्ञा
[हिं. बाँह]
( क ) सूरदास हरि बोलि भक्त कौं, निरबाहत गहि बहियाँ-९-१९। (ख) बहियाँ पकरि सूर के प्रभु की नंद की सौंह दिवाइ-३१६६।

बहिरंग
बाहरी।
वि.
[सं.]

बहिरंग
अंतरंग' का विपरीतार्थक।
वि.
[सं.]

बहिरंग
वर्ग या दल से बाहर।
वि.
[सं.]

बहिर
बहरा।
वि.
[हिं. बहरा]

बहिरत
बाहर।
अव्य.
[सं. वहि.]

बहिराना
बाहर निकालना।
क्रि. स.
[हिं. बाहर+ना]

बहिराना
बाहर हो जाना।
क्रि. अ.
[हिं. बाहर+ना]

बहिरी
बहरी (स्त्री)।
वि.
[हिं. बहरा]
बहिरी पति सों बात करै सो तैसोइ उत्तर पावै-३०२६।

बहिरो, बहिरौ
जो कान से सुन न सके।
वि.
[सं. बधिर, प्रा. बहिर, हिं. बहरा]
बहिरौ सुनै, मूक पुनि बोले-१-१। (ख) बहिरो तान स्वाद कहा जानै गूँगो खात मिठास ३३३६।

बिछुवा
पैर का एक गहना।
संज्ञा
[हिं. बिछुआ]

बिछूना
जो बिछुड़ गया हो।
वि.
[हिं. बिछुड़ना]

बिछोई
जो बिछुड़ा हुआ हो।
वि.
[हिं. बिछोह+ई]

बिछोई
जिसका प्रिय बिछुड़ गया हो, विरही।
वि.
[हिं. बिछोह+ई]

बिछोड़ा
बिछुड़ने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. बिछुड़ना]

बिछोड़ा
विरह, वियोग।
संज्ञा
[हिं. बिछुड़ना]

बिछोय
वियोग, विरह।
संज्ञा
[सं. विच्छेद]

बिछोह
विरह, वियोग।
संज्ञा
[हिं. बिछुड़ना]

बिछोही
बिछुड़ गयी है, वियोग हुआ है।
क्रि. अ.
[हिं. बिछड़ना]
अहो बिहंग, कहौ अपनौ दुख, पूछत ताहि खरारि। किहिं मति मूढ़ हत्यौ तनु तेरौ, किधौं बिछोही नारिं-९-६५।

बिछौन, बिछौना
बिस्तरा।
संज्ञा
[हिं. बिछाना]

बिजली
कान का एक गहना।
संज्ञा
[सं. विद्युत]

बिजली
बहुत चमकीला।
वि.

बिजली
बहुत चमकीला।
वि.

बिजाती
दुसरी जाति का।
वि.
[सं. विजातीय]

बिजाती
जाति से निकाला हुआ।
वि.
[सं. विजातीय]

बिजान
अनजान, अज्ञान।
संज्ञा
[सं. वि+ज्ञान]

बिजायठ
बाजूबंद (गहना)।
संज्ञा
[सं. विजय]

बिजार
बैल।
संज्ञा
[देश.]

बिजार
साँड़।
संज्ञा
[देश.]

बिजुकानी
भड़क गयी, बिझुक गयी, डराने लगी, मारने दौड़ी।
क्रि. अ.
[हिं. बिझुकना]
ब्यानी गाइ बछरुवा चाटति, हौं पय पियत पतूखिनि लैया। यहै देखि मोकौं बिजुकानी, भागि चल्यौ कहि दैया-दैया-१०-३३५।

बिजड़
तलवार।
संज्ञा
[हिं.]

बिजन
पंखा, बेना।
संज्ञा
[सं. व्यजन]

बिजन
जनरहित या एकांत (स्थान)।
वि.
[सं. विजन]

बिजय
जीत, विजय।
संज्ञा
[सं. विजय]

बिजय
विष्णु के पार्षद जो ब्रह्मशाप से असुर हो गये थे।
संज्ञा
जय अरु बिजय पारषद दोइ। बिप्र-सराप असुर भए सोइ-१०-२।

बिजयठे
हाथ का एक आभूषण, अंगद, बाजूबंद।
संज्ञा
[हिं. बिजायठ]
कुच कंचुकी हार मोतिनि अरु भुजन बिजयठे सोहत-१०७९।

बिजली
विद्युत (शक्ति)।
संज्ञा
[सं. विद्युत]

बिजली
(आकाश में चमकनेवाली) चपला।
संज्ञा
[सं. विद्युत]

बिजली
आम की गुठली।
संज्ञा
[सं. विद्युत]

बिजली
गले का एक गहना।
संज्ञा
[सं. विद्युत]

बिझुरना
डरना।
क्रि. अ.
[हिं. झोंका]

बिझुरना
तनना, टेढ़ा होना।
क्रि. अ.
[हिं. झोंका]

बिझुकाना
भड़काना।
क्रि. स.
[हिं. बिझुकना का सक.]

बिझुकाना
डराना।
क्रि. स.
[हिं. बिझुकना का सक.]

बिझुकाना
टेढ़ा करना, तानना।
क्रि. स.
[हिं. बिझुकना का सक.]

बिझुकि
भड़ककर।
क्रि. अ.
[हिं. बिझुकना]
बिडुरत बिझुकि जानि रथ ते मृग जनु ससंकि ससिलंगर सारे-१३३३।

बिट
कामुक और लंपट।
संज्ञा
[सं. विट्]
खान-पान-परिधान मैं (रे) जोबन गयौ सब बीति। ज्यौं बिट पर-तिय सँग बस्यौ ( रे ) भोर भए भई भीति-१-३२५।

बिट
नायक का चतुर सखा।
संज्ञा
[सं. विट्]

बिट
वैश्य।
संज्ञा
[सं. विट्]

बिट
पक्षियों की बाट।
संज्ञा
[सं. विट्]

बिजौरा
एक वृक्ष।
संज्ञा
[सं. बीजपूरक]

बिजौरी
उड़द की पीठी और पेठे की बड़ी, कुम्हड़ौरी।
संज्ञा
[हिं. बीज+औरी]

बिज्जल, बिज्जु
बिजली,विद्युत।
संज्ञा
[हिं. बिजली]
(क) इंद्रजीत लीन्ही तब सक्ती, देवनि हहा करयौ। छूटी बिज्जु-रासि वह मानौ, भूतल बंधु् परयौ-९-१४४।

बिज्जुपात
बिजली का गिरना।
संज्ञा
[सं. विद्युत्पात]

बिज्जुल
छिलका।
संज्ञा
[सं. विज्जुल]

बिज्जुल
बिजली, दामिनि।
संज्ञा
[सं. विद्युत]
हँसत दसननि चमक बिज्जुल लसति कठिन कठोर-पृ. ३१० (३)।

बिज्जुलता
विद्युत, बिजली।
संज्ञा
[सं. विद्युल्लता]
गोद लिए जसुदा नंद-नंदहिं। पीत झँगुलिया की छबि छाजति, बिज्जुलता सोहति मनु कंदहि-१०-१०७।

बिज्जू
एक जंगली पशु।
संज्ञा
[देश.]

बिझरा
मिला हुआ अन्न।
संज्ञा
[हिं. बेझर]

बिझुरना
भड़कना।
क्रि. अ.
[हिं. झोंका]

बिजुरी, बिजुली
विद्युत।
संज्ञा
[हिं. बिजली]

बिजुरी, बिजुली
चपला।
संज्ञा
[हिं. बिजली]

बिजुरी, बिजुली
गले का एक गहना।
संज्ञा
[हिं. बिजली]

बिजुरी, बिजुली
कान का एक गहना।
संज्ञा
[हिं. बिजली]

बिजूका, बिजूखा
(खेत का बनावटी) धोखा।
संज्ञा
[देश.]

बिजूका, बिजूखा
छल-कपट।
संज्ञा
[देश.]

बिजै
विजय।
संज्ञा
[सं. विजय]

बिजोग
विरह, वियोग।
संज्ञा
[सं. वियोग]

बिजोना
भली-भाँति देखना।
क्रि. स.
[हिं. जोवना]

बिजोर
निर्बल, अशक्त।
वि.
[सं. वि + फा. जोर]

बिटप
पेड़, वृक्ष।
संज्ञा
[सं. विटप]

बिटनियाँ
पुत्री।
संज्ञा
[हिं. बेटी]

बिटनियाँ
लड़की
सो आगे की महरि बिटनियाँ कहा करै वह मान-१८७६।

बिटरना
घँघोला जाना।
क्रि. अ.
[हिं. बिटारना]

बिटारना
घँघोलकर गंदा करना।
क्रि. स.
[सं. बिलोडन]

बिटिनियाँ, बिटिया
बेटी, पुत्री।
संज्ञा
[हिं. बेटी]

बिटिनियाँ, बिटिया
लड़की, बालिका।
संज्ञा
[हिं. बेटी]
एक बिटिनियाँ संग मेरे ही, कारैं खाई ताहि तहाँ री-६९५।

बिट्ठल
विष्णु का एक नाम।
संज्ञा
[सं. विष्णु, महा. बिठोबा]

बिट्ठल
पंढरपुर की प्रधान देवमूर्ति जिसे जैन तीर्थंकर की और हिन्दू विष्णु की मूर्ति मानते हैं।
संज्ञा
[सं. विष्णु, महा. बिठोबा]

बिठलाना
बैठने को प्रवृत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. बैठाना]

बिडरना
भयभीत होकर (पशु का) बिचकना।
क्रि. अ.
[सं. विट्]

बिडराना
तितर-बितर करना।
क्रि. स.
[हिं. बिडरना]

बिडराना
(पशु को) भयभीत करके बिचकाना।
क्रि. स.
[हिं. बिडरना]

बिडरि
भयभीत होकर,बिचककर।
क्रि. अ.
[हिं. बिडरना]
बिडरि चले घन प्रलय जानि कै, दिगपति दिग-दंतीनि सकेलत-१०-६३।

बिडरीं
भयभीत होकर बिचक गयीं।
क्रि. अ.
[हिं. बिडरना]

बिडरीं
तितर-बितर हो गयीं।
भीर भई सुरभी सब बिडरीं मुरली भली सम्हारी-६९३।

बिडरे
तितर-बितर हो गये।
क्रि. अ.
[हिं. बिडरना]
बिडरे गज-जूथ सील, सैन-लाज भाजी-६५०।

बिडरै
निर्भय, निडर।
वि.
[हिं. बि+ डरना]
वह निसंक अतिहिं ढीठ, बिडरै, नहिं भाजै-९-९६।

बिडरै
भयभीत होता है, विचलित होता है।
क्रि. अ.
[बिडरना]
अजामिल द्विज सौं अपराधी, अंतकाल बिडरै। सुत सुमिरत नारायन-बानी, पार्षद धाइ परै-१-८२।

बिडवत
तोड़ता है।
क्रि. स.
[हिं. बिडवना]
घूँघट पट बागर (बागुर) ज्यौं बिडवत जतन करत ससि हारे-2१९०।

बिठाइ
बैठाकर, स्थिर करके।
क्रि. स.
[हिं. बैठाना]
निकट बुलाइ बिठाइ, निरखि मुख, अंचर लेत बलाइ-९-८३।

बिठाना
बैठाना।
क्रि. स.
[हिं. बैठाना]

बिडंब, बिडंबन
आडंबर, दिखावा।
संज्ञा
[सं. विडंब]

विडंबना
नकल।
संज्ञा
[सं. बिडंबन]

विडंबना
उपहास
संज्ञा
[सं. बिडंबन]

बिडर
छितरा हुआ।
वि.
[हिं. बिडरना]

बिडर
निर्भय।
वि.
[हिं. बि+डर]

बिडर
ढीठ।
वि.
[हिं. बि+डर]

बिडरत
भयभीत होकर बिचकता है।
क्रि. अ.
[हिं. बिडरना]
बिडरत बिझुकि जानि रथ ते मृग जनु ससंकि ससि लंगर सारे–१३३३।

बिडरना
तितर-बितर होना।
क्रि. अ.
[सं. विट्]

बिडवना
तोड़ना-फोड़ना।
क्रि. स.
[सं. बिट्]

बिडारना
भयभीत करके भगाना।
क्रि. स.
[हिं. बिडरना]

बिडारी
भगाना, निकाल देना।
क्रि. स.
[हिं. बिडारना]
धर्म-सत्त मेरे पितु-माता, ते दोउ दिये बिडारी-१-१७३।

बिड़ाल
बिलाव।
संज्ञा
[सं.]

बिड़ाल
एक दैत्य।
संज्ञा
[सं.]

बिड़ालक
आँख का गोलक।
संज्ञा
[सं.]

बिढ़तो
लाभ, नफा
संज्ञा
[हिं. बढ़ना]

बिढ़बना, बिढ़ाना
कमाना।
क्रि. स.
[हिं. बढ़ाना]

बिढ़बना, बिढ़ाना
इकट्ठा करना।
क्रि. स.
[हिं. बढ़ाना]

बित
धन, द्रव्य।
संज्ञा
[सं. वित्त]
जनम सिरानौ अटकैं-अटकैं। राज-काज सुत-बित की डोरी, बिनु बिबेक फिर्यो भटकैं-१-२९२।

बहिर्गत
बाहर आया या निकला हुआ।
वि.
[सं.]

बहिर्गत
जो सम्मिलित न हो।
वि.
[सं.]

बहिर्भूमि
बस्ती से बाहर की भूमि जहाँ नित्यक्रिया के लिए लोग जाते हों।
संज्ञा
[सं.]

बहिर्मुख
विमुख, विरुद्ध।
वि.
[सं.]

बहिला
बाँझ, बंध्या।
वि.
[हिं. बाँझ+ला]

बहिष्कार
बाहर निकालना।
संज्ञा
[सं.]

बहिष्कार
दूर या अलग करना , त्यागना।
संज्ञा
[सं.]

बहिष्कृत
बाहर निकला हुआ।
वि.
[सं.]

बहिष्कृत
अलग किया था त्यागा हुआ।
वि.
[सं.]

बहिहौं
बह जाऊँगी, धारा के साथ प्रवाहित हो जाऊँगी।
क्रि. अ.
[हिं. बहना]
अब हौं जाइ जमुन जल बहिहौं-2७० १।

बितई
बिता दी, व्यतीत की।
क्रि. स.
[हिं. बिताना]
होत कहा अबकैं पछिताऐं, बहुत बेर बितई-१-२९९।

बितत
समाप्त, व्यतीत, विगत।
वि.
[सं. व्यतीत]
भारत जुद्ध बितत जब भयौ। दुरजोधन अकेल रहि गयौ-१-२८९।

बितताइ
व्याकुल होकर, बिलखकर।
क्रि. अ.
[हिं. बितताना]
खेलत में तुम बिरह बढ़ायौ गई कहा बितताइ-पृं. ३१२ (२०)।

बिततात
व्याकुल होकर,घबराकर।
क्रि. अ.
[हिं. बितताना]
मैं तौ चकित भई हौं सुनि कै, अति अचरज यह बात। सूर स्याम गारुड़ी कहाँ कौ, कहँ आई बिततात-७५३।

बितताना
व्याकुल, अधीर या संतप्त होना, बिलखना।
क्रि. अ.
[हिं. बिलखना]

बिततानी
बिलखने लगी, व्याकुल हुई, संतप्त हुई।
क्रि. अ.
[हिं. बितताना]
(क) कोउ निरखति दुति चिबुक चारु की, सूर तरुनि बिततानी-६४४। (ख) रोवति महरि फिरति बिततानी-७५९। (ग) घर-घर तरुनी सब बिततानी - पृं. ३३८ (७५)।

बितताने
व्याकुल।
वि.
[हिं. बितताना]
फिरत लोग जहँ तहँ बितताने-१०५०।

बितताये
दुखी या संतप्त किये।
क्रि. स.
[हिं. बितताना]
अपने सुख ब्रज जन बितताये-१०५६।

बितना
बित्ता, बालिश्त।
संज्ञा
[हिं. बित्ता]

बितनु
तन या शरीर रहित।
वि.
[सं. वितनु]

बितनु
बहुत छोटा, सूक्ष्म।
वि.
[सं. वितनु]

बितनु
कामदेव।
संज्ञा

बितपन्न
ज्ञाता, पंडित।
वि.
[सं. व्युत्पन्न]
सूरज प्रभु बितपन्न कोकगुन ताते हरिहर ध्यावत-१५९४।

बितरना
बाँटना।
क्रि. स.
[सं. वितरण]

बितवत
बिताते हैं, व्यतीत करते हैं।
क्रि. स.
[हिं. बितवना]
(क) कल्प समान एक छिन राघव, क्रमक्रम करि हैं बितवत-९-८७। (ख) जब तैं रूप ठगौरी लागी, जुग समान पल बितवत-७३०।

बितवति
बिताती है।
क्रि. स.
[हिं. बितवना]
दिवस बितवति सकल जन मिलि कथति गुन बलबीर-३४७९।

बितवना
बिताना।
क्रि. स.
[हिं. बिताना]

बिता
बित्ता, बालिश्त।
संज्ञा
[हिं. बित्ता]

बिताई
व्यतीत की, समय काटा।
क्रि. स.
[हिं. बिताना]
(क) काहू सौं यह कहि न सुनाई। उहाँ जाइ सब रैनि बिताई। (ख) नृपति निज आयु इहिं बिधि बिताई-८-१६।

बिताना
(समय) काटना।
क्रि. स.
[हिं. बीतना का सक.]

बितायो, बितायौ
(समय ) काटा।
क्रि. स.
[हिं. बिताना]
रिषि मग-जोवत वर्ष बितायौ-९-५।

बितावना
(समय) काटना।
क्रि. स.
[हिं. बिताना]

बिती
घटित हुई, पड़ी।
क्रि. अ.
[हिं. बीतना]
अंतर्यामी यहौ न जानत जो मो उरहि बिती-१० उ०-१०३।

बितीतना
बीतना, व्यतीत होना।
क्रि. अ.
[सं. व्यतीत]

बितीतना
बिताना, व्यतीत करना।
क्रि. स.
[सं. व्यतीत]

बितीतै
व्यतीत हो, बीते।
क्रि. अ.
[हिं. बितीतना]
कछु बालापन ही मैं बीतै। कछु बिरधापन - माहिं बितीतै-७-२।

बितु
धन, द्रव्य।
संज्ञा
[सं. बित्त]

बितैहै
व्यतीत करेगी।
क्रि. स.
[हिं. बिताना]
मेरौ कह्यौ मानिहै नाहीं ऐसे हीं भ्रुमि भ्रुमि द्योस बितैहै-११९२।

बित्त
धन, द्रव्य।
संज्ञा
[सं. वित्त]

बित्त
स्थिति, हैसियत।
संज्ञा
[सं. वित्त]

बित्त
शक्ति, सामर्थ्य।
संज्ञा
[सं. वित्त]

बित्ता
बालिश्त।
संज्ञा
[देश.]

बिथकना
थक जाना।
क्रि. अ.
[हिं. थकना]

बिथकना
चकित या स्तब्ध होना।
क्रि. अ.
[हिं. थकना]

बिथकना
आसक्त होना।
क्रि. अ.
[हिं. थकना]

बिथकाना
थकाना।
क्रि. स.
[हिं. बिथकना]

बिथकाना
चकित करना।
क्रि. स.
[हिं. बिथकना]

बिथकित
चकित या स्तब्ध होकर।
क्रि. अ.
[हिं. बिथकना]
गोपीजन बिथकित ह्वै चितवर्ति सब ठाढ़ी-४४१।

बिथकीं
मुग्ध या आसक्त हुईं।
क्रि. अ.
[हिं. बिथकना]
सूर अमर ललनागन बिथकीं अमरलोक बिसारी।

बिथक्यो, बिथक्यौ
थक गया।
क्रि. अ.
[हिं. बिथकना]
समुझाई समुझत नहीं सिख दै बिथक्यो गाउँ-११८२।

बिथरना
बिखरना।
क्रि. अ.
[सं. वितरण]

बिथरना
अलग होना।
क्रि. अ.
[सं. वितरण]

बिथराइ
अलग-अलग करके।
क्रि. स.
[हिं. बिथराना]

बिथराइ
बिथराइ दियौ - अलग-अलग करके बिखरा दिया।
प्र.
हार तोरि बिथराइ दियो-१०५१।

बिथराना
बिखेरना।
क्रि. स.
[हिं. बिथरना]

बिथराना
अलग करना।
क्रि. स.
[हिं. बिथरना]

बिथरै
छितराकर, बिखेरकर।
क्रि. अ.
[हिं. बिथराना]
धर बिधंसि नल करत किरषि हल, बारि, बीज बिथरै-१-११७।

बिथर्यौ
छिटकाया, बिखेरा।
क्रि. स.
[हिं. बिथारना]
इहिं ढोटा ले ग्वाल भवन मैं कछु बिथरयौ कछु खायौ-१०-३३९।

बिथा
दुख, पीड़ा, क्लेश, कष्ट।
संज्ञा
[सं. व्यथा]
(क) बिनु गोपाल बिथा या तन की कैसैं जाति कटी-१-९८ (ख) ब्यावर बिथा न बंध्या जानै-३४४२।

बिथारना
बिखेरना।
क्रि. स.
[हिं. बिथरना]

बिथित
पीड़ित, दुखित।
वि.
[सं. व्यथित]

बिथुरना
छितरना।
क्रि. अ.
[हिं. बिथरना]

बिथुरना
अलग होना।
क्रि. अ.
[हिं. बिथरना]

बिथुराइ, बिथुराई
फैलकर, छिटककर।
क्रि. अ.
[हिं. बिथरना]
सोभित चिकुर ललाट बदन पर कुंचित कुटिल अलक बिथुराई-2११६।

बिथुराना
बिखरना।
क्रि. अ.
[हिं. बिथुरना]

बिथुराना
अलग होना।
क्रि. अ.
[हिं. बिथुरना]

बिथुराना
बिखेरना।
क्रि. स.
[हिं. बिथुरना]

बिथुराना
अलग करना।
क्रि. स.
[हिं. बिथुरना]

बिथुरि
छितराकर, बिखरकर।
क्रि. अ.
[हिं. बिथुरना]
बिथुरि अलक रहीं मुख पर बिनहिं बपन सुभाइ-१०-२२५।

बिथोरना
बिखराना।
क्रि. स.
[हिं. बिथराना]

बिथोरना
अलग करना।
क्रि. स.
[हिं. बिथराना]

बिद
जाननेवाला, ज्ञाता।
वि.
[सं. विद्]

बिदकना
फटना।
क्रि. अ
[सं. विदारण]

बिदकना
भड़कना।
क्रि. अ
[सं. विदारण]

बिदकना
घायल होना।
क्रि. अ
[सं. विदारण]

बिदकाना
फाड़ना।
क्रि. स.
[हिं. बिदकना]

बिदकाना
घायल करना।
क्रि. स.
[हिं. बिदकना]

बिदकाना
घायल करना।
क्रि. स.
[हिं. बिदकना]

बिदमान
वर्तमान या उपस्थित (होने पर या होकर)।
वि.
[सं. विद्यमान]
(क) फोर्यो नयन, काग नहिं छाड़्यौ सुरपति के बिदमान-९-८३। (ख) जिहिं बल बिप्र तिलक दै माथ्यौ, रच्छा करी आप बिदमान-१०-१२७।

बिदर
विदर्भ देश।
संज्ञा
[सं. विदर्भ]

बिदरन
दरार, दरज।
संज्ञा
[सं. विदीर्ण]

बिदरन
फाड़ने या चीरनेवाला।
वि.

बिदरना
फटना, चिरना।
क्रि. अ.
[सं. विदारण]

बिदराना
फड़वाना, चिरवाना।
क्रि. स.
[हिं. बिदरना]

बिदरि
फटकर।
क्रि. अ.
[हिं. बिदरना]
मेरी बज्र की छाती बिदरि करि नहिं जाति-2५४३।

बिदर्भ
आधनिक वरार प्रदेश का प्राचीन नाम। प्रसिद्धि है कि इस प्रदेश को यह संज्ञा इसी नाम के एक राजा के कारण मिली थी।
संज्ञा
[सं. विदर्भ]

बिदलना
कुचलना।
क्रि. स.
[हिं. वि+दलना]

बिदलना
कष्ट या पीड़ा देना।
क्रि. स.
[हिं. वि+दलना]

बिदली
दलित की, कम कर दी।
क्रि. स.
[हिं. बिदलना]
कीर-कपोत-मीन-पिक-सारँग-केहरि-कदली छबि बिदली। सूरदास प्रभु पास दुहावति, धनि-धनि श्री बृषभानु-लली-१०-७३९।

बिदा, बिदाई, बिदायगी
प्रस्थान, गमन।
संज्ञा
[अ. बिदाअ]
साधु-साधु कहि श्रीमुख बानी। बिदा भए इहिं भाँति बखानी-३९१।

बिदा, बिदाई, बिदायगी
जाने की आज्ञा।
संज्ञा
[अ. बिदाअ]
दीजै बिदा, जाउँ घर अपनै, काल्हि साँझ की आई-१०-१६।

बिदा, बिदाई, बिदायगी
गौना, द्विरागमन।
संज्ञा
[अ. बिदाअ]

बिदा, बिदाई, बिदायगी
वह धन जो बिदा के समय मिले।
संज्ञा
[अ. बिदाअ]

बिदारति
फाड़ती या कुरेदती है।
क्रि. स.
[हिं. बिदारना]
सूरदास प्रभु मान धर्यो दृढ़, धरनी नखत बिदारति-पृ. ३१२ (१७)।

बिदारना
चीरना, फाड़ना, कुरेदना।
क्रि. स.
[सं. विदारण]

बिदारना
बिगाड़ना, नष्ट करना।
क्रि. स.
[सं. विदारण]

बिदारी
चीर डाली, फाड़ दी।
क्रि. स.
[हिं. बिदारना]
हिरनकसिपु की देह बिदारी-१-२८।

बिदार
नष्ट करे, नाश करे।
क्रि. स.
[हिं. बिदारना]
केतिक जीव कृपिन मम बपुरौ, तजै कालहू प्रान। सूर एक हीं बान बिदारैं, श्री गोपाल की आन-१-२७५।

बिदारौं
चीर दूँ, फाड़ डालूँ।
क्रि. स.
[हिं. बिदारना]
कहौ तौ असुर लँगूर लपेटौं, कहौ तौ नखनि बिदारौं-९-१०७।

बिदार्यो, बिदार्यौ
चीर-फाड़ डाला।
क्रि. स.
[हिं. बिदारना]
हिरनकसिपु बपु नखनि बिदार्यो-१०-२२१।

बिदेह
देहरहित।
वि.
[सं. विदेह]

बिदेह
बेसुध।
वि.
[सं. विदेह]

बिदेह
राजा जनक।
संज्ञा

बिदेह
मिथिला का प्राचीन नाम।
संज्ञा

बिदोख, विदोष
बैर, झगड़ा।
संज्ञा
[सं. विद्वेष]

बिदोरना
(दाँत) खोलकर दिखाना।
क्रि. स.
[सं. विदारण]

बिद्यमान
उपस्थित, विद्यमान, वर्तमान।
वि.
[सं. विद्यमान]
माधौ जू, मन हठ कठिन पर्यो। जद्यपि बिद्यमान सब निरखत, दुःख सरीर भर्यो-१-१००।

बिद्या
विद्या, शिक्षा, जानकारी।
संज्ञा
[सं. विद्या]
संदीपन-सुत तुम प्रभु दीने, बिद्या-पाठ करयौ-१-१३३।

बिधँसना
नाश करना
क्रि. स.
[हिं. बिध्वंसन]

विधंसि
नष्ट करके, नाश करके, विध्वंस करके।
क्रि. स.
[हिं. बिधँसना]
धर बिधंसि नल करत किरषि हल, बारि, बीज बिथरै। सहि सन्मुख तउ सीत-उष्न कौं, सोई सुफल करै-१-११७

बहिअर
स्त्री।
संज्ञा
[सं. वधूवर]

बहिए
धारा में प्रवाहित होइए, डूब जाइए
क्रि. अ.
[हिं. बहना]
कबहुँक उपजै जिय में ऐसी जाइ जमुन बहिए-2८९२।

बहिकाई
भुलावे में डाली।
क्रि. स.
[हिं. बहकाना]

बहिकाई
दियो बहिकाई-भुलावे में डाल दिया।
प्र.
काहू इन्हैं दियो बहकाई -१०४१।

बहिक्रम
अवस्था, उम्र।
संज्ञा
[सं. वयःकम]

बहित्र
नाव, जहाज।
संज्ञा
[सं. वहित्र]

बहिन
भगिनी।
संज्ञा
[सं. भगिनी, प्रा. बहिणी]

बहिनापा
बहन का संबन्ध।
संज्ञा
[हिं. बहनापा]

बहिनी
भगिनी।
संज्ञा
[हिं. बहन]
सूर स्याम हमको बिरमावत खीझति बहिनी माई-११४४।

बहिबो, बहिबौ
बहने का भाव या कार्य।
संज्ञा
[हिं. बहना]
(क) जब ते गंग परी हरि पग तें बहिबो नहीं निवारै - ३१८९ (ख) अब न देह जरि जाइ सुर इन नैनन को बहिबो-३४१४। (ग) सूर स्याम हम कहैं कहाँ लगि बचन लाज बहिबो-३४१५।

बिदित
प्रसिद्ध, ज्ञात, अवगत, जानी हुई।
वि.
[सं. विदित]
(क) जीव न तजै स्वभाव जीव कौ लोक बिदित दृढ़ताई.-१-२०७। (ख) जौ नाहीं अनुसरत नाम जग, बिदित बिरद कत कीन्हौं-१-२११।

बिदिसि
दो दिशाओं के बीच का कोना।
संज्ञा
[सं. विदिश्]
रघुपति कहि प्रिय नाम पुकारत। हाथ धनुष लीन्हें, कटि भाथा, चकित भए दिसि-बिदिसि निहारत-९-६२।

बिदीरना
फाड़ना।
क्रि. स.
[सं. विदीर्ण]

बिदुराना
मुसकराना।
क्रि. अ.
[सं. विदुर]

बिदुरानी
मुसकराहट।
संज्ञा
[हिं. बिदुराना]

बिदुरानी
मुसकरायी, हँसने लगी।
क्रि. अ.

बिदूषना
दोष या कलंक लगाना।
क्रि. स.
[हिं. दोष]

बिदूषना
बिगाड़ना।
क्रि. स.
[हिं. दोष]

बिदेस
दूसरा देश, परदेश।
संज्ञा
[सं. विदेश]
इहिं बिधि उच्च-अनुच तन धरि-धरि देस-बिदेस बिचरतौ-१-२०३।

बिदेह
जिसे शरीर का ध्यान या उसकी चिंता हो।
वि.
[सं. विदेह]

बिध
भाँति।
संज्ञा
[सं. विधि]

बिध
रीति।
संज्ञा
[सं. विधि]

बिध
ब्रह्मा, विधाता।
संज्ञा

बिध
आय-व्यय का लेखा।
संज्ञा
[सं. विधा=लाभ]

बिधना
ब्रह्मा, विधि,विधाता।
संज्ञा
[सं. विधि+ना (प्रत्य.)]
(क) कंसराइ जिय सोच परी। कहा करौं, काकौं ब्रज पठवौं, बिधना कहा करी-१०-४८। (ख) बड़ौ निठुर बिधना यह देख्यौ। जब तैं आजु नंदनंदन छबि बार-बार करि देख्यौ-६४३।

बिधना
ब्रह्म, ईश्वर।
संज्ञा
[सं. विधि+ना (प्रत्य.)]
सूरजदास भरम जनि भूलौ करि बिधना सौं हेत-१-३२२।

बिधना
होनी, भवितव्यता।
संज्ञा

बिधना
बींधा या छेदा जाना।
क्रि. स.
[हिं. बिंधना]

बिधना
फँसना, उलझना।
क्रि. स.
[हिं. बिंधना]
क्रि. स.

बिधये
छिद गये, आहत हुए।
क्रि. अ.
[हिं. बिधना]
थके चरन सुनि सूर मनो गुन मदन बान बिधये री-१३४८।

बिधवत
बेधता है।
क्रि. अ.
[हिं. बिधना]
जैसे बधिक अधिक मृग बिधवत राग रागिनी ठानि-३२५०।

बिधवा
राँड़ (स्त्री)।
वि.
[सं. विधवा]

बिधवाना
छिदवाना।
क्रि. स.
[हिं. बिंधवाना]

बिधवाना
फंसवाना।
क्रि. स.
[हिं. बिंधवाना]

बिधाँसना
नष्ट करना।
क्रि. स.
[सं. विध्वंसन]

बिधाई
विधान करनेवाला।
संज्ञा
[सं. विधायक]

बिधाता
ब्रह्मा।
संज्ञा
[हिं. विधाता]

बिधातैं
ब्रह्मा ने।
संज्ञा
[हिं. विधाता]
सूरदास बिपरीत बिधातैं यहि तनु फेरि ठटे-३०६९।

बिधान
आयोजन।
संज्ञा
[सं. विधान]

बिधान
प्रबंध।
संज्ञा
[सं. विधान]

बिधान
प्रणाली।
संज्ञा
[सं. विधान]

बिधान
निर्माण।
संज्ञा
[सं. विधान]

बिधान
नियम, आज्ञा।
संज्ञा
[सं. विधान]

बिधाना
छिदवाना, बिंधवाना।
क्रि. अ.
[हिं. बिंधाना]

बिधानी
विधान करनेवाला।
संज्ञा
[सं. विधान]

बिधि
ब्रह्मा, विधाता।
संज्ञा
[सं. विधि]
जोरि कर बिधि सौं मनावति आसीसै दै नाम-2५५५।

बिधि
रीति, प्रणाली।
संज्ञा
[सं. विधि]

बिधि
प्रकार, भाँति।
संज्ञा
[सं. विधि]
(क) इहि बिधि इहिं डहके सबै, जल-थल-नभ जिय जेते (हो)-१-४४। (ख) अब भ्रम-भँवर पर्यो ब्रजनायक निकसन की सब बिधि की १-२१३। (ग) स्रवन सुजस सारंग-नाद बिधि, चातकबिधि मुख नाम-2-१२२।

बिधि
व्यवस्था।
संज्ञा
[सं. विधि]

बिधि
शास्त्रीय विधान।
संज्ञा
[सं. विधि]

बिधि
नियम, कानून।
संज्ञा
[सं. विधि]

बिधिना
बिधाता, ब्रह्मा।
संज्ञा
[सं. विधि]
मनहीं मन अनुमान कियौ यह बिधिना जोरी भली बनाई–७६१।

बिधि-बाहन
विधाता का वाहन, हंस।
संज्ञा
[सं. विधि+हिं. बाहन]

बिधिवाहन-भच्छन
ब्रह्मा की सवारी (हंस) का भोजन, मोती।
संज्ञा
[सं. विधि+वाहन +भक्षण]
बिधि-बाहन-भच्छन की माला, राजत उर पहिराए-४१७।

बिधिवत
विधि से, विधिपूर्वक,पद्धति के अनुसार।
क्रि. वि.
[सं. विधिवत्]
बैठे नंद करत हरि-पूजा बिधिवत और बहु भाँति-१०-२६०।

बिधुंसना
नाश करना।
क्रि. स.
[हिं. बिधंसना]

बिधु
चन्द्रमा।
संज्ञा
[सं. विधु]
बिकसति ज्योति अधर-बिच, मानौ बिधु मैं बिज्जु उज्यारी-१०-९१।

बिधु
विधिना।
संज्ञा
[सं. विधु]

बिन
छोड़कर, बगैर, बिना।
अव्य.
[हिं. बिना]
जैसे मगन नाद-रस सारँग, बधत बधिक बिन बान-१-१६६।

बिनई
नम्र, विनीत।
संज्ञा
[सं. विनयी]

बिनई
विनती या प्रार्थना करनेवाला।
संज्ञा
[सं. विनयी]

बिनउ
प्रार्थना।
संज्ञा
[सं. विनय]

बिनउ
नम्रता।
संज्ञा
[सं. विनय]

बिनति, बिनती
प्रार्थना, निवेदन।
संज्ञा
[सं. विनय]
(क) सूरदास बिनती कह बिनवै, दोषनि दहे भरी-१-१३०। (ख) बिनती करत डरत करुनानिधि, नाहिँन परत रह्यौ-१-१६२।

बिनन
चुनने को क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. बिनना = चुनना]

बिनन
बीनने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. बिनना = चुनना]

बिनन
बीनने पर निकला हुआ कूड़ा करकट।
संज्ञा
[हिं. बिनना = चुनना]

बिनन
बुनने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. बिनना = चुनना]

बिनना
चुनना, छाँटना।
क्रि. स.
[सं. वीक्षण]

बिनना
संग्रह करना।
क्रि. स.
[सं. वीक्षण]

बिनना
डंक मारना।
क्रि. स.
[हिं. बींधना]

बिनना
बुनना।
क्रि. स.
[हिं. बुनना]

बिनय
बिनती, प्रार्थना।
संज्ञा
[सं. विनय]
बिनय कहा करै सूर, कूर, कुटिल कामी-१-१२४।

बिनवति
विनय करती है।
क्रि. अ.
[हिं. बिनवना]
उडुपति सों बिनवति मृग नैनी-१० उ०-९३।

बिनवना
बिनती-प्रार्थना करना।
क्रि. अ.
[सं. विनय]

बिनवहु
विनय करो।
क्रि. अ.
[हिं. बिनवना]
कहत बचन बिचारि बिनवहु सोधि हो मन माँहि-३२७५।

बिनवै
विनय करती है, प्रार्थना करे, बिनती करे।
क्रि. अ.
[हिं. बिनवना]
(क) सूरदास बिनती कह बिनवै, दोषनि देह भरी-१-१३०। (ख) सूर कर जोरि अंचल छोरि बिनवँ, बचैं ए आजु बिधि इहै माँगे-2५०३।

बिनशत, बिनसत
नष्ट होता है, नाश या बरबाद होता है।
क्रि. अ.
[सं. विनाश]
पुनि कह्यौ, जीव दुखित संसार। उपजत-बिनसत बारंबार-७-२।

बिनशना, बिनसना
नष्ट या बरबाद होना।
क्रि. अ.
[सं. विनाश या बिनष्ट]

बिनशना, बिनसना
नाश होना, चौपट होना।
क्रि. स.
[सं. विनाश या बिनष्ट]

बिनाश, बिनास
नाश, ध्वंस, मिटना, बरबादी।
संज्ञा
[सं. विनाश]
चोर न चित चोरी तजै(रे) सरबस सहै बिनास-१-३२५।

बिनाशन, बिनासन
नष्ट करने, नाश करने, बिगाड़ने।
काहे कौं छल करि-करि आवत, धर्म बिनासन मोर-९.८३।

बिनाशन, बिनासन
विनाश करनेवाले।
संज्ञा
[सं. विनाशन]
(क) सुनि देवकी को हितू हमारे। असुर कंस अपबंस बिनासन, सिर ऊपर बैठे रखवारे.-१०१०। (ख) सूरदास प्रभु दुष्ट बिनाशन गोकुल ते मथुरा आए-2५९८।

बिनाशना, बिनासना
नष्ट करना।
क्रि. स.
[सं. विनाश]

बिन, बिनि, बिनु
छोड़कर, बगैर।
अव्य.
[हिं. बिना]
बिनु बदलैं उपकार करत हैं स्वारथ बिना करत मित्राई-१-३।

बिनूठा
अनोखा, विचित्र।
वि.
[हिं. अनूठा]

बिनै
बिनती, प्रार्थमा, बिनय।
संज्ञा
[सं. विनय]
सरन आए की प्रभु, लाज धरिऐ। सध्यौ नाहिं धर्म सुचि, सील, तप, ब्रत कछु, कहा मुख लै तुम्हैं बिनै करिऐ-१-११०।

बिनैका
पकवान या भोजन का भाग जो गणेश जी के लिए निकाल दिया जाता है।
संज्ञा
[सं. विनायक]

बिनोद
प्रमोद, परिहास, हँसी, आनन्द।
संज्ञा
[सं. विनोद]
सुत-तनया-बनिता-बिनोद-रस इहिं जुर-जरनि जरायौ-१-१५४।

बिनोदी
आनंदी, जिसका स्वभाव आमोद-प्रमोद का हो।
वि.
[हिं. विनोदी]
छरीदार बैराग बिनोदी झिरकि बाहिर कीन्हें-१-४०।

बिनशाना, बिनसाना
नष्ट करना।
क्रि. स.
[सं. विनाश]

बिनशाना, बिनसाना
विनष्ट होना।
क्रि. अ.
[सं. विनाश]

बिनशै, बिनसै
नष्ट हो।
क्रि. अ.
[हिं. बिनसना]
अबिनाशी बिनशै (बिनसै) नहीं, सहज जोति परगास-३४४३।

बिना
छोड़कर, बगैर।
अव्य.
[सं. विना]

बिनाई
बीनने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
संज्ञा
[हिं. बीनना]

बिनाई
बुनने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. बीनना]

बिनाती
प्रार्थना, विनय।
संज्ञा
[हिं. बिनती]

बिनाना
बुनवाना।
क्रि. स.
[हिं. बुनवाना]

बिनानी
अज्ञानी, अनजान।
वि.
[सं. विज्ञानी]
(क) रोवन लागे कृष्न बिनानी। जसुमति आइ गई लै पानी-१०-५७। (ख) पाहन सिला निरखि हरि डार्‌यौ, ऊपर खेलत कृष्न बिनानी-१०-७८। कबहुँक आर करत माखन की कबहुँक भेष दिखाइ बिनानी। (ग) भवन-काज को गई नँदरानी। आँगन छाँड़े स्याम बिनानी-३९१।

बिनानी
विचार, गौर।
संज्ञा
[सं. विज्ञान]
चितै रहे तब नंद जुवति-मुख मन-मन करत बिनानी-१०-२५६।

बिनौला
कपास का बीज।
संज्ञा
[देश.]

बिपच्छ
शत्रु, बैरी।
संज्ञा
[सं. विपक्ष]

बिपच्छ
अप्रसन्न।
वि.

बिपच्छ
बिमुख, विरुद्ध।
वि.

बिपच्छी
विरोधी।
संज्ञा
[सं. विपक्षिन्]

बिपच्छी
शत्रु।
संज्ञा
[सं. विपक्षिन्]

बिपता, बिपति, बिपत्त, बिपत्ति, बिपत्ती
संकट, मुसीबत।
संज्ञा
[सं. विपत्ति]

बिपद, बिपदा
संकट, मुसीबत।
संज्ञा
[सं. विपद]

बिपर
ब्राह्मण।
संज्ञा
[सं. विप्र]

बिपरीत, बिपरीति
विरोध-भावना, प्रतिकूलता की भावना।
संज्ञा
[सं. विपरीत]
मंत्री काम क्रोध निज दोऊ अपनी अपनी रीति। दुबिधा दुंद रहै निसिबासर, उपजावत बिपरीति-१-१४१।

बहु
वधू, बहू।
संज्ञा
[हिं - बहू]

बहुज्ञ
बहुत जानकारी रखनेवाला।
वि.
[सं.]

बहुटनी
बाँह का एक गहना।
संज्ञा
[हिं. बहूँटा]
बहु नग लगे जराव की अँगिया, भुला बहु्टनी बलय संग को।

बहुत
गिनती में अधिक, अनेक।
वि.
[सं. बहुतर]

बहुत
मात्रा में अधिक।
वि.
[सं. बहुतर]

बहुत
यथेष्‍ट, पर्याप्त।
वि.
[सं. बहुतर]
बहुत अच्छा - (१) ऐसा ही किया जायगा (स्वीकृति सूचक) (२) अच्छी बात है, समझ लेंगे (धमकाना)। बहुत करके - (१) प्रायः, बहुधा।(२) अधिक संभव तो यही है। बहुत-कुछ - (१) अधिकांश। (२) पर्याप्त, यथेष्ट। बहुत खूब - (१) बहुत बढ़िया (आश्चर्यसूचक)। (२) बहुत अच्छा (स्वीकृतिसूचक)। बहुत है - कुछ नहीं है (व्यंग्य)।

बहुत
अधिक, ज्यादा।
क्रि. वि.
(क) तुम प्रभू मोसौं बहुत करी-१-११६। (ख) सूर रहे समुझाइ बहुत, पै कैकइ-हठ नहिं जाइ-९-३०१।

बहुतक
बहुत से, बहुतेरे।
वि.
[हिं. बहुत +एक]
(क) बहुतक जन्म पुरीष-परायन, सूकर-स्वान भयौ -१-७८। (ख) बहुतक तपसी पचि-पचि मुए-४-९।

बहुतक
अधिक परिमाण में, ज्यादा।
क्रि. वि.
ता रिस मैं मोहिं बहुतक मारयो-2१-१५१।

बहुता, बहुताइ, बहुताई,
अधिकता।
संज्ञा
[हिं. बहु+ता]

बिपरीत, बिपरीति
उलटी रीति-नीति या पद्धति।
संज्ञा
[सं. विपरीत]
तिनकी बड़ी बिपरीति। जिम्मे उनके, माँगैं मोतैं, यह तौ बड़ी अनीति-१-१४३।

बिपरीत, बिपरीति
उलटी या विरोधी बात।
संज्ञा
[सं. विपरीत]
कहँ मेरौ कान्ह, कहाँ तुम ग्वारिनि, यह बिपरीत न जानी-१०-३११।

बिपाक
पूर्णता को पहुँचना,चरम उत्कर्ष।
संज्ञा
[सं. विपाक]

बिपाक
दुर्दशा, कष्ट, संकट।
संज्ञा
[सं. विपाक]
प्रगट पाप-संताप सूर अब, कापर हठै गहौं ? और इहाँउ बिवेक-अगिनि के बिरह-बिपाक दहौं-३-२।

बिपुल
लम्बा, बड़ा
वि.
[सं. विपुल]
नव-धनु, नील सरोजबरन बपु, बिपुल बाहु, केहरि कल-काँधे-९-५८।

बिफर
निष्फल।
वि.
[सं. विफल]

बिफर
फलरहित।
वि.
[सं. विफल]

बिफरना
बिद्रोही होना।
क्रि. अ.
[सं. विप्लवन]

बिफरना
अप्रसन्न या क्रुद्ध होना, बिगड़ना।
क्रि. अ.
[सं. विप्लवन]

बिफल
निष्फल, मिथ्या, असत्य।
वि.
[सं. विफल]
या सपने कौ भाव सिया सुनि, कबहुँ बिफल नहिं जाइ-९-८३।

बिफल
फलरहित, जिसमें फल न लगें।
वि.
[सं. विफल]
मुरली सुनत अचल चले। द्रवित ह्वै जल झरत पाहन बिफल बृक्ष फले-पृ. ३४७ (५४)।

बिबछना
विरोधी होना।
क्रि. अ.
[सं. विपक्ष]

बिबछना
फँसना, उलझना।
क्रि. अ.
[सं. विपक्ष]

बिबरन
खराब रंगवाला।
वि.
[सं. विवर्ण]

बिबरन
मलिन कांतिवाला।
वि.
[सं. विवर्ण]

बिबरन
वृत्तांत, वर्णन।
संज्ञा
[सं. विवरण]

बिबरनि
बिलों में, छिद्रों में।
संज्ञा
[सं. विवर+हिं. नि. (प्रत्य.)]
भुज भुजंग, सरोज नैननि, बदन बिधु जित लरनि। रहे बिबरनि, सलिल, नभ, उपमा अपर दुरि डरनि-१०-१०९।

बिबस
मजबूर, विवश।
वि.
[सं. विवश]

बिबस
पराधीन, लीन।
वि.
[सं. विवश]
(क) कामी, बिबस कामिनी कैं रस, लोभ लालसा ब्यापी-१-१४०। (ख) तहाँ परासर रिषि चलि आए। बिबस होइ तिहिं कैं मद छाए.-१-२२९।

बिबस
विवश होकर, लाचारी से।
क्रि. वि.
[सं. विवश]

बिबर्जित
मना है, निषेष है।
वि.
[हिं. विवर्जित]
निराहार जलपान बिबर्जित-१००२।

बिबस्त्र
वस्त्ररहित, नग्न।
वि.
[सं. वि= रहित + वस्त्र]
करत बिबस्त्र द्रुपद-तनया कौं सरन सब्द कहि आयौ-१-१९०।

बिबहार
व्यवहार, बर्ताव।
संज्ञा
[सं. व्यवहार]

बिबाई
एक रोग जिसमें तलुए का चमड़ा फटने से घाव हो जाते हैं।
संज्ञा
[सं. विपादिका]

बिबाकी
हिसाब की सफाई।
संज्ञा
[अ. बेबाकी]

बिबाकी
समाप्ति।
संज्ञा
[अ. बेबाकी]

बिबाद
वितर्क।
संज्ञा
[सं. विवाद]
अबिहित बाद-बिबाद सकल मत इन लगि भेष धरत-१.५५।

बिबि
दो।
वि.
[सं. द्वि.]

बिबुध
देवता।
संज्ञा
[सं. विवुध]

बिबुधनि
देवों का, देवताओं का।
संज्ञा
[सं. विवुध+नि]
बिबुधनि मन तर मान रमत ब्रज, निरखत जसुमति सुख-छिन-पल-घरि-१०-१२०।

बिभावन
धारणा, विचार।
संज्ञा
[सं. विभावन]

बिभावन
रुचिकर, प्रिय लगनेवाला।
वि.

बिभिचारी
व्यभिचारी।
वि.
[सं. व्यभिचारी]

बिभीषन
रावण का भाई जिसने लंका की विजय में श्रीराम की सहायता की थी।
संज्ञा
[सं. विभीषण]

बिभूति
राख या भस्म।
संज्ञा
[सं. विभूति]
रावन तुरत बिभूति लगाए, कहत आइ, भिच्छा दै माई–९.५९।

बिभूति
वैभव।
संज्ञा
[सं. विभूति]

बिभूति
धन-संपत्ति।
संज्ञा
[सं. विभूति]

बिभूषन
भूषण, अलंकार।
संज्ञा
[सं. विभूषण]
हरिहर संकर नमो, नमो। अहिसायी, अहिअंग-बिभूषन, अमित दान, बल-बिष-हारी-१०-१७१।

बिभूषन
सजाने की क्रिया या भाव, अलंकरण।
संज्ञा
[सं. विभूषण]

विभूषित
अलंकृत।
वि.
[सं. विभूषित]
सुरभि रेनु-तन, भस्म विभूषित, बृष-बाहन, बन-बृथचारी-१०-१७२।

बिभंजन
तोड़ने या भंग करने का भाव या क्रिया।
संज्ञा
[हिं. भंजन]

बिभंजना
तोड़ना, भंग करना।
क्रि. स.
[हिं. भंजन]

बिभंज्यो, बिभंज्यौ
तोड़ा।
क्रि. स.
[हिं. बिभंजना]
रजक मारि कै दंड बिभंज्यो खेल करत गज प्रान लियो-2६१६।

बिभचार
उलटा, विपरीत।
वि.
[सं. व्यभिचार]

बिभचार
व्यभिचार।
संज्ञा
[सं. व्यभिचार]

बिभव
धन, संपत्ति, ऐश्वर्य।
संज्ञा
[सं. विभव]
(क) रोर कै जोर तैं सोर घरनी कियौ, चल्यौ द्विज द्वारिका-द्वार ठाढ़ौ। जोरि अंजलि मिले, छोरि तंदुल लए, इन्द्र के बिभव तैं अधिक बाढ़ौ-१-५। (ख) तीनि लोक बिभव दियौ तंदुल के खाता-१-१२३।

बिभाग
भाग, खंड।
संज्ञा
[सं. विभाग]

बिभागना
भाग करना।
क्रि. स.
[सं. विभाग]

बिभागि
भाग करके।
क्रि. स.
[हिं. विभागना]
माखन पिंड बिभागि दुहुँ कर, मेलत मुख मुसुकाइ-१०-१७८।

बिभाना
चमकाना।
क्रि. अ.
[सं. विभा]

बिभोर
मग्न, लोन।
वि.
[सं. विभोर]

बिभोर
मस्त।
वि.
[सं. विभोर]

बिभ्रम
भ्रम, भ्रांति,धोखा।
संज्ञा
[सं. विभ्रम]
कनक-कुंडल-स्रवन बिभ्रम कुमुद निसिं सकुचाइ-१०-३५२।

बिभ्रम
संदेह, संशय।
संज्ञा
[सं. विभ्रम]

बिमन
दुखी, उदास, चिंतित।
वि.
[सं. विमनस्]

बिमन
अनमना होकर, बेमन से।
क्रि. वि

बिमल
स्वच्छ, निर्मल, पावन।
वि.
[सं. विमल]
बेद बिमल नहिं भाख्यौ-१-१११।

बिमल
निर्दोष, निष्कलंक।
वि.
[सं. विमल]
पारथ बिमल बभ्रुबाहन कौं सीस-खिलौना दीनौ-१.२९।

बिमात, बिमाता
सौतेली माँ, विमाता।
संज्ञा
[हिं. विमाता]
सुर अरु असुर कस्यप के पुत्र। भ्रात-बिमात आपु मैं सत्रु-३-९।

बिमान
देवताओं का यान जो आकाश में चलता है।
संज्ञा
[सं. विमान]

बिमोहना
मुग्ध या आसक्त होना।
क्रि. अ.
[हिं बिमोहना]

बिमोहीं
मुग्ध, आकृष्ट या आसक्त हुई।
क्रि. अ.
[हिं. बिमोहना]
नाद सुनि बनिता बिमोहीं बिसारे उर-चीर-६५८।

बिय
दो।
वि.
[सं. द्वि]

बिय
दूसरा।
वि.
[सं. द्वि]

बिय
बीज।
संज्ञा
[हिं. बीज]

बियहुता
जिसके साथ विवाह हो।
वि.
[हिं. विवाहित]

बिया
बीज।
संज्ञा
[हिं. बीज]

बिया
दूसरा, अन्य।
वि.
[सं. द्वि]

बिया
शत्रु।
संज्ञा

बिया
विरोधी।
संज्ञा

बिमान
वायुयान।
संज्ञा
[सं. विमान]

बिमान
मृत पुण्यात्माओं को स्वर्ग ले जाने के लिए आनेवाला कल्पित यान।
संज्ञा
[सं. विमान]
सुवा पढ़ावत जीभ लड़ावति ताहि बिमान पठायौ-१-१८८।

बिमान
रथ आदि यान।
संज्ञा
[सं. विमान]
पाछे चढ़ो बिमान मनोहर बहुरो जदुपति होत अँधेरौ-2५३२।

बिमान
मान या प्रतिष्ठाहीन, गर्व-गौरवहीन।
वि.
जिहिं बल कमठ-पीठि पर गिरिधरि सजल सिंधु मथि कियौ बिमान-१०-१२७।

बिमानी
अभिमानरहित।
वि.
[सं. वि+मान]

बिमुख, बिमुखा
जो किसी के प्रतिकूल हो, विरोधी।
वि.
[सं. विमुख]
(क) मानी हार बिमुख दुरजोधन, जाके जोधा हे सौ भाई-१-२४। (ख) दान-धर्म बहु कियौ भानु-सुत,सो तुव विमुख कहायौ-१-१०४।

बिमुख, बिमुखा
जो अनुरक्त न हो, जिसने मन न लगाया हो, उदासीन।
वि.
[सं. विमुख]
(क) ऐसैहिं जनम बहुत बौरायौ। बिमुख भयौ हरि-चरन-कमल तजि, मन संतोष न आयौ-१-२७। (ख) तुमहिं बिमुख रघुनाथ, कौन बिधि जीवन कहा बनै-९-५३।

बिमुद
मोदरहित, खिन्न, चिंतित।
वि.
[सं. वि + मोद]

बिमोहन
मोहनेवाली, ध्यान आकृष्ट करनेवाली।
वि.
[हिं. विमोहन]
उर बनमाल बिचित्र बिमोहन,भृगु - भँवरी भ्रम कौं नासै-१-६९।

बिमोहना
लुभाना, मुग्ध करना।
क्रि. स.
[हिं बिमोहना]

बियाज
ब्याज, सूद।
संज्ञा
[सं. ब्याज]

बियाजू
(धन) जो ब्याज पर लगा या लगाने को हो।
वि.
[सं. ब्याज+युक्त]

बियाध
बहेलिया।
संज्ञा.
[सं. व्याध]

ब्याधा
बहेलिया।
संज्ञा
[सं. व्याध]

ब्याधा
रोग।
संज्ञा
[सं. व्याधि]

ब्याधा
विपत्ति।
संज्ञा
[सं. व्याधि]

बियान
प्रसव, जनन।
संज्ञा
[हिं. बियाना]

बियाना
बच्चा जनना।
क्रि. स.
[सं. विजनन]

बियापना
फैलना, व्याप्त होना।
क्रि. स.
[सं. व्यापना]

बियाबान
उजाड़ स्थान, जंगल।
संज्ञा
[फा.]

बियोग
संयोग का अभाव, विच्छेद।
संज्ञा
[सं. वियोग]

बियोग
पृथकता, अलगाव।
संज्ञा
[सं. वियोग]
नैंकु बियोग मीन नहिं मानत, प्रेम-काज बपु हारयौ-१-२१०।

बियौ
दूसरा, अन्य।
वि.
[सं. द्वितीय, प्रा. वीय, हिं. वियौ]
(क) सूरदास प्रभु भक्त-बछल हैं, उपमा कौं न बियौ-१-३८। (ख) इनतैं नहिं प्रभु और बियौ-१-८५।

बिरंग, बिरंगा
कई रंगों का।
वि.
[हिं. बि+रंग]

बिरंग, बिरंगा
बिना रंग का।
वि.
[हिं. बि+रंग]

बिरंचि
सृष्टि रचनेवाला, ब्रह्मा, विधाता।
संज्ञा
[सं. विरंचि]
सिव-बिरंचि, सुर-असुर, नाग-मुनि,सूतौ जाँचि मन आयौ-१-२००।

बिरक्त
जो सांसारिकता में लीन न रहता हो, वैरागी, संसार से उदासीन।
वि.
[सं. विरक्त]
(क) बिषयी भजे, बिरक्त न सेए, मन धन-धाम धरे-११९८। (ख) कौरव-पति ज्यौं बन कौं गयौ। धर्मपुत्र बिरक्त पुनि भयौ-१-२८४।

बिरचना
विरक्त या उदासीन होना।
क्रि. अ.
[सं. वि+ रुचि]

बिरचना
अप्रसन्न होना।
क्रि. अ.
[सं. वि+ रुचि]

बिरचि
रचकर, बनाकर, निर्माण करके।
क्रि. स.
[हिं. विरचना]
(क) एकनि लै मंदिर चढ़ै, एकनि बिरचि बिगोवै (हो )-१-४४। (ख) बर सिंगार बिरचि राधा जू चली सकल ब्रज-बालिका-८०९।

बही
हिसाब-किताब लिखने की पुस्तक।
संज्ञा
[सं. बद्ध]
(क) सूर पतित जौ झूठ कहत है, देखौ खोजि बही-१-१३७। (ख) अहंकार पटवारी कपटी झूठी लिखत बही-१-१८५।
बही में चढ़ना (टँकना) - हिसाब में लिख लिया जाना। बही में चढ़ाना (टाँकना) - हिसाब में लिखना।

बही
प्रवाहित हुई।
क्रि. अ.
[हिं. बना]
(क) मनु बरषत भादौं मास नदी घृत-दूध बही-१०- २४।

बही
मारी मारी फिरी, भटकती घूमी।
क्रि. अ.
[हिं. बना]
(क) घर तजिकै कोऊ रहत पराये मैं तबहीं ते फिरति बही री-१८६। (ख) सूरदास इन लोभिनि के संग बन-बन फिरति बही - पृ.३३२ (१५)।

बहीखाता
हिसाब-किताब लिखने की पुस्तक।
संज्ञा
[हिं. बही + खाता]

बहीर
जन-समूह, भीड़।
संज्ञा
[हिं. भीड़]

बहीर
सेना के साथ सेवक - समूह।
संज्ञा
[हिं. भीड़]

बहीर
सेना की सामग्री।
संज्ञा
[हिं. भीड़]

बहीर
बाहर।
अव्य.
[हिं. बाहर]

बहु
बहुत (संख्यावाचक), एक से अधिक, अनेक।
वि.
[सं.]

बहु
ज्यादा, अधिक।
जनम-मरन-काटन कौं कर्तरि तीछन बहु विख्यात-१- ९०।

बियारी, बियारू
रात का भोजन, व्यालू।
संज्ञा
[सं. वि+अद]
साँझ भई घर आवहु प्यारे।...। सूर स्याम कछु करौ बियारी, पुनि राखौं पौढ़ाइ-१०-२२६।

बियाल
सर्प, भुजंग।
संज्ञा
[सं. व्याल]

बियालू
रात का भोजन।
संज्ञा
[स. वि+अद]

बियावर
ब्याने या बच्चा देनेवाली।
वि.
[हिं. ब्याना]

बियाह
विवाह।
संज्ञा
[सं. विवाह]

बियाहता
जिसके साथ विवाह हो।
वि.
[सं. विवाहित]

बियाहता
जिसका विवाह हो चुका हो।
वि.
[सं. विवाहित]

बियाहन
विवाह करने, ब्याहने।
क्रि. स.
[हिं. ब्याहना]
तेरी सौं, मेरी सुनि मैया, अबहिं बियाहन जैहों-१०-१६३।

बियाहा
विवाहित।
वि.
[हिं. ब्याह]

बियो
बेटे का बेटा, पोता।
संज्ञा
[हिं.]

बिरचि
रचि-बिरचि - सजधजकर, बना-सँवारकर।
यौ.
रचि-बिरचि मुख-भौंह-छबि लै चलति चित्त चुराइ-१-५६।

बिरच्यौ
रचा, बनाया।
क्रि. स.
[हिं. विरचना]

बिरच्यौ
अलंकृत किया, सजाया।
क्रि. स.
[हिं. विरचना]
रहयौ मन सुमिरन कौ पछितायौ। यह तन राँचि-राँचि करि बिरच्यौ,कियौ आपनौ भायौ-१-६७।

बिरछ
पेड़, वृक्ष।
संज्ञा
[सं. वृक्ष]

बिरछिक, बिरछीक
बिच्छू।
संज्ञा
[सं. वृश्चिक]

बिरझना
उलझना, झगड़ना।
क्रि. अ.
[सं. विरुद्ध]

बिरतंत, बिरतांत
विवरण, वर्णन।
संज्ञा
[सं. वृत्तांत]

बिरत
जो सांसारिकता में लिप्त न हो, विरक्त, वैरागी.
वि.
[सं. विरत]
रे मन, गोबिंद के ह्व रहिये। इहिं संसार अपार बिरत ह्वै, जम की त्रास न सहियै-१-६२।

बिरता
शक्ति, सामर्थ्य।
संज्ञा
[सं. वृत्ति]

बिरताना
बाँटना, वितरण करना।
क्रि. स.
[सं. वर्त्तन]

बिरति
सांसारिकता से जी हटना, विरक्ति, वैराग्य।
संज्ञा
[सं. विरति]
(क) अजहूँ लौ मन मगन काम सौं बिरति नाहिं उपजाई-१-१८७। (ख) जौ तू सूर सुखहिं चाहत है, तो करि बिषय बिरति-१-३००। (ग) बाल दसा अवलोकि सकल मुनि, जोग-बिरति बिसरावै-१०-९७।

बिरतिया
बरेखी करनेवाला।
संज्ञा
[सं. वृत्ति+इया]

बिरथा
निरर्थक, व्यर्थ, वृथा, बेकाम।
क्रि. वि.
[सं. व्यर्थ]
(क) बिरथा जन्म लियौ संसार-१-२९४। (ख) बिरथा जनम गँवायौं-७६५।

बिरथा
बेकाम, निरर्थक, व्यर्थ।
वि.
[सं. व्यर्थ]

बिरद
बड़ाई, यश, कीर्ति।
संज्ञा
[सं. विरुद]

बिरदैत
नामी वीर।
संज्ञा
[हिं. बिरद+ऐत]

बिरदैत
नामी, प्रसिद्ध, विख्यात।
वि.
[हिं. बिरद+ऐत]

बिरध
बूढ़ा, वृद्ध।
वि.
[सं. वृद्ध]
(क) बिरध भऐं कफ कंठ बिरोध्यौ-१-३२९। (ख) एक बिरधकिसोर-बालक एक जोबन जोग-१०-२६।

बिरधना
बढ़ना, वृद्धि होना।
क्रि. अ.
[हिं. बढ़ना]

बिरधाई
बुढ़ापा।
संज्ञा
[हिं. बिरध+आई]

बिरधापन
बुढ़ापा, वृद्धावस्था।
संज्ञा
[सं. वृद्ध+ हिं. पन]
कछु बालापन ही मैं बीतै। कछु बिरधापन माँहि बितीतै-१-२।

बिरधै
बढ़ती है, वृद्धि को प्राप्त होती है।
क्रि. अ.
[हिं. बढ़ना]
कहयौ सुक श्रीभागवत बिचारि। हरि की भक्ति जुगै जुग बिरधै, आन धर्म दिन चारि-2-२।

बिरधौ
जो वृद्ध हो, जो बूढ़ा हो।
वि.
[सं. वृद्ध]
सिसु, किसोर, बिरधौ तनु होइ। सदा एकरस आतम सोइ-७-२।

बिरमत
ठहरता है, रुकता है।
क्रि. अ.
[हिं. बिरमना]
मैं तो अपनी कही बड़ाई। अपने कृत तै हौं नहिं बिरमत, सुनि कृपालु जदुराई-१-२०७।

बिरमना
रुकना।
क्रि. अ.
[सं. विलंबन]

बिरमना
सुस्ताना।
क्रि. अ.
[सं. विलंबन]

बिरमना
आसक्त होकर रम जाना।
क्रि. अ.
[सं. विलंबन]

बिरमहिं
मुग्ध होकर रम गये हैं।
क्रि. अ.
[हिं. बिरमना]
हमहिं छाँड़ि बिरमहिं कुबजा सँग, आए न रिपु रन जीति-३०५४।

बिरमाइ
ठहरे, रुके।
क्रि. अ.
[हिं. बिरमना]
कोउ गए ग्वाल गाइ बन घेरन, कोउ गए बछरू लिवाइ।...। सूर स्याम तहँ बैठि बिचारत, सखा कहाँ बिरमाइ-५००।

बिरमाई
रोक कर, फँसाकर, बहलाकर।
क्रि. अ.
[हिं. बिरमाना]
कहाँ लौं रखिए मन बिरमाई-2८०५।

बिरमाए
मुग्ध करके फँसालिया।
क्रि. स.
[हि. बिरमाना]
(क) अरुझि काम की बेलि सौं कौने बिरमाए.- (ख) को जानै काहे ते सजनी कहुँ बिरहिनि बिरमाए-2८५४। (ग) सीतल पंथ जोवति हम निसिदिन कित बिरहिनि बिरमाए-३०८३।

बिरमाना
रोकना।
क्रि. स.
[हिं. बिरमना]

बिरमाना
व्यतीत करना।
क्रि. स.
[हिं. बिरमना]

बिरमाना
मुग्ध करके फँसा रखना
क्रि. स.
[हिं. बिरमना]

बिरमायो
शांति पाते हैं, धीरज होता है।
क्रि. अ.
[हिं. बिरमना]
सूरस्याम पहिले गुन सुमिरिहि प्रान जात बिरमायो-2८४०।

बिरमावत
ठहर जाते हैं, रुक जाते हैं।
क्रि. स.
[हिं. बिरमाना]
भीतर तैं बाहर लौं आवत।...। अहुँठ पैग बसुधा सब कीनी, धाम अवधि बिरमावत-१०-१२५।

बिरमावत
मुग्ध होकर फँस जाता है।
क्रि. स.
[हिं. बिरमाना]
जेहि जु अंग अवलोकन कीन्हौ सो तन-मन तहँ ही बिरमावत-2३४७।

बिरमाँहिं
आराम करते हैं, विश्राम करते हैं, सुस्ताते हैं।
क्रि. अ.
[हिं. बिरमना]
पदुम-बास सुगंधसीतल लेत पाप नसाहिं।….। सघन-गुंजत बैठि उन पर भौंरहूँ बिरमाहिं-१-३३८।

बिरमाँहिं
ठहरते हैं, रुकते हैं।
क्रि. अ.
[हिं. बिरमना]
सूरदास स्वामी सौं कहियौ, अब बिरमाहिं नहीं-९-९१।

बिरमि
ठहरकर, रुककर।
क्रि. अ.
[हिं. बिरमना]
तातैं बिरमि रहे रघुनंदन, करि मनसा-गति पंग-९-२३।

बिरला
कोई-कोई, इक्का-दुक्का, एकआध।
वि.
[सं. विरल]
(क) हरि, हरि-भक्त एक, नहिं दोइ। पै यह जानत बिरला कोइ-१-२९०। (ख) नटवत करत कला सकल, बूझै बिरला कोइ-2-३६।

बिरवा
वृक्ष।
संज्ञा
[सं. विरुह]

बिरवा
पौधा।
संज्ञा
[सं. विरुह]
धोखे ही बिरवा लगाइ कै काटत नाहिं बहोरी-३३४८।

बिरवाहीं
बाग या स्थान,जहाँ छोटे पौधे लगे हों।
संज्ञा
[हिं. बिरवा+ही]

बिरषभ
बैल।
संज्ञा
[सं. वृषभ]

बिरस
रसरहित, रसहीन।
वि.
[सं. विरस]

बिरस
प्रेम का अभाव।
संज्ञा

बिरस
अनबन।
संज्ञा

बिरसन
जहर, बिष।
संज्ञा
[हिं.]

बिरसना
भोग-विलास करना।
क्रि. अ.
[सं. विलास]

बिरह, बिरहा
वियोग।
संज्ञा
[सं. विरह]
मीड़त हाथ सकल गोकुल जन बिरह बिकल बेहाल-2५३६।

बिरहा
एक तरह का लोक-गीत।
संज्ञा
[देश.]

बिरहाना
बिरह से दुखी होना।
क्रि. अ.
[हिं. बिरह]

बिरहानी
विरह से दुखो हुई।
क्रि. अ.
[हिं. बिरह]

बिरही
वियोगी।
वि.
[हिं. बिरह]

बिरहुला
साँप, सर्प।
संज्ञा
[पा. विरूल्हक = नाग]

बिरहुली
साँपिनि, नागिनि।
संज्ञा
[हिं. बिरहुला]

बिरहो, बिरही
विरह भी,विरह की स्थिति भी।
संज्ञा
[हिं. बिरह]
ऊधौ, बिरहौ प्रेम करै-३३५८।

बिराग
इच्छा का प्रभाव।
संज्ञा
[सं. विराग]

बिराग
विरक्ति, वैराग्य।
संज्ञा
[सं. विराग]

बिराज
शोभित होकर, शोभा बढ़ाकर।
क्रि. अ.
[हिं. विराजना]
भीषम, द्रोन, करन दुरजोधन, बैठे सभा बिराज-१-२५५।

बिराजत
शोभित होता है।
क्रि. अ.
[हिं. विराजना]
(क) भाल-तिलक मसि-बिंदु बिराजत-१०.१०६। (ख) हृदय हरि-नख अति बिराजत-१०-२३४

बिराजन
शोभित होने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. बिराजना]
यहै शब्द सुनियत गोकुल मैं मोहनरूप बिराजत-६२२।

बिराजना
शोभित होना।
क्रि. अ.
[सं. वि+रंजन]

बिराजना
बैठना।
क्रि. अ.
[सं. वि+रंजन]

बिराजा
शोभित हुआ।
क्रि. अ.
[हिं. बिराजना]
रविबंसी भयौ रैवत राजा। ता सम जग दुतिया न बिराजा-९-४।

बिराजैं
शोभित है, शोभा देते हैं, विराजते हैं।
क्रि. अ.
[हिं. बिराजना]
(क) लंका राज विभीषन राजैं, ध्रुव आकास बिराजैं-१-३६। (ख) उर पर पदिक कसुम बनमाला, अंगद खरे बिराजैं-४५१।

बिराट
ब्रह्म का वह स्थूल स्वरूप जिसके अंदर संपूर्ण विश्व है।
संज्ञा
[सं. विराट]

बिराट
विश्व।
संज्ञा
[सं. विराट]

बिराट
बहुत बड़ा या भारी।
वि.
[सं. विराट]
इक-इक रोम बिराट किए तन कोटि-कोटि ब्रह्मांड-४८७।

बिरादरी
जातीय समाज।
संज्ञा
[फा.]

बिरान, बिराना
जो अपने से अलग हो, पराया।
वि.
[फा. बेगाना]
सूरदास गोपिनि परतिज्ञा छवहिं न जोग बिरान-३३५७।

बिरान, बिराना
दूसरे का।
वि.
[फा. बेगाना]

बिराना
मुँह बनाना या चिढ़ाना।
क्रि. अ.
[अनु.]

बिरानी
दूसरे की, अन्य की।
वि.
[हिं. बिराना (पुं.)]

बिरानी
भिन्न, दूसरी, परिवर्तित, बदली हुई।
वि.
[हिं. बिराना (पुं.)]
नाहिं रही कछु सुधि तन-मन की, भई जु बात बिरानी-१-३०५।

बिराने
दूसरों के, अन्य व्यक्ति के।
वि.
[हिं. बिराना]
भक्ति बिनु बैल बिराने ह्वैहौ-१-३३१।

बिराने
पराये।
वि.
[हिं. बिराना]
को है अपने कौन बिराने-१०४१।

बिरानो
पराया, अन्य।
वि.
[हिं. बिराना]
बाप रिसाइ माइ घर मारै हँसै बिरानो लोग री-१२०३।

बिराम
आराम, विश्राम।
संज्ञा
[सं. विराम]
धेनु-काज नहिं विराम-६१९।

बिरावना
मुँह चिढ़ाना।
क्रि. स.
[सं. विरव]

बिरासी
विलास में लीन रहनेवाला।
वि.
[हिं. विलासी]

बिरिख
वृक्ष।
संज्ञा
[सं. वृक्ष]

बिरिख
बैल, साँड़।
संज्ञा
[सं. वृष]

बिरिछ
वृक्ष।
संज्ञा
[सं. वृक्ष]

बिरिध
बूढ़ा।
वि.
[सं. वृद्ध]

बिरियाँ
समय, वक्त, वेला।
संज्ञा
[हिं. बेला]
साँझ की बिरियाँ बिरद भई सखी री-६०५।

बिरियाँ
बार, पारी, बेर।
संज्ञा
[सं. वार, हिं. बाद]
(क) सूर कूर कहै मेरी बिरियाँ, बिरद कितै बिसरायौ-१-१८८। (ख) सूर की बिरियाँ निठुर भए प्रभु मोतैं कछु न सर्‌यौ-

बिरिया
कान का एक गहना।
संज्ञा
[हिं. बाली]

बिरी
पान का बीड़ा।
संज्ञा
[हिं. बीड़ा]
पीरे पान-बिरी मुख नावति-५१४।

बहुतेरा
बहुत , अधिक।
वि.
[हि. बहुत]

बहुतेरा
अधिक परिमाण में ज्यादा।
क्रि. वि.
[हि. बहुत]

बहुतेरे
संख्या में अधिक, अनेक।
वि.
[हिं. बहुत]

बहुतै
बहुत अधिक, अधिक मात्रा में।
वि.
[हिं. बहुत]
भ्रमत-भ्रमत बहुतै दुख पायौ, अजहुँ न टेव गई -१-२९९।

बहुतै
बहुत से, अनेक, अनगिनती।
वि.
[हिं. बहुत]
दाउँ-घात बहुतै कियौ, मरत नहीं जदुराइ-५८९।

बहुतै
अधिक परिमाण में।
क्रि. वि.
कमलनयन के कारन सजनी अपनो सो जतन रही बहुतै करि-2८१३।

बहुनायक, बहुनायकी
अनेक स्त्रियों से प्रेम रखनेवाला।
वि.
[हिं. बहु+नायक]
नंदसुवन बहुनायकी अनतहिं रहे जाई-2१५९।

बहुत्व
आधिक्य, अधिकता।
वि.
[सं.]

बहुदर्शी
बहुत जानकार।
वि.
[सं.]

बहुधा
अनेक प्रकार से।
क्रि. वि.
[सं.]

बिरुँधना
मार्ग रुकना।
क्रि. अ.
[हिं. रुँधना]

बिरुँधना
उलझना।
क्रि. अ.
[हिं. रुँधना]

बिरुँधना
घेरा जाना।
क्रि. अ.
[हिं. रुँधना]

बिरुँधना
मार्ग रोकना या अवरुद्ध करना।
क्रि. स.

बिरुँध्यौ
रुँध गया।
क्रि. अ.
[हिं. बिरुँधना]
पलित केस, कफ कंठ बिरुँध्यौ, कल न परति दिन-राती-१०-११८।

बिरुझना
झगड़ना।
क्रि. अ.
[हिं. उलझना]

बिरुझाई
क्रुद्ध या अप्रसन्न होकर।
क्रि. अ.
[हिं. बिरुझना]
कब तुमकौं मैं बोलि बुलाई। केहि कारन तुम धाई आईं। यह सुनि बहुरि चली बिरुझाई-३९१।

बिरुझातिं
झगड़ती या अप्रसन्न होती हैं।
क्रि. अ.
[हिं. बिरुझाना]
हठ करति बिरुझातिं तब जिय जननि जानति बारि-७७७।

बिरुझाना
अप्रसन्न होना।
क्रि. अ.
[हिं. उलझना]

बिरुझानी
क्रुद्ध होकर,बिगड़कर, झुँझलाकर।
क्रि. अ.
[हिं. बिरुझाना]
को निरदई रहै तेरैं घर, को तेरैं सँग बैठै आनी। सुनहु सूर कहि-कहि पचिहारीं, जुवती चलीं घरनि बिरुझानी-३६८।

बिरुझानी
अप्रसन्न हुई।
क्रि. अ.
[हिं. बिरुझाना]
बार-बार सुत सों बिरुझानी-१०१०।

बिरुझाने
रूठ गये, खीझे, झगड़ने लगे, उलझने लगे।
क्रि. अ.
[हिं. बिरुझाना]
बरजत-बरजत बिरुझाने। करि क्रोध मनहिं अकुलाने-१०-१८३।

बिरुझाने
खीझकर, झगड़कर।
क्रि. अ.
[हिं. बिरुझाना]
सूर स्याम बिरुझाने सोए-१-१९६।

बिरुझानौ
खीझा, अप्रसन्न हुआ।
क्रि. अ.
[हिं. बिरुझाना]
(क) मेरौ आजु अतिहिं बिरुझानौ-१०-१९७। (ख) साँझहिं तैं अतिहीं बिरुझानौ-१०-२००।

बिरुझावत
खीझता-मचलता है।
क्रि. अ.
[हिं. बिरुझावना]
लागी भूख, चंद मैं खैहौं, देहि-देहि रिस करि बिरुझावत-१०-१८८।

बिरुझावना
खीझना, झुँझलाना, मचलना, झगड़ना, अप्रसन्न होना।
क्रि. अ.
[हिं. बिरुझाना]

बिरुझै
खीझता, मचलता या रूठता है।
क्रि. अ.
[हिं. बिरुझाना]
जो बालक जननी से बिरुझै माता ताको लेइ मनाइ-९७९।

बिरुझहै
झगड़ेगा, उलझेगा।
क्रि. अ.
[हिं. बिरुझना]

बिरुझहै
रूठ जायेगा, बिगड़ जायेगा, बिरुझावेगा।
क्रि. अ.
[हिं. बिरुझना]
मेरे लाल के प्रेम खिलौला, ऐसौ को लै जैहै री।...। आवतहीं लै जैहै राधा, पुनि पाछैं पछितैहै री। सूरदास तब कहति जसोदा, बहुरि स्याम बिरुझैहै री-७११।

बिरुद
यश, कीर्ति।
संज्ञा
[सं. विरुद]

बिरुदावलि
सविस्तार गुण-कथन, यश-वर्णन, प्रशंसा।
संज्ञा
[सं. विरुद + अवली]

बिरुदावलि
यश, विरुद, प्रशस्ति।
संज्ञा
[सं. विरुद + अवली]
दीन कौ दयाल सुन्यौ, अभय-दानदाता। साँची बिरुदावली, तुम जग के पितु-माता-१-१२३।

बिरुदैत
प्रसिद्ध वीर।
संज्ञा
[हिं. बिरदैत]

बिरुद्ध
जो विरोधी है, प्रतिकूल, जो अनुकूल न हो।
वि.
[सं. विरुद्ध]
बेद-बिरुद्ध सकल पांडव-कुल, सो तुम्हरैं मन भायो-१-१०४।

बिरुधाई
बुढ़ापा।
संज्ञा
[सं. वृद्ध]

बिरूप
रूपहीन, कुरूप।
वि.
[सं. विरूप]
रे रे चपल, बिरूप, ढीठ, तू बोलत बचन अनेरौ-९-१३२।

बिरोग
विछोह।
संज्ञा
[सं. वियोग]

बिरोग
दुख।
संज्ञा
[सं. वियोग]

बिरोधना
विरोध करना।
क्रि. अ.
[सं. विरोध]

बिरोधी
विरोध करनेवाला।
वि.
[सं. विरोधी]
सूरदास सुनि भक्त-बिरोधी चक्र सुदरसन जारौं-.१-२७२।

बिरोधे
विरोध किया, बैर ठाना, द्वेष रखा।
क्रि. अ.
[हिं. बिरोधना]
ज्ञान-बिवेक बिरोधे दोऊ, हते बंधु हितकारी-१-१७३।

बिरोधैं
विरोध के द्वारा।
संज्ञा
[सं. विरोध]
मुक्ति-हेत जोगी स्रम साधैं, असुर बिरोधैं पावै-१-१०४।

बिरोधै
रुँधता है।
क्रि. अ.
[हिं. रुँधना]
सीतबात-कफ कंठ बिरोधै, रसना टूटै बात-१-३१३।

बिरोध्यौ
रुँध गया।
क्रि. अ.
[हिं. रुँधना]
बिरध भऐं कफ कंठ बिरोध्यौ, सिर धुनि धुनि पछितान्यौ-१-३२९

बिलंगी
अरगनी, अलगनी।
संज्ञा
[देश.]

बिलंब
देरी, बहुत समय।
संज्ञा
[सं. विलंब]
अब जौ तुम्हरी आज्ञा होइ। छाँडि बिलंब करौं मैं सोइ-४५।

बिलंबना
देर करना।
क्रि. अ.
[सं. विलंब]

बिलंबना
रुकना।
क्रि. अ.
[सं. विलंब]

बिल
छेद।
संज्ञा
[सं. विल]

बिल
जमीन या दीवार में (चूहे आदि द्वारा) बनाया गया विवर या छेद।
संज्ञा
[सं. विल]

बिलकुल
पूरा
क्रि.वि.
[अ]

बिलकुल
आदि से अन्त तक।
क्रि.वि.
[अ]

बिलख
विलाप, दुख।
संज्ञा
[हिं. बिलखना]
मति हिय बिलख करौ सिय, रघुबर हतिहैं कुल दैयत कौ-९-८४।

बिलखत
विलाप करते हैं, रोते हैं।
क्रि. अ.
[हिं. बिलखना]
हँसैं हँसत, बिलखैं बिलखत हैं, ज्यौं दरपन मैं झाईँ-१-१९५।

बिलखति
दुखी होती हैं।
क्रि. अ.
[हिं. बिलखना]
अतिही सुन्दर कुमार जसुमति रोहिणि बार बिलखति यह कहति सबै लोचन जल ढोरैं-2६०४।

बिलखना
रोना, विलापना।
क्रि. अ.
[सं. विलाप]

बिलखना
दुखी होना।
क्रि. अ.
[सं. विलाप]

बिलखना
संकुचित होना।
क्रि. अ.
[सं. विलाप]

बिलखात
रोता है।
क्रि. अ.
[हिं. बिलखना]
देखि री देखि हरि बिलखात-३६०।

बिलखात
दुखी होता है।
क्रि. अ.
[हिं. बिलखना]
कबहूँ मग-मग धूरि बटोरत भोजन कौं बिलखात-2-२२।

बिलखाना
दुखी या खिन्न होना।
क्रि. अ.
[हिं. बिलखना]

बिलखाना
रोना, विलाप करना।
क्रि. अ.
[हिं. बिलखना]

बिलखाना
दुखी करना।
क्रि. स.
[हिं. बिलखना]

बिलखाना
रुलाना।
क्रि. स.
[हिं. बिलखना]

बिलखानी
दुखी हुई।
क्रि. अ.
[हिं. बिलखाना]
(क) यह सुनि कै जुवती बिलखानी-2६०६। (ख) दुसह सँदेस सुनत माधो को गोपीजन बिलखानी-2९८८।

बिलखाने
दुखी हुए।
क्रि. अ.
[हिं. बिलखना]
भ्रात-मुख निरखि राम बिलखाने-९-५२।

बिलखान्यौ
दुखी हुआ, चिंचित हुआ।
क्रि. अ.
[हिं. बिलखना]
इंद्र हँस्यौ, हर हिय बिलखान्यौ, जानि बचन कौ भंग-९-१५८।

बिलखावै
विलाप करता है, रोता है।
क्रि. अ.
[हिं. बिलखाना]

बिलखावै
दुखी होता है।
क्रि. अ.
[हिं. बिलखाना]
उग्रसेन की आपदा सुनि-सुनि बिलखावै-१-४।

बिलखि
दुखी होकर।
क्रि. अ.
[हिं. बिलखना]
करति कछू न कानि, बकति है कटु बानि, निपट निलज बैन बिलखि सहूँ-१०-२९५।

बिलखैं
बिलखते देखकर, दुखी होने पर।
क्रि. अ.
[हिं. बिलखना]
हँसैं हँसत बिलखै बिलखत हैं ज्यौं दरपन मैं झाईँ-१-२९५।

बिलख्यो, बिलख्यौ
दुखी हुए।
क्रि. अ.
[हिं. बिलखना]
देखि अक्रूर नर-नारि बिलखे-2५०३।

बिलग
अलग, पृथक।
वि.
[हिं. वि+लगना]

बिलग
पृथकता।
संज्ञा

बिलग
बुरा (भाव), दुख।
बिलग मति मानौ ऊधौ प्यारे-पृ. ३१७५।

बिलगाना
अलग होना।
क्रि. अ.
[हिं. विलग+आना]

बिलगाना
अलग या दूर करना।
क्रि. स.
[हिं. विलग+आना]

बिलगाना
छाँटना।
क्रि. स.
[हिं. विलग+आना]

बिलगानी
दूर हो गयी।
क्रि. अ.
[हिं. बिलगाना]
अब ब्रज सूनो भयौ गिरिधर बिनु गोकुल-मति बिलगानी-2६९६।

बिलगानी
अलग, पृथक।
वि.
[हिं. बिलगाना]
हम एक ही संग, एक ही मत सब कोउ, नहि बिलगानी-१८३०।

बिलगी
एक संकर राग।
संज्ञा
[देश.]

बिलगु
पृथकता।
संज्ञा
[हिं बिलग]

बिलगु
बुरा या अनुचित (भाव)।
संज्ञा
[हिं बिलग]

बिलच्छन
अनोखा, अद्भुत।
वि.
[सं. विलक्षण].

बिलछना
ताड़ जाना, लक्ष करना।
क्रि. अ.
[सं. लक्ष]

बिलना
बेला जाना।
क्रि. अ.
[हिं. बेलना]

बिलनी
काली भ्रमरी।
संज्ञा
[हिं. बिल]

बिलनी
पलक पर होनवाली फुँसी।
संज्ञा

बिलपति
रोती है।
क्रि. अ.
[हिं. बिलपना]
कबहुँ बिहँसति,कबहुँ बिलपति,सकुचि रहति लजाइ-६७८।

बिलपति
रोती-बिलखती।
वि.
[हिं. बिलपना]
त्रेता जुग एक पत्नी ब्रत किए सोऊ बिलपति छोरी-2८६३।

बिलपना
रोना-कलपना।
क्रि. अ.
[सं. विलाप]

बिलबिलाना
(कीड़ों का) रेंगना।
क्रि. अ.
[अनु.]

बिलबिलाना
बहुत व्याकुल और दुखी होना।
क्रि. अ.
[अनु.]

बिलबिलाना
रोना-चिल्लाना।
क्रि. अ.
[अनु.]

बिलबिलाना
भूख से बेचैन हो जाना।
क्रि. अ.
[अनु.]

बिलम
विलंब, देर।
संज्ञा
[सं. बिलंब]
(क) हरषवंत ह्वै चले तहाँ तैं मग मैं बिलम न लाई-९-१०२। (ख) आवहु बेगि बिलम जनि लावहु, गैया दुरि गई-४४३।

बिलमना
विलंब करना।
क्रि. अ.
[सं. विलंब]

बिलमना
रुकना।
क्रि. अ.
[सं. विलंब]

बिलमना
मुग्ध होकर रम जाना।
क्रि. अ.
[सं. विलंब]

बिलमाई
देर।
संज्ञा
[हिं. बिलंब+आई]
नेक करहु अब जिनि बिलमाई.-१००४।

बिलमाना
रोकना, ठहरना।
क्रि. स.
[हिं. बिलमना का सक.]

बिलमाना
मुग्ध करके रोक लेना।
क्रि. स.
[हिं. बिलमना का सक.]

बिलमि
रुक या ठहर कर।
क्रि. अ.
[हिं. बिलमना]

बिलमि
बिलमि रहे - रुक गये, ठहरे, रम गये।
प्र.
(क) माधव बिलमि बिदेस रहे। (ख) कहाँ धौं बिलमि रहे, नैन मरत दरसन की साधौ-१८०९।

बिललाइ
दुखी होकर, बिलख कर।
कि. अ.
[हिं. बिललाना]
जहाँ जहाँ दुहि बन चराइ, मरत तहाँ बिललाइ-३४२४।

बिललाउ
दुखी होता है।
क्रि. अ.
[हिं. बिललाना]
सूर स्याम हैं पलक धाम मैं लखि चित कत बिललाउ-३४७२।

बिललाति
व्याकुल होकर असंबद्ध बातें कहती है, बिलखती है, दुखी होती है, रोती है।
क्रि. अ.
[हिं. बिललाना]
(क) पाँच बरष को मेरौ नन्हैया, अचरज तेरी बात। बिनहीं काज साँटि लै धावति, ता पाछैं बिललात-१०-२५७। (ख) धेनु फिरत बिललाति बच्छ थन कोउ न लगावै-५८९।

बिललाते
दुखी होते हैं।
क्रि. अ.
[हिं. बिललाना]
भवन ते बिछुरे मीन मकर बिललाते-३४६१।

बिललाना
बिलखना, विलाप करना।
क्रि. अ.
[हिं. बिलखना]

बिललाना
बहुत दुखी होकर असंबद्ध बातें करना या बकना।
क्रि. अ.
[हिं. बिलखना]

बहक
आवेशपूर्ण बात।
संज्ञा
[हि. बहकना]

बहकना
भटकना, मागं भ्रष्ट होना।
क्रि. अ.
[हि. बहना]

बहकना
चूक जाना।
क्रि. अ.
[हि. बहना]

बहकना
बात या भुलावे में आना।
क्रि. अ.
[हि. बहना]

बहकना
बहल जाना।
क्रि. अ.
[हि. बहना]

बहकना
मद से चर हो आपे में न रहना।
क्रि. अ.
[हि. बहना]

बह्काइ, बह्काई
भुलावे में डालकर।
क्रि. स.
[हिं. बहकाना]

बह्काइ, बह्काई
बहकाइ दई (दियो)-भुलावे में डाल दिया है।
प्र.
(क) कौन बहकाइ दई है तुमकौं, ताहि पकरि लै जाहि-१५३। (ख) नई रीति इन अबै चलाई। काहू इन्हें दियौ बहकाई।

बहकाना
गलत रास्ते पर भटकाना
क्रि. स.
[हिं. बहकना]

बहकाना
लक्ष्यभ्रष्ट करना।
क्रि. स.
[हिं. बहकना]

बहुरि
पुनः, फिर, दोबारा।
क्रि. वि.
[हिं. बहुरना]
अंबरीष कौँ साप देन गयौ, बहुरि पठायौ ताकौ-१-११३।

बहुरि
पश्चात्, उपरांत।
क्रि. वि.
[हिं. बहुरना]

बहुरियाँ
नई बधुएँ।
संज्ञा
[हिं. बहुरिया]

बहुरियाँ
नवयुवतियाँ।
संज्ञा
[हिं. बहुरिया]
आइ गए तिहिं समय कन्हाई। बाहँ गही लै तुरत दिखाई। तनक-तनक कर, तनक अँगुरियाँ। तुम जोबन भरीँ नवल बहुरियाँ-७९९।

बहुरिया
नववधू।
संज्ञा
[सं. बधूटी, बधूटिका, प्रा. बहूडिआ]

बहुरी
लौटी, वापस आयी, फिर कर आयी।
क्रि. अ.
[हिं. बहुरना]
आइ अजिर निकसी नँदरानी, बहुरी दोष मिटाइ-५४०।

बहुरी
चबेना।
संज्ञा
[हि. भौरना=भूनना]

बहुरूप
अनेक रूप धारण करने वाला, बहुतों के रूप धारण करनेवाला।
वि.
[हिं.बहु+रूप]

बहुरूप
विष्णु।
संज्ञा

बहुरूप
शिव।
संज्ञा

बिललायो, बिललायौ
बिलखा, दुखी हुआ, विलाप किया।
क्रि. प्र.
[हिं. बिललाना]

बिलवाना
नष्ट करने को प्रवृत्त करना,
क्रि. स.
[सं. वि+लय]

बिलवाना
छिपवाना, लुप्त कराना।
क्रि. स.
[सं. वि+लय]

बिलवाना
बेलने में सहायता करना।
क्रि. स.
[हिं. बेलना]

बिलवाना
बेलने को प्रवृत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. बेलना]

बिलसत
भोग करते हैं, भोगते हैं।
क्रि. स.
[हिं. बिलसना]
(क) निसि दिन बिषय-बिलासनि बिलसत फूटि गईं तब चारयौ-१-१०१। (ख) इंद्रासन बैठे सुख विलसत दूर किये भुव-भार। (ग) जो रस नंदजसोदा बिलसत, सो नहिं तिहूँ भुवनियाँ-१०-२३८।

बिलसत
विशेष रूप से शोभित होता है, बहुत भला जान पड़ता है।
क्रि. अ.
सूरदास स्वामी की लीला, अति प्रताप बिलसत नँदरैया-१०-११५।

बिलसना
भला लगना, शोभित होना।
क्रि. अ.
[सं. बिलसन]

बिलसना
भोगना, सुख उठाना।
क्रि. अ.
[सं. बिलसन]

बिलसहु
भोग करो, सुख उठाओ।
क्रि. अ.
[हिं. बिलसना]
राम रस रचौ मिलि संग बिलसहु सबै-बिहँसि हरि कह्यौ यों निगम बानी-पृ. ३४३(२१)।

बिलसात
सुखी होता है।
क्रि. अ.
[हिं. बिलसना]
लोचन सफल करौ प्रभु अपने हरि मुखकमल देखि बिलसात-१० उ०.५९।

बिलसाना
भोग करना, काम में लाना।
क्रि. स.
[हिं. बिलसना]

बिलसाना
भोगने को प्रवत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. बिलसना]

बिलसि
भोग करो, काम में लाओ, उपभोग करो।
क्रि. स.
[हिं. बिलसना]
बिधि संजोग टरत नहिं टारैं, बन दुख देख्यो आनि। अब रावन घर बिलसि सहज सुख, कह्यौ हमारौ मानि-९-७७।

बिलसैं
भोग करें, काम में लाएँ, बरतें।
क्रि. स.
[हिं. बिलसना]
कै तन देउँ मध्य पावक के, कै बिलसै रघुराइ-९-७७।

बिलसै
भोगे, (सुख) लूटे।
क्रि. स.
[हिं. बिलसना]
जीवै तौ सुख बिलसै जग मैं की रति लोकनि गावै-९-१५२।

बिलहरा
पान का डिब्बा।
संज्ञा
[हिं. बेल+हरा]

बिला
बिना, बगैर।
अव्य.
[अ.]

बिलाइ
नष्ट होते हैं, रह नहीं जाते, विलीन होते हैं।
क्रि. अ.
[हिं. बिलाना]
बारि मैं ज्यौं उठत बुदबुद लागि बाइ बिलाइ-१-३१६।

बिलाई
नष्ट हो (गये)।
क्रि. अ.
[हिं. बिलाना]
पूर्व पाप सब गए बिलाई-४-१२।

बिलाई
बिल्ली नामक पशु।
संज्ञा
[हिं. बिल्ली]

बिलाई
सिटकिनी।
संज्ञा
[हिं. बिल्ली]

बिलान
लुप्त हुआ, अदृश्य हुआ। छिप गया।
क्रि. अ.
[हिं. बिलाना]
फोर्यो नयन, काग नहिं छाड़्यौ सुरपति के बिदमान। अब वह कोप कहाँ रघुनन्दन, दससिर-बेर बिलान-९-८३।

बिलाना
नष्ट या विलीन होना।
क्रि. अ.
[सं. विलयन]

बिलाना
छिपना, अदृश्य होना।
क्रि. अ.
[सं. विलयन]

बिलाप
बिलखकर रोना, क्रंदन,रुदन।
संज्ञा
[सं. विलाप]
घरी इक सजन-कुटुँब मिलि बैठैं, रुदनबिलाप कराहीं-१-३१९।

बिलापना
बिलाप करना।
क्रि. अ.
[हिं. बिलाप]

बिलार
बिल्ला, मार्जार।
संज्ञा
[सं. बिडाल]
मन सुवा तन पींजरा, तिहिं माँझ राखै चेत। काल फिरत बिलार-तनु धरि, अब घरी तिहिं लेत-१-३११।

बिलारी
बिल्ली, मंजारी।
संज्ञा
[हिं. बिलार]

बिलाव
बिल्ला, मार्जार।
संज्ञा
[हिं. बिलार]
जैसैं घर बिलाव के मूसा, रहत बिषय-बस वैसौ-2.१४।

बिलावल
एक राग।
संज्ञा
[सं.]
भरति रंग रति नागरि राजति मानहु उमँगि बिलावल फोरी-2४०६।

बिलास
हर्ष, आनन्द, विनोद।
संज्ञा
[सं. विलास]
(क) अपनै-अपनै रस-बिलास काहू नहिं चीन्हौ-३९४। (ख) सूरदास ग्वारिनि सँग मिलि हरि लागे करन बिलास-४१०।

बिलास
सुख-भोग।
संज्ञा
[सं. विलास]

बिलासना
भोग करना।
क्रि. स.
[सं. बिलसन]

बिलासी
सुख भोगनेवाला, विनोद प्रिय।
वि.
[सं. विलासी]
सो प्रभु घर-घर घोष-बिलासी-३९१।

बिलुठना
(दुख, पीड़ा आदि से व्याकुल होकर) जमीन पर लेटना।
क्रि. अ.
[सं. लुंठन]

बिलुद्धना
नष्ट हो जाना।
क्रि. अ.
[सं. विलुप्त]

बिलैया
बिल्ली।
संज्ञा
[हिं. बिल्ली]

बिलोकना
देखना।
क्रि. स.
[सं. विलोकन]

बिलोकना
जाँचना, खोज करना।
क्रि. स.
[सं. विलोकन]

बिलोकनि
देखने की क्रिया, चितवन।
संज्ञा
[हिं. बिलोकना]

बिलोकनि
कटाक्ष।
संज्ञा
[हिं. बिलोकना]

बिलोचन
आँख, नेत्र।
संज्ञा
[सं. लोचन]

बिलोड़ना
मथना।
क्रि. स.
[सं. विलोड़न]

बिलोड़ना
अच्छी तरह मिलाना।
क्रि. स.
[सं. विलोड़न]

बिलोन
कुरूप, असुन्दर।
वि.
[सं. वि = रहित+लावण्य]

बिलोन
बिना नमक का, अलोना।
वि.
[सं. वि+लवण]

बिलोना
मथना।
क्रि. स.
[सं. विलोड़न]

बिलोना
अच्छी तरह मिलाना।
क्रि. स.
[सं. विलोड़न]

बिलोरना
मथना।
क्रि. स.
[हिं. बिलोड़ना]

बिलोरना
अस्तव्तस्त करके मिलाना।
क्रि. स.
[हिं. बिलोड़ना]

बिलोलना
हिलना-डोलना।
क्रि. स.
[सं. बिलोलन]

बिलोवना
मथना।
क्रि. स.
[हिं. बिलोना]

बिलौटा
बिल्ली का बच्चा।
संज्ञा
[हिं. बिल्ली + औटा]

बिलौर
स्फटिक पत्थर।
संज्ञा
[हिं. बिल्लौर]

बिल्ला
नर बिल्ली, मार्जार।
संज्ञा
[सं. बिडाल]

बिल्लाना
विलाप करना।
क्रि. अ.
[अनु.]

बिल्ली
मार्जार नामक पशु।
संज्ञा
[हिं. बिलार]

बिल्लूर, बिल्लौर
स्फटिक पत्थर।
संज्ञा
[सं. बैदूर्य, प्रा. बेलुरिय, हिं.बिल्लौर]

बिल्लूर, बिल्लौर
स्वच्छ शीशा।
संज्ञा
[सं. बैदूर्य, प्रा. बेलुरिय, हिं.बिल्लौर]

बिल्लौरी
स्फटिक पत्थर का
वि.
[हिं. बिल्लौर]

बिल्लौरी
स्फटिक जैसा स्वच्छ।
वि.
[हिं. बिल्लौर]

बिवर
बिल।
संज्ञा
[सं. बिवर]
मानहुँ बिवर गए चलि कारे तजि केचुरि भए निररे री-पृ. ३२७ (६०)।

बिवर
गुफा।
संज्ञा
[सं. बिवर]

बिवरना
गुथी या उलझी वस्तु का सुलझना।
क्रि. अ.
[हिं. विवरना]

बिवरना
उलझे बालों का सुलझना।
क्रि. अ.
[हिं. विवरना]

बिवराना
उलझे बालों को सुलझाना या सुलझवाना।
क्रि. स.
[हिं. बिवरना]

बिवश
विवश।
वि.
[सं. विवश]

बिवश
विकल।
वि.
[सं. विवश]

बिवशानी
विकल हो रही है।
क्रि. अ.
[सं. विवश]
ह्याँ तुम बिवश भए हौ ऐसे ह्वाँ तौ वै बिवशानी-2२०८।

बिवसाइ
व्यापार, व्यवसाय।
संज्ञा
[सं. व्यवसाय]

बिवाइ, बिवाई, बिवाय
बिबाई' नामक रोग।
संज्ञा
[हिं. बिबाई]

बिवाह
विवाह, शादी।
संज्ञा
[सं. विवाह]

बिवाहना
विवाह करना।
क्रि. स.
[हिं. विवाह]

बिवाहि
विवाह करके।
क्रि. स.
[हिं. बिवाहना]

बिवाहि
देहु बिबाहि - विवाह कर दो।
प्र.
हलधर कौं तुम देहु बिवाहि-९-४।

बिष
जहर, गरल।
संज्ञा
[सं. विष]
माया बिषम भुजंगिनि कौ बिष-2-३२।

विषम
भयंकर।
वि.
[सं विषम]
जहाँ न काहू कौ गम, दुसह दारुन तम, सकल बिधि बिषम, खल-मल खानि-१-७७।

विषम
तेज, तीव्र।
वि.
[सं विषम]

विषम
भयंकर।
वि.
[सं विषम]
माया बिषम भुजंगिनि कौ बिष उतर्यो नाहिंन तोहि-2-३२।

विषम
बहुत कठिन।

विषम
जो 'सम' न हो।

बिषय
वर्णित या विवेचित प्रसंग।
संज्ञा
[सं. विषय]

बिषय
भोग, संभोग, बिलास।
संज्ञा
[सं. विषय]

बिषय
वह जिसे इंद्रियाँ ग्रहण करें।
संज्ञा
[सं. विषय]

विषया
भोग की वासना।
संज्ञा
[सं. विषया]
तू तौ बिषया-रंग रँग्यौ है-१-६३।

बिषहर
साँप, भुजंग।
संज्ञा
[सं. विषधर]
खरिक मिले की गोरस बेंचत की बिषहर तें बाँची-१४३८।

बिषाद
इच्छा पूरी न होने का खेद या दुख।
संज्ञा
[सं. विषाद]
(क) काम-क्रोध-विषाद-तृष्ना, सकल जारि बहाउ-१-३१४। (ख) ताकौ बिषम बिषाद अहो मुनि मौपै सह्यौ न जाई-९-७।

बिषाद
निश्चेष्टता।
संज्ञा
[सं. विषाद]

बिषान
पशुओं का सींग।
संज्ञा
[सं.]

बिषान
सींग का बाजा।
संज्ञा
[सं.]
कोउ गावत, कोउ मुरलि बजावत कोउ बिषान, कोउ बेनु-४४८।

बिषै
भोग, संभोग, विलास।
संज्ञा
[सं. विषय]
बिषै-भोग सब तन मैं होइ-७.२।

बिष्णु, बिष्नु
परब्रह्म विष्णु।
संज्ञा
[सं. विष्णु]

बिसंच
असावधानी, लापरवाही।
संज्ञा
[सं. वि+संचय]

बिसंच
कार्य की बाधा।
संज्ञा
[सं. वि+संचय]

बिसंच
अमंगल का भय।
संज्ञा
[सं. वि+संचय]

बिसंभर
परमेश्वर।
संज्ञा
[सं. विश्वंभर]

बिसंभर
जो सँभल न सके।
वि.
[सं. वि+हिं. सँभार]

बिसंभर
असावधान।
वि.
[सं. वि+हिं. सँभार]

बिसँभार
बेखबर, असावधान।
वि.
[सं.वि+हिं. सँभार]

बहुरंग, बहुरंगा
अनेक रूप धारण करनेवाला, बहुरूपिया।
वि.
[हिं. बहु +रंग]

बहुरंग, बहुरंगा
मननौजी।
वि.
[हिं. बहु +रंग]

बहुरंगी
अनेक रूप धारण करने में समर्थ।
वि.
[हि. पुं. बहुरंगा + ई [प्रत्य.]
नाथ अनाथनि ही के संगी। दीन दयाल परम करुनामय, जन-हित हरि बहुरंगी-१-२१।

बहुरंगी
बहुरूपिया।
[हि. पुं. बहुरंगा + ई [प्रत्य.]

बहुरंगी
अनेक रंगों का।
[हि. पुं. बहुरंगा + ई [प्रत्य.]

बहुर
पुनः, फिर।
क्रि. वि.
[हिं. बहुरना (बहुरि =फिरकर)]
अब कैं तौ आपुन लै आयौ, बेर बहुर की और-१-१४६।

बहुरना
जाकर फिर वापस आना।
क्रि. अ.
[सं. व्याघुट, प्रा. बाहुड़ +ना]

बहुरना
खोकर फिर मिलना।
क्रि. अ.
[सं. व्याघुट, प्रा. बाहुड़ +ना]

बहुराई
लौटा देना, वापस कर देना।
क्रि. स.
[हिं. बहुरना]
उरहन देत ग्वालि जे आई। तिंन्हैं दियौ जसुदा बहुराई-३९१।

बहुरावहु
लौटाओ, वापस बुलाओ।
क्रि. स.
[हिं. बहुराना]
भई अबार गाइ बहुरावहु, उलटावहु, दै हाँक-४६४।

बिस
गरल, जहर।
संज्ञा
[सं. विष]

बिसखपरा, बिसखापर, बिसखोपड़ा
एक विषैला जंतु।
संज्ञा
[सं. विष+खर्पर]

बिसतरना
बढ़ना, विस्तार होना।
क्रि. अ.
[सं. विस्तरण]

बिसतार
फैलाव, विस्तार।
संज्ञा
[सं. विस्तार]

बिसतारना
बढ़ाना, विस्तार करना
क्रि. स.
[हिं बिस्तारना]

बिसद
स्वच्छ, सुन्दर।
वि.
[सं. विशद]
भूषन बिबिध बिषद अंबर जुत सुंदर स्याम सरीर-९-२६।

बिसद
विस्तृत।
वि.
[सं. विशद]
बृंदा बिपिन बिषद जमुना-तट, सुचि ज्यौनार बनाई-४१६।

बिसन
भोग-विलास की वासना।
संज्ञा
[सं. व्यसन]

बिसन
बुरी लत या आदत।
संज्ञा
[सं. व्यसन]

बिसन
शौक
संज्ञा
[सं. व्यसन]

बिसनी
भोग-विलास में रत रहनेवाला।
वि.
[हि. व्यसनी]

बिसनी
बुरी लतवाला।
वि.
[हि. व्यसनी]

बिसनी
शौकीन।
वि.
[हि. व्यसनी]

बिसमउ, बिसमय
अचरज।
संज्ञा
[सं. विस्मय]

बिसमरना
भूल जाना।
क्रि. स.
[सं. विस्मरण]

बिसमरै
भूले, भूल जाय।
क्रि. स.
[हिं. बिसमरना]
सुत-तिय धन की सुधि बिसमरै-३-१३।

बिसमव, बिसमौ
आश्चर्य।
संज्ञा
[सं. विस्मय]

बिसयक
देश।
संज्ञा
[सं. विषय]

बिसयक
राज्य।
संज्ञा
[सं. विषय]

बिसरत
भूलता है।
क्रि. स.
[हिं. बिसरना]
गोबिंद गुन उर ते नहिं बिसरत-2७४१।

बिसरना
भूलना, याद न रखना।
क्रि. अ.
[सं. विस्मरण, प्रा. बिम्हरण, बिस्सरण]

बिसराई
भुला दिया, ध्यान में रखा।
क्रि. स.
[हिं. बिसराना]
(क) अपनी को चालै सुनि सूरज पिताजननि बिसराई-३०१९। (ख) कबहुँक स्याम करत यहाँ कौ मन कैधौं चित्त सुध्यौ बिसराई-३११८।

बिसराए
भुला दिये।
क्रि. स.
[हिं. बिसराना]
अहंकार तैं तुम बिसराए-१-२०८।

बिसराना
भुलाना, ध्यान में न रखना।
क्रि. स.
[हिं. बिसरना]

बिसरानी
भुला दी, ध्यान में नहीं रखी विस्मरण कर दी।
क्रि. स.
[हिं. बिसरानी]
देव-काज की सुधि बिसरानी-१००१।

बिसराम
आराम, चैन, सुख।
संज्ञा
[सं. विश्राम]

बिसरामी
जिसे सुख मिले।
वि.
[सं. विश्राम]

बिसरामी
किसी के साथ सुख भोगनेवाली।
वि.
[सं. विश्राम]

बिसरावत
भुलाते या भुलवाते हैं।
क्रि. स.
[हिं बिसरावना]
मुरली बजाय बिसरावत भौना-2४२१।

बिसरावति
भुलाती है।
क्रि. स.
[हिं. बिसरावना]
सुंदर स्याम कृपालु दयानिधि कैसे हो बिसरावति-३१२८।

बिसरावन
भुलाने वाले, ध्यान छुड़ानेवाले।
वि.
[हिं. बिसरावना]
(क) महा पतित कुल तारन, एक नाम अधःजरन, दारुन दुख बिसरावन-१०-२५१। (ख) बेगि सुबचन सुनाइ मधुप जी मोहिं ब्यथा बिसरावन-३१०१।

बिसरावना
भुलाना।
क्रि. अ.
[हिं. बिसरावना]

बिसरावहु
भुलाओ, ध्यान से हटाओ।
क्रि. स.
[हिं. बिसरावना]
ग्वाल सखा कर जारि कहत हैं, हमहिं ...स्याम तुम जनि बिसरावहु-४५०।

बिसरावहुगे
भुला दोगे।
क्रि. स.
[हिं. बिसरावना]
सूर स्याम अति चतुर कहावत चतुराई बिसरावहुगे-१९७८।

बिसराहि
भुलाया जा सके।
क्रि. स.
[हिं. बिसराना]
हरि सौं प्रीतम क्यों बिसराहि-2७५७।

बिसर्जन
छोड़ना, परित्याग।
संज्ञा
[सं. विसर्जन]
ध्यान बिसर्जन कियौ नंद जब मूरति आगै नाहीं-१०-२६३।

बिसवा
वेश्या।
संज्ञा
[सं. वेश्या]

बिसवा
एक बीघे का बीसवाँ भाग।
संज्ञा
[हिं. बिस्वा]

बिसवास
विश्वास, यकीन।
संज्ञा
[सं. विश्वास]

बिसवासिनी
विश्वास करनेवाली।
वि.
[हिं. विश्वासी]

बिसवासिनी
जिस पर विश्वास हो।
वि.
[हिं. विश्वासी]

बिसवासिनी
जिस पर विश्वास न हो।
वि.
[हिं. अविश्वासी]

बिसवासिनी
विश्वासघातिनी।
वि.
[हिं. अविश्वासी]

बिसवासी
जो विश्वास करे।
वि.
[हिं. विश्वासी]

बिसवासी
जिस पर विश्वास हो।
वि.
[हिं. विश्वासी]

बिसवासी
जिस पर विश्वास न हो।
वि.
[हिं. अविश्वासी]

बिसवासी
विश्वासघात करनेवाला।
वि.
[हिं. अविश्वासी]

बिसवासी
जिसका ठीक न हो कि कब क्या करेगा या करायेगा।
वि.
[हिं. अविश्वासी]

बिससना
विश्वास करना।
क्रि. स.
[सं. विश्वसन]

बिससना
मारना।
क्रि. स.
[सं. विशसन]

बिससना
चीरना फाड़ना।
क्रि. स.
[सं. विशसन]

बिसहना
खरीदना, मोल लेना।
क्रि. स.
[हिं. बिसाह]

बिसहना
अपने साथ लेना या लगाना।
क्रि. स.
[हिं. बिसाह]

बिसहर
सर्प।
संज्ञा
[सं. विषधर, प्रा. बिसहर]

बिसहरू
खरीदार।
वि.
[हिं. बिसहना+रू]

बिसाँयँध
सड़े माँस-सी गंध।
वि.
[सं. वसा+गंध]

बिसात
हैसियत, औकात।
संज्ञा
[अ.]

बिसात
जमा, पूँजी।
संज्ञा
[अ.]

बिसात
सामर्थ्य।
संज्ञा
[अ.]

बिसात
शतरंज, चौपड़ आदि खेलने का खानेबना कपड़ा या पट्ठा।
संज्ञा
[अ.]

बिसाती
मामूली चीजें बेचनेवाला।
संज्ञा
[अ.]

बिसाना
वश चलना।
क्रि. अ.
[सं. वश]

बिसाना
विष-सा प्रभाव करना।
क्रि. अ.
[हिं. बिस+ना]

बिसारत
भुलाते हैं। ध्यान से हटाते हैं।
क्रि. स.
[हिं. बिसारना]
जे नख-चंद्र महामुनि नारद पलक न कबहुँक बिसारत-१३४२।

बिसारद
पंडित।
संज्ञा
[सं. विशारद]

बिसारद
कुशल।
संज्ञा
[सं. विशारद]

बिसारना
भुला देना।
क्रि. स.
[हिं. बिसरना]

बिसारा
विषैला, विषभरा।
वि.
[सं. विषालु]

बिसारी
भुला दी, ध्यान से हटा दी।
क्रि. स.
[हिं. बिसारना]
श्रीपति हूँ की सुधि बिसारी याही अनुराग-६५३।

बिसारे
भुला दिये, ध्यान से हटा दिये।
क्रि. स.
[हिं. बिसारना]
(क) जे पद-पदुम परसि ब्रजभामिनि सरबस दै सुत-सदन बिसारे-१.९४। (ख) नाद सुनि बनिता बिमोहीं, बिसारे उर-चीर-६५८।

बिसारे
विषभरे, विषैले।
वि.
[सं. विषालु]
लागे हैं बिसारे बान स्याम बिनु युग याम घायल ज्यौं घूमैं मनौ बिषहर खाई है-2८२७।

बिसाल
बड़ा।
वि.
[सं. विशाल]
भए अति अरुन बिसाल कमल-दल-लोचन मोचत नीर-९-१४५।

बिसास
यकीन, विश्वास।
संज्ञा
[सं. विश्वास]

बिसासिन, बिसासिनि, बिसासिनी
जिस पर विश्वास न किया जा सके, विश्वासघातिनी।
वि.
[सं. अविश्वासिनी]

बिसासी
जिस पर विश्वास न किया जा सके, विश्वासघाती।
वि.
[सं. अविश्वासी]
तुम देखे बहु स्याम बिसासी-१८१२।

बिसाह
खरीद, मोल लेने का कार्य।
संज्ञा
[सं. व्यवसाय]

बिसाहत
खरीदता है, मोल लेता है।
क्रि. स.
[हिं. बिसाहना]
सुजस बिकात बचन के बदले क्यों न बिसाहत आजु-2८५१।

बिसाहन
मोल लेने की वस्तु, सौदा।
संज्ञा
[हिं. बिसाहना]

बिसाहन
मोल लेने की क्रिया, खरीद।
संज्ञा
[हिं. बिसाहना]

बिसाहना
खरीदना, मोल लेना।
क्रि. स.
[हिं. बिसाह+ना]

बिसाहना
साथ लगाना।
क्रि. स.
[हिं. बिसाह+ना]

बिसाहना
मोल लेने की वस्तु, सौदा।
संज्ञा

बिसाहना
मोल लेने की क्रिया, खरीद।
संज्ञा

बिसाहनी
मोल लेने की वस्तु, सौदा।
संज्ञा
[हिं. बिसाहना]

बिसाहा
सौदा।
संज्ञा
[हिं. बिसाहना]

बिसाहा
भूत. -खरीदा, भोल लिया।
क्रि. स.

बिसाही
खरीदी, मोल ली।
क्रि. स.
[हिं. बिसाहना]
लाज बेंचि कूबरी बिसाही सँग न छाँड़त एक घरी-2६७७।

बिसिख
बाण, तीर।
संज्ञा
[सं. विशिख]

बिसियर
विषैला, विषभरा।
वि.
[सं. विषधर]

बिसुकर्मा
विश्वकर्मा।
संज्ञा
[सं. विश्वकर्मा]

बिसुनना
खाते समय किसी वस्तु का अंश नाक की ओर चढ़ जाना।
क्रि. अ.
[हिं. सुनकना]

बिसूरना
चिंता या दुख करना।
क्रि. अ.
[सं. विसूरण]

बिसूरना
चिंता, दुख, सोच
संज्ञा

बिसूरी
दुख या चिंता करके।
क्रि. अ.
[हिं. बिसूरना]
मधुबन बसत आस हुती सजनी, अब मरिहैं जु बिसूरी-१० उ.-८२।

बिसूरे
दुख या चिता करके।
क्रि. अ.
[हिं. बिसूरना]
तुम पुनि कहत स्रवन नहिं समुझत, दुख अति मरत बिसूरे-३०४२।

बिसेख
विशेष।
वि.
[सं. विशेष]

बिसेखता
विशेष गुण या स्वभाव।
संज्ञा
[सं. विशेषता]

बिसेखना
विशेष रीति से कहना या वर्णन करना।
क्रि. अ.
[सं. विशेष]

बिसेखना
निर्णय या निश्चय करना।
क्रि. अ.
[सं. विशेष]

बिसेखना
विशेष रूप से होना।
क्रि. अ.
[सं. विशेष]

बहुधा
प्रायः, बहुत करके, अक्सर।
[सं.]

बहुबाहु
रावण
संज्ञा
[सं.]

बहुबाहु
सहस्रार्जुन।
संज्ञा
[सं.]

बहुभाषी
बहुत बकवादी।
वि.
[सं. बहुभाषिन्]

बहुभाषी
अनेक भाषाएँ बोलने में समर्थ।
वि.
[सं. बहुभाषिन्]

बहुभुजा
दुर्गा।
संज्ञा
[सं.]

बहुमत
अनेक मत।
संज्ञा
[सं.]

बहुमत
समूह में से अधिकांश का मत।
संज्ञा
[सं.]

बहुमूल्य
अधिक मूल्य की, मूल्यवान।
वि.
[सं.]

बहुरंग, बहुरंगा
अनेक रंगों का।
वि.
[हिं. बहु +रंग]

बिसेषि
विशेष प्रकार या रीति के।
वि.
[सं. विशेष]
सिव सौं बोली बचन बिसेषि-४-५।

बिसेसर
परमेश्वर।
संज्ञा
[सं. विश्वेश्वर]

बिस्तर
बिछौना।
संज्ञा
[फा. विस्तर]

बिस्तर
विस्तार।
संज्ञा
[फा. विस्तर]

बिस्तरना
फैलना, बढ़ना।
क्रि. अ.
[सं. विस्तरण]

बिस्तरना
फैलाना, बढ़ाना।
क्रि. स.
[सं. विस्तरण]

बिस्तरना
बढ़ाकर कहना या वर्णन करना।
क्रि. स.
[सं. विस्तरण]

बिस्तरा
बिछौना, बिछावन।
संज्ञा
[हिं. बिस्तर]

बिस्तरी
विस्तार से कही या की वर्णन की।
क्रि. स.
[हिं. बिस्तरना]
गर्भ परीच्छित रच्छा करी। सोई कथा सकल बिस्तरी-१.२८९।

बिस्तरै
विस्तार करें।
क्रि. स.
[हिं. बिस्तारना]
इंद्री दासी सेवा करैं। तृप्ति न होइ, बहुरि बिस्तरैं-४-१२।

बिस्तरयौ
फैला, बढ़ा।
क्रि. अ.
[हिं. बिस्तरना]
जाकौ जस सब जग बिस्तरयौ-६-४।

बिस्तार
बढ़ा-चढ़ा रूप, विस्तार से कहा या वर्णन किया हुआ रूप।
संज्ञा
[सं. विस्तार]
जय अरु बिजय कथा नहिं कछुवै दसमुख-बंध बिस्तार १-२१५।

बिस्तार
खूब फैले हुए, विस्तृत।
वि.
देखि तरु सब अति डराने हैं बड़े बिस्तार-३८७।

बिस्तारना
बढ़ाना, विस्तार करना।
क्रि. स.
[सं. विस्तरण]

बिस्तारा
फैला हुआ, विस्तृत।
वि.
[सं. विस्‍तार]
ऐसौ नीप-बृच्छ बिस्तारा, चीर हार धौं कितिक हजारा-७९९।

बिस्तार्यो
फैलाया,बढ़ाया।
क्रि. स.
[हिं. बिस्तारना]
सुमिरत नाम, दुपद-तनया कौ पट अनेक बिस्तारयौ-१-१७।

बिस्तार्यो
विस्तार के साथ आरंभ किया।
[हिं. बिस्तारना]
बिप्रनि जज्ञ बहुरि बिस्तारयौ-४-५।

बिस्तुइया
छिपकली।
संज्ञा
[हिं. विष+चूना]

बिस्मरना
भूल जाना।
क्रि. स.
[सं. विस्मरण]

बिस्मरौ
भुलाओ।
क्रि. स.
[हिं. बिस्मरना]
हरि हरि हरि हरि सुमिरन करौ। आधे पलकहुँ जनि बिस्मरौ-६-१।

बिस्राम
आराम, चैन, सुख।
संज्ञा
[सं. विश्राम]
(क) दासी तृस्ना भ्रमत टहल-हित लहत न छिन बिस्राम-१-१५१। (ख) नंद लिये आवत हरि देखे, तब पायौ बिस्राम-६७९।

बिस्वंभर
परमेश्वर।
संज्ञा
[सं. विश्वंभर]
विस्वंभर सब जग कौं भरै-2-२०।

बिस्वांसी
बिस्वे का बीसवाँ भाग।
संज्ञा
[हिं. बिस्वा]

बिस्वा
बीघे का बीसवाँ भाग।
संज्ञा
[हिं. बीसवाँ]
बीस बिस्वा - निसंदेह, निश्चय ही।

बिस्वास
यकीन, प्रतीति।
संज्ञा
[सं. विश्वास]
तौ बिस्वास होइ मन मेरैं-१-१४६।

बिहंग, बिहंगा
पक्षी।
संज्ञा
[सं. विहंग]
मनो मुख मृदुल पानि पंकरह गुरु गति मनहुँ मराल बिहंगा-१९०५।

बिहंडन
नष्ट करने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[सं. विघटन, प्रा. बिहंडन]

बिहंडन
नष्ट या दूर करने वाले।
संज्ञा
[सं. विघटन, प्रा. बिहंडन]
बाल-सखा की बिपति-बिहंडन संकट हरन मुरारे-१० उ.-६०।

बिहंडना
खंडना, तोड़ना, काटना।
क्रि. स.
[सं. विघटन, प्रा. बिहंडना]

बिहंडना
मारना, नष्टना।
क्रि. स.
[सं. विघटन, प्रा. बिहंडना]

बिहँसना
मंद-मंद मुस्कराना।
क्रि. अ.
[सं. बिहसन]

बिहँसाना
हँसना, प्रसन्न करना।
क्रि. स.
[हिं. बिहँसना]

बिहँसाना
मंद-मंद हँसना, मुस्कराना।
क्रि. अ.

बिहँसी
मंद-मंद मुस्करायीं।
क्रि. अ.
[हिं. बिहँसना]
हँसत नंद गोपी सब बिहँसी-१०-१८०।

बिहँसौंहा
हँसता हुआ।
वि.
[हिं. बिहँसना]

बिहग
पंक्षी।
संज्ञा
[सं. विहंग]

बिहग
बाण।
संज्ञा
[सं. विहंग]

बिहद
बहुत अधिक, असीम।
वि.
[फ़ा. बेहद]

बिहबल
व्याकुल।
वि.
[सं. विह्वल]
(क) जादौपति जदुनाथ खगपति साथ जन जान्यौ बिहबल तब छाँड़ि दियौ थल मैं। (ख) प्रात खरिकहिं गई आइ बिहबल भई, राधिका कुँवरि कहुँ डस्यौ कारौ-७५१।

बिहरत
घूमता-फिरता है।
क्रि. अ.
[सं. विहरण]
घुटुरुनि चलत अजिर महँ बिहरत, मुख मंडित नवनीत-१०-९७।

बिहरना
फटना, दरकना।
क्रि. स.
[सं. विघटन, प्रा. विहडन]

बिहरना
टूटना-फूटना।
क्रि. स.
[सं. विघटन, प्रा. विहडन]

बिहरना
सैर करना, घूमना-फिरना।
क्रि. अ.
[सं. विहरण]

बिहराना
फटना।
क्रि. अ.
[हिं. बिहरना]

बिहराना
टूटना।
क्रि. अ.
[हिं. बिहरना]

बिहाइ, बिहाई
बीतती है।
क्रि. अ.
[हिं. बिहाना]
सब निसि याही भाँति बिहाइ-४-१२।

बिहाइ, बिहाई
छोड़कर, त्यागकर।
क्रि. स.
[हिं. बिहाना]
(क) भरत गयौ बन राज बिहाइ-६-२। (ख) अंसुमान मुनि राज बिहाइ, गंगा हेतु कियौ तप जाइ-९-९।

बिहाग
आधी रात के बाद गाया जानेवाला एक राग।
संज्ञा
[देश.]

बिहागड़ा
रात को गाया जानेवाला एक राग।
संज्ञा
[हिं. बिहाग]

बिहात
बीतता है, व्यतीत होता है।
क्रि. अ.
[हिं. बिहाना]
सुनहु स्याम तुम बिनु उन लोगनि जैसे दिवस बिहात-३४६०।

बिहान
सबेरा, प्रातःकाल।
संज्ञा
[सं. विभात, प्रा. विहाड, विहाण]
मोह-निसा कौ लेस रह्यौ नहिं भयौ बिबेक-बिहान-2-३३।

बिहान
आनेवाला दूसरा दिन, कल।
क्रि. वि.

बिहाना
छोड़ना, त्यागना।
क्रि. स.
[सं. वि+हाना]

बिहाना
बीतना, व्यतीत होना।
क्रि. अ.

बिहानी
व्यतीत हुई, बीती।
क्रि. अ.
[हिं. बिहाना]
चिरई चुहचुहानी चंद की ज्योति परानी रजनी बिहानी प्राची पियरी प्रबान की-१६०९।

बिहाने
सबेरा, प्रातःकाल।
संज्ञा
[हिं. बिहान]
सूरदास प्रभु जान देहु अब बहुरि कहौगे कालि बिहाने-११३६।

बिहाने
आनेवाला दिन, कल।
क्रि. वि.
सूरदास गोबर्धन पूजा कीने कर फल लेहु बिहाने ९५१।

बिहानै
प्रातःकाल।
संज्ञा
[हिं. बिहान]
सूरदास ऐसे लोगन को नाउँ न लीजै होत बिहानै-१५००।

बिहार
केलि, क्रीड़ा, लीला।
संज्ञा
[सं. बिहरण]
देखि-देखि किलकत दँतियाँ द्वै राजत क्रीड़त बिबिध बिहार-१०-८४।

बिहारना
बिहार या क्रीड़ा करना।
क्रि. अ.
[सं. बिहरण]

बिहारे
केलि-क्रीड़ा की।
क्रि. अ.
[हिं. बिहारना]
तिन युवती बन बननि बिहारे-2४५९।

बिहाल, बिहाला
व्याकुल, बेचैन।
वि.
[फा. बेहाल]
(क) सूरदास प्रभु मन हरि लीन्हौं हँसत ही ग्वारिनि भई बिहाला-१०३४। (ख) तरुनाई तनु आवन दीजे कित जिय होत बिहाला-१०३८।

बिहीन, बिहून
रहित, बिना।
वि.
[सं. विहीन]
(क) बारि-बिहीन मीन ज्यौं ब्याकुल त्यौं ब्रजनारि सबै। (ख) सूरदास सोभा क्यौं पावै, पिय बिहीन धनि मटकैं-१-२९२।

बिहोरना
बिछुड़ना।
क्रि. अ.
[हिं. बिहरना= फूटना]

बिह्वल
व्याकुल, विकल।
वि.
[सं. विह्वल]
(क) जादौपति जदुनाथ, छाँड़ि खगपति-साथ जानि जन विह्वल, छुड़ाइ लीन्हौ पल मैं-८-५। (ख) बिह्वल तन-मन , चकृत भई सो, यह प्रतच्छ सुपनाए-९-३१।

बींड़, बींड़ा
गेंडरी, इँडुरी।
संज्ञा
[हिं. बींडी]

बींड़, बींड़ा
पिंडी।
संज्ञा
[हिं. बींडी]

बीड़ी
गेंडुरी।
संज्ञा
[सं. वेणी]

बीड़ी
पिंडी।
संज्ञा
[सं. वेणी]

बींधना
फँसना, उलझना।
क्रि. अ.
[सं. विद्ध]

बींधना
छिदना, बिंध जाना।
क्रि. अ.
[सं. विद्ध]

बींधना
छेदना, बेधना।
क्रि. स.

बींधि
फँसकर, उलझकर।
क्रि. अ.
[हिं. बींधना]
ज्यौं कुज्वारि रस बींधि हारि गथु सोचति पटकि चिती-१० उ०-१०३।

बींधे
फँसे, उलझे।
क्रि. अ.
[हिं. बींधना]
नैना-बींधे दोऊ मेरे-पृ. ३२५ (४७)।

बीका
टेढ़ा।
वि.
[सं. वक्र]

बीख
पद, कदम, डग।
संज्ञा
[सं. बीखा]

बीग
भेड़िया।
संज्ञा
[सं. वृक]

बीगना
बिखराना, गिराना।
क्रि. स.
[सं. विकीरण]

बीघा
जमीन की एक नाप जो ३०२५ वर्ग गज की, और एकड़ के पाँचवें भाग के बराबर होती है।
संज्ञा
[सं. विग्रह, प्रा. बिग्गह]

बीच
किसी परिधि, सीमा, वस्तु आदि का मध्य भाग।
संज्ञा
[सं. विच = अलग करना]
बीच खेत - सबके देखते देखते। बीच-बीच में - (१) रह-रह कर। (२) थोड़ी-थोड़ी दूर पर।

बीच
भेद, अन्तर।
धन्य हो धन्य हो तुम घोष नारी। मोहि धोखा गयौ, दरस तुमको भयौ तुमहिं मोहिं देखौ री बीच भारी।
बीच करना - (१) लड़नेवालों को रोकना। (२) झगड़ा निबटाना। उ. - बीच करन जो आवै कोऊ ताको सौंह दिवाऊँ-१५१२। बीच न कियो - रक्षा नहीं की, बचाया नहीं। उ. - बीच न काहू तब कियौ (जब) दूतनि दीन्हीं मार-१- ३२५। बीच पड़ना - (१) अन्तर या परिवर्तन हो जाना। (२) झगड़ा निबटाने के लिए मध्यस्थ बनना। बीच डालना (पारना) - अन्तर, भेद या परिवर्तन करना। बीच में पड़ना - (१) मध्यस्थ होना। (२) जिम्मेदार या प्रतिभू बनना। बीच रखना - दुराव या भेद रखना। बीच में कूदना - दूसरे के काम में व्यर्थ ही पड़ना। किसी को बीच में देना - मध्यस्थ या साक्षी बनाना। किसी को बीच में रखकर कहना - उसकी शपथ खाकर कहना।

बीच
दो वस्तुओं के बीच का अन्तर या अवकाश।

बीच
अवसर, मौका।
पायौ बीच इंद्र अभिमानी हरि बिनु गोकुल आयौ-2८२०।

बीच
भेद, अन्तर।
तुमसौं उनसौं बीच नहीं कछू तुम दोऊ बर नारि-१४२२।

बीच
बीच ही में, लगभग मध्य भाग में, आधी दूर पर।
क्रि. वि.
मगन हौं भव-अंबुनिधि मैं कृपासिंधु मुरारि।….। थक्यौ बीच बिहाल विह्वल, सुनौ करुना-मूल। स्याम, भुज गहि काढ़ि लीजै, सूर ब्रज कैं कूल-१-९९।

बीच
अन्दर से, भीतर से।
(क) निकसे खंभ-बीच हैं नरहरि, ताहि अभयपद दीन्हौ-१-१०४। (ख) पाहन-बीच कमल बिकसावै, जल में अगिनि जरै-१-१०५।

बीचहिं
इसी काल के मध्य में।
क्रि. वि.
[हिं. बीच+हिं (प्रत्य.)]
कहत हे, आगे जापिहैं राम। बीचहिं भई और की औरै परयौ काल सौं काम-१-५७।

बीचहिं
बीच में ही बात काट कर।
क्रि. वि.
[हिं. बीच+हिं (प्रत्य.)]
सखा कहत हैं स्याम खिसाने।...। बीचहिं बोलि उठे हलधर तब याके माइ न बाप-१०-२१४।

बीचि, बीची
लहर, तरंग।
संज्ञा
[सं. वीचि]

बीचु
अवसर।
संज्ञा
[हिं. बीच]

बीचु
अन्तर।
संज्ञा
[हिं. बीच]

बीचोबीच
ठीक मध्य भाग में।
क्रि. वि.
[हिं. बीच]

बीछना
पसंद करके चुनना।
क्रि. स.
[सं. विचयन]

बीछना
अलग करके देखना।
क्रि. स.
[सं. विचयन]

बीछी
बिच्छू।
संज्ञा
[सं. वृश्चिक]

बीछू
बिच्छु।
संज्ञा
[सं. वृश्चिक]

बीछू
बिछुआ नामक शस्त्र
संज्ञा
[सं. वृश्चिक]

बीज
बिया या दाना जिससे पौधा-अंकुरित होता है।
संज्ञा
[सं.]
(क) बीज मन माली मदन चुर आलबाल बयौ-३३०७। (ख) जैसो बीज बोइए तसौ लुनिए लोग कहत सब बावरी-३३३१।

बीज
मूल प्रकृति या कारण।

बीज
वीर्य।

बहुरूप
गिरगिट।
संज्ञा

बहुरूपा
दुर्गा।
संज्ञा
[सं.]

बहुरूपिया, बहुरूपी
अनेक रूप धारण करनेवाला।
वि.
[हिं. बहु + रूप]

बहुरूपिया, बहुरूपी
स्वँग बनाने या नकल करनेवाला।
वि.
[हिं. बहु + रूप]

बहुरे
लौटे, वापस गये, फिरे।
क्रि. अ.
[हिं. बहुरना]
अस्तुति करत अमर-गन बहुरे, गए आपनैँलोक-५७९।

बहुरे
वापस आये, लौटे।
क्रि. अ.
[हिं. बहुरना]
गए सु गए फेरि नहिं बहुरे का धौं जियहि धरी-१० ३३२ (१४)।

बहुरौ
पुनः, फिर।
क्रि. वि.
[हिं. बहुरना (बहुरि=फिरकर )]
(क) अब मेरो-मेरी करि बौरे, बहुरौ बीज बयौ-१- ७८। (ख) कब वह मुख बहुरौ देखौंगी कब वैसौ सचु पैहौं-2५५०।

बहुल
प्रचुर, अधिक।
वि.
[सं.]

बहुलता
अधिकता, प्रचुरता।
संज्ञा
[सं.]

बहुला
गाय।
संज्ञा
[सं.]

बीज
किसी देवता का मूलमंत्र।

बीज
बिजली।
संज्ञा
[हिं. बिजली]

बीजक
सूची।
संज्ञा
[सं.]

बीजक
बीज।
संज्ञा
[सं.]

बीजक
कबीर का एक पद-संग्रह।
संज्ञा
[सं.]

बीजगणित
गणित का एक भेद।
संज्ञा
[सं.]

बीजन
पंखा, बेना।
संज्ञा
[सं. व्यजन]

बीजना
बीज बोना।
क्रि. स.
[हिं. बीज]

बीजमंत्र
किसी देवता का मूलमंत्र।
संज्ञा
[सं.]

बीजमंत्र
किसी कार्य की सिद्धि का गुर।
संज्ञा
[सं.]

बीजरी
बिजली।
संज्ञा
[हिं. बिजली]
एक दिशा मनो मकर चाँदिनी, एक दिशा सघन बीजरी ऐसे हरि मन मोहैं-पृ. ३१६ (५७)।

बीजा
दूसरा।
वि.
[हिं. दूजा]

बीजा
बीज।
संज्ञा
[हिं. बीज]

बीजाक्षर
किसी बीजमंत्र का पहला अक्षर।
संज्ञा
[सं.]

बीजी
गिरी।
संज्ञा
[हिं. बीज+ई]

बीजी
गुठली।
संज्ञा
[हिं. बीज+ई]

बीजी
पिता।
संज्ञा
[सं. वीजिन्]

बीजु
बिजली, विद्युत।
संज्ञा
[हिं. बिजली]
(क) निसि अँधेरी, बीजु चमकै, सघन बरसै मेह-१०-५। (ख) चमकत बीजु सैल कर मंडित गरजि निसान बजायो-2८४०।

बीजुपात
बिजली गिरना।
संज्ञा
[सं. वज्र+पात]

बीजुरी
बिजली।
संज्ञा
[हिं. बिजली]

बीजू
जो बीज से उगा हो।
वि.
[हिं. बीज+ऊ]

बीजू
बिजली।
संज्ञा
[हिं. बिजली]

बीझ
सघन, घना।
वि.
[सं. विद्ध]

बीझना
फँसना, लिप्तहोना।
क्रि.अ.
[सं. बिद्ध, प्रा. बिज्झ]

बीझा
निर्जन, एकान्त।
वि.
[सं. विजन]

बीट
पक्षी को विष्ठा।
संज्ञा
[सं. विट]

बीठल
विष्णु के अवतार एक देवता जिनका मंदिर पंढरपुर में है।
संज्ञा
[सं. विट्ठल]

बीड़ा
पान की गिलौरी।
संज्ञा
[सं. बीटक]
बीड़ा उठाना-१) किसी काम को करने का निश्चय करना। (२) तत्पर होना। बीड़ा डालना (रखना) - (१) किसी काम को करने का दायित्व लेने के लिए उपस्थित जन-समूह को चुनौती-सी देना।

बीड़ा देना
काम करने का भार सौंपना।

बीड़ा देना
बयाना या साई देना।

बीड़िया
बीड़ा उठानेवाला,कार्य-संपादन का भार लेनेवाला।
वि.
[हिं. बीड़ा+इया]

बीड़ी
छोटा बीड़ा।
संज्ञा
[हिं. बीड़ा]

बीड़ी
गड्डी।
संज्ञा
[हिं. बीड़ा]

बीतत
व्यतीत होते हैं, समय बीतता है, वक्त कटता है।
क्रि. अ.
[हिं. बीतना]
(क) दिन बीतत माया कैं लालच, कुल-कुटुंब कैं हेत-१-१२५। (ख)-छिन इक माहिं कोटि जुग बीतत नर की केतिक बात-१-३१३।

बीतना
समय कटना या व्यतीत होना।
क्रि. अ.
[सं. व्यतीत]

बीतना
छूट जाना, दूर होना।
क्रि. अ.
[सं. व्यतीत]

बीतना
घटित होना, पड़ना।
क्रि. अ.
[सं. व्यतीत]

बीता
समाप्त हो गया।
क्रि. अ.
[हिं. बीतना]
भारत युद्ध होइ जब बीता। भयो जुधिष्ठिर अति भयभीता-१-२६१।

बीता
बालिश्त।
संज्ञा
[बित्ता]

बीती
समाप्त हो गयी, बीत गयी।
क्रि. अ.
[हिं. बीतना]
भयौ अकाज अर्द्धनिसि बीती, लछिमनकाज नसायौ-९-१५५।

बीती
घटित हुई, पड़ी।
हमरे मन की सोई जानै जापै बीती होई ३२०९।

बीती
घटित या मन पर पड़ी हुई बात का प्रभाव।
संज्ञा
ऊधौ सों समुझाइ प्रगट करि अपने मन की बीती-2९४२।

बीते
व्यतीत हुए, विगत हुए।
क्रि. अ.
[हिं. बीतना]
(क) जनमत मरत बहुत जुग बीते, अजहूँ लाज न आइ-१-३१७। (ख) कछु दिन पत्र भक्ष करि बीते कछू दिन लीन्हौ पानी।

बीते
पड़े, घटित हो।
क्रि. अ.
[हिं. बीतना]

बीतैं
बीतने पर, व्यतीत होने पर, समाप्ति के बाद।
क्रि. वि.
[हिं. बीतना]
भारत के बीतैं पुनि आयौ। लोगनि सब बृत्तांत सुनायौ-१-२८४।

बीतैं
बीतते हैं, व्यतीत होते हैं।
क्रि. अ.
[हिं. बीतना]
बाद-बिबाद सबै दिन बीतैं, खेलत ही अरु खात-2-२२।

बीतै
पड़, संघटित हो।
क्रि. अ.
[हिं. बीतना]
सूर स्याम के बस्य भए जेहि बीतै सो जानै-पृ.३२७ (६४)

बीतैगी
पड़ेगी, संघटित होगी। बीतैगी तबहीं जानौगे महा कठिन है नेह-३०६८।
क्रि. अ.
[हिं. बीतना]

बीत्यौ
छूट गया, दूर हो गया।
क्रि. अ.
[हिं. बीतना]
उलटा नाम जपत अघ बीत्यौ मुनि उपदेस करायौ।

बीथित
दुखी, पीड़ित।
वि.
[सं. व्यथित]

बीथिन, बीथिनि
मार्ग, गलियाँ, पथ।
संज्ञा
[हिं. वीथी]
(क) बरन-बरन पट परत पाँवड़े, बीथिनि सकल सुगंध सिंचाई-९.१६९। (ख) बारक इन बीथिनि ह्वै निक से मैं दूरि झरोखनि झाँक्यौ-2५४६।

बीध
विधिपूर्वक।
क्रि. वि.
[सं. विधि]

बीधना
फँसना, उलझना।
क्रि. अ.
[सं. विद्ध]

बीधना
छेदना, बेधना।
क्रि. स.
[हिं. बीधना]

बीधे
फँसे, उलझे।
क्रि. अ.
[हिं. बीधना]
नैना बीधे दोऊ मेरे-ना० २८९७।

बीन
वीणा।
संज्ञा
[सं. वीण]

बीनऊँ
बिनती करता हूँ, प्रार्थना करता हूँ।
क्रि. अ.
[हिं. बिनवना]
गौरि गनेस्वर बीनऊँ (हो) देवी सारद तोहिं-१०-४०।

बीनति
चुनती है।
क्रि. स.
[हिं. बीनना]
ब्रजबनिता मृग सावक नैनी बीनति कुसुमकली-2०७१।

बीनती
प्रार्थना, निवेदन।
संज्ञा
[हिं. बिनती]
(क) सूरदास की बीनती कोउ लै पहुँचावै-१-४। (ख) सूरदास की यहै बीनती दस्तक कीजै माफ-१-१५३। (ग) सूरदास की बीनती नीकैं पहुँचाऊँ-९-४२।

बीनना
चुनना।
क्रि. स.
[सं. विनयन]

बीनना
छाँटना।
क्रि. स.
[सं. विनयन]

बीनना
बेधना, छेदना।
क्रि. स.
[हिं. बीधना]

बीनना
बुनना।
क्रि. स.
[हिं. बुनना]

बीनि
छाँटकर।
क्रि. स.
[हिं. बीनि]
कठिन-कठिन कलि बीनि करत न्यारी प्यारी के चरन कोमल जानि सकुच अति गड़िबेहि डरात-2०६८।

बीबी
पत्नी।
संज्ञा
[फा.]

बीबी
बीबी
संज्ञा
[फा.]

बीभत्स
घृणित।
वि.
[सं.]

बीभत्स
पापी।
वि.
[सं.]

बीभत्स
काव्य के नौ रसों में एक जिसमें रक्त, मांस आदि का वर्णन रहता है।
संज्ञा

बीमार
रोगी।
वि.
[फा.]

बीमारी
रोग।
संज्ञा
[फा.]

बीमारी
बुरी लत।
संज्ञा
[फा.]

बीय, बीया
दूसरा।
वि.
[हिं. दूजा]

बीय, बीया
बीज, दाना।
संज्ञा
[सं. बीज]

बीर
वीर, साहसी।
वि.
[सं. वीर]
तुम्हैं पहिचानति नाहीं बीर-९-८६।

बीर
भाई, भ्राता।
संज्ञा
[हिं. बीरन]
सबै ब्रज है जमुना कैं तीर। कालिनाग के फन पर निरतत संकर्षन कौ बीर-५७५।

बीर
सखी, सहेली।
संज्ञा

बीर
कान का एक आभूषण।
संज्ञा
हाथ पहुँची बीर कंगन जरित मुँदरी भ्राजई।

बीरउ
बिरवा, पौधा।
संज्ञा
[हिं. बिरवा]

बीरज
शुक्र, वीर्य।
संज्ञा
[सं. वीय्र्य]

बीरन
भाई।
संज्ञा
[हिं. बीरन]

बीरनि
कान का एक गहना।
संज्ञा
[देश.]

बीरबहूटी
एक छोटा लाल कीड़ा जिसके मखमली रोएँ होते हैं।
संज्ञा
[सं. वीर+बधूटी]

बीरभद्र
शिव जी के एक गण जो उनके पुत्र और अवतार माने जाते हैं। इनकी उत्पत्ति शिव जी के मुख से दक्ष प्रजापति का यज्ञ नष्ट करने के लिए हुई थी। सूरदास जी ने इनकी उत्पत्ति शिव जी की जटा से लिखी है।
संज्ञा
[सं. वीरभद्र]
सिव ह्वै क्रोध इक जटा उपारी। बीरभद्र उपज्यौ बलभारी-४-५।

बीरा
पान का बीड़ा।
संज्ञा
[हिं. बीड़ा]
जेंइ उठे अँचवन लियौ, दुहुँकर बीरा देत-४३७।
बीरा दीन्हौ - कार्य-भार सौंपा। उ. - यह सुनि नृपति हरष मन कीन्हौं, तुरतहिं बीरा दीन्हौं-१०-६१। बीरा लै आयौ - कार्य-संपादन करने का भार लिया। उ. - बीरा लै आयौ सन्मुख तैं, आदर करि नृप कंस पठायौ-५९१।

बीरा
वह फूल-फल जो देव-प्रसाद-रूप में भक्तों को दिया जाता है।
कह अपनी परतीति नसावत, मैं पायौ हरि हीरा। सूर पतित तबहीं उठिहै, प्रभु जब हँसि देहौ बीरा-१-१३४।

बीरी
पान का छोटा बीड़ा।
संज्ञा
[हिं. बीड़ा]
तब बीरी तनक मुख नायौ-१०-१८३।

बीरी
कान का एक गहना।
संज्ञा
[हिं. बीड़ा]

बीरो
वृक्ष, पेड़।
संज्ञा
[हिं. बिरवा]

बीर्य
शरीर की सात धातुओं में से एक जिसका निर्माण सबके अन्त में होता है।
संज्ञा
[सं. वीर्य]
रुद्र कौ बीर्य खसि के परयौ धरनि पर, मोहिनी रूप हरि लियौ दुराई-८-१०।

बीस
संख्या में दस का दूना हो।
वि.
[सं. विंशति, प्रा. वीशति, बीसा]

बीस
श्रेष्ठ, उत्तम। बीसहूँ बिसौ-निश्चय ही।
वि.
[सं. विंशति, प्रा. वीशति, बीसा]
जपत अठारहो भेद उनईस नहिं बीसहुँ बिसौ तै सुखहिं पैहै-१२७८।

बीस
बीस की संख्या।
संज्ञा

बीस
बीस (स्त्रियाँ)।
संज्ञा
ब्याहौ बीस धरौ दस कुबिजा अंतहु स्याम हमारे-३३४२।

बीसक
लगभग बीस।
वि.
[हिं. बीस+एक]
बेसन के दस-बीसक दोना-३९६।

बीसक
बीस (स्त्री या पुरुष)। कबहुँक मिलि दस-बीसक धावति लेति छिंड़ाइ मुरलि झकझोरी २४०३।
संज्ञा

बीसी
बीस चीजों का समूह।
संज्ञा
[हिं. बीस]

बीसी
आठ संवत्सरों के तीन विभागों-पहली, ब्रह्म बीसी; दूसरी, विष्णु; और तीसरी रुद्र बीसी-में से कोई एक।
संज्ञा
[हिं. बीस]

बीसों
कई (जार) बीस।
वि.
[हिं. बीस]

बीसों
बीस से अधिक।
वि.
[हिं. बीस]

बहुला
एक देवी।
संज्ञा
[सं.]

बहुला
राधा की एक सखी का नाम।
संज्ञा
[सं.]
कहि राधा, किन हार चुरायो।...। सुमना बहुला चंपा जुहिला ज्ञाना भाना भाउ-१५८०।

बहुला
एक गाय जिसने वृंदावन के बहुलावन में व्याघ्र के साथ सत्य व्रत का निर्वाह किया था।
संज्ञा
[सं.]

बहुलाबन
वृंदावन के ८४ बनों में एक जहाँ बहुला गाय ने व्याघ्र के साथ सत्य वचन का निर्वाह किया था।
संज्ञा
[सं.]

बहुलि, बहुली
इलायची।
संज्ञा
[सं. बहुला]
बकुल, बहुलि, बट कदम पै ठाढ़ी ब्रजनारी-१८२२।

बहुवचन
वचन' का एक भेद जो एक से अधिक वस्तुओं का बोधक होता है (व्याकरण)।
संज्ञा
[सं.]

बहुब्रीहि
समास का एक भेद।
संज्ञा
[सं.]

बहुश्रुत
बहुत जानकार, बहुज्ञ।
वि.
[सं.]

बहूँटा
बाँह का एक गहना।
संज्ञा
[हिं. बाहु.]

बहू
नव विवाहिता।
संज्ञा
[सं. बघू]

बीहड़
ऊबड़-खाबड़।
वि.
[सं. विकट]

बीहड़
जो सम या सुगम न हो, विकट।
वि.
[सं. विकट]

बीहड़
अलग, पृथक।
वि.
[सं. विलग]

बुंद
बूँद।
संज्ञा
[सं. विदु]
नाग-नर-पसु सबनि चाह्यौ सुरसरी कौ बुंद-९-१०।

बुंद
थोड़ा या जरा सा।
वि.

बुँदका
बड़ा और गोल धब्बा।
संज्ञा
[सं. विंदुक]

बुँदका
माथे का गोल टीका।
संज्ञा
[सं. विंदुक]

बुँदकी
छोटी गोल बिंदी।
संज्ञा
[सं. विदु+हिं. की]

बुँदकी
किसी चीज पर बनी, पड़ी या कढ़ी छोटी गोल बिंदी।
संज्ञा
[सं. विदु+हिं. की]

बुंदा
कान का एक गहना।
संज्ञा
[सं. विंदु]

बुंदा
बड़ी बिंदी।
संज्ञा
[सं. विंदु]
उर बघनहाँ, कंठ कठुला, झँडूले बार, बेनी लटकन मसि-बंदा मुनि-मनहर-१०-१५१।

बुँदिया
बूँद।
संज्ञा
[हिं. बूँदी]

बुँदिया
एक मिठाई जो बेसन की बूँदों से बनायी जाती है।
संज्ञा
[हिं. बूँदी]

बुँदेला
क्षत्रियों की एक जाति।
संज्ञा
[हिं. बूँद+एला (प्रत्य.)]

बुँदोरी, बुँदौरी
बूँदी' नामक मिठाई।
संज्ञा
[हिं. बूँद+ओरी]

बुआ
पिता की बहन।
संज्ञा
[देश.]

बुकनी
महीन चूर्ण।
संज्ञा
[हिं. बूकना]

बुकुन
महीन चूर्ण, बुकनी।
संज्ञा
[हिं. बूकना]

बुकुन
पाचक चूर्ण, चूरन।
संज्ञा
[हिं. बूकना]

बुक्का
अभ्रक का चूर्ण।
संज्ञा
[हिं. बूकना]

बुखार
भाप, वाष्प।
संज्ञा
[अ. बुखार]

बुखार
ज्वर
संज्ञा
[अ. बुखार]

बुखार
दुख, कोध आदि का आवेग।
संज्ञा
[अ. बुखार]
जी (दिल) का बुखार निकालना - दुख, शोक आदि की बात कहकर जी शान्त करना।

बुजदिल
कायर।
वि.
[फा. बुजदिल]

बुजुर्ग
बाप-दादा।
संज्ञा
[फा. बुजुर्ग]

बुजुर्ग
व्यक्ति जो अवस्था में बड़ा हो।
संज्ञा
[फा. बुजुर्ग]

बुजुर्गियत, बुजुर्गी
बड़प्पन।
संज्ञा
[हिं. बुजुर्ग]

बुझति
(अग्नि) बुझती या शांत होती है।
क्रि. अ.
[हिं. बुझना]
दारुन दुख दवारि ज्यौं तृन-बन, नाहिनँ बुझति बुझाई-९-५२।

बुझना
जलती हुई चीज का जलना बंद हो जाना।
क्रि. अ.
[देश.]

बुझना
तपी या गरम चीज का ठंढा होना।
क्रि. अ.
[देश.]

बुझना
किसी गरम चीज का पानी में डालने से ठंडा होना।
क्रि. अ.
[देश.]

बुझना
पानी से आग का शांत होना।
क्रि. अ.
[देश.]

बुझना
उमंग या उत्साह में कमी आना।
क्रि. अ.
[देश.]

बुझना
तृप्ति या संतोष का अनुभव होना, शांत होना।
क्रि. अ.
[देश.]

बुझाइ
तृप्त हुई।
क्रि. अ.
[हिं. बुझना]
माधौ, नैंकु हटको गाइ।….। अष्ट-दस-घट नीर अँचवति, तृषा तउ न बुझाइ-१-५६।

बुझाइ
आवेग आदि में कमी आई।
क्रि. अ.
[हिं. बुझना]
मुख तन चितै, बिहँसि हरि दीन्हौ, रिस तब गई बुझाइ-१०-२९७।

बुझाइ
समझाकर।
क्रि. स.
[हिं. बुझाना]
(क.) बार बार बुझाइ हारी भौंह मोपर तानति-पृ. ३२६ (५४)। (ख) ज्ञान बुझाइ खबरि दै आवहु एक पंथ द्वै काज-2९२५।

बुझाई
अग्नि बुझाने या, शांत करने से।
क्रि. स.
[हिं. बुझाना]
दारुन दुख दवारि ज्यौं तृन-बन नाहिनँ बूझति बुझाई-९-५२।

बुझाई
समझाकर।
क्रि. स.
[हिं. बुझाना]
सूर स्याम लिए हँसति जसोदा नंदहिं कहति बुझाई-१०-१८९।

बुझाई
तृप्त या शांत हुई।
क्रि. अ.
[हिं. बुझना]
जोग सिखाये क्यों मन मानै क्यौंऽब ओसकन प्यास बुझाई-३३१०।

बुझाई
दुख, क्रोध आदि के आवेग में कमी हुई।
क्रि. अ.
[हिं. बुझना]
नैननि निरखि दुख निमेष न खंडित प्रेम ब्यथा न बुझाई-2९७६।

बुझाई
बुझाने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
संज्ञा
[हिं. बुझाना]

बुझाऊँगो
तृप्त या शांत करना।
क्रि. स.
[हिं. बुझाना]
सुनहु सूर अधरन रस अँचवो दुहुँ मन तृषा बुझाऊँगो-१९४४।

बुझान
शांत करने (दे)।
क्रि. स.
[हिं. बुझाना]

बुझान
बुझा दे-बुझाने दे, शांत करने दे।
प्र.
गोपालहिं माखन खान दै।...। गहि बहियाँ हौं लैकै जैहौं, नैननि तपति बुझान दै-१०-२७४।

बुझाना
जलती चीज की आग ठंढी करना।
क्रि. स.
[हिं. बुझना]

बुझाना
तपी हुई धातु आदि को पानी में डालकर ठंढा करना।
क्रि. स.
[हिं. बुझना]

बुझाना
किसी चीज को तपाकर उसका गुण पानी में लाने के लिए उसे पानी में डालना।
क्रि. स.
[हिं. बुझना]

बुझाना
पानी आदि से शांत करना।
क्रि. स.
[हिं. बुझना]

बुझाना
आवेग, उत्साह आदि शांत करना।
क्रि. स.
[हिं. बुझना]

बुझाना
बूझने को प्रवृत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. बूझना]

बुझाना
समझाना।
क्रि. स.
[हिं. बूझना]

बुझाना
संतोष देना।
क्रि. स.
[हिं. बूझना]

बुझानी
तृप्त हुई, शांत हुई।
क्रि. अ.
[हिं. बुझना]
निसि-दिन दुखित मनोरथ करि करि, पावत हूँ तृष्ना न बुझानी-१-१४९।

बुझानी
ताप में कमी आयी।
क्रि. अ.
[हिं. बुझना]
(क) लोचन तृप्त भए दरसन तैं उर की तपति बुझानी-७७८। (ख) ग्वालिनि बिकल देखि प्रभु प्रगटे हर्ष भयो तन तपति बुझानी-८४७।

बुझानी
आवेग या उत्तेजना में कमी हुई।
क्रि. अ.
[हिं. बुझना]
यह सुनि सुनि रिस कछुक बुझानी-१०४५।

बुझायौ
अग्नि शांत की।
क्रि. स.
[हिं. बुझाना]
काम-क्रोध-मद-लोभ-अगिनि तैं कहूँ न जरत बुझायौ-१-१५४।

बुझावन
पूछने या बूझने (लगे)।
क्रि. स.
[हिं. बुझाना]

बुझावन
बुझावन लागे-पूछने या बुझने लगे।
प्र.
फल कौ नाम बुझावन लागे हरि कहि दियो अमोरि-2३७७।

बुझावै
अग्नि शांत करता है।
क्रि. स.
[हिं. बुझाना]
पग तर जरत न जानै मूरख, घर तजि घूर बुझावै-2-१३१

बुझावै
समभावे।
क्रि. स.
[हिं. बूझना]
चतुर काम फँग परे कन्हाई अब धौं इनहिं बुझावै को री-१५९३।

बुट
जड़ी-बूटी, वनस्पति।
संज्ञा
[हिं. बूटी]

बुटना
भाग जाना।
क्रि. अ.
[देश.]

बुड़की
डुबकी, गोता।
संज्ञा
[हिं. डुबकी]
(क) करति स्नान सब प्रेम बुड़की देहि। (ख) चकृत होइ नीर तैं बहुरि बुड़की देइ-2५७०।

बुड़ना
बूड़ना, डूबना।
क्रि. अ.
[हिं. डूबना]

बुड़बुड़ाना
कुढ़कर या झुँझलाकर बड़-बड़ाना।
क्रि. अ.
[अनु.]

बुड़ाई
डूबने को प्रवृत्त किया।
क्रि. स.
[हि. बुड़ाना]

बुड़ाई
देउँ बुड़ाई-डुबो दूँ।
प्र.
राखौं नहीं इन्हैं भूतल मैं गोकुल देउँ बुड़ाई-९००।

बुड़ाना
पानी में गोता देना।
क्रि. स.
[हिं. डुबाना]

बुड़ाना
पानी में गोता देकर प्राण लेना।
क्रि. स.
[हिं. डुबाना]

बुत
मूर्ति, प्रतिमा।
संज्ञा
[फ़ा.]

बुत
प्रियतम।
संज्ञा
[फ़ा.]

बुत
जो प्रतिमा की तरह चुप-चाप हो।
वि.

बुतना
बुझना।
क्रि. अ.
[हिं. बुझना]

बुतपरस्त
मूर्तिपूजक।
संज्ञा
[फ़ा.]

बुताना
बुझना।
क्रि. अ.
[हिं. बुतना]

बुताना
बुझाना।
क्रि. स.

बुत्ता
धोखा, झाँसा।
संज्ञा
[देश.]

बुत्ता
बहाना।
संज्ञा
[देश.]

बुबुद, बुदबुदा
पानी का बुलबुला, बुल्ला।
संज्ञा
[सं.]
(क) बारि मैं ज्यौं उठत बुदबुद, लागि बाइ बिलाइ-१-३१६। (ख) मनहुँ बुदबुदा उपजत अमी-2३२१।

बुड़ाव
पानी आदि की गहराई जो थाह या ऊँचाई से अधिक हो।
संज्ञा
[हिं. डुबाव]

बुढ़वा, बुढ़ा
बूढ़ा, वृद्ध।
वि.
[सं. वृद्ध]

बुढ़ाई
बुढ़ापा।
संज्ञा
[हिं. बूढ़ा+आई (प्रत्य.)]
(क) त्राहि त्राहि करि नंद पुकारत, देखत ठौर गिरे भहराई। लोटत धरनि, परत जल भीतर, सूर-स्याम दुख दियौ बुढ़ाई-५४४। (ख) नंद पुकारत रोइ बुढ़ाई मैं मोहिं छाड़्यौ-५८९।

बुढ़ाना
बूढ़ा होना।
क्रि. अ.
[हिं. बूढ़ा]

बुढ़ानी
बूढ़ी हुई।
क्रि. अ.
[हिं. बुढ़ाना]
अब मैं जानी, देह बुढ़ानी। सीस, पाउँ, कर कह्यौ न मानत तन की दसा सिरानी-१-३०५।

बुढ़ाने
बूढ़े हो गये, शक्ति शिथिल या समाप्त हो गयी।
क्रि. अ.
[हिं. बुढ़ाना]
सात दिवस जल बरषि बुढ़ाने-१०६०।

बुढ़ापा, बुढ़ापौ
बूढ़े होने का भाव।
संज्ञा
[हिं. बूढ़ा+पा]

बुढ़ापा, बुढ़ापौ
वृद्धावस्था।
संज्ञा
[हिं. बूढ़ा+पा]
बहुरौ ताहि बुढ़ापौ आवै। इंद्री-सक्ति सकल मिटि जावै-३-१३।

बुढ़ायौ
बूढ़ा हो गया।
क्रि. अ.
[हिं. बुढ़ाना]
देखि बिधि को कह्यौ, यह बुढ़ायौ-८-८।

बुढ़ौती
वृद्धावस्था।
संज्ञा
[हिं. बूढ़ा+औती]

बुद्ध
बौद्ध-धर्म के प्रवर्तक जो शाक्यवंशी राजा शुद्धोधन की रानी महामाया के गर्भ से जन्मे थे। हिंदू शास्त्रों के अनुसार ये दस अवतारों में नवें, और चौबीस अवतारों में तेईसवें माने जाते हैं।
संज्ञा
[सं.]
बासुदेव सोई भयौ, बुद्ध भयौ पुनि सोइ। सोई कल्की होइहै, और न द्वितिया कोइ-2-३६।

बुद्धि
समझ, विवेक-शक्ति।
संज्ञा
[सं.]
चतुराई अंग-अंग भरी है, पूरन ज्ञान न बुद्धि (बुधि) की मोटी-१४७९।

बुद्धिचक्षु
प्रज्ञाचक्षु।
संज्ञा
[सं.]

बुद्धिचक्षु
धृतराष्ट्र।
संज्ञा
[सं.]

बुद्धिजीवी
वह जो बौद्धिक कार्य करके जीविकोपार्जन करता हो।
संज्ञा
[सं. बुद्धिजीविन्]

बुद्धिपर
जिस तक बुद्धि न पहुँच सके।
वि.
[सं.]

बुद्धिमत्ता
समझदारी।
संज्ञा
[सं.]

बुद्धिमान
समझदार।
वि.
[सं.बुद्धिमान्]

बुध
सौर जगत का एक ग्रह।
संज्ञा
[सं.]

बुध
ज्योतिष के नौ ग्रहों में से चौथा जिसकी उत्पत्ति बृहस्पति की स्त्री तारा के गर्भ से और चन्द्रमा के वीर्य से हुई थी। किसी किसी का मत है कि इसने वैवस्वत मनु की कन्या ईला से विवाह किया था जिससे पुरुरवा का जन्म हुआ था।
संज्ञा
[सं.]
(क) सूरज कैं बैवस्वत भयौ।….। इला सुता ताकैं गृह जाई।….। बुध कैं आस्रम सो पुनि आयौ। तासौं गंधरब-ब्याह करायौ। बहुरौ एक पुत्र तिन जायौ। नाम पुरुरवा ताहि धरायौ-९-२। (ख) पँचऐँ बुध कन्या कौ जौ है, पुत्रनि बहुत बढ़ैहैं-१०-८६।

बहू
पुत्र - वधू।
संज्ञा
[सं. बघू]

बहू
पत्नी।
संज्ञा
[सं. बघू]

बहूटनि
बाँह का एक गहना।
संज्ञा
[हिं. बाहुँटा]
बहु नग लगे इराव की अंगिया भुजा बहूटनि बलय संग को-१०४२।

बहूदक
एक वर्ग के संन्यासी।
संज्ञा
[सं.]

बहेड़ा, बहेरा
एक जंगली पेड़ जिसका फल वैद्यक के अनुसार बहुत गुणकारी होता है।
संज्ञा
[सं. विभीतक, प्रा. बहेड़अ, हि. बहेड़ा]
बाइबिरंग बहेड़ा हरैँ कहुँ बैल गोंद व्यापारी-११०८।

बहेतू
मारा-मारा फिरनेवाला।
वि.
[हिं. बहना]

बहेरी
हीला-बहाना।
संज्ञा
[हिं. बहराना]

बहेलिया
शिकारी, व्याध।
संज्ञा
[सं. वध + हेला]

बहै
प्रवाहित हो।
क्रि. अ.
[हिं. बहना]

बहै
वायु चले।
क्रि. अ.
[हिं. बहना]
(क) सीतल मंद सुगंध पवन बहै। रोम-रोम सुखदाई-१८६६। (ख) जैसी बयारि बहै। तैसी ओढ़िए जू पीठि-2०२५।

बुन्यौ
बुनकर तैयार किया।
क्रि. स.
[हिं. बुनना]
घुनो बाँस गत बुन्यौ खटोला, काहू कौ पलँग कनक पाटी को-१०उ०-७१।

बुबुकना
जोर से रोना।
क्रि. अ.
[अनु.]

बुबुकारी
जोर से रोने की क्रिया।
संज्ञा
[अनु.]

बुभुक्षा
खाने की इच्छा, भूख।
संज्ञा
[सं.]

बुभुक्षित
जिसे भूख हो, भूखा।
वि.
[सं.]

बुरकना
महीन पिसी चीज को छिड़कना।
क्रि. स.
[अनु.]

बुरका
मुसलमानियों का एक ढीलाढाला पहनावा।
संज्ञा
[अ. बुरका]

बुरका
झिल्ली जिसमें गर्भ का बालक लिपटा रहता है।
संज्ञा
[अ. बुरका]

बुरा
जो अच्छा न हो, खराब।
वि.
[सं. विरूप]
बुरा मानना - (१) अप्रसन्न होना। (२) बैर रखना।

बुरा
बुरा-भला-हानि-लाभ। डाँट-फटकार। गाली-गलौज।
यौ.

बुध
बुद्धिमान पुरुष।
संज्ञा
[सं.]
तातैं बुध हरि-सेवा करैं। हरि-चरननि नितही चित धरैं-९-८।

बुधवान
समझदार।
वि.
[सं. बुद्धिमान]

बुधवाद
सात वारों में से एक जो मंगलवार के बाद और वृहस्पतिवार के पूर्व पड़ता है। यह वार बुद्धग्रह का माना जाता है।
संज्ञा
[सं.]

बुधि
बुद्धि, समझ, विचार-शक्ति।
संज्ञा
[सं. बुद्धि]
बरज्यौ आवत तुम्हैं, असुर-बुधि इन यह कीनी-३-११।

बुधिवंत
बुद्धिमान, समझदार।
वि.
[सं. बुद्धि+वंत]
बुधिवंत पुरुष यह सब सँभारैं-१०उ०-४६।

बुनना
सूत, ऊन या अन्य तारों से कपड़ा तैयार करने या अन्य कोई वस्तु बिनने की क्रिया या भाव।
क्रि. स.
[सं. वयन]

बुनाई
बुनने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
संज्ञा
[हिं. बुनना]

बुनावट
बुनने का ढंग या रीति।
संज्ञा
[हिं. बुनना+आवट]

बुनियाद, बुन्यादि
जड़, मूल, नींव।
संज्ञा
[फा. बुनियाद]
बृन्दाबन आदि, ब्रज आदि, गोकुल आदि, आदि बुन्यादि सब अहिर जारौं-५९०।

बुनियाद, बुन्यादि
वास्तविकता।
संज्ञा
[फा. बुनियाद]
आदि-बुन्यादि सबै हम जानति काहे को सतरात-११२४।

बुर्ज
गुम्बद।
संज्ञा
[अ.]

बुलंद
भारी।
वि.
[फ़ा. बलंद]

बुलंद
ऊँचा।
वि.
[फ़ा. बलंद]

बुलबुल
एक गानेवाली चिड़िया।
संज्ञा
[फ़ा.]

बुलबुला
ब्रुदबुदा।
संज्ञा
[हिं. बुदबुद]

बुलवाना
बुलाने को प्रवृत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. बुलाना]

बुलाइ
अपने पास आने को कहकर, निकट बुलाकर।
क्रि. स.
[हिं. बुलाना]
निकट बुलाइ बिठाइ निरखि मुख, अंचर लेत बलाइ-९-८३।

बुलाइकै
बुलाकर, पुकारकर।
क्रि. स.
[हिं. बुलाना]
जोइ जोइ माँग्यौ जिनि, सोइ सोइ पायौ तिनि, दीजै सूरदास दर्स भक्तनि बुलाइकै-१०-३१।

बुलाई
बुलाये, लौटाये, वापस कर लिये।
क्रि. स.
[हिं. बुलाना]
अस्वत्थामा अस्त्र चलायौ। अर्जुनहूँ ब्रह्मास्त्र पठायौ। उन दोउनि सो भई लराई। अर्जुन तब दोउ लिए बुलाई-१-२८९।

बुलाई
बुलाकर।
क्रि. स.
[हिं. बुलाना]
काकैं सत्रु जन्म लीन्यौ है, बूझै मतौ बुलाई-१०-४।

बुलाऊँ
बुलाकर एकत्र करूँ, इकट्ठा करूँ।
क्रि. स.
[हिं. बुलाना]
तौ बिस्वास होइ मन मेरैं, औरौं पतित बुलाऊँ-१-१४६।

बुलाक
वह लम्बा मोती जिसे स्त्रियाँ नाक में पहनती हैं।
संज्ञा
[तु. बुलाक]

बुलाकी
घोड़ों की एक जाति।
संज्ञा
[तु. बुलाक]

बुलाना
पुकारना।
क्रि. सं.
[हिं. बोलना]

बुलाना
पास आने को कहना।
क्रि. सं.
[हिं. बोलना]

बुलाना
बोलने को प्रवृत करना।
क्रि. सं.
[हिं. बोलना]

बुलायौ
निमंत्रण दिया।
क्रि. सं.
[हिं. बुलाना]
दच्छ प्रजापति जज्ञ रचायौ। महादेव कौं नाहिं बुलायौ-५-४।

बुलावत
कहलाते हो, प्रसिद्ध हो।
क्रि. सं.
[हिं. बोलना]
(क) दीनदयाल, पतित पावन प्रभु, बिरद बुलावत कैसौ-१-१२९। (ख) तुम कब मो सौं पतित उधार्यो। काहे कौं हरि बिरद बुलावत, बिन मसकत को तार्यो-१-१३२।

बुलावत
बोलने को प्रेरित करते हैं, बुलवाते हैं।
क्रि. सं.
[हिं. बोलना]
(नंद) बार-बार बकि स्याम सौं कछु बोल बुलावत–१०-१२२।

बुलावत
पुकारते हैं, बुलाते हैं।
क्रि. सं.
[हिं. बोलना]
खेलन चलौ बालगोविंद। सखा प्रिय द्वारैं बुलावत घोष बालक बृन्द-१०-२१८।

बुराई
खराबी।
संज्ञा
[हिं. बुरा]

बुराई
खोटापन, नीचता।
संज्ञा
[हिं. बुरा]

बुराई
अवगुण, दोष।
संज्ञा
[हिं. बुरा]

बुराई
निंदा।
संज्ञा
[हिं. बुरा]

बुरादा
चूर्ण।
संज्ञा
[फा.]

बुरादा
लकड़ी का चूर्ण।
संज्ञा
[फा.]

बुरौ
जो अच्छा या उत्तम न हो, खराब।
वि.
[हिं. बुरा]
भैया, बहुत बुरौ बलदाऊ-४८१।

बुरौ
अनुचित।
वि.
[हिं. बुरा]
(क) कह्यौ ब्रह्मा सिव-निन्दा जहाँ। बुरौ कियौ तुम बैठे तहाँ–४-५। (ख) तै जु बुरौ कर्म कियौ, सीता हरि ल्यायौ-९-११८।
बुरौ मानेंगे - अप्रसन्न होंगे। उ. - नंद बाबा बुरौ मानैगे और जसोदा मैया-४४५।

बुर्ज
दीवारों के कोनों पर आगे की ओर निकला हुआ भाग।
संज्ञा
[अ.]

बुर्ज
मीनार का ऊपरी भाग।
संज्ञा
[अ.]

बुलावति
पुकारती है, आवाज देकर बुलाती है।
क्रि. स.
[हिं. बुलाना]
छाक लिए सिर स्याम बुलावति-४५९।

बुलावते
पुकारते हैं, आवाज देकर बुलाते हैं।
क्रि. स.
[हिं. बुलाना]
कबहुँक लै लै नाम मनोहर धवरी धेनु बुलावते-2७३५।

बुलावहु
बुलाओ, पुकारो।
क्रि. स.
[हिं. बुलाना]
बाँह उचारि काल की नाई धौरी धेनु बुलावहु-१०-१७९।

बुलावहु
निमंत्रण दो, न्योता भेजो।
क्रि. स.
[हिं. बुलाना]
जसुमति नंदहिं बोलि कह्यौ तब, महर, बुलावहु जाति-१०-८९।

बुलावा
निमंत्रण।
संज्ञा
[हिं. बुलाना]

बुलावैं
कहते हैं, घोषणा करते हैं।
क्रि. स.
[हिं. बुलाना]
पतित उधारन बिरद बुलावैं, चारौं बेद पुकारैं-१-१८३।

बुलावै
बुलाता है, पुकारता है, आने को कहता है।
क्रि. स.
[हिं. बुलाना]
नैन मूँदि, कर जोरि, नाम लै बारहिं बार बुलावै-१०-२४९।

बुलाहट
बुलावा।
संज्ञा
[हिं. बुलाना]

बुलैहै
बुलाएगी, अपने पास आने को कहेगी।
क्रि. स.
[हिं. बुलाना]
कबहुँक कृपावंत कौसिल्या, बधू-बधू कहि मोहिं बुलैहै-९-८१।

बुलौआ, बुलौवा
निमंत्रण।
संज्ञा
[हिं. बुलावा]

बुहारत
बुहारता है।
क्रि. अ.
[हिं. बुहारना]
पवन बुहारत द्वार सदा संकर कुतवारी-११२८।

बुहारति
झाड़ू देती है, साफ करती है।
क्रि. स.
[सं. बुहारना]
द्वार बुहारति फिरति अष्टसिद्धि-१०-३२।

बुहारना
झाड़ू देना।
क्रि. स.
[सं. बहुकर]

बुहारा
बड़ा झाड़ू।
संज्ञा
[हिं. बुहाना]

बुहारी
छोटी झाड़ू बढ़नी।
संज्ञा
[हिं. बुहारना]

बूँद
जल जैसे तरल पदार्थ का बहुत ही थोड़ा अंश जो गिरते समय छोटे दाने की तरह जान पड़ता है।
संज्ञा
[सं. विंदु]
करन-मेघ बान-बूँद भादौंझरि लायौ-१-२३।
बूँद गिरना (पड़ना) - हल्की वर्षा होना। बूँद भर - बहुत थोड़ा।

बूँदन, बूँदनि
बूँदों (में)।
संज्ञा
[हिं. बूँद]
नान्हीं नान्हीं बूँदन में ठाढ़ो री-८३८।

बूँदाबाँदी
हल्की वर्षा।
संज्ञा
[हिं. बूँद+ बाँद (अनु.)]

बूँदी
बेसन के दानों की एक मिठाई।
संज्ञा
[हिं. बूँद]

बूँदी
वर्षा की बूँद।
संज्ञा
[हिं. बूँद]

बू
गंध।
संज्ञा
[फ़ा.]

बू
दुर्गधं।
संज्ञा
[फ़ा.]

बूआ
पिता की बहन।
संज्ञा
[देश.]

बूकना
खूब महीन पीसना।
क्रि. स.
[देश.]

बूकना
अपनी योग्यता की धाक जमाने को बातें गढ़ना।
क्रि. स.
[देश.]

बूका
अभ्रक का चूर्ण जो गुलाल में मिलाकर होली में उड़ाया जाता है।
संज्ञा
[हिं. बुक्का]
बूका सुरँग अबीर उड़ावत भरि-भरि झोरी-2४०८।

बूगा
भूसा।
संज्ञा
[देश.]

बूचा
कनकटा।
वि.
[सं. बुस]

बूचा
अंगहीन।
वि.
[सं. बुस]

बूजना
धोखा देना, छिपाना।
क्रि. स.
[देश.]

बूझ
समझ।
संज्ञा
[सं. बुद्धि]

बूझ
पहेली।
संज्ञा
[सं. बुद्धि]

बूझत
खोजता है।
क्रि. स.
[हिं. बूझना]
जौ लौं सत-सरूप नहिं सूझत। तौ लौं मृग-मद नाभि-बिसारे, फिरत सकल बन बूझत-2-२५

बूझत
जानता-समझता है।
क्रि. स.
[हिं. बूझना]
राजा, इक पंडित पौरि तुम्हारी। अपद-दुपद पसु भाषा बूझत अविगत अल्प अहारी-८-१४।

बूझत
पूछता है।
क्रि. स.
[हिं. बूझना]
बार-बार हरि मातहिं बूझत, कहि चौगान कहाँ है-१०-२४३।

बूझन
बुद्धि।
संज्ञा
[हिं. बूझ]

बूझन
पहेली।
संज्ञा
[हिं. बूझ]

बूझन
पूछने (लगे)।
क्रि. स.
[हिं. बूझना]
सखा बृंद लै तहाँ गए बूझन तेहि लागे-2५७५।

बूझना
जानना, समझना।
क्रि. स.
[हिं. बूझ]

बूझना
पूछना, प्रश्न करना।
क्रि. स.
[हिं. बूझ]

बूझना
खोजना, ढूँढ़ना।
क्रि. स.
[हिं. बूझ]

बूझहु
पूछो।
क्रि. स.
[हिं. बूझना]
यह तौ नाहिं बदी हम उनसौ बूझहु धौं यह बात-११९०।

बूझि
समझकर, जानकर।
क्रि. स.
[हिं. बूझना]
जानि-बूझि मैं होत अजान-१-३४२।

बूझि
समझदारी।
संज्ञा
[हिं. बूझ]
जसुदा यह न बूझि कौ काम। कमल नैन की भुजा देखि धौं, तैं बाँधे हैं दाम-३६७।

बूझिए, बूझिये
पूछिए।
क्रि. स.
[हिं. बूझना]
उठौ महरि कुसलात बूझियै आनन्द उमँगि भरी-2९६२।

बूझी
पूछी।
क्रि. स.
[हिं. बूझना]
ते मोहिं मिले जात घर अपनैं, मैं बूझी तब जाति-१०-३६।
न बूझी बातें - खोज-खबर भी न ली। ज्यों मधुकर अम्बुज रस चाख्यौ बहुरि न बूझी बातै आइ-३०५३।

बूझ
समझता है, जानता है।
क्रि. स.
[हिं. बूझना]
अज, अबिनासी, अमर प्रभु, जनमै-मरै न सोइ। नटवर करत कला सकल, बूझै बिरला कोइ-2-३६।

बूझ
पुकारता है।
क्रि. स.
[हिं. बूझना]

बूझौ
पूछो।
क्रि. स.
[हिं. बूझना]
(क) याकै चरित कहा कोउ जानै, बूझौ धौं संकर्षन भैया-१०-३३५। (ख) जंत्र-मंत्र कह जानै मेरौ। यह तुम जाइ गुनिनि कौं बूझौ, इहाँ करति कत झेरौ-७५३।

बूझ्‌यौ
समझा, जाना।
क्रि. स.
[हिं. बूझना]
सूरदास अब कहति जसोदा, बूझ्यौ सबकौ ज्ञान३३५।

बहै
मारी-मारी फिरे, खीजती फिरे।
क्रि. अ.
[हिं. बहना]
अपनो चाउ सारि उन लीन्हों तू काहै अब बृथा बहै री-१६६०।

बहैया
बहायी, प्रवाहित की।
क्रि. स.
[हिं. बहाना]
जिनि चरननि छलियौ बलि राजा, नख गंगा जु बहैया-१०-१३१।

बहोर
फेरा, वापसी।
संज्ञा
[हिं. बहुरना]

बहोर
फिर, पुनः, दोबारा।
क्रि. वि.

बहोरत
(पशुओं को चराने के पश्चात) घर की ओर हाँकता है।
क्रि. स.
[हिं. बहोरना]
कबहुँक रहसि देत आलिंगन कबहुँक दौरि बहोरति गाई-१३००।

बहोरना
लौटाना।
क्रि. स.
[हिं. बहोरना]

बहोरना
(पशुओं) को चराकर घर की ओर हाँकना।
क्रि. स.
[हिं. बहोरना]

बहोरि, बहोरी
पुनः, फिर।
क्रि. वि.
[हिं. बहोर]
(क) जद्यपि हो त्रयलोक के ईश्वर परसि दृष्टि चितवति न बहोरी-2८९०। (ख) धोखे ही बिरवा लगाइ कै काटत नाहिं बहोरी-३३ ८।

बहोरो, बहोरौ
लौटाओ, (पशु को) घर की और हाँको।
क्रि. स.
[हिं. बहोरना]
घर को गाय बहोरो मोहन ग्वालनि टेर सुनाए-९५८।

बहौं
(भार) लाद कर ले चलता हूँ, भार ढोता हूँ, वहन करता हूँ।
क्रि. अ.
[सं. वहन]
कबहुँक चढ़ौं तुरंग, महागज, कबहुँक भार बहौं-१-१६१।

बूझ्‌यौ
पूछा, प्रश्न किया।
क्रि. स.
[हिं. बूझना]
तहँ के बासी नृपति बुलाइ। बूझ्यौ, तब तिन कही सुनाइ-९-३।

बूट
चने का हरा पौधा।
संज्ञा
[सं. विटप]

बूट
चने का हरा दाना।
संज्ञा
[सं. विटप]

बूट
पेड़, पौधा।
संज्ञा
[सं. विटप]

बूटनि
बीरबहूटी' कीड़ा।
संज्ञा
[हिं. बहूटी]

बूटा
पौधा।
संज्ञा
[सं. विटप]

बूटा
बड़ी बूँटी।
संज्ञा
[सं. विटप]

बूटी
जड़ी, वनस्पति।
संज्ञा
[हिं. बूटा]

बूटी
भाँग।
संज्ञा
[हिं. बूटा]

बूटी
छोटी बूटी।
संज्ञा
[हिं. बूटा]

बूड़
डुबाव।
संज्ञा
[हिं. डूब]

बूड़त
डूबता है, निमज्जित होता है।
क्रि. अ.
[हिं. बूड़ना]
(क) मोह-समुद्र सूर बूड़त है, लीजै भुजा पसारि-१.१११। (ख) सूरदास प्रभु गोकुल बूड़त काहे न लेत उबारे-2७७४।

बूड़त
नष्ट होता है।
क्रि. अ.
[हिं. बूड़ना]
ताकी कहा कहौं सुनि सूरज बूड़त कुटुँब समेत-2-१५।

बूड़न
डूबना, निमंत्रित होना।
क्रि. अ.
[हिं. बूड़ना]

बूड़न
बूड़न लग्यौ-डूबने लगा।
यौ.
मंदराचल समुद्र माँहि बूड़न लग्यौ, तब सबनि बहुरि अस्तुति सुनाई-८.८।

बूड़ना
(जल या पानी आदि में) डूबना।
क्रि. अ.
[सं. बुड]

बूड़ना
लीन या निमग्न होना।
क्रि. अ.
[सं. बुड]

बूड़ा
(जल की) बाढ़।
संज्ञा
[हिं. डूबना]

बूड़ि
डूबकर।
क्रि. अ.
[हिं. डूबना]
बूड़ि मुए कै कहुँ उठि गए-१-२८४।

बूड़ी
डूब गयी।
क्रि. अ.
[हिं. बूड़ना]
सोक-सिंधु बूड़ी नँदरानी-५४७।

बूड़े
डूबता है, निमज्जित होता है।
क्रि. अ.
[हिं. बूड़ना]
कबहुँक तृन बूड़ै पानी में, कबहुँक सिला तरै-१-१०५।

बूड़्यौ
डूब गया, निमज्जित हो गया।
क्रि. अ.
[हिं. बूड़ना]
सूरदास कहै, सब जग बूड़्यौ, जुग-जुग भक्त तरयो-१.२९१।

बूढ़
बूढ़ा।
वि.
[हिं. बुड्ढा]

बूढ़
लाल रंग।
संज्ञा
[देश]

बूढ़
बीरबहूटी।
संज्ञा
[देश]

बूढ़ा
बूढ़ा।
संज्ञा
[हिं. बुड्ढा]

बूढ़ा
बुड्ढी स्त्री।
संज्ञा

बूत, बूता, बूते
बल, पराक्रम,शक्ति।
संज्ञा
[हिं. बित्त, बूता]
प्रेम न रुकत हमारे बूते-३३०५।

बूरना
डूबना।
क्रि. अ.
[हिं. डूबना]

बूरा
कच्ची चीनी।
संज्ञा
[हिं. भूरा]

बूरा
साफ चीनी।
संज्ञा
[हिं. भूरा]

बूरा
महीन चूर्ण।
संज्ञा
[हिं. भूरा]

बृंद
समूह, झुंड।
संज्ञा
[सं. बृद]
(क) कुमुद बृंद सँकुचित भए, भृंगलता भूले-१०.१०२। (ख) मनौ बेद बंदीजन सूत-बृंद मागध-गन, बिरद बदत जै जै जै जैति कैटभारे-१०-२०५।

बृंदाबन
वृन्दावन।
संज्ञा
[सं. वृंदावन]

बृंदाबन, चंद
वृन्दावन के चंद श्रीकृष्ण।
संज्ञा
[सं. वृदावन+चंद्र]
देखन दै बृदावन-चंदहिं-८०३।

बृंत्तांत
विवरण, समाचार, हाल, सूचना।
संज्ञा
[सं. वृत्तांत]
भारत के बीतैं पुनि आयौ। लोगनि सब बृत्तांत सुनायौ-१-२८४।

बृथा, बृथाई
व्यर्थ, निष्फल, निष्प्रयोजन।
क्रि. वि.
[सं. बृथा]
(क) सूर प्रभु जिहिं करै कृपा, जीतै सोई, बिनु कृपा जाइ उद्यम बृथाई-८-८। (ख) आजु कहा उद्यम करि आए। कहै, बृथा भ्रमि भ्रमि स्रम पाए-४-१२।

वृष
साँड़, बैल।
संज्ञा
[सं. वृष]

वृष
बारह राशियों में से दूसरी जिसमें १४१ तारे हैं एवं कृत्तिका नक्षत्र के अंतिम तीन पाद, पूरा रोहिणी नक्षत्र और मृगशिरा नक्षत्र के पहले दो पाद हैं।
संज्ञा
[सं. वृष]
बृष है लग्न, उच्च के निसिपति, तनहिं बहुत सुख पैहैं-१०-८६।

बृषपर्वा
एक दैत्य का नाम जिसने शुक्राचार्य को अपना पुरोहित बनाया था। शर्मिष्ठा इसकी पुत्री थी।
संज्ञा
[सं. वृषपर्वा]

बृहदारण्यक
एक उपनिषद्।
संज्ञा
[सं.]

बृहद्भानु
अग्नि।
संज्ञा
[सं.]

बृहद्भानु
सूर्य।
संज्ञा
[सं.]

बृहद्भानु
सत्यभामा के एक पुत्र का नाम।
संज्ञा
[सं.]

बृहद्रथ
इन्द्र।
संज्ञा
[सं.]

बृहद्रथ
शतधन्वा के पुत्र का नाम।
संज्ञा
[सं.]

बृहद्रथ
जरासंध के पिता का नाम।
संज्ञा
[सं.]

बृहन्नल
अर्जुन का एक नाम।
संज्ञा
[सं.]

बृहन्नल
बाँह, बाहु।
संज्ञा
[सं.]

बृहन्नला
अर्जुन का वह नाम जो अज्ञातवासकाल में राजा विराट की पुत्री को नाच-गाना सिखाने के लिए रखा गया था।
संज्ञा
[सं.]

बृषभ
बैल।
संज्ञा
[सं. वृषभ]

बृषभ
एक असुर।
संज्ञा
[सं. वृषभ]
अघ, बक, बृषभ, बकी, धेनुक हति, भव जलनिधि तै जु उबारे-१-२७।

बृषभानु
श्रीराधिका जीके पिता। ये पद्मावती के गर्भ से उत्पन्न सुरभानु के पुत्र थे। पहले ये रावल ग्राम में रहते थे और यहीं राधा का जन्म हुआ था; पश्चात् कंस के उपद्रवों से ऊबकर ये बरसाने जा बसे थे।
संज्ञा
[सं. वृषभानु]

बृषभास
एक दैत्य।
संज्ञा
[सं. वृषभ+ असुर]
बकी, बकासुर, सकट, तृनाब्रत, अघ, प्रलंब, बृषभास। कंस-केसि कौं वह गति दीनी, राखे चरन निवास-४८७।

बृषली
वृषल या शूद्र जाति की स्त्री।
संज्ञा
[सं. वृषली]
(क) क्यों दासी-सुत कैं पग धारे ? ... .। सुनियत हीन, दीन, बृषली-सुत, जाति-पाँति तै न्यारे-१-२४२। (ख) अजामिल बिप्र कनौज निवासी। सो भयौ बृषली कैं गृहवासी-६-४।

बृष्टि
वर्षा, बरसना।
संज्ञा
[सं. वृष्टि]

बृष्टि
ऊपर से बहुत सी चीजों का एक साथ गिरना।
संज्ञा
[सं. वृष्टि]
बान-बृष्टि स्रोनित करि सरिता, ब्याहत लगी न बार-९-१२४।

बृहत, बृहद
बहुत बड़ा, विशाल।
वि.
[सं. बृहत्]

बृहत, बृहद
बली, दृढ़।
वि.
[सं. बृहत्]

बृहत, बृहद
ऊँचा।
वि.
[सं. बृहत्]

बृहस्पति
देव-गुरु जिनके पिता अंगिरस थे और माता श्रद्धा थीं।
संज्ञा
[सं.]

बृहस्पति
सौर जगत का पाँचवाँ ग्रह।
संज्ञा
[सं.]

बग
मेढक।
संज्ञा
[सं. भेक]
जैसैं ब्याल बेंग कौ ढूके बेंग पखारी ताके हो।

बेंचति
बेंचती है।
क्रि. स.
[हिं. बेचना]
घर घर बेंचति फिरति दही री-१०-२९।

बेंचनहारी
बेचनेवाली।
संज्ञा
[हिं. बेंचना+हारी]
नंद ग्राम को मारग बूझै है कोउ दधि बेचनहारी-१२१२।

बेंचना
मूल्य लेकर देना।
क्रि. स.
[हिं. बेचना]

बेंचि
बेचकर, विक्रय करके।
क्रि. स.
[हिं. बेचना]
(क) विद्या बेंचि जीविका करिहौ-४-५। (ख) लाज बेंचि कूबरी बिसाही संग न छाँड़त एक घरी-2६७७।
बेंचि खाई - खो दी, गवाँ दी। उ. - पुरुष केरी सबै सोहै कूबरी के काज। सूर प्रभु की कहा कहिए बेंच खाई लाज-2७२७।

बेंट
औजार की मूठ।
संज्ञा
[देश.]

बेंड़
गिरती वस्तु को रोकने के लिए नीचे लगाई जानेवाली टेक या चाँड़।
संज्ञा
[हिं. बेड़ा=आड़ा]

बेंड़ा
तिरछा।
वि.
[हिं. आड़ा]

बे
बिना, बगैर।
अव्य.
[फा.]

बे
तिरस्कारसूचक संबोधन।
अव्य.
[हिं. हे]
बे ते करना - तिरस्कार के ढंग से बात करना।

बेअदब
अशिष्ट।
वि.
[का, बे + अ. अदब]

बेआब
जिसमें चमक न हो।
वि.
[फा. बे + आब]

बेआबरू
अप्रतिष्ठित।
वि.
[फा.]

बेइंसाफी
अन्याय।
संज्ञा
[फा.]

बेइज्जत
अप्रतिष्ठित।
वि.
[फा. बे+अ. इज्जत]

बेइज्जत
अपमानित।
वि.
[फा. बे+अ. इज्जत]

बेइज्जती
अप्रतिष्ठा।
संज्ञा
[हिं. बेइज्जत]

बेइज्जती
अपमान।
संज्ञा
[हिं. बेइज्जत]

बेंड़ा
कठिन।
वि.
[हिं. आड़ा]

बेंत
एक लता के डंठल की बनी हुई छड़ी।
संज्ञा
[सं. वेतस्]
छोरि उदर तैं दुसह दाँवरी, डारि कठिन कर बेंत-१०-३४९।
बेंत की तरह काँपना - बहुत डर कर काँपना।

बेंदली
बिंदी, टिकुली।
संज्ञा
[हिं. बिंदी]

बेंदा
गोल तिलक या टीका।
संज्ञा
[सं. बिंदु]

बेंदा
माथे की बड़ी बिंदी।
संज्ञा
[सं. बिंदु]

बेंदा
स्त्रियों के माथे का एक आभूषण।
संज्ञा
[सं. बिंदु]
नाना बिधि सिंगार बनाये बेंदा दीन्हौ भाल।

बेंदी
टिकली।
संज्ञा
[हिं. बिंदी]

बेंदी
शून्य।
संज्ञा
[हिं. बिंदी]

बेंदी
माथे की बिंदी।
संज्ञा
[हिं. बिंदी]
बेंदी भाल नैन नित आँजति निरखि रहति तनु गोरी।

बेंदी
माथे का वेंदी नामक गहना।
संज्ञा
[हिं. बिंदी]
(क) गुरुजन में बैठी आये हरि बेंदी सँवारन मिस पाइ लागी-११५४। (ख) बदन बिंद जराइ की बेंदी ता पर बनै सुधारत-2०८०।

बेइलि
बेला पुष्प।
संज्ञा
[हिं. बेला]

बेइलि
लता, बेल।
संज्ञा
[हिं. बेल]

बेईमान
अधर्मी।
वि.
[फा. बे +अ. ईमान]

बेईमान
अनाचारी।
वि.
[फा. बे +अ. ईमान]

बेईमान
जो विश्वास योग्य न हो।
वि.
[फा. बे +अ. ईमान]

बेईमानी
अधर्म।
वि.
[हिं. बेईमान]

बेईमानी
अनाचार, अन्याय।
वि.
[हिं. बेईमान]

बेकरार
विकल, व्याकुल।
वि.
[फा. बे+करार]

बेकल
बेचैन, व्याकुल।
वि.
[सं. विकल]

बेकली
बेचैनी।
संज्ञा
[हिं. बेकल]

बहौं
बह जाऊँ, डूब मरूँ।
क्रि. अ.
[हिं. बहना]
मेरे जिय में ऐसी आवत जमुना जाइ बहौं २७७४।

बह्यौ
बहा, प्रवाहित हुआ।
क्रि. अ.
[हिं बहना]
सूरदास उमँगे दोउ नैना सिंधू प्रवाह बह्यौ-१-२४७।

बह्यौ
भ्रम में पड़ा रहा, भटकता फिरा।
क्रि. अ.
[हिं बहना]
धोखैं ही धोखैं बहुत बह्यो-१-३२७।

बाँ
गाय की बोली।
संज्ञा
[अनु.]

बाँ
बार, वफा, मरतबा।
संज्ञा
[हिं. बार]

बाँक
बच्चों की बाँह का एक चन्द्राकार आभूषण।
संज्ञा
[सं. बंक]

बाँक
पैर का एक गहना।
संज्ञा
[सं. बंक]

बाँक
एक तरह की चौड़ी चूड़ी।
संज्ञा
[सं. बंक]

बाँक
धनुष।
संज्ञा
[सं. बंक]

बाँक
टेढ़ापन
संज्ञा
[सं. बंक]

बेकस
दीन, असहाय।
वि.
[फा.]

बेकाज
जिसे कोई काम न हो, निकम्मा, निठल्ला।
वि.
[फा. बे+काज ( कार्य )]
माधौ जू, मोहिं काहे की लाज। जनम-जनम यौं ही भरमायौ, अभिमानी, बेकाज-१-१५०।

बेकाज
बेमतलब, वृथा, व्यर्थ।
क्रि. वि
[फा. बे+काज ( कार्य )]
(क) हित की कहत कुहित की लागत इहाँ बेकाज अरौ -३०३६। (ख) रे अलि चपल मूढ़ रस-लंपट कतहिं बकत बेकाज-३१६१।

बेक़ाम
निकम्मा, निठल्ला।
वि.
[हिं. बे+काम]

बेक़ाम
व्यर्थ, निरर्थक।
क्रि. वि.
[हिं. बे+काम]
कतहिं बकत बेकाम काज बिन होहि न ह्याँ तें हातौ-३१३२।

बेकाबदे
नियमविरुद्ध।
वि.
[हिं. बे+फा. कायदा]

बेकार
निठल्ला, निकम्मा।
वि.
[हिं. बे+कार्य]

बेकार
व्यर्थ, निरर्थक।
क्रि. वि.
[हिं. बे+कार्य]

बेकारी
बेकार होने का भाव।
संज्ञा
[हिं. बेकार]

बेकसूर
निरपराध।
वि.
[हिं. बे+अ. कुसूर]

बेगाना
पराया।
वि.
[फ़ा.]

बेगाना
अनजान।
वि.
[फ़ा.]

बेगार
बिना मजदूरी दिये जबरदस्ती लिया गया काम।
संज्ञा
[फ़ा.]

बेगार
बेमन से किया गया काम।
संज्ञा
[फ़ा.]
बेगार टालना-जैसे-तैसे बेमन से काम पूरा कर डालना।

बेगि
चटपट, तुरन्त, शीघ्रता से, जल्दी से।
क्रि. वि.
[सं. वेग]
(क) लीजै बेगि निबेरि तुरत हीं सूर पतित कौ टांड़ौ-१-१४६। (ख) पठवहु बेगि गोहार लगावन सूरदास जिहि नाम-2७२६।

बेगुनाह
निरपराध, निर्दोष।
वि.
[फ़ा.]

बेचक
बेचनेवाला।
संज्ञा
[हिं. बेचना]

बेचन
बेचने के लिए।
संज्ञा
[हिं. बेचना]
मथुरा जाति हौं बेचन दहियौ-१०-३१३।

बेचनहारि
बेचनेवाली, वह स्त्री जो कोई वस्तु बेचती हो।
संज्ञा
[हिं. बेचना+हारी (प्रत्य.)]
हाट की बेचनहारी - गली-गली बेचनेवाली, क्षुद्र प्रकृति की नारी जो हाट-बाट में (वस्तु) बेंचती फिरती है। उ. - ब्रज की ढीठी गुवारि, हाट की बेचनहारि सकचै न देत गारि झगरत हूँ।

बेचना
मूल्य लेकर देना।
क्रि. स.
[सं. विक्रय]

बेखटक
निस्संकोच।
वि.
[हिं. बे+खटका]

बेखटक
बिना किसी संकोच के।
क्रि. वि.
[हिं. बे+खटका]

बेख़ता
निरपराध।
वि.
[हिं. बे+अ. खता]

बेख़बर
बेसुध।
वि.
[हिं. बे+फा. खबर]

बेख़ौफ
निडर।
वि.
[हिं. बे+फा. खौफ]

बेग
प्रवाह, बहाव।
संज्ञा
[सं. वेग]

बेग
तेजी, जोर।
संज्ञा
[सं. वेग]

बेग
जल्दी, शीघ्रता।
संज्ञा
[सं. वेग]

बेगम
रानी, राज्ञी।
संज्ञा
[तु.]

बेगरज
बिना मतलब के।
वि.
[हिं. बे+अ. गरज]

बेचारा
दीन, गरीब, असहाय।
वि.
[फ़ा.]

बेचैन
विकल, व्याकुल।
वि.
[फ़ा.]

बेचैनी
विकलता, बेकली।
संज्ञा
[फ़ा.]

बेजवान
गूँगा।
वि.
[हिं. बे+ फ़ा. जबान]

बेजवान
दीन।
वि.
[हिं. बे+ फ़ा. जबान]

बेजा
बुरा।
वि.
[फ़ा.]

बेजा
अनुचित।
वि.
[फ़ा.]

बेजान
मुरदा।
वि.
[फ़ा.]

बेजान
जिसमें बहुत कम दम या शक्ति हो।
वि.
[फ़ा.]

बेजान
निर्बल।
वि.
[फ़ा.]

बेठिकाने
जो अनुचित स्थान पर हो।
वि.
[हिं. बे+ठिकाना]

बेठिकाने
ऊल-जलूल।
वि.
[हिं. बे+ठिकाना]

बेठिकाने
व्यर्थ, निरर्थक।
वि.
[हिं. बे+ठिकाना]

बेड़
वृक्ष के चारों ओर लगायी गयी बाड़, मेंड़।
संज्ञा
[हिं. बाढ़]

बेड़ना
मेंड़ या थाला बाँधना।
क्रि. स.
[हिं. बेड़]

बेड़ा
लकड़ी, लट्ठों को बाँधने से बना ढाँचा जिस पर बैठकर नदी पार की जा सके।
संज्ञा
[सं. वेष्टन]
बेड़ा पार करना (लगाना) - संकट से पार करना। बेड़ा पार लगना (होना) - संकट से छुटकारा मिलना। बेड़ा डूबना - संकट से नाश हो जाना।

बेड़ा
नावों या जहाजों का समूह।
संज्ञा
[सं. वेष्टन]

बेड़ा
आड़ा।
वि.
[हिं. आड़ा का अनु.]

बेड़ा
कठिन।
वि.
[हिं. आड़ा का अनु.]

बेड़िन, बेड़िनी
नट जाति की स्त्री।
संज्ञा
[देश.]

बेजान
मुरझाया हुआ।
वि.
[फ़ा.]

बेजोड़
जिसमें जोड़ न हो।
वि.
[हिं. बे+जोड़]

बेजोड़
जिसके समान दूसरा न हो, अनुपम।
वि.
[हिं. बे+जोड़]

बेझर, बेझरा
गेहूँ जौ, चना आदि मिले हुए अनाज।
संज्ञा
[हिं. मझरना=मिलाना]

बेझा
निशाना, लक्ष्य।
संज्ञा
[सं. बेध]

बेटकी
पुत्री, बेटी।
संज्ञा
[हिं. बेटी]

बेटला, बेटवा, बेटा, बेटौना, बेट्टा
पुत्र, सुत, लड़का।
संज्ञा
[सं बटु=बालक, हिं. बेटा]

बेटला, बेटवा, बेटा, बेटौना, बेटा
बेटा-बेटी - संतान।
यौ.

बेटी
पुत्री, लड़की।
संज्ञा
[हिं. बेटी]
बूझत-स्याम, कौन तू गोरी। कहाँ रहति, काकी है बेटी-६७३।

बेठन
लपेटने का कपड़ा या कागज।
संज्ञा
[सं. वेष्टन]

बेड़ी
लोहे की जंजीर जो कैदियों को पहनायी जाती है, निगड़।
संज्ञा
[सं. वलय]

बेड़ी
छोटा बेड़ा।
संज्ञा
[हिं. बेड़ा]

बेडौल
भद्दे डीलडौल का।
वि.
[हिं. बे+डौल]

बेढंग, बेढंगा
जिसका ढंग ठीक न हो।
वि.
[हिं. बे+ढंग]

बेढंग, बेढंगा
जो ठीक ढंग से लगाया या रखा न गया हो।
वि.
[हिं. बे+ढंग]

बेढंग, बेढंगा
भद्दे रूप-रंग का।
वि.
[हिं. बे+ढंग]

बेढ
नाश, बरबादी।
संज्ञा
[देश.]

बेढ़न
बेठन, घेरा।
संज्ञा
[सं. वेष्टन]

बेढ़ना
घेरना।
क्रि. स.
[हिं. बेढ़न]

बेढब
बेढंगा, भद्दा।
वि.
[हिं. बे+ढब]

बेढब
बेधड़क बात कहनेवाला।
वि.
[हिं. बे+ढब]

बेढ़ा
हाथ का एक गहना।
संज्ञा
[हिं. बेढ़ना]

बेणी
चोटी, वेणी।
संज्ञा
[सं. वेणी]

बेणीफूल
शीश फूल नामक सिर का गहना।
संज्ञा
[सं. वेणी+हिं. फूल]

बेतकल्लुफ
निस्संकोच कार्य या व्यवहार करनेवाला।
वि.
[फ़ा. बे+अ. तकल्लुफ]

बेतना
प्रतीत होना।
क्रि. अ.
[सं. वेतना]

बेतरह
बहुत अधिक।
वि.
[फ़ा. बे+अ. तरह]

बेतवा
बुन्देलखंड की एक नदी जो भूपाल के ताल से निकलकर जमुना में मिलती है।
संज्ञा
[सं. वेत्रवती]

बेतहाशा
बहुत तेजी से।
क्रि. वि.
[फा. बे+अ. तहाशा]

बेतहाशा
बहुत घबड़ाकर।
क्रि. वि.
[फा. बे+अ. तहाशा]

बेताब
विकल, व्याकुल।
वि
[फा.]

बेताल
बैताल।
संज्ञा
[सं. वेताल]

बेताल
भाट, बंदी।
संज्ञा
[सं. वैतालिक]

बेतुका
बेमेल, बेढंगा।
वि
[हिं. बे+तुक]

बेद
भारतीय आर्यों के प्राचीन धार्मिक ग्रंथ जो चार हैं - ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद।
संज्ञा
[सं. वेद]

बेदन
वेदना।
संज्ञा
[सं. वेदना]
ज्यों अचेत बालक की बेदन अपने ही तन सहिए।

बेदम
जिसमें दम न हो।
वि.
[फा.]

बेदम
जिसमें शक्ति न हो।
वि.
[फा.]

बेदम
जो कामलायक न हो, जर्जर।
वि.
[फा.]

बेदर्द
निर्दयी, कठोर।
वि.
[फा.]

बेदाना
जिसमें बीज न हो।
वि.
[फा. बे + दाना]

बेदाना
मूर्ख, नासमझ।
वि.
[फा. बे + दाना]

बेदाम
बिना दाम का।
वि.
[हिं. बे+दाम]

बेदी
किसी शुभ या धार्मिक कार्य के लिए तैयार की हुई ऊँची भूमि, मंडप।
संज्ञा
[हिं. वेदी]
चलियै बिप्र जहाँ जग-बेदी, बहुत करी मनुहारी-८.१४।

बेध
छेद।
संज्ञा
[सं. वेध]

बेध
छेदने का भाव।
संज्ञा
[सं. वेध]

बेधड़क
बिना संकोच के।
क्रि. वि.
[हिं. बे+धड़क]

बेधड़क
बिना भय या आशंका के।
क्रि. वि.
[हिं. बे+धड़क]

बेधड़क
बिना रुकावट के।
क्रि. वि.
[हिं. बे+धड़क]

बेधड़क
बिना सोचे-समझे।
क्रि. वि.
[हिं. बे+धड़क]

बाँक
टेढ़ी छुरी।
संज्ञा
[सं. बंक]

बाँक
टेढ़ा
वि.
[हिं, बाँका]

बाँक
तिरछा, बाँका
वि.
[हिं, बाँका]

बाँकड़ा
वीर, साहसी।
वि.
[हिं. बाँका]

बाँकड़ी
बादले और कलाबत्तू का बना सुनहरा-रूपहला फीता जो साड़ियों में टाँका जाता है।
संज्ञा
[सं. बंक +ड़ी]

बाँकडोरी
एक शस्त्र।
संज्ञा
[हिं. बाँक]

बाँकना
टेढ़ा-तिरछा करना।
क्रि. स.
[सं. बंक]
बाल बाँकना - हानि पहुँचाना, कष्ट देना।

बाँकना
टेढ़ा-तिरछा होना।
क्रि. अ.

बाँकपन
टेढ़े-तिरछे होने का भाव।
संज्ञा
[हि. बाँका+पन]

बाँकपन
छैलापन।
संज्ञा
[हि. बाँका+पन]

बेधड़क
निसंकोची।
वि.

बेधड़क
निडर, निर्भय।
वि.

बेधत
छेदता है, सूराख करता है, भेदता है।
क्रि. स.
[हिं. बेधना]
पाहन पतित बान नहिं बेधत रीतो करत निषंग-१-३३२।

बेधना
बेधना, छेदना।
क्रि. स.
[सं. बेधन]

बेधना
शरीर में घाव करना।
क्रि. स.
[सं. बेधन]

बेधर्म
धर्म से गिरा हुआ।
वि.
[सं. विधर्म]

बेधीर
अधीर, व्याकुल।
वि.
[हिं. बे+धीर]
अधार-निधि बेधीर करिकै करत आनन हास।

बेधे
शरीर में घाव किये।
क्रि. स.
[हिं. बेधना]
बहुत सनाह समर सर बेधे, ज्यौं कंटक नल नाल-१-२७८।

बेधै
छेद दे, भेद दे, बेध डाले।
क्रि. स.
[हिं. बेधना]
अचरज कहा पार्थ जौ बेधै, तीनि लोक इक बान-१-२६९।

बेधै
घाव करे, घायल करे।
क्रि. स.
[हिं. बेधना]

बेन
मुरली, बाँसुरी।
संज्ञा
[सं. वेणु]

बेन
बाँस।
संज्ञा
[सं. वेणु]

बेन
एक वृक्ष।
संज्ञा
[सं. वेणु]

बेना
छोटा पंखा।
संज्ञा
[सं. वेणु]

बेना
खस, उशीर।
संज्ञा
[सं. वेणु]

बेना
बाँस।
संज्ञा
[सं. वेणु]

बेना
माथे का एक गहना।
संज्ञा
[सं. वेणी]

बेनागा
बिना नागा किये।
क्रि. वि.
[फ़ा. बे+अ. नागा]

बेनि
बालकों की चोटी।
संज्ञा
[हिं. बेनी]
कजरी कौ पय पियहु लाल, जासौं तेरी बेनि बढ़ै-१०-१७४।

बनिभूत
अनुपम, अद्वितीय।
वि.
[फा. बे + नमूना]

बेनी
गंगा, सरस्वती और यमुना का संगम, त्रिवेणी।
संज्ञा
[सं. वेणी]
सहस बार जौ बेनी परसौ चंद्रायन कीजै सौ बार। सूरदास भगवंत-भजन बिनु, जम के दूत खरे हैं द्वार-2-३।

बेनी
स्त्रियों की चोटी।
संज्ञा
[सं. वेणी]
सुभ स्रवननि तरल तरौन, बेनी सिथिल गुही-१०-२४।

बेनीपान
बेंदी (गहना)।
संज्ञा
[हिं. बेनी+पान]

बेनु
वंशी, मुरली, बाँसुरी।
संज्ञा
[सं. वेणु]
ताल, मृदंग, झाँझ, इंद्रिनि मिलि, बीना, बेनु बजायौ-१-२०५

बेनु
बाँस।
संज्ञा
[सं. वेणु]

बेनौटी
हलका पीला रंग।
संज्ञा
[हिं. बिनौला]

बेनौरी
ओला।
संज्ञा
[हिं. बिनौला]

बेपरवाह
बेफिक्र।
वि.
[फा.]

बेपरवाह
मनमौजी।
वि.
[फा.]

बेपाइ
बहुत घबराया हुआ।
वि.
[हिं. बे+सं. उपाय]

बेमुरव्वत
जिसमें शील या संकोच न हो।
वि.
[फ़ा.]

बर
बार, दफा।
संज्ञा
[हिं. बार]
बेर सूर की निठुर भए प्रभु, मेरौ कछु न सरयौ १-१३३।

बर
विलंब, देर।
संज्ञा
[हिं. बार]
(क) प्रभु, हौं बड़ी बेर को ठाढ़ौ। और पतित तुम जैसे तारे, तिनहीं मैं लिखि काढ़ौ-१-१३७। (ख) मेरे प्रान-जिवन-धन माधौ, बाँधे बेर भई-३८१।

बर
घड़ी, समय।
संज्ञा
[हिं. बार]
मरती बेर सम्हारन लागे जो कछु गाड़ि धरी-१-७१।

बर
एक छोटा खटमिट्ठा फल।
संज्ञा
[सं. बदरी]

बेरस
जिसमें रस न हो।
वि.
[हिं. बे+ रस]

बेरस
जिसमें स्वाद न हो।
वि.
[हिं. बे+ रस]

बेरस
जिसमें आनन्द न हो।
वि.
[हिं. बे+ रस]

बेरहम
निर्दय, निठुर।
वि.
[फ़ा. बे+रहम]

बेरा
समय, अवसर।
संज्ञा
[हिं. बेला]
सिव-आहुति-बेरा जब आई। विप्रनि दच्छहिं पूछयौ जाई-४-५।

बेपार
वाणिज्य, व्यापार।
संज्ञा
[सं. व्यापार]

बेपारी
व्यवसायी।
संज्ञा
[सं. व्यापारी]

बेपीर
दूसरों का दुख-दर्द न समझनेवाला, निर्दयी, निष्ठुर।
वि.
[हिं. बे+पीर]
सूरदास प्रभु दुखित जानिकै छाँड़ि गए बेपीर-2६८६।

बेफायदा
बिना किसी लाभ के।
क्रि. वि.
[फ़ा.]

बेफिक्र
जिसे कुछ चिन्ता न हो।
वि.
[फ़ा.]

बेबस
जिसका कुछ वश न चले।
वि.
[सं. विवश]

बेबस
पराधीन, परवश।
वि.
[सं. विवश]

बेबाक
चुकाया हुआ (ऋण आदि)।
वि.
[फ़ा.]

बेभाव
बिना हिसाब या गिनती के।
क्रि. वि.
[हिं.बे+भाव]

बेमन
बिना ध्यान लगाये।
क्रि. वि.
[हिं. बे+मन]

बेरा
सबेरा, प्रभात।
संज्ञा
[हिं. बेला]

बेरा
लकड़ी-लट्ठों का बेड़ा।
संज्ञा
[हिं. बेड़ा]

बेरा
नाव या जहाजों का समूह।
संज्ञा
[हिं. बेड़ा]

बेरिआ, बेरियाँ, बेरिया
समय, बेला, वक्त।
संज्ञा
[हिं. बेला, बिरियाँ]
(क) आवहु कान्ह, साँझ की बेरिया-१०-२४६। (ख) ग्वाल-मंडली मैं बैठे मोहन बट की छाँह, दुपहर बेरिया सखनि संग लीने-४६७।

बेरी
लोहे की जंजीर जो प्रायः कैदियों को पहनाई जाती है, बेड़ी, निगड़।
संज्ञा
[हिं. बेड़ी]
(क) पांडव सब पुरुषारथ छाँड़्यौ, बाँधे कपट-बचन की बेरी-१-२५१। (ख) पति अति रोष माँहि मन ही मन, भीषम दई बचन बँधि बेरी-१-२५२। (ग) प्रीतम भयो पाइ की बेरी-८०७।

बेरी
बेर, फल।
संज्ञा
[हिं. बेर (फल)]

बेरी
बार, दफा।
संज्ञा
[हिं. बार]

बेरी
देर।
संज्ञा
[हिं. बार]

बेरो
बेड़ा।
संज्ञा
[हिं. बेड़ा]
सूर मधुप उठि चले मधुपुरी बोरि जोग को बेरो-३४३१।

बेरोक
बेखटके।
क्रि. वि.
[हिं. बे+रोक]

बेलन, बलना
लकड़ी का लंबा गोल खंड जो रोटी-पूरी बेलने के काम आता है।
संज्ञा
[सं. वलन]

बेलना
बेलन की सहायता से चकले पर रोटी-पूरी आदि को तैयार करना।
क्रि. स.
[हिं. बेलन]
पापड़ बेलना - नुसीबतें और कठिनाइयाँ सहकर काम करना या समय काटना। (२) नष्ट करना। (२) पानी के छीटें उड़ाना।

बेलपत्र
बेल वृक्ष की पत्ती।
संज्ञा
[सं. बिल्वपत्र]

बेलसना
भोग करना।
क्रि. अ.
[सं. विलास+ना]

बेलहरा
पान की डिबिया।
संज्ञा
[हिं. बेल+हरा]

बेला
एक-छोटा पौधा जिसमें बहुत सुगंधित सफेद फूल लगते हैं।
संज्ञा
[सं. विचकिल, प्रा. बिअइल्ल]

बेला
बेले के फूल की तरह का एक गहना।
संज्ञा
[सं. विचकिल, प्रा. बिअइल्ल]

बेला
लहर।
संज्ञा
[सं. वेला]

बेला
तेल नापने की चमड़े की कुल्हिया।
संज्ञा
[सं. वेला]

बेला
कटोरा।
संज्ञा
[सं. वेला]
बेला भरि हलधर कौ दीन्हौ। पीवत पय बल अस्तुति कीन्हौ-३९६।

बेरौ
लकड़ी-लट्ठों का बना बेड़ा।
संज्ञा
[हिं. बेड़ा]
सेमर-ढाकहिं काटिकै बाँधौं तुम बैरौ-९-४२।

बेलंद
ऊँचा, उच्च।
वि.
[फ़ा. बलंद]

बेल
एक वृक्ष और उसका फल।
संज्ञा
[सं. बिल्व]

बेल
लता, बल्ली।
संज्ञा
[सं. वल्ली]
बेल मँढ़े चढ़ना - किसी काम में अभीष्ट क्रम से पूरी सफलता मिलना।

बेल
काम-काज के अवसर पर 'परजा' को दिया जानेवाला धन या नेग।
संज्ञा
[सं. वल्ली]

बेल
संतान, वंश।
संज्ञा
[सं. वल्ली]
बेल बढ़ना - वंश - वृद्धि होना।

बेल
बेल-बूटेदार रेशमी या मखमली फीता।
संज्ञा
[सं. वल्ली]

बेल
एक तरह की लंबी कुदाली।
संज्ञा
[सं. वल्ली]

बेलदार
मजदूर, कारीगर।
संज्ञा
[फ़ा.]

बेलन, बलना
लकड़ी, पत्थर आदि का कुछ लम्बा और गोल खंड।
संज्ञा
[सं. वलन]

बेला
समुद्र का किनारा।
संज्ञा
[सं. वेला]
बरनि न जाइ कहाँ लौ बरनौं प्रेम-जलधि वेला बल बोरे।

बेला
समय, वक्त।

बेलि
लता, बेल।
संज्ञा
[हिं. बेल]

बेलि
बेले का फूल।
संज्ञा
[हिं. बेला]

बेली
बेल, लता, बल्ली।
संज्ञा
[हिं. बेल]
(क) ते बेली कैसैं दहियत हैं, जे अपनै रस भेइ १-२००। (ख) फिरत प्रभु पूछत बन द्रुम-बेली-९-६४।

बेलौस
खरा, सच्चा।
वि.
[हिं. बे+फा. लौस]

बेवकूफ
मूर्ख, नासमझ।
वि.
[फ़ा. बेवकूफ]

बेवकूफी
मूर्खता, नासमझी।
वि.
[हिं. बेवकूफ]

बेवक्त
कुसमय में।
क्रि. वि.
[फ़ा. बेवक्त]

बेवफा
कृतघ्न।
वि.
[फ़ा. बे+अ. वफा]

बेवफा
बेमुरव्वत।
वि.
[फ़ा. बे+अ. वफा]

बेवरा
विवरण।
संज्ञा
[हिं. ब्योरा]

बेवस्था
प्रबंध, व्यवस्था।
संज्ञा
[सं. व्यवस्था]

बेवहरना
बरतना, व्यवहार करना।
क्रि. अ.
[सं. व्यवहार]

बेवहरिया
लेनदेन का व्यवहार करनेवाला, महाजन।
संज्ञा
[सं. व्यवहार+ हिं. इया]

बेवहरिया
मुनीम।
संज्ञा
[सं. व्यवहार+ हिं. इया]

बेवहार
बरताव, व्यवहार।
संज्ञा
[सं. व्यवहार]

बेवा
विधवा, राँड़।
संज्ञा
[फ़ा.]

बेवाई
बिवाई' नामक रोग।
संज्ञा
[हिं. बिवाई]

बेवान
रथ, यान।
संज्ञा
[सं विमान]

बाँकी
सजी - सजायी।
वि.

बाँकुर, बाँकुरा
टेढ़ा, तिरछा।
वि.
[हिं. बाँका]

बाँकुर, बाँकुरा
पैना, तेज धारवाला।
वि.
[हिं. बाँका]

बाँकुर, बाँकुरा
चतुर।
वि.
[हिं. बाँका]

बाँके
टेढ़े, तिरछे, बाँकापन लिये हुए।
वि.
[सं. बंक]
ससि-गन गरि रच्यौ बिधि आनन, बाँके नैननि जोहै-१०-१५८।

बाँके
वीर, साहसी।
वि.
[सं. बंक]
दुहुँ दिसि सुभट बाँके बिकट अति जुरे मनो दोउ दिसि घटा उमड़ि आई-१० उ०-१।

बाँकौ
अत्यन्त साहसी, वीर।
वि.
[सं. बंक]

बाँकौ
कठिन, कड़ा।
वि.
[सं. बंक]
नरहरि ह्वै हिरनाकुस मार्‌यौ, काम पर्‌यौ हो बाँकौ-१-५१३।

बाँग
आवाज।
संज्ञा
[फा.]

बाँग
पूकार।
संज्ञा
[फा.]

बेवान
आकाश-यान।
संज्ञा
[सं विमान]

बेवान
वृद्ध मनुष्य की अरथी।
संज्ञा
[सं विमान]

बेश
वस्त्र, पोशाक।
संज्ञा
[सं. वेश]

बेश
वस्त्र आदि पहनने का ढंग।
संज्ञा
[सं. वेश]

बेशऊर
नासमझ, फूहड़।
वि.
[फ़ा. बे+अ. शऊर]

बेशक
बिना शक-संदेह के।
क्रि. वि.
[फ़ा. बे+अ. शक]

बेशकीमती
बहुमूल्य।
वि.
[फ़ा. बेश+ अ. कीमती]

बेशरम
निर्लज्ज, बेहया।
वि.
[फ़ा. बेशर्म]
(क) बाँह पकरि तू ल्याई काको अति बेशरम गँवारि। (ख) ऐसे जन बेशरम कहावत-३००९।

बेशरमी
बेशर्मी निलज्जता, बेहयाई।
संज्ञा
[फा. बेशर्म]

बेशी
अधिकता।
संज्ञा
[फा.]

बेसा
वारांगना, वेश्या।
संज्ञा
[सं. वेश्या]

बेसा
वेश-भूषा।
संज्ञा
[सं. भेष]

बेसारा
बैठानेवाला।
वि.
[हिं. बैठाना, गुज. बैसाना]

बेसारा
जमाने या रखनेवाला।
वि.
[हिं. बैठाना, गुज. बैसाना]

बेसाहना
खरीदना।
क्रि. अ.
[देश.]

बेसाहना
साथ या पीछे लगाना।
क्रि. अ.
[देश.]

बेसाहा
खरीदा हुआ सौदा।
संज्ञा
[हिं. बेसाहना]

बेसी
अधिक।
क्रि. वि.
[फा. बेश.]

बेसुध
बेहोश। बेखबर।
वि.
[हिं. बे+सुध]

बेसुर
बेमेल स्वरवाला।
वि.
[हिं. बे+स्वर]

बेसनी
बेसन का बना हुआ।
वि.
[हिं. बेसन]

बेसबब
बिना कारण के।
क्रि. वि.
[फा.]

बेसबरा
धैर्य न रखनेवाला।
वि.
[फा. बे+अ. सब्र]

बेसमझ
मूर्ख।
वि.
[हिं. बे+समझ]

बेसर
नाक में पहनने का एक आभूषण, नथ।
संज्ञा
[देश.]

बेसरम
निर्लज्ज, बेहया, बेशर्म।
वि.
[फा. बेशर्म]
बाँह पकरि तू ल्याइ काकौं, अति बेसरम गँवारि। सूर स्याम मेरे आगे खेलत, जोबन-मद मतवारि-१०-३१४.

बेसरा
आश्रयहीन।
वि.
[फा. बे+सरा]

बेसरा
एक शिकारी पक्षी।
संज्ञा
[देश.]

बेसरि
नाक में पहनने की छोटी नथ।
संज्ञा
[देश.]
कच खुबि आँधरि काजर कानी नकटी पहिरै बेसरि-३०२६।

बेसवा
वारांगना, वेश्या।
संज्ञा
[सं. वेश्या]

बेशी
लाभ।
संज्ञा
[फा.]

बेशुमार
अनगिनती।
वि.
[फा.]

बेश्म
घर, गृह।
संज्ञा
[स.]

बेष
वस्त्राभूषणों से सजाना।
संज्ञा
[सं. वेश]

बेष
रूप, स्वरूप।
संज्ञा
[सं. वेश]
तुरत मोहिं गोकुल पहुँचावहु,-यह कहि कै सिसु बेष धरयौ-१०-८।

बेष्ठित
छाया हुआ, घिरा हुआ, लिपटा हुआ।
वि.
[सं. वेष्टित]
मुक्त-माल बिसाल उर पर, कछु कहौं उपमाइ। मनौ तारा-गननि बेष्ठित गगन निसि रहयौ छाइ-१०-२३४।’

बेसंदर
अग्नि।
संज्ञा
[सं. वैश्वनर]

बेसँभर
बेहोश।
वि.
[हिं. बे+सँभाल]

बेसन
चने की दाल का आटा।
संज्ञा
[देश]
बेसन मिलै सरस मैदा सौं अति कोमल पूरी है भारी-१०-२४१।

बेसन
बेसन के बने व्यञ्जन।
संज्ञा
[देश]
बरी, बरा, बेसन, बहु भाँतिनि, ब्यंजन बिबिध अगनियाँ.-१०-२३८।

बेसुरा
बेमेल स्वरवाला।
वि.
[हि. बे+स्वर]

बेसुरा
बेमौके , बेठिकाने।
वि.
[हि. बे+स्वर]

बेस्वाद
जिसमें कोई स्वाद न हो।
वि.
[हिं. बे+ स्वाद]

बेस्वाद
जिसका स्वाद बुरा हो।
वि.
[हिं. बे+ स्वाद]

बेहंगम
बेढंगा।
वि.
[सं. विहंगम]

बेहंगम
बेढब।
वि.
[सं. विहंगम]

बेह
छेद, छिद्र।
संज्ञा
[सं. वेध]

बेहतर
तुलना में बढ़कर।
वि.
[फ़ा.]

बेहतर
स्वीकृति-सूचक शब्द, स्वीकार है।
अव्य

बेहद
बहुत अधिक।
वि.
[फ़ा.]

बेहना
रुई धुननेवाला।
संज्ञा
[देश.]

बेहया
निर्लज्ज, बेशर्म।
वि.
[फ़ा.]

बेहयाई
निर्लज्जता, बेशर्मी।
संज्ञा
[फ़ा.]

बेहर
अचर।
वि.
[देश.]

बेहर
पृथक।
वि.
[देश.]

बेहरना
फटना, दरार पड़ना।
क्रि. अ.
[देश.]

बेहरा
अलग, पृथक्।
वि.
[देश.]

बेहराना
फाड़ना।
क्रि. स.
[सं. विदीर्ण]

बेहराना
फटना।
क्रि. अ.
[सं. विदीर्ण]

बेहान
आनेवाला दिन, कल।
क्रि. वि.
[हिं. बिहान]

बेहाल, बेहाला
व्याकुल, विकल, बेचैन।
वि.
[फा. बे+अ. हाल]
(क) काम-क्रोध-मद-लोभ-महाभय, अहनिसि नाथ, रहत बेहाल-१-१२७। (ख) मीड़त हाथ सकल गोकुल जन बिरह बिकल बेहाल-2५३६। (ग) मुरछि परी धरनी बेहाला-३४०८।

बेहिसाब
बहुत अधिक।
क्रि. वि.
[फ़ा. बे+अ. हिसाब]

बेहून
बिना, बगैर।
क्रि. वि.
[सं. विहीन]

बेहोश
बेसुध, मूर्छित।
वि.
[फ़ा.]

बैंगन
एक पौधा जिसके फल की तरकारी बनती है।
संज्ञा
[सं. वंगण ?]

बैगनी, बैंजनी
ललाई लिये नीले रंग का।
वि.
[हिं. बैंगन]

बैगनी, बैंजनी
बैंगन के टकड़े को बेसन में लपेटकर बनायी गयी पकौड़ी।
संज्ञा

बैडा
तिरछा।
वि.
[हि. बेड़ा]

बैडा
कठिन।
वि.
[हि. बेड़ा]

बै
आयु, अवस्था।
संज्ञा
[सं. वय]

बै
बेचना, बिक्री।
संज्ञा
[अ.]

बैकल
पागल, उन्मत्त।
वि.
[सं. विकल]

बैकुंठ
विष्णुलोक।
संज्ञा
[सं. वैकुंठ]
त्राहि-त्राहि द्रौपदी पुकारी, गई बैकुंठ अवाज खरी १-२४९।

बैखरी
व्यक्त और स्पष्ट वाणी।
संज्ञा
[सं. वैखरी]

बैखरी
वाक शक्ति।
संज्ञा
[सं. वैखरी]

बैखरी
वाग्देवी।
संज्ञा
[सं. वैखरी]

बैखानस
बानप्रस्थ आश्रम में रहनेवाला यति।
वि.
[सं. वैखानस]

बैजंती, बैजयंती
एक पौधा।
संज्ञा
[सं. वैजयंती]

बैजंती, बैजयंती
विष्णु की माला।
संज्ञा
[सं. वैजयंती]

बैठक
बैठने का स्थान, चौपाल, अथाई।
संज्ञा
[हिं. बैठना]

बैठक
वह आसन या पीठ जिस पर बैठा जाय।
संज्ञा
[हिं. बैठना]
(क) अति आदर करि बैठक दीन्हों-१२८५। (ख) हृदय माँह पिय घर करौं री नैनन बैठक देउँ-१२१५। (ग) गई भवन भीतर लिए तहँ बैठक दीन्हों–२१८२।

बैठक
मूर्ति, खम्भे आदि की चौकी।
संज्ञा
[हिं. बैठना]

बैठक
बैठने का कार्य, जमाव।
संज्ञा
[हिं. बैठना]

बैठक
अधिवेशन।
संज्ञा
[हिं. बैठना]

बैठक
बैठने का ढंग।
संज्ञा
[हिं. बैठना]

बैठक
संग-साथ, मेल।
संज्ञा
[हिं. बैठना]

बैठक
दीवट,बैठकी।
संज्ञा
[हिं. बैठना]

बैठक
एक तरह की कसरत।
संज्ञा
[हिं. बैठना]

बैठका
बैठने का स्थान, चौपाल।
संज्ञा
[हिं. बैठक]

बैठकी
बैठने का आसन,पीठ, पीढ़ा।
संज्ञा
[हिं. बैठक]
कनक-भूमि पर कर-पग-छाया यह उपमा इक राजति। करि-करि प्रतिपद प्रतिमनि बसुधा कमल बैठकी साजति-१०-११०।

बैठकी
उठनेबैठने की कसरत।

बैठकी
मूर्ति, खंभे आदि की चौकी।

बैठकी
बैठने का ढंग।

बैठत
बैठता है।
क्रि. अ.
[हिं. बैठना]
बैठत-उठत - उठते-बैठते, हर समय। उ. - बैठत-उठत सेज सोवत मैं कंस डरनि अकुलात-१०-१२।

बैठन
बैठने की क्रिया, भाव या ढंग।
संज्ञा
[हिं. बैठना]

बैठन
आसन, पीढ़ा।
संज्ञा
[हिं. बैठना]

बैठना
आसीन या स्थित होना।
क्रि. अ.
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]
बैठना-उठना-(१) समय बिताना। (२) साथ या संगत में रहना। उठ-बैठना - (१) जाग जाना। (२) लेटा न रहना।

बैठना
किसी खाली जगह में ठीक तरह से जमना।
क्रि. अ.
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]

बैठना
ठीक या अभ्यस्त होना।
क्रि. अ.
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]

बैठना
घुली हुई चीज का तल में इकट्ठा हो जाना।
क्रि. अ.
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]

बहकाना
भुलावा देना, फुसलाना।
क्रि. स.
[हिं. बहकना]

बहकाना
(बच्चे को) बहलाना।
क्रि. स.
[हिं. बहकना]

बहत
धारण करते हो, रखते हो, वहन करते हो।
क्रि. अ.
[हिं. बहना]
सूर पतित कौं ठौर नहीं, तौ बहत बिरद कत भारौ-१-१३१।

बहत
(वायु) संचालित होती है, (वायु) चलती है।
क्रि. अ.
[हिं. बहना]
बहत पवन, भरमत ससि-दिनकर, फनपति सीस न डुलावै-१-१६३।

बहत
बहता है, प्रवाहित होता है।
क्रि. अ.
[हिं. बहना]
चहुँ दिसि कान्ह्-कान्ह करि टेरत अँसुवन बहत पनारे-३४४६।

बहति
सत्पथ से भटकती है।
क्रि. अ.
[हि. बहना]
सूर प्रभु कौ ध्यान चित धरि अतिहि काहे। बहति।

बहती
प्रवाहित होती हुई।
वि.
[हिं. बहना]
बहती गंगा में हाथ धोना (पाव पखारना) - ऐसी चीज या अवसर से लाभ उठाना जिससे सब लाभ उठा रहे हों।

बहतोल
नाली।
संज्ञा
[हि. बहता]

बहन
भगिनी, सहोदरा।
संज्ञा
[हिं. बहिन]

बहना
प्रवाहित होना।
क्रि. अ.
[सं. वहन]

बाँकपन
सजावट
संज्ञा
[हि. बाँका+पन]

बाँका
टेढ़ा, तिरछा।
वि.
[सं. बंक]

बाँका
वीर, साहसी।
वि.
[सं. बंक]

बाँका
छैला, बना-ठना।
वि.
[सं. बंक]

बाँका
लोहे का एक टेढ़ा हथियार।
संज्ञा

बाँका
एक कीड़ा।
संज्ञा

बाँका
सजाया-सँवारा युवक।
संज्ञा

बाँकिया
नर्रसिंहा नामक बाजा।
संज्ञा
[सं. बंक]

बाँकी
लोहे का एक औजार।
संज्ञा
[हिं. बाँका]

बाँकी
टेढ़ी।
वि.

बैठवाना
पौधा लगवाना।
क्रि. स.
[हिं. बैठाना]

बैठाइ
बैठाकर, आसीन करके।
क्रि. स.
[हिं. बैठाना]
दाऊ जू कहि, हँसि मिले, बाँह गही बैठाइ-४३१।

बैठाए
स्थित किया, आसीन किया।
क्रि. स.
[हिं.. बैठाना]
अरघासन दै प्रभु बैठाए-९-६७।

बैठाना
आसीन या स्थित करना।
क्रि. स.
[हिं. बैठना]

बैठाना
आसीन होने को कहना।
क्रि. स.
[हिं. बैठना]

बैठाना
पद पर प्रतिष्ठित करना।
क्रि. स.
[हिं. बैठना]

बैठाना
किसी स्थान पर ठीक से जमना।
क्रि. स.
[हिं. बैठना]

बैठाना
अभ्यस्त करना।
क्रि. स.
[हिं. बैठना]

बैठाना
धुली हुई वस्तु को तल पर इकट्ठा करना।
क्रि. स.
[हिं. बैठना]

बैठाना
डुबाना, घँसाना।
क्रि. स.
[हिं. बैठना]

बैठना
समाना, अँटना।
क्रि. अ.
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]

बैठना
किसी स्त्री का पत्नी के समान रहने लगना।
क्रि. अ.
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]

बैठना
पक्षी का अंडे सेना।
क्रि. अ.
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]

बैठना
काम न मिलना या रहना।
क्रि. अ.
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]

बैठना
काम से नागा करना।
क्रि. अ.
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]

बैठना
अस्त हो जाना।
क्रि. अ.
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]

बैठना
स्त्री का रजस्वला होना।
क्रि. अ.
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]

बैठनि
बैठने की क्रिया, भाव या ढंग।
संज्ञा
[हिं. बैठना]
धन्य यह मिलनि धन्य यह बैठनि धन्य अनुराग नहीं रुचि थोरी-पृ. ३१० (४)। (ख) लोचन भए पखेरू माइ।….। मोर मुकुट टाटी मानौं यह बैठनि ललित त्रिभंग-2८९० (ना.)।

बैठवाँ
दबा या बैठा हुआ।
वि.
[हिं. बैठना]

बैठवाना
बैठाने को प्रवृत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. बैठाना]

बैठना
नीचे की ओर जाना, धँस जाना।
क्रि. अ.
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]

बैठना
पचक जाना, धँसना।
क्रि. अ.
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]

बैठना
चलता हुआ कार्य-व्यापार बिगड़ जाना।
क्रि. अ.
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]

बैठना
तौल में निकलना।
क्रि. अ.
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]

बैठना
खर्च होना।
क्रि. अ.
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]

बैठना
गुड़ का पिघल जाना।
क्रि. अ.
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]

बैठना
पकाने पर चावल का गीला हो जाना।
क्रि. अ.
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]

बैठना
सवार होना।
क्रि. अ.
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]

बैठना
पौधे का जमना या लगना।
क्रि. अ.
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]

बैठना
पद पर स्थित होना।
क्रि. अ.
[सं. वेशन, बिष्ठ., प्रा. बिट्ठ+ना]

बैताल, बैतालिक
राजा का वह सेवक जो स्तुति-पाठ कर उन्हें जगाता था।
संज्ञा
[सं. वैताल, वैतालिक]

बैद
चिकित्सक, वैद्य।
संज्ञा
[सं. वैद्य]

बैदई, बैदक
वैद्य का कार्य।
संज्ञा
[हिं. बैद]

बैदूर्य
लहसुनिया रत्न।
संज्ञा
[सं. वैदूय्‌‌र्य]

बैदेही
जनक की पुत्री जानकी।
संज्ञा
[सं. वैदेही]

बैद्य
चिकित्सक।
संज्ञा
[सं. वैद्य]
(अश्विनि-सुत) कह्यौ, हम जज्ञ-भाग नहिं पावत। बैद्य जानि हमकौं बहरावत-९-३।

बैद्यक
वैद्य का कार्य-व्यापार।
संज्ञा
[हिं. वैद्य]

बैन
वचन, बात।
संज्ञा
[सं. वचन, प्रा. वयन]
किलकि-किलकि बैन कहत मोहन मृदु रसना-१०-९०।

बैन
शोकसूचक वाक्य।
संज्ञा
[सं. वचन, प्रा. वयन]

बैन
व्यंग्य वाक्य।
संज्ञा
[सं. वचन, प्रा. वयन]

बैठारौ
बैठाया, स्थित किया, रखा।
क्रि. स.
[हिं. बैठाना]
बाहिर बाँधि सुतहिं बैठारौ। मथति दही माखन तोहिं प्यारौ-३९१।

बैठालना
बैठाना।
क्रि. स.
[हिं. बैठाना]

बैठावन
बैठाने की क्रिया, भाव या ढंग।
संज्ञा
[हिं. बैठाना]
पाइन परि सब बधू महरि बैठावन रे-१०-२५।

बैठाव
स्थित करावे।
क्रि. स.
[हिं. बैठाना]
हाथहिं पर तोहिं लीन्हे खेलै नैंकु नहीं धरनी बैठावै-१०-१९१।

बैठिबे
स्थित या आसीन होने का भाव, कार्य या ढंग।
संज्ञा
[हिं. बैठना]
ध्रुव खेलत-खेलत तहँ आए। गोद बैठिबे कौं पुनि धाए-४-९।

बैठे
स्थित हैं, आसीन हैं।
क्रि. अ.
[हिं. बैठना]
सुनि देवकी को हितू हमारे। असुर कंस अपबंस बिनासन, सिर ऊपर बैठे रखवारे-१०-१०।

बैठैं
स्थित हों, आसीन हों, बैठें।
क्रि. अ.
[हिं. बैठना]
मेरैं संग आइ दोउ बैठैं, उन बिनु भोजन कौने काम-१०-२३५।

बैढ़ना, बैड़ना
रोकना, बन्द करना।
क्रि. स.
[हिं. बाड़ा]

बैत
पद्य, इलोक।
संज्ञा
[अ.]

बैतरनी
यम के द्वार के पास की एक कल्पित पौराणिक नदी।
संज्ञा
[सं. वैतरणी]

बैठाना
पचकाना, दबाना।
क्रि. स.
[हिं. बैठना]

बैठाना
कार्य-व्यापार चलता न रहने देना।
क्रि. स.
[हिं. बैठना]

बैठाना
फेंक या चलाकर किसी स्थान पर पहुँचाना।
क्रि. स.
[हिं. बैठना]

बैठाना
सवार कराना।
क्रि. स.
[हिं. बैठना]

बैठाना
जमीन में गाड़ना या जमाना।
क्रि. स.
[हिं. बैठना]

बैठाना
किसी स्त्री को पत्नी के रूप में रख लेना।
क्रि. स.
[हिं. बैठना]

बैठाना
बेकाम कर देना।
क्रि. स.
[हिं. बैठना]

बैठार
बैठाकर।
क्रि. स.
[हिं. बैठालना]
बहुरौ गोद माँहि बैठार। कह्यौ, पढ़ेकहबिद्या-सार-2।

बैठारना
बैठाना।
क्रि. स.
[हिं. बैठालना]

बैठारिहौं
बैठालूँगा, आसीन करूँगा।
क्रि. स.
[हिं. बैठालना]
तोहिं बैठारिहौं नाव मैं हाथ गहि, बहुरि हम ज्ञान तोहिं कहि सुनावै-८-१६।

बनतेय
गरुड़।
संज्ञा
[सं. वैनतेय]

बैना
भेंट रूप में भेजी गयी मिठाई।
संज्ञा
[सं. वायन]

बैना
बोना।
क्रि. स.
[सं. वयन]

बैपार
काम-धंधा।
संज्ञा
[सं. व्यापार]

बैपारी
व्यवसायी, रोजगारी।
संज्ञा
[सं. व्यापारी]

बैयर
स्त्री।
संज्ञा
[हिं. बहुअर]

बैयर
बैर, द्वेष।
संज्ञा
[हिं. बैर]

बैया
घुटनों के बल।
क्रि. वि.
[अनु. पैयाँ]

बैया
जुलाहे की कंघी।
संज्ञा.
[सं. बाय]

बैर
विरोध, शत्रुता।
संज्ञा
[सं. वैर]

बैर
दुर्भाव, द्रोह, द्वेष।
संज्ञा
[सं. वैर]
बैर काढ़ना (निकालना) - बदला लेना। बैर काढ़त - बदला लेता है। उ. - यहि बिधि सब नवीन पायौ ब्रज काढ़त बैर दुरासी। बैर ठहना (ठानना) - दुर्भाव रखना। बैर ठयौ - दुर्भाव हो गया है। उ. - कालि नहीं यहि मारग ऐहौं, ऐसौ मोसौं बैर ठयौ। बैर डालना विरोध पैदा करना। बैर पड़ना - शत्रु बनकर कष्ट पहुँचाना। बैर परै - शत्रु बन जाय, विरोध करे। उ. - (क) जाकौं मनमोहन अंग करै। ताकौ केस खसै नहिं सिर तैं जौ जग बैर परै-१- ३७। (ख) कुटुंब बैर मेरे परे बैरिनि बैरि सिसुपाल-४१८८ (ना.)। बैर बढ़ाना - दुर्भाव उत्पन्न करना। बैर बढ़ैहै - दुर्भाव उत्पन्न करेगी। उ. - सुनहु सूर रस छकी राधिका बातन बैर बढ़ैहै-१२६३। बैर बढ़ैहौ - दुर्भाव उत्पन्न करोगी। उ. - आवत जात रहत याही पथ मोसौं बैर बढ़हौ। बैर बिसाहना (मोल लेना) व्यर्थ ही शत्रु बना लेना। बैर मानना - दुर्भाव या द्वेष रखना। बैर लेना - बदला लेना। बैर लेहु - बदला लो। उ. - भ्राता-बैर लेहु तुम जाइ-७- २। लैहौं बैर - बदला लूँगा। उ. - लैहौं बैर पिता तेरे को जैहै कहाँ पराई।

बैर
बेर का पेड़ या फल।
संज्ञा
[हिं. बेर (फल)]

बैरख
सेना का झंडा, ध्वजा, पताका।
संज्ञा
[तु. बैरक]
सोई करौ जु बसतै रहियै, अपनौ धरियै नाउँ। अपने नाम की बैरख बाँधौ, सुबस बसौं इहिं गाउँ-१-१८५।

बैराखी
भुजा का एक गहना।
संज्ञा
[हिं. बाहु+ राखी]

बैराग
विरक्ति।
संज्ञा
[सं. वैराग्य]
मानौ बैराग पाइ, सकल सोक-गृह बिहाइ, प्रेम-मत्त फिरत भृत्य, गुनत गुन तिहारे-१०-२०५।

बैरागी
वैष्णव साधुओं का एक वर्ग।
संज्ञा
[सं. विरागी]

बैरागी
विरक्त।
वि.

बैराग्य
विरक्ति।
संज्ञा
[सं. वैराग्य]

बैराना
वायु प्रकोप से बिगड़ना।
क्रि. अ.
[हिं. वायु]

बैरी
शत्रु, द्वेषी।
वि.
[सं. बैरी]
जो भक्तनि सौं बैर करत है, सो बैरी निज मेरौ-१-२७२।

बैरी
विरोधी।
वि.
[सं. बैरी]

बैरी
व्यक्ति जो शत्रुता या द्वेष रखता हो।
संज्ञा
रंगभूमि मैं कंस पछारौं धीसि बहाऊँ बैरी-१०-१७६।

बैरोचन
विरोचन का पुत्र, राजा बलि।
संज्ञा
[सं. बैरोचन]
जज्ञ करत बैरोचन कौ सुत, बेद-बिहित बिधि-कर्मा-१-१०४।

बैल
वृषभ, बलीवर्द।
संज्ञा
[सं बलद]
प्रभु जू, यौं कीन्हीं हम खेती।...। काम-क्रोध दोउ बैल बली मिलि, रज-तामस सब कीन्हौ। अति कुबुद्धि मन हाँकनहारे, माया जूआ दीन्हौ-१-१८५।

बैल
मूर्ख या बुद्धिहीन व्यक्ति।
संज्ञा
[सं बलद]

बैवस्वत
सूर्य के एक पुत्र का नाम।
संज्ञा
[सं. वैवस्वत]
सूरज कैं बैवस्वत भयौ। सुत-हित सो बसिष्ठ पै गयौ-९-२।

बैषानस
तपस्वी।
संज्ञा
[सं. वैखानस]

बैसंदर
अग्नि।
संज्ञा
[सं. वैश्वानर]

बैस
अवस्था, आयु, उम्र।
संज्ञा
[सं. वयस्]
(क) हम तुम सब बैस एक, को कारौं को अगरौ-१०-३३६। (ख) जिन कीन्हे मोहन सुबस बैस ही थोरी-४२८६ (ना.)।
बैस चढ़ै - युवावस्था को प्राप्त हो, जवानी आए।

बैस
अवस्था में वृद्धि हो।
संज्ञा
[सं. वयस्]
कजरी कौ पय पियहु लाल, जासौं तेरी बेनि बढ़ैं। जैसै देखि और ब्रज बालक, त्यौं बल-बैस चढ़ै-१०-१७४।

बैस
वैश्य जाति।
संज्ञा
[सं. वैश्य]

बैस
क्षत्रियों की एक शाखा।
संज्ञा

बैसना
बैठना।
क्रि. अ.
[हिं. बैठना]

बैसवाड़ा, बैसवारा
अवध का पश्चिमी प्रान्त जहाँ बैस क्षत्रियों की बस्ती थी।
संज्ञा
[सं. बैस]

बैसाख
चैत के बाद का महीना।
संज्ञा
[सं. बैशाख]

बैसाखी
बैसाख की पूर्णिमा।
संज्ञा
[हिं. बैसाख]

बैसाखी
लँगड़े के सहारे की लाठी।
संज्ञा
[सं. वैशाख]

बैसारना
बैठाना।
क्रि. स.
[हिं. बैसना]

बैसी
बैठी (है)।
क्रि. अ.
[हिं. बैसना]
ठाली बैसी है - कोई काम-धाम नहीं है, निठल्ली है। उ. - ऐसी को ठाली बैसी है तो सौं मूड़ लड़ावै-३२८७।

बैसैं
बैठे, बैठे रहकर।
क्रि. स.
[हिं. बैसना]
जनम सिरानौ ऐसैं। कै घर-घर भरमत जदुपति बिनु, कै सोवत, के बैसैं-१-२९३।

बाँग
नमाज की अजान।
संज्ञा
[फा.]

बाँग
मुर्गे का शब्द।
संज्ञा
[फा.]

बाँगड़ू
मूर्ख, दुर्बुद्धि।
वि.
[हिं. बाँगर]

बाँगर
एक तरह का बैल।
संज्ञा
[देश.]

बाँगुर
जाल, फंदा।
संज्ञा
[देश.]

बाँचत
पढ़ता है।
क्रि. स.
[हिं. बाँचना]
सोई तिथि-बार-नछत्र-लगन-ग्रह सोइ जिहिं ठाट ठयौ। तिन अंकनि कोउ फिरि नहिं बाँचत गत स्वारथत समयौ-१-२९८।

बाँचना
पढ़ना।
क्रि. स.
[सं. वाचन]

बाँचना
शेष रहना, बच जाना।
क्रि. स.
[सं. बचना]

बाँचना
छोड़ देना, बचा लेना।
क्रि. स.
[हिं. बचाना]

बाँचि
पढ़कर।
क्रि. स.
[हिं. बाँचना]
(क) कर्म-कागद बाँचि देखौ, जौ न मन पतियाइ-१-२१६। (ख) तब उन बाँचि सुनाई -२९७८।

बैहर
हवा, वायु।
संज्ञा
[सं. वायु]

बैहाल
बुरा हाल।
संज्ञा
[हिं. बिहाल]

बैहौं
बोऊँगा।
क्रि. स.
[हिं. बोना]
देहौं छाँडि राखिहौं यह ब्रत हरि हितु बीजु बहुरि को बैहौं-2५२४।

बोआई
बोने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
संज्ञा
[हिं. बोना]

बोइए, बोइयै
बीज जमाइए, उगाइये, पैदा कीजिए।
क्रि. स.
[हिं. बोना]
(क) जैसोइ बोइयै तैसोइ लुनिए, कर्मन भोग अभागे-१-६१। (ख) जैसौ बीज बोइए तैसौ लुनिए लोग कहत सब बावरी-३३३१।

बोक, बोकरा
बकरा।
संज्ञा
[हिं. बकरा]

बोकरी
बकरी।
संज्ञा
[हिं. बकरी]

बोकला
छिलका।
संज्ञा
[हिं. बकला]

बोकला
छाल।
संज्ञा
[हिं. बकला]

बोज
घोड़ों का एक भेद।
संज्ञा
[देश]

बोझ
भार, बोझा।
संज्ञा
[देश]
(क) सूरदास भगवंत-भजन बिनु धरनी जननि बोझ कत मारी ?-१-३४। (ख) जोग मोट सिर बोझ आनि तुम कत धौं घोष उतारी-३३१६।

बोझ
भारीपन।
संज्ञा
[देश]

बोझ
कठिन काम।
संज्ञा
[देश]

बोझ
खटका, चिंता।
संज्ञा
[देश]

बोझ
कार्यसंपादन का श्रम या कष्ट।
संज्ञा
[देश]

बोझ
वस्तु या व्यक्ति के संबन्ध-निर्वाह का भार।
संज्ञा
[देश]

बोझ
गट्ठा।
संज्ञा
[देश]

बोझ
भार जो एक बार में लादा जाय।
संज्ञा
[देश]
बोझ उठना- कार्य-भार लिया जा सकना। बोझ उठाना - कार्य-भार का दायित्व लेना। बोझ उतरना-कठिन कार्य या दायित्व से छुटकारा पाना। बोझ उतारना - कठिन कार्य या दायित्व से छुटकारा दिलाना। (२) ऐसा कार्य करना या स्वयं दायित्व ले लेना, जिससे दूसरे की चिंता दूर हो जाय। (३) बेमन से काम करके बेगार-सी टालना।

बोझना
भार लादना।
क्रि. स.
[हिं. बोझ]

बोझल
भारी, गुरु।
वि.
[हिं. बोझ]

बोझा
बोझ, भार।
संज्ञा
[हिं. बोझ]

बोझिल
भारी, गुरु।
वि.
[हिं. बोझ]

बोटा
लट्ठा, कुंदा।
संज्ञा
[सं. बोण्ट]

बोटी
मांस का छोटा टुकड़ा।
संज्ञा
[हिं. बोटा]

बोड़
सिर का एक आभूषण।
संज्ञा
[देश.]

बोड़री
तोंदी, नाभि।
संज्ञा
[हिं. बौंडी]

बोड़ा
बड़ा साँप, अजगर।
संज्ञा
[देश.]

बोड़ा
लोबिए की फली।
संज्ञा
[देश.]

बोड़ी
दमड़ी, कौड़ी।
संज्ञा
[देश.]

बोड़ी
तोंदी, नाभि।
संज्ञा
[हिं. बौंड़ी]

बोत
घोड़ों की एक जाति।
संज्ञा
[देश.]

बोदा
मूर्ख।
वि.
[सं. अबोध]

बोदा
सुस्त, मट्ठर।
वि.
[सं. अबोध]

बोदा
फुसफुसा !
वि.
[सं. अबोध]

बोदापन
मूर्खता, नासमझी।
संज्ञा
[हिं. बोदा+पन]

बोदापन
फुसफुसापन, फुसफुसा होने का भाव।
संज्ञा
[हिं. बोदा+पन]

बोध
शाल, जानकारी।
संज्ञा
[सं.]

बोध
धीरज, संतोष।
संज्ञा
[सं.]

बोधक
जताने-बतानेवाला।
संज्ञा
[सं.]

बोधक
श्रृंगार रस का एक हाब जिसमें संकेत या क्रिया द्वारा मन का भाव जताया जाता है।
संज्ञा
[सं.]

बोधगम्य
समझ में आने योग्य।
वि.
[सं.]

बोधत
समझाते हैं।
क्रि. स.
[हिं. समझाना]
पुनि पुनि बोधत कृष्न लिखौ नहिं मेटै कोई-2६२५।

बोधति
समझाती-बुझाती है।
क्रि. स.
[हिं. बोधना]
(क) एकनि माथै दूब-रोचना, एकनि कौं बोधति दै धीर-१०-२५। (ख) सुनहु सूर जसुमति सुत बोधति बिधि के चरित सबै हैं न्यारे-६०८।

बोधति
ज्ञान सिखाती है।
क्रि. स.
[हिं. बोधना]

बोधन
समझाना, जताना।
संज्ञा
[सं.]

बोधन
उपदेश।
संज्ञा
[सं.]

बोधन
मंत्र जगाना।
संज्ञा
[सं.]

बोधना
समझाना-बुझाना।
क्रि. स.
[सं. बोधन]

बोधना
ज्ञान सिखाना, जताना।
क्रि. स.
[सं. बोधन]

बोधि
समझा-बुझाकर।
क्रि. स.
[हिं. बोधना]
सूर प्रभु कियौ बिस्राम सब निसि तहाँ बोधि अक्रूर निज घर पठाए-2५७०।

बोधि
पीपल का पेड़।
संज्ञा
[सं.]

बोधितरु, बोधिद्रुम, बोधिवृक्ष
गया नगर का पीपल का वह पेड़ जिसके नीचे गौतम बुद्ध ने बुद्धत्व प्राप्त किया था।
संज्ञा
[सं.]

बोधिसत्व
जो बुद्धत्व प्राप्त करने का अधिकारी हो, परंतु उसे प्राप्त न कर पाया हो।
संज्ञा
[सं.]

बोधी
समझाया।
क्रि. स.
[हिं. बोधना]
सूर यह कहि जननि बोधी, देख्यौ तुमहीं आइ-५८०।

बोना
उगाने के लिए बीज को जमीन में छितराना या डालना।
क्रि. स.
[सं. वपन]

बोना
इधर-उधर डालना या छितराना।
क्रि. स.
[सं. वपन]

बोबा
स्तन, थन।
संज्ञा
[देश.]

बोबा
साजसामान।
संज्ञा
[देश.]

बोबा
गठरी।
संज्ञा
[देश.]

बोय
सुगंध।
संज्ञा
[फा. बू]

बोय
दुर्गध।
संज्ञा
[फा. बू]

बोयौ
उगाया, अंकुरित किया।
क्रि. स.
[हिं. बोना]

बोयौ
फेंका, डाला, बहाया।
क्रि. स.
[हिं. बोना]
कंस, केसि, चानूर, महाबल करि निरजीव जमुनजल बोयौ-१-५४।

बोयौ
बोया या उपाया हुआ।
वि.
अपनौ बोयौ आप लोनिए तुम आपहिं निरुवारौ ३२९४।

बोर
[हिं. बोरना]
संज्ञा
डुबाव।

बोर
कँगूरेदार धुंघरू जो आभूषणों में गूँथा जाता है।
संज्ञा
[सं. वत्तुल]

बोर
सिर का एक गहना।
संज्ञा
[सं. वत्तुल]

बोर
गड्ढा, खड्ड, बिल।
संज्ञा
[देश.]

बोरत
डुबाता है, बोरता है, निमग्न करता है।
क्रि. स.
[हिं. बोरना]
यह भव-जल कलिमलहिं गहे हैं, बोरत सहस प्रकारौ-१-२०९।

बोरति
बोरती, डुबाती या निमग्न करती है।
क्रि. स.
[हिं. बोरना]
गोलक नाउ निमेष न लागत सो पलकनि बर बोरति-३४५४।

बोरन
बोरने या डुबाने के लिए।
क्रि. स.
[हिं. बोरना]
गर्व सहित आयो ब्रज बोरन, यह कहि मेरी भक्ति घटाई-९९६।

बोरना
डुबाना।
क्रि. स.
[हिं. बूड़ना]

बोरना
पानी में डालकर तर करना।
क्रि. स.
[हिं. बूड़ना]

बोरना
बदनाम करना।
क्रि. स.
[हिं. बूड़ना]

बोरना
मिलाना।
क्रि. स.
[हिं. बूड़ना]

बोरना
रंग के घोल में डालकर रँगना।
क्रि. स.
[हिं. बूड़ना]

बोरा
टाट का बड़ा थैला।
संज्ञा
[सं. पुर]

बोरा
छोटा घुँघरू।
संज्ञा
[हिं. बोर]

बोरा
डुबोया।
क्रि. स.
[हिं. बोरना]

बोरि
पानी में डुबोकर।
क्रि. स.
[हिं. बोरना]
सूर मधुप उठि चले मधुपुरी बोरि जोग को बेरौ-३४३१।

बोरि
पानी की बाढ़ में बहाकर।
क्रि. स.
[हिं. बोरना]
बल समेत निसि बासर बरसह गोकुल बोरि पताल पठावहु-९४७।

बोरि
सुगंधित जल या रंग में डुबोकर।
क्रि. स.
[हिं. बोरना]
रचि स्रक कुसुम सुगंध सेज सजि बसन कुमकुमा बोरि-2८१२।

बोरि
लपेटकर, मिलाकर, सानकर।
क्रि. स.
[हिं. बोरना]
नील पुट बिच मनौ मोती धरे बंदन बोरि-१०-२२५।

बोरिया
टाट का छोटा थैला।
संज्ञा
[हिं. बोरा]

बोरिया
चटाई, बिस्तर।
संज्ञा
[फा.]
बोरिया-बँधना उठाना ( समेटना) - चलने की तैयारी करना।

बोरी
डुबो दी, निमग्न कर दी।
क्रि. स.
[हिं. बोरना]
धन-जोबन अभिमान अल्प जल, काहे कूर आपनी बोरी-१-३०३।

बोरी
डुबाकर भिगोई हुई, अच्छी तरह तर की हुई, रस से भरी हुई।
वि.
सुठि सरस जलेबी बोरी। जिहिं जेंवत रुचि नहिं थोरी-१०-१८३।

बोरे
डुबाये हुए, तर किये हुए।
वि
[हिं. बोरना]
घेवर अति घिरत चभोरे। लै खाँड़ सरस रस बोरे-१०-१८३।

बोरे
डुबाये, निमग्न किये।
क्रि. स.

बोरै
डुबा देने से, बोरने से, निमज्जित करने से।
क्रि. स.
[हिं. बोरना]
प्रेम के सिंधु को मर्म जान्यौ नहीं, सूर कहि कहा भयै देह बोरैं-१-२२२।

बोरौं
पानी की बाढ़ में डुबो दूँ,या डुबोकर बहा हूँ।
क्रि. स.
[हिं. बोरना]
ब्रज बोरौं प्रलय के पानी-१०२४।

बौरयौ
डुबाया, निमग्न किया।
क्रि. स.
[हिं. बोरना]
प्रीति नदी महँ पाँव न बोरयौ दृष्टि न रूप परागी-३३३५।

बौरयौ
कलंकित किया, बदनाम किया।
क्रि. स.
[हिं. बोरना]
कैसै नाथहिं मुख दिखराऊँ, जौ बिनु देखे जाउँ। बानर बीर हँसैंगे मोकौं, तैं बोरयौ पितु नाउँ-९-७५।

बोल
वचन, वाणी, बोली, शब्द।
संज्ञा
[हिं. बोलना]
(क) (सुरपति) काग-रूप करि रिषिगृह आयौ। अर्धनिसा तिहिं बोल सुनायौ-६-८। (ख) बार-बार बकि स्याम सौं कछु बोल बुलावत१०-१२२। (ग) स्रवन सुनत सुठि मीठे बोल-६३०।

बोल
ताना, व्यंग्य, चुभती हुई बात।
संज्ञा
[हिं. बोलना]
ब्रज बसि करके बोल सहौं-2७७४।
बोल मारना - ताना देना।

बोल
सिखावन, सीख।
संज्ञा
[हिं. बोलना]
लोचन मानत नाहिन बोल-पृ० ३३५ (४५)।

बोल
बात, कथन, निश्चय, प्रतिज्ञा।
संज्ञा
[हिं. बोलना]
अब न कौनौ चूक करिहौं यह हमारे बोल-३४७५।
बोल रखना - बात मानकर काम करना, बात या कहा न टालना। बोल रखायौ - बात नहीं टाली, कहा मान लिया। उ. - मथन नहीं मोहिं आवई, तुम सौंह दिवायौ। तिहिं कारन मैं आइ कै तुव बोल रखायौ-७१६। बोलबाला रहना - बात या कहे का आदर होना। बोलबाला होना - (१) बात या कहे का आदर होना। (२) प्रताप या भाग्य बढ़ा-चढ़ा होना। (३) प्रसिद्ध होना। बोल रहना - मान - मर्यादा होना।

बोल
बाजे का बँधा हुआ शब्द।
संज्ञा
[हिं. बोलना]

बोल
गीत का अंतरा।
संज्ञा
[हिं. बोलना]

बोल
संख्या।
संज्ञा
[हिं. बोलना]

बाँचि
बचकर, रक्षित रहकर।
क्रि. अ.
[हिं. बचना]
उरग तैं बाँचि फिरि ब्रजहिं आयौं-५९०।

बाँचिहैं
बचेंगे, रक्षित रहेंगे।
क्रि. अ.
[हिं. बचना]
कोउ बरसत, कोउ अगिनि जरावत, दई पर्‌यौ है खोज हमारे। तब गिरधर कर धर्‌यौ कन्हैया, अब न बाचिहैं मारत जारे-५९५।

बाँची
बचायी, रक्षा की।
क्रि. स.
[हिं. बचाना]
(क) दुस्सासन करि बसन छुड़ावत सुमिरत नाम द्रौपदी बाँची-१-१८। (ख) खरिक मिले की गोरस बेचत की विषहर से बाँची-१४६८।

बाँचे
बच गये, सुरक्षित रहे, चोट नहीं लगी।
क्रि. स.
[हिं. बचना]
भली भई अबकैं हरि बाँचे, अब तौ सुरति सम्हारि-१०-७९।

बाँचौ
बचे रहे।
क्रि. स.
[हिं बचना]
(क) सुमिरन कथा सदा सुखदायक, बिषधर विषम-विषय-विष बाँचौ-१-८३। (ख) अब तुम नाम गहौ मन नागर। जातैं काल-अगिनि तैं बाँचौ, सदा रहौ सुखसागर-१-९१।

बाँच्यौ
बच सका, छूट सका।
क्रि. अ.
[हिं. बचना]
कछु कुल-धर्म न जानई, रूप सकल जग राँच्यौं (हो)। बिनु देखैं, बिनु ही सुनैं, ठगत न कौऊ बाँच्यौ (हो)-१-४४।

बाँच्यौ
शेष रहा है, बाकी बचा है।
क्रि. स.
[सं. बंचना, हिं. बचना]
इत-उत देखि द्रौपदी देरी ........। सरबस दै अंबर तन बाँच्यौ, सो‍उ अब हरत, जाति पति मेरी-१-२५१।

बांछना
इच्छा, अभिलाषा।
संज्ञा
[सं. बाँछा]
यह बाँछना होइ क्यों पूरन दासी ह्वै बस ब्रज रहिए।

बांछना
इच्छा करना।
क्रि. स.

बांछना
छाँटना, चुनना।
क्रि. स.

बोल
एक तरह का गोंद।
संज्ञा
[देश.]

बोल
शब्दोच्चारण करके, कहकर।
क्रि. अ.
बोल जाना - (१) मर जाना। (२) बाकी न बचना। (३) घिस या फट जाना। (४) दुखी या हैरान होकर हार मान लेना। (५) सिटपिटा जाना। (६) दिवाला निकल जाना।

बोल
कोई कथन, बात या वचन कहकर।
क्रि. स.
बोल उठना - एकाएक कुछ कहने लगना

बोलक
एक बात, शिक्षा की एक-दो बातें।
संज्ञा
[हिं. बोल+एक]
बोलक इनहू को सुनि लीजै-2९७२।

बोलचाल
बात-चीत।
संज्ञा
[हिं.बोल+चाल]

बोलचाल
मेल-मिलाप।
संज्ञा
[हिं.बोल+चाल]

बोलचाल
सामान्य व्यवहार (की भाषा)।
संज्ञा
[हिं.बोल+चाल]

बोलत
बोलते हैं, मुख से शब्द निकालते हैं।
क्रि. अ.
[हिं. बोलना]

बोलत
चहचहाते हैं।
क्रि. अ.
[हिं. बोलना]
तमचुर खग-रोर सुनहु, बोलत बनराई-१०-२०२।

बोलत
बुलाते हैं, पुकारते हैं।
क्रि. स.
ग्वाल सखा ऊँचे चढ़ि बोलत बार बार लै नाम।

बोलता
आत्मा।
संज्ञा
[हिं. बोलना]

बोलता
प्राण।
संज्ञा
[हिं. बोलना]

बोलता
जीवित।
वि.

बोलता
वाक्पटु।
वि.

बोलती
बोलने की शक्ति, वाणी।
संज्ञा
[हिं. बोलना]
बोलती मारी जाना - भय, संकोच आदि के कारण मुँह से शब्द न निकलना।

बोलन
बोलने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. बोलना]

बोलन
वचन, बात, कथन।
कुंज किलोल किये बन ही बन सुधि बिसरी उन बोलन की-३२९९।

बोलना
मुँह से शब्द निकालना।
क्रि. अ.
[सं. ब्रू, 'ब्रूयते', बूर्यते ; प्रा. बुल्लइ]

बोलना
बोलना-चालना-बातचीत करना। हँसनाबोलना-प्रेमपूर्वक बातें करके प्रसन्न होना।
यौ.

बोलना
किसी चीज के ठोंके-पीटे जाने पर आवाज निकलना या ध्वनि होना।
क्रि. अ.

बोलना
कथन, बात या वचन कहना।
क्रि. स.

बोलना
ठहराना, बद लेना।
क्रि. स.

बोलना
उत्तर देना।
क्रि. स.

बोलना
रोक-टोक करना।
क्रि. स.

बोलना
छेड़छाड़ करना, सताना।
क्रि. स.

बोलना
बुलाना, पुकारना।
क्रि. स.

बोलना
बुलाने का संदेसा भेजना।
क्रि. स.

बोलनि
बोलने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. बोलना]
मन मोहनी तोतरी बोलनि, मुनि-मन हरनि सु हँसि मुसुकनियाँ-१०-१०६। (ख) कुंडल लोल, कपोलनि की छबि, मधुरी बोलनि बरनि न जाई-६१६।

बोलनि
बात, वचन।
संज्ञा
[हिं. बोलना]
तुम्हरी बोलनि कौन पतीजै ज्यौं भुस पर की भीति-३१६३।

बोलनो
बोलने या बात करने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. बोलना]

बोलनो
हँसि-बोलनो-सस्नेह हँसने बोलने में।
यौ.
रमत राम स्याम सँग ब्रज बालक सुख पावत हँसि बोलनो-2२८०।

बोलवाना
कहलाना, बुलवाना।
क्रि. स.
[हिं. बोलना]

बोलसर, बोलसिरी
मौलसिरी।
संज्ञा
[हिं. मौलसिरी]

बोलाना
बोलने को प्रेरित करना।
क्रि. स.
[हिं.बुलाना]

बोलायो
बुलाया, आने को कहा,आने का निमंत्रण या संदेश भेजा,
क्रि. स.
[हिं. बुलाना]
सब कुल सहित नंद सूरज प्रभु हित करि तहाँ बुलायो-१० उ०-१०८।

बोलावन
बुलाने के लिए।
संज्ञा
[हिं. बुलाना]
गए ग्वाल तब नंद बोलावन-१००१।

बोलावा
न्योता, निमन्त्रण।
संज्ञा
[हिं. बुलाना]

बोलि
बोलकर, कहकर।
क्रि.
[हिं. बोलना]

बोलि
बुलाकर।
क्रि.
[हिं. बोलना]
पारथ-तिय कुरुराज सभा मैं बोलि करन चहै नंगी-१-२१।

बोलि
आवाज देकर, पुकार कर।
क्रि.
[हिं. बोलना]
आई दरजी गयौ, बोलि ताकौ लयौ-2४८४

बोलौं
कहूँ, बताऊँ, उत्तर दूँ।
क्रि. स.
[हिं. बोलना]
जौ तुम कहौ कौन खल तारयौ, तौ हौं बोलौं साखी-१-१२२।

बोलौ
कहो, उच्चारण करो।
क्रि. स.
[हिं. बोलना]
तौ हौं अपनी फेरि सुधारौं, बचन एक जो बोलौ-१-१३६।

बोल्यौ
खोला, कहा।
क्रि. अ.
[हिं. बोलना]
भोजन करत सखा इक बोल्यौ, बछरू कतहूँ दुरि गये-४३८।

बोवत
बोता है, उगाता है, बीज जमाता है।
क्रि. स.
[हिं. बोना]
बोवत बबूर दाख फल चाहत, जोवत है फल लागे.-१.६१।

बोवना
उगाने के लिए बीज जमीन में डालना।
क्रि. स.
[हिं. बोना]

बोवाई
बोने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
संज्ञा
[हिं. बोवना]

बोवाना
बोने का काम करना।
क्रि. स.
[हिं. बोना]

बोह
डुबकी, गोता।
संज्ञा
[हिं. बोर]
बोह लेना - डुबकी या गोता मारना।

बोहनी
किसी चीज की पहली बिक्री।
संज्ञा
[सं. बोधन = जगाना]

बोहनी
दिन की पहली बिक्री।
संज्ञा
[सं. बोधन = जगाना]
बिन बोहनी तनक नहिं दैहौं ऐसेहि छीन लेहु बर सगरौ।

बोलि
बोलि आयौ - बोल निकला, मुँह से शब्द निकल सके।
प्र.
बीतैं जाम बोलि तब आयौ, सुनह कंस तव आई सरयौ-१०.५९।

बोली
मुँह से निकली हुई आवाज, वाणी।
संझा
[हिं. बोलना]
मीठी बोली - कानों को मधुर या प्रिय लगनेवाली वाणी।

बोली
बचन, बात, कथन।
संझा
[हिं. बोलना]

बोली
नीलाम में दाम कहना।
संझा
[हिं. बोलना]

बोली
बोलचाल का भाषा-रूप।
संझा
[हिं. बोलना]

बोली
हँसी-ठठोली।
संझा
[हिं. बोलना]
बोली छोड़ना ( बोलना या मारना) - ताना देना।

बोली
बुलाया।
क्रि. स.
तब ब्रज बसत बेनु (ख) ध्वनि करि बन बोली अधरातनि-३०२५।

बोले
बुलाये।
क्रि. स.
[हिं. बोलना]
औरै दसा भई छिन भीतर बोले गुनी नगर तैं-७४४

बोलैं
बोलते हैं, उच्चारण करते हैं।
क्रि. अ.
[हिं. बोलना]

बोले
नाम ले लेकर आशीर्वाद देते हैं, बढ़ती मनाते हैं।
क्रि. अ.
[हिं. बोलना]
बंदीजन-मागध-मूत, आँगन भौन भरे। ते बोलैं लै लै नाउँ, नहिं हित कोउ बिसरै-१०-२४

वोहारना
झाड़ू देना।
क्रि. स.
[हिं. बुहारना]

बोहारी
झाड़ू।
संज्ञा
[हिं. बुहारी]

बोहित
नाव, जहाज।
संज्ञा
[सं. बोहित्य]
भवसागर, बोहित बपु मेरौ, लोभ-पवन दिसि चारौ-१-२१३।

बौंड़
डोरी जैसी पतली टहनी।
संज्ञा
[सं. वृत]

बौंड़
लता, बेल।
संज्ञा
[सं. वृत]

बौड़ना
पतली टहनी या लता को तरह बढ़कर फैलना।
क्रि. अ.
[हिं. बौड़]

बौंडर
चक्कर खाता हुआ चलने वाला वायु का भोंका, बगूला, बवंडर।
संज्ञा
[हिं. बवंडर]
बौंडर महा भयावन आयौ, गोकुल सबै प्रलय कर मानी। महा दुष्ट लै उड़यौ गुपालहिं, चल्यौ अकास कृष्न यह जानी-१०-७८।

बौंड़ी
कच्चा फल, ढेंड़ी।
संज्ञा
[हिं. बौड़]

बौंड़ी
फली, छीमी।
संज्ञा
[हिं. बौड़]

बौंरना
लता का फूलना।
क्रि. अ.
[हिं. बौर]

बौरई
पागल स्त्री।
संज्ञा
[हिं. बोरा]

बौरना
आम के पेड़ में मंजरी या बौर आना।
क्रि. अ.
[हिं. बौर + आना]

बौरहा
पागल, बावला।
वि.
[हिं. बावला]

बौरहा
बहुत बकनेवाला बकवादी।
वि.
[हिं. बावला]

बौरा
पागल।
वि.
[हिं. बाउर]

बौरा
पागल।
वि.
[हिं. बाउर]

बौराई
पागलपन।
संज्ञा
[हिं. बौरा]

बौराऐं
मूर्ख बनाने, बहलाने या पति फेरने पर।
क्रि. स.
[हिं. बौराना (ना. प्रत्य.)]
तुम्हरौ प्रेम प्रगट मैं जान्यौ, बौराऐं न बहौंगौ-१०-१९४।

बौराना
पागल हो जाना।
क्रि. अ.
[हिं. बौरा]

बौराना
उन्मत्त या विवेकरहित हो जाना।
क्रि. अ.
[हिं. बौरा]

बौआना
सोते सोते बकना।
क्रि. अ.
[हिं. वाउ - वायु+आना]

बौआना
बाई या पागलपन में बर्राना।
क्रि. अ.
[हिं. वाउ - वायु+आना]

बौखल
पागल, सनकी।
वि.
[हिं. बाउ = वायु+स्खलन]

बौखलाना
पागल-सा हो जाना, बहकने लगना।
क्रि. अ.
[हिं. बौखल]

बौछाड़, बौछार
हवा का झोंका।
संज्ञा
[सं. वायु + क्षरण]

बौछाड़, बौछार
(ईंट, पत्थर आदि का) बूँदों की तरह बरसना।
संज्ञा
[सं. वायु + क्षरण]

बौछाड़, बौछार
(रुपया-पैसा) बहुत अधिक देना या लुटाना।
संज्ञा
[सं. वायु + क्षरण]

बौछाड़, बौछार
(गाली, कोसना आदि) का बहुत अधिक कहा जाना।
संज्ञा
[सं. वायु + क्षरण]

बौछाड़, बौछार
ताना,व्यंग्य।
संज्ञा
[सं. वायु + क्षरण]

बौड़हा
बावला, पागल।
वि.
[हिं. बाउर+हा]

बौद्ध
गौतम बुद्ध द्वारा प्रचारित।
वि.
[सं.]

बौद्ध
गौतमबुद्ध का अनुयायी।
वि.
[सं.]

बौद्ध
गौतम बुद्ध का अनुयायी या उनके धर्म में आस्था रखनेवाला व्यक्ति।
संज्ञा

बौद्ध धर्म
गौतमबद्ध का प्रवर्तित प्रसिद्ध धर्म।
संज्ञा
[सं.]

बौध
गौतमबद्ध।
संज्ञा
[सं. बौद्ध]

बौध
बुद्ध का अनुयायी।
संज्ञा
[सं. बौद्ध]

बौधा
अनेक प्रकार से।
क्रि. वि.
[सं. बहुधा]

बौना
छोटे शरीर का, ठिगना।
संज्ञा
[सं. वामन]
सूर प्रगट गिरि धरयौ बाम कर, हम जानतिं बलि बौना-६०१।

बौर
आम की मंजरी।
संज्ञा
[सं. मुकुल, प्रा. मुउड़]

बौरई
पागलपन, सनक।
संज्ञा
[हिं. बोरा]

बांछा
इच्छा, कामना।
संज्ञा
[स. बाँछा]

बांछित
अभिलषित।
वि.
[सं. वांछित]

बांछी
इच्छा करनेवाला।
संज्ञा
[सं. वांछिन्]

बांछै
चाहता है, इच्छा करता है।
क्रि. स.
[हि. बाँछना]
महामुक्ति कोऊ नहिं बाँछै जदपि पदारथ चारी-३३१६।

बांछा
इच्छा की, चाहा।
क्रि. स.
[हिं. बाँचना]
निरखि लोचन प्रनत मोचन कुँवरि फल बांछो सो पायो-१० उ०,१८।

बाँझ
वह स्त्री जिसके संतान न जन्मी हो।
संज्ञा
[सं. बंध्या]
(क) बाँझ सुत जनै उकठे काठ पल्लवै बिफल तरु फलै बिनु मेघ पानी-2२७३ । (ख) जानै कहा बाँझ ब्यावर दुख-३३२९।

बाँझपन, बाँझपना
बांझ होने का भाव।
संज्ञा
[हिं. बाँझ +पन]

बाँट
बाँटने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. बाँटना]

बाँट
भाग, हिस्सा।
संज्ञा
[हिं. बाँटना]
याहू मैं कछु बाँट तुम्हारौ -११२१।

बाँट
बाँट लेहु-भाग ले लो, हिस्सा कर लो।
प्र.
बाँट न लेहु सबै चाहत है, यहै बात है थोरी-१०-२६७।
बाँट पड़ना - (१) भाग या हिस्से में आना। (२) अधिक परिमाण में होना।

बौराना
मूर्ख बनाना, मति फेरना।
क्रि. स.

बौरानी
पागल हो गयी है, बौरा गयी है।
क्रि. अ.
[हिं. बौराना]
देखौ री जसुमति बौरानी। घर-घर हाथ दिवावति डोलति, गोद लिए गोपाल बिनानी-१०-२५८।

बौरानी
पगली, जो पागल हो गयी हो।
वि.

बौराने
पागल (जैसे)।
वि.
[हिं. बौराना]
हम अपने ब्रज ऐसेहिं रहिहै बिरहबाइ बौराने-३२३९।

बौरान्यौ
पागल हो गया, बौराया, सनकी हुआ।
क्रि. अ.
[हिं. बौराना]

बौरान्यौ
उन्मत्त हुआ, विवेक या बुद्धिरहित हुआ।
क्रि. अ.
[हिं. बौराना]
बौरे मन्द रहन अटल करि जान्यौ। धन-दारा-सुत-बंधु-कुटुंब-कुल निरखि निरखि बौरान्यौ-१-३१९।

बौरायौ
उन्मत्त हुआ, विवेकबुद्धि रहित हुआ।
क्रि. अ.
[हिं. बौरना]
ऐसैहिं जनम बहुत बौरायौ। बिमुख भयौ हरि-चरन-कमल-तजि, मन संतोष न आयौ .....१-२७।

बौरायौ
विवेकहीन किया, मूर्ख बनाया।
क्रि. स.
किधौं देवमाया बौरायौ किंधौ अनत ही आयौ-१० उ०-६९।

बौरावत
मूर्ख बनाता है।
क्रि. स.
[हिं. बौराना]
हम जानत परपंच स्याम बातन ही बौरावत-३१३५।

बौरावति
पागल होती है, सनक गयी है।
क्रि. अ.
[हिं. बौराना]
साँचैहिं सुत भयौ नंद-नायक कैं, हौं नाहीं बौराबति-१०-२३।

बौरावहीं
मूर्ख बनाती हैं, बहलाती-फुसलाती हैं।
क्रि. स.
[हिं. बौराना]
अति विचित्र लरिका की नाई गुर देखाइ बौरावहिं-2९८५।

बौरावै
पागल बना देता है, विवेक-बुद्धिरहित कर देती है।
क्रि. स.
[हिं. बौराना]
सोवत सपने मैं ज्यौं संपति, त्यौं दिखाइ बौरावै-१-४२।

बौराह
पागल, सनकी।
वि.
[हिं. बाबला]

बौरी
पगली।
वि.
[हिं. बौरा (पुं.)]

बौरी
बुद्धिहीन, मूर्ख।
वि.
[हिं. बौरा (पुं.)]
(क) कहति कहा ऊधौ सौं तुम बौरी-३००७। (ख) हम बौरी बकवाद करत हैं-३०९१।

बौरी
उन्नत, मदमाती।
वि.
[हिं. बौरा (पुं.)]
री बौरी, सठ भई मदनबस, मेरै ध्यान चरन रघुराई-९-५६।

बौरे
पागल, विक्षिप्त।
वि.
[हिं. बौरा]

बौरे
अज्ञान, नादान, मूर्ख।
वि.
[हिं. बौरा]
(क) तजि अभिमान, राम कहि बौरे, नतरुक ज्वाला तचिबौ-१-५९। (ख) और उपाई नहीं रे बौरे, सुनि तू यह दै कान-१-३०४।

बौरैया
बावली. पागल. बौरी।
संज्ञा
[हिं. बौरी]
आई सिखवन भवन पराऐं, स्यानि ग्वालि बौरैया-३७१।

बौलड़ा
सिर का एक गहना।
संज्ञा
[हिं. बहु+लड़]

बौहर
वधू, दुलहिन।
संज्ञा
[सं. वधूवर,हिं बहुवर]

ब्यंग, ब्यंग्य
ताना, व्यंग्य।
संज्ञा
[सं. व्यंग्य]

ब्यंजन
तैयार या बनी हुई तरकारी और साग।
संज्ञा
[सं. व्यंजन]

ब्यंजन
(विभिन्न प्रकार के) भोजन।
संज्ञा
[सं. व्यंजन]
(क) षट-रस व्यंजन छाँड़ि रसोई, साग बिदुर-घर खाए.-१-२४४ (ख) बहुत प्रकार किये सब ब्यंजन अमित बरन मिष्टान्न-१०-८९।

ब्यंजन
हवा करने का पंखा।
संज्ञा
[सं. व्यजन]
असुर-सुता तिहिं ब्यजन डुलावै-९-१७४।

ब्यतीतत
बीतता है।
क्रि. अ.
[सं. व्यतीत]

ब्यतीतना
बीत जाना।
क्रि. अ.
[सं. व्यतीत]

ब्यतीतना
बिताना, व्यतीत करना।
क्रि. स.

ब्यथा
पीड़ा, कष्ट।
संज्ञा
[सं. व्यथा]

ब्यथित
पीड़ित, दुखी।
वि.
[सं. व्यथित]

ब्यभिचारी
चरित्रहीन, दुश्चरित्र।
वि.
[सं. व्यभिचारी]
बिना गोपाल और जेहि भावत ते कहिहैं ब्यभिचारी-2४१६।

ब्यवसाय
काम-धंधा।
संज्ञा
[सं. व्यवसाय]

ब्यवसाय
जीविका-साधन।
संज्ञा
[सं. व्यवसाय]

ब्यवसाय
व्यापार।
संज्ञा
[सं. व्यवसाय]

ब्यवस्था
कार्य-विधान।
संज्ञा
[सं. व्यवस्था]

ब्यवस्था
उचित क्रम।
संज्ञा
[सं. व्यवस्था]

ब्यवस्था
प्रबन्ध, योजना।
संज्ञा
[सं. व्यवस्था]

ब्यवहर
उधार, ऋण।
संज्ञा
[सं. व्यवहार]

ब्यवहरिया
रुपए का लेन-देन करनेवाला, महाजन।
संज्ञा
[सं. व्यवहार]

ब्यवहार
बर्ताव।
संज्ञा
[सं. व्यवहार]

ब्यसन
बुरे शौक की लत।
संज्ञा
[सं. व्यसन]

ब्यसनी
जिसको भोग-विलास के प्रति आसक्ति हो।
वि.
[सं. व्यसनिन्]

ब्यसनी
जिसे बुरी बात का शौक हो।
वि.
[सं. व्यसनिन्]

ब्याइ
बच्चा जनकर।
क्रि. अ.
[हिं. ब्याना]

ब्याइ
रही ब्याइ-बच्चा जन रही है।
प्र.
अबहीं एक सखा यह कहि गयौ गाइ रही बन ब्याइ-१५५७।

ब्याख्यान
व्याख्या, वर्णन।
संज्ञा
[सं. व्याख्यान]

ब्याख्यान
कियौ ब्याख्यान - व्याख्या की, वर्णन किया।
प्र.
ब्यासदेव तब करि हरि-ध्यान, कियौ भागवत कौ ब्याख्यान-१-२३०।

ब्याज
छल, बहाना, मिस।
संज्ञा
[सं. व्याज]
यहै जानि गोपाल बँधाए। साप-दग्ध ह्वै सुत कुबेर के, आनि भए तरु जुगल सुहाए। ब्याज रुदन लोचन-जल ढारत, ऊखल दाम सहित चलि आए-३८६।

ब्याज
उधार दिये गये धन का सूद।
संज्ञा
[सं. व्याज]
सूर मूर अक्रूर गयौ लै ब्याज निबेरत ऊधौ-३३७८।

ब्याजू
व्याज पर दिया हुआ या दिया जानेवाला धन।
वि.
[हिं. ब्याज]

ब्यवहार
रुपये का लेन-देन।
संज्ञा
[सं. व्यवहार]

ब्यवहार
आने-जाने या लेने देने का संबंध।
संज्ञा
[सं. व्यवहार]

ब्यवहार
रीति-नीति, प्रसंग, विवरण।
संज्ञा
[सं. व्यवहार]
पारवती-बिवाह ब्यवहार, सूर कह्यौ भागवतऽनुसार-४.७।

ब्यवहार
कार्य, धर्म, प्रकृति।
संज्ञा
[सं. व्यवहार]
(क) हर्षसोक तनु कौ ब्यवहार-५-४। (ख) सूरदास सिर देत सूरमा सोइ जानै ब्यवहार-2९००।

ब्यवहारी
कार्यकर्ता।
संज्ञा
[सं.व्यवहारिन्]

ब्यवहारी
लेन-देन करनेवाला।
संज्ञा
[सं.व्यवहारिन्]

ब्यवहारी
इष्ट-मित्र।
संज्ञा
[सं.व्यवहारिन्]

ब्यवहारी
प्रबंधक।
संज्ञा
[सं.व्यवहारिन्]

ब्यष्टि
समष्टि का विशिष्ट और पृथक अंश, समष्टि का विपरीतार्थक।
संज्ञा
[सं. व्यष्टि]
प्रथम ज्ञान, बिज्ञानक द्वितिय मत, तृतिय भक्ति को भाव। सूरदास सोई समष्टि करि, ब्यष्टि दृष्टि मन लाव-2-३८।

ब्यसन
भोग-विलास के प्रति आसक्ति।
संज्ञा
[सं. व्यसन]

ब्याध
पशु-पक्षियों को पकड़ने, बेचने और मारने से जीविका चलानेवाला, बहेलिया।
संज्ञा
[सं. व्याध]
लोचन भए पखेरू माई।......। सूरदास मन ब्याध हमारौ गृह-बन तैं जु बिसारे-सभा. २८९०।

ब्याधा
ब्याध, बहेलिया।
संज्ञा
[हिं. ब्याध]

ब्याधा
रोग।
संज्ञा
[सं. व्याधि]

ब्याधा
विपत्ति।
संज्ञा
[सं. व्याधि]

ब्याधि
रोग।
संज्ञा
[सं. व्याधि]

ब्याधि
विरह के कारण अस्वस्थ रहना जो एक संचारी भाव है और पूर्व रोग की दस अवस्थाओं में से भी एक है।
संज्ञा
[सं. व्याधि]

ब्याधि
विपत्ति।
संज्ञा
[सं. व्याधि]

ब्याधि
झंझट।
संज्ञा
[सं. व्याधि]

ब्याना
बच्चा जनना।
क्रि. अ.
[हिं. बिया - बीज]

ब्याना
उत्पन्न करना, गर्भ से निकालना।
क्रि. स

ब्यापारी
रोजगार करनेवाला।
संज्ञा
[सं. व्यापारिन्‌]

ब्यापि
फैला है, व्याप्त है, वर्तमान है।
क्रि. अ.
[हिं. ब्यापना]
रह्यौ घट-घट ब्यापि सोई, जोति-रूप अनूप-2-२७।

ब्यापिहै
प्रभाव डालेगी, असर करेगी, व्यापेगी।
क्रि. अ.
[हिं. व्यापना]
हरि कह्यौ अब न ब्यापि है माया, तब वह गर्भ छाँड़ि जग आया-१-२२६।

ब्यापै
किसी पात्र या पदार्थ के भीतर फैलता है अथवा व्याप्त होता है।
क्रि. अ.
[हिं. ब्यापना]

ब्यापै
प्रभाव या असर करता है।
क्रि. अ.
[हिं. ब्यापना]
(क) जाकौ कामक्रोध नित ब्यापै। अरु पुनि लोभ सदा संतापै।... हरि-माया सब जग संतापै। ताकौ माया-मोह न ब्यापै।......। भक्ति पाइ पावै हरि-लोक। तिन्हैं न ब्यापै हर्षऽरु सोक-३-१३। (ख) माया, काल, कछु नहिं ब्यापै, यह रस-रीति जो जानै।

ब्यापै
घेरती है, ग्रसती है।
क्रि. अ.
[हिं. ब्यापना]
जरा अबहिं तोहिं ब्यापै अई। भयउ बृद्ध तब कहेउ सिर नाई।

ब्यार
हवा, वायु।
संज्ञा
[हिं. बयार]

ब्यारी
रात का भोजन।
संज्ञा
[हिं. ब्यालू]

ब्याल
सर्प।
संज्ञा
[सं. व्याल]

ब्याल
कालियनाग।
संज्ञा
[सं. व्याल]
नाथत ब्याल बिलंब न कीन्हौ-५५७

ब्यानी
ब्यायी हुई, जिसने हाल ही में बच्चा जना हो।
वि.
[हिं. ब्याना]
ब्यानी गाय बछरुवा चाटति, हौं पय पियत पतूखिनि लैया-१०-३३५।

व्यापक
दूर तक व्याप्त, चारों ओर फैला हुआ।
वि.
[सं. व्यापक]
दूरि गयौ दरसन के ताईं, ब्यापक प्रभुता सब बिसरी-१-११५।

ब्यापत
प्रभाव या असर करत है।
क्रि. अ.
[हिं. ब्यापना]
हमारे देहु मनोहर चीर। काँपति, सीत तनहिं अति ब्यापत, हिम सम जमुना-नीर-७९२।

ब्यापना
अच्छी तरह फैलकर सब जगह घेर लेना।
क्रि. अ.
[सं. व्यापन]

ब्यापना
चारों ओर छा जाना।
क्रि. अ.
[सं. व्यापन]

ब्यापना
घेरना, ग्रसना।
क्रि. अ.
[सं. व्यापन]

ब्यापना
प्रभाव या असर करना।
क्रि. अ.
[सं. व्यापन]

ब्यापार
काम, कार्य।
संज्ञा
[सं. व्यापार]

ब्यापार
काम करने का भाव।
संज्ञा
[सं. व्यापार]

ब्यापार
रोजगार, धंधा।
संज्ञा
[सं. व्यापार]

ब्याली
साँपिन, नागिन।
संज्ञा
[सं. व्याली]

ब्याली
सर्पो को धारण करनेवाला।
वि.

ब्यालू
रात का भोजन।
संज्ञा
[सं. विकाल]

ब्यावर
जिसने बच्चा जना हो।
वि.
[हिं. ब्याना]
ब्यावर बिथा न बंध्या जान-३४४२।

ब्यास
श्रीकृष्ण द्वैपायन जो वेदों के संपादक और श्रीमद्भागवत आदि पुराणों के रचयिता माने जाते हैं।
संज्ञा
[सं. व्यास]
अन्तर-दाह जु मिट्यो ब्यास कौ इक चित ह्वै भागवत किऐं-१-९।

ब्याह
विवाह, परिणय।
संज्ञा
[सं. विवाह]
कहति जननी ब्याह कौं तब रहत बदन दुराइ-४९८।

ब्याहता
जिसके साथ ब्याह हुआ हो।
वि.
[सं. विवाहित]

ब्याहता
पति।
संज्ञा

ब्याहना
विवाह करना।
क्रि. स.
[हिं. ब्याह+ना]

ब्याहि
ब्याह कर।
क्रि. स.
[हिं. ब्याहना]

बाँटचूँट
भाग, हिस्सा।
संज्ञा
[हिं. बाँट + अनु. चूँट]

बाँटचूँट
लेनदेन।
संज्ञा
[हिं. बाँट + अनु. चूँट]

बाँटत
भाग या हिस्सा करके देते हैं।
क्रि. स.
[हिं बाँटना]
सूर स्याम अपने कर लीन्हें बाँटत जूठनि भोग-९३५।

बाँटना
भाग या हिस्सा करना।
क्रि. स.
[सं. वितरण]

बाँटना
अलग-अलग रखना।
क्रि. स.
[सं. वितरण]

बाँटना
थोड़ा-थोड़ा करके (सबको) देना।
क्रि. स.
[सं. वितरण]

बाँटा
भाग, हिस्सा।
संज्ञा
[हिं. बाँटना]

बाँटि
पीसकर, चूर्ण करके, लेप बनाकर।
क्रि. स.
[हिं. बट्टा या बाट, बाटना]
(क) उरजनि कौं विष बाँटि लगायौ, जसुमति की गति पाई-१-१५८। (ख) सुन री सखी स्यामसुंदर बिन बाँटि विषम बिष पीजै-2८६४।

बाँटि
भाग या हिस्सा करने (दूसरों को) दिया।
क्रि. स.
[हिं. बाँटना]
(क) थाती प्रान तुम्हारी मोपै जनमत ही जो दीन्हीं। सो मैं बाँटि दई पाँचनि कौ-१-१९६। (ख) चारो अंस बाँटि पुनि दिये-६-५।

बाँटी
वितरण करके, (दुसरे को भाग या हिस्सा) देकर।
क्रि. स.
[हिं. बाँटना]
सिगरोइ दूध पियौ मेरे मोहन, बलहिं न दैहौं बाँटी-१०-२५९।

ब्योंत
संयोग, अवसर।
संज्ञा
[सं. व्यवस्था]

ब्योंत
पूरा-पूरा कार्य होने का हिसाब।
संज्ञा
[सं. व्यवस्था]

ब्योंत
साधन, समाई।
संज्ञा
[सं. व्यवस्था]

ब्योंत
पहनावे की काट-छाँट।
संज्ञा
[सं. व्यवस्था]

ब्योंत
प्रबन्ध, व्यवस्था।
संज्ञा
[सं. व्यवस्था]
ब्योंत खाना - अनुकूल व्यवस्था होना।

ब्योंतत
किसी पहनावे के हिसाब से कपड़े को काटता-छाँटता है।
क्रि. स.
[हिं. ब्योंतना]
सूर स्वामी अति रिस भीम की भुजा के मिस ब्योंतत बसन ज्यों सुत तन फारयौ।

ब्योंतना
किसी हिसाब से कपड़े को काटना-छाँटना।
क्रि. स.
[हिं. ब्योंत]

ब्योंतना
मार डालना।
क्रि. स.
[हिं. ब्योंत]

ब्योंताना
नाप के हिसाब से कपड़ा कटाना-छँटाना।
क्रि. स.
[हिं. ब्योंतना]

ब्योपार
रोजगार, धंधा।
संज्ञा
[हिं. ब्यापार]

ब्याहि
ब्याहि दयौ - विवाह कर दिया।
प्र.
रुचि कै अत्रि नाम सुत भयौ, ब्याहि अनसुया सौं सो दयौ-४-२।

ब्याही
विवाह किया, ब्याह लिया।
क्रि. स.
[हिं. ब्याहना]
हरि, हौं महा अधम संसारी। आन समुझ मैं बरिया ब्याही आसा कुमति कुनारी-१-१७३।

ब्याहुला
विवाह का।
वि.
[हिं. ब्याह]

ब्योंचना
शरीर के किसी अंग का मुरक जाना या मोच खा जाना।
क्रि. अ.
[सं. विकुंचन, प्रा. बिउंचन]

ब्योंची
उलटी, कै, वमन।
संज्ञा
[हिं. ब्योंचना]

ब्योंड़ा
लम्बी गोलाकार लकड़ी जो दरवाजा खुलने से रोकने को लगाई जाती है।
संज्ञा
[हिं. बेड़ा]

ब्योंत
ब्योरा, विवरण।
संज्ञा
[सं. व्यवस्था]

ब्योंत
ढंग, विधि, रीति।
संज्ञा
[सं. व्यवस्था]

ब्योंत
युक्ति, उपाय।
संज्ञा
[सं. व्यवस्था]

ब्योंत
उपक्रम, तैयारी।
संज्ञा
[सं. व्यवस्था]

ब्योपारी
रोजगारी, व्यवसायी।
संज्ञा
[हिं. ब्यापारी]

ब्योरन
बाल सँवारने की रीति।
संज्ञा
[हिं.ब्योरना]

ब्योरना
उलझे बाल सुलझाना।
क्रि. स.
[सं. ब्योरना]

ब्योरा
घटना आदि का विवरण।
संज्ञा
[सं. विवरण]

ब्योरा
किसी विषय या प्रसंग का पूरा हिसाब।
संज्ञा
[सं. विवरण]

ब्योरा
हाल, वृत्तान्त।
संज्ञा
[सं. विवरण]

ब्योरेवार
वस्तार के साथ।
क्रि. वि.
[हिं. ववोरा]

ब्योसाइ, ब्योसाय
कारबार, धंधा।
संज्ञा
[सं. व्यवसाय]

ब्योसाइ, ब्योसाय
व्यापार, व्यवसाया।
संज्ञा
[सं. व्यवसाय]

ब्योहर
सूद पर रुपये के लेन-देन का व्यापार।
संज्ञा
[हिं. व्यवहार]

ब्योहरा, ब्योहरिया
सूद पर रुपया देनेवाला।
संज्ञा
[हिं. ब्योहर]

ब्योहरना
काम में लाना।
क्रि. अ.
[हिं. व्यवहार]

ब्योहरना
आचरण या बर्ताव करना।
क्रि. स.

ब्योहार
बर्ताव, व्यवहार।
संज्ञा
[सं. व्यवहार]

ब्यौंकना
उछलना, कूदना, लपकना।
क्रि. अ.
[देश.]

ब्यौंकि
उछलकर, लपककर
क्रि. अ.
[हिं. ब्यौंकना]
मैया री, मैं चंद लहौंगो। कहा करौं जलपुट भीतर कौ, बाहर ब्यौंकि गहौंगौ-१०-१९४।

ब्यौपार
व्यवसाय।
संज्ञा
[सं. व्यापार]

ब्यौपार
कर्म, कार्य, काम।
संज्ञा
[सं. व्यापार]
या बिधि को ब्यौपार बन्यौ जग, तासौं नेह लगायौ-१-७९।

ब्यौपारी
ब्यापारी, व्यवसायी।
संज्ञा
[हिं. व्यापारी]
(क) यह मारग चौगुनौ चलाऊँ तौ पूरौ ब्यौपारी-१-१४६। (ख) दीरघ मोल कहयौ ब्यौपारी रहे ठगे सब कौतुक हार-१०-१७३।

ब्यौरौ
प्रसंग, झगड़ा, चक्कर, बन्धन।
संज्ञा
[हिं. ब्यौरा]
श्री भागवत सुनै जो कोइ, ताकौं हरिपद प्रापति होइ। ऊँच-नीच ब्यौरौ न रहाइ। ताकी साखी मैं, सुनि आइ-१-२३०।

ब्यौसाइ
कार-बार, व्यापार।
संज्ञा
[सं. व्यवसाय]

ब्यौसाई
कार-बार करनेवाला, व्यापारी।
संज्ञा
[सं. व्यवसायी]

ब्यौहर
सूद पर रुपया लेने-देने का व्यापार।
संज्ञा
[हिं. व्यवहार]

ब्यौहरा, ब्यौहरिया
सूद पर रुपया लेने-देने का व्यापार करनेवाला।
संज्ञा
[हिं. व्यवहारी]

ब्यौहार
काम-धंधा।
संज्ञा
[सं. व्यवहार]
जब हरि मुरली अधर धरी। गृह-ब्यौहार तजे आरजपथ, चलत न संक करी-६५९।

ब्यौहार
बर्ताव, व्यवहार।
संज्ञा
[सं. व्यवहार]

ब्यौहारत
व्यवहार करता है।
क्रि. अ.
[हिं. व्यवहारना]
ऐसे जनम-करम के ओछे, ओछनि हूँ ब्योहारत-१-१२।

ब्यौहारना
सम्बन्ध रखना।
क्रि. अ.
[सं. व्यवहार]

ब्रंद
समूह।
संज्ञा
[सं. वृंद]

ब्रज
मथुरा और वृन्दावन का समीप वर्ती प्रदेश जब बीकृष्ण ने बाललीलाएँ की थीं श्रीकृष्ण-भक्तों के लिए यह प्रदेश समस्त तीर्थों से बढ़कर है।
संज्ञा
[व्रज]

ब्रह्म
ईश्वर।
संज्ञा
[सं. ब्रह्मन्]

ब्रह्मकन्यका, ब्रह्मकन्या
ब्रह्मा की कन्या सरस्वती।
संज्ञा
[सं.]

ब्रह्मचर्य
वीर्य को रक्षित रखने की साधना।
संज्ञा
[सं.]

ब्रह्मचर्य
चार आश्रमों में प्रथम।
संज्ञा
[सं.]

ब्रह्मचारी
ब्रह्मचर्य का साधक।
संज्ञा
[सं. ब्रह्मचारिन्]

ब्रह्मज्ञ
ब्रह्म का ज्ञाता।
वि.
[सं.]

ब्रह्मज्ञान
ब्रह्म या अद्वैत सिद्धान्त का बोध या उसकी जानकारी।
संज्ञा
[सं.]

ब्रह्मज्ञानी
ब्रह्म का ज्ञाता, अद्वैतवादी।
संज्ञा
[सं.]

ब्रह्मण्य
ब्राह्मण पर श्रद्धा रखनेवाला।
वि.
[सं.]

ब्रह्मण्य
ब्रह्म या ब्रह्मा-संबंधी।
वि.
[सं.]

ब्रजधर
व्रज को धारण करनेवाले, ब्रज में ही व्याप्त, व्रज के रक्षक।
संज्ञा
[सं. ब्रज+हिं. धरना]
गिरिधर, ब्रजधर, मुरलीधर, धरनीधर-५७२।

ब्रजना
जाना, चलना।
क्रि. अ.
[सं. ब्रजन]

ब्रजराइ, ब्रजराई
व्रजपति श्रीकृष्ण।
संज्ञा
[सं. व्रज+हिं. राय]
अपने कृत तै हौं नहिं बिरमत, सुनि कृपालु ब्रजराई-१.२०७।

ब्रजराज, ब्रजराजा
ब्रज के राजा नन्द जी।
संज्ञा
[सं. व्रजराज]
जागिए, ब्रजराज-कुँवर, कमलकुसुम फूले-१०-२०२।

ब्रजराज, ब्रजराजा
व्रज के स्वामी श्री कृष्ण।
संज्ञा
[सं. व्रजराज]
(क) लीजै पार उतारि सूर कौं महाराज ब्रजराज-१-१०८। (ख) और लेहु कछ सुख ब्रजराजा-३९६।

ब्रत
पुण्य-प्राप्ति के उद्देश्य से नियमपूर्वक उपवास करना।
संज्ञा
[सं. व्रत]
भक्तनि-हित तुम कहा न कियौ। गर्भ परीच्छित रच्छा कीन्ही ; अंबरीष ब्रत राखि लियौ-१-२६।

ब्रत
टेक, संकल्प।
संज्ञा
[सं. व्रत]
पतिब्रता जालंधर-जुवती सो पति-ब्रत तैं टारी-१-१०४।

ब्रह्मांड
चौदहों भुवनों का समूह,अखिल विश्व, ब्रह्मांड।
संज्ञा
[सं. ब्रह्मांड]
अखिल ब्रह्मंड-खंड की महिमा, दिखराई मुख माहि-१०-२५५।

ब्रह्म
जगत का कर्ता जो सत, चित् और आनन्दस्वरूप माना गया है।
संज्ञा
[सं. ब्रह्मन्]
सूर पूरन बह्म निगम नाहीं गम्य तिनहिं अक्रूर मन यह बिचारै-2५५१।

ब्रह्म
आत्मा, चैतन्य।
संज्ञा
[सं. ब्रह्मन्]

ब्रह्मन्य
ब्रह्मण्य।
वि.
[सं. ब्रह्मण्य]
बिदित बिरद ब्रह्मन्य देव, तुम करुनामय सुखदाई-९-७।

ब्रह्मद्रव
गंगाजल।
संज्ञा
[सं.]

ब्रह्मद्रोही
ब्राह्मण का बैरी।
वि.
[सं.]

ब्रह्मद्वार
खोपड़ी के बीच का छेद जिससे प्राण निकलते माने जाते हैं, ब्रह्मरंध्र।
संज्ञा
[सं.]
(क) त्रिकुटी संगम ब्रह्मद्वार भिदि यों मिलिहैं बनमाली। (ख) ब्रह्मद्वार फिरि फोरि कै निकसे गोकुलराय।

ब्रह्मनाथ
विष्णु।
संज्ञा
[सं.]

ब्रह्मपुत्र
ब्रह्मा का पुत्र।
संज्ञा
[सं.]

ब्रह्मपुत्र
नारद।
संज्ञा
[सं.]

ब्रह्मपुत्र
एक नद जो मानसरोवर से निकलकर भारत के पूर्वी प्रदेश से होकर बंगाल की खाड़ी में गिरता है। इसका प्राचीन नाम 'लौहित्य' है।
संज्ञा
[सं.]

ब्रह्मपुत्री
सरस्वती।
संज्ञा
[सं.]

ब्रह्मपुराण
१८ पुराणों में एक।
संज्ञा
[सं.]

ब्रात, ब्रात्य
जिसका यज्ञोपवीत न हुआ हो।
वि.
[सं. व्रात्य]

ब्रात, ब्रात्य
वर्ण-संकर।
वि.
[सं. व्रात्य]

बाह्म
ब्रह्म-संबंधी।
वि.
[सं.]

ब्राह्मण
चार वर्णों में सर्वश्रेष्ठ वर्ण।
संज्ञा
[सं.]

ब्राह्मण
इस वर्ण का व्यक्ति।
संज्ञा
[सं.]

ब्राह्मण
वेद का भाग जो 'मंत्र' नहीं है।
संज्ञा
[सं.]

ब्राह्मणत्व
ब्राह्मण का भाव या धर्म।
संज्ञा
[सं.]

ब्राह्मणी
ब्राह्मण की स्त्री।
संज्ञा
[सं.]

ब्राह्मन
ब्राह्मण।
संज्ञा
[सं. ब्राह्मण]
गुरु-ब्राह्मन अरु संत सुजन के जात न कबहुँ निकेत-2-१५।

ब्राह्ममुहूर्त
सूर्योदय से दो-तीन घड़ी पूर्व का समय।
संज्ञा
[सं.]

ब्रह्मांड
चौदहों भवनों का समूह।
संज्ञा
[सं.]

ब्रह्मांड
खोपड़ी, कपाल।
संज्ञा
[सं.]

ब्रह्मांडपति
चौदहों भुवनों के स्वामी
संज्ञा
[सं.]
अखिल ब्रह्मांडपति तिहुँ भुवनाधिपति नीरपति पवनपति अगम बानी-१५२२।

ब्रह्मा
ब्रह्म के तीन सगुण रूपों में एक जो सृष्टि का रचयिता माना गया है, विधाता।
संज्ञा
[सं.]
ध्यान धरत महादेव व ब्रह्मा तिनहूँ पै न छटै-१-२६३।

ब्रह्माणी
ब्रह्मा की स्त्री।
संज्ञा
[सं.]

ब्रह्माणी
सरस्वती।
संज्ञा
[सं.]

ब्रह्मानंद
ब्रह्मज्ञान के अनुभव का आनन्द।
संज्ञा
[सं.]

ब्रह्मावर्त
सरस्वती और दृशद्वती नदियों के बीच के प्रदेश का नाम।
संज्ञा
[सं.]

ब्रह्मास्त्र
एक अमोघ अस्त्र।
संज्ञा
[सं.]

ब्रात, ब्रात्य
जिसके दस संस्कार न हुए हों।
वि.
[सं. व्रात्य]

बाँड़ा
पूँछहीन पशु।
संज्ञा
[देश.]

बाँड़ा
संतानहीन पशु।
संज्ञा
[देश.]

बाँड़ी
पूछहीन (मादा) पशु।
संज्ञा
[हिं. बाँड़ा]

बाँद
सेवक, दास।
संज्ञा
[फ़ा. बंदा]

बाँदर
बंदर।
संज्ञा
[सं. वानर]

बाँदी
दासी, सेविका, लौंडी।
संज्ञा
[फ़ा. बंदा]

बाँदू
कैदी, बंदी।
संज्ञा
[सं. बंदी]

बाँध
पानी रोकने का घुस्स।
संज्ञा
[हिं. बाँधना]

बाँधन
बंधन में डालना।
क्रि. स.
[हिं. बाँधना]

बाँधन
बाँधन गये - बंदी बनाने गये।
प्र.
बाँधन गये बँधाये आपुन-८१५।

ब्रह्मभोज
ब्राह्मण-भोजन।
संज्ञा
[सं.]

ब्रह्ममुकुन्द
परब्रह्म।
संज्ञा
[सं.]
सुरनि कही गोकुल प्रगटे हैं पूरन ब्रह्ममुकुन्द-९७५

ब्रह्ममुहूरत, ब्रह्ममुहूर्त
सूर्योदय से एक घण्टा पहले का समय।
संज्ञा
[सं.]
ब्रह्ममुहरत भयौ सबेरौ जागे दोऊ भाई।

ब्रह्मरंध्र
खोपड़ी के बीच का गुप्त छिद्र जो प्राण निकलने का द्वार माना जाता है।
संज्ञा
[सं.]

ब्रह्मराक्षस
वह ब्राह्मण जो मरकर प्रेत हुआ हो।
संज्ञा
[सं.]

ब्रह्मलोक
ब्रह्मा का लोक।
संज्ञा
[सं.]

ब्रह्मवाद
वह सिद्धान्त जिसमें शुद्ध चैतन्य की सत्ता मानी जाय, अद्वैतवाद।
संज्ञा
[सं.]

ब्रह्मवादी
वेदान्ती, अद्वैतवादी।
वि.
[सं. ब्रह्मवाद]

ब्रह्मविद्या
ब्रह्म को जानने की विद्या।
संज्ञा
[सं.]

ब्रह्महत्या
ब्राह्मण-वध।
संज्ञा
[सं.]

ब्राह्मी
दुर्गा।
संज्ञा
[सं.]

ब्राह्मी
भारत की एक प्राचीन लिपि जिससे नागरी आदि लिपियाँ विकसित हुई हैं।
संज्ञा
[सं.]

ब्राह्मी
एक बूटी।
संज्ञा
[सं.]

ब्रीड़त
लजाते हो, लज्जित होते हो।
क्रि. अ
[हिं. ब्रीड़ना]
मोसौं बात सकुच तजि कहिए। कत ब्रीड़त कोउ और बतावौ, ताही के ह्वै रहियै-१-१३६।

ब्रीड़ना, ब्रीड़नो
लजाना, लज्जित होना।
क्रि. अ
[सं. व्रीडन]

ब्रीड़ा
लज्जा।
संज्ञा
[सं. व्रीडा]

ब्वै
दो।
वि.
[हिं. बिय]

देवनागरी वर्णमाला का चौबीसवाँ और पवर्ग का चौथा वर्ण जिसका उच्चारण-स्थान ओष्ठ है।

भंकार
भयानक शब्द।
संज्ञा
[सं. भय+करना]

भंग
टूटने का भाव, विनाश।
संज्ञा
[सं.]
(क) देवराज मष-भंग जानि कै बरष्यौ ब्रज पर आई-१-१२२।

भंग
बाधा, रुकावट।
संज्ञा
[सं.]
छाँड़ि मन हरि बिमुखन कौ संग। जिनके संग कुबुद्धि उपजति है, परत भजन में भंग-१-३३२।

भंग
तरंग, लहर।
संज्ञा
[सं.]

भंग
पराजय।
संज्ञा
[सं.]

भंग
खण्ड, भाग।
संज्ञा
[सं.]

भंग
टेढ़ापन।
संज्ञा
[सं.]

भंग
टेढ़े होने या झुकने का भाव।
संज्ञा
[सं.]

भंग
टेढ़ी, कुटिल, झुकी हुई।
वि.
अलक अबिरल चारु हास-बिलास भृकुटी भंग-६२७।

भंग
भाँग।
संज्ञा
[हिं. भाँग]

भंगड़
बहुत भाँग पीनेवाला।
वि.
[हिं. भाँग]

भंगना, भंगनो
टूटना।
क्रि. अ.
[हिं. भंग]

भंगना, भंगनो
हारना।
क्रि. अ.
[हिं. भंग]

भंगना, भंगनो
तोड़ना।
क्रि. स.

भंगना, भंगनो
हराना।
क्रि. स.

भंगरा, भंगरैया
भाँग के रेशे से बना मोटा कपड़ा।
संज्ञा
[हिं. भाँग]

भंगरा, भंगरैया
एक बनस्पति।
संज्ञा
[सं. भृंगराज]

भंगार
घास-फूस, कूड़ा-करकट।
संज्ञा
[हिं. भाँग]

भंगिमा
टेढ़ापन।
संज्ञा
[सं.]

भंगिमा
हाव-भाव या कोमल चेष्टाएँ।
संज्ञा
[सं.]

भंगी
भंग या नष्ट होनेवाला।
वि.
[सं. भंगिन्]

भंगी
भंग या नष्ट करनेवाला।
वि.
[सं. भंगिन्]

भंगी
मेहतर।
संज्ञा
[सं. भक्त]

भंगी
भाँग पीनेवाला, भँगेड़ी।
वि.
[हिं. भाँग]

भंगी
स्त्रियों के हाव-भाव।
संज्ञा
[सं. भंगिमा]

भंगुर
भंग होनेवाला, नाशवान।
वि.
[सं.]
(क) इहिं तन छन-भंगुर के कारन, गरबत कहा गँवार-१-८४। (ख) भ्रम्यौ बहुत लघु धाम बिलोकत छनभंगुर दुखदानी-१-८७।

भंगुर
टेढ़ा, कुटिल।
वि.
[सं.]

भँगेड़ी
खूब भाँग पीनेवाला।
वि.
[हिं. भाँग]

भंजक
भंग करने या तोड़नेवाला।
वि.
[सं.]

भंजन
नाश करनेवाला, तोड़नेवाला, भंजक।
वि.
[सं.]
(क) जन-दुख जानि, जमल-द्रुम-भंजन, अति आतुर ह्वै धाए-१-२७। (ख) रजक-मल्ल चानूरदवानल-दुख-भंजन सुखदाई-१-१५८।

भंजन
तोड़ने या भंग करने का भाव।
संज्ञा

भंजन
नाश, ध्वंस।
संज्ञा

भंजे
तोड़े, टुकड़े-टुकड़े किये।
क्रि. स.
[हिं. भंजना]

भंजे
नष्ट किये, विनाशे, दूर किये।
क्रि. स.
[हिं. भंजना]
सुदामादारिद्र भंजे कुबरी तारी-१-१७६।

भंटा
बैंगन।
संज्ञा
[सं. वृत्ताक]
भरता भँटा खटाई दीनी-2३२१।

भंड
अश्लील बातें बकनेवाला।
वि.
[सं.]

भंड
भाड़।
संज्ञा
[हिं. भाड़]

भंडता
भाँड़ों की बातें।
संज्ञा
[सं.]

भंडता
ओछी हँसी-मखौल।
संज्ञा
[सं.]

भंडना, भंडनो
हानि पहुँचाना।
क्रि. स.
[सं. भंडन]

भंडना, भंडनो
भंग करना, तोड़ना।
क्रि. स.
[सं. भंडन]

भंडना, भंडनो
नष्ट करना।
क्रि. स.
[सं. भंडन]

भँजना, भँजानो
टूटना।
क्रि. अ.
[सं. भंजन]

भँजना, भँजानो
भुनना।
क्रि. अ.
[सं. भंजन]

भँजना, भँजानो
(रस्सी आदि का) बटा जाना।
क्रि. अ.
[हिं. भाँजना]

भँजना, भँजानो
(कागज आदि का)परतों में मोड़ा जाना।
क्रि. अ.
[हिं. भाँजना]

भंजना, भंजनो
तोड़ना।
क्रि. स.
[सं. भंजन]

भँजाई
भाँजने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
संज्ञा
[हिं. भाँजना]

भँजाना, भँजानो
तुड़वाना।
क्रि. स.
[हिं. भँजना]

भँजाना, भँजानो
भुनाना।
क्रि. स.
[हिं. भँजना]

भँजाना, भँजानो
भाँजने को प्रवृत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. भाँजना]

भंजि
तोड़कर, गिराकर।
क्रि. स.
[हिं. भंजना]
बिटप भंजि, जमलार्जुन तारे, करि अस्तुति गोबिंद रिझाए-३८६।

भँडा
तोड़-फोड़ दिया, नष्ट कर दिया, अव्यव्यस्त कर दिया।
क्रि. स.
[हिं. भँडाना]
अब तौ इन्हें जकरि बाँधौंगी, इहि सब तुम्हरौ गाँव भँडायौ।

भंडार, भंडारा
कोष, खजाना।
संज्ञा
[सं. भांडागार, हिं. भंडार]
"(क) तिन हारयौ सब भूमिभँडार। हारी बहुरि द्रौपदी नार-१-२४६ (ख) हारि सकल भंडार-भूमि, आपुन बन-बास लहयौ-१.२४७।"

भंडार, भंडारा
अन्नादि रखने का कोठार।
संज्ञा
[सं. भांडागार, हिं. भंडार]

भंडार, भंडारा
व्यंजन पकाने और रखने का स्थान।
संज्ञा
[सं. भांडागार, हिं. भंडार]

भंडार, भंडारा
पेट।
संज्ञा
[सं. भांडागार, हिं. भंडार]

भंडारा
कोष
संज्ञा
[हिं. भंडार]

भंडारा
कोठार।
संज्ञा
[हिं. भंडार]

भंडारा
समूह, झुंड।
संज्ञा
[हिं. भंडार]

भंडारा
साधुओं का भोज।
संज्ञा
[हिं. भंडार]

भंडारा
पेट।
संज्ञा
[हिं. भंडार]

भंडना, भंडनो
बदनाम करना।
क्रि. स.
[सं. भंडन]

भडफोड़
बर्तन तोड़ना-फोड़ना।
संज्ञा
[हिं. भाँड़ा+फोड़ना]

भडफोड़
भंडाफोड़ करना।
संज्ञा
[हिं. भाँड़ा+फोड़ना]

भंडर, भँडरिया
पाखंडी, धूर्त।
वि.
[हिं. भंड]

भँडसार, भँडसाल
खत्ती, गोदाम।
संज्ञा
[हिं. भाँड+शाला]

भंडा
बर्तन।
संज्ञा
[सं. भाँड]

भंडा
भेद।
संज्ञा
[सं. भाँड]
भंडा फूटना - भेद खुलना। भंडा फोड़ना भेद खोलना।

भँडाई
उपद्रव।
संज्ञा
[हिं. भाँड]
काहू कै घर करत भँडाई-१०-३४०।

भँडा , भँडानो
उपद्रव रना।
क्रि. स.
[हिं. भाँड]

भँडा , भँडानो
तोड़ना-फोड़ना।
क्रि. स.
[हिं. भाँड]

भडारी
भंडार, कोष, खजाना।
संज्ञा
[हिं. भंडार]
(क) जो माँगौ सो देहुँ तुरतहीं, हीरा-रतन-भँडारी-८-१४। (ख) तिन हारयौ सब भूमि भँडारी (भँडार)-१-२४६।

भडारी
छोटी कोठरी।
संज्ञा
[हिं. भंडार]

भडारी
कोषाध्यक्ष, खजांची।
संज्ञा

भडारी
भंडार
संज्ञा

भडारी
रसोइया।
संज्ञा

भंडीर
चौलाई।
संज्ञा
[सं.]

भंडीर
बट।
संज्ञा
[सं.]

भँडेरिया
चालाकी, मक्कारी।
संज्ञा
[हिं. भंड]

भँड़ैती
भाँड़ का काम।
संज्ञा
[हिं. भांड़]

भँड़ैती
भाँड़ों की सी बातचीत या चेष्टा।
संज्ञा
[हिं. भांड़]

बाँधना
रचना की सामग्री या विचार जोड़ना।
क्रि. स.
[सं. बंधन]

बाँधना
क्रम या व्यवस्था बनाना
क्रि. स.
[सं. बंधन]

बाँधना
मन में बैठाना।
क्रि. स.
[सं. बंधन]

बाँधना
अस्त्र-शस्त्र साथ रखना।
क्रि. स.
[सं. बंधन]

बाँधनि
बाँधने की रीति, बंधन, गाँठ।
संज्ञा
[हिं. बाँधना]
छूटे बंधन अरु पाग की बाँधनि छुटी, लटपटे पेच अटपटे दिये-2००९।

बाँधनीपौरि
पशुशाला।
संज्ञा
[हिं - बाँधना+पौरि]

बाँधनू
योजना, उपक्रम।
संज्ञा
[हिं. बाँधना]

बाँधनू
मनगढ़ंत।
संज्ञा
[हिं. बाँधना]

बाँधनू
मिथ्यारोप।
संज्ञा
[हिं. बाँधना]

बाँधनू
लहरियादार रँगाई के लिए वस्त्र में बाँधा जानेवाला बंधन।
संज्ञा
[हिं. बाँधना]

भवरी
प्राणी के शरीर के ऊपर वह स्थान जहाँ के रोएं और बाल भँवर की तरह घूमे हुए हों।
संज्ञा
[हिं. भवरा]
(क) उर बनमाल बिचित्र बिमोहन, भृगु-भँवरी भ्रम कौं नासै-१-६९। (ख) उरज भँवरी भँवर मानों मीन मनि की कांति-१४१६।

भवरी
पानी का चक्कर, भँवर।
संज्ञा
[हिं. भवरा]

भवरी
भाँवर।
संज्ञा
[हिं. भाँवना]

भवरी
सौदे की फेरी।
संज्ञा
[हिं. भाँवना]

भवरी
रक्षक की गश्त।
संज्ञा
[हिं. भाँवना]

भवरी
परिक्रमा।
संज्ञा
[हिं. भाँवना]

भँवा
फेरा, चक्कर।
संज्ञा
[हिं. भँवना]

भँवाना, भँवानो
घुमाना फिराना, चक्कर देना।
क्रि. स.
[हिं. भँवना]

भँवाना, भँवानो
भ्रम या उलझन में डालना।
क्रि. स.
[हिं. भँवना]

भँवारा
घूमने-फिरनेवाला।
वि.
[हिं. भँवना]

भड़ौआ
भाँड़ों का गीत।
संज्ञा
[हिं. भाँड]

भड़ौआ
हास्य रस की साधारण कविता।
संज्ञा
[हिं. भाँड]

भँभरना
डरना, भयभीत होना।
क्रि. अ.
[हिं. भय]

भंभा, भँभा, भँभाका
बड़ा छेद।
संज्ञा
[सं. भंसस्]

भँभाना, भँभानो
गाय आदि का रँभाना।
क्रि. अ.
[अनु.]

भँभीरी
एक पतिंगा जिसकी पूछ लंबी और चार पर झिल्लीदार होते हैं।
संज्ञा
[अनु.]
बाल अवस्था मैं तुम धाइ। उड़ति भँभीरी पकरी जाइ-३-५।

भँभेरि
भय, डर।
संज्ञा
[हिं. भँभरना]

भँमर, भँमरा
बड़ी मधुमक्खी।
संज्ञा
[सं. भ्रमर]

भँवत
हिलता-डोलता या चक्कर लगाता है।
क्रि. अ.
[हिं. भँवना]
चंचल दृग अंचल-पट-दुति-छबि, 'झलकत चहुँ दिसि झालरी। मनु सेवाल कमल पर अरुझे, भँवत भ्रमर भ्रम-चाल री-१०-१४०।

भँवन
घूमना, भ्रमण।
संज्ञा
[सं. भ्रमण]

भँवना, भँवनी
घूमना।
क्रि. अ.
[सं. भ्रमण]

भँवना, भँवनी
चक्कर काटना।
क्रि. अ.
[सं. भ्रमण]

भँवर
भौंरा।
संज्ञा
[सं. भ्रमर, पा. भमर, प्रा. भँवर]

भँवर
जल का चक्करदार धुमाव।
संज्ञा
[सं. भ्रमर, पा. भमर, प्रा. भँवर]

भँवर
गड्ढा।
संज्ञा
[सं. भ्रमर, पा. भमर, प्रा. भँवर]
उरज भँवरी भंवर मानो मीन मनि की कांति-१४१६।

भँवरजाल
मोह-माया के सांसारिक झगड़े।
संज्ञा
[हिं. भँवर+जाल]

भँवरना, भँवरनो
घूमना।
क्रि. अ.
[हिं. भ्रमना]

भँवरना, भँवरनो
चक्कर लगाना।
क्रि. अ.
[हिं. भ्रमना]

भँवरभीख
तीन प्रकार की भिक्षा में से दूसरी जो घूम-घूमकर माँगी जाय।
संज्ञा
[हिं. भँवर+भीख]

भँवरा
भौंरा।
संज्ञा
[हिं. भँवर]
(क) ज्यौं-भँवरा रस चाखि चाहि कै तहाँ जाइ जहाँ नव तन जानै-2६९८। (ख) आपुहिं भँवरा आपुहिं फूल-३४०७।

भकुआना, भकुआनो
घबरा देना।
क्रि. स.
[हिं. भकुआ]

भकुआना, भकुआनो
मूर्ख बनाना।
क्रि. स.
[हिं. भकुआ]

भकोसना, भकोसनो
जल्दी-जल्दी खाना।
क्रि. स.
[सं. भक्षण]

भक्त
कई भागों में बाँटा हुआ।
वि.
[सं.]

भक्त
अनुयायी।
वि.
[सं.]

भक्त
भजन या भक्ति करनेवाला।
वि.
[सं.]
भक्त (भक्तनि) हित तुम कहा न कियौ-१-२६।

भक्तपन
भक्ति।
संज्ञा
[सं. भक्त+हिं. पन]

भक्तबछल, भक्तबच्छल, भक्तबत्सल, भक्तबत्सल
भक्तों पर कृपा रखनेवाला।
[सं.भक्तवत्सल]
(क) सूरदास प्रभु भक्त-बछल तुम पावन-नाम कहाए हो-१.७। (ख) कुसल प्रसननि कहे तुरत मन काम लहि भक्तबत्सल नाम भक्त गावैं-2५८८।

भक्ता
भक्ति करनेवाला।
वि.
[सं. भक्त]
इह सुन के भृगं कह्यौ, नारद आदिक हरि-भक्ता-१८६१।

भक्ताई
भक्ति।
संज्ञा
[हिं. भक्त+आई]

भँवारे
चक्कर लगानेवाले, घूमने फिरने वाले।
वि.
[हिं. भँवारा]
तुम कारे सुफलकसुत कारे, कारे मधुप भँवारे।

नक्षत्र।
संज्ञा
[सं.]

भूधर।
संज्ञा
[सं.]

भौंरा।
संज्ञा
[सं.]

भइया
भाई।
संज्ञा
[हिं. भाई]

भइया
एक प्रेम या स्नेह-सूचक संबोधन।
संज्ञा
[हिं. भाई]

भइ
हुई।
क्रि. अ.
[हिं. भई]
सिंह आगैं, सेष पाछैं, नदी भइ भरिपूरि-१०.५।

भईं
हुई.
क्रि अ.
[हिं. हुई]
जुवति बनि भईं ठाढ़ी और पहिरे चीर-१८५२।

भईं
निकलीं, उगी, जन्मीं।
क्रि अ.
[हिं. हुई]
दुहुँधा द्वैं दँतुली भईं, मुख अति छबि पावत-१०-१२२।

भई
हुई, घटित हुई।
क्रि. अ.
[हिं. हुई]
(क) पाछे भई सु भई सूर जन, अजहूँ समुझि सँभारि-2-३१। (ख) तातैं भई यज्ञ की हान-४-५।

भउजाई
भावज, भाभी।
संज्ञा
[हिं. भौजाई]

भए
हुए, हो गये, प्रतिष्ठित हुए, बने।
क्रि. अ.
[हिं. होना]
(क) कहा कूबरी सील-रूप-गुन ? बस भए स्याम त्रिभंगी-१-२१। (ख) पारथ के सारथि हरि आप भए हैं-१-२२। (ग) काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह ये भए चोर तैं साहु-१-४०।

भए
जन्मे, अवतरे, पैदा हए।
क्रि. अ.
[हिं. होना]
प्राचीनबर्हि भूप इक भए-४-१२।

भऐं
होने पर, हो जाने पर।
क्रि. अ.
[हिं. होना]
बिरध भऐं कफ कंठ बिरोध्यौ, सिर धुनि धुनि पछितानौ-१-३२९।

भक
सहसा जल उठना।
संज्ञा
[अनु.]

भकभकाना
भकभक' करके जलना।
क्रि. अ.
[अनु.]

भकभूरि
उजड्ड।
वि
[सं. भेक]

भकभूरि
उजड्ड।
वि
[सं. भेक]

भकुआ
मूर्ख।
वि.
[सं. भेक]

भकुआना, भकुआनो
घबरा जाना।
क्रि. अ.
[हिं. भकुआ]

भखना
निगल जाना।
क्रि. स.
[सं. भक्षण, प्रा. भक्खन]

भखि
खाकर।
क्रि. स.
[हिं. भखना]
दादुर जल बिनु जिवै पवन भखि, मीन तजै हठि प्रान-३३५७।

भखिहैं
भक्षण करेंगे, खायँगे।
क्रि. स.
[हिं. भखना]
कृमि-पावक तेरौ तन भखिहैं,-१-३१९।

भग
स्त्री की योनि या जननेंद्रिय।
संज्ञा
[सं.]
इहिं अंतर गौतम गृह आयौ। इंद्र जानि यह बचन सुनायौ।...इक भग की तोहिं इच्छा भई भग सहस्र मैं तोकौं दई-६-८।

भग
ऐश्वर्य।

भगई
लँगोटी।
संज्ञा
[हिं. भगवा]

भगण
छंदशास्त्र में एक गण।
संज्ञा
[सं.]

भगत
भक्ति करनेवाला, उपासक।
वि.
[सं. भक्त]
भगत-बिरह कौ अति हीं कादर, असुर-गर्ब-बल नासत-2-३१।

भगत
साधु।
संज्ञा

भगत
भूत-प्रेत उतारनेवाला ओझा।
संज्ञा

भक्ति
भागों में बाँटना।
संज्ञा
[सं.]

भक्ति
भाग।
संज्ञा
[सं.]

भक्ति
पूजा, अर्चन।
संज्ञा
[सं.]

भक्ति
श्रद्धा।
संज्ञा
[सं.]

भक्ति
अनुराग।
संज्ञा
[सं.]

भक्ति
ईश्वर में श्रद्धापूर्ण अनुराग। इसके नौ भेद हैं-श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पाद सेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन।
संज्ञा
[सं.]

भक्ष
खाने का पदार्थ, भोजन।
संज्ञा
[सं.]

भक्ष
खाने का काम।
संज्ञा
[सं.]
जूठे की कछु संक न मानी भक्ष किए सत भाई।

भक्षक
खाने या भक्षण करनेवाला।
वि.
[सं.]

भक्षण
भोजन।
संज्ञा
[सं.]

भक्षण
भोजन करना।
संज्ञा
[सं.]

भक्षत
भोजन करता है।
क्रि. स.
[हिं. भक्षना]

भक्षना, भक्षनी
भोजन करना।
क्रि. स.
[सं. भक्षण]

भक्षिए, भक्षिये
खाइये।
क्रि. स.
[हिं. भक्षण]

भक्षित
खाया हुआ।
वि.
[सं.]

भक्षी
खानेवाला, भक्षक।
वि.
[सं. भक्षिन्]

भक्ष्य
खाने या भक्षण करने योग्य।
वि.
[सं.]

भक्ष्य
भोजन, आहार।
संज्ञा

भख
आहार, भोजन।
संज्ञा
[सं. भक्ष, प्रा. भक्ख]
बेद-बेदांत उपनिषद अरपै सो भख भोक्ता नाहिं।
भख करना - भोजन करना।

भखना
भोजन करना।
क्रि. स.
[सं. भक्षण, प्रा. भक्खन]

भगवत्
ईश्वर।
संज्ञा

भगवत्
विष्णु।
संज्ञा

भगवत्
शिव।
संज्ञा

भगवत्पदी
गंगा:
संज्ञा
[सं.]

भगवदीय
भगवान का (भक्त)।
वि.
[सं. भगवत्]

भगवद्गीता
एक प्रसिद्ध संस्कृत ग्रंथ जो हिन्दू धर्म का सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ माना जाता है और सभी भारतीय संप्रदायों में मान्य है।
संज्ञा
[सं.]

भगवद्भक्त
ईश्वर का भक्त
संज्ञा
[सं.]

भगवान, भगवान्
ऐश्वर्य, बल, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य-इन छह गुणों से युक्त।
वि.
[सं. भगवत् का एक.]

भगवान, भगवान्
पूज्य।
वि.
[सं. भगवत् का एक.]

भगवान, भगवान्
ईश्वर।
संज्ञा

बाँधना
रस्सी, डोरी आदि से कसकर बंदी बनाना।
क्रि. स.
[सं. बंधन]

बाँधना
रस्सी, डोरी आदि लपेटकर गाँठ लगाना।
क्रि. स.
[सं. बंधन]

बाँधना
गाँठ जोड़कर कसना।
क्रि. स.
[सं. बंधन]

बाँधना
बंधन में डालना, कैद करना।
क्रि. स.
[सं. बंधन]

बाँधना
नियम या अधिकार आदि से मर्यादित रखना।
क्रि. स.
[सं. बंधन]

बाँधना
तंद्र - मंत्र आदि से शक्ति या गति बाधित करना।
क्रि. स.
[सं. बंधन]

बाँधना
प्रेम के बंधन में डालना।
क्रि. स.
[सं. बंधन]

बाँधना
निश्चित या नियत करना।
क्रि. स.
[सं. बंधन]

बाँधना
बाँध कर घुस्स बनाना।
क्रि. स.
[सं. बंधन]

बाँधना
चूर्ण आदि के पिंड बनाना।
क्रि. स.
[सं. बंधन]

भगतबछल, भगतबच्छल, भगतबत्सल, भक्तवत्सल
भक्त पर कृपा रखनेवाला।
वि.
[सं. भक्त-वत्सल]

भगति, भगती
पूजा,अर्चना।
संज्ञा
[सं. भक्ति]
परमारथ सौं बिरत, बिषय-रत, भावभगति नहिं नैंकहु जानी-१-१४९।

भगति, भगती
श्रद्धा।
संज्ञा
[सं. भक्ति]

भगति, भगती
विश्वास।
संज्ञा
[सं. भक्ति]

भगदत्त
प्राग्ज्योतिषपुर का राजा जो नरकासुर का पुत्र था और महाभारत के युद्ध में कौरवों की ओर से लड़ा था।
संज्ञा
[सं.]
इत भगदत्त, द्रोन, भूरिस्रव, तुम ( भीष्म ) सेनापति धीर-१-२६९।

भगदड़, भगदर
बहुत से लोगों के दौड़ने-भागने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. भागना+दौड़ना]

भगन
भग्न, टूटा फूटा।
वि.
[सं. भग्न]

भगना
भागना।
क्रि. अ.
[हिं. भागना]

भगना
बहन का लड़का, भानजा।
संज्ञा
[सं. भागनेय]

भगनी
बहन।
संज्ञा
[सं. भगिनी]

भगर, भगल, भगली
छल-कपट।
संज्ञा
[देश.]

भगर, भगल, भगली
लूट-खसोट।
संज्ञा
[देश.]

भगर, भगल, भगली
जादू।
संज्ञा
[देश.]

भगवंत
भगवान, ईश्वर।
संज्ञा
[सं. भगवत् का बहु. भगवंत]
(क) भक्त सात्विकी सेवै संत। लखै तिन्है मूरति भगवंत-३-१३। (ख) मानि भगवंतआज्ञा सो आयौ तहाँ...-८-८।

भगवती
देवी।
संज्ञा
[सं.]

भगवती
गौरी।
संज्ञा
[सं.]

भगवती
सरस्वती।
संज्ञा
[सं.]

भगवती
गंगा।
संज्ञा
[सं.]
त्रिभुवन-हार सिंगार भगवती सलिल चराचर जाके ऐन-९-१२।

भगवत्
ऐश्वर्ययुक्त।
वि.
[सं.]

भगवत्
पूज्य।
वि.
[सं.]

भगेड़ ,भगोड़ा
काम पड़ने पर भागनेवाला, कायर।
वि.
[हिं. भागना]

भगौती
देवी, भगवती।
संज्ञा
[सं. भगवती]

भगौहाँ
भाग जाने वाला, भागने को प्रस्तुत।
वि.
[हिं. भागना+औहाँ]

भगौहाँ
कायर।
वि.
[हिं. भागना+औहाँ]

भगौहाँ
गेरू से रँगा हुआ, भगवा।
वि.
[हिं. भगवा]

भग्गुल, भग्गू
भागनेवाला, कायर।
वि.
[हिं. भागना]

भग्न
टूटा हुआ।
वि.
[सं.]
भग्न भाजन कंठ, कृमि सिर, कामिनी-आधीन-१-३२१।

भग्न
पराजित।
वि.
[सं.]

भग्नावशेष
खँडहर।
संज्ञा
[सं.]

भग्नावशेष
टूटा-फूटा टुकड़ा या अंश।
संज्ञा
[सं.]

भगाना, भगानो
भागना, दौड़ना।
क्रि. अ.

भगाने
भाग गये।
क्रि. अ.
[हिं. भागना]
सूर निरखि मुख सकुचि भगाने-६९५।

भगाड़, भगार
भागने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. भागना]
मल्ल सुभट परे भगार कृष्ण को परिसाने-2६१३।

भगिनी
बहन, सहोदरा।
संज्ञा
[सं.]
सती कह्यो, मम भगिनी सात। सबै बुलाई ह्वै हैं तात-४-५।

भगिनीय
बहन का लड़का, भानजा।
संज्ञा
[सं.]

भगी
भाग गयी, चली गयी।
क्रि. अ.
[हिं. भागना]
सुपनेउ के सुख न सहि सकी नींद जगाइ भगी २७९०।

भगीरथ
अयोध्या के एक राजा जो दिलीप के पुत्र थे और जिनकी तपस्या से संतुष्ट होकर गंगा पृथ्वी पर आयी थी।
संज्ञा
[सं.]
बहुरि भगीरथ तप बहु कियौ। तब गंगा जू दरसन दियौ-९.९।

भगे
भाग गये।
क्रि. अ.
[हिं. भागना]

भगे
दूर हो गये, हट गये।
सूर स्याम ऐसे तैं देखे मैं जानति दुख दूर भगे-१३१८।

भगेड़ ,भगोड़ा
छिपकर भागनेवाला।
वि.
[हिं. भागना]

भगवान, भगवान्
विष्णु।
संज्ञा

भगवान, भगवान्
शिव।
संज्ञा

भगवान, भगवान्
कोई परम आदरणीय व्यक्ति।
संज्ञा

भगाइ
भगाकर, छिपाकर, हराकर !
क्रि. स.
[हिं. भगाना]
कै बालकनि भगाई जाहिं लै आन भूमि पर-५८९।

भगाई
भागकर, दौड़कर।
क्रि. अ,
[हिं. भागना]

भगाई
गए भगाई-भाग गए
प्र.
सखा सहित बलराम छपाने जहँ-तहँ गए भगाई-१०-२४०।

भगाऊँ
भागने को प्रवृत्त करूँ।
क्रि. स.
[हिं. भगाना]

भगात
भागता है।
क्रि. अ.
[हिं. भागना]
जोइ लीजै सोई है अपनो जैसे चोर भगात-पृ. ३२४(३२)।

भगाना, भगानो
भागने को प्रवृत्त करना, दौड़ना।
क्रि. स.
[हिं. भागना]

भगाना, भगानो
खदेड़ना, हटाना।
क्रि. स.
[हिं. भागना]

भग्यो, भग्यौ
भागा, दौड़ा।
क्रि. अ.
[हिं. भागना]
(क) अस्वत्थामा भय करि भन्यो-१-२८९। (ख) कौन कौन को उत्तर दीजै ताते भग्यो अगाऊँ-३४६६।

भचकना, भचकनो
अचरज से स्तब्ध या हक्काबक्का रह जाना।
क्रि. अ.
[हिं. भौचक]

भचकना, भचकनो
लचककर या कुछ लँगड़ाकर चलना।
क्रि. अ.
[अनु. भच]

भच्छ
भोजन, आहार।
संज्ञा
[सं. भक्ष्य]

भच्छक
भक्षण करनेवाला।
संज्ञा
[सं. भक्षक]

भच्छति
खाती है, भक्षण करती है।
क्रि. स
[हिं. भच्छना]
माधौ, नैकु हटको गाइ।...। और अहित अभच्छ भच्छति, कला बरनि न जाइ-१-५६

भच्छन
भोजन, आहार।
संज्ञा
[सं. भक्षण]
बिधि-बाहन-भच्छन की माला, राजत उर पहिराए-४१७।

भच्छना, भच्छनो
भक्षण करना।
क्रि. स.
[सं. भक्षण]

भच्छि
भक्षण करके, खाकर।
क्रि. स.
[हिं. भच्छना]
भच्छि अभच्छ, अपान पान करि, कबहुँ न मनसा धापी.-१-१४०।

भछना, भछनो
खाना,।
क्रि. स.
[हिं. भच्छना]

भजना, भजनो
जपना, स्मरण करना।
क्रि. स.
[सं. भजन]

भजना, भजनो
आश्रित होना।
क्रि. स.
[सं. भजन]

भजना, भजनो
भाग जाना।
क्रि. अ.
[सं. व्रजन, प्रा. वजन]

भजना, भजनो
पहुँचना।
क्रि. अ.
[सं. व्रजन, प्रा. वजन]

भजनानंद
भजन-भाव से प्राप्त होनेवाला आनन्द या सुख।
संज्ञा
[सं.]

भजनानंदी
सदैव भजन के आनन्द में ही मग्न रहनेवाला।
वि.
[सं.]

भजनी, भजनीक
भजन करने योग्य।
वि.
[सं. भजनीय]

भजनी, भजनीक
भजन करनेवाला।
संज्ञा
यह प्रताप दीपक सुनिरंतर, लोक सकल भजनी-2.२८।

भजनीय
सेवा-पूजा करने योग्य।
वि.
[सं.]

भजनीय
भजने योग्य।
वि.
[सं.]

भछ्यो, भछ्यौ
खाया, भक्षण किया।
क्रि. स.
[हिं. भच्छना]
कहियत गुन प्रबीन है राधा क्रोधही में बिष भछ्यो्-2२५९।

भजक
भजन करनेवाला।
वि.
[सं.]

भजक
भाग करनेवाला।
वि.
[सं.]

भजत
भजन करता है, स्मरण करता है, चित्त लगाता है।
क्रि. स.
[हिं. भजना]
(क) सूर कहत जे भजत राम कौं, तिनसौं हरि सौं सदा बनी-१-३९।

भजत
वासना का भाव मन में लाता है, वासना के भाव से स्मरण करता या ध्यान लगाता है।
क्रि. स.
[हिं. भजना]
पंजा पंच प्रपंच नारि-पर भजत सारि फिरि मारी-१-६०।

भजत
भागता है, दौड़ता है।
क्रि. अ.
[हिं. भागना]
भजत सखनि समेत मोहन देखि ब्याई गाय-४९८।

भजन
सेवा, पूजा।
संज्ञा
[सं.]

भजन
स्मरण,जप।
संज्ञा
[सं.]
स्याम भजन बिनु कौन बड़ाई-१-२४।

भजन
ऐसा गीत जिसमें देवी-देवता का गुण-गान हो।
संज्ञा
[सं.]

भजना, भजनो
सेवा-पूजा करना।
क्रि. स.
[सं. भजन]

भजिबौ
भजने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. भजना]
जिहिं तन हरि भजिबौ न कियौ। सो तन सूकर-स्वान-मीन ज्यौं, इहिं सुख कहा जियौ-2-१६।

भजियाउर
चावल, दही, घी आदि का बना नमकीन भोजन।
संज्ञा
[हिं. भाजी+चाउर = चावल]

भजियै
भजन कीजिए, जपिए।
क्रि. स.
[हिं. भजना]
सदा सँघाती श्री जदुराइ। भजियै ताहि सदा लव लाइ.-७-२.।

भजी
भागी, दौड़ी।
क्रि. अ.
[हिं. भजना = भागना]

भजे
भागे, दौड़े।
क्रि. अ.
[हिं. भजना= भागना]

भजे
शरण ली, आश्रित हुए।
क्रि. स.
[हिं. भजना]
(क) जे जन सरन भजे बनवारी। ते-ते राखि लिए जग जीवन, जहँ जहँ बिपति परी तहँ टारी-१-२२। (ख) बिषयी भजे, बिरक्त न सेए मन धन-धाम धरे.-१-१९८।

भजे
स्मरण किया, जप किया।
क्रि. स.
[हिं. भजना]
(क) पाँडव पाँच भजे प्रभु चरननि, रनहिं जिताए हैं जदुराई-१-२४। (ख) सूर सबै तजि हरि-पद भजे-१-२८८।

भजैं
स्मरण करें, ध्यान लगायें।
क्रि. स
[हिं. भजना]
और सकल तजि मोकौं भजैं-९-५।

भजैं
भागें, दूर जायँ।
क्रि. अ.
[हिं. भजना= भगना]
(धनु) बेनु स्रवन सुनि, गोबर्धन तैं, तृन दंतनि धरि चालीं। आई बेगि सूर के प्रभु पै, ते क्यौं भजै जे पाली-६१३।

भज
स्मरण करे, जपे।
क्रि. स.
[हिं. भजना]
मनबच-क्रमजौ भजै स्यामकौं, चारि पदारथ देत-१-२९६।

भजहु
भजन करो, स्मरण करो, जपो।
क्रि. स.
[हिं. भजना]
भजहु न मेरे स्याम मुरारी-१-२१२।

भजाइ
हटाकर।
क्रि. स.
[हिं. भजाना]

भजाइ
लेत भजाइ-हटा लेता है।
प्र.
कीर पिंजरै गहत अँगुरी ललन लेत भजाइ-४९८।

भजाना, भजानो
भागना।
क्रि. अ.
[हिं. भजना]

भजाना, भजानो
भगाना।
क्रि. स.
[हिं. भजना]

भजाना, भजानो
भगाना।
क्रि. स.
[हिं. भजना]

भजायौ
भगाया, दौड़ाया, भटकाया।
क्रि. स.
[हिं. भजाना]
अब तौ इन्हैं जकरि धरि बाँधौं, इहि सब तुम्हरौ गाउँ भजायौ-१०-३४०।

भजि
भागकर।
क्रि. अ.
[हिं. भजना = भगना]

भजि
जैहै भजि-भाग जायगा।
प्रा.
जाकौ सुजस सुनत अरु गावत जैहै पाप-बृंद भजि भरहरि-१-३१२।

भजिऐ
स्मरण कीजिए, जपिए।
क्रि. स.
[हिं. भजना]
सब तजि भजिऐ नंदकुमार-१-६७।

बाँधनू
बंधन बाँधकर रंगा जानेवाला बंधन।
संज्ञा
[हिं. बाँधना]

बाँधव
भाई-बंधु।
संज्ञा
[सं.]

बाँधव
संबंधी, आत्मीय।
संज्ञा
[सं.]

बाँधव
मित्र, सखा।
संज्ञा
[सं.]

बाँधि
नियत करके, स्थिर करके, ठहराकर |
क्रि. स.
[हिं. बाँधना]
साँचौ सो लिखहार कहावै। कायाग्राम मसाहत करिकै, जमा बाँधि ठहरावै-१-१४२।

बाँधी
बाँध ली, लपेटकर गाँठ दी।
क्रि. स.
[हिं. बाँधना]
बाँधी मोट पसारि त्रिविध गुन, नहिं कहुँ बीच उतारौ-१-१५२।

बाँधौंगी
बंधन में डालूँगी।
क्रि. स.
[हिं. बाँधना]
अब मैं याहि जकरि बाँधौंगी-१०-३३०।

बाँध्यौ
बँध गया, अटक गया, स्वच्छंद न रहा, प्रतिबंधित हुआ।
क्रि. स.
[हिं. बँधना]
माया सबल धाम-धन बनिता बाँध्यौ हौं इहिं साज-१-१०८।

बाँबी, बाँमी
दीमकों का भीटा।
संज्ञा
[सं. वल्मीक, हिं. बाँबी]

बाँबी, बाँमी
साँप का बिल।
बाँबी पर अहि करत लराई-३९१।

भज
भागती है, शीघ्रता से जाती है।
क्रि. अ.
[हिं. भजना = भागना]
ज्यौं पति सौं त्रिय रति करै। जैसे सरिता सिंधुहिं भजै-पृ. ३६० (५)।

भजौं
भजन करूँ, स्मरण करूँ।
क्रि. स.
[हिं. भजना]
(क) करौं जतन, न भजौं तुमकौं, कछुक मन उपजाइ-१-४५। (ख) तुमहिं समान और नहिं दूजौ काहि भजौं हौं दीन-१-१११।

भजौ
स्मरण करो, ध्यान लगाओ।
क्रि. स.
[हिं. भजना]
दृढ़ बिस्वास भजौ नँदलालहिं-१-७४।

भज्यौ
भजन किया, जपा, स्मरण किया।
क्रि. स.
[हिं. भजना]
अब हौं माया-हाथ बिकानौ। परबस भयौ पसू ज्यौं रजु-बस, भज्यौ न श्रीपति रानौ-१-४७।

भज्यौ
भागा, पलायन किया।
क्रि. अ.
[हिं. भजना= भागना]
नरकौ भज्यौ नाम सुनि मेरो, पीठि दई जमराज-१-९६।

भट
योद्धा, वीर।
संज्ञा
[सं.]
(क) द्वार-कपाट कोट भट रोके-१०-११। (ख) उठी बहुरि सँभारि भट ज्यौं परम साहस कीन-३४५१।

भटई
भाट का काम, भाव या मजदूरी।
संज्ञा
[हिं. भाट]

भटई
कोरी प्रशंसा या चाटुकारी।
संज्ञा
[हिं. भाट]

भटकत
खोजता-फिरता है, मारा-मारा घूमता है।
क्रि. अ.
[हिं. भटकना]
भटकत फिरयौ स्वान की नाईं नैंकु जूठ कैं चाइ-१-१५५।

भटकाई, भटकटैया
एक काँटेदार झाड़।
संज्ञा
[सं. कंटकारी]

भटकै
मारा-मारा फिरता है, व्यर्थ घूमता है।
क्रि. अ.
[हिं. भटकना]
ऐसौ प्रभू छाँड़ि क्यों भटकै, अजहूँ चेति अचेत-१-२९६।

भटकैया
भटकावे या भुलावे में डालनेवाला।
संज्ञा
[हिं. भटकना]

भटकैया
भटकने या भ्रम में पड़ने वाला।
संज्ञा
[हिं. भटकना]

भटकौंहाँ
भटकानेवाला।
वि.
[हिं. भटकना + औहाँ]

भटभेरा
योद्धाओं की भिड़ंत।
संज्ञा
[हिं. भट+भिड़ना]

भटभेरा
धक्का, टक्कर।
संज्ञा
[हिं. भट+भिड़ना]

भटभेरा
आकस्मिक भेंट।
संज्ञा
[हिं. भट+भिड़ना]

भटू
सखी।
संज्ञा
[सं. बधू]

भटू
स्त्रियों के लिए प्रेम और आदरसूचक एक संबोधन।
संज्ञा
[सं. बधू]

भटैया
भटकटैया।
संज्ञा
[हिं. भटकटैया]

भटकना, भटकनो
खोजते फिरना, मारे-मारे घूमना।
क्रि. अ.
[सं. भ्रम]

भटकना, भटकनो
रास्ता भूलकर धूमना।
क्रि. अ.
[सं. भ्रम]

भटकना, भटकनो
भ्रम में पड़ना।
क्रि. अ.
[सं. भ्रम]

भटकाना, भटकानो
व्यर्थ मारे-मारे घुमाना-फिराना।
क्रि. स.
[हिं. भटकना]

भटकाना, भटकानो
भ्रम में डालना।
क्रि. स.
[हिं. भटकना]

भटकि
मारे-मारे फिरकर, व्यर्थ इधर-उधर घूमकर।
क्रि. अ.
[हिं. भटकना]
श्रीभागवत सुन्यौ नहिं कबहूँ, बीनहिं भटकि मरयौ-१-२९१।

भटकी
भूली हुई, रास्ता भूल जाने के कारण इधर-उधर घूमती फिरती हुई।
क्रि. अ.
[हिं. भटकना]

भटकी
जैहैं भटकी- भटक जायँगी, मार्ग भूलकर इधर-उधर फिरने लगेंगी।
प्र.
अबकैं अपनी हटकि चरावहु, जैहै भटकी घाली-५०३।

भटके
भ्रम में पड़ गये।
क्रि. अ.
[हिं. भटकना]
ऊधौ भूलि भले भटके-३१०७।

भटकैं
मारे-मारे या भटका-भटका फिरता हुआ।
क्रि. अ.
[हिं. भटकना]
जनम सिरानौ अटकैं अटकैं। राजकाज, सुतबित की डोरी, बिन बिवेक फिरयो भटकैं-१-२९२।

भट्ट
ब्राह्मणों की एक उपाधि।
संज्ञा
[सं. भट]

भट्ट
भाट।
संज्ञा
[सं. भट]

भट्ट
योद्धा, भट।
संज्ञा
[सं. भट]

भट्टारक
राजा।
संज्ञा
[सं.]

भट्टारक
मान्य, माननीय।
वि.

भट्‌ठा
बहुत बड़ी भट्ठी।
संज्ञा
[हिं. भट्ठा]

भट्ठी
विशेष आकार-प्रकार का बड़ा चूल्हा।
संज्ञा
[सं. भ्राष्ट्र, प्रा. भट्ठ]

भठियारपन
लड़ना, झगड़ना और गाली बकना।
संज्ञा
[हिं. भठियारा + पन]

भठियारा
सराय का प्रबंधक।
संज्ञा
[हिं. भट्ठी]

भड़वा
दिखावटी शान।
संज्ञा
[सं. विडंबन]

भड़भूँजा
भाड़ झोंकनेवाला।
संज्ञा
[हि.भाड़+ भूँजन]

भड़ास
गुप्त क्रोध या असंतोष जो विशेष अवसर पर प्रकट किया जाय।
संज्ञा
[अनु.]

भड़िहा
चोर।
संज्ञा.
[सं भाँडहर]

भड़िहाई
चोरों की तरह लुक छिपकर या आँख बचाकर।
क्रि. वि.
[हिं. भाँङहर]

भड़ी
भड़काने के लिए दिया गया झूठा बढ़ावा।
संज्ञा
[हिं. भड़क]

भड़ुआ
वेश्याओं का दलाल।
संज्ञा
[हिं. भाँड़]

भणना
कहना, बोलना।
क्रि. अ.
[सं. भग]

भणित
बात, कथा।
संज्ञा
[सं.]

भणित
कविता।
संज्ञा
[सं.]

भणित
जो कहा गया हो, कहा हुआ।
वि.

भड़काना, भड़कानो
डराना, चौकाना।
क्रि. स.
[हिं. भड़कना]

भड़काना, भड़कानो
शारीर में गर्मी पहुँचाना।
क्रि. स.
[हिं. भड़कना]

भड़कीला
खूब चमक-दमकवाला।
वि.
[हिं. भड़क]

भड़कीला
जल्दी चौकन्ना हो जाने वाला।
वि.
[हिं. भड़क]

भड़भड़
भड़' होने का शब्द।
संज्ञा
[अनु.]

भड़भड़
भड़' होने का शब्द। भीड़-भब्बड़ की गड़बड़। व्यर्थ की बातचीत।
संज्ञा
[अनु.]

भड़भड़
भड़' होने का शब्द। भीड़-भब्बड़ की गड़बड़। व्यर्थ की बातचीत।
संज्ञा
[अनु.]

भड़भड़ाना, भड़भड़ानो
भड़भड़' शब्द करना।
क्रि. स.
[अनु.]

भड़भड़ाना, भड़भड़ानो
भड़भड़' शब्द होना।
कि. अ.

भड़भाड़िया
व्यर्थ बकनेवाला।
वि.
[हिं. भड़भड़]

भड़क
ऊपरी चमकदमक।
संज्ञा
[अनु.]

भड़क
डरने-सहमने का भाव।
संज्ञा
[अनु.]

भड़कदार
जिसमें खूब चमक-दमक हो।
वि.
[हिं. भड़क + फा. दार]

भड़कदार
रोबदार।
वि.
[हिं. भड़क + फा. दार]

भड़कना, भड़कनो
बढ़ना, तेज होना
क्रि. अ.
[हिं. भड़क]

भड़कना, भड़कनो
चौंककर पीछे हटना।
क्रि. अ.
[हिं. भड़क]

भड़कना, भड़कनो
उत्तेजित होना।
क्रि. अ.
[हिं. भड़क]

भड़कना, भड़कनो
शरीर में गर्मी आना।
क्रि. अ.
[हिं. भड़क]

भड़काना, भड़कानो
बढ़ाना, तेज करना।
क्रि. स.
[हिं. भड़कना]

भड़काना, भड़कानो
उत्तेजित करना।
क्रि. स.
[हिं. भड़कना]

भद्र
क्षेम-कुशल।
संज्ञा
[सं.]

भद्र
महादेव।
संज्ञा
[सं.]

भद्र
ब्रज के चौबीस वनों में एक।
संज्ञा
[सं.]

भद्र
खग पक्षी।
संज्ञा
[सं.]

भद्रकाली
दुर्गा देवी।
संज्ञा
[सं.]

भद्रता
शिष्टता, सज्जनता।
संज्ञा
[सं.]

भद्रवन
मथुरा के पास का एक वन।
संज्ञा
[सं.]

भद्रा
श्रीकृष्ण की एक पत्नी जो केकयराज की पुत्री थी।
संज्ञा
[सं.]
भद्रा व्याहि आप जब आये, द्वारावती अनंद-सारा. ६५७।

भद्रा
आकाश गंगा।
संज्ञा
[सं.]

भद्रा
द्वितिया, सप्तमी और द्वादशी तिथियों की संज्ञा।
संज्ञा
[सं.]

भतरौड़
मथुरा-वृन्दावन के बीच एक स्थान जहाँ चौवों की स्त्रियों से भात माँगकर श्रीकृष्ण द्वारा खाये जाने की बात कही जाती है।
संज्ञा
[हिं. भात]

भतरौड़
मंदिर का शिखर।
संज्ञा
[हिं. भात]

भतवान
विवाह की एक रीति जिसमें विवाह के एक दिन पूर्व वर और उससे छोटों को कच्ची रसोई खिलायी जाती है।
संज्ञा
[हिं. भात+वान]

भतार, भतारी
पति।
संज्ञा
[सं. भर्तार]

भतीजा
भाई का पुत्र।
संज्ञा
[सं. भ्रातृज]

भत्ता
यात्रा आदि के लिए, वेतन के अतिरिक्त दिया जानेवाला धन।
संज्ञा
[सं. भरण]

भद
तुच्छ या हास्यास्पद बात या आचरण।
संज्ञा
[हिं. भद्दा]

भदईं
भादों का, भादों-सम्बन्धी।
वि.
[हिं. भादों]

भदभद
बहुत मोटा।
वि.
[अनु.]

भदभद
भद्दा।
वि.
[अनु.]

भदेस, भदेसिल
भोंडा, कुरूप।
वि.
[हिं. भद्दा]

भदैला
भादों का, भादों संबंधी।
वि.
[हिं. भादों]

भदौंह
भादों में होनेवाला।
वि.
[हिं. भादों]

भद्दा
कुरूप, बेडौल, बेढंगा।
वि.
[अनु. भद]

भद्दा
अनुचित।
वि.
[अनु. भद]

भद्दा
अश्लील।
वि.
[अनु. भद]

भद्दापन
भद्दे होने का भाव।
संज्ञा
[हिं. भद्दा+पन]

भद्र
सिर, दाढ़ी, मूछ आदि का मुंडन।
संज्ञा
[सं. भद्राकरण]
राम पै भरत चले अतुराई।...। लीनौ हृदय लगाइ सुर-प्रभु, पूछत भद्र भए क्यौं भाइ-९-५१।

भद्र
सभ्य
वि.
[सं.]

भद्र
मंगलकारी।
वि.
[सं.]

बाँही
बाँह।
संज्ञा
[हिं. बाँह]
ऊखल सों बाँध्यौ सुत बाँही-३९१।

बा
जल, पानी।
संज्ञा
[सं. वा= जल]
(क) बा-बा-पति-अग्रज-अंबा के भानुथान सुत हीन हियो री। (ख) बा-निवास-रिपुधर-रिपु लै सर सदा सूल सुख पेरै। बा-ज्वर नीतन ते सारंग अति बार-बार झर लखै।

बा
दफा, मरतबा, बार।
संज्ञा
[फ़ा. बार]

बाइ
वायु, हवा।
संज्ञा
[सं. वायु या वात]
बारि मैं ज्यौं उठत बुदबुद लागि बाइ बिलाइ-१-३१६।

बाइ
छोटा जलाशय, बावली।
संज्ञा
[सं. वापी]
भानै मठ कूप बाइ सरवर कौ पानी-९- ९६।

बाइ
( मुँह ) बा कर, खोलकर, फैलाकर।
क्रि. स.
[सं. व्यायन, हिं. बाना]
मेरे कहै नहीं तू मानति, दिखरावौं मुख बाइ-१०-२५५।

बाइगी
व्यर्थ की बकवाद।
संज्ञा
[सं. वार्ता या हिं. बाई ?]

बाइबिडंग
बिडंग नामक औषधि जो पंसारी के यहाँ मिलती है।
संज्ञा
[सं. बिडंग]
बाइ-बिडंग बहेरा हर्रै कहुँ बैल गोंद ब्यापारी-११०८।

बाई
त्रिदोषों में वात दोष।
संज्ञा
[सं. वायु]
बाई चढ़ना - (१) वायु का प्रकोप होना। (२) घमंड की बातें करना। बाई पचना (१) वायु का प्रकोप शांत होना। (२) घमंड टूटना। बाई पचाना - गर्व चूर करना।

बाई
स्त्रियों के लिए आदरसूचक संबोधन।
संज्ञा
[हिं. बाबा]

भनक
धीमी ध्वनि।
संज्ञा
[सं. भणन]
स्रवन भनक परी ललिता के तान की-१६०९।

भनक
उड़ती हुई खबर। नंद-भवन भनक सुनी कंस कहि पठायौ-२४९६।
संज्ञा
[सं. भणन]

भनकना
बोलना, कहना।
क्रि. स.
[हिं. भनक]

भनना, भननो
कहना।
क्रि. स.
[सं. भणन]

भनना, भननो
ध्वनि होना।
क्रि. अ.
[सं. भणन]

भनभनाना, भनभनानो
भन-भन' शब्द करना।
क्रि. अ.
[अनु.]

भनभनाहट
भन भनाने का शब्द।
संज्ञा
[हिं. भनभन+आहट]

भनित
जो कहा गया हो।
वि.
[सं. भणित]

भनित
कही हुई बात।
संज्ञा

भनित
कही हुई बात। कविता।
संज्ञा

भद्रा
गाय।
संज्ञा
[सं.]

भद्रा
दुर्गा।
संज्ञा
[सं.]

भद्रा
मंगलकारिणी शाक्ति।
संज्ञा
[सं.]

भद्रा
पृथ्वी।
संज्ञा
[सं.]

भद्रा
बाधा।
संज्ञा
[सं.]
भद्रा उतरना - हानि होना। भद्रा लगाना - बाधा या हानि पहुँचाना।

भद्राकरण
मुंडन।
संज्ञा
[सं.]

भद्रासन
वह मणिजटित सिंहासन जिस पर राज्याभिषेक होता है।
संज्ञा
[सं.]

भद्रासन
योग का एक आसन।
संज्ञा
[सं.]

भद्रासन
सात द्वीपों में एक।
संज्ञा
[सं.]
इलावर्त और किंपुरुषा, कुरु और हरिषर्ष केतुमाल। हिरनमै, रमयक, भद्रासन भरतखंड सुखपाल-सारा० ३३।

भद्री
भाग्यवान्।
वि.
[सं. भद्रिन]

भनीजना, भनीजनो
कहना, बोलना।
क्रि. स.
[सं. भणन]

भनै
ध्वनि होती है।
क्रि. अ.
[हिं. भनना]
जँ जँ ध्वनि भनै-पृ. ३४५ (३७)।

भबका
अर्क आदि उतारने का बंद मुँह का घड़ा।
संज्ञा
[हिं. भाप]

भब्य
सुन्दर, विशाल।
वि.
[सं. भव्य]

भब्य
शुभ, मंगलकारी।
वि.
[सं. भव्य]
अतिहिं पुनीत बिष्नु पादोदक, महिमा निगम पढ़त गुनि चैन। परम पवित्र, मुक्ति की दाता, भागीरथहिं भब्य बर दैन-९.१२।

भभक
उबाल।
संज्ञा
[अनु. भक]

भभक
तेज गंध।
संज्ञा
[अनु. भक]

भभकत
छटपटाता है, उछलता है।
क्रि. अ.
[हिं. भभकना]
कहुँ भुज, कहुँ धर, कहुँ सिर लोटत, मानौ मद मतवारौ। भभकत, तरफत स्रोनित मैं तन, नाहीं-परत निहारौ-९-१५९।

भभकना, भभकनो
उबलना।
क्रि. अ.
[अनु.]

भभकना, भभकनो
तेज गर्मी से फूटना।
क्रि. अ.
[अनु.]

भभकना, भभकनो
तेजी से धधक उठना।
क्रि. अ.
[अनु.]

भभका
अरक निकालने का घड़ा।
संज्ञा
[हिं. भाप]

भभकि
उबलकर, फूटकर।
क्रि. अ.
[हिं. भभकना]
भभकि कै दंत ते रुधिर धारा चली छींट छबि बसन पर भई भारी-2५९५।

भभकी
झूठी धमकी, घुड़की।
संज्ञा
[हिं. भभक]

भभरिकै
घबराकर।
क्रि. अ.
[हिं. भभरना]
सबनि मटुकिया रीती देखी तरुनी गई भभरिकै-११६८।

भभरना, भभरनो
डरना।
क्रि. अ
[हिं. भय+करना]

भभरना, भभरनो
घबरा जाना।
क्रि. अ
[हिं. भय+करना]

भभरना, भभरनो
धोखे में पड़ जाना।
क्रि. अ
[हिं. भय+करना]

भभूका
ज्वाला, लपट।
संज्ञा
[हिं. भभक]

भभूका
बहुत गहरे लाल रंग का।
वि.

भभूत
देवमूर्ति के सामने जलनेवाली अथवा यज्ञादि की अग्नि की भस्म जो मस्तक, भुजा आदि पर लगायी जाती है।
संज्ञा
[सं. विभूति]

भभूत
भस्म जो शिव जी शरीर में लगाते हैं।
संज्ञा
[सं. विभूति]

भभ्भड़
भीड़-भाड़।
संज्ञा
[हिं. भीड़]

भभ्भड़
शोर।
संज्ञा
[हिं. भीड़]

भयंकर
डरावना, भयानक।
वि.
[सं.]

भयंकरता
भयानकता, भीषणता।
संज्ञा
[सं.]

भय
डर, भौति।
संज्ञा
[सं.]
भय खाना, खानो - डरना, भयभीत होना।

भय
हुआ।
क्रि. अ.
[हिं. होना]

भयउ
हुआ।
क्रि. अ.
[हिं. हुआ]
यह सब कलिजुग कौ परभाउ। जो नृप कैं मन भयउ-कुभाउ-१-२९०।

भयकर
जिसे देखकर डर लगे।
वि.
[सं.]

भयद
डरावना, भयानक।
वि.
[सं.]

भयप्रद
जिसे देखकर डर लगे।
वि.
[सं.]

भयभीत, भयभीता
भयभीत, डरा हुआ।
वि.
[सं. भयभीत]
(क) भारत जुद्ध होइ जब बीता। भयौ जुधिष्ठिर अति भयभीता-१-२६१। (ख) मनु रघुपति भयभीत सिंधु पत्नी पयौसार पठाई-९-१२४।

भयमोचन
डर दूर करनेवाला।
वि.
[सं.]

भयल
पूर्वो हिंदी में होना' का भूत.।
वि.
[हिं. होना]

भयहरण, भयहरन
भय या डर दूर करनेवाला।
वि.
[सं. भयहरण]

भयहारी, भयहारे
डर छुड़ानेवाला, भय दूर करनेवाला।
वि.
[सं. भयहारिन् , हिं. भयहारी]
गज चानूर हते, दव नास्यौ, ब्याल मथ्यौ, भयहारे १-२७।

भया
एक राक्षसी।
संज्ञा
[सं.]

भया
हुआ।
क्रि. अ.
[हिं. हुआ]

भयाकुल
डर से घबराया हुआ।
वि.
[सं.]

भयातुर
डर से घबराया हुआ।
वि.
[सं.]

भयान
भयानक, डरावना।
वि.
[सं. भयानक]
(क) सुनि के सिंह भयान अवाज। मारि फलाँग चली सो भाज-५-३। (ख) तुम बिना सोभा न ज्यौं गृह बिना दीप भयान-३४४७।

भयानक
डरावना, भयंकर।
वि.
[सं.]
(क) भवसमुद्र अति देखि भयानक, मन मैं अधिक डराऊँ-१.१६४। (ख) अरी मोहिं भवन भयानक लागै माई स्याम बिना-2५४७।

भयानक
साहित्य के नौ रसों में एक जिसमें भीषण दृश्यों का वर्णन होता है।
संज्ञा

भयाना, भयानो
डरना।
क्रि. अ.
[सं. भय + हिं. आना]

भयाना, भयानो
डराना, भयभीत करना।
क्रि. स.
[सं. भय + हिं. आना]

भयारा
डरावना, भयंकर।
वि.
[सं. भयानक]

भयावन, भयावना
डरावना।
वि.
[सं. भय+हिं. आवन]

भयावह
डरावना, भयंकर।
वि.
[सं.]

भयौ
हुआ, प्रतिष्ठित हुआ,बना।
क्रि. अ.
[हिं. हुआ]
राखी पैज भक्त भीषम की, पारथ को सारथी भयौ-१-२६।

भरकना, भरकनो
तेजी से बल उठना।
कि.अ.
[हिं. भड़कना]

भरकना, भरकनो
चौंककर पीछे हटना।
कि.अ.
[हिं. भड़कना]

भरकना, भरकनो
उत्तेजित होना।
कि.अ.
[हिं. भड़कना]

भरकना, भरकनो
शरीर में कुछ गर्मी आना।
कि.अ.
[हिं. भड़कना]

भरकाना, भरकानो
तेजी से बलाना। ।
क्रि. स.
[हिं. भड़काना]

भरकाना, भरकानो
चौंककर पीछे हटाना।
क्रि. स.
[हिं. भड़काना]

भरकाना, भरकानो
उत्तेजित करना।
क्रि. स.
[हिं. भड़काना]

भरकाना, भरकानो
शरीर में कुछ गर्मी पहुँचाना।
क्रि. स.
[हिं. भड़काना]

भरण
पालन-पोषण।
संज्ञा
[सं.]

भरण
वेतन।
संज्ञा
[सं.]

भयौ
पैदा हुआ, जन्मा।
क्रि. अ.
[हिं. हुआ]
ताकैं छौना सुन्दर भयौ-५-३।

भरंत
भ्रम, संदेह।
संज्ञा
[सं. भ्रांति]

भर
सब, सारा।
वि.
[हिं. भरना]
अति करुना रघुनाथ गुसाईं जुग भर जात घरी।

भर
भार या बल से द्वारा।
क्रि.वि.
[हिं. भार]

भर
भार, बोझ।
संज्ञा
[हिं. भार]
(क) भू-भरहरन प्रगट तुम भूतल गावत संत-समाज-१-२१५। (ख) धरनि सीस धरि सेस मरब धर्यो, इहिं (कालिय नाग) भर अधिक सँहार्यौ-५६७।

भर
मोटाई , पुष्टता।
संज्ञा
[हिं. भार]

भर
भरण-पोषण करनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

भर
लड़ाई, युद्ध।
संज्ञा
[सं.]

भरक
चमक-दमक,चमकीलापन।
संज्ञा
[हिं. भड़क]

भरक
डरने-सहमने का भाव।
संज्ञा
[हिं. भड़क]

भरणी
सत्ताइस नक्षत्रों में दूसरा।
संज्ञा
[सं.]

भरणी
पालन-पोषण करनेवाली।
वि.

भरत
राजा दशरथ के कैकेयी से उत्पन्न पुत्र जो राम से छोटे थे। कैकेयी ने इनके लिए राजा दशरथ से राज्य माँगा और राम को निर्वासित कराया। भरत ने इस कर्म के लिए माता कैकेयी की निंदा की और राम को वापस लौटाने के लिए वे चित्रकूट गये। राम जब लौटने को तैयार न हुए तब वे इनकी पादुकाएँ ले आए और उन्हें ही सिंहासन पर रख कर राम के आने तक अयोध्या का शासन करते रहे। राम के वन से लौटने पर भरत ने राज्य उन्हें सौंप कर अपूर्व त्याग का परिचय दिया।
संज्ञा
[सं.]

भरत
ऋषभ देव के पुत्र जड़ भरत।
संज्ञा
[सं.]

भरत
शकुंतला के पुत्र का नाम; प्रसिद्ध है कि इस देश का नाम 'भारत' इन्हीं के नाम पर पड़ा है।
संज्ञा
[सं.]

भरत
नाट्य शास्त्र' के रचयिता भरत मुनि।
संज्ञा
[सं.]

भरत
लवा' नामक पक्षी।
संज्ञा
[सं. भरद्वाज]

भरत
लादता है (लादकर) ढोता है।
क्रि. स.
[हिं. भरना]
अगम सिंधु जतननि सजि नौका, हठि क्रम-भार भरत-१-५५।

भरत
पेट पालता या भरता है।
क्रि. स.
[हिं. भरना]
जीव मारि कै उदर भरत हैं-2-१४।
दुख भरत - दुख भोगता है कष्ट सहता है। उ. - (क) मेरे हित इतनौ दुख भरत-१.२२६। (ख) हम तौ उन बिनु बहु दुख भरत-१० उ. ३७। नैन भरत पानी - आँसू आ जाते हैं उ. - मेरे नैन भरत है पानी-2६४९। हियो भरत - हृदय भरभर आता है। उ. -मोसौं कहत होहि जिनि ऐसी नैन टरत नहिं भरत हियौ-2६४७।

भरतखंड
पृथ्वी के नौ खंडों में से एक जिसका राजा भरत था।
संज्ञा
[सं.]
भरत सो भरत खंड कौ राव-५-३।

बहना
घारा या प्रवाह में पड़कर उसी के साथ जाने लगना।
क्रि. अ.
[सं. वहन]

बहना
बूँद या धार के रूप में लगातार निकलना।
क्रि. अ.
[सं. वहन]

बहना
हवा का चलना।
क्रि. अ.
[सं. वहन]

बहना
लक्ष्य या स्थान से हट जाना।
क्रि. अ.
[सं. वहन]

बहना
मारे-मारे फिरना।
क्रि. अ.
[सं. वहन]

बहना
इधर उधर चला जाना।
क्रि. अ.
[सं. वहन]

बहना
चरित्र-भ्रष्ट होना।
क्रि. अ.
[सं. वहन]

बहना
अधम या बुरा होना।
क्रि. अ.
[सं. वहन]

बहना
बहुत सस्ता होना।
क्रि. अ.
[सं. वहन]

बहना
(धन) डूब जाना।
क्रि. अ.
[सं. वहन]

बाँभन
ब्राह्मण।
संज्ञा
[सं. ब्राह्मण]
बाँभन मारैं नहीं भलाई-१०-५७।

बाँस
एक प्रसिद्ध गँठीली वनस्पति।
संज्ञा
[सं. वंश]
बाँसो उछलना - बहुत प्रसन्न होना।

बाँसपूर
एक तरह का महीन कपड़ा।
संज्ञा
[हिं. बाँस + पूरना]

बाँसली, बाँसुरी, बाँसी
मुरली, बाँसुरी।
संज्ञा
[हिं. बाँस, बाँसुरी]

बाँह
भुजा, बाहु।
संज्ञा
[सं. बाहु,]
बाँह थको बायसहिं उड़ावत-2७६९।
बाँह गहना (पकड़ना) - ( १ ) सहारा देना। (२) विवाह करना। बाँह की छाँह लेना - शरण लेना। बाँह चढ़ाना - (१) किसी बात के लिए तैयार होना। (२) लड़ने को मुस्तैद हो जाना। बाँह देना - सहारा देना। देहु बाँह - सहारा, आश्रय और शरण दो। उ. - सुख सोऊँ सुनि बचन तुम्हारे देहु कृपा करि बाँह-१- ५१। दै बाँह - आश्रय देकर, छाया करके। उ. - बर्षत में गोपाल बुलाए अभय किये दै बाँह-९५७। बाँह बुलंद होना - (१) साहसी होना। (२) दानी और उदार होना।

बाँह
बाँह-बोल - सहायता का वचन। बल, शक्ति।
यौ.

बाँह
सहायक।
यौ.
बाँह टूटना - सहायक न रह जाना।

बाँह
सहारा, भरोसा।
यौ.

बाँह
आस्तीन।
यौ.

बाँहाजोरी
गले में बाहें डाले हुए।
क्रि. वि.
[हि. बाँह+ जोड़ना]
(क) बाँहाजोरी निकसे कुंज तें-पृ. ३१५ (४८)। (ख) बाँहाजोरी कुसुम चुनत दोउ-2८७१।

भरता
बैंगन आदि की ऐसी तरकारी जो अच्छी तरह भूनकर और नमक-मिर्च-खटाई डालकर बनायी जाती है।
संज्ञा
[देश.]
भरता भँटा खटाई दीनी-2३२१।

भरता
स्वामी।
संज्ञा
[सं. भर्तृ]

भरता
पति।
संज्ञा
[सं. भर्तृ]

भरतार
पति।
संज्ञा
[सं. भर्ता]
(क) काम अति तनु दहत, दीजै सूर हरि भरतार-७६७। (ख) तजि भरतार और जो भजिए सो कुलीन नहिं होई-पृ. ३४१ (३)।

भरतार
स्वामी, मालिक।
संज्ञा
[सं. भर्ता]

भरती
भरे जाने का भाव।
संज्ञा
[हिं. भरना]
भरती करना - (२) रखना या सम्मिलित करना। (२) केवल खाना-पूरी के लिए रखना।

भरती
प्रविष्ट होने या प्रवेश पाने का भाव।
संज्ञा
[हिं. भरना]

भरतौ
किसी रिक्त वस्तु या पात्र में दूसरा पदार्थ डालकर उसे पूर्ण करता।
क्रि. स.
[हिं. भरना]
परतिय-रति अभिलाष निसा-दिन मन-पिटरी लै भरतौ-१-१०३।

भरत्थ, भरथ
श्रीराम के छोटे भाई भरत। ।
संज्ञा
[सं.]

भरत्थ, भरथ
जड़ भरत।
संज्ञा
[सं.]

भरत्थ, भरथ
शकुंतला के पुत्र का नाम।
संज्ञा
[सं.]

भरत्थ, भरथ
नाट्य शास्त्र के रचयिता भरतमुनि।
संज्ञा
[सं.]

भरथरी
राजा भर्तृहरि।
संज्ञा
[सं. भर्तृहरी]

भरद्वाज
उतथ्य ऋषि के भाई वृहस्पति का अपनी भावज ममता के गर्भ से उत्पन्न किया हुआ पुत्र जो आगे चलकर गोत्र-प्रवर्तक हुआ।
संज्ञा
[सं.]

भरद्वाज
भरद्वाज ऋषि के वंशज।
संज्ञा
[सं.]

भरन
पालन, पोषण।
संज्ञा
[सं. भरण]
प्रभु तेरौ बचन भरोसौ साँचौ। पोषन भरन बिसंभर साहब, जो कलपै सो काँचौ-१-३२।

भरन
भरने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. भरना]
उदर भरन - पेट पालने के लिए। उ. - भजन बिनु जीवत जैसे प्रेत। मलिन मंदमति डोलत घर - घर उदर भरन कैं हेत-2-१५।

भरना, भरनो
खाली पात्र को कोई चीज डालकर पूर्ण करना।
क्रि. स.
[सं. भरण]

भरना, भरनो
उँड़ेलना, डालना।
क्रि. स.
[सं. भरण]

भरना, भरनो
स्थान को खाली न छोड़ना।
क्रि. स.
[सं. भरण]

भरना, भरनो
दो चीजों के बीच की दरज आदि बंद करना।
क्रि. स.
[सं. भरण]

भरना, भरनो
(बंदूक आदि में) गोली डालना।
क्रि. स.
[सं. भरण]

भरना, भरनो
रिक्त पद की पूर्ति करना।
क्रि. स.
[सं. भरण]

भरना, भरनो
हानि पूरी करना, चुकाना।
क्रि. स.
[सं. भरण]
(किसी का) घर भरना, भरनो - (किसी को) खूब धन देना।

भरना, भरनो
(किसी के मन में ) बुरी धारणा जमाना।
क्रि. स.
[सं. भरण]

भरना, भरनो
बिताना, व्यतीत करना।
क्रि. स.
[सं. भरण]

भरना, भरनो
निबाहना।
क्रि. स.
[सं. भरण]

भरना, भरनो
काटना, डसना।
क्रि. स.
[सं. भरण]

भरना, भरनो
सहन करना।
क्रि. स.
[सं. भरण]

भरना, भरनो
(पशु पर) बोझ लादना
क्रि. स.
[सं. भरण]

भरना, भरनो
घाव का ठीक होना।
क्रि. अ.
[सं. भरण]

भरना, भरनो
शरीर का हृष्ट-पुष्ट होना।
क्रि. अ.
[सं. भरण]

भरना, भरनो
कमी या कसर न रह जाना।
क्रि. अ.
[सं. भरण]

भरना, भरनो
भरने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[सं. भरण]

भरनि, भरनी
भरने का भाव।
संज्ञा
[हिं. भरना]
अंकम भरनी - गले या छाती से लगाने का भाव या कार्य। उ. - उमँगि उमँगि प्रभु भुजा पसारत हरषि जसोमति अंकम भरनी-१०- ४४।

भरनि, भरनी
पहनावा, पोशाक।
संज्ञा
[सं. भरण]

भरपाई
भली भाँति।
क्रि.वि.
[हिं. भरना+पाना]

भरपाई
बाकी (धन आदि) पा जाने का भाव।
संज्ञा

भरपूर
पूरा, जिसमें कसर न हो।
वि.
[हिं. भरना+पूरना]

भरपूर
अच्छी तरह, भली भाँति।
क्रि. वि.

भरना, भरनो
(शरीर पर) पोतना
क्रि. स.
[सं. भरण]

भरना, भरनो
रिक्त स्थान की पूर्ति होना।
क्रि. अ.
[सं. भरण]

भरना, भरनो
उँड़ेला जाना।
क्रि. अ.
[सं. भरण]

भरना, भरनो
रिक्त पद की पूर्ति होना।
क्रि. अ.
[सं. भरण]

भरना, भरनो
बीच का अवकाश बंद होना।
क्रि. अ.
[सं. भरण]

भरना, भरनो
गोली आदि डाली जाना।
क्रि. अ.
[सं. भरण]

भरना, भरनो
हानि पूरी होना।
क्रि. अ.
[सं. भरण]

भरना, भरनो
क्रोध या अप्रसन्नता होना।
क्रि. अ.
[सं. भरण]

भरना, भरनो
बोझ आदि लदना।
क्रि. अ.
[सं. भरण]

भरना, भरनो
परिश्रम से किसी अंग का दर्द करने लगना।
क्रि. अ.
[सं. भरण]

भरमाना, भरमानो
भ्रम में डालना।
क्रि. स.
[हिं. भरमना]

भरमान्यौ
भटकाता फिरा, मारे मारे घूमा।
क्रि. स.
[हिं. भरमाना]
माधौ जू मोहि काहे की लाज। जन्म जन्म योहीं भरमान्यौ अभिमानी बेकाज-१-१५०।

भरमाया
भ्रम या चक्कर में डाला, बहकाया।
क्रि. स.
[हि. भरमाना]
बिदुर कह्यौ, देखौ हरि-माया। जिन यह सकल लोक भरमाया-१-२८४।

भरमार
बहुत अधिकता।
संज्ञा
[हि. भरना+मार= अधिकता]

भरमावत
भ्रम में डालते हो, बहकाते हो।
क्रि. स.
[हिं. भरमाना]
तुम नारायन भक्त कहावत। केहिं कारन हमकौं भरमावत-४.९।

भरमावहु
हैरान होते हो।
क्रि. अ.
[हिं. भरमाना]
आन जन्तु-धुनि सुनि कत डरपत, मो भुज कंठ लगावहु। जनि संका जिय करौ लाल मेरे, काहे कौं भरमाबहु-१०-१७९।

भरमावै
भ्रम में डालती है,चक्कर में गलती है, बहकाती है।
क्रि. स.
[हिं. भरमाना]
माया नटी लकुटि कर लीन्हें, कोटिक नाच नचावै।...। तुमसौं कपट करावति प्रभु जू, मेरी बुधि भरमावै-१-४२।

भरमाहीं
चकित या हैरान होती है।
क्रि. अ.
[हिं. भरमाना]
सूर स्याम छबि निरखि कै जुवती भरमाहीं-पृ. ३१९ (८५)।

भरमि
भटककर, मारे मारे फिर कर।
क्रि. स.
[हिं. भरमना]
लख चौरासी जोनि भरमि कै, फिरि वाहीं मन दीनौ-१-६५।

भरमित
चक्षित, हैरान, अचंभित।
वि.
[हिं. भरमना]
लखि लोचन, सोचै हनुमान। चहुँ दिसि लंक दुर्ग दानवदल, कैसैं पाऊँ जान। -। भरमित भयौ देखि मारुत-सुत दियो महाबल ईस-९-७५।

भरमना, भरमनो
भूल।
संज्ञा
[सं. भ्रम]

भरमना, भरमनो
भ्रम, भ्रांति।
संज्ञा
[सं. भ्रम]

भरमाइ
भटकती है, घूमती फिरती है।
क्रि. अ.
[हि. भरमना]
प्रात से सिर धरे मटुकी नंद गृह भरमाइ-१२११।

भरमाई
मारा-मारा फिरता है, भटकता है।
क्रि. अ.
[हिं. भरमना]
काया हरि कैं काम न आई। ...............। जब लगि स्याम-अंग नहिं परसत, अंधे ज्यौं भरमाई-१-२९५।

भरमाई
भ्रम में पड़ गयी।
क्रि. अ.
[हिं. भरमना]
(क) राधा हरि के रंगहि राँची, जननी रही जिये भरमाई-१२५२। (ख) सूरदास राधा की बानी सुनत सखी भरमाई-१२७५।

भरमाई
चकित हुई।
क्रि. अ.
[हिं. भरमना]

भरमाई
भ्रम या चक्कर में डाल दिया।
क्रि. स.
[हिं. भरमाना]
(क) एकनि कह्यौ, याहि मत मारौ। याको सुन्दर रूप निहारौ। केतिक अमृत पिए यह भाई। हरि मति तिनकी यौं भरमाई-७-७ (ख) कोऊ निरखि रही चारु लोचन निमिष भरमाई-१३३८।

भरमाई
भटकाया, व्यर्थ मारे-मारे फिराया।
क्रि. स.
[हिं. भरमाना]

भरमाए
भ्रम या आश्चर्य में डाल दिया।
क्रि. स.
[हिं. भरमाना]
अंकुस-कुलिस-बज्र-ध्वज परगट, तरुनी-मन भरमाए-६३१।

भरमात
हैरान होता है, अचम्भे में आता है।
क्रि. अ.
[हिं. भरमाना]
एक अंग को पार न पावति चकित होइ भरमात-१४२४।

भरभराना, भरभरानो
रोंआँ खड़ा होना।
क्रि. अ.
[अनु.]

भरभराना, भरभरानो
घबराना, व्याकुल होना।
क्रि. अ.
[अनु.]

भरभेंटा
मुठभेड़।
संज्ञा
[हिं. भर+भेंटना]

भरम
भ्रम, भ्रांति, धोखा।
संज्ञा
[सं. भ्रम]
(क) भरम ही बलवंत सबमैं ईसहू के भाइ-१-७०। (ख) बदन उघारि दिखायौ अपनौ नाटक की परिपाटी। बड़ी बार भई, लोचन उघरे भरम-जवनिका फाटी-१०-२५४।

भरम
भेद, रहस्य।
संज्ञा
[सं. भ्रम]
भरम गँवाना (बिगाड़ना) - भेद खोलना।

भरमत
मारा मारा फिरता है, भटका है।
क्रि. अ.
[हिं भरमना]
(क) पंचनि के हित-कारन यह मन जहँ तहँ भरमत भाग्यो-१-७३। (ख) जनम सिरानौ ऐसैं ऐसैं। कै घर घर भरमत जदुपति बिनु, कै सोवत, कै वैसे-१-२६३।"

भरमत
घूमता-फिरता है।
क्रि. अ.
[हिं भरमना]
बहत पवन, भरमत ससि-दिनकर फनपति सिर न डुलावै-१-१६३।

भरमना, भरमनो
घूमना फिरना।
क्रि. अ.
[सं. भ्रमण]

भरमना, भरमनो
मारा-मारा फिरना।
क्रि. अ.
[सं. भ्रमण]

भरमना, भरमनो
धोखे में पड़ना।
क्रि. अ.
[सं. भ्रमण]

भराइ
लेत भराइ-भर या भरा लेता है।
प्र.
सुभग कर आनन समीपै मुरलिका इहिं भाइ। मनु उभै अंभोज-भाजन लेत सुधा भराइ-६२७।

भराई
भर लो, भरी।
क्रि. अ.
[हिं. भरना]

भराई
जाति भराई-भरी जाती है।
प्र.
बेगिहिं नार छेदि बालक कौ, जाति बयारि भराई.-१०-१६।

भराई
भरने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
संज्ञा

भराए
सामग्री रखवायी।
क्रि. स.
[हिं. भराना]
आजु कान्ह करिहैं अनप्रासन। मनि कंचन के थार भराए, भाँति-भाँति के बासन-१०-८९।

भराए
कमी पूरी करेंगे।
क्रि. स.
[हिं. भराना]
सुनहु सूर कछु मोल लेहिंगे, कछु इक दान भराए-११०९।

भराना, भरानो
रिक्त पात्र को किसी वस्तु से भरने को प्रवृत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. भरना]

भराना, भरानो
उलटाना, डलवाना।
क्रि. स.
[हिं. भरना]

भराना, भरानो
खाली स्थान को पूरा कराना।
क्रि. स.
[हिं. भरना]

भराना, भरानो
दरज आदि भरने को प्रवृत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. भरना]

भरमिहौ
मारी-मारी फिरोगी, भटकोगी।
क्रि. अ.
[हिं. भरमना]
तुम जानकी, जनकपुर जाहु। कहा आनि हम संग भरमिहौ, गहबर बन दुख-सिंधु अथाहु-९-३४।

भरमे
भ्रम में पड़ गये।
क्रि. अ.
[हिं. भरमना]
सोच मुख देखि अक्रूर भरमे...२४६६।

भरमौंहाँ
भ्रम उत्पन्न करनेवाला।
वि.
[सं. भ्रम]

भरमौंहाँ
चक्कर खिलानेवाला।
वि.
[सं. भ्रमण]

भरम्यौ
मारा-मारा फिरा, फटका।
क्रि. अ.
[हि. भरमना]
(क) फिरि-फिरि जोनि अनंतनि भरम्यौ, अब सुख-सरन पर्यो-१-१५६। (ख) सुन मैया मैं बृथा भरम्यो बन जो देखो नैननि भरि जोइ-१५७७।

भरराना, भररानो
भरर' शब्द के साथ गिरना।
क्रि. अ.
[अनु.]

भरराना, भररानो
टूट पड़ना, पिल पड़ना।
क्रि. अ.
[अनु.]

भरराना, भररानो
भरर' शब्द के साथ गिराना।
क्रि. स.

भरराना, भररानो
पिल पड़ने या टूट पड़ने को प्रवृत्त करना।
क्रि. स.

भरवाई
भरवाने की क्रिया।
संज्ञा
[हिं. भरवाना]

बाई
वेश्या।
संज्ञा
[हिं. बाबा]

बाईस
बीस और दो की संख्या या अंक।
संज्ञा
[सं. द्वाविंशति, प्रा. बाईसा]

बाईसी
बाईस चीजों का समूह।
संज्ञा
[हि. बाईस]

बाईसी
बाईस छंदों का संग्रह।
संज्ञा
[हि. बाईस]

बाउ, बाऊ
हवा, पवन।
संज्ञा
[सं. वायु]

बाउर, बाऊर
पागल।
वि.
[सं. बातुल्]

बाउर, बाऊर
भोला, सीधा।
वि.
[सं. बातुल्]

बाउर, बाऊर
मूर्ख।
वि.
[सं. बातुल्]

बाउर, बाऊर
गूँगा, मूक।
वि.
[सं. बातुल्]

बाउर, बाऊर
बुरा।
वि.
[सं. बातुल्]

भरवाना, भरवानो
भरने का काम कराना, मरने की प्रवृत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. भरना]

भरसक
यथाशक्ति।
क्रि. वि.
[हिं. भर+सक = शक्ति]

भरसन
डाँट-फटकार।
संज्ञा
[सं. भर्त्सना]

भरहरना, भरहरनो
धबराना, ब्याकुल होना।
क्रि. अ.
[हिं. भरभराना]

भरहराना,भरहरानो
टूट पड़ना।
क्रि.अ.
[हिं महराना]

भरहराना,भरहरानो
एकाएक गिरना।
क्रि.अ.
[हिं महराना]

भरहराना,भरहरानो
फिसल पड़ना।
क्रि.अ.
[हिं महराना]

भरहरि
व्याकुल होकर, घबराकर।
क्रि.अ.
[हिं. भरभराना (अनु.)]
जाको सुजस सुगत अरु गावत, जैहै पाप बृंद भजि भरहरि-१.३१२।

भरांति
भ्रम भ्रांति।
संज्ञा
[सं, भ्रांति]

भराइ
भराकर।
क्रि. स.
[हिं. भराना]

भराव
भरने का भाव।
संज्ञा
[हिं. भरना]

भराव
भरने का अवकाश।
संज्ञा
[हिं. भरना]

भराव
भरी हुई वस्तु आदि।
संज्ञा
[हिं. भरना]

भरावन
भर जाने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. भरना+ आवन]
ब्रह्मादिक, सनकादिक, गगन भरावन रे.-१०-२८।

भरावहु
भरने को प्रवृत्त करो।
क्रि. स
[हिं. भरावना]
बाँधो बंदनवार मनोहर कनक कलस भरि नीर भरावहु-१० उ० २३।

भरि
लगाकर, (गोद में) लेकर, आलिंगन करके।
क्रि. स
[हिं. भरना]
पुत्र-कबंध अंक भरि लीन्हौ, धरति न इक छिंन धीर-१-२९।

भरि
हानि पूरी करके।
क्रि. स
[हिं. भरना]
जब दिन को भरि लेहुँ आजु ही तब छाँड़ौं मैं तुमको.-१०८९।

भरित
भरा हुआ।
वि.
[सं.]

भरित
भरा हुआ। पाला-पोसा हुआ।
वि.
[सं.]

भरिपूरि
खूब भरी हुई।
वि.
[हिं. भरपूर]
सिंह आगैं, शेष पाछैं, नदी भइ भरिपूरि १०-५।

भरियत
भर जाती है, जल-मग्न हो जाती है।
क्रि. अ.
[हिं. भरना]
स्वाति बिना ऊसर सब भरियत ग्रीव रंध्र मत कीन्हों-३०३४।

भरिया
भरे हुए, युक्त, पूर्ण, मग्‍न लीन।
वि.
[हिं. भरना]
क्रीड़ा करत तमाल-तरुन-तर स्यामा-स्याम उमँगि रसभरिया-६८८।

भरिया
पूरा करनेवाला।
वि.
[हिं. भरना]

भरिया
ऋण चुकानेवाला।
वि.
[हिं. भरना]

भरिया
बरतन ढालनेवाला।
संज्ञा

भरिहैं
बीतेंगे, बीत सकेंगे, बिताये जा सहेंगे।
क्रि. अ.
[हिं. भरना]
कैसे कै भरि हैं री दिन सावन के-2८३०।

भरिहैं
सहन होगी, सही जा सकेगी।
क्रि. अ.
[हिं. भरना]
अब यह ब्यथा कौन बिधि भरिहैं कोऊ देइ बताइ-३११३।

भरिहौं
बसूल कर लूँगा।
क्रि. स
[हिं. भरना]
चोरी जाति बेंचि दान सब दिन को भरिहौं-१११६।

भरीं
पूर्ण, युक्त।
वि.
[हिं. भरना]
पिय पहिलै पहुँची जाइ अति आनन्द भरीं-१०-२४।

भरी
युक्‍त, पूर्ण, सहित।
वि.
[हिं. भरना]
जिहिं जिहिं जोनि भ्रम्यौ संकट बस, सोइ सोइ दुखनि भरी-१-७१।

भराना, भरानो
बंदूक आदि में गोली डलवाना।
क्रि. स.
[हिं. भरना]

भराना, भरानो
पद पर नियुक्त कराना।
क्रि. स.
[हिं. भरना]

भराना, भरानो
हानि पूरी कराना।
क्रि. स.
[हिं. भरना]

भराना, भरानो
बुरी बात मन में बैठाना
क्रि. स.
[हिं. भरना]

भराना, भरानो
निबाह कराना।
क्रि. स.
[हिं. भरना]

भराना, भरानो
डसवाना, कटवाना।
क्रि. स.
[हिं. भरना]

भराना, भरानो
झेलने को प्रवत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. भरना]

भराना, भरानो
बोझ लदवाना।
क्रि. स.
[हिं. भरना]

भराना, भरानो
शरीर में पुतवाना।
क्रि. स.
[हिं. भरना]

भरापूरा
बहुत सम्पन्न।
वि.
[हिं. भरना+पूरना]

भरोसा
आशा।
संज्ञा
[सं. भर = भार+आशा]

भरोसा
दृढ़ विश्वास।
संज्ञा
[सं. भर = भार+आशा]

भरोसी
आसरा रखनेवाला।
वि.
[हिं. भरोसा]

भरोसी
सहारे रहनेवाला।
वि.
[हिं. भरोसा]

भरोसी
आशा रखनेवाला।
वि.
[हिं. भरोसा]

भरोसी
विश्वास करने योग्य।
वि.
[हिं. भरोसा]

भरोसैं
आश्रय, आसरा।
संज्ञा
[हिं. भरोसा]

भरोसैं
सहारा, अवलंब।
संज्ञा
[हिं. भरोसा]
आज हौं एक-एक करि टरि हौं। कै तुमहीं कै हमहीं, माधौ, अपने भरोसै लरि हौं-१-१३४।

भरोसौ
सहारा, अवलंब।
संज्ञा
[हिं. भरोसा]
प्रभु तेरो बचन भरोसौ साँचौ। पोषन भरन बिसंभर साहब, जो कलपै सो काँचौ-१.३२।

भरोसौ
दृढ़ विश्वास।
संज्ञा
[हिं. भरोसा]
तातै तुम्हरौ भरोसौ आवै। दीनानाथ पतित-पावन, जस बेद-उपनिषद गावै-१-१२२।

भरुहावत
भ्रम में डालते हैं, बहकाते हैं।
क्रि. स.
[हिं. भरुहाना]
अपने हैं ताते यह कहियत स्याम इनहिं भरुहावत हैं-पृ. ३३० (९३)।

भरे
युक्त, पूर्ण, सहित।
वि.
[हिं. भरना]
रंग भरे - प्रेम, विभोर, उन्मत्त। उ. - आजु नँद-नँदन रंग भरे। बिबि लोचन सु बिसाल दुहुँनि के चितवत चित्त हरे-६८९।

भरे
कुल, पूरा, सब।
वि.
[हिं. भरना]
पलक भरे की ओट न सहती अब लागे दिन जान-२६४७।

भरे
भरापुरा स्थान।
संज्ञा
जित देखौं मन भयो तितहिं कौ मनौ भरे कौ चोर री-१०-१३९।

भरै
रिक्त स्थान या पात्र को पूर्ण अथवा अंशत: भरता है।
क्रि. स.
[हिं. भरना]
(क) अनायास बिनु उद्यम कीन्हैं, अजगर उदर भरै। (ख) रातै भरै, भरैं पुनि ढारै, चाहै फेरि भरै। -। बागर तैं सागर करि डारै, चहुँ दिसि नीर भरै-१-१०५।
अंग भरै - गोद में लेती है। उ. - मुख के रेनु झारि अंचल सौं जसुमति अंग भरैं-2८०३।

भरैया
पालन करनेवाला।
वि.
[हिं. भरण]

भरैया
भरनेवाला।
वि.
[हिं. भरना]

भरोइ
युक्त, सहित।
वि.
[हिं. भरा]
कन्हैया हालरो हलरोइ। हौं बारी तब इंदु-बदन पर, अति छबि अलस भरोई-१०.५६।

भरोसा
आसरा।
संज्ञा
[सं. भर = भार+आशा]

भरोसा
सहारा।
संज्ञा
[सं. भर = भार+आशा]

भरी
दश माशे के बराबर तौल।
संज्ञा
[हिं. भर]

भरीजै
भरिए, किसी पदार्थ को रिक्त स्थान में डालकर उसको पूर्ण कीजिए।
क्रि. स.
[हिं, भरना]
उदर भरीजै - पेट पालिए। उ. - ऐसै बसिए ब्रज की बीथिनि। ग्वारनि के पनवारे चुनि चुनि, उदर भरोजै सीथिनि-१०- ४९०।

भरु
बोझ, बोझा, भार।
संज्ञा
[सं, भार]
इहिं भरु अधिक सह्यौ अपनैं सिर अमित अंडमय बेष-५७०।

भरुआ
वेश्या का दलाल।
संज्ञा
[हिं. भड़ुआ]

भरुका
कुल्हड़, चुक्कड़।
संज्ञा
[हिं. भरना]

भरुहाए
भ्रम में डाला है, बहकाया है।
क्रि. स
[हिं. भरुहाना]
तुमकौ नद महर भरुहाए। माता गर्भ नहीं तुम उपजे तो कहौ कहाँ ते आए-१७०२।

भरुहाना, भरुहानो
घमंड करना, गर्व में चूर होना।
क्रि. अ.
[हिं. भार + होना]

भरुहाना, भरुहानो
बहकाना, भ्रम में डालना।
क्रि. स.
[हिं. भ्रम]

भरुहाना, भरुहानो
उत्तेजित करना, बढ़ावा देना।
क्रि. स.
[हिं. भ्रम]

भरुहाने
घमंड में चूर होकर, अभिमान में भरकर।
क्रि. अ.
[हिं. भरुहाना]
अब वै भरुहाने फिरैं कहुँ डरत न माई। सूरज प्रभु मुँह पाइ कै भए ढीठ बजाई-पृ. ३२३ (२०)।

भरयौ
भरा।
क्रि. सं.
[हिं. भरना]

भरयौ
अंकम भरयौ - छाती से लगाया।
प्र.
पुनि माता के पायनि परयौ। माता ध्रुव कौं अंकम भरयौ-.४-९।

भर्राना, भर्रानो
भर्र' शब्द होना।
क्रि. अ.
[अनु.]

भर्सन
निंदा।
संज्ञा
[सं. भर्त्सन]

भर्सन
फटकार।
संज्ञा
[सं. भर्त्सन]

भल
भला, श्रेष्ठ, उत्तम।
वि.
[हिं. भला]
कुंती प्रान तजे धरि ध्यान। जीवन-सहन उनहिं भल जान-१-२८८।

भलपति
भारता रखनेवाला; वह जिसके पास भाला हो।
संज्ञा
[हिं. भाला+सं. पति]

भलमनसाहत, भलमनसो
सज्‍जनता।
संज्ञा
[हिं. भला+मनुष्य]

भलहिं
भली भाँति।
क्रि. वि.
[हिं. भला]

भला
उत्तम, अच्छा।
वि.
[सं. भद्र]

भरौं
संपूर्ण कर दूँ, खाली न रहने दूँ।
क्रि. स.
[हिं. भरना]
काल्हि जाइ अस उद्यम करौं। तेरे सब भंडारनि भरौं-४-१२।

भरौं
सारे शरीर में लगा हुआ, पुता हुआ, सना हुआ।
वि.
[हिं. भरना]
धोयो चाहत कीच भरौ पट, जल सौं रुचि नहिं मानौ-१-१९४।

भर्ग
शिव, शंकर।
संज्ञा
[सं. भर्ग्य]

भर्ता, भर्त्तार
स्वामी।
संज्ञा
[सं. भर्तृ]

भर्ता, भर्त्तार
पति।
संज्ञा
[सं. भर्तृ]

भर्तृहरि
उज्जयिनी के राजा विक्रमादित्य के छोटे भाई जो पत्नी से अत्यधिक प्रेम करते थे; परन्तु एक बार उसको चरित्रहीनता से खिन्न होकर विरक्त हो गये। ये प्रसिद्ध वैयाकरण और कवि थे।
संज्ञा
[सं.]

भर्त्सन
निंदा।
संज्ञा
[सं.]

भर्त्सन
डाँट-फटकार।
संज्ञा
[सं.]

भर्म
भ्रम, भ्रांति।
संज्ञा
[सं. भ्रम]
नारद मन की भर्म तोहिं यतनो भरमायौ-३०४७।

भर्मन
घूमना-फिरना।
संज्ञा
[सं. भ्रमण]

भला
बढ़िया।
वि.
[सं. भद्र]

भला
कुशल, भलाई।
संज्ञा

भला
लाभ।
संज्ञा

भला
खैर, अस्तु।
अव्य.

भला
नहीं' सूचक अव्यय।
अव्य.

भलाई
अच्छाई, अच्छी बात।
संज्ञा
[हिं. भला+ई]
(क) तिन कह्यौ, मो मैं एक भलाई। तुम सौं कहौं, सुनौ चित लाई-१-२९०। (ख) की गोकुल ते गमन कियो तुम इन बातन है नहीं भलाई-पुं.-३४० (९७)।

भलाई
उपकार।
संज्ञा
[हिं. भला+ई]

भलाई
सौभाग्य।
संज्ञा
[हिं. भला+ई]

भलापन
भले होने का भाव।
संज्ञा
[हिं. भला]

भले
भलो भाँति, अच्छी तरह।
क्रि. वि.
[हिं. भला]

बाएँ
बायीं ओर।
क्रि. वि.
[हिं. बाँयाँ]

बाए
मुँह फैलाये खोले हुए।
क्रि. स.
[हिं. बाना]
निसि दिन फिरत रहत मुँह बाए, अहमिति जनम बिगोइसि-१-३३३।

बाऐं
बायीं ओर का, दाहिने की विपरीत दिशावाला।
वि.
[हिं. बायाँ]
बाऐं कर बाजि-बाग दाहिन हैं बैठे-१- २३।

बाक
बात, बचन।
संज्ञा
[सं. वाक्य]

बाकचाल
बातूनी, बकवादी।
वि.
[सं. वाक् + चल]

बाकना
बकवाद करना।
क्रि. अ.
[सं. वाक]

बाका
वाक्‍शकित, वाणी।
संज्ञा
[सं. वाक]

बाकी
जो बच गया हो, शेष।
वि.
[अ. बाकी]

बाकी
लेकिन, मगर, परन्तु।
अव्य.

बाकी
अंतर निकालने की रीति।
संज्ञा

भले
खूज, वाह।
अव्य.

भलेरा
कुशल।
संज्ञा
[हिं. भला]

भलेरा
लाभ।
संज्ञा
[हिं. भला]

भलैं
खूब, वाह।
अव्य.
[हिं. भला]
सूरदास प्रभु भलैं परे फँद, देउँ न जान भावते जेकैं १०-२८७।

भलौ
भला, उत्तम, श्रेष्ठ।
वि.
[हिं. भला]

भलौ
भली बात, उत्तम कार्य, श्रेष्ठ कर्म।
संज्ञा
जहाँ गयौ तहँ भलो न भावत, सब कोऊ सकुचानौ-१-१०२।

भलौ
कल्याण, कुशल, भलाई।
संज्ञा
ऐसौ को ठाकुर, जन-कारन दुख सहि. भलौ मनावै-१-१२२।

भल्ल
वध, हत्या।
संज्ञा
[सं.]

भल्ल
भाला।
संज्ञा
[सं.]

भवँ
भौंह।
संज्ञा
[हिं. भौंह]

भवंग
साँप, सर्प।
संज्ञा
[सं. भुजंग]

भवँर
भौंरा।
संज्ञा
[सं. भ्रमर]

भवंत
आप लोगों का।
वि.
[सं. भवत्]

भव
संसार, जगत।
संज्ञा
[सं.]
यहै जिय जानि कै अंध भव त्रास तैं सूर कामी-कुटिल सरन आयौ-१-५।

भव
संसार का दुख, जन्म-मरण का दुख।
संज्ञा
[सं.]
कमलनयन मकराकृति कुंडल देखत ही भव भागै।

भव
उत्पत्ति, जन्म।
संज्ञा
[सं.]

भव
कारण।
संज्ञा
[सं.]

भव
कारण।
संज्ञा
[सं.]

भव
कामदेव।
संज्ञा
[सं.]

भव
शिव।
संज्ञा
[सं.]

भव
डर, भय।
संज्ञा
[सं. भय]

भव
कल्याण-कारी।
वि.

भव
जन्मा हुआ।
वि.

भवचन्द
शिव जी का धनुष, पिनाक।
संज्ञा
[सं.]

भवदीय
आपका।
सर्व.
[सं.]

भवन
घर, मकान।
संज्ञा
[सं.]
भवन सँवारि नारि रस लोम्यौ, सुत, बाहन, जन, भ्रात्र-१.२१६।

भवन
महल।
संज्ञा
[सं.]

भवन
अगत, संसार।
संज्ञा
[सं. भुवन]

भवना, भवनो
घूमना-फिरना।
क्रि. अ.
[सं. भ्रमण]

भवनी
गृहिणी, गृहस्वामिनी।
संज्ञा
[सं. भवन]

भवबंधन
सांसारिक माया-मोह के कष्ट।
संज्ञा
[सं.]

भवभंजन
परमेश्वर
संज्ञा
[सं.]

भवभंजन
काल।
संज्ञा
[सं.]

भवभय
जन्म-मृत्यु का भय।
संज्ञा
[सं.]

भवभामिनी
पार्वती, भवानी।
संज्ञा
[सं.]

भवभार
सांसारिक दुख और कष्ट, जन्म मरण के कष्ट।
संज्ञा
[सं.]
सूर हरि कौ सुजस गावौ जाहि मिटि भंव-भार-१-२९४।

भवभूष, भवभूषण
संसार को भूषित करनेवाले (परमेश्वर)।
संज्ञा
[सं.]

भवमोचन
सांसारिक बंधनों से छुड़ानेवाले (परमेश्वर)।
वि.
[सं.]

भवविलास
सांसारिक सुख जो अज्ञान और माया-जन्य होते हैं।
संज्ञा
[सं.]

भवसंभव
संसार में होनेवाला।
वि.
[सं.]

भवाँ
भौंरा, चक्कर।
संज्ञा
[हिं. भवना]

भवाँना
घुमाना, चक्कर खिलाना।
क्रि. स.
[सं. भ्रमण]

भवा
पार्वती, भवानी।
संज्ञा
[सं.]

भवानी
शिव-पत्नी पार्वती।
संज्ञा
[सं.]

भवितव्य
अवश्य होनेवाला।
वि.
[सं.]

भवितव्यता
होनी।
संज्ञा
[सं.]

भवितव्यता
भाग्य।
संज्ञा
[सं.]

भविष, भविष्य, भविष्यत्
आनेवाला काल या समय।
वि.
[सं. भविष्यत्, हिं.भविष्य]

भविष्यद्वक्ता
भविष्यवाणी करनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

भविष्यद्वक्ता
ज्योतिषी।
संज्ञा
[सं.]

भविष्यद्वाणी
भविष्य में होनेवाली बात जो पहले से ही बता दी जाय।
संज्ञा
[सं.]

भवेश
संसार का स्वामी।
संज्ञा
[सं.]

भवेश
शिव।
संज्ञा
[सं.]

भव्य
सुन्दर, शानदार।
वि.
[सं.]

भव्य
मंगलसूचक।
वि.
[सं.]

भव्य
भविष्य में होनेवाला।
वि.
[सं.]

भव्यता
सुन्दरता, शोभा।
संज्ञा
[सं.]

भष
आहार, भोजन।
संज्ञा
[सं. भक्ष्य]
(क) सुंदर स्याम गही कवरी कर, मुक्तामाल गही बलबीर। सूरज भष लैबे अप अपनौ, मानहुँ लेत निबेरे सीर-१०-१६१। (ख) सिंह भष तजि परत तिनुका सुनी बात नई-३१३१।

भषना, भषनो
भोजन करना।
क्रि. स.
[सं. भक्षण]

भसम
राख।
संज्ञा
[सं. भस्म]

भसम
जिता की राख।
संज्ञा
[सं. भस्म]

भसम
अग्निहोत्र आदि को राख।
संज्ञा
[सं. भस्म]

भसान
पूजा के उपरांत मूर्ति को जल में प्रवाहित करने की क्रिया।
सज्ञा
[बं. भसाना]

भसाना, मसानो
पानी पर तैराना।
क्रि. स.
[ब.]

भसाना, मसानो
जल में प्रवाहित करना।
क्रि. स.
[ब.]

भसिंड, भसिंडा, भसींड, भसींडा
कमल की जड़।
संज्ञा
[देश.]

भसुंड
हाथी, मज।
संज्ञा
[सं. भुशुंड]

भस्म
अग्निहोत्र की राख जो पवित्र मानी जाती है और जिसे शिव-भक्त मस्तक या शरीर में अथवा साधु सारे शरीर में लगाते हैं।
संज्ञा
[सं. भस्मन्]
कहा स्नान कियैं तीरथ के, अंग भस्म, जट-जूटै २.१९।

भस्म
राख।
संज्ञा
[सं. भस्मन्]

भस्म
चिता की राक्ष।
संज्ञा
[सं. भस्मन्]

भाँउर, भाँउरि
विवाह के समय बर-बधू द्वारा अग्नि की परिक्रमा।
संज्ञा
[हिं. भाँवर]

भाँग
भंग, बिजया।
संज्ञा
[स. भृंगी]
भाँग खाना, खानो खा जाना, पी जाना, पीना - पागलपन की बातें या काम करना। घर में भूँजी भाँग न होना - बहुत दरिद्र होना।

भाँगना, भाँगनो
तोड़ना।
क्रि. स
[हिं. भंग]

भाँगना, भाँगनो
टूटना, टूट जाना।
क्रि. अ.

भाँज
भौजने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
संज्ञा
[हिं. भजना]

भाँजना, भाँजनो
तह करके मोड़ना।
क्रि. स.
[सं. भंजन]

भाँजना, भाँजनो
मुग्दर आदि घमाना।
क्रि. स.
[सं. भंजन]

भाँजना, भाँजनो
कई लड़ों को बटना।
क्रि. स.
[सं. भंजन]

भाँजना, भाँजनो
तोड़ना-फोड़ना।
क्रि. स.
[सं. भंजन]

भांजा
बहन का लड़का।
संज्ञा
[हिं. भानजा]

भस्म
जला हुआ, जल कर भस्म हुआ।
वि.
कालयवन मुचुंकुद से हरि भस्म करायौ-१०- उ. ३।

भस्मासुर
वृकासुर' नामक दैत्य जिले शिव जी ने वरदान दिया था कि तू जिसके सर पर हाथ रख देगा, यह भस्म हो जायेगा। पार्वती जी पर मुग्ध होकर जब भस्मासुर शिव जी के ही सर पर हाथ रखने बढ़ा तब-वे भागे और विष्णु ने चतुरता से उसी के सर पर हाथ रखवाकर उसी को भस्म करा दिया।
संज्ञा
[सं]

भहराइ, भहराई
झोंके के साथ गिरकर
क्रि. अ.
[अनु.]
(क)परि कबंध रथनि तैं उठत मनौ झर जागि-९-१५८। (ख) त्राहि त्राहि करि नंद पुकारत देखत ठौर गिरे भहराई-५४४।

भहरात
झोंके के साथ।
क्रि वि.
[हिं. भहराना]
गिर्यो भहरात सकटा सँहार्यो-१०-६२।

भहराना भहरानो
टूट पड़ना।
क्रि. अ.
[अनु.]

भहराना भहरानो
झोंके के साथ गिरना।
क्रि. अ.
[अनु.]

भहराना भहरानो
फिसल पड़ना।
क्रि. अ.
[अनु.]

भहूँ
भौंह।
संज्ञा
[हिं. भौंह]

भाँईं
खरादनेवाला।
संज्ञा
[हिं. भाना]

भाँउँ
अभिप्राय।
संज्ञा
[सं. भाव]

भाँड़
बरतन-भाँड़ा।
संज्ञा
[हिं. भाँड़ा]
फोरि भाँड़ दधि-माखन खायौ-१०.३१८।

भाँड़
भंडाफोड़।
संज्ञा
[हिं. भाँड़ा]

भाँड़
उपद्रव, उत्पात।
संज्ञा
[हिं. भाँड़ा]

भांड
बरतन-भाँड़ा।
संज्ञा
[सं.]

भांड
व्यापार की वस्तुएँ।
संज्ञा
[सं.]

भाँडना, भाँडनो
मारे-मारे घूमना।
क्रि. अ.
[सं. भंड]

भाँडना, भाँडनो
निंदा करते फिरना।
क्रि. स.

भाँडना, भाँडनो
नष्ट-भ्रष्ट करना, तोड़ना-फोड़ना।
क्रि. स.

भाँड़ा
बड़ा बरतन।
संज्ञा
[सं. भाण्ड]

भांडागार
भंडार, कोष।
संज्ञा
[सं.]

बाकी
एक तरह का धान।
संज्ञा
[देश.]

बाखर, बाखरि, बाखरी
मकान, घेरा, स्थान, बख़ार।
संज्ञा
[हिं. बखार]
जानति हौं गोरस को लैबो याही बाखरि माँझ-१२१४।

बाग
उपवन, वाटिका, उद्यान।
संज्ञा
[अ. बाग]
अद्भुत एक अनूपम बाग-१६६०।

बाग
लगाम।
संज्ञा
[सं. वल्गा]
बाऐं कर बाजि-बाग दाहिन हैं बैठे-१- २३।
बागा मोड़नी - किसी ओर जाने को होना।

बागडोर
लगाम।
संज्ञा
[हिं. बाग+डोर]

बागना
घूमना-फिरना।
क्रि. अ.
[सं. बक=चलना]

बागना
कहना, बोलना।
क्रि. अ.
[सं. वाक]

बागवान
माली।
संज्ञा
[फा.]

बागबानी
माली का काम।
संज्ञा
[हिं. बागवान]

बागा
अंगे-जैसा एक पहनावा, जामा।
संज्ञा
[देश.]

भांडार
स्थान जहाँ बहुत सी चीजें रखी जायें।
संज्ञा
[सं. भांडागार]

भांडार
वह जहाँ एक सी अनेक बातें या चीजें हों।
संज्ञा
[सं. भांडागार]

भांडार
अनाज या सामान रखने का स्थान।
संज्ञा
[सं. भांडागार]

भांडार
कोष।
संज्ञा
[सं. भांडागार]

भांडारिक
भंडार का अध्यक्ष, भंडारी।
संज्ञा
[हिं. भांडार]

भाँड़े
बड़े बरतन।
संज्ञा
[हिं. भाँड़ा]
भाड़े में जी (प्राण) देना - किसी के प्रति आसक्ति या प्रेम होना। भाँड़े भरना - पछताना। भाँड़े भरति - पछताती है। उ. - तब तू मारिबोई करति। रिसनि आगे कहि जो आवत अब लै भाँड़े भरति-2६७९।

भाँडौ
बड़ा बरतन।
संज्ञा
[हिं. भाँड़ा]
भारि भाँड़ौ - बहुत अधिक। उ. - बहुत भरोसौ जानि तुम्हारौ, अघ कीन्हे भरि भाँड़ौ-१. १४६।

भाँत, भाँति, भाँती, भाँते
तरह, प्रकार, रीति।
संज्ञा
[सं. भेद, हिं.भाँति]
(क) कौन भाँति हरि, कृपा तुम्हारी, सो स्वामी समुझी न परति-१-११५। (ख) पय पीवत पूतना निपाती, तृनावर्त इहिं भाँत-५०८। (ग) द्रुम फूले बन अनगन भाँती-पृ. ३४८ (५)। (घ) सारँगरिपु-सुत-सुहृदपति बिना दुख पावति बहु भाँते-४६१।
भाँति - भाँति के अनेक प्रकार से।

भाँपना, भाँपनो
ताड़ जाना, पहचान लेना, देखकर समझ जाना।
क्रि. स.
[देश.]

भाँयँ
सन्नाटे का शब्द।
संज्ञा
[अनु.]

भाँजी
बाधा डालनेवाली बात।
संज्ञा
[हिं. भाँजना]

भांजी
बहन की लड़की।
संज्ञा
[हिं. भांजा]

भाँजि
तोड़कर, फोड़कर।
क्रि. स.
[हिं. भाँजना]
अब कैसैं जैयतु अपनै बल, भाजन भाँजि, दूध दधि पी कै.-१०-२८७।

भाँट
भार, चारण।
संज्ञा
[हिं. भाट]
मागध,सूत, भाँट धन लेत जरावन रे.-१०-२८।

भाँटा
बैंगन।
संज्ञा
[हिं. भंट]

भाँड़
बहुत हँसो-मजाक करनेवाला।
संज्ञा
[सं. भंड]

भाँड़
स्वाँग भरकर नाचने-गानेवाला।
संज्ञा
[सं. भंड]

भाँड़
हँसी-मजाक।
संज्ञा
[सं. भंड]

भाँड़
बेहया या निर्लज्ज पुरुष।
संज्ञा
[सं. भंड]

भाँड़
नाश, बरबादी।
संज्ञा
[सं. भंड]

भाँयँ
भाँयँ भाँयँ-सन्नाटे का शब्द।
यौ.

भाँरी
विवाह के समय वर-वधू द्वारा की जानेवाली अग्नि की परिक्रमा।
संज्ञा
[हिं. भाँवर]

भाँवता
भला लगनेवाला।
वि.
[हिं. भावता]

भाँवता
प्रियपात्र, प्रियतम।
संज्ञा

भाँवना, भाँवनो
खरादना।
क्रि. स.
[सं. भ्रमण]

भाँवना, भाँवनो
गढ़ना, गढ़कर सुन्दर बनाना।
क्रि. स.
[सं. भ्रमण]

भाँवर, भाँवरि, भाँवरी
परिक्रमा करना।
संज्ञा
[सं. भ्रमण, हिं.भाँवर]

भाँवर, भाँवरि, भाँवरी
विवाह के समय वर-वधू का अग्नि की परिक्रमा करना।
संज्ञा
[सं. भ्रमण, हिं.भाँवर]
भाँवरि सी पारि फिरैं नारि ज्यों पराई-पृ. ३२८ (७०)।

भाँवर, भाँवरि, भाँवरी
भौंरा, भ्रमर।
संज्ञा
[हिं. भौंरा]

भाँस
धाँस' जैसी गंध।
संज्ञा
[हिं. धाँस (?)]
भहरात झहरात दवा (नल) आयौ।...। बरत-बन-बाँस, थरहरत कुस कांस, जरि, उड़त है भाँस, अति प्रबल धायौ-५९६।

भा
चमक, प्रकाश।
संज्ञा
[सं.]

भा
शोभा, छबि।
संज्ञा
[सं.]

भा
किरण, रश्मि।
संज्ञा
[सं.]

भा
बिजली।
संज्ञा
[सं.]

भा
चाहे, यदि, इच्छा हो।
अव्य

भा
हुआ (अवधी)।
क्रि. अ.
[हिं. हुआ]

भाइ
प्रेम, प्रीति, भाव।
संज्ञा
[सं. भाव]
आन देव की भक्ति भाइ करि कोटिक कसब करैगी-१-७५।

भाइ
संबंध, विषय।
संज्ञा
[सं. भाव]
भरम ही बलवंत सब मैं ईसहू कैं भाइ। जब भगत भगवंत चीन्है, भरम मन तैं जाइ-१-७०।

भाइ
स्वभाव।
संज्ञा
[सं. भाव]

भाइ
विचार।
संज्ञा
[सं. भाव]

भाइ
भाँति, प्रकार, तरह।
संज्ञा
[हिं. भाँति]
(क) वृषभ कहयौ तासौं या भाइ-१-२९०। (ख) दासी-पुत्र होहु तुम जाइ। सूर बिदुर भयौ सो इहिं भाइ-३-५। (ग) उन दियौ साप ताहि या भाइ-६-५।

भाइ
चालढाल, रंगढंग।
संज्ञा
[हिं. भाँति]

भाइ
भाई, भ्राता।
संज्ञा
[हिं. भाई]

भाइ
आत्मीयता-सूचक संबोधन।
संज्ञा
[हिं. भाई]
ऊँच-नीच ब्यौरौ न रहाइ। ताकी साखि मैं, सुनि भाइ-१-२३०।

भाइ
भाती है, रुचती है।
क्रि. स.
[हिं. भाना]
कहौं सो कथा, सुनौ चित लाइ। सूर स्याम भक्तनि मन भाइ-१-२३६।

भाइय
भाई-चारा।
संज्ञा
[हिं. भाई+पन]

भाइय
मित्रता
संज्ञा
[हिं. भाई+पन]

भाई
भ्राता, सहोदर, बंधु।
संज्ञा
[सं. भ्रातृ]

भाई
चाचा, फूफा, मौसा, मामा आदि का लड़का।
संज्ञा
[सं. भ्रातृ]

भाई
जाति या समाज का व्यक्ति।
संज्ञा
[सं. भ्रातृ]

भाई
आत्मीयता सूचक संबोधन।
संज्ञा
[सं. भ्रातृ]

भाई
प्रिय, रुचिकर।
वि.
छाँडि सकुच सब देति परस्पर अपनी भाई गारि-2३९९।

भाई
रुची, भली लगी।
कि. स.
[हिं. भाना]
ब्रह्मा मन सो भली न भाई। सूर सृष्टि तब और उपाई-३-७।

भाईचारा
बंधुत्व, भाईपन।
संज्ञा
[हिं. भाई+चारा]

भाईचारा
परम प्रिय होने का भाव।
संज्ञा
[हिं. भाई+चारा]

भाईदूज
कार्तिक शुक्ल द्वितीया, जब बहन, भाई के टीका काढ़ती है।
संज्ञा
[हिं. भाई + दूज]

भाईपन
भाई की प्रीति का भाव।
संज्ञा
[हिं. भाई+ पन]

भाईपन
मित्रता या आत्मीयता का भाव
संज्ञा
[हिं. भाई+ पन]

भाईबंद, भाईबंधु
भाई तथा अन्य संबंधी।
संज्ञा
[हिं. भाई+बंधु]

भाईबंद, भाईबंधु
इष्ट-मित्र।
संज्ञा
[हिं. भाई+बंधु]

भाई-बिरादरी
नाते-रिश्तेदार।
संज्ञा
[हिं. भाई+बिरादरी]

भाई-बिरादरी
जाति-समाज के लोग।
संज्ञा
[हिं. भाई+बिरादरी]

भाउ, भाऊ
विचार, भाव।
संज्ञा
[सं. भाव]

भाउ, भाऊ
उद्देश्य, तात्पर्य।
संज्ञा
[सं. भाव]
गोपिकनि लिखि जोग पठयौ भाउ जान न जाइ-2९२९

भाउ, भाऊ
प्रीति।
संज्ञा
[सं. भाव]

भाउ, भाऊ
स्वभाव, प्रकृति।
संज्ञा
[सं. भाव]
अनजानै बिधि यह करी, नए रचे भगवान।...। वहै नाउ, वहै भाउ, धेनु बछरा मिलि रब के-४३७।

भाउ, भाऊ
जन्म, उत्पत्ति।
संज्ञा
[सं. भव]

भाऊँ
प्रेम, प्रीति।
संज्ञा
[सं. भाव]

भाऊँ
भावना।
संज्ञा
[सं. भाव]

भाऊँ
स्वभाव।
संज्ञा
[सं. भाव]

भाऊँ
दशा, अवस्था।
संज्ञा
[सं. भाव]

भाऊँ
महिमा, महत्व।
संज्ञा
[सं. भाव]

भाऊँ
रूप, आकृति।
संज्ञा
[सं. भाव]

भाऊँ
सत्ता, प्रभाव।
संज्ञा
[सं. भाव]

भाऊँ
विचार।
संज्ञा
[सं. भाव]

भाऊँ
रुचूँ, भला लगूँ।
क्रि. स.
[हिं. भाना]

भाएँ, भाए
समझ में, दृष्टि में।
क्रि. वि.
[सं. भाव]
(क) सबही या ब्रज के लोग चिकनिया मेरे भाएँ घास। (ख) सरबस दियो आफ्नो उनको तऊ न कछू‌ कान्ह के भाए-३४०३।

भाएँ, भाए
रुचे, भले लगे।
क्रि. स.
[हिं. भाना]
मधुबन की मानिनी मनौहर तहीं जाहु जहाँ भाए हो-2९८६।

भाकर
सूर्य, रवि।
संज्ञा
[सं.]

भाकसी
भट्ठी।
संज्ञा
[हिं. भट्ठी]

भाखना, भाखनो
कहना, बोलना।
क्रि. स.
[सं. भाषण]

भाखा
कहा, बोला।
क्रि. स.
[हिं. भाखना]

भाखा
भाषा।
संज्ञा
[हिं. भाषा]

भाखा
हिन्दी भाषा।
संज्ञा
[हिं. भाषा]

भाखि
कहो, बोलो, जपो।
क्रि. स.
[हिं भाखना]
दुहूँ लोक सुखकरन, हरनदुख, वेद-पुराननि साखि। भक्ति ज्ञान के पंथ सूर ये, प्रेमनिरंतर भाखि-१-९०।

भाखी
कही।
क्रि. स.
[हिं. भाखना]
बुधि बिबेक उनमान आपने मुख आई सो भाखी.३४६९।

भाखी
बतायी, वर्णन की।
क्रि. स.
[हिं. भाखना]
ग्राह ग्रसत गजराज छुड़ायौ, बेद पुराननि भाखी-५६७।

भाखे
कहे, सुनाये।
क्रि. स.
[हिं. भाखना]
चारि स्लोक कहे समुझाइ। -। सोई अब मैं तुम सौं भाखे-१.२३०।

भाखे
बताये, वर्णन किये।
क्रि. स.
[हिं. भाखना]
जे पदकमल रमा-उर भूषन, बेद भागवत भाखे-५७१।

भाखै
कहती है, बोलती है।
क्रि. स.
[हिं. भाखना]
बाल-बिनोद बचन हित-अनहित बार बार मुख भाखै-१-६०।

भाख्यौ
कहा, बताया।
क्रि. स.
[हिं. भाषना]
दुहुँनि मनोरथ अपनी भाख्यौ, तब श्रीपति बानी उचरी-१-२६८।

भाख्यौ
उच्चारण किया, पढ़ा।
क्रि. स.
[हिं. भाषना]
जोग-जज्ञ-जप-तप नहिं कीन्हौ, बेद बिमल नहिं भाख्यौ-१-१११।

भाग
हिस्सा, खंड, अंश।
संज्ञा
[सं.]
(क) जज्ञ-भाग नहिं लियौ हेत सौं रिषिरति पतित बिचारै-१-२५। (ख) रिषि कयौ, मैं करिहौं जहँ जाग हौं तुमहिं अवसि करि भाग-९-७३।

भाग
ओर, तरफ।
संज्ञा
[सं.]

भाग
भाग्य, तकदीर
संज्ञा
[सं.]
दुख, सुख, कीरति, भाग आपनैं आइ परै सो गहियै-१-६२।

भाग
सौभाग्य।
संज्ञा
[सं.]
(क) नाहिंन इतनौ भाग जो यह रस, नित लोचन-पुट पीजै-१०-९। (ख) धनि-धनि महरि की कोख भाग-सुहाग भरी-१०-२४। (ग ) ऐसे कबहुँ भाग होहिंगे बहुरौ गोद खेलाइ-३४३५।

भाग
माथा, ललाट।
संज्ञा
[सं.]

भाग
प्रातः काल।
संज्ञा
[सं.]

भाग
ऐश्वर्य, वैभव।
संज्ञा
[सं.]

भाग
गणित की 'भाग' करने को किया।
संज्ञा
[सं.]

बाघंबर
बाघ की खाल-जैसा कम्बल।
संज्ञा
[सं. व्याघ्रांबर]

बाघ
सिंह, शेर।
संज्ञा
[सं. व्याघ्र]

बाच
अच्छा, सुन्दर, बढ़िया।
वि.
[सं. वाच्य]

बाचना
सुरक्षित रहना।
क्रि. अ.
[हिं. बचना]

बाचना
सुरक्षित रखना।
क्रि. स.
[हिं. बचना]

बाचा
बोलने की शक्ति, वाक्‍शक्ति।
संज्ञा
[सं. बाचा]

बाचा
वचन, बातचीत, वाक्य।
संज्ञा
[सं. बाचा]
मनसा-बाचा-कर्म अगोचर सो मूरति नहिं नैन धरी-१-११५।

बाचा
प्रण, प्रतिज्ञा।
संज्ञा
[सं. बाचा]

बाचाबंध, बाचावद्ध
वचन या प्रतिज्ञा बद्ध।
वि.
[सं. वाचा+वद्ध]

बाची
बच गयी, सुरक्षित रही।
क्रि. अ.
[हिं. बचना]

भागड़
भगदड़, भागदौड़।
संज्ञा
[हिं. भगदड़]

भागना, भागनो
दौड़ना पलायन करना।
क्रि. अ.
[सं. भाज्]
सिर पर पैर रखकर भागना-बहुत तेज भागना।
सिर पर पैर रखकर भागना-बहुत तेज भागना।

भागना, भागनो
हट जाना।
क्रि. अ.
[सं. भाज्]

भागना, भागनो
काम से बचना।
क्रि. अ.
[सं. भाज्]

भागनेय
बहन का बेटा, भानजा।
संज्ञा
[सं.]

भागवंत
अच्छे भाग्यवाला।
वि.
[सं. भाग्यवान्]

भागवत
अठारह पुराणों में से एक जो वैष्णवों का मान्य धर्मग्रंथ है। इसे वे महापुराण मानते हैं। इसमें १२ स्कंध, ३१२ अध्याय और १८००० श्लोक हैं। कृष्ण-भक्ति की प्रेमयुक्त कहानियाँ इसमें वर्णित है। सूरदास ने 'सूरसागर' का क्रम इसी ग्रंथ के अनुसार रखा है।
सज्ञा
[सं.]
सूर कह्यौ भागवतऽनुसार-४-७।

भागवत
ईश्वर का भक्त।
सज्ञा
[सं.]

भागवत
भगवत-संबंधी, भगवत-विषयक।
वि.

भागवती
वैष्णवों की कंठी।
संज्ञा
[सं.]

भागि
भागकर, दौड़कर, पलायन करके।
क्रि. अ.
[हिं. भागना]
बाँध्यौ बैर दया भागिनी सौं, भागि दुरी सु बिचारी-१-१७३।

भागिनि, भागिनी
अच्छे भाग्यवाली, भाग्यवती।
वि.
[हिं. भाग्यवान्]
कुबिजा सी भागिनि को नारी-2६४०।

भागिनेय
बहन का बेटा, भानजा।
संज्ञा
[सं.]

भागी
दौड़ी, पलायन किया।
क्रि. अ.
[हिं. भागना]
घर की नारि बहुत हित जासौं, रहति सदा सँग लागी। जा छन हंस तजी यह काया, प्रेत-प्रेत कहि भागी-१७९।

भागी
अच्छे भाग्यवाली, भाग्यवती।
वि.
[हिं. भाग्य]
तब बोले बलराम मातु तुगतें को भागी-2६२५।

भागी
हिस्सेदार
संज्ञा
[सं. भागिन्‌]

भागी
अधिकारी।
संज्ञा
[सं. भागिन्‌]

भागीरथ
राजा भगीरथ।
संज्ञा
[सं. भगीरथ]
भागीरथ जब बहु तप कियौ। तब गंगा जू दरसन दियौ-९-९।

भागीरथी
गंगा नदी जिसको राजा भगीरथ पृथ्वी पर लाये थे।
संज्ञा
[सं.]

भागु
भाग्य, सौभाग्य।
संज्ञा
[सं. भाग्य]
ऊधौ जाके माथे भागु-३०१५।

भागे
दौड़े, पलायन किया, चटपट दूर चले गए।
क्रि. अ.
[हिं. भागना]
सुनि याके उतपात कौं, सुक सनकादिक भागे (ह.)-१-४४।

भागे
दौड़े हुए, भागते हुए।
क्रि. वि.
ध्रुव आये माता पै भागे-४-८।

भागे
परम भाग्यवान।
वि.
[हिं. भाग्य]

भाग्य
नियति, अदृष्ट, किस्मत, तकदीर।
संज्ञा
[सं.]
बड़े भाग्य - अच्छे भाग्य से, सौभाग्य से। उ. - (क) बड़े भाग्य इहिं मारग आये-९- ७०। (ख) सूरदास प्रभु कहति जसोदा भाग्य बड़े ते पावै-2५४९। भाग्य के मोटे - अच्छे भाग्य वाले, सौभाग्यशाली। उ. - बड़े भाग्य के मोटे हौ-2०६१।

भाग्य - भवन
जन्मकुंडली में जन्म-लग्न से नवाँ स्थान जहाँ मनुष्य के शुभाशुभ भाग्य का विचार किया जाता है।
संज्ञा
[सं.]
भाग्य भवन मैं मकर मही-सुत बहु ऐश्वर्य बढ़हैं-१०.६६।

भाग्यवान
जिसका भाग्य अच्छा हो।
वि.
[सं.]

भाग्यौ
भागा, पलायन किया।
क्रि . अ.
[हिं. भागना]
पंचनि के हित कारन यह मन जहँ-जहँ भरमत भाग्यौ-१-७३।

भाज
भागना दौड़ना।
क्रि . अ.
[हि. भाजना]

भाज
चली भाज-भाग या दौड़ चली।
प्र.
सुनि कै सिंह भयान अवाज। मारि फलाँग चली सो भाज-५-३।

भाज
गये भाज-भाग गये, पलायन कर गये।
प्र.
और मल्ल मारे शल तोशल बहुत गये सब भाज।

भाजक
बाँटने या भाग करनेवाला।
वि.
[सं.]

भाजत
भागता है।
क्रि. अ.
[हिं. भागना]

भाजत
भागता हुआ।
वि.
रघुपति-रवि-प्रकास सौं देखों, उड़ुगन ज्यौं तोहिं भाजत-९-१३७।

भाजन
बरतन।
संज्ञा
[सं. भाजन]
(क) मेरो मन मतिहीन गुसाईं। सब सुखनिधि पद-कमल छाँडि, स्रम करत स्वान की नाई। फिरत वृथा भाजन अवलोकत, मूनैं सदन अजान-१-१०३। (ख) रसचरन-अंबुज बुद्धि भाजन लेहि भरि भरि-भरि-१-३०६।

भाजन
पात्र, योग्य व्यक्ति।
संज्ञा
[सं. भाजन]

भाजन
भागने की क्रिया।
संज्ञा
[हिं. भाजना= भागना]

भाजन
कैसे पावतु भाजन-भागना कैसे हो सकता है, भागने का अवसर कैसे मिल सकता है।
प्र.
चहुँ दिसि में तनु बिरहा घेरो अब कैसे पावतु भाजन-2८१७।

भाजनता
पात्रता, योग्यता।
संज्ञा
[सं.]

भाजना, भाजनो
दौड़ना, भाग जाना, पलायन कर जाना।
क्रि. अ.
[सं. वजन,प्रा. वजन, पुं. हिं. - भजना]

भाजा, भाजो
भाग गया।
क्रि. अ.
[हिं. भाजना]

भाट
यश-गायक चारण या बंदी।
संज्ञा
[सं. भट्ट]

भाट
यश-गायकों की जाति।
संज्ञा
[सं. भट्ट]

भाट
चाटुकार।
संज्ञा
[सं. भट्ट]

भाट
राजदूत।
संज्ञा
[सं. भट्ट]

भाटा
पानी का चढ़ाव से उतार की ओर जाना, 'ज्वार' का उलटा।
संज्ञा
[हिं. भाट]

भाटी
भट्टी, तपाने का स्थान
संज्ञा
[हिं. भट्टी]

भाटयौ
भाट का काम।
संज्ञा
[हिं. भाट]

भाठ, भाठा
नदी के साथ बहकर आयी हुई मिट्टी।
संज्ञा
[देश.]

भाठ, भाठा
पानी का उतार।
संज्ञा
[देश.]

भाठ, भाठा
नदी का किनार।
संज्ञा
[देश.]

भाठ, भाठा
बहाव।
संज्ञा
[देश.]

भाठ, भाठा
गड्ढा।
संज्ञा
[देश.]

भाठी
पानी का उतार।
संज्ञा
[हिं. भाठा]

भाठी
भट्ठी।
संज्ञा
[भट्ठी]
भवन मोहिं भाठी सौं लागत मरति सोच ही सोचन-१५१७।

भाठी
शराब बनाने की भट्ठी।
संज्ञा
[भट्ठी]

भाड़
भड़भूजे की भट्ठी।
संज्ञा
[सं. भ्राष्ट्र, प्रा. भट्टो]
भाड़ झोंकना - (१) साधारण काम में शक्ति खोना। (२) व्यर्थ समय खोना। भाड़ में झोंकना (डालना) - (१) आग में जलाना। (२) नष्ट करना। भाड़ में जाय (पड़े) - नष्ट हो जाय हमें परवाह नहीं।

भाड़ा
किराया।
संज्ञा
[सं. भाटक]

भाण
रूपक का एक भेद।
संज्ञा
[सं.]

भाण
व्याज, बहाना।
संज्ञा
[सं.]

भाण
ज्ञान, बोध।
संज्ञा
[सं.]

भाजित
भाग या विभक्त किया हुआ।
वि.
[सं.]

भाजिबे
भागने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. भाजना]
पुरुष को भाजिबे तें मरन है भलो जाई सुरलोक द्वारे उधारे-१० उ.-2१।

भाजी
तरकारी, साग।
संज्ञा
[हिं. भाजना= भूनना]
(क) तुम तौ तीनि लोक के ठाकुर, तुम तैं कहा दुरइयै ? हम तो प्रेम-प्रीति के गाहक, भाजी साक छकइयै-१-२३१। (ख) मीठे तेल चना की भाजी। एक मकूनी दै मोहिं साजी-३९६।

भाजी
भागी, दौड़ी, पलायन किया।
क्रि. अ.
[हिं. भाजना = भागना]
बिडरे गज-जूथ सील, सैन-लाज भाजी ६५०।

भाजे
भागे, पलायन कर गये।
क्रि. अ.
[हिं. भाजना]
भाजे नरक नाम सुनि मेरौ, जम दीन्यौ हठि तारौ-१-१३१।

भाजैं
भागते हैं, दौड़ते हैं।
क्रि. अ.
[हिं. भाजना]
उग्रसेन-सिर छत्र धरयो है, दानव दस दिसि भाजैं १-३६।

भाजैं
भागते हैं, दूर होते हैं।
क्रि. अ.
[हिं. भाजना]
ह्रद बिच नाभि, उदर त्रिबलो वर, अवलोकत भव भय भाजै-१-६९।

भाजौ
दूर हो, मिटे।
क्रि. अ.
[हिं. भाजना]
भोजन किये बिनु भूख क्यों भाजै बिन खाए सब स्वाद-2७७८।

भाज्य
जिसे भाग या विभक्त किया जाय।
वि.
[सं.]

भाज्यो
भागा, पलायन किया।
क्रि. अ.
[हिं. भाजना]
(क) हौं अनाथ बैठयो द्रुम-डरिया, पारधि साधे बान। ताकै डर मैं भाज्यौ नाहत, ऊपर ढुक्यो सचान-१-९७। (ख) प्रथम पूतना इनहि निपाती काग मरत उठि भाज्यो-2५८१।

भात
पकाया हुआ चावल।
संज्ञा
[सं. भक्त, पा. भत्त]
(क) परस्थौ थार घरयौ मग जोवत, बोलति बचन-रसाल। भात सिरात तात दुख पावत, बेगि चलौ मेरे लाल-१०-२२३। (ख) घर गोरस जनि जाहु पराए। दूध भात भोजन घृत अंमृत अरु आछौ करि दह्यौ जमाए-१०.३०९।

भात
विवाह की एक रीति जिसमें कन्या के घर जाकर समधी 'भात' खाते हैं।
संज्ञा
[सं. भक्त, पा. भत्त]

भाति, भाती
शोभा, कांति।
संज्ञा
[सं. भाति]
मनोहर है नैनन की भाति (भांति)। मानहुँ दूरि करत बल अपने सरद कमल की काँति-ना. २४२९।

भाति, भाती
रीति, प्रकार।
संज्ञा
[सं. भाँति]

भातु
सूर्य, रवि।
संज्ञा
[सं.]

भाथा
तीर रखने की चमड़े की थैली जो पीठ पर या कमर में बाँधी जाती है, तरकश, तूणीर।
संज्ञा
[सं. भस्त्रा, पा. भत्था]
रघुपति कहि प्रिय नाम पुकारत। हाथ धनुष लीन्हे, कटि भाथा, चकित भए दिसि-बिदिसि निहारत-९-६१।

भाथा
बड़ी धौंकनी।
संज्ञा
[सं. भस्त्रा, पा. भत्था]

भाथी
लोहार की धौंकानी।
संज्ञा
[हिं. भाथा]

भादों, भादौं, भाद्र
भादों या भाद्रपद नामक महीना जो सावन और कुआर के बीच में पड़ता है। इस महीने की पूर्णिमा को चंद्रमा भाद्रपद नक्षत्र में रहता है। प्रायः इस महीने में खूब वर्षा होती है।
संज्ञा
[सं. भाद्र, पा. भद्दो, हिं. भादों]
(क) करन मेघ बात-बूँद भादौं-झरि लायौ १-२३। (ख) भादौं की अध राति अँध्यारी-१०-११। (ग) नैना सावन-भादौं जीते-2७६९।

भान
भानु, सूर्य।
संज्ञा
[सं. भानु]
(क) सूर मधुप निसि कमल-कोश-बस, करौ कृपा-दिन-भान.. १-१००। (ख) जैसे कमल होत अति प्रफुलित देखत दरसन भान-१-१६९। (ग) चलत तारे सकल मंडल, चलत ससि अरु भान-१-२३५।

भानमती
जादूगरनी।
संज्ञा
[सं. भानुमती]

भानवी
यमुना नदी।
संज्ञा
[सं. भानवीया]

भाना, भानो
जान पड़ना, मालूम होना।
क्रि. अ.
[सं. भान =ज्ञान]

भाना, भानो
रुचना, भला लगना।
क्रि. अ.
[सं. भान =ज्ञान]

भाना, भानो
सोहना, फबना।
क्रि. अ.
[सं. भान =ज्ञान]

भाना, भानो
चमकाना।
क्रि. स.
[सं. भा= प्रकाश]

भाना, भानो
सूर्य, रवि।
संज्ञा
[सं. भानु]

भाना, भानो
राधा की एक सखी का नाम।
संज्ञा
कहि राधा, किन हार चोरायो।..। सुमना बहुला चंपा जुहिला ज्ञाना भाना भाउ १५८७।

भानि
काट (डालेंगे)।
क्रि.स
[हिं. भानना]
रे दसकंध, अंधमति, तेरी आयु तुलानी आनि। सूर राम की करत अवज्ञा, डारै सब भुज भानि-९-७९।

भानी
काटकर, विच्छिन्न करके।
क्रि.स
[हिं. भानना]
मूरख सुख निद्रा नहिं आवै, लैहैं लंक बीस भुज भानी ९-११६।

भान
प्रकाश।
संज्ञा
[सं.]

भान
दीप्ति, कांति।
संज्ञा
[सं.]

भान
ज्ञान !
संज्ञा
[सं.]

भान
आभास, प्रतीति।
संज्ञा
[सं.]

भानजा
बहन का लड़का।
संज्ञा
[हिं बहन +जा]

भानना, भाननो
तोड़ना, भंग करना।
क्रि. स
[सं. भंजन]

भानना, भाननो
नाश करना।
क्रि. स
[सं. भंजन]

भानना, भाननो
हटाना, दूर करना।
क्रि. स
[सं. भंजन]

भानना, भाननो
काटना।
क्रि. स
[सं. भंजन]

भानना, भाननो
समझना, अनुमानना।
क्रि. स.
[हिं. भान]

बागिया
घूमें-फिरे।
क्रि. अ.
[हिं. बागना]

बागर
नदी किनारे की ऊँची भूमि जहाँ पानी कभी नहीं पहुँचता।
संज्ञा
[देश.]
अबिगत-गति जानी न परै।…….। बागर तैं सागर करि डारै, चहुँ दिसि नीर भरै-१-१०५।

बागर
एक तरह का बैल।
संज्ञा
[हिं. बाँगर]

बागल
बक, बगुला।
संज्ञा
[सं. वक]

बागा
जामा' नामक पहनावा।
संज्ञा
[हिं. बाग]

बागी
विद्रोही, राजद्रोही।
वि.
[फ़ा. बागी]

बागुर, बागुरि, बागुरी
पशु-पक्षी फँसाने का जाल।
संज्ञा
[देश.]

बागे
‘जामा' नामक पहनावा।
संज्ञा
[हिं. बागा]
(क) सूरदास प्रभु प्यारी राजत आवत भ्राजत बने हैं मरगजे बागे-पृ. ३१५ (४९)। (ख) नाना रंग गए रँगि बागे-2४४४।

बागेसरी
सरस्वती।
संज्ञा
[सं. वागीश्वरी]

बाघंबर
बाघ की खाल।
संज्ञा
[सं. व्याघ्रांबर]

भानी
हटायी, दूर की।
क्रि.स
[हिं. भानना]
ढोटा एक भयौ कैसैंहु करि, कौन-कौन करवर बिधि भानी-३६८।

भानु
सूर्य, रवि।
संज्ञा
[सं.]

भानुज
यम।
संज्ञा
[सं.]

भानुज
शनिश्चर।
संज्ञा
[सं.]

भानुज
कर्ण।
संज्ञा
[सं.]

भानुज
मनु।
संज्ञा
[सं.]

भानुजा
सूर्य की पुत्री, यमुना।
संज्ञा
[सं.]

भानुतनया, भनुतनूजा
यमुना नदी।
संज्ञा
[सं.]

भानुमती
जादूगरनी।
संज्ञा
[सं.]

भानुसुत
कर्ण।
संज्ञा
[सं.]
दान-धर्म बहु कियौ भानु-सुत, सो तुव बिमुख कहायौ-१-१०४

भानुसुत
यम।
संज्ञा
[सं.]
प्रभु, मेरे गुल-अवगुन न बिचारौ। कीजै लाज सरन आए की, रबि-सुत त्रास निवारौ १-१११।

भानुसुत
शनिश्चर।
संज्ञा
[सं.]

भानुसुत
मनु।
संज्ञा
[सं.]

भानुसुता
यमुना नदी।
संज्ञा
[सं.]

भाने
तोड़ता है, भंग करता है।
क्रि. स.
[हिं. भानना]
आपुहिं हरता आपुहिं करता आपु बनावत, आपुहिं भाने-११८७।

भानै
काट देंगे, काटेंगे
क्रि. स
[हिं. भानना]
अजहूँ सिय सौंपि नतरु बीस भुजा भानै। रघुपति यह पैज करी, भूतल धरि पानै-९-९७।

भानै
नष्ट-भ्रष्ट करती है।
क्रि. स
[हिं. भानना]
सरिता चली मिलन सागर को कूल सबै द्रुम भानै-३३३७।

भानै
सूर्य या रवि को।
संज्ञा
[सं. भानु]
कुमुद चकोर मुदित बिधु निरखत कहा करै लै भानै-३४०४।

भान्यो, भान्यौ
तोड़ा।
क्रि. स.
[हिं. भानना]

भान्यो, भान्यौ
नष्ट किया।
क्रि. स.
[हिं. भानना]

भाप, भाफ
बाष्प।
संज्ञा
[सं. वाष्प, पा. वप्प, हिं. भाप]

भाभरा
लाल (रंग का)।
वि.
[हिं. भा+भरना]

भाभी
बड़े भाई की स्त्री,भौजाई।
संज्ञा
[हिं. भाई]
खैबे कौं कछु भाभी दीन्हे। श्रीपति श्री मुख बोले। फैंट उपर तैं अंजुल तंदुल बल करि हरि ज खोले-ना . ४२४५।

भाम
कोष।
संज्ञा
[सं.]

भाम
प्रकाश।
संज्ञा
[सं.]

भाम
स्त्री।
संज्ञा
[सं. भामा]

भामा
स्त्री, पत्नी।
संज्ञा
[सं.]
वह सुधि आवत तोहि सुदामा। जब हम तुम बन गए लकरियन पठए गुरु की भामा-१०- उ.-६६।

भामा
क्रुद्ध स्त्री।
संज्ञा
[सं.]

भामिन, भामिनि, भामिनी
स्त्री, नारी।
संज्ञा
[सं. भामिन]
जे पद-पदुम परसि ब्रजभामिनि सरबस दै, सुत-सदन बिसारे-१-९४।

भामिन, भामिनि, भामिनी
क्रुद्ध स्त्री।
संज्ञा
[सं. भामिन]

भामिन, भामिनि, भामिनी
पत्नी।
संज्ञा
[सं. भामिन]

भामी
क्रुद्ध, नाराज।
वि.
[सं. भामिन]

भामी
क्रुद्ध नारी।
संज्ञा

भामी
क्रुद्ध नारी। नारी।
संज्ञा

भाय
भाई।
संज्ञा
[हिं. भाई]

भाय
भाव।
संज्ञा
[सं. भाव]
गोविंद प्रीति सबन की मानत। जेहि-जेहि भाय करी जिन सेवा अंतरगत की जानत-१-१३।

भाय
परिमाण।

भाय
वर, भाव।

भाय
ढंग, भाँति।

भायप
भाईचारा।
संज्ञा
[हिं. भाई+पन]

भाया
रुचिकर, प्रिय।
वि.
[हिं. भाना]

भाया
रुचा, भला या प्यारा लगा।
क्रि. स.

भायो, भायौ.
जो अच्छ लगे, प्रिय, इच्छित।
वि.
[हिं. भाना = रुचना, भाया]
(क) जित-जित मन अर्जुन कौ तितहिं रथ चलायौ। कौरो-दल नासि-नासि कीन्हौं जन भायौ-१.२३। (ख) यह तन राँचि-राँचि करि बिरच्यौ कियौ आपनो भायौ-१-६७। (ग) बारक मिलैं सूर के प्रभु तौ करौं आपने भायौ-३३८५।

भायो, भायौ.
रुचा, भला या प्यारा लगा।
क्रि. स.
(क) बेद-बिरुद्ध सकल पांडव-कुल, सो तुम्हरैं मन भायौ-१.१०४। (ख) श्री रुकमिनि के जिय नाहिं भायो-१० उ०-७।

भार
बोझ।
संज्ञा
[स.]
(क) जिहि-जिहिं जानि जन्म जारयौ, बहु जारघौ अघ कौ भार-१६८। (ख) मोह अघ सिर भार-१.९९। (ग) कबहुँक चढ़ौं तुरंग, महा गज, कबहुँक भार बहौं-११६१। (ध) बिरथा जनम लियो संसार। करी कबहुँ न भक्ति हरि की मारी जननी भार-१-२९४। (ङ) सूरदास प्रभु दुष्ट-निकंदन धरनी भार उतारनकारी-2५८९।

भार
बोझ जो बहँगी में लावा जाय।
संज्ञा
[स.]

भार
सँभाल, रक्षा।
संज्ञा
[स.]
घर-घर गोपिन ते कहेउ कर भार जुरावहु।

भार
आभय, बल, सहारा।
संज्ञा
[स.]

भार
कर्तव्यपालन का उत्तरदायित्व।
संज्ञा
[स.]
किसी का भार उठाना-उसके पालनपोषण या रख-रखाव का भार अपने ऊपर लेना। भार उतरना-उत्तरदायित्व से मुक्त होना। भार उतारना (१) उत्तरदायित्व से मुक्त करना। (२) बेगार की तरह काम पूरा कर देना। भार डालना (देना)-उत्तरदायित्व सौंपना।
किसी का भार उठाना - उसके पालन-पोषण या रख-रखाव का भार अपने ऊपर लेना। भार उतरना-उत्तरदायित्व से मुक्त होना। भार उतारना (१) उत्तरदायित्व से मुक्त करना। (२) बेगार की तरह काम पूरा कर देना। भार डालना (देना) - उत्तरदायित्व सौंपना।

भार
भड़भूजे का भाड़।
संज्ञा
[हिं. भाड़]

भारत
महाभारत का युद्ध।
संज्ञा
[सं.]
भारत जुद्ध होइ जब बीता। भयौ जुधिष्ठिर अति भयभीता-१-२६१।

भारत
महाभारत ग्रंथ।
संज्ञा
[सं.]
भारत माहिं कथा यह विस्तृत, कहत होइ बिस्तार-१-२६७।

भारत
घोर युद्ध।
संज्ञा
[सं.]
सोवत काली जाइ जगायौ, फिरि भारत हरि कीन्हौं-५७६।

भारत
भार से दबाता है।
कि. अ.
[हिं. भारना]

भारत
भारी।
वि.
आपुन तरि-तरि औरनि तारत।...। इहिं विधि उपलै तरत पात ज्यौं, जदपि सैल अति भारत-९.१२३।

भारतवर्ष
आर्यावर्त, हिंदुस्तान।
संज्ञा
[सं.]

भारति, भारती
बाणी,-वचन।
संज्ञा
[सं. भारती]

भारति, भारती
सरस्वती।
संज्ञा
[सं. भारती]

भारतीय
भारत-संबंधी।
वि.
[सं.]

भारथ
युद्ध।
संज्ञा
[सं. भारत]

भारथ
महाभारत का युद्ध।
संज्ञा
[सं. भारत]

भारथ
महाभारत ग्रंथ।
संज्ञा
[सं. भारत]

भारथी
योद्धा, सैनिक।
संज्ञा
[सं. भारत]

भारद्वाज
भरद्वाज का वंशज।
संज्ञा
[सं.]

भारना, भारनो
भार था बोझ लादना।
क्रि. अ.
[हिं. भार]

भारना, भारनो
दबाना।
क्रि. अ.
[हिं. भार]

भारवाह, भारवाहक, भारबाहि, भारवाही
भार ढोनेवाला।
वि.
[सं.]

भारहारी
पृथ्वी का भार उतारने वाले (भगवान विष्णु और उनके अवतार)।
संज्ञा
[सं. भारहारिन्]

भारा
भार, बोझ।
संज्ञा
[सं. भार]
गयो कूदि हनुमंत जब सिंधु पारा। सेल के सांस लागे कमठ पाठि सौं, धँसे गिरिबर सबै तासु भारा-९-७६।

भारा
भारी।
वि.

भारा
बहुत बड़े, विशाल।
वि.

भारा
भाला।
संज्ञा
[हिं. भाला]

भारि
विशाल, बड़े, विस्तृत।
वि.
[हिं. भार, भार]
आइ घर जो नंद देखे, तरु गिरे दोउ भारि-३८७।

भारी
महान, बड़ा, महत्वशाली।
वि.
[सं. भार]
जन प्रहलाद प्रतिज्ञा पाली, कियौ बिभीषन राजा भारी-१-३४।

भारी
अधिक भारवाला, बोझिल।
वि.
[सं. भार]
पेट भारा हीना - अपच होना। पर भारी होना - गर्भिणी होना। सिर भारी होना सिर में दर्द होना। आवाज (गला) भारी होना - गला पड़ जाना या बैठ जाना।

भारी
कठिन, असह्य।
वि.
[सं. भार]
(क) यहि अतंर जुवती सब आई बन लाग्यो कछु भारी-१०८२। (ख) स्याम बिन भई सरद-निसि भारी-१० उ०-९७।

भारी
अत्यंत, अधिक, बहुत।
वि.
[सं. भार]
(क) बचन बाँह से चलौं गाँठि दै, पाऊँ सुख अति भारी-१-१४६। (ख) हँसे सबै कर तारी दै दै आनन्द कौतुक भारी १०-७५।

भारी
जिसका निर्वाह करना कठिन हो, दूभर।
वि.
[सं. भार]

भारी
फूला या सूजा हुआ।
वि.
[सं. भार]

भारी
सबल, अधिक शक्तिशाली।
वि.
[सं. भार]

भारी
गभीर।
वि.
[सं. भार]

भारीपन
भारी होने का भाव।
संज्ञा
[हिं. भारी+पन]

भारे
अधिक, बहुत अत्यंत।
वि.
[हिं. भारी]
(क) काम-क्रोध-मद-लोभ-मोह-बस, अतिहिं किए अध भारे-१-२७। (ख) कुरुपति अंध मोह बस तिनको देत सदा दुख भारे-३४९४।

भारे
विशाल, बड़ा, बृहत, महा।
जीव जल-थल जिते, बेष धरि धरि तिरे, अटत दुरगम अगम अचल भारे-१-१२०।

भारो, भारौ
अधिक, अत्यंत, बहुत।
वि.
[हिं. भार, भारी]
(क) सूर पतित कौं ठोर नहीं, तौ बहत बिरद कत भारौ-१-१३१। (ख) मदनदूत मोहि बात सुनाई इन में भर्‌यौ महारस भारौ-११२२।

भारो, भारौ
बड़ी, महान, महिमामही।
वि.
[हिं. भार, भारी]
नाद मुद्रा विभूति भारी करौ रावर भेस-३४१३।

भार्गव
भृगु का वंशज
संज्ञा
[सं.]

भार्गव
परशूराम
संज्ञा
[सं.]

भार्या
पत्नी, स्त्री।
संज्ञा
[सं.]

भारयौ
बहुत, अधिक, अत्यंत।
वि.
[हिं. भारी]
माखन ले दाउनि कर दीन्हौ, तुरत मथ्यौ, मीठौ अति भार्यौ-४०७।

भाव
विषय-भोग
संज्ञा
[सं.]

भाव
प्रेम, प्रीति।
संज्ञा
[सं.]

भाव
उपदेश।
संज्ञा
[सं.]

भाव
कल्पना।
संज्ञा
[सं.]
सूर स्याम जन के सुखदायक बँधे भाव रजु रंग-2५९।

भाव
प्रकृति स्वभाव।
संज्ञा
[सं.]

भाव
आंतरिक इच्छा।
संज्ञा
[सं.]

भाव
ढंग, रीति।
संज्ञा
[सं.]

भाव
प्रकार, तरह।
संज्ञा
[सं.]

भाव
दशा।
संज्ञा
[सं.]

भाव
विश्वास, भरोसा,
संज्ञा
[सं.]

बाची
भेद न खुला।
क्रि. अ.
[हिं. बचना]
आजु बाची मौन धरि जो सदा होत बचाउ - -१२८३।

बाचे
बच सकता है। बच पाता है।
क्रि. प्र.
[हिं. बचना]
(माया) बिनु देखे समुझे सुने जग ठगत, न कोऊ बाचे हो-पृ. ३४९ (५९)।

बाछ, बाछड़ा, बाछा, बाछे
गाय का बछड़ा।
संज्ञा
[सं. वत्स, प्रा.बच्छ, हिं - बाछा]

बाछ, बाछड़ा, बाछा, बाछे
पुत्र, बेटा, लाल।
संज्ञा
[सं. वत्स, प्रा.बच्छ, हिं - बाछा]
( क ) सूरदास प्रभु दोउ जननी मिलि, लेहिं बलाई बोलि मुख बाछे-५०७। (ख) भवन जाहु तुम मेरे बाछे-१०१४।

बाज
एक शिकारी पक्षी।
संज्ञा
[अ. बाज]
बाज सों टूटि गजराज हाँकत परयौ मनौ गिरि चरन धरि लपकि लीन्हे-2५९०।

बाज
एक तरह का बगला।
संज्ञा
[अ. बाज]

बाज
तीर में लगा हुआ पर।
संज्ञा
[अ. बाज]

बाज
वंचित, रहित।
वि.
[फ़ा. बाज]
बाज आना - (१) खो देना। (२) अलग रहना। न आयौ बाज - दूर न हटा, अलग न हुआ, आदत, न छोड़ी, संबंध न तोड़ा। उ. - (क) और पतित आवत न आँखितर, देखत अपनौ साज। तीनौं पन भरि ओर निबाह्यौ, तऊ न आयौ बाज-१९६। (ख) माया सबल धाम-धन-बनिता, बाँध्यौ हौं इहिं साज। देखत सुनत सबै जानत हौं, तऊ न आयौ बाज १-१०७। बाज करना - रोकना, मना करना। बाज रखना - रोक लेना। बाज रहना - दूर रहना।

बाज
एक प्रत्यय जो ‘रखने', 'खेलने', 'करने आदि का अर्थ देता है।
प्रत्य.

बाज
कई कोई या कुछ (लोग)।
वि.
[अ, बअज़]

भाल
माथा, ललाट।
संज्ञा
[सं.]
अधर दसन रसना रस बानी, स्रवन नैन अरु भाल-६४३।

भाल
भाला, बरछा।
संज्ञा
[हिं. भाला]

भाल
तीर की नोक, गाँसी।
संज्ञा
[हिं. भाला]

भाल
रीछ, भालू।
संज्ञा
[सं. भल्लुक]

भालना, भालनो
अच्छी तरह देखना।
कि. स.
[हिं. देखना का अनु.]

भालना, भालनो
ढूँढ़ना, खोज़ करना।
कि. स.
[हिं. देखना का अनु.]

भाला
बरछा, साँग, नेजा।
संज्ञा
[सं. भल्ल]

भालि
बरछी।
संज्ञा
[हिं. भाला]

भालि
काँटा।
संज्ञा
[हिं. भाला]

भाली
भाले या तीर की गाँसी या नोक।
संज्ञा
[हिं. भाला]
जब वह सुरति होत उर अंतर लागति काम बान की भाली-१० उ०-७९।

भाली
शूल, काँटा।
संज्ञा
[हिं. भाला]
कहा री कहौं कछु कहति न बनि आवै लगी मरम की भाली री-८४६।

भालुनाथ
जामवंत।
संज्ञा
[हिं. भालू + सं. नाथ]

भालू
रीछ' नामक चौपाया।
संज्ञा
[सं. भल्लुक]

भावंता
प्रिय, प्रीतम।
संज्ञा
[हिं. भाना]

भावंता
होनहार, भावी।
संज्ञा
[सं. भावी]

भाव
अभाव' का उलटा, अस्तित्व।
संज्ञा
[सं.]

भाव
विचार।
संज्ञा
[सं.]

भाव
अभिप्राय।
संज्ञा
[सं.]

भाव
मुख की आकृति।
संज्ञा
[सं.]

भाव
कृत्य, क्रिया।
संज्ञा
[सं.]

भाव
प्रतिष्ठा।
संज्ञा
[सं.]

भाव
बिक्री की दर।
संज्ञा
[सं.]
भाव उतरना - दर या दाम घटना। भाव चढ़ना - दर या दाम बढ़ जाना।

भाव
देवी-देवता के प्रति श्रद्धा-भक्ति।
संज्ञा
[सं.]
(क) बहुत भाव करि भोजन अर्प्यौ-९३५।

भाव
नायक के दर्शन से नायिका के मन में उपजनेवाला विकार।
संज्ञा
[सं.]

भाव
आंतरिक अनुभव को शारीरिक चेष्टा द्वारा व्यक्त करना।
संज्ञा
[सं.]
भाव देना - शारीरिक चेष्टा से मन का भाव प्रकट करना। भाव दै गयी - मनोभाव या मनो कामना सूचित कर गयी। उ. - स्याम कौ भाव दै गयी राधा। नारि नागरि न काहु लख्यौ कोऊ नहीं, कान्ह कछु करत है बहुत अनुराधा। भाव बताना - (१) नखरे के साथ हाथ - पैर हिलाना। (२) आंतरिक भाव सूचित करना।

भाव
नखरा, चोंचला।
संज्ञा
[सं.]

भाव
बुद्धि का गुण जिससे धर्म आदि का ज्ञान होता है।
संज्ञा
[सं.]

भावइ
चाहो तो, इच्छा हो तो।
अव्य.
[हिं. भाना]

भावई
रुचिकर लगता है, प्रिय होता है।
क्रि. स.
[हिं. भाना]
सुधारस जेहि स्वाद चाख्यौ तिनहिं और न भावई.-३२६०।

भावक
थोड़ा, किंचित।
क्रि. वि.
[सं. भाव+क]

भावता
जो भला लगे।
वि
[हिं. भावना, भाना]

भावता
प्रेमपात्र, प्रियतम।
संज्ञा

भावताव
मोल-तोल।
संज्ञा
[हिं. भाव+ताव]

भावति
भली लगनेवाली, रुचिकर, प्रिय।
वि.
[हिं. भावती]
आजु सा बात बिधाता कीन्ही, मन जो हुती अति भावति-१०-२३।

भावति
भली लगती है, प्रिय है।
क्रि. स
मोसौं तुम मुँह की मिलवत हौ भावति है वह प्यारी -१८६४।

भावती
जो भली लगे।
वि.
[हिं. पुं. भावता]
(क) बालबिनोद भावती लीला, अनि पुनीत मुनि भाषी-१०-४। (ख) एक-एक ते गुन-रूप उजागरि स्याम भावती प्यारी-११८५। (ग) तुमते को है भावती हृदय बपाऊँ-१८६८। (ब) बाकी भावती बात चलाइहौं-2२०९।

भावती
प्रेमपात्री, प्रियतमा।
संज्ञा
(क) सूर स्याम की भावती कहै कहौ कहा री-१५३२। (ख) सूर-प्रभु-भावती के सदा रसभरे नैन भरि भरि प्रिया रूप चोरै-पृ० ३१७ (६४)।

भावते
जो-जो रुचे, भले लगे।
वि.
[हिं. भावता]
(क) होड़ाहोड़ी सनहिं भावते किए पाप भरि पेट-१-१४६ (ख) सूरदास प्रभु भलैं परे फँद, देउँ न जान भावते जी के-१०-२८७।

भावते
प्रेममात्र, प्रियतम।
संज्ञा

भावन
अच्छा लगनेवाला, जो भला लगे, भानेवाला।
वि.
[सं. भाव]
चरन धोइ चरनोदक लीन्हौ, कह्यौ माँगु मन-भावन-८-१३।

भावक
भावपूर्ण, भावयुक्त।
वि.
[सं.]

भावक
भावना करनेवाला।
संज्ञा

भावक
भाव से युक्त।
संज्ञा

भावक
भक्त. श्रद्धालु।
संज्ञा

भावक
भाव।
संज्ञा

भावगति
इच्छा, विचार।
संज्ञा
[सं. भाव+गति]

भावगम्य
जो भाव द्वारा जाना जाय।
वि.
[सं.]

भावज
भाव से उत्पन्न।
वि.
[सं.]

भावज
भाई की स्त्री।
संज्ञा
[सं. भ्रातृजाया, हिं. भौजाई]

भावत
अच्छा लगता है, रुचता है, पसंद आता है।
क्रि. अ.
[हिं. भाना]
(क) जहाँ गयौ तहँ भलौ न भावत, सब कोऊ सकुचानौ-१-१०२। (ख) गरब गोबिंदहिं भाक्त नाहीं-2-२३। (ग) उपवन बन्यौ चहूँघा पुर के अति ही मोकों भावत-2५५९।

भावन
लागी भावन-भली लगने लगी है।
प्र.
सूर सुरति क्यों होति हमारी लागी नीको भावन-2०६९।

भावन
भावना।
संज्ञा
[सं.]

भावन
ध्यान।
संज्ञा
[सं.]

भावना
ध्यान, विचार।
संज्ञा
[सं.]

भावना
अनुभव-जन्य विचार।
संज्ञा
[सं.]

भावना
कामना, वासना।
संज्ञा
[सं.]

भावना
रुचना, भला लगना।
क्रि. अ.

भावना
जो भला लगे।
वि.

भावना
मनचाहा, मनचीता।
वि.
(तब) लादि पंकज कढ्‌यौ बाहिर, भयौ ब्रज-मन-भावना-५७७।

भावनि
इच्छानुसार कार्य।
संज्ञा
[हिं. भाना]

भाविक
वह अलंकार जिसमें भूत और भावी बातें प्रत्यक्षवत् यर्णित हों।
संज्ञा
[सं.]

भाविक
जाननेवाला, सर्वज्ञ।
वि.

भावित
सोचा-विचारा हुआ।
वि.
[सं.]

भावित
सुगंधित किया हुआ।
वि.
[सं.]

भावित
भेंट किया हुआ, समर्पित।
वि.
[सं.]

भाविता
होनहार, होनी।
संज्ञा
[सं.]

भाविय, भाविहि
भावी ही के, भवितव्यता हो के।
संज्ञा
[हिं. भावी]
कह्यौ, सुतनि-सुधि आवति कबहीं? कह्यौ, भावियै कैं बस सबहीं.-१-२८४। (ख) सूरदास प्रभु भाविहि के बस मिलत कृपा कै अति सुख देवै-2६४१।

भावी
भविष्य में होनेवाली बात, भवितव्यता होनी।
संज्ञा
[सं. भाविन]
भावी काहूसौं न टरै। कहँ वह राहु, कहाँ वह रवि-ससि आनि सँजोग परै। भावी कैं बस तीन लोक हैं, सुर नर देह धरै-१-२६४।

भावी
आनेवाला समय।
संज्ञा
[सं. भाविन]

भावी
भाग्य, प्रारब्ध।
संज्ञा
[सं. भाविन]

भावनी
रुचिकर, प्रिय।
वि.
[हिं. भावना]
भाट बोलै बिरद नारी बचन कहैं मन भावनी-१० उ०.२४।

भावनो
भला लगनेवाला, रुचिकर।
वि.
[हिं. भावना]
तेहि देखे त्रय ताप नासै ब्रज-बधू-मन-भावनो-2२८०।

भावनो
रुचना, भला लगना।
क्रि, अ.

भावभक्ति
भक्ति की भावना।
संज्ञा
[सं. भाव+भक्ति]
भाव-भक्ति कछ हृदय न उपजी, मन विषया मैं दीनौ-१-६५

भावभक्ति
आदर, सत्कार, श्रद्धा।
संज्ञा
[सं. भाव+भक्ति]
नैन मूँदि कर जोरि बोलायौ। भाव-भक्ति सों भोग लगायौ।

भाववाचक
संज्ञा (शब्द) जिससे किसी पदार्थ का गुण, धर्म आदि सूचित हो।
संज्ञा
[सं.]

भावशबलता
एक अलंकार जिसमें कई भावों की संधि हो।
संज्ञा
[सं.]

भाव संधि
वह वर्णन-रीति जिसमें दो विरुद्ध भावों की संधि का वर्णन रहता है।
संज्ञा
[सं.]

भावहि
भला लगता है, रुचता है।
क्रि. स.
[हिं. भाना]
नाहिंन कछू सुहात तुमहिं बिन कानन भवन न भावहिं-३४२७।

भाविक
भादी अनुमान।
संज्ञा
[सं.]

भाषी
बोली, कहा, कहने लगी।
क्रि. अ.
[हिं. भाषना]
(क) रिपु कच गहत द्रुपद-तनया जब सरन-सरन कहि भाषी-१-२७। (ख) ऐसी भाँति नृपति बहु भाषी। सुनि जड़ भरत हृदय महँ राखी-५-४।

भाषी
बोलनेवाला।
संज्ञा
[सं. भाषिन्‌]

भाषैं
कहते हैं।
क्रि. स.
[हिं. भाषना]
सूरदास प्रभु दीन बचन यौँ हनूमान सौं भाषैं-९-१४६।

भाषै
कहता है, बोलता है।
क्रि. स.
[हिं. भाषना]
ठाढ़े आधान भए देव-देव भाषै-2६१९।

भाषौं
कहता हूँ, बोलता हूँ।
क्रि. स.
[हिं. भाषना]
रसना इहई नेम लियो है और नहिं भाषौं मुख बैन-2७६८।

भाष्य
व्याख्था, टीका
संज्ञा
[सं.]

भाष्यकार
व्याख्या या टीकाकार।
संज्ञा
[सं.]

भाष्यौ
कहा।
क्रि. स.
[हिं. भाषना]
(रिसि ) कह्यौ, सर्प है भाष्यौ मोहिं। सूर्य रूप तूहौ नृप होहि-६-७।

भास
प्रमा, दीप्ति।
संज्ञा
[सं.]

भास
किरण।
संज्ञा
[सं.]

भावुक
सोचने-विचारनेवाला।
वि.
[सं.]

भावुक
जिसके मन में भावों का उदय बहुत शीघ्र हो, जो सहज ही द्रवित हो जाय।
वि.
[सं.]

भावै
प्रिय लगता है, रुचता है।
क्रि. स.
[हिं. भाना]
(क) सुकृती-सुचि-सेवकजन काहि न जिय भावै-१-१२४। (ख) प्रातहिं उठत तुम्हारे कान्ह को माखन-रोटी भावै-2७०७। (ग) नहिंन सोहात कछु हरि तुम बिनु कानन भवन न भावै-३४२३।

भावै
समझ में, बुद्धि के अनुसार।
क्रि. वि.
प्रान हमारे थात (?) होत हैं तुमरे भावै हाँसी-३०६३।

भावै
चाहे।
क्रि. वि.
भावै परौ आजु ही यह तन भाव रहौ अमान-2-३३।

भाषण
कथन।
संज्ञा
[सं.]

भाषण
व्याख्यान।
संज्ञा
[सं.]

भाषत
कहती है, बताते हैं।
क्रि. अ.
[हिं. भाषना]
(क) महादेव कौं भाषत साधु-४-५। (ख) बार-बार संकर्षन भाषत लेत नहीं ह्याँते गज टारी-2५८९।

भाषति
कहती है, बोलती है।
क्रि. अ.
[हिं. भाषना]
निबाहौ बाँह गहे की लाज। द्रुपद-सुता भाषति नँदनंदन, कठिन बनी है आज-१-२५५।

भाषना, भाषनो
बोलना, कहना।
क्रि. अ.
[सं. भाषण]

बाजने
बाजे।
संज्ञा
[हिं. बाजना]
बाजत नगर बाजने जहँ तहँ और बजत घरियार-2५६२।

बाजरा
एक मोटा अनाज।
संज्ञा
[सं. वर्जरी]

बाजा
वाद्य।
संज्ञा
[सं. वाद्य]

बाजा
बजता है, बाजे से शब्द निकलता है, बाजा बोलता है।
क्रि. अ.
[हिं. बजना]
हरि, हौं सब पति-तनि कौ राजा। निंदा पर-मुख पुरि रह्यौ जग,यह निसान नित बाजा-१-१४४।

बाजार
वह स्थान जहाँ सभी चीजें बेचने की दुकानें हों।
संज्ञा
[फ़ा. बाजार]
बाजार गर्म होना - खूब बिक्री या लेनदेन होना।

बाजार
निश्चित वार, तिथि आदि को लगने वाली हाट या पैंठ।

बाजारी, बाजारू
बाजार संबंधी।
वि.
[हिं. बाजार]

बाजारी, बाजारू
मामूली।
वि.
[हिं. बाजार]

बाजारी, बाजारू
अशिष्ट।
वि.
[हिं. बाजार]

बाजि
घोड़ा।
संज्ञा
[सं. वाजिन्]
बाऐँ कर बाजि-बाग दाहिन हैं बैठे-१- २३।

भाषना, भाषनो
भोजन करना।
क्रि. अ.
[सं. भक्षण]

भाषांतर
अनुवाद, उल्था।
संज्ञा
[सं.]

भाषा
बोली, जबान।
संज्ञा
[सं.]

भाषा
विशेष जन-समूह की बोली।
संज्ञा
[सं.]

भाषा
जन-साधारण में प्रचलित बोली का रूप।
संज्ञा
[सं.]

भाषा
आधुनिक हिंदी जिसका जन्म सन् १००० के आस-पास हुआ माना जाता है और जिसको राजस्थानी ब्रजभाषा, अवधी, खड़ीबोली आदि जन-बोलियों के लिए (संस्कृत की तुलना में) 'भाषा' कहा जाता है।
संज्ञा
[सं.]
ब्यास कहे सुकदेव सौं द्वादस स्कंध बनाइ। सूरदास सोइ कहे पद भाषा करि गाइ-१-२२५।

भाषाबद्ध
जनभाषा में लिखा हुआ।
वि.
[सं.]

भाषि
कहकर, बोलकर।
क्रि. अ.
[हिं. भाषना]

भाषित
कहा हुआ, कथित।
वि.
[सं.]

भाषित
कथन, बातचीत।
संज्ञा

भासना, भासनो
चमकना।
क्रि. स.
[सं. भास]

भासना, भासनो
जान पड़ना।
क्रि. स.
[सं. भास]

भासना, भासनो
देख पड़ना।
क्रि. स.
[सं. भास]

भासना, भासनो
फँस जाना।
क्रि. स.
[सं. भास]

भासना, भासनो
कहना, बोलना।
क्रि. अ.
[हिं. भाषना]

भासमान
जान पड़ता हुआ।
वि.
[सं.]

भासमान
सूर्य।
संज्ञा

भासित
प्रकाशमान, दीपित।
वि.
[सं.]

भासी
फँसी, लिप्त हुई।
क्रि. अ.
[हिं. भासना]
अपने भुज दंडन कर गहिये बिरह-सलिल मैं भासी।

भास्कर
सूर्य।
संज्ञा
[सं.]

भिक्षण
भीख माँगना।
संज्ञा
[सं.]

भिक्षा
माँगना, याचना।
संज्ञा
[सं.]

भिक्षा
भीख।
संज्ञा
[सं.]

भिक्षा
भीख में मिली वस्तु।
संज्ञा
[सं.]

भिक्षा
सेवा, नौकरी।
संज्ञा
[सं.]

भिक्षाटन
भीख माँगते घूमना।
संज्ञा
[सं.]

भिक्षापात्र
भीख माँगने का पात्र।
संज्ञा
[सं.]

भिक्षु, भिक्षुक
भिखारी।
संज्ञा
[सं.]

भिक्षु, भिक्षुक
साधु।
संज्ञा
[सं.]

भिखमंगा
भिखारी।
संज्ञा
[हिं. भीख +माँगना]

भास्कर
अग्नि।
संज्ञा
[सं.]

भास्वर
सूर्य।
संज्ञा
[सं.]

भास्वर
दिन।
संज्ञा
[सं.]

भिंग
भृगीं कीड़ा।
संज्ञा
[सं. भृंग]

भिंग
भौंरा।
संज्ञा
[सं. भृंग]

भिंग
बाधा, रुकावट।
संज्ञा
[सं. भंग]

भिंगाना, भिंगानो, भिजाना, भिंजानो
गीला करना।
क्रि. स.
[हिं. भिगोना]

भिंडी
एक पौधे की फली जिसकी तरकारी बनती है।
संज्ञा
[सं.भिड़ा]
बनकौरा पिंडीक चिचिंड़ी, सीप पिड़ारू कोमल भिंडी-३९६।

भिंसार
प्रातःकाल।
संज्ञा
[सं. भानु+सरण]

भिआ
भाई, भ्राता।
संज्ञा
[हिं. भैया]

भिखार
भिखारी।
संज्ञा
[हिं. भीख]

भिखारिणि, भिखारिणी भिखारिन, भिखारिनी
भीख माँगनेवाली स्त्री।
संज्ञा
[हिं. भिखारी]

भिखारि, भिखारी
भीख माँगनेवाला, भिक्षुक।
वि.
[हिं. भीख+आरी (प्रत्य.)]
और देव सब रंक-भिखारी, त्यागे बहुत अनेरे-१-१७०।

भिखिया
भीख, भिक्षा।
संज्ञा
[हिं. भीख भीख]

भिगाना, भिगानो, भिगोना, भिगोनो
गीला करना।
क्रि. स.
[हिं.भिगोना]

भिच्छा
भीख, भिक्षा।
संज्ञा
[सं. भिक्षा]
रावन तुरत बिभूति लगाए, कहत आइ, भिच्छा दै माई-९-५९।

भिजवना, भिजवनो
गीला करना।
क्रि. स.
[हिं. भिगोना]

भिजवाना, भिजवानो
गीला या तर कराना।
क्रि. स.
[हिं. भिगोना]

भिजवाना, भिजवानो
भेजने को प्रवृत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. भेजना]

भिजाना, भिजानो
गीला या तर करना।
क्रि. स.
[हिं. भिगोना]

भिजाना, भिजानो
भेजने को प्रवृत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. भेजना]

भिजे
गीले, तर, भीजे हुए।
वि.
[हिं. भीजना]
मूँग-पकौरा पनौ पतबरा। इक कोरे इक भिजे गुरबरा-३९६।

भिजोना, भिजोनो, भिजोवना, भिजोवनो
गीला करना।
क्रि. स.
[हिं.भिगोना]

भिज्ञ
जानकार, ज्ञाता।
वि.
[सं.]

भिटना
छोटा गोल फल।
संज्ञा
[देश.]

भिटनी
स्तन की घुंडी।
संज्ञा
[हिं. भिटना]

भिंडत
मुठभेड़।
संज्ञा
[हिं. भिड़ना]

भिड़
बर्र, ततैया।
संज्ञा
[सं. वरट]

भिड़ना, भिड़नो
टकराना।
क्रि. अ.
[हिं. भड़ (अनु.)]

भिड़ना, भिड़नो
लड़ाई करना।
क्रि. अ.
[हिं. भड़ (अनु.)]

भिड़ना, भिड़नो
निकट या पास पहुँचना।
क्रि. अ.
[हिं. भड़ (अनु.)]

भितरिया
बल्लभ-संप्रदायी मंदिर में मूर्ति के निकट रहनेवाला पुजारी।
संज्ञा
[हिं. भीतर]

भितरिया
भीतर या अन्दर का।
वि.

भितल्ला
भीतरी परत।
संज्ञा
[हिं. भीतर +तल]

भितल्ली
चक्की का निचला पाट।
संज्ञा
[हिं. भीतर+तल]

भिताना, भितानो
डराना, भयभीत करना।
क्रि. स.
[सं. भीति]

भिताना, भितानो
डरना, भयभीत होना।
क्रि. अ.

भित्ति
दीवार।
संज्ञा
[सं.]

भित्ति
भय, डर।
संज्ञा
[सं.]

भित्ति
चित्र खींचने का आधार।
संज्ञा
[सं.]

भिद
भेद, अन्तर।
संज्ञा
[सं. भिद्]

भिदन
भेदने, छेदने या नाश करने वाले।
वि.
[हिं. भेदना]
मधु कैटभ मथन, मुर भौम केसी भिदन कंस कुलकाल अनुसाल हारी-१०3०-५०।

भिदना, भिदनो
घुसना,धँसना।
क्रि. अ.
[सं. भिद्]

भिदना, भिदनो
छेदा जाना।
क्रि. अ.
[सं. भिद्]

भिदना, भिदनो
घायल होना।
क्रि. अ.
[सं. भिद्]

भिदि
धँसकर।
क्रि. अ.
[हिं. भिदना]

भिदि
भिदि गयौ-धँस गया।
प्र.
रोमनि रोमनि भिदि गयौ सब अँग अंग पगी-१५०३।

भिदुर
वज्र।
संज्ञा
[सं. भिदिर]

भिनकना, भिनकनो
घृणा उत्पन्न होना।
क्रि. अ.
[अनु.]

भिनकना, भिनकनो
मलिन या गंदा होना।
क्रि. अ.
[अनु.]

भिनकना, भिनकनो
भिन-भिन' शब्द या ध्वनि करना।
क्रि. अ.
[अनु.]
(किसी पर) मक्खियाँ भिनकना - बहुत दुर्बल और दीन - मलीन होना।

भिनभिनाना, भिनभिनानो
भिनभिन' शब्द या ध्वनि करना।
क्रि. अ.
[अनु.]

भिनसार
प्रात:काल।
संज्ञा
[सं. वि+अह्नि + सार]

भिनहीं
सबेरे, तड़के।
क्रि. वि.
[सं. विनिशा]

भिनुसार
सबेरा, प्रभात, प्रातःकाल।
संज्ञा
[हिं. भिनुसार]
(क) उठौ नँदलाल भयौ भिनुसार, जगावति नंद की रानी-१०-२०८। (ख) बारहिं बार जगावति माता, अंबुजनैन भयौ भिनुसार-४०३।

भिन्न
अलग, पृथक।
वि.
[सं.]

भिन्न
दूसरा, अन्य।
वि.
[सं.]
बिष्नु, रुद्र, बिधि, एकहिं रूप। इन्हैं जानि मति भिन्न स्वरूप-४-५।

भिन्न
संख्या जो इकाई से कम हो।
संज्ञा

भिन्नता
अलगाव, भेद, अन्तर।
संज्ञा
[सं.]

भिन्नाना, भिन्नानो
( दुर्गन्ध आदि से) सर चकराना।
क्रि. अ.
[अनु.]

भिन्नाना, भिन्नानो
खीझना, खिजलाना।
क्रि. अ.
[अनु.]

भियना, भियनो
भयभीत होना।
क्रि. अ.
[सं. भीति]

भिया
भाई, भ्राता।
संज्ञा
[हिं. भैया]

भिरत
लड़ता-फिरता है।
क्रि. अ.
[हिं. भिड़ना]
सोभित सुभट प्रचारि पैज करि भिरत न मोरत अंग-९५७।

भिरना,भिरनो
टकराना।
क्रि. अ.
[हिं. भिड़ना]

भिरना,भिरनो
लड़ना-झगड़ना।
क्रि. अ.
[हिं. भिड़ना]

भिरना,भिरनो
समीप या निकट पहुँचना।
क्रि. अ.
[हिं. भिड़ना]

भिरहु
लड़ो, जूझो।
क्रि. अ.
[हिं. भिड़ना]
सब कहत भिरहु स्याम सुनत रहत सदा नाम हारि-जीति घर ही की कौन काहि मारै-2६००।

भिरे
लड़े, जूझे।
क्रि. अ.
[हिं. भिड़ना]
रुद्र भगवान अरु बान सांबुक भिरे राम कुंभाउ माँड़ी लड़ाई-१० उ०-३५।

भिरौं
लड़ूँगा, सामना करूँगा।
क्रि. अ.
[हिं. भिड़ना]
होइ सनमुख भिरौं, संक नहिं धरौं, मारि सब कटक सागर बहाऊँ-९-१२९।

बाजन
बाजे, वाद्य।
संज्ञा
[हिं. बाजा]
ज्यौं सहगमन सुंदरी कैं सँग, बहु बाजन हैं बाजत-९१३०।

बाजन
बजना, शब्द करना।
क्रि. अ.
[हिं. बजना]

बाजन
गरजना।
क्रि. अ.
[हिं. बजना]

बाजन
लागे बाजन-गरजने लगा।
प्र.
चहुँ दिसि ते दल-बादल उमड़े, सूने लागे बाजन–१०३० - उ०-९६।

बाजना
बाजा बजना।
क्रि. अ.
[हिं. बजना]

बाजना
लड़ना-झगड़ना।
क्रि. अ.
[हिं. बजना]

बाजना
प्रसिद्ध हो जाना।
क्रि. अ.
[हिं. बजना]

बाजना
आघात पहुँचना।
क्रि. अ.
[हिं. बजना]

बाजना
जो (बाजा) बजने से ठीक हो।
वि.
[हिं. बजना]

बाजना
सामने उपस्थित हो जाना।
क्रि. अ.
[सं. व्रज्]

भीख
भिक्षा।
संज्ञा
[सं. भिक्षा]

भीख
दान।
संज्ञा
[सं. भिक्षा]
पंच की भीख सूर बल-मोहन, कहति जसोमति माई-४५५

भीखन
भयानक, भयंकर।
वि.
[सं. भीषण]

भीरक
भीष्म पितामह।
संज्ञा
[सं. भीष्म]

भीरक
भयानक, डरावना।
वि.

भीगना, भीगनो
गीला होना।
क्रि. अ.
[सं. अभ्यंज]

भीजत
गीला या तर होता है।
क्रि. अ.
[हिं. भीजना]
अति ही सीत भीत भीजत तनु गिरि कर क्यों न धरी-३२००।

भीजना, भीजनो
गीला होना।
क्रि. अ.
[हिं. भीगना]

भीजी
भीग गयी, गीली या तर हो गयी, आर्द्र या सराबोर हो गयी।
क्रि. अ.
[हिं. भीजना]
(क) नैन सलिल भीजी सब सारी-पृ. ३५३ (९२)। (ख) या गोकुल के चौहटे रँग भीजी ग्वालिनि-2४०५।

भीजे
गीले या तर हो गये।
क्रि. अ.
[हिं. भीजना]

भींचना, भींचनो
कसना, दबाना।
क्रि. स.
[हिं. खींचना]

भींचना, भींचनो
(आँख) मूँदना या बंद करना।
क्रि. स.
[हिं. खींचना]

भींज
नमी, तरी।
संज्ञा
[हिं. भीगना]

भी
भय, डर।
संज्ञा
[सं.]

भी
अवश्य, निश्चय ही।
अव्य.
[हिं. ही]

भी
अधिक, विशेष।
अव्य.
[हिं. ही]

भी
तक, लौं।
अव्य.
[हिं. ही]

भीउँ
युधिष्ठिर का भाई भीम।
संज्ञा
[सं. भीम]

भीक
डरा हुआ, भयभीत।
वि.
[सं.]

भीक
भिक्षा।
संज्ञा
[हिं. भीख]

भिलनी
भील जाति की स्त्री।
संज्ञा
[हिं. भील]

भिल्ल
भील जाति।
संज्ञा
[हिं. भील]

भिल्लनि
बहुत से भील।
संज्ञा
[सं. भिल्ल]
तहँ भिल्लनि सौं भई लराई। लूटे सब, बिन स्याम सहाई-१-२८६।

भिल्लिनि
भील जाति की स्त्री।
संज्ञा
[हिं. भीलनी]

भिल्लिनि
भीलनी शबरी जिसके बेर श्रीरामचन्द्र ने सरुचि खाए थे।
संज्ञा
[हिं. भीलनी]
भिल्लिनि के फल खाए भाव सौं खाटे मीठे-खारे-१-२५।

भिश्त
स्वर्ग।
संज्ञा
[फा. बिहिश्त]

भिश्ती
मशक से पानी भरनेवाला।
संज्ञा
[?]

भिषक, भिषक, भिषज
वैद्य।
संज्ञा
[सं. भिषक्]

भिष्टा, भिसटा, भिस्टा
मल।
संज्ञा
[सं. विष्टा]

भिस्त
(मुसलमानों का) स्वर्ग।
संज्ञा
[फा. बिहिश्त]

भीड़ना, भीड़नो
मलना।
क्रि.स.
[हिं. भिड़ाना]

भीड़भड़क्का
बहुत भीड़।
संज्ञा
[हिं. भीड़]

भीड़भाड़
बहुत भीड़।
संज्ञा
[हिं. भीड़]

भीड़ा
तंग, संकुचित।
वि.
[हिं. भिड़ाना]

भींड़ी
भिंडी (तरकारी)।
संज्ञा
[हिं. भिंडी]
बन कोरा पिंडीक चिचींड़ी। खीय पिंडारू कोमल भींड़ी-८३१।

भींड़ी
जन समूह, झुंड, भीड़।
संज्ञा
[सं. भीड़]

भीत
दीवार।
संज्ञा
[सं. भित्ति]
भीत में दौड़ना - शक्ति से बाहर काम करना।

भीत
चित्र खीचने का आधार।
संज्ञा
[सं. भित्ति]
बिन ही भीत चित्र किन कीनो किन नभ हठ करि घाल्यो झोरी-३०२८।
भीत बिना चित्र बनाना - वे सिर पैर की या उल्टी - सीधी बात करना।

भीत
डरा हुआ, भयभीत।
वि.
[सं.]

भीत
भय, डर।
संज्ञा

भीतर
अंदर, में।
क्रि. वि.
[देश.]
जबतैं जनम लियौ जग भीतर तब तैं तिहिं प्रतिहार्यौ-१.३३६।
भीतर का कुआँ - उपयोगी, परन्तु सबके काम न आ सकनेवाली वस्तु। उ. - सूरदास प्रभु तुम बिन जोबन घर भीतर को कूप। भीतर पैठना - तत्व की बात जानने का प्रयत्न करना।

भीतर
हृदय, अन्तःकरण।
संज्ञा
भीतर ही भीतर - मन ही मन में।

भीतर
रनिवास, जनानाखाना।
संज्ञा

भीतरा
रनिवास में आने-जानेवाला।
वि.
[हिं. भीतर]

भीतरि
अंदर, में।
क्रि. वि.
[हिं. भीतर]

भीतरिया
वह जो भीतर रहता हो।
संज्ञा
[हिं. भीतर]

भीतरिया
वल्लभ-संप्रदायी मंदिरों के वे पुजारी जो मूर्ति के निकट रहते हैं।
संज्ञा
[हिं. भीतर]

भीतरिया
भीतर का, भीतरी।
वि.

भीतरी
भीतर का।
वि.
[हिं. भीतर]

भीतरी
गुप्त।
वि.
[हिं. भीतर]

भीजे
गीले, तर, आर्द्र।
वि.
दसन दामिनि ज्योति उर पर माल मोती, ग्वाल-बाल सब आवैं रंग भीजे-2३५२।

भीजै
(भीगती) भीगते हैं, गीले होते हैं।
क्रि. अ.
[हिं. भीजना]
(क) पाहन तारे, सागर बाँध्यौ तापर चरन न भीजै-९-१२६। (ख) बूँद परत रँग ह्वैहै फीको, सुरँग चूनरी भीजै-७३१।

भीजै
पुलकित या प्रेममग्न हो जाते हैं।
क्रि. अ.
[हिं. भीजना]
गदगद सुर, पुलक रोम, अंक प्रेम भीजै-१-७२।

भीजैगौ
गीला या तर हो जायगा।
क्रि. अ.
[हिं. भीजना]
बेगि साँवरे पाइँ धारिये सूर के स्वामी नतरु भीजैगो पियरौ पट आवत है पिय मेहरा-2००१।

भीजौ
गीले या तर हो जाओ।
क्रि. अ.
[हिं. भीजना]
ठाढ़े रहौ आँगन ही हो पिय जौलौं मेह न नखशिख भीजौ-2००२।

भीट, भीटा
टीला।
संज्ञा
[देश.]

भीट, भीटा
स्थान जहाँ पान की खेती होती है।
संज्ञा
[देश.]

भीड़
जन-समूह, झुंड।
संज्ञा
[हिं. भिड़ना]
भीड़ चीरना - झुंड हटाकर मार्ग बनाना। भीड़ छँटना - जन-समूह का एकत्र न रह जाना।

भीड़ छँटना
संकर, आपत्ति, विपत्ति।
संज्ञा
[हिं. भिड़ना]

भीड़ना, भीड़नो
मिलाना।
क्रि.स.
[हिं. भिड़ाना]

भीति
भय, डर।
संज्ञा
[सं.]
ज्यौं बिट पर-तिय सँग बस्यौ, भोर भए भई भीति-१-३२५।

भीति
कंप, कँपकँपी।
संज्ञा
[सं.]

भीति
दीवार।
संज्ञा
[सं. भित्ति]
नंदनंदन ब्रत छाँड़िकै को लिखि पूजै भीति-३४४३।
भुस पर की भिति - दृढ़ आधार न होने के कारण बहुत जल्दी ढा जाने या नष्ट हो जानेवाली चीज। उ. - सूरदास प्रभु तुम्हरे मिलन बिनु भई भुस पर की भिति-2७१६।

भीति
चित्र खींचने का आधार।
संज्ञा
[सं. भित्ति]
भीत बिन कह चित्र देखै रही दूती हेरि २०४३।
भीति (के) बिना चित्र करना (बनाना) - बे सिर-पैर की या आधार-रहित बात करना। भिति बिन चित्र करत - बे सिर-पैर की बातें करते हो। उ. - तात रिस करत भ्राता कहै मारिहौं, भौति बिन चित्र तुम करत रेखा-१२४६।

भीतिका, भीतिकारी
भयंकर, भायावना।
वि.
[सं.]

भीती
दीवार।
संज्ञा
[सं. भित्ति]

भीती
डर, भय।
संज्ञा
[सं, भीति]
चंद की दुति गई, पहै पीरी भई सकुच नाहीं दई अतिहि भीती-१६१०।

भीन
सबेरा, प्रातःकाल।
संज्ञा
[हिं, बिहान]

भीन
मग्न, निमग्न, लीन, डूबा हुआ।
वि.
[हिं. भीनना]
दुष्टनि दुख, सुख संतनि दीन्हौ, नृप-ब्रत पूरन कीन। रामचन्द्र दसरथहिं बिदा करि सूरदास रसभीन-९-२६।

भीनना, भीननो
भर या समा जाना, लीन होना।
क्रि. अ.
[हिं. भीगना]

भीनी
युक्त, लीन, डूबी हुई, निमग्न।
वि.
[हिं. भीनना]
चलत चरन गहि रहि गई गिरि खेद सलिल भय भीनी-३४४९।

भीने
युक्त, लीन, डूबे हुए, निमग्न।
वि.
[हिं. भीनना]
(क) नवल निकुंज नवल रस दोऊ राजत हैं रँग भीने-पृ० ३१५ (४६)। (ख) दुरत न डर नख गात लाल रँग भीने हो-2४०१।

भीनो, भीनौ
मग्न, लीन, डूबा हुआ।
वि.
[हिं. भीनना]
अति सुकुमार डोलत रस-भीनौ-2-१०।

भीन्यौ
लीन या मग्न हो गया, समा गया।
क्रि. अ.
[हिं. भीनना]
सूरदास स्वामीपन तजि कै सेवक पन रस भीन्यौ-८-१५।

भीन्ही
(सुगंध आदि में) बसी हुई।
वि.
[हिं. भीनना]
गोरे गात मनोहर उरजन लसत फुलेल कंचुकी भीन्ही-2२९५।

भीम
युधिष्ठिर का भाई भीमसेन।
संज्ञा
[सं.]
भीम के हाथी - भीमसेन द्वरा फेंके गये हाथी जो आज भी आकाश में घूमते माने जाते हैं। तात्पर्य उस व्यक्ति या पदार्थ से है जो एक बार छूटकर फिर न मिले। उ. - अब मन भयौ भीम के हाथी सुपने अगम अपार-१० उ०.८४।

भीम
भयानक, भयंकर।
वि.

भीम
बहुत बड़ा।
वि.

भीमता
भयंकरता।
संज्ञा
[सं.]

भीमा
भयंकर, डरावनी।
वि.
[सं.]

भीर
जन-समूह, भीड़।
संज्ञा
[हिं. भीड़]
सूर स्याम कौ जसुमति टेरति बहुत भीर है हरि न भुलाहिं-९१९।

भीर
ठठ, झुंड, समूह।
संज्ञा
[हिं. भीड़]
प्रेम मगन गावत गंध्रब गन ब्यौम बिमाननि भार-५७५।

भीर
संकट, विपत्ति।
संज्ञा
[हिं. भीड़]
(क) हरै बलकार बिना को पर। सारंगपति प्रगटे सारंग तैं, जानि दीन पर भीर-१-३३१। (ख) जब-जब भीर परी संतन कौंचक्र सुदरसन तहाँ सँभारयौ-१-१४। (ग) जहँ-जहँ भीर पर भक्तनि कौ तहाँ-तहाँ उठि धाऊँ-१-२४४।

भीर
डरा हुआ।
वि.
[सं. भीरु]

भीर
कायर।
वि.
[सं. भीरु]

भीरना, भीरनो
भयभीत होना, डरना।
क्रि. अ.
[हिं. भीरु]

भीरा
कायर, साहसहीन।
वि.
[सं. भीरु]

भीरा
संकट, विपत्ति।
संज्ञा
[हिं. भीड़]

भीरु
डरपोक, कायर।
वि.
[सं.]

भीरु
डरी हुई, भयभीत।
वि.
[सं.]
दुखित द्रौपदी जानि जगतपति, आए खगपति त्याग। पूरे चीर भीरु-तन-कृष्ना, ताके भरे जहाज-१-२२५।

भीरुता, भीरुताई
कायरता।
संज्ञा
[सं. भीरुता]

भीरुता, भीरुताई
भय, डर।
संज्ञा
[सं. भीरुता]

भीरू
कायर, साहसहीन
वि.
[सं. भीरू]

भीरे
समीप, पास।
क्रि. वि.
[हिं. भिड़ना]

भील
एक प्रसिद्ध जंगली जाति।
संज्ञा
[सं. भिल्ल]

भीलि
भील जाति की स्त्री, भीलनी।
संज्ञा
[हिं. भील]

भीलि
शबरी जिसे श्रीरामचंद्र जी ने तारा था।
संज्ञा
[हिं. भील]
अजामील अरु भीलि गनिका, चढ़े जात बिमान-१-२३५।

भीलिनि
भील जाति की स्त्री।
संज्ञा
[हिं. भीलनी]
अजामिल बिप्र कनौज-निवासी। सो भयौ बृषली कैं गृहबासी।….। ता भीलिनि कैं दस सुत भए। पहिले पुत्र भूलि तिहिं गए-६-४।

भीलु, भीलुक
कायर, भीरु।
वि.
[सं.]

भीवँ, भीन
भीमसेन।
संज्ञा
[सं. भीम]

बाज
बिना, बगैर।
क्रि. वि.

बाज
घोड़ा, तुरंग।
संज्ञा
[हिं. बाजी]

बाज
बाजा, वाद्य।
संज्ञा
[सं. वाद्य]

बाज
बाजे का शब्द।
संज्ञा
[सं. वाद्य]

बाज
बाजा बजाने की रीति।
संज्ञा
[सं. वाद्य]

बाज
सितार का पहला तार जो लोहे का होता है।
संज्ञा
[सं. वाद्य]

बाज
बजतें हैं।
क्रि. अ.
[हिं. बजना]
घर घर ते मिष्ठान्न चले लै भाँति-भाँति बहु बाजन बाज-९२०।

बाजई
बजता है।
क्रि. अ.
[हिं. बजना]
पाइनि नूपुर बाजई, कटि किंकिनि कूजै -१०-१३४।

बाजत
बजता है, बाजे से शब्द निकलता है।
क्रि. अ.
[हिं. बजना]
महामोह के नूपुर बाजत, निंदासब्द - रसाल-१-१५३।

बाजते
(बाजे) बजाकर। (बाजेगाजे) बजा बजाकर।
क्रि. अ.
[हिं. बजना]
बाजते नीसान - डंके की चोट पर। उ. - है हरि-भजन कौ परमान। नीच पावैं ऊँच पदवी, बाजते नीसान-१- २३५।

भीष
भिक्षा, भीख।
संज्ञा
[हिं. भीख]

भीषक
भयंकर।
वि.
[सं. भीषण]

भीषज
बैंद्य।
संज्ञा
[सं. भेषज]

भीषण, भोषन
भयानक, डरावना।
वि.
[सं. भीषण]

भीषण, भोषन
उग्र, दुष्ट, कठोर।
वि.
[सं. भीषण]

भीषणता, भोषनता
भयंकरता, डरावनापन।
संज्ञा
[सं. भीषणता]

भीषम
भीष्‍म पितामह।
संज्ञा
[सं. भीष्‍म]
भीर परैं भीषम-प्रन राख्यौ, अर्जुन कौ रथ हाँक्यौ-१-११३।

भीषम
राजा भीष्मक जो रुक्मिणी के पिता थे।
संज्ञा
[सं. भीष्‍म]
कुदनपुर को भोषम राई-१० उ०-७।

भीष्म
भयानक रस।
संज्ञा
[सं.]

भीष्म
राजा शांतनु के, गंगा के गर्भ से उत्पन्न पुत्र देवव्रत जो भीष्म पितामह के नाम से प्रसिद्ध हैं।
संज्ञा
[सं.]

भीष्मक
विदर्भ के एक राजा जो रुक्मिणी के पिता थे।
संज्ञा
[सं.]

भीष्मकसुता
रुक्मिणी जो श्रीकृष्ण की पटरानी थी।
संज्ञा
[सं.]

भुँइ, भुँई
पृथ्वी।
संज्ञा
[सं. भूमि]

भुइघरा, भुँइधरा, भुँइहरा
तहखाना।
संज्ञा
[सं. भूमि+गृह=घर]

भुंगल
युद्ध का एक बाजा।
संज्ञा
[देश.]

भुँजना, भुँजनो
भुनना।
क्रि. अ.
[हिं. भुनना]

भुंजै
तपाती हैं, जलाती हैं।
क्रि. अ.
[हिं. भूँजना, भूनना]
पवन पानि घनसारि सुमन दै दधि-सुत-किरन भानु भै भुंजैं-2७२१।

भुँजौना
भूनने की मजदूरी।
संज्ञा
[हिं. भूनना]

भुँजौना
भुना हुआ अन्न।
संज्ञा
[हिं. भूनना]

भुअ
पृथ्वी।
संज्ञा
[सं. भूमि]

भुक्खड़
जो सदा भुखा रहे।
संज्ञा
[हिं. भूख]

भुक्त
खाया हुआ।
वि.
[सं.]

भुक्त
भोगा हुआ।
वि.
[सं.]

भुक्ता
उपयोग करनेवाला, भोक्ता।
संज्ञा
[हिं. भोक्ता]
( क ) दाता-मुक्ता, हरता-करता, बिस्वंभर जग जानि। ताहि लगाइ माखन की चोरी, बाँध्यौ जसुमति रानि-४८७। (ख) मैं कर्ता मैं भुक्ता मोहिं बिनु और न कोई-१० उ०-४७।

भुक्ति
भोजन।
संज्ञा
[सं.]

भुक्ति
सुख-भोग।
संज्ञा
[सं.]

भुखमरा
भूख से मरनेवाला।
वि.
[हिं, भूख + मरना]

भुखमरी
भूख से मरने की स्थिति।
संज्ञा
[हिं. भूख+ मरना]

भुखाना, भुखानो
भूखा होना।
क्रि. अ.
[हिं. भूख]

भुखालू
भूखा।
वि.
[हिं. भूख]

भुगत
भोजन।
संज्ञा
[सं. भुक्ति]

भुगत
भोग।
संज्ञा
[सं. भुक्ति]

भुगतना, भुगतनो
भोगना।
क्रि. स.
[सं. भुक्ति]

भुगतना, भुगतनो
निपटना।
क्रि. अ.

भुगतना, भुगतनो
बीतना।
क्रि. अ.

भुगतान
भुगताने की क्रिया, भाव या मूल्य।
संज्ञा
[हिं. भुगतना]

भुगताना, भुगतानो
निपटाना।
क्रि. स.
[हिं. भुगतना]

भुगताना, भुगतानो
बिताना।
क्रि. स.
[हिं. भुगतना]

भुगताना, भुगतानो
चुकाना, अदा करना।
क्रि. स.
[हिं. भुगतना]

भुगति
सुख-भोग, भोजन का सुख या रस।
संज्ञा
[सं. भुक्ति]
भोग भुगति भूलेहु भखनहिं, भरी बिरह बैराग-३१२५।

भुअंग, भुअंगम
साँप।
संज्ञा
[सं. भुजंग]
(क) डसी री स्याम भुअंगम कारे-७४७। (ख) भूलि न उठत जसोदा जननी मनो भुअंगम डासी-३४३९।

भुअन
जगत, संसार।
संज्ञा
[सं. भुवन]

भुआर, भुआल
राजा।
संज्ञा
[सं. भूपाल]

भुइँ
भूमि, पृथ्वी।
संज्ञा
[सं. भूमि]
ऊखल चढ़ि, सींके कौ लीन्हौ, अनभावत भुइँ मैं ढरकायौ-१०-३३१।

भुइँघरा, भुइँधरा, भुइँ हरा
तहखाना।
संज्ञा
[सं. भूमिगृह]

भुइँचाल, भुइँडोल
भूचाल, भूडोल, भूकंप।
संज्ञा
[सं. भू+ चलना, डोलना]

भुईं
भूमि, पृथ्वी।
संज्ञा
[सं. भूमि]
मैया, कबहिं बढ़ैगो चोटी ? .....। तू जो कहति बल की बेनी ज्यों, ह्वैहै लाँबी-मोटी। काढ़त-गुहत न्हवावत जैहै नागिनि सी भुईं लोटी-१०-१७५।

भुक
भोजन।
संज्ञा
[सं. भुज]

भुक
अग्नि।
संज्ञा
[सं. भुज]

भुकराँद, भुकराँयध
सड़ने की दुर्गंध।
संज्ञा
[अनु. भुक]

भुजवा
भड़भूजा।
संज्ञा
[हिं. भूँजना]

भुजा
बाह, हाथ।
संज्ञा
[सं.]
भुजा उठाना (टेकना) - प्रण करना।

भुजाना, भुनानो
भुनाना।
क्रि. स.
[हिं. भुनाना]

भुजाली
छोटी बरछी।
संज्ञा
[हिं. भुज+ आली]

भुजिया
उबाले हुए धान के चावल।
संज्ञा
[हिं. भूँजना]

भुजिया
भूनी हुई (बिना रसे की) तरकारी।
संज्ञा
[हिं. भूँजना]

भुजेना
भुना हुआ चबेना।
संज्ञा
[हिं. भूजना]

भुट्टा
मक्का, ज्वार आदि की बाल।
संज्ञा
[सं. सृष्ट, प्रा. भुट्ठी]

भुतना, भुतवा
प्रेत, भूत।
संज्ञा
[हिं. भूत]

भुथरा
जिसमें धार न हो, कुंद।
वि.
[हिं. भोथरा]

भुज
हाथी की सूड़।
संज्ञा
[सं.]

भुज
दो की संख्या सूचक शब्द।
संज्ञा
[सं.]

भुजग
साँप।
संज्ञा
[सं.]

भुजदंड
बाहु रूपी दंड।
संज्ञा
[सं.]

भुजपात
भोजपत्र।
संज्ञा
[सं. भोजपत्र]

भुजपाश
दोनों हाथों का बंधन जिसमें बाँधकर गले था छाती से लगाया जाता है।
संज्ञा
[सं.]

भुजबंद, भुजबंध
बाजूबंद।
संज्ञा
[सं. भुजबंध]

भुजनाथ
भुजपाश।
संज्ञा
[सं. भुजपाश]

भुजमूल
कंधा।
संज्ञा
[सं.]

भुजमूल
बगल, काँख।
संज्ञा
[सं.]

भुगती
भोजन का भाव।
संज्ञा
[सं. भुक्ति]

भुगती
भोजन।
संज्ञा
[सं. भुक्ति]

भुगतै
(फल) भोगे, सहे, झेले।
क्रि. स.
[हिं. भुगतना]
हम तौ पाप कियो भुगतै को पुण्य प्रगटि कियौ निठुर हियो री-१४०६।

भुच्च, भुच्चड़
मूर्ख।
वि.
[हिं. भूत+चढ़ना]

भुजंग
साँप।
संज्ञा
[सं.]

भुजंगम
साँप।
संज्ञा
[सं. भुजंगम.]

भुजंगा
साँप।
संज्ञा
[सं. भुजंग]

भुजंगिनि, भुजंगिनी, भुजंगी
साँपिन, नागिन।
संज्ञा
[सं. भुजंगिनी]
माया बिषम भुजंगिनि कौ बिष, उतरचौ नाहिंन तोहि-2.३२।

भुजंगेंद्र, भुजंगेश
शेषनाग।
संज्ञा
[सं.]

भुज
बाहु, बाँह।
संज्ञा
[सं.]
(क) उरगइंद्र उनमान सुभग भुज-१-६९। (ख) स्याम, भुज गहि काढ़ि लीजै, सूर ब्रज कैं कूल-१-९९।
भुज भरि गले लगाकर। उ. - (क) भुज भरि धरि अँकवारि बाँह गहि कै झकझोरयौ-१०२६। (ख) भुज भरि मिलनि उडत उदास ह्वै गत स्वारथ समए-2९९२।

भुथराई
कुंद होने का भाव।
संज्ञा
[हिं भोथरा]

भुनगा
उड़नेवाला छोटा कीड़ा।
संज्ञा
[अनु.]

भुनना, भुननो
बिना जल के आग पर पकना।
क्रि. अ.
[हिं. भूनना]

भुनना, भुननो
गरम बालू में पकना।
क्रि. अ.
[हिं. भूनना]

भुनना, भुननो
घी-तेल में पकना।
क्रि. अ.
[हिं. भूनना]

भुनना, भुननो
तेज धूप या तपी जमीन पर जलना।
क्रि. अ.
[हिं. भूनना]

भुनना, भुननो
कष्ट होना।
क्रि. अ.
[हिं. भूनना]

भुनना, भुननो
बड़े सिक्के के छोटे सिक्के मिलना।
क्रि. अ.
[सं. भंजन]

भुनभुनाना, भुनभुनानो
भुनभुन' करना।
क्रि. अ.
[अनु,]

भुनभुनाना, भुनभुनानो
अस्पष्ट स्वर में बड़बड़ाना।
क्रि. अ.
[अनु,]

भुनाना, भुनानो
भूनने को प्रेरित करना।
क्रि. स.
[हिं. भूनना]

भुनाना, भुनानो
बड़े सिक्के को छोटे से बदलना।
क्रि. स.
[सं. भंजन]

भुवि
पृथ्वी, भूमि।
संज्ञा
[सं. भू]

भुरई
फुसला ली।
क्रि. स.
[हिं. भुरवना]
सूरदास प्रभु रसिक सिरोमनि भरई राधिका भोरी।

भुरकना, भुरकनो
सूखकर भुरभुरा होना।
क्रि. अ.
[हिं. भरक]

भुरकना, भुरकनो
भूल जाना।
क्रि. अ.
[हिं. भरक]

भुरकना, भुरकनो
चूर्ण को
क्रि. अ.
[हिं. भरक]

भुरका
बुकनी, चूर्ण, अबीर।
संज्ञा
[सं. धूरि]

भुरकाना भुरकानी
सुखाकर भुरभुरा करना।
क्रि. स.
[हिं भुरवना]

भुरकाना भुरकानी
छिड़कना।
क्रि. स.
[हिं भुरवना]

बहरत
बहलता है।
क्रि. अ.
[हिं. बहरना]
छिनछिन बिरस करति है सुंदरि क्यों बहरत मन मोर-2२१४।

बहरना
दुख की बात भूलकर चित दूसरी और लगना।
क्रि. अ.
[हिं, बहलना]

बहरना
चित प्रसन्न होना।
क्रि. अ.
[हिं, बहलना]

बहरा
न सुननेवाला।
वि.
[सं. बधिर, प्रा. बहिर]

बहराइ
बहलाकर, भुलावे में डालकर।
क्रि. स.
[हिं. बहलाना]
सबै सखा बैठे रहौ, मैं देखौं घौं जाइ। बच्छ-हरन जिय जानि प्रभू, आपु गए बहराइ-४९२।

बहराइ
चित्त प्रसन्न करके।
क्रि. स.
[हिं. बहलाना]

बहराइ
आवै, मन बहराइ - मन बहला आवे, (घूम-घाम कर) चित्त प्रसन्न कर ले।
प्र.
मैं पठवत अपने लरिका को आवै मन बहराइ ५१०।

बहराई
बहलायी हुई, जिसे भुलावे में डाला गया हो।
वि.
[हि. बहलाना]
जनु सुरभी बन बसतिं बच्छ बिनु, परबस पसुपति की बहराई-१०-१६९।

बहराई
बहकाया, फुसला दिया।
क्रि. स.
[हि. बहलाना]
उरहन देन ग्वालि जे आईं। तिन्हैं जसोदा दियौ बहराई।

बहराना
ऊबी हुई बात से चित्त हटाकर दूसरी ओर लगाना।
क्रि. स.
[हि. बहलाना]

बाजीगरी
जादू का खेल।
संज्ञा
[हिं. बाजीगर]

बाजु
बिना, बगैर।
अव्य.
[सं. वर्जन]
सूरदास मन रहत कौन बिधि बदन बिलोकनि बाजु-३२३५।

बाजु
सिवा, अतिरिक्त।
अव्य.
[सं. वर्जन]

बाजू
भुजा, बाँह।
संज्ञा
[फ़ा. बाजू]

बाजू
‘बाजूबंद' नामक गहना।
संज्ञा
[फ़ा. बाजू]

बाजू
सेना का कोई पार्श्व
संज्ञा
[फ़ा. बाजू]

बाजू
सहायक।
संज्ञा
[फ़ा. बाजू]

बाजू
पक्षी का पंख।
संज्ञा
[फ़ा. बाजू]

बाजूबंद
बाँह का एक गहना।
संज्ञा
[हिं. बाजू+ फा. बंद]
बाहु टाड़ कर कंकन बाजूबँद एते पर तौकी -११२०।

बाजूबीर
बाजूबंद।
संज्ञा
[हिं. बाजू + बीर]

भुरकाना भुरकानी
भुलवाना, बहकाना।
क्रि. स.
[हिं भुरवना]

भुरकि
(किसी चूर्ण-पदार्थ को) छिड़ककर, भुरभुराकर।
क्रि. अ.
[हिं. भुरकना]
अरुन अधर-छबि दमन बिराजत, जब गावत कल मंदन। मुक्ता मनौ नीलमनिमय-पुट, धरे भुरकि बर बंदन-४७६।

भुरकुस
चूर्ण, चूरा।
संज्ञा
[हिं. भुरकना]
भुरकुस निकलना - ( १ ) इतनी मार पड़ना कि हड्डी पसली चूर-चूर हो जाय। (२) नष्ट होना। भुरकुस निकालना - मारते-मारते हड्डी पसली चूर-चूर कर देना। (२) नष्ट करना।

भुरजी
भड़भूजा।
संज्ञा
[हिं. भूजना]

भुरजी
जो 'भूरजी' जैसा काला हो।
वि.

भुरता
दबने-कुचलने से बिगड़ी दशा वाला।
संज्ञा
[हिं. भुरकना]
भरता करना ( कर देना) - दबाकर या मार-पीटकर चूर-चूर कर देना।

भुरता
तरकारी जो बैंगन आदि को आग में भूनकर बनती है।
संज्ञा
[हिं. भुरकना]

भुरभुर, भुरभुरा
हल्के आघात से ही चूर-चूर हो जानेवाला।
वि.
[अनु.]

भुरभुराना, भुरभुरानो
भुरभुरा करना।
क्रि. स.
[अनु.]

भुरभुराना, भुरभुरानो
छिड़काना, बुरकना।
क्रि. स.
[अनु.]

भुरये
भुलावे में डाला।
क्रि. स.
[हिं. भुराना]
तुम भुरये हौ नंद कहते हैं तुमसौं ठोटा। दधि-ओदन के काज देह धरि आए छोटा।

भुरयौ
भ्रम में पड़ा हुआ, भूला हुआ।
वि
[हिं. भरमना]
जनम साहिबी करत गयौ।…| कुबुधिकमान चढ़ाइ कोप करि, बुधि-तरकस रितयौ। सदा सिकार करत मृग-मन कौ, रहत मगन भुरयौ-१६४।

भुरवतिं
फुसलाती हैं, भुलावा देती हैं।
क्रि. स.
[हिं. भरवना]
ओढ़नि आनि दिखाई मोकौं, तरुनिनि की सिखई बुधि ठानी। घर लै लै मेरौ सुत भुरवहिं, ये ऐसी सब दिन की जानी-६९५।

भुरवना, भुरवनो
फुसलाना, बहलाना।
क्रि. स.
[हिं. भरमना]

भुरहरा
सबेरे, प्रातःकाल।
संज्ञा
[हिं. भोरहरा]

भुरहरे
बहुत सबेरे।
क्रि. वि.
[हिं. भोरहरा]

भुराई
सीधापन, सिधाई।
संज्ञा
[हिं. भोला]

भुराना, भुरानो
भूल जाना।
क्रि. स.
[हिं. भुलाना]

भुराना, भुरानो
बहलाना, फुसलाना।
क्रि. स.
[हिं. भुरवना]

भुराये
बहलाया, फुसलाया, भ्रम में डाला।
क्रि. स.
[हिं. भुराना]
अति हीं चतुर कहावत राधा बातन ही हरि क्यों न भुराये-१४५३।

भुरी
भोली, सीधी।
वि.
[हिं. भोली]

भुरी
बहलाया, फुसला लिया।
क्रि. स.
[हिं. भुराना]

भरै
बहला-फुसलाकर।
क्रि. स.
[हिं. भुरवना]

भरै
भुरै लई-बहला-फुसला लिया।
प्र.
कुंतल कुटिल भँवर भामिनि वर मालति भुरै लई।-तजत न गहरु कियो तिन कपटी जानि निरास भई-३३०८।

भुरैहौं
भूलूँगा, बहलाने-फुसलाने में आऊँगा।
क्रि. स.
[हिं. भूलना]
मैं अपनी सब गाय चरैहौं। प्रात होत बल के सँग जैहौं तेरे कहे न भुरैहौं।

भुलक्कड़
भूल जानेवाला।
वि.
[हिं. भूलना]

भुलना, भुलनो
भूल जानेवाला।
वि.
[हिं. भूलना]

भुलभुला
गरम राख।
संज्ञा
[अनु.]

भुलवाना, भुलवानो
भ्रम या भुलावे में डालना।
क्रि. स.
[हिं. भूलना]

भुलवाना, भुलवानो
बिसराना।
क्रि. स.
[हिं. भूलना]

भुलसना, भुलसनो
गरम राख में झुलसना।
क्रि. अ.
[हिं. भुलभुला]

भुलाइ
भुला कर।
क्रि. स.
[हिं. भुलाना]

भुलाइ
दई भुलाइ-भुला दिया।
प्र.
लेहु-लेहु गोपाल कोऊ दहयौ दई भुलाइ-१२११।

भुलाइ
देति भुलाइ-भ्रम में डालती है, धोखा देती है।
प्र.
उ.-सूर प्रभु की सबल माया देति मोहिं भुला-१-४५।

भुलाई
भुला दी, विस्मरण की।
क्रि. स.
[हिं. भूलना]

भुलाई
रहे भुलाई-भूले रहे, (सब कुछ) भुला बैठे।
प्र.
जेंवत छाक गाइ बिसराई। सखा श्रीदामा कहत सबनि सौं, छाकहि मैं तुम रहे भुलाई-४७१।

भुलाऊ
भुला दी, विस्मरण कर दी।
क्रि. स.
[हिं. भूलना]
सप्त रसातल सेषासन रहे तब की सुरति भुलाऊ-१०-२२१।

भुलाए
भूल गये, विस्मृत हो गये।
क्रि. अ.
[हिं. भूलना]
सुरसरी-सुवन रनभूमि आए। बान-बरषा लगे करन अति क्रुद्ध ह्वै, पार्थ-अवसान तब सबु लाए-१-२७१।

भुलाना
भ्रम या धोखे में डालना।
क्रि. स.
[हिं. भूलना]

भुलाना
भूलना, विस्मृत करना।
क्रि. स.
[हिं. भूलना]

भुलाना
भ्रम या धोखे में पड़ना।
क्रि. अ.

भुलाना
भटकना, राह भूलना।
क्रि. अ.

भुलाना
बिसरना, भूल जाना।
क्रि. अ.

भुलानीं
भूल गयीं।
क्रि. अ.
[हिं. भूलना]

भुलानी
भूल गयी, विस्मरण हो गयी, बिसर गयी।
क्रि. अ.
[हिं. भूलना]
(क) चिंता कीन्हैं भूख भुलानी नींद फिरति उचटी-१-९८। (ख) सुरपति-पूजा तुमहि भुलानी-१००१।

भुलाने
भटक गये हो, राह भूल गये हो।
क्रि. अ.
[हिं. भुलाना]
स्याम तुमहिं ह्याँ कौ नहिं पठए तुम हौ बीच भुलाने-३००६।

भुलानो, भुलानौ
भ्रम में पड़ा।
क्रि. अ.
[हिं. भूलना]
सुत-बित बनिता प्रीति लगाई, झूठे भरम भुलानौ-१-३२९।

भुलानो, भुलानौ
भूल गया।
क्रि. अ.
[हिं. भूलना]

भुलानो, भुलानौ
सुधि न रही, होश में न रहा, घबरा गया।
क्रि. अ.
[हिं. भूलना]
कमल सकटनि भरे ब्याल मानौ। स्याम के बचन सुनि, मनहिं मन रह्यौ गुनि, काठ ज्यौं गयौ घुनि, तनु भुलानौ-५९०।

भुलान्यो, भुलान्यौ
भूल गया, विस्मृत कर दिया।
क्रि. स.
[हिं. भूलना]
पुर-नर-मुनि मोहित सब कीन्हे सिवहिं समाधि भुलान्यो-१८५७

भुलान्यो, भुलान्यौ
(मार्ग) भुला दिया, (राह) भूल गया।
क्रि. स.
[हिं. भूलना]
कब धौं गयो संग हरि के वह कीधौं पंथ भुलान्यौ-१४७१।

भुलायौ
भ्रम में पड़ गया।
क्रि. अ.
[हिं. भूलना]
अपनपौ आपुन ही मैं पायौ.....। ज्यौं कुरंग-नाभी कस्तूरी, ढूँढ़त फिरत भलायौ-४-१३।

भुलावत
भूल जाता है, विस्मृत हो जाता है।
क्रि. स.
[हिं. भूलना]
बृन्दाबन मोकौं अति भावत।......। कामधेनु, सुरतरु सुख जितने, रमा सहित बैकुंठ भुलावत-४४९।

भुलावा
छल, धोखा।
संज्ञा
[हिं. भूलना]

भुलाव
भ्रम में पड़ जाता है।
क्रि. अ.
[हिं. भूलना]
(क) जीव कर्म करि बहु तन पावै। अज्ञानी तिहिं देखि भुलावै-५-४। (ख) सूरदास प्रभु देखि देवि सुर-नर-मुनि-बुद्धि भुलावै-१०-१२६।

भुलाहि
भटक जाय, राह भूल जाय।
क्रि. अ.
[हिं. भूलना]
सूर स्याम को जसुमति टेरति बहुत भीर है हरि न भुलाहि-९१९।

भुलाहीं
भ्रम में पड़ जाती हैं।
क्रि. अ.
[हिं. भूलना]
जब हरि मुरली अधर धरत।....खग मोहैं मृग-जूथ भुलाहीं, निरखि मदन-छबि धरत-६२०।

भुलाहु
भटक जाओ, राह भूल जाओ।
क्रि. अ.
[हिं. भूलना]
सघन बृन्दाबन अगम अति, जाइ कहुँ-न भुलाहु-६१०।

भुवंग
साँप।
संज्ञा
[सं. भुजंग, प्रा. भुअंग]
खाइ न सकै खरचि नहिं जानै ज्यौं भुवंग सिर रहत मनी-१-३९।

भुवंगम
साँप।
संज्ञा
[सं. भुजंगम्]
(क) गइ मुरछाइ, परी धरनी पर, मनौ भुवंगम खाई-१०-५२। (ख) ज्यों केंचुरी भुवंगम त्यागत मात-पिता यों त्यागे-पृ० ३३९ (८९)। (ग) माई री मोहिं डस्यौ भुवंगम कारो।

भुवंगिनि, भुवंगिनी
साँपिनी।
संज्ञा
[हिं. भुजंगिनी]
लेन मीन भुवंगिनी भुअ नासिका थल बीच-१३५१।

भुवः
भूमि और सूर्य के बीच का लोक, अंतरिक्ष लोक।
संज्ञा
[सं.]

भुव
आग, अग्नि।
संज्ञा
[सं.]

भुव
भूमि, पृथ्वी।
संज्ञा
[सं. भू, भूमि]
कंपै भुव वर्षा नहिं होहि-१-२८६।

भुव
भौंह, भ्रू।
संज्ञा
[सं. भ्रू]

भुवन
जगत।
संज्ञा
[सं.]
तुम हर्ता तुम कर्ता एकै, तुम हौ अखिल भुवन के साँई-2५५८।

भुवन
लोक।
संज्ञा
[सं.]
भुवन चौदह खुरनि खूँदति सुधौं कहा समाइ-१-५६।

भुवन
चौदह की संख्या का द्योतक शब्द।
संज्ञा
[सं.]

भुवनकोश
भूमंडल।
संज्ञा
[सं.]

भुवनकोश
ब्रह्मांड।
संज्ञा
[सं.]

भुवनायक
संसार के स्वामी।
संज्ञा
[सं.]
येई हैं श्रीपति भुवनायक येई हैं कर्ता संसार-४९७।

भुवनिया
भुवन, लोक।
संज्ञा
[सं. भुवन]
जो रस नंद-जसोदा बिलसत, सो नहिं तिहूँ भुवनिया-१०-२३८।

भुवपाल
राजा।
संज्ञा
[सं. भूपाल]

भुवा
रुई।
संज्ञा
[हिं. घूआ]

भुवार, भुवाल, भुवाला
राजा।
संज्ञा
[सं. भूपाल, प्रा.भुआल, हिं. भुआल]
(क) रावन पै लै गए सकल मिलि, ज्यौं लुब्धक पसु जाल। करूवौ बचन स्रवन सुनि मेरौ, अति रिस गही भुवाल-९१०४। (ख) कालिंदी कैं कूल बसत इक मधुपुरि नगर रसाला। कालनेमि अरु उग्रसेन-कुल उपज्यौ कंस भुवाला-१०-४।

भुवि
भूमि, पृथ्वी।
संज्ञा
[सं. भूमि]
रविबंसी भयौ रैवत राजा। ता सम जग दुतिया न बिराजा। ता गृह जन्म रैवती लयौ। ताकौं लैसो ब्रह्मपुर गयौ।......। ब्याह-जोग अब सोई आहि। रैवत ब्याह कियो भुवि आइ। आप कियौ तप बन मैं जाइ~-९-४।

भुशुंडी
काकभुशुंडि।
संज्ञा
[सं.]

भुशुंडी
एक प्राचीन अस्त्र-
संज्ञा
[सं.]

भुस
भूसा।
संज्ञा
[सं. बुस]
टूटे कंधऽरु फूटी नाकनि, कौ लौं धौं भुस खैहौ-१-३३१।
भुस पर की (मी) भीत - शीघ्र नष्ट हो जानेवाली वस्तु, अस्थायी और अविश्वसनीय बात। उ. - (क) तुम्हरी बोलनि कौन पतीजै ज्यौं भुस पर की भीति-३१६३। (ख) बिनु गोविंद सक्‌‌ल सुख सुन्दरि भुम पर की सी भीत-१० उ०-७५। कह्यौ पवन को भुस भयौ - बात तत्काल उड़ गयी, किसी ने बात पर ध्यान ही नहीं दिया। उ. - मेरौ कह्‌यौ पवन को भुस भयौ गावत नंदकुमार-३४८४। भुस फटकै - व्यर्थ के कार्य में श्रम नष्ट करे, निरर्थक कार्य में शक्ति लगाये। उ. - सूर स्याम तजि को भुस फटके मधुप तुम्हारे हेति-३२५६।

भुसी
भूसी।
संज्ञा
[हिं. भूमा]

भुसुंडी
काकभुशुंडि।
संज्ञा
[सं. भुशुडि]

भूँकना, भूँकनो
भों-भों' करना।
क्रि अ.
[अनु.]

भूँकना, भूँकनो
कुत्ते का बोलना।
क्रि अ.
[अनु.]

भूँकना, भूँकनो
व्यर्थ बकना।
क्रि अ.
[अनु.]

भूँख
भूख।
संज्ञा
[हिं. भूख]
भोजन किये बिनु भूव क्यौं भाजै बिन खाए तब स्वाध-2७७८।

भूँखा
भूखा।
वि.
[हिं. भूखा]

भूँ जना, भूँजनो
आग या ताप से पकाना।
क्रि. स.
[हिं. भूनना]

भूँ जना, भूँजनो
गरम बालू से पकाना।
क्रि. स.
[हिं. भूनना]

भूँ जना, भूँजनो
तलना।
क्रि. स.
[हिं. भूनना]

भूँ जना, भूँजनो
दुख देना।
क्रि. स.
[हिं. भूनना]

भूँ जना, भूँजनो
भोग करना।
क्रि.स.
[सं. भोगना]

भूँजब
भोगेंगे, भोग करेंगे।
क्रि.स.
[हिं. भूँजना]
ऊँचे चढ़ि दसरथ लोचन भरि सुत-मुख देखे लेत। रामचन्द्र से पुत्र बिना मैं भूँजब क्यौं यह खेत-९-३९।

भूँजा
भुना हुआ अन्न।
संज्ञा
[हिं. भूनना]

भूँसना, भूँसनो
भों भों करना, भँकना।
क्रि. अ.
[हिं. भूकना]

भू
पृथ्थी।
संज्ञा
[सं]
(क) संकर कौ मन हर्यो कामिनी, सेज छाँड़ि भू सोयौ-१-४३। (ख) भू-भर-हरन प्रगट तुम भूतल गावत संत-समाज-१-२१५।

भू
स्थान।
संज्ञा
[सं]

भू
भौंह।
संज्ञा
[सं. भ्रू]
कीर नासा इंद्र धनु भू भँवर सी अलकावली।

भूकंप
भूचाल, भूडोल।
संज्ञा
[सं.]

भूक
भूख।
संज्ञा
[हिं. भूख]

भूकना, भूकनो
भों-भों करना, भूँकना।
क्रि. अ.
[हिं. भूँकना]

बाजैं
बजते हैं।
क्रि. अ.
[हिं. बजना]
जाकौं दीनानाथ निवाजैं। भवसागर मैं कबहुँ न झूकै, अभय निसाने बाजैं - १- ३६।

बाझन
फँसने का भाव, फँसावट।
संज्ञा
[हिं. बझना]

बाझन
उलझन।
संज्ञा
[हिं. बझना]

बाझन
झंझट।
संज्ञा
[हिं. बझना]

बाझन
लड़ाई।
संज्ञा
[हिं. बझना]

बाझना
बंधन में पड़ना।
कि. अ.
[हिं. बझना]

बाझना
फँसना-उलझना।
क्रि. अ.
[हिं. बझना]

बाझना
हठ करना।
क्रि. अ.
[हिं. बझना]

बाझि
फँसकर, बंधन में पड़कर।
क्रि. अ.
[हिं. बाझना]
नक बेसरि बंसी के संभ्रम भौंह मीन अकुलात। मनु ताटंक कमठ घूँघट उर जाल बाँझि अकुलात।

बाट
मार्ग, रास्ता।
संज्ञा
[सं. वाट= मार्ग]
सीस धरि श्रीकृष्न लीने चले गोकुल बाट -१०- ५।
बाट करना - मार्ग या रास्ता बनाना। बाट करि - मार्ग बनाकर, रास्ता खोलकर। जीत्यौ जरासंध बाँधि छोरी। जुगल कपाट बिदारि बाटि करि लतनि जही संधि जोरी-१० उ. ५२ बाट जोहना (देखना, निहारना) - प्रतीक्षा करना। बाट पड़ना - (१) मार्ग में तंग करना या पीछे पड़ना। (२) डाका पड़ना, हरण होना। बाट पारना - डाका डालना, हरण करना। बाट लगाना - (१) मार्ग दिखाना। (२) ढंग बताना। (३) मूर्ख बनाना।

भूण
जल-यात्रा
संज्ञा
[सं. भ्रमण]

भूण
जलविहार।
संज्ञा
[सं. भ्रमण]

भूत
सृष्टि-रचना के मूत उपकरण जो पाँच माने गये हैं.-पृथ्वी, वायु, जल, अग्नि और आकाश।
संज्ञा
[सं.]

भूत
जड़ या चेतन प्राणी, जीव।
संज्ञा
[सं.]

भूत
भूत-दया-प्राणीमात्र के प्रति दया।
यौ.

भूत
बीता हुआ समय।
संज्ञा
[सं.]

भूत
क्रिया का वह रूप जो व्यापार की समाप्ति का सूचक हो।
संज्ञा
[सं.]

भूत
मृत शरीर।
संज्ञा
[सं.]

भूत
मृत प्राणी की आत्मा।
संज्ञा
[सं.]

भूत
प्रेत।
संज्ञा
[सं.]

भूकि
कुत्ते का भों-भों शब्द करना।
क्रि. अ.
[हिं. भूँकना]
अपुनपौ आपुत ही बिसरयौ। जैसे स्वान काँच-मदिर मैं, भ्रभि-भ्रमि भूकिं मरयौ-2-२६।

भूख
खाने की इच्छा, क्षुधा।
संज्ञा
[सं. बुपुक्षा]
(क) चिंता कोन्ह भूख भुलानी-१-९८। (ख) अति प्रचंड पौरुष बल पाऐं केहरि भूख मरै-१-१०५।
भूख मरना - खाने की इच्छा न रह जाना। भूख लगना - खाने की इच्‍छा होना। भूख से (भूखों) मरना - योजन न मिलने ले कष्ट उठाना या मरना।

भूख
आवश्यकता।
संज्ञा
[सं. बुपुक्षा]

भूख
समाई।
संज्ञा
[सं. बुपुक्षा]

भूख
कामना।
संज्ञा
[सं. बुपुक्षा]

भूखण, भूखन
अलंकार, आभूषण।
संज्ञा
[सं. भूषण]

भूखना, भूखनो
सजाना, अलंकृत करना।
क्रि. स.
[सं. भूषण]

भूखर
भूख।
संज्ञा
[हिं. भूख]

भूखर
इच्छा।
संज्ञा
[हिं. भूख]

भूखा
जिसे भूख लगी हो।
वि.
[हिं. भूख]
मचला अकलैमूल, पातर, खाउँ खाउँ करै भूखा-१-१८६।
भूखा रहना - उपवास करना। भूखाप्यासा - बिना खाये - पिये।

भूखा
इच्छुक, चाहनेवाला।
वि.
[हिं. भूख]

भूखा
दरिद्र।
वि.
[हिं. भूख]

भूखे
जिसे भूख लगी हो।
वि.
[हिं. भूखा]
भूखे छिन न रहत मन मोहन-१०-२३१।

भूगर्भ
पृथ्वी का भीतरी भाग।
संज्ञा
[सं.]

भूगोल
वह शास्त्र जिससे पृथ्वी की प्राकृतिक बातों का ज्ञान होता है।
संज्ञा
[सं.]

भूचर
पृथ्वी पर रहने वाले प्राणी।
संज्ञा
[सं.]

भूचरी
समाधि की एक मुद्रा।
संज्ञा
[सं.]

भूचाल
भूकंप, भूडोल।
संज्ञा
[सं. भू+हिं. चलना]

भूड़
बलुई भूमि
संज्ञा
[देश.]

भूडोल
भूकंप, भूचाल।
संज्ञा
[सं. भू + हिं. डोलना]

भूति
वृद्धि।
संज्ञा
[सं.]

भूति
लक्ष्मी।
संज्ञा
[सं.]

भूतिनी
भूत की स्त्री।
संज्ञा
[हिं. भूत]

भूतिनी
पिशाचिनी।
संज्ञा
[हिं. भूत]

भूदेव, भूदेवता
ब्राह्मण।
संज्ञा
[सं.]

भूधर
पहाड़।
संज्ञा
[सं.]

भूधर
शेषनाग।
संज्ञा
[सं.]

भून
गर्भ का बालक।
संज्ञा
[सं.भ्रूण]

भूनना, भूननो
आग में डालकर पकाना।
क्रि. स.
[सं. भर्जन]

भूनना, भूननो
गरम बालू से पकाना।
क्रि. स.
[सं. भर्जन]

भूत
वे पिशाच या दैत्य जो रुद्र के अनुचर तथा अत्यन्त कुरूप और क्रूर माने जाते हैं।
संज्ञा
[सं.]
संकर प्रगट भए भृकुटी तें, करी सृष्टि निर्मान। भूत-प्रेत बैताल रचे बहु दौरे बिधि कौ खान-सारा. ६५।
(किसी बात का) भूत उतरना - (इस बात के लिए) जरा भी उत्साह न रह जाना। (किसी बात का) भूत चढ़ना (सवार होना)(किसी बात के लिए ) जी - जान से जुट जाना। भूत चढ़ना ( सवार होना) - बहुत क्रोध होना। भूत उतरना - (१) क्रोध शांत होना। (२) उत्साह शेष न रहना। भूत बनना - (१) बहुत कुद्ध होना। (२) बहुत आवेश में होना भूत बनकर लगना (पीछे पडना ) - किसी तरह पीछा न छोड़ना। भूत का पकवान ( की मिठाई ) - (१) ऐसी चीज जिसका अस्तित्व न हो पर जो भ्रम से सच्ची प्रतीत हो। (२) सहज ही मिला हुआ धन या ऐश्वर्य जो अनायास नष्ट भी हो जाय।

भूत
बीता हुआ, गत।
वि.

भूत
मिला हुआ, युक्त
वि.

भूत
समान।
वि.

भूत
जो हो चुका हो।
वि.

भ-तनया
सीता, जानकी।
संज्ञा
[सं.]

भूतना
भूत, प्रेत।
संज्ञा
[सं. भूत]

भूतनाथ
रुद्र, शिव।
संज्ञा
[सं.]

भूतनायिका
दुर्गा।
संज्ञा
[सं.]

भूतपूर्व
वर्तमान से पूर्व का।
वि.
[सं.]

भूतभावन
शिव।
संज्ञा
[सं.]

भूतभावन
विष्णु।
संज्ञा
[सं.]

भूतराज
रुद्र, शिव।
संज्ञा
[सं.]

भूतल
धरातल।
संज्ञा
[सं.]

भूतल
संसार, जगत।
संज्ञा
[सं.]
भक्त-बत्सल कृपानाथ असरन-सरन, भार-भूतल हरन, जस सुहायौ-१-११९।

भूतलराइ, भूतलराई, भूतलराउ, भूतलराऊ
पृथ्वोपति, भूपाल।
संज्ञा
[सं. भूतल+राजा]
मतौ यह पूछत भूतलराइ-१-२६९।

भूतविद्या
वह विद्या जिससे प्रेत,पिशाच, कुग्रह आदि जनित मानसिक रोगों का निदान हो।
संज्ञा
[सं.]

भूति
धन-संपति।
संज्ञा
[सं.]

भूति
भस्म,राख।
संज्ञा
[सं.]

भूति
उत्पत्ति।
संज्ञा
[सं.]

भूमिका
पृथ्वी, भूमि।
संज्ञा
[सं. भूमि]

भूमिज
भूमि या पृथ्वी से उत्पन्न।
वि.
[सं.]

भूमिजीवी
खेतिहर, कृषक।
संज्ञा
[सं. भूमिजीविन्]

भूयसी
बहुत अधिक।
वि.
[सं.]

भूयसी
बार-बार।
क्रि. वि
[सं.]

भूर
बहुत, अधिक।
वि.
[सं. भूरि]

संज्ञा
बालू, रेत।
पुं.
[हिं. भुरभुरा]

भूरज
धूल, मिट्टी।
संज्ञा
[सं. भू+रज]

भूरज
भोजपत्र का पेड़।
संज्ञा
[सं. भूर्ज]

भूरजपत्र
भोजपत्र।
संज्ञा
[सं. भूर्जपत्र]

भूभृत्
राजा।
संज्ञा
[सं.]
करुनामय जब चाप लियौ कर, बांधि सुदृढ़ कटि-चीर। भूभृत सीस नमित जो गर्बगत, पावक सींच्यौ नीर-९-२६।

भूभृत्
पहाड़, पर्वत।
संज्ञा
[सं.]

भूमंडल
पृथ्वी।
संज्ञा
[सं.]

भूमि
पृथ्वी।
संज्ञा
[सं.]
भूमि होना - पुथ्वी पर गिरना।

भूमि
भूमि-भँडार-धन-धाम।
यौ
तिन हारयौ सब भूमि-भँडार-१-२४६।

भूमि
स्थान।
संज्ञा
[सं.]

भूमि
जड़, आधार।
संज्ञा
[सं.]

भूमि
प्रदेश।
संज्ञा
[सं.]

भूमिका
रचना।
संज्ञा
[सं.]

भूमिका
प्रस्तावना।
संज्ञा
[सं.]

भूनना, भूननो
घी-तेल तलना।
क्रि. स.
[सं. भर्जन]

भूनना, भूननो
कष्ट देना।
क्रि. स.
[सं. भर्जन]

भूप
राजा, भूपति।
संज्ञा
[सं.]

भूप
स्वामी।
संज्ञा
[सं.]
सेमर फूल सुरँग अति निरखत मुदित होत खगभूप-१-१०२।

भूपति
राजा, भूपाल।
संज्ञा
[सं.]

भूपाल
राजा।
संज्ञा
[सं.]
कहन लगे सब सूरप्रभु सौं होहु इहाँ भूपाल-2५७१।

भूपाली
एक रागिनी।
संज्ञा
[सं.]

भूपुत्र
मंगल ग्रह।
संज्ञा
[सं.]

भूपुत्री
जानकी, सीता।
संज्ञा
[सं.]

भूभुल, भूभुरि
गर्म राख या रेत।
संज्ञा
[सं, भू+भुर्ज]

भूरा
मटमैले या धूमिल रंग का।
वि.
[सं. वभ्रु]

भूरि
अधिक, बहुत।
वि.
[सं.]

भूरि
बड़ा।
वि.
[सं.]

भूरिदा
बहुत बड़ा दानी।
वि.
[सं.]

भूरिश्रव, भूरिश्रवा
वाल्हीक का चंद्रवंशी राजा जो सोमदत्त का पुत्र था। महाभारत के युद्ध में यह दुर्योधन की ओर से लड़ा और अर्जुन द्वारा मारा गया था।
संज्ञा
[सं. भूरिश्रवस्, हिं. भूरिश्रवा]
इत भगदत्त द्रोन भूरिश्रव तुम सेनापति धोर-१-२६९।

भूरी
भूरे रंग की गाय।
संज्ञा
[हिं. भूरा]
पियरी, भौरी, गोरी, गैनी, खैरी, कजरी जेती। दुलही, फुलही, भौंरी, भूरी, हाँकि ठिकाई तेती-४५५।

भूरी
भूरे रंग की।
वि.

भूरुह
वृक्ष, पेड़।
संज्ञा
[सं.]

भूर्ज
भोजपत्र का वृक्ष।
संज्ञा
[सं.]

भूर्जपत्र
भोजपत्र।
संज्ञा
[सं.]

बाजि
बाण।

बाजि
पक्षी।

बाजि
चलने वाला।
वि.
[सं. वाजिन्]

बाजिह
प्रहार होगा, आघात पड़ेगा, चोट लगेगी।
क्रि. अ.
[हिं. बजना]
लादत, जोतत लकुट बाजिहै, तब कहैं मूड़ दुरैहौ -१-३३१।

बाजी
शर्त, दाँव।
संज्ञा
[फ़ा. बाजी]
बाजी मारना - दाँव जीतना। बाजी ले जाना - किसी बात में आगे बढ़ जाना।

बाजी
खेल।
[फ़ा. बाजी]
सूर एक पौ नाम बिना नर फिरि-फिरि बाजी हारी-१-६०।

बाजी
खेल का दाँव।
[फ़ा. बाजी]

बाजी
घोड़ा।
संज्ञा
[सं. वाजिन्]

बाजी
बाजा बजानेवाला।
संज्ञा
[हिं. बाजा]

बाजीगर
जादूगर, ऐंट्रजालिक।
संज्ञा
[फ़ा. बाजीगर]
कै कहुँ रंक, कहूँ ईस्वरता, नट-बाजीगर जैसे -१-२९३।

भूलना, भूलनो
धोखे में आ जाना।
क्रि. अ.

भूलना, भूलनो
आसक्त हो जाना।
क्रि. अ.

भूलना, भूलनो
इतराने लगना।
क्रि. अ.

भूलना, भूलनो
खो जाना।
क्रि. अ.

भूलना, भूलनो
जिसे स्मरण न रहता हो।
वि.

भूलभुलैयाँ
वह भवन जिसमें एक ही जैसे अनेक द्वारों के कारण मार्ग भूल जाय।
संज्ञा
[हिं. भूल+ भूलना]

भूलभुलैयाँ
चक्करदार और पेचीदी बात।
संज्ञा
[हिं. भूल+ भूलना]

भूलि
भूलकर।
क्रि. अ.
[हिं. भूलना]

भूलि
भूलि रहे-धोखे में पड़ गये।
प्र.
भूलि रहे अति चतुर चितै चित कौन सत्य कछु मर्म न पावत-१० उ.-५।
भूलि करौ नहिं ऐसे काम - कदापि वैसा काम न करना। उ. - अब पर घर की सौंह करत है भूलि करौ नहिं ऐसे काम-2०२३।

भूलिहु
भूलकर भी, कदापि।
क्रि. वि.
[हिं. भूलना+हु]
(क) तू जननी अब दुख जनि मानहिं। रामचंद्र नहिं दूरि कहूँ, पुनि भूलिहु चित चिंता नहिं आनहिं-९-९५। (ख) भूलिहु जिनि आवहिं इहि गोकुल तपत तरनि सम चंद।

भूल
भूलने का भाव।
संज्ञा
[हिं. भूलना]

भूल
गल्ती , चूक।
संज्ञा
[हिं. भूलना]
भूल के कोई काम करना - अनजान या धोखे में कोई काम करना। भूल के (भी) कोई काम न करना - वह काम कदापि न करना, उस काम को न करने का पक्का निश्चय कर लेना।

भूल
दोष, अपराध।
संज्ञा
[हिं. भूलना]

भूल
अशुद्धि।
संज्ञा
[हिं. भूलना]

भूलक
भूल करनेवाला।
संज्ञा
[हिं. भूल]

भूलना, भूलनो
ध्यान या याद न रखना।
क्रि. स.
[सं. विह्वल]

भूलना, भूलनो
गलती करना।
क्रि. स.
[सं. विह्वल]

भूलना, भूलनो
खो देना।
क्रि. स.
[सं. विह्वल]

भूलना, भूलनो
याद न रहना।
क्रि. अ.

भूलना, भूलनो
चकूना, गलती होना।
क्रि. अ.

भूलीं
आसक्त हो गयीं, मुग्ध हो गयी।
क्रि.अ.
[हिं. भूलना]
गोपी तजि लाज, सँग स्याम-रंग भूलीं-६४२।

भूलै
भूल जाय, ध्यान न रखे, पता न पावे, विस्मरण कर दे।
क्रि. स.
[हि. भूलना]
ज्यौं मृगा कस्तूरि भूलै, सु तौ ताके पास-१-७०।

भूलोई
भूला हुआ ही, भ्रम में पड़ा।
क्रि. वि.
[हिं. भूला+ई]
तुम बिनु सुलोइ भूलौ डोलत-१-१७७।

भूलोक
संसार।
संज्ञा
[सं.]

भूलौ
भूला हुआ, भ्रम में पड़ा हुआ।
वि.
[हिं. भूलना]
तुम बिनु भूलोइ भूलौ डोलत-१-१७७।

भूल्यौ
याद न रहा, विस्मृत हुआ, ध्यान न रहा।
क्रि.अ.
[हिं. भूलना]
भुल्यौ भ्रम्यौ तृषातुर मृग लौं, काहूँ सम्र न गँवायौ-१-२०१।

भूल्यौ
भ्रम में पड़ गया, धोखे में आ गया।
क्रि.अ.
[हिं. भूलना]
(क) अब हौं माया-हाथ बिकानौ।...। हिंसा-मद-ममता रस भूल्यौ, आसा हीं लपटान्यौ-१-४७। (ख) दीन जन क्यौं करि आवै सरन ? भूल्यौ फिरत सकल जल-थल मग, सुनहु न ताप-भय-हरन-१-४८।

भूवा
रुई।
संज्ञा
[हिं. घू आ]

भूवा
रुई जैसा उजला या सफेद।
वि.

भूवा
पिता की बहन।
संज्ञा
[हिं. बुआ]

भूषित
सजा-सजाया।
वि.
[सं.]

भूषित
अलंकृत।
वि.
[सं.]

भूष्य
सजाने योग्य।
वि.
[सं.]

भूसन
अलंकार, आभूषण।
संज्ञा
[सं. भूषण]

भूसन
[हिं. भूँकना]
संज्ञा
भूँकने या बकने का भाव।

भूसना, भूसनो
भूँकना,'भों-भों' करना।
क्रि. अ.
[हिं. भूँकना]

भूसना, भूसनो
बकना।
क्रि. अ.
[हिं. भूँकना]

भूसा
भुस।
संज्ञा
[सं. तुष]

भूसा
भूसी।
संज्ञा
[सं. तुष]

भूसी
अनाज का छिलका।
संज्ञा
[हिं. भूसा]

भूशय्या
पृथ्वी रूपी सेज।
संज्ञा
[सं.]

भूशय्या
भूमि पर सोना।
संज्ञा
[सं.]

भूशायो
पृथ्वी पर सोनेवाला।
वि.
[सं. भूशायिन्]

भूशायो
मृतक।
वि.
[सं. भूशायिन्]

भूषण, भूषन
अलंकार।
संज्ञा
[सं. भूषण]

भूषण, भूषन
शोभा बढ़ानेवाली वस्तु या व्यक्ति।
संज्ञा
[सं. भूषण]

भूषणता, भूषनता
भूषण का भाव या धर्म।
सज्ञा
[सं.]

भूषना, भूषनो
भूषित करना।
क्रि. स.
[सं. भूषण]

भूषा
गहना।
संज्ञा
[सं. भूषण]

भूषा
सजाने की क्रिया।
संज्ञा
[सं. भूषण]

भूसुर
पृथ्वी के देवता, ब्राह्मण।
संज्ञा
[सं.]

भूहर
तहखाना।
संज्ञा
[हिं. भू+सं. गृह]

भ्रृंग
भौंरा।
संज्ञा
[सं.]

भ्रृंग
बिलनी' (कीड़ा) जो दूसरे कीड़ों के ढोले को पकड़ कर इस तरह 'भिनभिन' करता है कि वह भी उसी की तरह हो जाता है।
संज्ञा
[सं.]

भृंगी
भौंरी, भ्रमरी।
संज्ञा
[सं.]
(क) कहूँ ठौर नहिं चरन-कमल बिनु, भृंगी ज्यौं दसहूँ दिसि धावै-१-२३३। (ख) भृंगी री; भजि स्यामकमल-पद, जहाँ न निसि कौ त्रास-१-३३९।

भृंगी
बिलनी' कीड़ा जो दूसरे कीड़ों को भी अपना जैसा बना लेता है।
संज्ञा
[सं.]

भृकुटि, भृकुटी
भौंह।
संज्ञा
[सं. भृकुटी]
भृकुटी कुटिल, अरुन अति लोचन, अगिनि-सिखा-मुख कह्यौ फिराई-९-५६। (ख) भृकुटि पर मसि-बिंदु सोहै सकै सूर न गाइ-१२०-2५।

भृगु
एक प्रसिद्ध मुनि जो शिव जी के पुत्र माने जाते हैं और जिनके वंश में परशुराम जन्मे थे। प्रसिद्धि है कि इन्होंने विष्णु की छाती में, उनकी सहनशीलता की परीक्षा के उद्देश्य से, लात मारी थी। विष्णु के सब अवतारों की छाती पर इस चिह्न का बना रहना माना गया है।
संज्ञा
[सं.]

भृगु
जमदग्नि।
संज्ञा
[सं.]

भृगु
परशुराम
संज्ञा
[सं.]

भृति
वेतन।
संज्ञा
[सं.]

भृति
मूल्य।
संज्ञा
[सं.]

भृति
पालन करना।
संज्ञा
[सं.]
वै पथ बिकल चकित अति आतुर भर्मत हेतु दियौ। भृति बिलबि पृष्टि दै स्यामा स्यामै स्याम बियौ-३४७४।

भृतु
दास, सेवक।
संज्ञा
[सं. भृत्य]
तब पहिचानि जानि प्रभु को भृतु परम सुचित मन कीन्हीं-2९७१।

भृत्य
सेवक, दास।
संज्ञा
[सं.]
मंत्री-भृत्य-सखा-मो सेवक यातैं कहत सुजान-सारा. ५४६।

भृश
बहुत अधिक।
क्रि. वि.
[सं.]

भेंगा
जिसको आँखों की पुतलियाँ टेढ़ी तिरछी रहती हों।
वि.
[हिं. भिंगा]

भेंट
उपहार, उपायन।
संज्ञा
[हिं. भेंटना]
( क ) चारि पदारथ दिए, सुदामा तंदुल भेंट धरयौ-१-१३३। (ख) ते सब पतित पायेँ-तर डारौं, यहै हमारी भेंट-१-१४६।

भेंट
मिलना, साक्षात्कार।
संज्ञा
[हिं. भेंटना]
(क) अब लगि प्रभु तुम बिरद बुलाए भई न मोसौं भेंट। तजौ बिरद कै मोहिं उधारौ, सूर कहै कसि फेंट-१-१४५। (ख) नृपति के रजक सौं भेंट मग मैं भई, कह्यो, दै बसन हम पहिरि जाहीं-2५८४।

भेंटइ
गले या छाती से लगाता है।
क्रि. स.
[हिं. भेंटना]
धाइ-धाइ द्रुम भेंटइ ऊधौ छाके प्रेम-३४४३।

भृगु
शुक्राचार्य।
संज्ञा
[सं.]

भृगुनंद, भृगुनंदन
परशुराम।
संज्ञा
[सं.]

भृगुपति
परशुराम।
संज्ञा
[सं.]
जिन रघुनाथ-फेरि भृगुपति-गति डारी काटि तहीं-९-९१

भृगुरेखा
विष्णु की छाती पर भृगु की लात का चिह्न।
संज्ञा
[सं.]
(क) माथे मुकुट सुभग पीतांबर उर साभित भृगु-रेखा हो। (ख) तट भुजदड भौंर भृगुरेखा चंदन चित्रिच रंगत सुंदर।

भृगुलता
भृगु मुनि का चरण-चिह्न जो विष्णु की छाती पर है।
संज्ञा
[सं.]
उर अरु ग्रीव बहुरि हिय धारै। तापर कौस्तुभ मनिहिं बिचारै। तहँ भृगुलता, लच्छमी जान। नाभि कमल चित धारै ध्यान-३-१३।

भृगुवार
शुक्रवार।
संज्ञा
[सं.]

भृत
भृन्य, दास, सेवक।
संज्ञा
[सं.]
जोइ भावै सोइ करहु तुम, लता सिला, द्रुम, गेहु। ग्वाल गाइ कौ भृत करौ, मानि सत्य ब्रत एहु-४९२।

भृत
भरा-पूरा।
वि.
[सं.]

भृत
पोषित।
वि.
[सं.]

भृति
नौकरी।
संज्ञा
[सं.]

भेजा
सिर के भीतर का गूदा, मगज।
संज्ञा
[?]
भेजा खाना - बकबक से तंग करना।

भेज्यौ
भेजा, एक स्थान से दूसरे तक जाने को प्रेरित किया।
क्रि. स.
[हिं. भेजना]
रिषि सिष्यहि भेज्यौ समुझाइ। नृप सौं कहि तू ऐसी जाइ-१-२९०।

भेड़
एक प्रसिद्ध चौपाया, गाडर।
संज्ञा
[सं. मेष]

भेड़
बहुत सीधा।
वि.

भेड़
बहुत मूर्ख।
वि.

भेड़ा
नर भेड़, मेढा।
संज्ञा
[हिं. भेड़]

भेड़िया
एक मांसाहारी चौपाया।
संज्ञा
[हिं. भेड़]

भेड़ी
भेड़।
संज्ञा
[हिं. भेड़]

भेद
भेदने छेदने की क्रिया।
संज्ञा
[सं.]

भेद
विरोधी पक्ष में परस्पर द्वेष उत्पन्न करना।
संज्ञा
[सं.]

भेंटोंगो, भेटौंगो
गले या छाती से लगाऊँगा।
क्रि. स.
[हिं. भेंटना]
मनो इन सकुल अबहीं यहि बन इन भुज भरि भेंटोंगो गोपालहिं-2४८३।

भेंवना, भेंवनो
तर करना।
क्रि. स.
[हिं. भिगोना]

भेइ
भिगोई, तर की, मग्न की।
क्रि. स.
[हिं. भेवन]
ते बेली कैसै दहियत हैं जे अपनै रस भेइ.-१-२००।

भेउ
भेद, धर्म, रहस्य।
संज्ञा
[सं. भेद]

भेक
मेढक।
संज्ञा
[हिं. मेढक]

भेख
पहनने के वस्त्र।
संज्ञा
[सं. भेष]

भेख
पहनने का ढंग।
संज्ञा
[सं. भेष]

भेखज
दवा, औषधि।
संज्ञा
[सं. भेषज]

भेज
भेजने की वस्तु।
संज्ञा
[हिं. भेजना]

भेजना, भेजनो
किसी वस्तु या व्यक्ति के जाने का आयोजन करना, रवाना करना।
क्रि. स.
[सं. व्रजन्]

बाट
बाट-घाट-मार्ग और घाट का।
यौ.
[सं. वाट= मार्ग]
बाहिर तरुन किसोर बयस बर, बाट-घाट का दानी -१०-३११।

बाट
तौलने का बटखरा।
संज्ञा
[सं. वटक]

बाट
रस्सी की ऐंठन या बटन।
संज्ञा
[हिं. बटना]

बाटिकी
बटलोई।
संज्ञा
[देश.]

बाटना
पीसना, चूर्ण करना।
क्रि. स.
[हिं. बट्टा]

बाटना
(डोरी आदि) बटना।
क्रि. स.
[हिं. बटना]

बाटि
घिसकर, पीसकर।
क्रि. स.
[हिं. बाटना]
कूच बिष बाटि लगाय कपट करि बालघातिनी परम सुहाई।

बाटिका
बाग, उद्यान।
संज्ञा
[सं.]

बाटी
अंगारों या उपलों पर सिकी मोटी छोटी रोटी, अंगाकड़ी, लिट्टी।
संज्ञा
[सं. बटी]
दूध, बरा, उत्तम दधि बाटी, गाल मसूरी की रुचि न्यारी-१०-२२७।

बाटी
गोली।
संज्ञा
[सं. बटी]

भेंटत
भेंटते समय, भेंटने पर।
क्रि. वि.
[हिं. भेंटना]
भेंटत आँसू परे पोठि पर, बिरह-अगिनि मनु जरत बुझाए-९-१६८।

भेंटत
भेंट करते हैं, चढ़ाते हैं।
क्रि. स.
नंद करत पूजा, हरि देखत। घंट बजाइ देव अन्हवायौ, दलचंदन लै भेंटत-१०-२६१।

भेटन
मिलने, मुलाकात करने।
संज्ञा
[हिं. भेंट]
(क) भारतादि दुरजोधन, अर्जुन, भेंटन गए द्वारिकापुरी-१-२६८। (ख) जुवतिन सबै कामबपु भेंटन कूँ ललचाय-सारा. ५१५।

भेंटना, भेटनो
मिलना, साक्षात्कार करना।
क्रि. अ.
[हिं. भिड़ना]

भेंटना, भेटनो
गले या छाती से लगाना।
क्रि. स.

भेंटना, भेटनो
भेंट देना।
क्रि. स.
[हि. भेंट]

भेंटिबों, भेटिबौं
गले या छाती से लगाना।
क्रि. स.
[हिं. भेंटना]
श्रीदामा आदि सकल ग्वालनि को मेरे हित भैंटिबों-2९४२।

भेंटी
गले या छाती से लगाया।
क्रि. स.
[हिं. भेंटना]
(क) किशोरी अँग अँग भेंटो स्यामहिं-१७०१। (ख) रुकमिनि राधा ऐसैं भेंटी। जैसे बहुत दिननि की बिछुरी एक बाप की बेटी-४२९१।

भेंटे
भेंट की, गले या छाती से लगाया, मिले।
क्रि. स.
[हिं. भेंटना]
जथाजोग भेंटे पुरबासी, गए सूल, सुख-सिंधु नहाए-९-१६८।

भेंटोंगी, भेंटौंगी
गले या छाती से लगाऊँगी।
क्रि. स.
[हिं. भेंटना]
सूर स्याम ज्यों उछँगि लई मोहिं यों मैं हूँ हँसि भेंटोंगी-पृ० ३५२ (७९)।

भेद
रहस्य।
संज्ञा
[सं.]
(क) अपुनपौ आपुनही मैं पायौ। सब्दहिं सब्द भयौ उजियारी, सतगुरु भेद बतायौ.-४-१३। (ख) मन इनसौं मिलि भेद बतायौ बिरह फाँस गरे डारी-पृ. ३२६ (५७)। (ग) घर को भेद और के आगे क्यौं कहिबे कौं जाही-१९००। (घ) कहा मन मैं घालि बैठी भेद मैं नहिं लखि सकी २२५९।

भेद
अता-पता, खोज।
संज्ञा
[सं.]
छाक लिए सिर स्याम बुलावति। ढूँढ़त फिरति ग्वारिनी हरि कौं, कितहूँ भेद न पावति-४५९।

भेद
तात्पर्य।
संज्ञा
[सं.]

भेद
अंतर, फर्क।
संज्ञा
[सं.]
(क) बग-बगुली अरु गीध-गीधिनी आइ जनम लियौ तैसौ। उनहूँ कै गृह सुत दाता हैं, उन्हें भेद कहु कैसौ-2-१४। (ख) भेद चकोर कियौ ताहू मैं बिधु प्रीतम रिपु भान-.३३५७।

भेद
प्रकार, किस्म।
संज्ञा
[सं.]
इते पर हस्तकानि गति छबि नृत्य भेद अपार-पृ० ३५१ (७७)।

भेदक
भेदने-छेदनेवाला।
वि.
[सं.]

भेदन
भेदने-छेदने की क्रिया।
संज्ञा
[सं.]

भेदना, भेदनो
बेधना, छेदना।
क्रि. स.
[सं. भेदन]

भेदना, भेदनो
मनोभाव जानने के लिए पैनी दृष्टि से देखना।
क्रि. स.
[सं. भेदन]

भेदभाव
अंतर।
संज्ञा
[सं.]

भेदि
छेदकर, भेदन करके, विदीर्ण करके।
क्रि. अ.
[हिं. भेदना]
धनि जननी जो सुभटहिं जावै ...। मरै तो मंडल भेदि भानु कौ, सुरपुर जाइ बसावै-९-१५२।

भेदिआ, भेदिया
भेद लेनेवाला।
संज्ञा
[हिं. भेद]
भेदिआ सौं भेद कहिबो छेद सौं छाती परौ-३२६०।

भेदिआ, भेदिया
गुप्त रहस्य जाननेवाला।
संज्ञा
[हिं. भेद]

भेदी
भेद लेनेवाला।
संज्ञा
[हिं. भेद]

भेदी
गुप्त रहस्य जाननेवाला
संज्ञा
[हिं. भेद]

भेदी
भेदनेवाला।
वि.
[सं. भेदिन]

भेदीसार
बड़ई का ’बरमा’' जिससे काठ में छेद किया जाता है।
संज्ञा
[सं.]

भेद्य
जो भेदा या छेदा जा सके।
वि.
[सं.]

भेद्यौ
मनोभाव जानने के लिए तीव्र दृष्टि से देखा।
क्रि. स.
[हिं. भेदना]
प्रभु जागे, अर्जुन-तन चितयौ। कब आये तुम, कुसल खरी। ता पाछै दुर्योधन भेद्यौ, शिर-दिसि तै मन गर्व धरी-१-२६८।

भेन, भेना
बहिन।
संज्ञा
[हिं. बहिन]

भेना, भेनो
तर करना।
कि. स.
[हिं. भिगोना]

भेर, भेरि, भेरी
बड़ा ढोल या नगाड़ा, दुंदुभी।
संज्ञा
[सं. भेरी]
(क) घुरत निसान, मृदंग-संख धुनि, भेरि-झाँझ-सहनाइ-९-२९। (ख) बाजन बाजै गहगहे, बाजैं मंदिर भेरि-१०.४०।

भेरीकार
भेरी बजानेवाला।
संज्ञा
[सं. भेरी+कार]

भेल
कायर, भीरु।
वि.
[सं.]

भेल
मूर्ख।
वि.
[सं.]

भेला
भिडंत।
संज्ञा
[हिं. भेंट]

भेला
मुलाकात।
संज्ञा
[हिं. भेंट]

भेला
(गुड़ का) बड़ा पिंड।
संज्ञा
[देश.]

भेली
गुड़ की पिंडी।
संज्ञा
[हिं. भेला (पुं.)]
कान्ह कुँवर कौ कनछेदन है, हाथ सोहारी भेली गुरु की १८-१९०।

भेव
मर्म की बात, भेद, रहस्य।
संज्ञा
[सं. भेद]
जुग-जुग जनम, मरन अरु बिछुरन, सब समुझत मत-भेव। ज्यौं दिनकरहिं उलूक न मानत, परि भाई यह टेव-१-१००।

भेव
बारी, पारी।
संज्ञा
[सं. भेद]

भेवना, भेवनी
तर करना।
क्रि. स.
[हिं. भिगोना]

भेश, भेष
कपड़े, गहने आदि से अपने को सजाना।
संज्ञा
[सं. वेश]
अबिहित बाद-बिवाद सकल मत इन लगि भेष धरत-१-५५।
भेष बनायौ - शरीर धारण किया, अवतार लिया। उ. - नर तन सिंह बदन बपु कीन्हौ जन लगि भेष बनायौ-१-१९०।

भेषज
औषध, दवा।
संज्ञा
[सं.]
वहाँ भेषज नाना बिधि को अरु मधुरिपु से हैं बैद-३०१३।

भेषति
पहनती है।
क्रि. अ.
[हिं. भेषना]
अति सुगंध मर्दन अँग अँग ठनि बनि बनि भूषन भेषति-१५२६।

भेषना, भेषनो
स्वाँग बनाना।
क्रि. स.
[हिं. भेष]

भेषना, भेषनो
पहनना।
क्रि. स.
[हिं. भेष]

भेषा
वेश, रूप।
संज्ञा
[सं. वेश]
संख-चक्र-गदा-पद्म बिराजत, अति प्रताप सिसु-भेषा-१०-४।

भेस
रूप-रंग, पहनावा आदि।
संज्ञा
[सं. वेष]

भेस
बनावटी रूप रंग और पहनावा।
संज्ञा
[सं. वेष]

भैजन
भय उत्पन्न करनेवाला।
वि.
[सं. भय+जनक]

भैजल
संसार का बंधन।
संज्ञा
[सं. भव+जाल]

भैदा
भय पैदा करनेवाला।
वि.
[सं. भय+दा]

भैन, भैना भैनि, भैनी
बहन, भगिनी।
संज्ञा
[हिं. बहन]
(क) भनी मात-पिता बंधव गुरु-गुरुजन यह कहैं मोसौं-१२२१। (ख) भैनी देखि देति मोहिं गारी काहें कुलहि लजावति-१५१६।

भैने
बहन का पुर, भानजा।
संज्ञा
[सं. भागिनय]

भैया
भाई, भ्राता।
संज्ञा
[हिं. भाई]
मातु-पिता भैया मिले, (२) नई रुचि नई पहिचानि-१-३२५।

भैया
आत्मीयता सूचक संबोधन।
संज्ञा
[हिं. भाई]

भैरव
भयंकर।
वि.
[सं.]

भैरव
भयानक शब्दवाला।
वि.
[सं.]

भैरव
शंकर।
संज्ञा

भेसज
औषध, दवा।
संज्ञा
[सं. भेषज]

भेसना, भेसनो
वस्त्रादि पहनना।
कि . स.
[सं. वेश, हिं. भेष]

भेसना, भेसनो
स्वाँग बनाना।
कि . स.
[सं. वेश, हिं. भेष]

भैंस
एक दुधारु चौपाया।
संज्ञा
[सं. महिष]

भैसा
’भैस' का नर है।
संज्ञा
[हिं. भैंस]

भैंसासुर
एक दैत्य जो दुर्गा जी द्वारा मारा गया था।
संज्ञा
[सं. महिषासुर]

भैसौ
मैस का नर, भैंसा; यह यम का वाहन माना गया है।
संज्ञा
[हिं. भैंसा]
सूरदास भगवंत-भजन बिनु, मनौ ऊँट-वृष भैसौ-2-१४।

भै
भय, डर।
संज्ञा
[सं. भय]

भै
हुई, हुआ।
क्रि. अ.
[हिं.]
कत हौ सीत सहति ब्रत-सुंदरि, ब्रज' पूरन सब भै री-७८७

भैचक, भैचक्क
भौचक्‍का, चकित।
वि.
[हिं. भय+चक]

भोंपा, भोंपू
एक बाजा।
संज्ञा
[अनु. भों+पू]

भो
हुआ, भया।
क्रि. अ.
[हिं. भया]

भो
हे, हो।
संबोधन
[सं.]

भोइ
आसक्त या अनुरक्त होकर।
क्रि. अ.
[हिं. भीनना, भोना]
(क) नागनि के काटैं बिष होइ। नारी चितवत नर रहै भोइ.-९-२।

भोइ
लीन या मग्‍न होकर।
क्रि. अ.
[हिं. भीनना, भोना]
त्यों जिय रहै बिषय-रस भोइ-१० उ०-१२७।

भोए
लीन, निमग्न।
वि.
[हिं. भोना]
लाल सों रति मानी जानी कहे देत नैना री रंग भोए-2११२।

भोकस, भोकप्ता
भूखा, अक्खड़।
वि.
[हिं. भूख]

भोकता, भोक्ता
भोग करनेवाला।
वि.
[सं. भोक्ता]
तुम दाता अरु तुमहिं भोकमा हरता-करता तुमहीं सार-९३६।

भोकता, भोक्ता
भोजन करनेवाला।
वि.
[सं. भोक्ता]

भोकता, भोक्ता
विषय-सुख भोगनेवाला।
वि.
[सं. भोक्ता]

भैरव
शिव के एक गण।
संज्ञा

भैरव
एक राग।
संज्ञा

भैरव
भयानक शब्द।
संज्ञा

भैरवी
एक देवी, चामुंडा।
संज्ञा
[सं.]

भैरवी
एक रागिनी।
संज्ञा
[सं.]

भैरवी
पार्वती।
संज्ञा
[सं.]

भैरवीचक्र
वे तान्त्रिक और वाममार्गी जो एक चक्र में बैठकर देवी का पूजन और मद्यपान करते हैं।
संज्ञा
[सं.]

भैरवीचक्र
मद्यप और अनाचारी वर्ग।
संज्ञा
[सं.]

भैरों
शंकर, रुद्र।
संज्ञा
[सं. भैरव]
परै भहराइ भभकंत रिपु धाइ सौं, करि कदन रुधिर भैरौं अघाऊँ-९-१२९।

भैषज
औषध, दवा।
संज्ञा
[सं.]

भैहा
भयभीत।
संज्ञा
[हिं. भय+हा]

भैहा
जिस पर किसी भूत-प्रेत का आवेश आता हो।
संज्ञा
[हिं. भय+हा]

भों
भो' का शब्द।
संज्ञा
[अनु.]

भोंकना, भोंकनो
घुसेड़ना।
क्रि. स.
[अनु. भक]

भोंकना, भोंकनो
’भों’’भों’ करना।
कि. अ.

भोंकना, भोंकनो
कुत्ते का बोलना।
कि. अ.

भोंड़ा
कुरूप।
वि.
[हिं. भद्‍दा]
मूकू, निंद, निगोड़ा, भोंड़ा, कायर, काम बनावै-१-१८६।

भोंडापन
भद्दापन।
संज्ञा
[हिं. भोंडा+पन]

भोंतरा, भोंतला, भोंथरा, भोंथला
जिसकी धार तेज न हो, कुंद।
वि.
[हिं. भुथरा]

भोंदू
मूर्ख, बेवकूफ।
वि.
[हिं. बुद्धू]
निर्घिन, नीच कुलज, दुर्बुद्धी, भोंदू, नित को रोऊ-१-१८६।

बाटी
तसला।
संज्ञा
[सं. वर्तुल]

बाटे
भाग, हिस्सा।
संज्ञा
[हिं. बाँट]
गुरुजन तेउ इहाँ इनि त्यागी मेरे बाटे परयौ जँजाल-पृ. ३२९ (८४)।

बाड़
वृद्धि,
संज्ञा
[हिं. बाढ़]

बाड़
जोर।
संज्ञा
[हिं. बाढ़]

बाड़
टाड़' नामक गहना।
संज्ञा
[देश.]

बाड़व
समुद्र की आग।
संज्ञा
[सं.]

बाड़ा
चारो ओर से घिरा स्थान।
संज्ञा
[सं. वाट]

बाड़ा
पशुशाल।
संज्ञा
[सं. वाट]

बाड़ी
बाटिका, उपवन।
संज्ञा
[सं. वारी]

बाढ़
वृद्धि, अधिकता।
संज्ञा
[हिं. बढ़ना]

भोगली
नाक की लौंग (गहना)।
संज्ञा
[देश.]

भोगली
कान का एक गहना।
संज्ञा
[देश.]

भोगवना, भोगवनो
भुगतना।
क्रि. अ.
[हिं. भोगना]

सहन करना।
क्रि. अ.
[हिं. भोगना]

भोगवना, भोगवनो
संभोग करना।
क्रि. अ.
[हिं. भोगना]

भोगवै
सुख-दुख का अनुभव करे।
कि.अ
[हिं. भोगवना]

भोगवै
सुख भोगे।
कि.अ
[हिं. भोगवना]

भोगवै
सहन करे।
कि.अ
[हिं. भोगवना]

भोगवै
सहवास करे।
कि.अ
[हिं. भोगवना]

भोगवाना, भोगवानो
भोगने को प्रवृत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. भोगना]

भोग
पाप-पुण्य का फल जो सहा या भोगा जाता है, प्रारब्ध।
संज्ञा
[सं.]
अब कैसै पैयत सुख माँगे। जैसोइ बोइयै तैसोइ लुनिए, कर्मन भोग अभागे-१-६१।

भोग
सुख-दुख का अनुभव।
संज्ञा
[सं.]

भोग
सुख, विलास।
संज्ञा
[सं.]
काग हंसहिं संग जैसी कहाँ दुख कहूँ भोग-2९११।

भोग
स्त्री से संभोग।
संज्ञा
[सं.]

भोग
फल, अर्थ।
संज्ञा
[सं.]

भोग
देवी-देवता को चढ़ाया जानेवाला खाद्य, नैवेद्य।
संज्ञा
[सं.]
(क) पट अंतर दै भोग लगायौ-१०-२६१। (ख) गिरि गोबर्धन देवन को मनि सेवहु ताकौ भोग चढ़ाई-९१३।

भोगना, भोगनो
सुख-दुख का अनुभव करना, भुगतना।
क्रि. अ.
[सं. भोग]

भोगना, भोगनो
सहन करना।
क्रि. अ.
[सं. भोग]

भोगना, भोगनो
संभोग करना।
क्रि. अ.
[सं. भोग]

भोगलिप्सा
लत, व्यसन।
संज्ञा
[सं.]

भोग - विलास
आमोद-प्रमोद।
संज्ञा
[सं.]

भोगाना, भोगानो
भोगने को प्रवृत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. भोगना]

भोगिन, भोगिनि, भोगिनी
उपपत्नी।
संज्ञा
[सं.]

भोगिन, भोगिनि, भोगिनी
प्रेयसी।
संज्ञा
[सं.]

भोगी
सुखी।
वि.
[सं. भोगिन्]

भोगी
इन्द्रियों का सुख भोगनेवाला।
वि.
[सं. भोगिन्]
सूर स्याम ब्रज जुवतिनि भोगी-१८४५।

भोगी
भुगतनेवाला।
वि.
[सं. भोगिन्]

भोगी
विषयासक्त।
वि.
[सं. भोगिन्]

भोगी
विलासी, आनंद करनेवाला।
वि.
[सं. भोगिन्]
सूर स्याम आपुन ही भोगी-१०२५।

भोगी
विषयी, भोगासक्त।
वि.
[सं. भोगिन्]
भौंरा भोगी बन भ्रमै (रे) मोद न मानै ताप-१-३२५।

भोज्य
खाने योग्य।
वि.
[सं.]

भोडर, भोडल
अबरक।
संज्ञा
[देश.]

भोडर, भोडल
अबरक का चूर्ण जो होली में गुलाल के साथ उड़ाया जाता है।
संज्ञा
[देश.]

भोथर, भोथरा
कुंद धारबाला, गुट्ठल।
वि.
[अनु.]

भोना, भोनो
संचारित होना।
क्रि. अ.
[हिं. भीनना]

भोना, भोनो
लिप्त, लीन या निमग्न होना।
क्रि. अ.
[हिं. भीनना]

भोना, भोनो
आसक्त या अनुरक्त होना।
क्रि. अ.
[हिं. भीनना]

भोना, भोनो
भीगना, तर होना।
क्रि. अ.
[हिं. भीनना]

भोना, भोनो
संचारित करना।
क्रि. स.

भोना, भोनो
मिलाना।
क्रि. स.

भोज
खाद्य पदार्थ।
संज्ञा
[सं. भोजन]

भोजक
भोगनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

भोजक
विलासी।
संज्ञा
[सं.]

भोजन
खाने की सामग्री।
संज्ञा
[सं.]
काग-सृगाल-स्वान कौ भोजन तू कहै मेरौ मेरो१-३४०।

भोजन
खाना, भक्षण करना।
संज्ञा
[सं.]
करि भोजन अवसेस जज्ञ कौ त्रिभुवन भूख हरी-१-१६।

भोजनभट्ट
बहुत खाने वाला।
संज्ञा
[सं. भोजन+भट्ट]

भोजनालय
पाकशाला। ।
संज्ञा
[सं.]

भोजनालय
स्थान जहाँ मूल्य देकर भोजन किया जाय।
संज्ञा
[सं.]

भोजपत्र
एक वृक्ष जिसकी छाल प्राचीन काल में ग्रंथ-लेखन के काम में आती थी।
संज्ञा
[सं. भूर्जपत्र]

भोजी
खानेवाला या वाली।
वि.
[सं. भोजिन]

भोगी
खानेवाला।
वि.
[सं. भोगिन्]
(क) सो ब्रज मैं माखन कौ भोगी-५९९। (ख) सूर-स्याम मेरौ माखन-भोगी तुम आवतिं बेकाज-७७५।

भोगैं
व्यंजनों को, खाद्यों को।
संज्ञा
[हिं. भोग]
नंद-भवन मैं कान्ह अरोगैं। जसुदा ल्यावैं षटरस भोगैं-३९६।

भोग्य
जिसका भोग किया जाय।
वि.
[सं.]

भोग्य
जो भोगने योग्य हो।
वि.
[सं.]

भोग्य
खाद्य।
वि.
[सं.]

भोग्यभूमि
सुख-विलास का स्थान या प्रदेश
संज्ञा
[सं.]

भोग्यभूमि
मर्त्यलोक जहाँ पाप-पुण्य का फल दुख-सुख के रूप में भोगना होता है।
संज्ञा
[सं.]

भोग्यमान
जो भोगने को शेष हो।
वि.
[सं.]

भोज
श्रीकृष्ण के एक ग्‍वाल सखा का नाम।
संज्ञा
[सं.]
अर्जुन, भोजऽरु, सुबल, सुदामा, मधुमंगल इक ताक-४६४।

भोज
दावत
संज्ञा
[सं. भोजन]

भोरना, भोरनो
धोखा देना।
क्रि, स.
[सं. भ्रम]

भोरना, भोरनो
बहकाना, फुसलाना।
क्रि, स.
[सं. भ्रम]

भोरा
प्रातःकाल, सबेरा।
संज्ञा
[हिं. भोर]

भोरा
भोला, सीधा।
वि.
[हिं. भोला]

भोराई
सीधापन।
संज्ञा
[हिं. भोरा+ई]

भोराना, भोरानो
बहकाना, भ्रम में डालना।
क्रि. स.
[हिं. भोर+ आना]

भोराना, भोरानो
भ्रम में पड़ना, बहकाया जाना।
क्रि. अ.

भोरानाथ
शिव जी।
संज्ञा
[हिं. भोलानाथ]

भोरि
धोखा देकर, भ्रम में डालकर।
क्रि. स.
[हिं. भोराना]
सखी री, मुरली लीजै चोरि।...। ना जानौं कछु मेलि मोहिनी राखे अंग अंग भोरि-६५७।

भोरि
बहकाकर, फुसलाकर।
क्रि. स.
[हिं. भोराना]
महा मोहिनी मोहि आतमा-अपमारगहिं लगावै।........। ज्यों दूती पर-बधू भोरि कै लै परपुरुष दिखावै-१-४२।

भोरी
भोली, सीधी, सरल, अनजान।
वि.
[हिं. पुं. भोला]
(क) देखी हरि मथति ग्वालि दधि ठाढ़ी।….| दिन थोरी, भोरी, अति गोरी, देखत ही जु स्याम भए चाढ़ी-१०-३००। (ख) सूरदास अबला हम भोरी गुर-चैटी ज्यौं पागी-३३३५।

भोरी
बहकाया, भ्रम में डाला।
क्रि. स.
[हिं. भोरना]
आरज पंथ छिड़ाय गोपिकन अपने स्वारथ भोरी-2८६३।

भोरु
सबेरा, प्रातःकाल।
संज्ञा
[हिं. भोर]

भोरु
भोखा, भ्रम।
संज्ञा

भोरे
सीधा, सरल स्वभाव का।
वि.
[हिं. भोला]
(क) सूर स्याम उनको भाए भोरे हमको निठुर मुरारी-पृ. ३३० (९१)। (ख) सुनियत हुए तैसई देखे सुंदर सुमति सूभोरे-2९७१। (ग) ऊधौ, तुम सब साथी भोरे-३१७६।

भोरे
अबोध, अनजान, अपरिपक्य अवस्था के।
वि.
[हिं. भोला]
(क) कहाँ रहत काके वै ढोटा बृद्ध तरुन की वो हैं भोरे-१२३८। (ख) की गोरे की कारे रँग हरि की जोबन की भोरे-१२६०।

भोरैं
धोखे में, भ्रम में।
संज्ञा
[हिं. भोर]
किलकि किलकत हँसत, बाल सोभा लसत, जानि यह कपट, रिपु आयौ भोरैं-१०-६२।

भोरै
भ्रम या धोखे में।
संज्ञा
[हिं. भोर]
कहा भयौ तेरे भवन गए जो पियौ तनक लै भोरै-१०-३२१।

भोरो, भोरौ
भोला, सीधा, सरल, अनजान।
वि.
[हिं. भोला]
कह जानै मेरौ, बारौ भोरौ, झुकी महरि दै-दै मुख गारि-१०-३०४।

भोल
मुग्ध, आसक्त, लीन।
वि.
[हिं. भोला]

भोना, भोनो
आसक्त करना।
क्रि. स.

भोना, भोनो
धोखे में डालना।
क्रि. स.

भोयो, भोयौ
लीन हुआ, लिप्त या निमग्न हुआ।
क्रि. अ.
[हिं. भोना]

भोयो, भोोयौ
लिप्त, लीन, युक्त, निम्मग्न।
वि.
[हिं. भीनना, भोना]
(क) भ्रम-भोयौ मन भयौ पखावज, चलत असंगत चाल-१-१५३। (ख) ब्रह्मा महादेव सुर सुरपति नाचत फिरत महारस भोयो.-१-५४।

भोर
प्रातःकाल, सबेरा, तड़का।
संज्ञा
[सं. विभावरी]
खान-पान-परिधान मैं (रे) जोबन गयौ सब बीति। ज्यों बिट पर-तिम सँग बस्यौ (रे) भोर भए भई भीति-१-३२५। (ख) भोर भयो जागे नँदलाल-2५७१।

भोर
धोखा, भूल, भ्रम।
संज्ञा
[सं. भ्रम]
हँसत परस्पर आपु में चली जाहिं जिय भोर।

भोर
चकित, स्तंभित।
वि.
सूर प्रभु की निरखि सोभा भई तरुनी भोर-१३५५।

भोर
भोला, सीधा, सरल।
वि.
[हिं. भोला]

भोरए
भ्रम में डालने (से),बहकाने से।
क्रि. स.
[हिं. भोराना]
सूरदास लोगन के भोरए काहे कान्ह अब होत पराए।

भोरना, भोरनो
भ्रम में डालना।
क्रि, स.
[सं. भ्रम]

भोला
सीधा-सादा।
वि.
[हिं. भूलना]

भोला
मूर्ख।
वि.
[हिं. भूलना]

भोलानाथ
शीघ्र ही संतुष्ट हो जानेवाले, शिव, महादेव।
संज्ञा
[हिं. भोला+सं. नाथ]
सिव कौं सबनि कियौ सनमान। भोलानाथ लियौ सब मान-४-५।

भोलानाथ
सरल स्वभाव का व्यक्ति।
संज्ञा
[हिं. भोला+सं. नाथ]

भोलापन
सिधाई, सरलता।
संज्ञा
[हिं. भोला+पन]

भोलापन
नादानी, मूर्खता।
संज्ञा
[हिं. भोला+पन]

भोलाभाला
सीधा।
वि.
[हिं. भोला+ अनु. भाला]

भोवति
सुगन्धित करती है।
क्रि. स.
[हिं. भोवना]
कबहुँ सेज कर झारि सँवारति कबहुँ मलयरज भोवति-१९४९।

भोवना, भोवनो
सुगंधित करना।
क्रि. स.
[हिं. भोना]

भोसर, भोसरा
मूर्ख, मूढ़।
वि.
[देश.]

बाढ़
अधिक वर्षा आदि से नदी का पानी बढ़ना।
संज्ञा
[हिं. बढ़ना]

बाढ़
लाभ।
संज्ञा
[हिं. बढ़ना]

बाढ़
बंदूक, तोप आदि छूटना।
संज्ञा
[हिं. बढ़ना]

बाढ़ई
लकड़ी का काम करनेवाला, बढ़ई।
संज्ञा
[हिं. बढ़ई]
कन्हैया हालरु रे। गढ़ि-गुढ़ि ल्यायौ बाढ़ई, धरनी पर डोलाइ, बलि हालरु रे।...। इक लख माँगै बाढ़ई, दुइ लख नंद जु देहिं, बलि हालरु रे -१०-४७।

बाढ़ना
वृद्धि होना, बढ़ना।
क्रि. अ.
[हिं. बढ़ना]

बाढ़ाली
खड्ग, तलवार।
संज्ञा
[हिं.]

बाढ़ि, बाढ़ी
बढ़ गयी, वृद्धि को प्राप्त हुई।
क्रि.
[हिं. बढ़ना]
(क) कहा भयौ जौ संपति बाढ़ी, कियौ बहुत घर घेरौ-१-२६६। (ख) नैननि न बिचारि परत देखत रुचि बाढ़ी-१०-२०१।

बाढ़ि, बाढ़ी
बढ़ी-चढ़ी।
वि.
घर की बाढ़ी - घर ही में बढ़ चढ़ कर बातें करने वाली। उ. - ग्वालिनि है घर ही की बाढ़ी -७७४।

बाढ़ि, बाढ़ी
वृद्धि।
संज्ञा
[हिं. बाढ़]

बाढ़ि, बाढ़ी
लाभ।
संज्ञा
[हिं. बाढ़]

भौंरा
एक खिलौना जो डोरी लपेट कर नचाया जाता है।
संज्ञा
[सं. भ्रमर, पा. भमर, प्रा. भँवर]
इत आवत दै जात देखाई ज्यौं भौंरा चकडोर।

भौंरा
हिंडोले की मयारी में लगी लकड़ी जिसमें डोरी बाँधी जाती है।
संज्ञा
[सं. भ्रमर, पा. भमर, प्रा. भँवर]
हिंडोरना माई झूलत गोपाल।.....। भौंरा मयारिनि नील मरकत खँचे पाँति अपार।

भौंराना, भौंरानो
घुमाना।
क्रि. स
[सं. भ्रमण]

भौंराना, भौंरानो
विवाह की भाँवर दिलाना।
क्रि. स
[सं. भ्रमण]

भौंराना, भौंरानो
घूमना, चक्कर काटना।
क्रि. अ.

भौंराही
भौंरों के मँडराने की किया या भाव।
संज्ञा
[हिं. भौंरा]

भौंरी
जिस पशु के रोओं या बालों का घुमावदार चक्र हो, जिसके स्थान आदि के विचार से पशु के गुण-दोष का निर्णय किया जाय।
वि.
[सं. भ्रमण]

भौंरी
घुमावदार रोओं या बालों के चक्र वाली गाय।
संज्ञा
पियरी, मौरी, गोरी, गैनी, खैरी, कजरी, जेती। दुलही, फुलही, भौंरी, भूरी, हाँकि, ठिकाई तेती-४४५।

भौंरी
विवाह के समय वर-वधू द्वारा अग्नि की परिक्रमा।

भौंरी
जल-धारा का चक्कर।

भौं
भौंह, भृकुटी।
संज्ञा
[सं. भ्रू]

भौंकना, भौंकनो
भौंभौं करना।
क्रि. अ.
[अनु. भौंभौं]

भौंकना, भौंकनो
कुत्ते का बोलना।
क्रि. अ.
[अनु. भौंभौं]

भौंकना, भौंकनो
बकवाद करना।
क्रि. अ.
[अनु. भौंभौं]

भौंतुआ, भौंतुवा
एक कीड़ा।
संज्ञा
[हिं. भ्रमना]

भौंतुआ, भौंतुवा
एक रोग।
संज्ञा
[हिं. भ्रमना]

भौंर
तेज बहते हुए पानी में पड़ने वाला चक्कर, भँवर, आवर्त।
संज्ञा
[सं. भ्रमर]
कब लगि फिरिहौं दीन बह्यो ? सुरति-सरित-भ्रम भौंर लोल मैं, मन परि तट न लह्यौ-१-१६२।

भौंर
भौंरा, भ्रमर।
संज्ञा
[सं. भ्रमर]
रसभरे अंबुजनि भीतर भ्रमत मानौ भौंर-१३६४।

भौंरा
भ्रमर, चंचरीक।
संज्ञा
[सं. भ्रमर, पा. भमर, प्रा. भँवर]
भौंरा भोगो बन भ्रमै मोद न मानै ताप-१-३२५।

भौंरा
बड़ी मधुमक्खी।
संज्ञा
[सं. भ्रमर, पा. भमर, प्रा. भँवर]

भौचाल
भूकंप, भूडोल।
संज्ञा
[हिं. भूचाल]

भौचाली
उपद्रवी।
वि.
[हिं. भौचाल]

भौज, भौजाइ, भौजाई
भाई की पत्नी, भावज।
संज्ञा
[सं. भ्रातृजाया]
तेरी कोऊ कहा करैगौ धौं लरिहै हमसों भौजाई.-८५५।

भौजल
सांसारिक बंधन।
संज्ञा
[सं. भव+जाल]

भौठा
पहाड़ी, टीला।
संज्ञा
[देश.]

भौतिक
पाँच भूतों से बना हुआ, पार्थिव, सांसारिक।
वि.
[सं.]
भौतिक देह जीव अभिमानी देखत ही दुख लायौ।

भौतिक
शरीर संबंधी।
वि.
[सं.]

भौतिक
भूतयोनिसम्बन्धी।
वि.
[सं.]

भौती
रात, रजनी।
संज्ञा
[सं.]

भौती
बहुत ही।
क्रि. वि.
[हिं. बहुत + ही]

भौंरी
बाटी (रोटी)।

भौंह
भौं, भँव।
संज्ञा
[सं. भ्रू]
तब इक-पुरुष भौंह तै भयो-३-७।
भौह चढ़ाना (तानना) - अप्रसन्न होना, बिगड़ना। भौंह तनत - कुद्ध या अस्न्न होते हैं। उ. - बदत काहू नहीं निधरक निदरि मोहिं न गनत। बार-बार बुझाइ हारी भौंह मो पर तनत। भौंह चलाना - भौंह मटका कर संकेत करना। भौंह चलावै - भौंहें मटकाकर संकेत करता है। उ. - ठठकति चल मटकि मुँह मोरे बंकर भौंह चलावै-८७६। भौंह जोहना - खुशामद करना। भौंह ताकना - रुख या मनोभाव परखना।

भौंहरा
तहखाना।
संज्ञा
[हिं. भू + गृह]

भौ
संसार।
संज्ञा
[सं. भव]

भौ
डर, भय।
संज्ञा
[सं. भय]

भौकन
ज्वाला।
संज्ञा
[हिं. भभक]

भौकन
ताप।
संज्ञा
[हिं. भभक]

भौगिया
सुख भोगनेवाला।
वि.
[हिं. भोग]

भौगोलिक
भूगोल-संबंधी।
वि.
[सं.]

भौचक
हक्का-बक्का, चकित।
वि.
[हिं. भय + चकित]

भौन
घर, गृह।
संज्ञा
[सं. भवन]
आजु बिधाता मति मेरी गई भौन कान बिरमाई-2५३८

भौना, भौनो
चक्कर लगाना।
क्रि. अ.
[सं. भ्रमण]

भौना, भौनो
घर, गृह।
संज्ञा
[सं. भवन]
मुरली बजाय बिसरावत भौना-2४२१।

भौम
भूमि-संबंधी।
वि.
[सं.]

भौम
भूमि से उत्पन्न।
वि.
[सं.]

भौम
मंगल ग्रह।
संज्ञा
(क) नील, सेत अरुपीत, लाल मनि लटकन भाल लुनाई। सनि, गुरुअसुर, देवगुरु मिलि मनु भौम सहित समुदाई --१०-१०८। ( ख ) मुक्ता-बिद्रम-नील-पीत भनि, लटकत लटकन भाल री। मानौ सुक्र भौम-सनि गुरु मिलि, ससि कै बीच रसाल री---१०-१४०।

भौमरत्न
मूँगा।
संज्ञा
[सं.]

भौमवार
मंगलवार।
संज्ञा
[सं.]

भौमासुर
नरकासुर नामक दैत्य।
संज्ञा
[सं.]
(क) सिसु होइ भौमासुर तहाँ आयौ काहू जान न पाइ-2३७८। (ख) सत्यभामा सहित बैठे हरिंगरुड़ पर भौमासुर नगर गए तुरत धाई.-१० उ०-३१।

भौमी
पृथ्वी की कन्या, सीता।
संज्ञा
[सं.]

भौर
भौंरा।
संज्ञा
[सं. भ्रमर]

भौर
एक तरह का घोड़ा
संज्ञा
[सं. भ्रमर]

भ्रंश, भ्रंस
भ्रष्ट, खाराब।
वि.
[सं. भ्रंश]
सूर सुज्ञान सुनावति अबलनि सुनत होत मति भ्रंस-३०४९।

भ्रकुटि
भौंह।
संज्ञा
[सं. भृकुटी]

भ्रत
दास, सेवक।
संज्ञा
[सं. भृत्य]

भ्रम
धोखा, भ्रांति।
संज्ञा
[सं.]

भ्रम
संदेह, संशय।
संज्ञा
[सं.]

भ्रम
भ्रमण।
संज्ञा
[सं.]

भ्रम
कुम्हार का चाक।
संज्ञा
[सं.]

भ्रम
घूमने वाला।
वि.

भ्रम
भ्रमण करनेवाला।
वि.

भ्रमकारी
भ्रम उत्पन्न करने वाला।
वि
[सं. भ्रमकारिन्]

भ्रमण
घूमना-फिरना।
संज्ञा
[सं.]

भ्रमण
आना-जाना।
संज्ञा
[सं.]

भ्रमण
यात्रा।
संज्ञा
[सं.]

भ्रमण
चक्कर, फेरी।
संज्ञा
[सं.]

भ्रमत
घूमता-फिरता है।
क्रि. अ.
[हिं. भ्रमना]
कौन बिरक्त अधिक नारद तैं, निसि दिन भ्रमत फिरै-१-३५।

भ्रमत
घूमता-फिरता हुआ, चक्कर काढता।
वि.
चक्र सौं भ्रमत चकृत भए देखि सब चहुँधा देखिए नंद ढोटा-2५९१।

भ्रमति, भ्रमती
घूमती-फिरती है।
क्रि. अ.
[हिं. भ्रमना]
तेरो दोष नहीं भ्रमती तू जहीं तहीं नदी डोंगर बन बन पात-पाता.-१५४६।

भ्रमना, भ्रमनो
घूमना-फिरना।
क्रि. अ.
[सं. भ्रमण]

भ्रमना, भ्रमनो
धोखा खाना, भूल करना।
कि, अ.
[सं. भ्रम]

भ्रमना, भ्रमनो
भूल-भटक जाना, भटकाना।
कि, अ.
[सं. भ्रम]

भ्रमनि
घूमना-फिरना।
संज्ञा
[सं. भ्रमण]

भ्रमनि
चक्कर, फेरी।
संज्ञा
[सं. भ्रमण]

भ्रमनि
भ्रम में पड़े हुए व्यक्ति।
वि.
[सं. भ्रम]
तुम सर्वज्ञ, सबै बिधि पूरन, अखिल भुवन निज नाथ तिन्हैं छाँड़ि यह सूर महा सठ, भ्रमत भ्रमनि कैं साथ-१-१०३।

भ्रममूलक
भ्रम से उत्पन्न।
वि.
[सं.]

भ्रमर
भौंरा।
संज्ञा
[सं.]

भ्रमर
भ्रमरगुफा-हृदय का स्थान-विशेष।
यौं.

भ्रमर
कामुक, बिलासी, विषयी।
वि.

भ्रमरगीत
कृष्ण-काव्य का अंश-विशेष जो कृष्ण-सखा उद्धव के योगोपदेश के उत्तर में ब्रज-बालाओं की उन उक्तियों से युक्त है जो ’भ्रमर' को संबोधित करके कही गयी है।
संज्ञा
[सं. भ्रमर+गीत]

भ्रमाना, भ्रमानो
भ्रम या धोखे में पड़ना, भटकना।
क्रि. अ.

भ्रमाती
धूमती फिरती है।
क्रि. अ.
[हिं. भ्रमाना]

भ्रमाती
भान या धोखे में पड़ गयी है।
क्रि. अ.
[हिं. भ्रमाना]

भ्रमावै
भ्रम या धोखे में पड जाते हैं।
क्रि. अ.
[हिं. भ्रमाना]
जसुदा मदन-गुपाल सोवावै। देखि सयन-गति त्रिभुवन कंपै, ईस बिरंचि भ्रमावै-१०.६५।

भ्रमि
धूम-फिरकर।
क्रि. अ.
[हिं. भ्रमना]
सूर नगर-चौरासी भ्रमि-भ्रमि धर-धर कौ जु भयौ-१-६४

भ्रमित
भ्रम में पड़ा हुआ।
वि.
[सं.]

भ्रमित
घूमताफिरता, भटकता।
वि.
[सं.]

भ्रमी
जिसे भ्रम या धोखा हो गया हो।
वि.
[सं. भ्रमिन्‌]

भ्रमी
चकित, भौचक्का।
वि.
[सं. भ्रमिन्‌]

भ्रमीन
घूमता हुआ।
वि.
[सं. भ्रमण]

भ्रमरा
भौंरा, भ्रमर।
संज्ञा
[सं. भ्रमर]
जैसे लुबधति कमल-कोश में भ्रमरा की भ्रमरी-पृ. . ३२९ (८९)।

भ्रमरावली
भ्रमर पंक्ति, भ्रमर समूह।
संज्ञा
[सं.]

भ्रमरी
भौंरे की मादा, भौंरी।
संज्ञा
[सं. भ्रमर]

भ्रमवात
वायु मंडल जो सदैव घूमता रहता है।
संज्ञा
[सं.]

भ्रमाइ
भ्रम में पड़ जाती है, चकित हो जाती है।
क्रि. अ.
[हिं. भ्रमना]
जौन जराइ जु जगमगाइ रहे देखत दृष्टि भ्रमाइ-१० उ०-६।

भ्रमात्मक
भ्रम उत्पन्न करनेवाला।
वि.
[स.]

भ्रमात्मक
संदिग्ध।
वि.
[स.]

भ्रमाना, भ्रमानो
घूमाना-फिराना।
क्रि. स.
[हिं. भ्रमाना]

भ्रमाना, भ्रमानो
धोखे में डालना, भटकाना।
क्रि. स.
[हिं. भ्रमाना]

भ्रमाना, भ्रमानो
घूमना-फिरना।
क्रि. अ.

बाण
संस्कृत का एक प्रसिद्ध कवि।
संज्ञा
[सं.]

बाणिज्य
व्यापार।
संज्ञा
[सं.]

बात
बचन, कथन, बोल।
संज्ञा
[सं. वार्ता]
बात को आँचल (गाँठ) में बाँधना- सदैव ध्यान रखना। बात उठाना - (१) कड़ी बातें सह लेना। (२) वचन का निर्वाह करना। (३) वचन न मानना। बात उलटना - (१) बात का जवाब देना। (२) कहकर फिर बदल जाना। बात कहते - तुरंत, तत्काल। बात कह न पाना - (१) प्रभुता, महत्ता आदि से इतना अभिभूत होना कि कुछ कह न पाना। उ. - सूर देखि वा प्रभुता उनकी कहि न आवै बात-2७८०। (२) इतना सरल या भोला होना कि बात का जवाब भी न दे पाना। (३) इतना मूर्ख होना कि उत्तर भी न दे पाना। बात करना - (१) किसी के बोलते समय बीच ही में बोल उठना। (२) आरोप या कथन का खंडन करना। बात के टेकी - वचन का निर्वाह करनेवाला। उ. - एतो अलि उनहीं के संगी अपनि बात के टेकी-३२८८। बात कान में पड़ना-सुनना। बात की बात में - तुरंत, तत्काल। बात खाली जाना - कथन का माना न जाना। बात गढ़ना - झूठी बात कहना। बात गढ़त - झूठी बात कहता है। उ. - झूठैं कहत स्याम अंग सुन्दर बात (बातैं) गढ़त बनावत। बात घूँटना या पीना (घूँट या पी जाना) - (१) बात सुनकर भी ध्यान न देना। (२) अनुचित बात सुनकर भी उत्तर न देना। बात चबा जाना - कहते-कहते रुक जाना या दूसरे ढंग से कहने लगना। (मन में) बात जमना (बैठना) - कथन सत्य जान पड़ना। (मन में) बात जमाना (बैठाना) - निश्चय कराना कि कथन सत्य ही है। बात टालना - (१) पूछी हुई बात का उत्तर न देकर और बातें करने लगना। (२) कही हुई बात के अनुसार कार्य न करना। बात टूटना - पूरा वाक्य न बोल पाना। उ. - सीत-बात कफ कंठ बिरोधै, रसना टूटै बात १- ३१३। बात दुहराना - बात का उलटकर जवाब देना। बात न पूछना - बहुत तुच्छ समझकर बात तक न करना। बात न करना - घमंड के मारे न बोलना। बात नीचे डालना - (१) अपनी बात का खंडन होने देना। (२) दूसरे की बात का खंडन करना। बात पकड़ना - (१) बात या कथन में दोष निकालकर कायल करना। (२) तर्क-कुतर्क करना। (किसी की बात पर जाना (१) कथन का बुरा-भला मानना। (२) कथन के अनुसार चलना। बात पलटना ( बदलना।) - एक बात कहकर फिर कुछ और कहना। बात पूछना - (१) सुख सुविधा का ध्यान रखना। (२) आदर-सत्कार करना। बात पुछातौ - ध्यान नहीं देता, परवाह नहीं करता। उ. - जग में जीवित हो को नातौ। मन बिछरैं तन छार होइगौ, कोउ न बात पुछातौ-१- ३०२। न पूछ बात - जरा भी ध्यान नहीं देता। उ. - मीन बियोग न सहि सकै, नीर न पूछै बात-१- ३२५। बात फूटना - बोलना, कहना। बात फेंकना - ताना मारना। बात फेरना - कही हुई बात को पूरा न करके कुछ और तात्पर्य समझना। बात बढ़ना - वाद-विवाद हो जाना। बात बढ़ाना - वाद-विवाद करना। बड़ी बात - अनुचित या अनुपयुक्त कथन। उ. - छोटै मुँह बड़ी बात कहत, अबहीं मरि जैहै-५८९। बात बनाना - (१) झूठी - सच्ची बातें गढ़ना, हीला-हवाला करना। (२) व्यर्थ की बातें बकना। (३) चापलूसी या खुशामद करना। (४) डींग हाँकना। बात बनावन कौं है नीकौ खूब झूठी-सच्ची बातें गढ़ता है, झूठ बोलने में बहुत कुशल है। उ. - बात बनावन कौं है नीकौ, बचन-रचन समुझावै-१-१८६। बात बनाइ - झूठ बोलकर। उ. - कोई कहै बात बनाई पचासक उनकी बात जो एक-३३६४। बात बनाई - झूठ बोली। उ. - सूर स्याम मन हर्‌यौ तुम्हारौ हम जानी इह बात बनाई-११८६। बहुत बनावत बात - खूब झूठ-सच बोलते हो। उ. - तुम जो राजनीति सब जानत बहुत बनावत बात। बात बात में - (१) प्रत्येक कथन में। (२) हर बार। बात मारना - ताना मारना। बात में बात निकालना - व्यर्थ के दोष दिखाना। (किसी की) बात रखना - (१) कहा मान लेना। (२) इच्छा पूरी कर देना। (अपनी) बात रखना - (१) जैसा कहा हो, वैसा ही करना। (२) हठ पकड़ना। बात लगना - किसी की बात का बुरा मानना। बात लगाना - (१) निंदा करना। (२) अनुचित बात का बुरा मानकर चिंतित या दुखी रहना। बात (बातें) छाँटना (बघारना) - (१) बहुत बोलना। (२) बहुत बढ़-चढ़कर बोलना। (३) डींग हाँकना। बात (बातें, मिलाना - 'हाँ' में ‘हाँ' मिलाना, समर्थन करना, चाटुकारी करना। सीधे बात न कहना - गर्व या अभिमान का व्यवहार करना। सूधैं कहत न बात - गर्व या अभियान के कारण सज्जनता से बोलता भी नहीं। उ. - हौं बड़ हौं बड़ बहुत कहावत सूधैं कहत न बात-2- २२। बात (बातें) सुनना अनुचित कथन भी सहन करना। बातें सुनाना - भला-बुरा कहना। बात में आना - दूसरे के कथन पर विश्वास कर लेना। बात (बातों) की झड़ी बाँधना - बराबर बोलते जाना। बात (बातों) का धनी जो केवल बातें बनाने में ही कुशल हो, करे-धरे कुछ नहीं। बात (बातों) पर जाना - (१) बात पर ध्यान देना। (२) कहने के अनुसार चलना बात (बातों) में उड़ाना - (१) हँसी में ही टाल देना। (२) बहानेबाजी करना। बात (बातों) में फुसलाना (बहलाना, समझाना) - खाली बातों से ही संतुष्ट कर देना। बात (बातों) में लगाना - दूसरी ओर से ध्यान हटाने के लिए रुचिकर प्रसंग छेड़कर बातें करने लगना।

बात
चर्चा, प्रसंग, बिषय, जिक्र।
संज्ञा
[सं. वार्ता]
बात आना (उठना, चलना छिड़ना) - चर्चा चलाना। बात उठाना (चलाना, छोड़ना) - चर्चा चलना। बात उठावति - चर्चा चलाती है। उ. - अब समझी मैं बात सबनि की झूठे ही यह बात उठावति-१२५०। बात चलावत - चर्चा करते हैं। उ. - फिरि फिरि नृपति चलावत बात। कहौ सुमंत कहाँ तैं पलटे प्रान जिवन कैसे बन जात-९- ३८। (किसी की) बात चलाना - (किसी का) दृष्टांत या उदाहरण देना। बात चालना - चर्चा चलाना। बातैं चाली - चर्चा छेड़ी। उ. - ऊधौ, कत ये बातैं चालीं। कछु मीठी कछु मधुरी हरि की, ते उर-अंतर साली-३८२३। बात पड़ना - प्रसंग छिड़ जाना। बात फेरना चालू विषय को किसी कारण से समाप्त करके नया प्रसंग छेड़ना। बात मुँह पर लाना - चर्चा या प्रसंग छेड़ बैठना।

बात
प्रसिद्ध या प्रचलित प्रसंग, किवदंती, प्रवाद।
बात उड़ना - किसी बात का प्रसिद्ध हो जाना। बात उड़ी है - चर्चा फैल गयी है। उ. - झूठी ही यह बात उड़ी है, राधा कान्ह कहत नर-नारी। (किसी पर) बात आना - किसी को दोष या कलंक लगना। बात फैलना (बहना) किसी विषय का प्रसिद्ध हो जाना। बात बहानी - चारों ओर चर्चा फैल दी है। उ. - जो हम सुनति रहीं सो नाहीं। ऐसी ही यह बात बहानी। बात फैलाना (बहाना) - किसी विषय को सब पर प्रकट कर देना। (किसी पर) बात रखना (लगाना, लाना) - किसी पर दोष या कलंक लागाना।

बात
मामला, हाल, वस्तुस्थिति।
बात का बतंगड़ करना - (१) छोटी सी बात को खूब बढ़ा-चढ़ाकर कहना। (२) छोटी सी घटना को व्यर्थ ही बहुत पेचीदा बना देना। बात ठहरना - मामला तय हो जाना। बात पर धूल डालना - किसी घटना या झगड़े को भुलाने का यत्न करना। बात बढ़ना - जरा सी घटना या प्रसंग का झगड़े का रूप लेना। बात बढ़ाना - मामूली बात पर झगड़ा कर बैठना। बात बनना (सँवरना) (१) काम सिद्ध होना। (२) संयोग या घटना का अनुकूल होना। बात बनाना (सँवारना) - (१) का सिद्ध करना। (२) संयोग या परिस्थिति को अनुकूल करना। बात-बात पर (में) - हर काम में। बात बिगड़ना - काम चौपट ही जाना, असफलता मिलना। बात बिगाड़ना - काम चौपट करना, असफल करना।

बात
स्थिति, दशा, प्राप्त संयोग।

बात
संदेश, संदेशा।
ऊधौ, हरि सों कहियौ बात।

बात
वार्तालाप, संलाप, कथोपकथन।

बात
संबंध आदि निश्चित करने का वार्तालाप।
बात ठहरना - संबंध का निश्चित होना। बात लगाना - संबंध का प्रस्ताव करना। बात लाना - विवाह का प्रस्ताव लाना।

भ्रमै
घूमता-फिरता है।
क्रि. अ.
[हिं. भ्रमना]
भौंरा भोगी बन भ्रमै (रे) मोद न मानै ताप। सब कुसुमनि मिलि रस करै, (पै) कमल बँधावै आप-१-३२५।

भ्रम्यौ
मार-मार फिरा, भटका।
क्रि. अ.
[हिं. भ्रमना]
(क) जिहिं-जिहिं जोनि भ्रम्‍यौ संकट-बस, सोइ सोइ दुखनि भरी-१-७१। (ख) भूल्यौ भ्रम्यौ तृषातुर मृग लौ, काहूँ स्रम न गँवायौ-१-२०१।

भ्रष्ट
नीचे गिरा हुआ।
वि.
[सं.]

भ्रष्ट
बिगड़ा हुआ।
वि.
[सं.]

भ्रष्ट
दोषयुक्त।
वि.
[सं.]

भ्रष्ट
बुरे चाल-चलनवाला।
वि.
[सं.]

भ्रष्टा
बुरे आचरणवाली।
वि.
[सं.]

भ्रष्टाचरण, भ्रष्टाचार
अनुचित या भ्रष्ट आचार-विचार।
संज्ञा
[सं.]

भ्रष्टाचरण, भ्रष्टाचार
ईमानदारी से काम न करने का व्यवहार।
संज्ञा
[सं.]

भ्रांत
भ्रम या धोखे में पड़ा हुआ।
वि.
[सं.]

भ्राजमान
शोभायमान।
वि.
[हि. भ्राजना]

भ्राजै
शोभित होता है।
क्रि. अ.
[हिं. भ्राजना]
मनि कुंडल मकराकृत तरुन तिलक भ्राजै-१४६५।

भ्रात, भ्राता
भाई।
संज्ञा
[सं. भ्रात, हिं. भ्राता]
(क) बृषभासुर-बत्सासुर मारयौ, बल-मोहन दोउ भ्रात-५०८। (ख) मुकुट कुंडल पीत पट छबि अनुज भ्राता स्याम-2५६५।

भ्रातृज
भाई का लड़का।
संज्ञा
[सं.]

भातृजाया
भाई की स्त्री, भौजाई।
संज्ञा
[सं.]

भ्रातृत्व
भाईपन, भाईचारा।
संज्ञा
[सं.]

भात्र
सगा भाई, सहोदर।
संज्ञा
[सं. भ्रातृ]
भवन सँवारि, नारि रस लोभ्यौ, सुत, बाहन, जन, भ्रात्र-१-२१६।

भ्राम
भ्रम धोखा।
संज्ञा
[सं.भ्रम]

भ्रामक
भ्रम में डालनेवाला।
वि.
[सं.]

भ्रामक
संदेह उत्पन्न करनेवाला।
वि.
[सं.]

भ्रामक
चक्कर खिलानेवाला।
वि.
[सं.]

भ्रुम
एक दैत्य जिसे श्रीकृष्ण ने मारा था।
संज्ञा
[सं. भ्रम]
भ्रम अरु केसी इहाँ पछारयौ-३४०९।

भ्रुव
भौं, भौंह।
संज्ञा
[सं.भ्रू]
(क) लटकन लटकत ललित भाल पर, काजर-बिंदु भ्रुव-ऊपर री-१०-९८। (ख) अंजन दोउ दृग भरि दीन्हौ। भ्रुव चारु चखौड़ा कीन्हौ-१०-१८३।

भ्रू
भौं, भौंह।
संज्ञा
[सं.]
चूमति कर पग अधर-भ्रू लटकति लट चूमति-१०-७४।

भ्रू - भंग
भौंह का संकेत।
संज्ञा
[सं.]

भ्रू - भंग
भृकुटी या त्यौरी चढ़ाना
काल डरत भ्रू-भंग की आँची-१-१८।

भ्रूण
गर्भ।
संज्ञा
[सं.]

भ्रूण
गर्भ का बालक।
संज्ञा
[सं.]

भ्रूणहत्या
गर्भ के बालक की हत्या।
संज्ञा
[सं.]

भ्रूविक्षेप
भृकुटी चढ़ाना, भ्रूभंग।
संज्ञा
[सं.]

भ्रांत
घबराया हुआ।
वि.
[सं.]

भ्रांत
उन्मत्त।
वि.
[सं.]

भ्रांति
भ्रम, धोखा।
संज्ञा
[सं.]

भ्रांति
संदेह।
संज्ञा
[सं.]

भ्रांति
मोह, प्रमाद।
संज्ञा
[सं.]

भ्रांति
एक काव्यालंकार।
संज्ञा
[सं.]

भ्राज
सुशोभित है।
क्रि. अ.
[हिं. भ्राजना]
दुलहिनि बृषभानु-सुता अंग अंग भ्राज-पृ.३४९(६०)।

भ्राजई
सुशोभित है।
क्रि. अ.
[हिं. भ्राजना]
हाथ पहुँची बीर कानन जटित मुँदरी भ्राजई। ...। अँग अंग भूषन सुरस ससि पूरनकला मानों भ्राजई-१० उ०-2४।

भ्राजत
शोभित है।
क्रि. अ.
[हिं. भ्राजना]
(क) लटकन सीस, कंठ मनि भ्राजत, मनमथ कोटि बारनैं गै री-१०-५५ (ख) डगमगात गिरि परत पानि परु, भुज भ्राजत नँदलाल.-१०-११४। (ग) राजभूषन अंग भ्राजत अहीर कहत लजात-2६७२।

भ्राजना, भ्राजनो
शोभा पाना, शोभित होना।
क्रि. अ.
[सं. भ्राजन - दीपन]

भ्वहरना, स्वहरनो
डरना।
क्रि. अ.
[हिं. भय + हरना]

भ्वासर
मूर्ख, भूढ़।
वि.
[देश.]

देवनागरी वर्णमाला का पचीसवाँ व्यंजन जो होंठ और नासिका से उच्चरित होता है।

मंकुर
शीशा, दर्पण।
संज्ञा
[सं. मुकुर]

मंग
सिर के बालों के बीच की माँग।
संज्ञा
[हिं. माँग]
(क) गोरे भाल लाल सेंदुर छबि मुक्ताबर सिर सुभग मंग को-१०४२। (ख) इन बिरहिनि मैं कहूँ तू देखी सुमन गुहाए मंग-३२२३।

मँगइए
मँगाइए।
क्रि. स
[हिं. मँगाना]
सकुचत फिरत जो बदन छिपाए, भोजन कहा मँगइए.-१-२३९।

मंगता, मँगता
भिखमंगा।
संज्ञा
[हिं. माँगन+ ता]

मंगन
भिखमंगा।
संज्ञा
[हिं. माँगना]
धेनु जे संकल्प राखीं लईं ते गनाइ कै....... मागध मंगन जन लेत मन भाइ कै--२६२८।

मंगना
याचना करना।
क्रि. स.
[हिं. माँगना]

मँगनी
माँगने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. माँगना]

मँगनी
कुछ समय के लिए माँग कर लेले का भाव।
संज्ञा
[हिं. माँगना]

मँगनी
कुछ समय के लिए माँग कर ली गयी वस्तु।
संज्ञा
[हिं. माँगना]

मँगनी
विवाह-पूर्व की एक रीति जिसमें सम्बन्ध पक्का किया जाता है।
संज्ञा
[हिं. माँगना]

मंगनो
माँगने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. माँगना]
नवसत साज सिंगार नागरि मारगमय भूषन मंगनो.-2२८०।

मंगनो
माँगना, याचना करना।
कि. स.
[हिं. माँगना]

मंगरना, मंगरनो
जलाना, प्रज्ज्वलित करना।
कि. स.
[हिं. मंगलना]

मंगल
कामना पूरी होना।
संज्ञा
[सं.]

मंगल
कुशल, कल्याण।
संज्ञा
[सं.]

मंगल
एक राह।
संज्ञा
[सं.]

मंगल
इस ग्रह के नाम पर पड़ा 'बार'।
संज्ञा
[सं.]

मंगल
शुभ या पूजन-संबंधी कार्य।
संज्ञा
[सं.]
धूप दीप नैवेद्य साजि कै मंगल करे बिचारी-2५८७।

मंगलकलश, मंगलकलस
मंगल अवसर पर रखा जानेवाला पानी भरा घड़ा।
संज्ञा
[सं. मंगलकलश]

मंगलगीत
शुभ दिवस पर अथवा प्रसन्नता के अवसर पर गाया जानेवाला गीत।
संज्ञा
[सं.]
गुन गावत मंगलगीत मिलि दस-पाँच अली-१०-२४।

मंगलघट
मंगल अवसर पर रखा जाने वाला जल का घड़ा।
संज्ञा
[सं.]

मंगलचार, मंगलचारा
हर्ष, आनन्द, प्रसन्नता।
संज्ञा
[सं. मंगल+ चार]

मंगलचार, मंगलचारा
शुभ दिवस पर अथवा प्रसन्नता के अवसर पर किये जानेवाले नृत्य, गीत आदि हर्ष-सूचक कृत्य।
संज्ञा
[सं. मंगल+ चार]
(क) ह्य-गय-रतन हेम-पाटंबर आनँद मंगलचारा-१०-४। (ख) कमलनयन मधुपुरी सिधारे मिटि गयौ मंगलचार-2६८७। (ग) कनक कलस प्रति पौर बिराजत मंगलचार बधाई-सारा. ३९५।

मंगलना, मंगलनो
जलाना, प्रज्यलित करना।
क्रि. स.
[सं. मंगल]

मंगल पाठ
पद्य जो शुभ कार्यारम्भ के पूर्व मंगल कामना से पढ़ा जाता है।
संज्ञा
[सं.]

मंगलपाठक
बंदीजन।
संज्ञा
[सं.]

मंगलप्रद
कल्याणकारी।
वि.
[सं.]

मंगलभाषित
अशुभ या अप्रिय बात को शुभ या प्रिय रूप में कहने का ढंग।
संज्ञा
[सं.]

मंगलवार
सोमवार और बुधवार के बीच का वार, भौमवार।
संज्ञा
[सं.]

मंगलसूत्र
तागा जो देव-प्रसाद-रूप में गले में या कलाई पर बाँधा जाता है।
संज्ञा
[सं.]

मंगला
पार्वती।
संज्ञा
[सं.]

मंगला
पतिव्रता।
संज्ञा
[सं.]

मंगलाचरण
श्लोक या छन्द जो मंगल की कामना से किसी कार्य के आरम्भ में पढ़ा जाता या ग्रंथ के आदि में लिखा जाता है।
संज्ञा
[सं.]

मंगलामुखी
वेश्या।
संज्ञा
[सं. मंगलमुखी]

मंगली
जिसकी जन्म लग्न के अनुसार चौथे, आठवे या बारहवें स्थान में मंगल बैठा हो।
वि.
[सं. मंगल (ग्रह)]

मँगवाना, मँगवानो
माँगने में दूसरे को प्रवृत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. माँगना]

मँगवाना, मँगवानो
दूसरे को खरीद कर लाने के लिए प्रवृत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. माँगना]

मंगा
सिर के बालों के बीच की माँग।
संज्ञा
[हिं. माँग]
स्याम अलक बिच मोती दुति मंगा-१७६२।

मँगाइ, मँगाई
बुलवा ली, मँगवा ली, लौटवा ली।
क्रि. स.
[हिं. मँगाना]
(क) मैं खेई हो पार कौं तुम उलटि मँगाई.-९-४२। (ख) घसि चदन चारु मँगाइ बिप्रनि तिलक करे-१०-२४। (ग) पँचरँग सारी मँगाइ बधूजननि पैहराइ-१०-९५।

मँगाए
बुलवाया है, बुलवा भेजा है।
क्रि. स.
[हिं. मँगाना]
हम तुमको सुख-काज मँगाए-१००५।

मँगाना, मँगानो
माँगने के लिए दूसरे को प्रवृत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. माँगना]

मँगाना, मँगानो
दूसरे को कुछ खरीद कर लाने के लिए प्रवृत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. माँगना]

मँगाय
मँगाकर।
क्रि. स.
[हि. मँगाना]
पँचरँग सारी बहुत मँगाय-2४१०।

मँगायौ
बुलवाया, बुलवा भेजा।
क्रि. स.
[हिं. मँगाना]
बैठि एकांत मंत्र दृढ़ कान्हा राम-कृष्न दोउ बंधु मँगायौ-2४७७।

मँगारना, मँगारनो
जलाना, प्रज्वलित करना।
क्रि. स.
[सं. मंगल]

मँगावत
लाने को प्रवृत्त करता है।
क्रि. स.
[हिं. मँगाना]
फूले फिरत नंद अति मुख भयौ, हरषि मँगावत फूल-तमोल-१०-९४।

मँगावति
लाने को प्रवृत्त करती है।
क्रि. स.
[हिं. मँगाना]
बार-बार रोहिनि कौं कहि कहि पलिका अजिर मँगावति है-१०-७३।

मँगावन
मँगाने की क्रिया।
क्रि. संज्ञा
[हिं. मँगाना]

मँगावन
कह्यो पकरि मँगावन-पकड़ मँगवाने को कहा है.
प्र.
बल मोहन को नाम धरयौ, कह्यौ पकरि मगावन-५८९।

मंगी
माँग (लिया)।
क्रि. स.
[हिं. माँगना]

मंगी
लियौ मँगा-माँग लिया।
प्र.
कहा बिदुर की जाति-बरन है, आइ साग लियौ मँगो-१-२१।

मँगेतर
जिसके साथ मँगनी होकर विवाह-संबंध पक्का हुआ हो।
वि.
[हिं. मैंगनी + एतर]

मँगैया
माँगनेवाला।
वि.
[हिं. माँगना+ऐया]
धन्य दान धनि कान्ह मँगैया धन्य सूर तृन द्रुम बन डारि-११८१।

मंच, मंचक
पीढ़ी, मँचिया।
संज्ञा
[सं.]

मंच, मंचक
ऊँचा बना हुआ मंडल।
संज्ञा
[सं.]

मंचल
मचलनेवाला।
वि.
[हिं. मचलना]
चंचलअधर चरन-कर चंचल मंचल अंचल गहत बकोटनि-१०-१८७।

मंछल
ईर्ष्या, डाह।
संज्ञा
[सं. मत्सर]

बाढ़ीवान
शस्त्र पर शान रखनेवाला।
वि.
[हिं. बाढ़]

बाढ़े
बढ़-चढ़े।
वि.
[हिं. बढ़ना]
घर के बाढ़-घर ही में लंबी-चौड़ी हाँकने वाले। उ. - (क) घर के बाढ़े रावरे बातैं कहत बनाइ-११२९। (ख) अब जाने घर के बाढ़े हौ तुम ऐसे कहा रहे मुरझाई - २२६१।

बाढ़ै
बढ़े, वृद्धि को प्राप्त हो।
क्रि. स.
[हिं. बढ़ना]
जाके पूजे बाढ़ै गोधन-१०१५।

बाढ़यौ
बढ़ा, वृद्धि को प्राप्त हुआ।
क्रि. अ.
[हिं. बढ़ना]

बाढ़यौ
फैल गया, व्यापक हुआ।
क्रि. अ.
[हिं. बढ़ना]
गावत गुन सूरदास, बाढ़यौ जस भुव-अकास, नाचत त्रैलोक-नाथ माखन के काजै-१०-१४६।

बाण
तीर, सायक ।
संज्ञा
[सं.]

बाण
गाय का थन।
संज्ञा
[सं.]

बाण
लक्ष्य।
संज्ञा
[सं.]

बाण
पाँच की संख्या।
संज्ञा
[सं.]

बाण
राजा बलि का पुत्र जिसकी पुत्री अनिरुद्ध को ब्याही थी।
संज्ञा
[सं.]

मंजुल
कुंज।
संज्ञा पुं.

मंजूर
जो मान लिया गया हो, स्वीकृत।
वि.
[अ.]

मंजूरी
स्वीकार करने का भाव।
संज्ञा
[हिं. मंजूर]

मंजूषा, मंजूसा
पिटारी, डिबिया।
संज्ञा
[सं. मंजूषा]

मंझ, मंझा
बीच या मध्य का।
वि.
[सं. मध्य, पा. मज्झ]

मंझ, मंझा
चौकी।
संज्ञा
[सं. मंच]

मंझ, मंझा
खाट।
संज्ञा
[सं. मंच]

मँझधार
धारा का मध्य भाग।
संज्ञा
[हिं. माँझ+धार]

मँझधार
काम की अपूर्ण अवस्था।
संज्ञा
[हिं. माँझ+धार]

मँझरिया
केवट, मल्लाह।
संज्ञा
[हिं. माँझी]

मंजार
बिल्ली का नर, बिल्ला।
संज्ञा
[सं. मार्जार]
खाइ जाइ मंजार काज एको नहिं आवै-११४१।

मंजारी
बिल्ली जिसका रास्ता काट जाना अशकुन समझा जाता है।
संज्ञा
[सं. मार्जारी]
आइ अजिर निकसो नँदरानी बहुरी दोष मिटाइ। मंजारी आगै ह्वै आई पुनि फिरि आँगन आइ-५४०।

मँजिल
यात्रा में ठहरने का स्थान, पड़ाव।
संज्ञा
[अ. मंज़िल]

मँजिल
मकान, मन्दिर आदि का खण्ड।
संज्ञा
[अ. मंज़िल]

मँजीठ
एक लता जिसकी जड़ और डंठल से लाल रंग बनता है।
संज्ञा
[हिं. मजीठ]
मानहुँ मीन मँजीठ प्रेम रँग तैसेही गहि जैहै – २०३३।

मंजीर
धुँघरू, नूपुर।
संज्ञा
[सं.]
ढिग जरित भरि मंजीर इत-उत चरन पंकज रंग-2२८९।

मँजीरा
काँसे की छोटी कटोरियों की जोड़ी जिससे (संगीत में) ताल दी जाती है।
संज्ञा
[सं. मंजीर]
बाजत हुड़क मँजीरा नूपुर नाना भाँति नचायौ-सारा० ४०७।

मंजु
सुन्दर, सुकुमार, मनोहर।
वि.
[सं.]
मंजु मेचक मृदुल तनु अनुहरत भूषन भरनि १०-१०९।

मंजुल
सुन्दर, मनोहर।
वि.
[सं.]
मंजुल तारनि की चपलाई चित चतुराइ करसै री-१०-१३७।

मंजुल
नदी तट।
संज्ञा

मंछल
मच्छड़।
संज्ञा
[हिं. मच्छड]

मंजन
दाँत साफ करने का कोई चूर्ण।
संज्ञा
[सं. मञ्जन]

मंजन
स्नान।
संज्ञा
[सं. मञ्जन]

मँजना, मँजनो
माँजाजाना।
क्रि. अ.
[हिं. माँजना]

मँजना, मँजनो
अभ्यास होना।
क्रि. अ.
[हिं. माँजना]

मंजरि, मंजरिका, मंजरी
कल्ला कोंपल।
संज्ञा
[सं. मंजरी]

मंजरि, मंजरिका, मंजरी
आम, तुलसी जैसे वृक्षों में फूलों या फलों के स्थान में एक सींक में लगनेवाले दाने।
संज्ञा
[सं. मंजरी]
पुहुप मंजरी मुक्तन माला अँग अनुराग धरे-६८९।

मंजरित
मंजरी से युक्त।
वि.
[सं. मंजरी]

मँजाई
माँजने या मँजाने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
संज्ञा.
[हिं. मंजाना]

मजाना, मँजानो
माँजने को प्रवृत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. माँजना]

मँझला
बीच का।
वि.
[हिं. मँझ+ला]

मंझा
बीच का।
वि.
[सं. मध्य]

मंझा
बीच, मध्य।
संज्ञा
[सं. मध्य]

मंझा
पलँग, खाट।
संज्ञा
[सं. मंच]

मंझा
पतंग लड़ाने की डोर।
संज्ञा
[हिं. माँझा]

मँझार, मँझारि, मँझारी, मँझारे
बीच में।
क्रि. वि.
[सं. मध्य]
(क) सभा मँझार दुष्ट दुस्सासन द्रौपदि आनि धरी-१-१६। (ख) इंद्र एक दिन सभा मँझारि। बैठ्यौ हुतौ सिंहासन डारि-६-५। (ग) सब जादव सौं कह्यौ बैठिकै सभा मँझारी-१० उ०-१०५। (घ) इक दिन बैठे सभा मँझारे-४-५।

मँझोला
बीच का।
वि.
[हिं. मझोला]

मँझोला
मध्यम आकारवाला।
वि.
[हिं. मझोला]

मंड
उबले हुए चावल का माँड़।
संज्ञा
[सं.]

मंड
भूषा, सजावट।
संज्ञा
[सं.]

मंडइ, मंडई
झोपड़ी, कुटी।
संज्ञा
[सं. मंडप]

मंडइ, मंडई
बाजार, मंडी।
संज्ञा
[हिं. मंडा]

मंडत
सुसज्जित करता है।
क्रि. स.
[हिं. मंडना]
तुम्हरैं भजन सबहिं सिंगार। जो कोउ प्रीति करै पद-अंबुज, उर मंडत निरमोलक हार-१-४१।

मंडन
सजाना, सँवारना।
संज्ञा
[सं.]

मंडन
प्रमाण आदि देकर किसी कथन की पुष्टि करना।
संज्ञा
[सं.]

मंडना, मडनो
सजाना, सँवारना।
क्रि. स.
[सं. मंडन]

मंडना, मडनो
प्रमाण आदि देकर सिद्ध करना।
क्रि. स.
[सं. मंडन]

मंडना, मडनो
दलन-मर्दन करना।
क्रि. स.
[सं. मर्दन]

मंडप
विश्रामालय।
संज्ञा
[सं.]

मंडप
ऊपर से छाया और चारों ओर से खुला स्थान।
संज्ञा
[सं.]

मंडप
उत्सव, आयोजन आदि के लिए बनाया गया सुसज्जित स्थान।
संज्ञा
[सं.]
(क) नव फूलन के मंडप छाए-१७०३। (ख) लग्न लै जु बरात साजी उनत मंडप छाइ-१० उ०१३।

मंडप
चँदोबा।
संज्ञा
[सं.]

मंडपिका, मंडपी
छोटा मंडप।
संज्ञा
[सं. मंडप]

मंडर
मंडल।
संज्ञा
[सं. मंडल]

मंडरना, मंडरनो
मंडल बाँधकर या चारों ओर छाकर घेर लेना।
क्रि. अ.
[सं. मंडल]

मँडराइ, मँडराई
मंडल बाँध कर या चक्कर काट कर उड़ता है।
क्रि. अ.
[हिं. मँडराना]
हंस को मैं अंस राख्यौ काग कत मँडराइ-१० उ०-१३।

मँडराइ, मँडराई
मंडल या घेरा बाँधकर उड़ने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. मँडराना]

मँडराना, मँडरानो
मंडल बाँध कर या चक्कर काटकर उड़ना।
क्रि. अ.
[सं. मंडल]

मँडराना, मँडरानो
चारों ओर घूमना, परिक्रमा करना।
क्रि. अ.
[सं. मंडल]

मँडराना, मँडरानो
आस-पास घूमना।
क्रि. अ.
[सं. मंडल]

मँडरानी
आस-पास घूमती या चक्कर काटती रहती है।
क्रि. अ.
[सं. मंडल]
देखहु जाइ और काहू को हरियर सबै रहत मँडरानी-१०५७।

मँडरे
छा गया, घेर लिया।
क्रि. अ.
[सं. मंडल]
झाँझ ताल सुर मँडरे रँग हो हो होरी-2४१०।

मंडल
गोलाई, वृत्त।
संज्ञा
[सं.]
मंडल बाँधना - (१) गोलाई में चक्कर काटना। (२) चारों ओर छा जाना या घेरना।

मंडल
गोलाकार विस्तार।
संज्ञा
[सं.]

मंडल
बादलों आदि के कारण चंद्रमा या सूर्य के चारों ओर दिखायी देने वाला घेरा।
संज्ञा
[सं.]

मंडल
किसी वस्तु या अंग का गोल भाग।
संज्ञा
[सं.]
चलित कुंडल गंडमंडल-१-३०७।

मंडल
क्षितिज।
संज्ञा
[सं.]

मंडल
भूमि खंड।
संज्ञा
[सं.]
मथुरा मंडल भरत खंड निज धाम हमारो-१८६१।

मंडल
समूह, समाज।
संज्ञा
[सं.]
गोपिनि मंडल मध्य बिराजत।

मंडल
पहिया।
संज्ञा
[सं.]

मंडित
छाया हुआ।
वि.
[सं.]

मंडित
भरा हुआ।
वि.
[सं.]

मंडी
थोक बिक्री की जगह।
संज्ञा
[सं. मंडप]

मंडूक
मेंढक।
संज्ञा
[सं.]

मंत
मंत्र।
संज्ञा
[सं. मंत्र]

मंत
सलाह।
संज्ञा
[सं. मंत्र]

मंत
तंत-मंत-उद्योग, प्रयत्न।
यौ.

मंतव्य
विचार, मत।
संज्ञा
[सं.]

मंत्र
गुप्त सलाह।
संज्ञा
[सं.]

मंत्र
यज्ञादि के विधान-सूचक वैदिक वाक्य।
संज्ञा
[सं.]

मंडलाकार
गोल।
वि.
[सं.]

मँडलाना, मँडलानो
चक्कर काटते हुए उड़ना।
क्रि. अ.
[हिं. मँडराना]

मँडलाना, मँडलानो
चारो ओर घूमना।
क्रि. अ.
[हिं. मँडराना]

मँडलाना, मँडलानो
आस-पास फिरना।
क्रि. अ.
[हिं. मँडराना]

मंडली
समूह, समाज।
संज्ञा
[सं.]
ग्वाल मंडली में बैठे मोहन-४६७।

मंडली
ढेर, राशि।
संज्ञा
[सं.]
पुहुप मंडली तापर छायो-१००१।

मंडलीक
बारह राजाओं का अधिपति।
संज्ञा
[सं. मांडलीक]

मंडव, मंड़वा
मंडप।
संज्ञा
[सं. मंडप, प्रा मंडव]

मँडार
गड्ढा
संज्ञा
[सं. मंडल]

मंडित
विभूषित, अलंकृत, सजे हुए।
वि.
[सं.]
(क) ज्यौं माखी मृग-मद मंडित तन परिहरि पूय परै-१-१९८३ (ख) मुख मंडित रोरी रंग-१०-२४। (ग) गो-रज मंडित केस-४७८।

मंत्र
वे शब्द या वाक्य जिनका जाप विभिन्न देवताओं को संतुष्ट करने अथवा विभिन्न कामनाओं की पूर्ति के लिए किया जाता है।
संज्ञा
[सं.]
(क) माया मंत्र पढ़त मन निसि दिनि-१-४९। (ख) धन्य ऐसौ गुरू कान के लागत ही मंत्र दै आजु ही वह लखायौ-१२६८।

मंत्र
मंत्र-जंत्र (यंत्र)-जादू-टोना।
यौ.
साधन मंत्र-जंत्र उद्यम बल ये सब डारौ धोइ-१-२६२।

मंत्र
उपाय, उद्योग, प्रयत्न।
संज्ञा
[सं.]
(क) थकित भए कछ मंत्र न फुरई, कीन्हें मोह अचेत-१-२९। (ख) जातै रहै छत्रपन मेरौ, सोइ मंत्र कछु कीजै-१-२६९। (ग) मंत्रिनि नीकौ मंत्र बिचारचौ-९-९८।

मंत्रकार
मंत्र का रचयिता।
संज्ञा
[सं.]

मंत्रजल
जल जो मंत्र के प्रभाव से युक्तहो।
संज्ञा
[सं.]

मंत्रणा
सलाह, परामर्श।
संज्ञा
[सं.]

मंत्र - पूत
मंत्र पढ़ कर पवित्र किया हुआ।
वि.
[सं.]

मंत्र - पूत
मंत्र पढ़ कर फूँका हुआ।
वि.
[सं.]

मंत्रित
जो मंत्र के प्रभाव से संस्कृत हो।
वि.
[सं.]

मंत्रित्व
मंत्री का कार्य या पद।
संज्ञा
[सं.]

बात
छल-कपट का व्यवहार।
बात में आना - छल-कपट का व्यवहार न समझकर धोखा खा जाना।

बात
झूठ या बनावटी बचत, बहाना।

बात
बचन, निश्चय, प्रतिज्ञा, वादा।
बात का धनी (पक्का, पूरा) - दृढ़निश्चयी, ढ्रुढ़प्रतिज्ञ। बात का कच्चा (हेठा) - बात का निर्वाह न करनेवाला। बात पक्की करना - परस्पर दृढ़ निश्चय करना। बात पक्की होना - दृढ़ निश्चय होना। (अपनी) बात रखना - अपना निश्चय या वचन पूरा करना। बात हारना - वचन देना, प्रण करना।

बात
वचन का विश्वास या उसकी प्रतीति।
बात जाना - विश्वास न रह जाना। बात खोना - विश्वास खोना। बात बनी रहना - विश्वास बना रहना। बात हेठी होना - विश्वास न रह जाना।

बात
मान-मर्यादा, प्रतिष्ठा।
बात खोना - मान-र्मयादा नष्ट कर देना। बात जाना - मान-मर्यादा नष्ट हो जाना। बात बनना - मान-र्मयादा बनी रहना। बात बना लेना - मान-मर्यादा प्रतिष्ठित कर लेना। बात बिगड़ना - मान-मर्यादा न रह जाना। बात बिगाड़ना - मान-मर्यादा नष्ट कर देना। बात रखना (रख लेना) - मान-मर्यादा की रक्षा कर लेना। बात रहना ( रह जाना) - मान-मर्यादा बनी रह जाना।

बात
गुण, योग्यता, स्थिति संबंधी कथन।

बात
उपदेश, शिक्षा, सीख।

बात
रहस्य, गुप्त भेद।
बात खुलना (फूटना) - भेद ज्ञात होना।

बात
प्रशंसा-योग्य विषय।

बात
चमत्कार पूर्ण उक्ति।

मंत्री
परामर्शदाता।
संज्ञा
[स. मत्रिन्]

मंत्री
राजकाज में परामर्श देनेवाला, सचिव
संज्ञा
[स. मत्रिन्]
(क) मंत्री ज्ञान न औसर पावै कहत बात सकुचातौ-१-४०। (ख) मंत्री काम-क्रोध निज दोऊ अपनी अपनी रीति-१-१४१। (ग) पोच पिसुन लस दसन सभासद प्रभु अनंग मंत्री बिन भीति-2२२३।

मंत्री
शतरंज की एक गोटी।
संज्ञा
[स. मत्रिन्]

मंत्रेला
झाड़फूँक या तंत्र-मंत्र जानने वाला।
संज्ञा
[सं. मंत्र]

मंथन
मथना, बिलोना।
संज्ञा.
[सं.]

मंथन
लीन होकर या अवगाहन करके तत्वों की खोज करना।
संज्ञा.
[सं.]

मंथर
मंद, सुस्त।
वि.
[सं.]

मंथर
मूर्ख।
वि.
[सं.]

मंथरा
कैकेयी की दासी जिसके कहने से उसने राम को वन भिजवाया था।
संज्ञा
[सं.]

मंद
धीमा, सुस्त।
वि.
[सं.]
डुलत नहिं द्रुम-पत्र बेली थकित मंद समीर-६५८।

मंद
मूर्ख।
वि.
[सं.]
अहं ममता हमैं सदा लागी रहै, मोह मद-क्रोध जुत मंद कामी.-८-१६।

मंदग
धीरे धीरे चलने वाला।
वि.
[सं.]

मंदता
आलस्य।
संज्ञा
[सं.]

मंदता
धीमापन।
संज्ञा
[सं.]

मंदन
धीमे से, धीरे-धीरे।
क्रि. वि.
[सं. मंद]
(क) अरुन अधर छबि दसन बिराजत जब गावत कल मंदन-१८४१।

मंदबुद्धि
जिसकी बुद्धि हीन हो।
वि.
[सं.]

मंदभागी
अभागा, हतभाग्य।
वि.
[सं.]

मंदभाग्य
अभाग्य, दुर्भाग्य।
संज्ञा
[सं.]

मंदमति
मूर्ख।
वि.
[सं.]
(क) बसत सुरसरी तीर मंदमति कूप खनावै-2-९। (ख) मलिन मंदमति डोलत घर घर उदर भरन कै हेत-2-१५।

मंदर
एक पर्वत जिससे समुद्र मथा गया था।
संज्ञा
[सं.]
(क) मथि समुद्र सुर-असुरन कै हित मंदर जलधि धसाऊ-१०-२२१। ( ख ) मंदर डरत सिंधु पुनि काँपत फिरि जनि मथन करै-१०-१४२।

मंदर
स्वर्ग।
संज्ञा
[सं.]

मंदर
गंभीर ध्वनि या शब्द।
संज्ञा
[सं. मंद]

मंदर
धीमा, मंद।
वि

मंदरगिरि
मंदर पर्वत।
संज्ञा
[सं.]

मंदरा
नाटा, ठिगना।
वि.
[सं. मंदर]

मंदरा
एक बाजा।
संज्ञा
[सं. मंडल]

मंदराचल
मंदर पर्वत जिससे समुद्र मथा गया था।
संज्ञा
[सं.]
बासुकी नेति अरु मंदराचल रई.-८-८।

मंदरी
नाटी, ठिगनी।
वि.
[हिं. मँदरा]

मंदल
एक तरह का ढोल।
संज्ञा
[सं. मृदंग]

मंदहि
धीरे से, कोमलता के साथ।
क्रि. वि
[हिं. मंद]
नंद-नारि-आनन छुवै मंदहि-१०-१०७।

मंदार
एक वृक्ष।
संज्ञा
[सं.]
उर पर मंदार हार-2३६२।

मंदार
मंदर पर्वत।
संज्ञा
[सं.]

मंदिर, मंदिल, मंदिलरा
घर, महल, प्रासाद।
संज्ञा
[सं. मंदिर]
(क) तब पूछ्यौ , कुरपति है कहाँ ? कह्यौ, पांडु-सुत-मंदिर जहाँ-१-२८४। (ख) सुंदर नंद महर कै मंदिर-१०-३२।

मंदिर, मंदिल, मंदिलरा
देवालय, देवस्थान।
संज्ञा
[सं. मंदिर]

मंदिर, मंदिल, मंदिलरा
एक तरह का ढोल।
संज्ञा
[सं. मृदंग]

मंदी
सस्तापन।
संज्ञा
[हिं. मंद]

मंदे
जहाँ भाव सस्ते हों।
वि.
[हिं. मंदा]
मुक्ति आनि मंदे मो मेली-३१४४।

मंदो
सस्ता भाव।
संज्ञा
[हिं. मंदा]
मंदो परयो सिधाउ अनत लै यहि निर्गुन मत तेरौ-३१४३।

मंदोदरी
रावण की पटरानी जो मय दानव की पुत्री थी।
संज्ञा
[सं.]

मंद
गंभीर ध्वनि।
संज्ञा
[सं.]

मंदा
धीमा, मंद।
वि.
[सं. मंद]

मंदा
ढीला।
वि.
[सं. मंद]

मंदा
सस्ता।
वि.
[सं. मंद]

मंदा
खराब।
वि.
[सं. मंद]

मंदा
बिगड़ा हुआ।
वि.
[सं. मंद]

मंदाकिनि, मंदाकिनी
गंगा की वह धार जो स्वर्ग में मानी गयी है।
संज्ञा
[सं. मंदाकिनी]

मंदाकिनि, मंदाकिनी
आकाश गंगा।
संज्ञा
[सं. मंदाकिनी]

मंदाकिनि, मंदाकिनी
चित्रकूट के पास की वह नदी जो ‘पयस्विनी' कहलाती है।
संज्ञा
[सं. मंदाकिनी]

मंदाग्नि
अन्न न पचने का रोग।
संज्ञा
[सं.]

मंदार
स्वर्ग का एक देववृक्ष।
संज्ञा
[सं.]

मंद
संगीत में स्वर का एक भेद।
संज्ञा
[सं.]

मंद
सुन्दर, मनोहर।
वि.

मंद
गंभीर।
वि.

मंसना, मंसनो
संकल्प करना।
क्रि. स
[सं. मनस]

मंसब
पदवी।
संज्ञा
[अ.]

मंसब
अधिकार।
संज्ञा
[अ.]

मंसा
इच्छा।
संज्ञा
[अ. मंशा]

मंसा
संकल्प।
संज्ञा
[अ. मंशा]

मंसा
अभिप्राय, तात्पर्य।
संज्ञा
[अ. मंशा]

मइ
मैं।
सर्व.
[हिं. मैं]

मकरंद
फूल का केसर, किंजल्क।

मकर
मगर या घड़ियाल नामक जलजंतु जो कामदेव की ध्वजा का चिन्ह और गंगा का वाहन है।
संज्ञा
[सं.]
सुधा-सर जनु मकर क्रीड़त-६२७।

मकर
एक राशि।
संज्ञा
[सं.]

मकर
एक लग्न।
संज्ञा
[सं.]
भाग्य भवन मैं मकर महीसुत बहु ऐश्वर्य बढ़ैहै-१०-८।

मकर
एक निधि।
संज्ञा
[सं.]

मकर
मछली।
संज्ञा
[सं.]

मकरकेतु
कामदेव।
संज्ञा
[सं.]

मकरध्वज
कामदेव।
संज्ञा
[सं.]
मनहुँ खेलत हैं परस्पर मकरध्वज द्वै म न-३५३।

मकरपति
कामदेव।
संज्ञा
[सं.]

मकरपति
ग्राह।
संज्ञा
[सं.]

मकरसंक्रांति
वह समय जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है।
संज्ञा
[सं.]

मकराकृत
मकर' के आकार का।
वि.
[सं.]
मोर मुकुट मकराकृत कुंडल-५०७।

मकरालय
समुद्र।
संज्ञा
[सं.]

मकरी
मादा मगर।
संज्ञा
[सं.]

मकान
घर।
संज्ञा
[फ़ा.]

मकान
वासस्थान।
संज्ञा
[फ़ा.]

मकु
चाहे।
अव्य.
[सं. म]

मकु
बल्कि।
अव्य.
[सं. म]

मकु
शायद।
अव्य.
[सं. म]

मकुना
छोटा।
वि.
[सं. मनांक]

मइका
माँ का घर।
संज्ञा
[हिं. मायका]

मइमत
मतवाला।
वि.
[हिं. मैमंत]

मइया
माँ, माता।
संज्ञा
[हिं. मैया]
बाबा नंद जसोदा मइया मिले सबन हित आइ-३४४४।

मई
एक प्रत्यय जो तद्रूप, विकार प्राचुर्य आदि के अर्थ में शब्दांत में जुड़ता है।
प्रत्य.
[हिं. मयी]
(क) पद-नख-चंद चकोर बिमुख मन खात अँगार मयी-१-२९९। (ख) उठि न गई हरि संग तबहिं तें ह्वै न गई सखि स्याममई-2५३७। (ग) पाती लिखत बिरह तनु ब्याकुल कागर ह्वै गयौ नीर मई-३४१७।

मउर
मुकुट या मौर जो दूल्हे के सिर पर पहनाया जाता है।
संज्ञा
[हिं. मौर]

मकड़ी
एक प्रसिद्ध कीड़ा जो जाला तान कर दूसरे कीड़े फँसाती और उन्हें खाकर जीवित रहती है।
संज्ञा
[सं. मर्कटक]

मकना
छोटा।
वि.
[हिं. मकुना]

मकना
नाटा।
वि.
[हिं. मकुना]

मकबरा
इमारत जिसमें किसी की कब हो, रौजा, मजार।
संज्ञा
[अ. मक़बरा]

मकरंद
फूलों का रस।
संज्ञा
[सं.]
(क)-कृष्न पद मकरंद पावन और नहिं सरबरन-१- ० ३०८। (ख) इच्छा सौं मकरंद लेत मनु अलि गोलक के वेष री-१०-१३६।

मक्कारी
छल।
संज्ञा
[अ.]

मक्कारी
नखरा।
संज्ञा
[अ.]

मक्खन
नैनूँ , नवनीत।
संज्ञा
[सं.मंथज]
कलेजे पर मक्खन मला जाना - बहुत सुख - संतोष होना।

मक्खी
एक प्रसिद्ध कीड़ा।
संज्ञा
[सं. मक्षिका]
जीती मक्खी निगलना - जानूबझ कर अनुचित कार्य या पाप करना। नाक पर मक्खी न बैठने देना - अभिमान के कारण किसी को अपने ऊपर एहसान करने का अवसर न देना। मक्‍खी की तरह निकाल ( फेंक ) देना - ऐसा अलग करना कि किसी प्रकार का संबंध न रखना। मक्खी छोड़ हाथी निगलना - छोटी भूल से बचकर घोर पाप करना। मक्खी मारना - खाली या निठल्ला रहना।

मक्खीचूस
बहुत ही कंजूस।
वि.
[हिं. मक्खी + चूसना]

मक्षिका
मक्खी।
संज्ञा
[सं.]

मख
यज्ञ।
संज्ञा
[सं.]

मखतूल
काला रेशम।
वि.
[सं. महर्घतूल]

मखनिया
मक्‍खन निकला हुआ।
वि
[हिं. मक्खन]

मखमल
एक बढ़िया कपड़ा।
संज्ञा
[अ. मखमल]

बातैं
कथन, बोल।
संज्ञा
[हिं. बात]
बातैं न पूछना - खोज - खबर न लेना। न पूछी बातैं - खोज-खबर तक न ली। उ. - ज्यों मधुकर अंबुज रस चाख्यो बहुरि न पूछी बातैं आइ-३०५३। बातैं बनाना - झूठी-सच्ची बातें करना। कहा बनावत बातैं - क्यों झूठी-सच्ची बातें करते हो। उ. - फिरि-फिरि कहा बनावत बातैं-३१२१। बातैं मिलाना - प्रसन्न करने के लिए सुहाती बातें करना। बातैं मिलवति जोरि - प्रसन्न करने के लिए सुहाती बातें गढ़गढ़ कर कहता है। उ. - मैं जानति उनके ढँग नीके बातैं मिलवति जोरि-८६७।

बातैं
चर्चा, प्रसंग, जिक्र।
संज्ञा
[हिं. बात]
बात चलाना - नया प्रसंग या विषय छेड़ना, चर्चा चलाना। बातैं चालीं - चर्चा छेड़ी। उ. - ऊधौ, कत ये बात चालीं। कछु मीठी कछु करुई हरि की अन्तर में सब साली-३८२३।

बातौ
कथन, वचन।
संज्ञा
[हिं. बात]
कहत अलि तेरे मुख बातौ-३३१९।

बाद
तर्क, बहस।
संज्ञा
[सं. वाद]
कहा एतौ बाद ठानै देखि गोपी भोग-३१२६।

बाद
हुज्जत, विवाद, तर्क-कुतर्क।
संज्ञा
[सं. वाद]
बाद करति अबही रोवहुगी बार-बार कहि दई दई-१०४७।

बाद
शर्त, बाजी।
संज्ञा
[सं. वाद]

बाद
वाद-विवाद - तर्क-वितर्क।
यौ.
मिथ्या बाद-बिवाद छाँड़ि दै, काम-क्रोध-मद-लोभहि परिहरि-१-३१२।
बाद मेलना - शर्त बदना।

बाद
व्यर्थ, बिना मतलब।
अव्य.

बाद
पीछे, अनंतर, पश्चात्।
अव्य.
[अ.]

बाद
छोड़ा या अलग किया हुआ।
वि.

मकुना
छोटा। नाटा।
वि.
[सं. मनांक]

मकुनि, मकूनी
चने और गेहूँ अथवा मटर के आटे की रोटी।
संज्ञा
[देश.]
मीठे तेल चना की भाजी। एक भकनी दै मोहिं साजी।

मकोइ, मकोई
काँटेदार मकोय (वृक्ष)।
संज्ञा
[हिं. मकोय]

मकोय
एक पौधा और उसका फल।
संज्ञा
[सं. काकभाटा]

मकोरना, मकोरनो
मरोड़ना।
क्रि. स.
[हिं, मरोड़ना]

मक्कर
छल-कपट।
संज्ञा
[अ. मक]

मक्कर
छल-कपट। नखरा।
संज्ञा
[अ. मक]

मक्‍का
बड़ी ज्वार।
संज्ञा
[देश.]

मक्कार
छली, कपटी।
वि.
[अ.]

मक्कार
नखरीला।
वि.
[अ.]

मखशाला
यज्ञशाला।
संज्ञा
[सं.]

मखाना
तालमखाना।
संज्ञा
[हिं. तालमखाना]

मखियाँ
मक्खी।
संज्ञा
[हिं. मक्खी]
झाँकति झपति झरोखा बैठो कर मोड़त ज्यौं मखियाँ-2७६६।

मखोना
एक तरह का कपड़ा।
संज्ञा
[देश.]

मखौल
हँसी-ठट्ठा।
संज्ञा
[देश.]

मखौलिया
हँसोड़।
वि.
[हिं. मखौल]

मग
रास्ता, राह।
संज्ञा
[सं. मार्ग, प्रा. मग्ग]
(क) भूल्यौ फिरत सकल जल-थल-मग-१-४८। (ख) नैननि मग निरखि बदन सोभा रस पीजै-2७९९।
मग जोहना - प्रतीक्षा करना। मग जोवत - आसरा देखता है, प्रतीक्षा करता है। उ. - (क) परस्यौ थाल धरयो, मग जोवत-१०- २२३। (ख) अवधि गनत इकटक मग जोवत तब ए इत्यो नहिं झूखी-३०२९। (ग) कबहुँ कहत ब्रजनाथ बन गए जोवत मग भई दृष्टि झाँवरी-३४४८।

मगज
दिमाग।
संज्ञा
[अ. मग्ज]

मगज
मींगी।
संज्ञा
[अ. मग्ज]

मगण
वह 'गण' जिसमें तीन गुरु होते हैं।
संज्ञा
[सं.]

मगद
एक मिठाई।
संज्ञा
[सं. मुद्ग]

मगदर, मगदल
एक तरह का लड्डू।
संज्ञा
[सं. मुद्ग]

मगदा
मार्ग दिखानेवाला।
वि.
[सं. मग+ दा]

मगन
डूबा हुआ।
वि.
[सं. मग्न]
(क) आनँद मगन राम गुन गावै-१-३९। (ख) सुत कुबेर के मत्त मगन भए विषै रस नैननि छाए-१-७

मगन
बहुत प्रसन्न।
वि.
[सं. मग्न]

मगन
लीन, तन्मय।
वि.
[सं. मग्न]
(क) जैसे मगन नाद-रस सारँग बधत बधिक बिन बान-१-१६९। (ख) मम सरूप जो सब घट जान। मगन रहै तजि उद्यम आन-३-१३।

मगन
मूर्छित।
वि.
[सं. मग्न]

मगनता
लीनता, तन्मयता।
संज्ञा
[सं. मग्न + हिं. ता]

मगनता
हर्ष, आनन्द।
संज्ञा
[सं. मग्न + हिं. ता]

मगना, मगनो
लीन या तन्मय होना।
क्रि. अ.
[सं. मग्न]

मगना, मगनो
डूबना।
क्रि. अ.
[सं. मग्न]

मगना, मगनो
लीन, तन्मय।
वि.

मगना, मगनो
डूबा हुआ।
वि.
काहि उठाइ गोद करि लीजौ करि करि मन मगना-2५४७।

मगर
घड़ियाल।
संज्ञा
[सं. मकर]

मगर
मछली।
संज्ञा
[सं. मकर]

मगर
लेकिन, परन्तु।
अव्य.
[फा.]
अगर-मगर करना-टाल-टूट करना।

मगरमच्छ
घड़ियाल।
संज्ञा
[हिं. मगर + मच्छ]

मगरमच्छ
मछली।
संज्ञा
[हिं. मगर + मच्छ]

मगसिर
अगहन मास।
संज्ञा
[सं. मार्गशीर्ष]

मगह, मगहय, मगहर
मगध देश।
संज्ञा
[सं. मगध]

मगही
मगध देश का।
वि.
[हिं. मगह]

मगु, मग्ग
राह, रास्ता।
संज्ञा
[सं. मार्ग]
जैसे फिरत रंध्र मगु कँगुरी तैसे मैंहु फिराऊँ.-पृ. ३११ (११)।

मग्न
डूबा हुआ।
वि.
[सं.]
भव अगाध जल मग्न महा सठ तजि पद कल रह्यौ-१-२०१।

मग्न
लीन, तन्मय।

मग्न
प्रसन्न।

मग्न
नशे में चूर।

मघई
मगध देश का।
वि
[हिं. मगही]

मघवा
इंद्र।
संज्ञा
[सं. मघवन्]
मानौ नव धन ऊपर राजत मधवा धनुष चढ़ाई-१०-१०८।

मघवाप्रस्थ
इंद्रप्रस्थ' नामक नगर।
संज्ञा
[सं.]
फिरि आए हस्तिनपुर पारथ मघवाप्रस्थ बसायो।

मघवारिपु
इंद्र का शत्रु मेघनाद।
संज्ञा
[सं.]

मघा
एक नक्षत्र।
संज्ञा
[सं.]

मघोनी
इंद्र की पत्नी।
संज्ञा
[सं. मघवन]

मघौना
इंद्र।
संज्ञा
[सं. मघवा]

मचक
दाब, दबाव।
संज्ञा
[हिं. मचकना]

मचकना, सचकनो
मच-मच’ शब्द करके दबना, झटके से हिलना।
क्रि. अ.
[हिं. मच मच]

मचकना, सचकनो
किसी चीज को इस तरह दबाना कि ’मच-मच' शब्द हो।
क्रि. स.

मचका
झटका, झोंका।
संज्ञा
[हिं. प्रचक]

मचका
झूले का पेंग।
संज्ञा
[हिं. प्रचक]

मचत
झटके से या झोंका देकर हिलाते या झूले के पेंग भरते हैं।
क्रि. अ.
[हिं. मचना]
(क) कबहुँ रहँसत मचत लै सँग एक एक सहेलि-2२७८। (ख) यह सुनि हँसत मचत अति गिरिधर डरत देखि अति नारि-2२८२।

मचति
झोंका या झटका देकर हिलाती या झूले के पेंग भरती है।
क्रि. अ.
[हिं. मचना]
कोउ संग मचति कहत कोउ मचिहौं उपजी रूप अगाध २२८२।

मचना, मचनो
शोर-गुल के साथ काम शुरू होना।
क्रि. अ.
[अनु.]

मचना, मचनो
फैल या छा जाना।
क्रि. अ.
[अनु.]

मचना, मचनो
मच-मच' शब्द करके या झोंके से हिलना।
क्रि. अ.
[हिं. मचकना]

मचमचाना, मचमचानो
दबना या दबाना जिससे मच-मच' शब्द हो।
क्रि. अ. क्रि. स.
[अनु.]

मचल
मचलने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. मचलना]

मचलना, मचलनो
हठ या जिद करना।
क्रि, अ.
[अनु.]

मचला
जिद्दी, हठीला, अड़ पर डटा रहने वाला।
वि.
[हिं. मचलना]
मचला अकलैमूल पातर खाउँ खाउँ कर भूखा-१-१८६।

मचलाई
मचलने की क्रिया-या भाव, मचल।
संज्ञा
[हिं. मचलना]

मचलाना, मचलानी
जी मतलाना।
क्रि. अ.
[अनु.]

मचलाना, मचलानी
किसी को मचलने के लिए प्रवत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. मचलना]

मचलाना, मचलानी
हठ या जिद करना, अड़ना।
क्रि. अ.
[हिं. मचलना]

मचलि
हठ करके।
क्रि, अ.
[हिं. मचलना]

मचलि
मचलि जाइगी-जिद करने लगेगी, हठ पकड़ लेगी।
प्र.
अबहिं मचलि जाइगी तब पुनि कैसे मोसौं जाति बुझाई-१२५७।

मचवा
खटिया।
संज्ञा
[सं. मंच]

मचवा
चौकी या खाट का पावा।
संज्ञा
[सं. मंच]

मचवा
नाव।
संज्ञा
[सं. मंच]

मचाई
फैलायी, छा दी।
क्रि. स.
[हिं. मचाना]
नाचत बृद्ध तरुन अरु बालक गोरस कीच मचाई.-१०-२१।

मचाई
मचाकर, (शोर) करके।
क्रि. स.
[हिं. मचाना]
बालक सब नंदहि सँग धाए ब्रज-घर जहँ तहँ सोर मचाई-५४४।

मचाँग, मचान
शिकार खेलने के लिए पेड़ पर बनाया गया ऊँचा स्थान।
संज्ञा
[सं. मंच+ हिं. आन, हिं.मचान]

मचाँग, मचान
ऊँची बैठक।
संज्ञा
[सं. मंच+ हिं. आन, हिं.मचान]

मचाना, मचानो
शोर-गुल के साथ काम शुरू करना।
क्रि. स
[हिं. मचना]

मचाना, मचानो
फैलाना, छा देना।
क्रि. स
[हिं. मचना]

मचायौ
(शोर-गुल) फैला दिया, (हुल्लड़) किया।
क्रि. स.
[हिं. मचाना]
ब्रज बीथिनि पुर गलिनि घरै घर घाट-बाट सब सोर मचायौ-१०-३४०।

मचावत
(शोर-गुल आदि) करता है।
क्रि. स.
[हिं. मचाना]
फिरत जहाँ तहाँ दुंद मचावत ३७७।

मचिया
पोढ़ी, खटोली।
संज्ञा
[सं. मंच]

मचिलई
मचलने का भाव।
संज्ञा
[हिं. मचलना]

मचिहौं
झटका या झोंका दूँगी।
क्रि. अ.
[हिं. मचना]
कोउ संग मचति कहति कोउ मचिहौं उपजौ रूप अगाध.-2२८२।

मची
फैली, छा गयी।
क्रि. अ.
[हिं. मचना]
कुमकुम कीच मची धरनी पर-2४१०।

मचौ
कोंका दो, पेंग भरो।
क्रि. अ.
[हिं मचना]
अब जिनि मचौ पाँय लागति हौं मोकौं देहु उतारि-2२८२।

मच्छ
मछली।
संज्ञा
[सं, मत्स्य, प्रा. मच्छ]
मच्छ-बास ताकी सब हरी-१-१२९।

मच्छ
विष्णु का पहला अवतार जिसमें शरीर का निचला भाग रोहू मछली जैसा और ऊपरी मनुष्य का था।
मच्छ कच्छ बाराह बहुरि नरसिंह रूप धरि-2-३६।

मच्छड़, मच्छर
एक छोटा पतिंगा।
संज्ञा
[सं. मशक, हिं. मच्छड़]

मच्छर
ईर्ष्या, द्वेष।
संज्ञा
[सं. मत्सर]

मच्छरता
ईर्ष्या, द्वेष।
संज्ञा
[सं मत्सर+ता]

मच्छी
मछली।
संज्ञा
[हिं. मछली]

मच्छीमार
मछुआ।
संज्ञा
[हिं. मछली+मार]

मच्छोदरि, मच्छोदरी
शांतनु की पत्नी सत्यवती जो व्यास जी की माता थी।
संज्ञा
[सं. मत्स्योदरी]
सत्यवती मच्छोदरि नारी। गंगा-तट ठाढ़ी सुकुमारी-१-२२९।

मच्यौ
फैल गया, छा गया, भर गया।
क्रि. अ.
[हिं. मचना]
ब्रज घर-घर सुख सिंधु मच्यौ री-६०६।

मछ
मछली।
संज्ञा
[सं. मत्स्य, हिं. मच्छ]
कह्यौ, मछ बचन किहिं भाँति भाष्यौ-८-१६।

मछली
मीन, मत्स्य।
संज्ञा
[सं. मत्स्य, प्रा. मच्छ]

बहना
बोभा ढोना।
क्रि. अ.
[सं. वहन]

बहना
(गाड़ी आदि) खींचकर ले चलना।
क्रि. अ.
[सं. वहन]

बहना
धारण करना।
क्रि. अ.
[सं. वहन]

बहना
(हाथ या वार) उठना या चलना।
क्रि. अ.
[सं. वहन]

बहनापा
बहिन का संबंध।
संज्ञा
[हिं. बहिन+आपा]

बहनि, बहनी
आग, अग्नि।
संज्ञा
[सं. बह्नि]
(क) वै कहियत उडुराज अमृत मैं तजि स्वभाव मोंहि बहनि बहत-2८५८। (ख) तुम कहियत उडुराज अमृतमय तजि सुभाउ बर्षत कह बहनी-१० उ०-९३।

बहनु
सवारी।
संज्ञा
[सं. बहन]

बहनोई
बहन का पति।
संज्ञा
[सं. भगिनी-पति]

बहनौता
बहन का पुत्र।
संज्ञा
[सं. भगिनी-पुत्र]

बहनौरा
बहन की ससुराल।
संज्ञा
[हिं. बहन+औरा]

बात
गूढ़ उद्देश्य या अर्थ।

बात
विशेषता, खूबी।

बात
ढंग।

बात
समस्या, प्रश्न।

बात
आशय, विचार।

बात
इच्छा कामना।

बात
कार्य, व्यवहार।

बात
संबंध।

बात
लक्षण, प्रकृति।

बात
पदार्थ, वस्तु।

मछवा, मछुआ, मछुवा
मछली मारनेवाला।
संज्ञा
[हिं. मछली+उआ]

मजदूर
बोझा ढोने या छोटामोटा काम करने वाले।
संज्ञा
[फा. मज़दूर]

मजदूरी
बोझा ढोने का काम।
संज्ञा
[हिं. मजदूर+ ई]

मजदूरी
काम के पारिश्रमिक स्वरूप मिलने वाला धन।
संज्ञा
[हिं. मजदूर+ ई]

मजना, मजनो
डूबना निमज्जित होना।
कि. अ.
[सं. मञ्‍जन]

मजना, मजनो
अनुरक्त होना।
कि. अ.
[सं. मञ्‍जन]

मजनूँ
लैला' का प्रसिद्ध प्रेमी।
संज्ञा
[अ.]

मजनूँ
प्रेमी।
संज्ञा
[अ.]

मजनूँ
दीवाना।
संज्ञा
[अ.]

मजनूँ
बहुत दुबला-पतला।
संज्ञा
[अ.]

मजबूत
पक्का।
वि.
[अ. मज़बूत]

मजबूत
अचल, स्थिर।
वि.
[अ. मज़बूत]

मजबूत
बलवान।
वि.
[अ. मज़बूत]

मजबूती
पक्कापन।
संज्ञा
[हिं. मजबूत]

मजबूती
ताकत, बल।
संज्ञा
[हिं. मजबूत]

मजबूती
साहस।
संज्ञा
[हिं. मजबूत]

मजबूर
विवश, लाचार।
वि.
[अ.]

मजबूरी
लाचारी, विवशता।
संज्ञा
[हिं. मजबूर]

मजमा
भीड़भाड़, जमाव।
संज्ञा
[अ.]

मजमून
विषय।
संज्ञा
[अ. मजमून]

मजमून
लेख।
संज्ञा
[अ. मजमून]

मजलिस
सभा।
संज्ञा
[अ.]

मजलिस
महफिल।
संज्ञा
[अ.]

मजहब
संप्रदाय, पंथ, मत।
संज्ञा
[अ. मजहब]

मजहबी
मत या संप्रदाय-संबंधी।
वि.
[हिं. मजहब]

मजा
स्वाद।
संज्ञा
[फ़ा. मजः]
मजा चखाना - अपराध या अनुचित व्यवहार का दण्ड देना। ( किसी चीज का ) मजा पड़ना - चसका लगना।

मजा
आनंद, सुख।
संज्ञा
[फ़ा. मजः]
मजा उड़ाना (लूटना) - सुख भोगना। मजा किरकिरा होना - सुख में बाधा पड़ना।

मजा
हँसी, दिल्लगी।
संज्ञा
[फ़ा. मजः]
मजा आ जाना - हँसी - दिल्लगी का प्रसंग उपस्थित होना। मजा देखना ( लेना) - तमाशा देखना।

मजाक
हँसी, दिल्लगी, ठिठोली।
संज्ञा
[अ. मज़ क़]
मजाक उड़ाना - उपहास करना।

मजार
कब्र।
संज्ञा
[अ.]

मजार
मकबरा।
संज्ञा
[अ.]

मजारी
बिल्ली।
संज्ञा
[हिं. माजारी]

मजाल
शक्ति, सामर्थ्य।
संज्ञा
[अ.]

मजी
अनुरक्त हुई।
क्रि . अ.
[हिं. मजना]
मानत नहीं लोक मर्यादा हरि के रंग मजा-११७३।

मजीठ
एक लता जिसके डंठलों से लाल रंग तैयार होता है।
संज्ञा
[सं. मंजिष्ठा]
सीचिय मजीठ जैसी निकट काटी पाई.-३२०९।

मजीर
मंजरी, गौद।
संज्ञा
[सं. मंजरी]
करि कुंभ कुंजर बिटप भारी चमर चारु मजीर।

मजीरा
काँसे की ठोस कटोरियों की जोड़ी जिसको बजाकर संगीत में ताल दी जाती है।
संज्ञा
[सं. मंजीर]

मजूर, मजूरा
मोर।
संज्ञा
[सं. मयूर]

मजूर, मजूरा
मजदूर।
संज्ञा
[हिं. मजदूर]

मजूरी
मजदूरी।
संज्ञा
[हिं. मजदूर]

मजेदार
स्वादिष्ट।
वि.
[फ़ा. मजेदार]

मजेदार
बढ़िया।
वि.
[फ़ा. मजेदार]

मजेदार
जिसमें मजा या आनन्द मिलता हो।
वि.
[फ़ा. मजेदार]

मज्ज
हड्डी या नली के भीतर का भेजा या गूदा।
संज्ञा
[सं. मज्जा]

मज्जत
डूबता हुआ, जो डूबने की स्थिति में हो।
वि.
[हिं. मज्जना]
अब मोहिं मज्जत क्यों न उबारो-१-२०९।

मज्जन
नहाना, स्नान।
संज्ञा
[सं. मञ्जन]

मज्जना, मज्जनो
नहाना, स्नान करना।
क्रि. अ.
[सं. मञ्‍जन]

मज्जना, मज्जनो
डूबना, निमग्न होना।
क्रि. अ.
[सं. मञ्‍जन]

मज्जा
हड्डी का भीतरी गूदा।
संज्ञा
[सं.]

मज्झ, मझ
बीच,मध्य।
क्रि. वि.
[सं. मध्य, प्रा. मज्झ]

मझवार
नदी,सरोवर आदि का बीच।
संज्ञा
[हिं. मध्य +धार]

मझवार
काम की अपूर्णता की स्थिति।
संज्ञा
[हिं. मध्य +धार]
मझधार में छोड़ना - ( १) अधूरे काम को छोड़ना। (२) बीच में ही छोड़ देना।

मझला
बीच का।
वि.
[सं. मध्य, प्रा. मज्झ+ ला]

मझाना, मझानो
बीच या मँझधार में घँसाना।
क्रि. स.
[सं. मध्य]

मझाना, मझानो
पैठना, प्रविष्ट होना।
क्रि. अ.

मझार, मझारि, मझारी, मझारे
बीच में, में, भीतर।
क्रि.वि.
[सं. मध्य, प्रा.मज्झ + हिं. आर, हिं. मशार]

मझावना; मझावनो
पैठना, प्रविष्ट होना।
क्रि. अ.
[हिं. मझाना]

मझावना; मझावनो
धँसाना, प्रविष्ट कराना।
क्रि. स.
[हिं. मझाना]

मझियाना, मझियानो
नाव खेना।
क्रि. अ.
[हिं माँझी+इयाना]

मझियाना, मझियानो
बीच या मध्य से निकलना।
क्रि. अ.
[सं. मध्य + इयाना]

मझियाना, मझियानो
बोच से होकर निकालना।
कि. स.
[सं. मध्य + इयाना]

मभियारा
बीच का।
वि.
[सं. मध्य, प्रा. मज्झ + इयारा]

मझोला
बीच का।
वि.
[हिं. मझला]

मट
मटका, मटकी।
संज्ञा
[हिं. मटका]

मटक
गति,चाल।
संज्ञा
[सं. मट = चलना+क]
मुकुट लटकि अरु भृकुटी मटक देखौ कुंडल की चटक सौं अटकि परी दुगनि लपट-८३९।

मटक
मटकने की क्रिया का भाव।
संज्ञा
[सं. मट = चलना+क]
लटकि निर्खन लग्यौ मटक सब भूलि गयौ हटक ह्वैकै गयौ गटकि सिला सो रह्यौं मीचु जाती-2६०९।

मटकत
अंग लचकाते या मटकाते (ही )।
क्रि. अ.
[हिं. मटकना]
मटकत गिरी गागरी सिर तें-८६६

मटकन
मटकने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. मटकना]
मुकुट लटकनि भृकुटि मटकन धरे नटवर अंग-१७४२।

मटकना, मटकनो
अंग लचकाकर नखरे के साथ चलना।
क्रि. अ.
[हिं. मटक]

मटकना, मटकनो
नेत्र, भृकुटी आदि अंगों को ऐसे चलाना जिससे लचक या नखरा जान पड़े।
क्रि. अ.
[हिं. मटक]

मटकना, मटकनो
वापस आना।
क्रि. अ.
[हिं. मटक]

मटकना, मटकनो
हिलना-डोलना।
क्रि. अ.
[हिं. मटक]

मटकनि
गति, चाल।
संज्ञा
[हिं. मटकना]

मटकनि
मटकने का भाव।
संज्ञा
[हिं. मटकना]
(क) मोर पंख सिर-मुकुट की मुख-मटकनि की बलि जाउँ-४५१। (ख) रसिक रंग भौंहनि की मटकनि-५१८।

मटकनि
नखरा।
संज्ञा
[हिं. मटकना]

मटका
घड़ा, माट।
संज्ञा
[हिं. मिट्टी]

मटकाना, मटकानो
नेत्र, भृकुटि आदि अंगों का नखरे के साथ संचालन करना।
क्रि. स.
[हिं. मटकना]

मटकाना, मटकानो
मटकने को प्रवत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. मटकना]

मटकावै
नखरे के साथ अंग चमकाती है।
क्रि. स.
[हिं. मटकाना]
चमकति चलै बदन मटकावै ऐसी जोबन जोरी-१६२१।

मटकियो
हिली-डुली।
क्रि. अ.
[हिं. मटकना]
गहि पटकि पुहुमि पर नेक नहिं मटकियो दंत मनु मृनाल से ऐंचि लीन्हे-2५९६।

मटमैला
मिट्टी के रंग का।
वि.
[हिं. मिट्टी + मैला]

मटर
एक अन्न।
संज्ञा
[सं. मधुर]

मटरगश्त, मटरगश्ती
धीरे-धीरे घूमना।
संज्ञा
[हिं. मट्ठर=मंद+फा. गश्त]

मटरगश्त, मटरगश्ती
सैर सपाटा।
संज्ञा
[हिं. मट्ठर=मंद+फा. गश्त]

मटरी
एक नमकीन पकवान।
संज्ञा
[देश.]
पिस्ता दाख बदाम छुहारा खुरमा खाझा गूँझा मटरी-८१०।

मटिआना, मटिश्रानो, मटियाना, मटियानो
मिट्टी से माँजना या मलना।
क्रि.स.
[हिं. मिट्टी+आना]

मटिआना, मटिश्रानो, मटियाना, मटियानो
टालना, सुनी-अनसुनी करना।
क्रि.स.
[हिं. मिट्टी+आना]

मटिया
मिट्टी।
संज्ञा
[हिं. मिट्टी]

मटिया
शव, लाश।
संज्ञा
[हिं. मिट्टी]

मटियामसान
नष्टप्राय।
वि.
[हिं. मटिया+मसान]

मटकी
छोटा मटका, कमोरी।
संज्ञा
[हिं. मटका]
कोरी मटकी दही जमायौ।

मटकी
मटकाने का भाव।
संज्ञा
[हिं. मटकाना]

मटकी
हिली-जुली।
क्रि. अ.
उतर न देत मोहिनी मौन ह्वै रही री सुनि सब बात नैकहूँ न मटकी।

मटकी
भुकुटी, नेत्र, हाथ आदि अंग चमका कर या चमकाने लगी।
क्रि. अ.
( क ) मुख मुख हेरि तरुनि मुसकानी नैन सैन दै दै सब मटकी-११०५। (ख) बात करत तुलमी मुख मैले सयन दै मुँह मटकी-१३०१।

मटकीला
नखरे दिखानेवाला।
वि.
[हिं. मटकना]

मटके
लौटे, फिरे, हटे।
क्रि. अ.
[हिं. मटकना]
नैना बहुत भाँति हटके। बुधि बल छल उपाइ करि थाकी नेक नहीं मटके-पृ.३३६ (५२)।

मटकैं
मटकने या नखरे दिखाने (से)।
क्रि. अ.
[हिं. मटकना]
सूरदास सोभा क्यौ पावै पिय बिहीन धनि मटकैं-१-२९२।

मटकौअल, मटकौवल
मटकने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. मटकना +औवल]

मटक्यो, मटक्यौ
हटे, लौटे, फिरे।
क्रि. अ.
[हिं. मटकना]
स्याम सलोने रूप में अरी मन अरयौ। ऐसे ह्वै लटक्यौ तहाँ ते फिरि नहिं मटक्यौ बहुत जतन मैं करयो-१४८९।

मटक्यो, मटक्यौ
हिला-डुला, विचलित हुआ।
क्रि. अ.
[हिं. मटकना]
पटक्यौ भूमि फेरि नहिं मटक्यौ लीन्हें दंत उपारी-2५९४।

बात
दाम, मोल।

बात
कर्तव्य, उपयुक्त उपाय।

बातचीत
वार्तालाप।
संज्ञा
[हिं. बात+चिंतन]

बातनि
अनेक बातें।
संज्ञा
[हिं.बात]
सौ बातनि की एक बात - सारे वाद-विवाद या वार्तालाप का सारांश या तात्पर्य केवल इतना ही है। उ. - (क) सौ बातनि की एकै बात। सूर सुमिरि हरि-हरि दिन रात-2- ५। (ख) सौ बातनि की एक बात। सब तजि भजौ जानकीनाथ-७- २। बातनि हीं - बातों-बातों में, अनायास। उ. - . अजामील बातनि हीं तार्‌यौ हुतौ जु मोतैं आधौ-१-१३९।

बाता
समस्या।
संज्ञा
[हिं. बात]
धाए गजराज-काज, केतिक यह बाता-१-१२३।

बाता
कथन।
संज्ञा
[हिं. बात]
धृग तव जन्म जियन धृग तेरौ, कही। कपट मुख बाता-९-४९।

बाती
बटी हुई रुई या कपड़ा।
संज्ञा
[सं. वर्ती]

बाती
कपड़े या रुई की बटी हुई सलाई के आकार की बत्ती जो दीपक में जलाने के काम आती है, बत्ती।
संज्ञा
[सं. वर्ती]
हरि जू की आरती बनी।….। मही सराव, सप्त सागर घृत, बाती सैल घनी-2.२८।

बातुल
पागल, सनकी, बौड़म।
वि.
[सं. वातुल]

बातूनिया, बातूनी
बकवादी।
वि.
[हिं. बात +ऊनी]

मटियार
जिसमें मिट्टी चिकनी हो।
वि.
[हिं. मिट्टी + यार]

मटियाला, मटीला
मटमैला।
वि.
[हिं. मटमैला]

मटुक, मटुका
घड़ा, मटका।
संज्ञा
[हिं. मटका]

मटुकिया, मटुकी
छोटा घड़ा, मटकी।
संज्ञा
[हिं. मटकी]
(क) आरि करत मटुकी गहि मोहन बासुकि संभु डरै-१०-१४२। (ख) कोरी मटुकी दहयौ जमायौ-३४६।

मट्टी
मिट्टी।
संज्ञा
[हिं. मिट्टी]

मट्ठर
सुस्त।
वि.
[हिं, मंद]

मट्‍ठा
छाछ, मही, तक।
संज्ञा
[सं. मंथन]

मट्‍ठा
एक खस्ता पकवान।
संज्ञा
[देश.]

मठ
वासस्थान।
संज्ञा
[सं.]

मठ
साधु या महंत का स्थान।
संज्ञा
[सं.]

मड़ना, मड़नो
बिछना आरंभ होना।
कि. अ.
[देश.]

मड़वा
किसी उत्सव के लिए बनाया गया स्थान, मंडप। मंच।
संज्ञ
[सं. मंडप]
(१) किसी उत्सव के लिए बनाया गया स्थान, मंडप।

मड़वा
मंच।
संज्ञ
[सं. मंडप]

मड़ाड़
कच्चा तालाब।
सज्ञा
[देश.]

मड़ुआ
एक मोटा अनाज।
संज्ञा
[देश.]

मड़े
बिछे, फैले, आरंभ हुए।
क्रि. अ.
[हि. मड़ना]
चौपरि जगन मई जुप बीने-१-६०।

मड़ैआ मड़ैया
छोटा मंडप।
संज्ञा
[सं मडपी]

मड़ैआ मड़ैया
कुटी, कुटिया, झोपड़ा !
संज्ञा
[सं मडपी]
इहाँ हुती मेरा तनिक मड़ैया का नृप आनि छरयौ-१० उ.-६८।

मढ़ना, मढ़नो
घर देना, लपेट लेना।
क्रि. स.
[सं. मंडन]

मढ़ना, मढ़नो
बाजे के मुँह पर चमड़ा लगाना।
क्रि. स.
[सं. मंडन]
मढ़ आना - (बादल का) घिर आना।

मठ
मंदिर, देवालय।
संज्ञा
[सं.]
सब दल होहु हुपिया-चलहु मठ घेरहिं जाई.-१० उ०-८।

मठरी
एक पकवान।
संज्ञा
[देश.]

मठा
छाछ मही, तक।
संज्ञा
[हिं. मटठा]

मठाधीश
मठ का स्वामी, महंत।
संज्ञा
[सं.]

मठी
छोटा मठ।
संज्ञा
[हिं. मठ]

मठी
मठ-का अधिकारी महंत।
संज्ञा
[हिं. मठ]

मड़ई
छोटा मंडप।
संज्ञा
[सं. मंडपी]

मड़ई
कुटिया, कुटी।
संज्ञा
[सं. मंडपी]

मड़क
घुमाव या पेंच की बात।
संज्ञा
[अनु.]

मड़क
भेद, रहस्य।
संज्ञा
[अनु.]

मणी
सर्प, साँप।
सज्ञा
[सं. मणिन्]

मणी
मणि, रत्न।
संज्ञा

मतंग, मतंगज
हाथी।
संज्ञा
[सं.]
(क) जेहरि पगज करयौ गाढ़े मनो मंद मंद गति यह मतंग की-१०४१। (ख) बारन छाँडि देत किन हमको तू जानन मतंग मतवारो-2५९०।

मतंग, मतंगज
बादल।

मतंग, मतंगज
एक ऋषि।

मतंगी
हाथी का सवार।
संज्ञा
[सं. मतिंगिन्]

मत
सम्मति, राय।
संज्ञा
[सं.]
सबै समर्पो सूरदास कौं यह साँचौ मत मेरौ-१-२६६।
मत उपाना - सम्मति स्थिर करना।

मत
धर्म, पंथ, संप्रदाय।
संज्ञा
[सं.]
अबिहित बाद बिवाद सकल मत इन लगि भेष धरत-१-५५।

मत
भाव, आशय, तात्पर्य।
संज्ञा
[सं.]
बेद पुरान भागवत गीता सब कौ यह मत सार १६८।

मत
ज्ञान।
संज्ञा
[सं.]

मढ़ी
छोटा मंदिर।
संज्ञा
[हिं. मठ]

मढ़ी
कुटी, झोपड़ी।
संज्ञा
[हिं. मठ]
सूरदास प्रभ हरि न मिलै तो घर ते भला मढ़ी-2७९४।

मढ़ैया
मढ़नेवाला।
संज्ञा
[हिं. मढ़ना + ऐया]

मढ़ैया
मढ़ी।
संज्ञा

मढ़ौं
लिपटवा दूँ, चढ़वा दूँ, मढ़ा दूँ।
क्रि. स.
[हिं. मढ़ना]
सूरदास सोने कै पानी मढ़ौं चोंच अरु पाँखि-९-१६४।

मणि
बहुमूल्य रत्न।
संज्ञा
[सं.]

मणि
श्रेष्ठ व्यक्ति।
संज्ञा
[सं.]

मणिधर
सर्प, साँप।
संज्ञा
[सं.]

मणिबंध
कलाई, गट्टा।
संज्ञा
[सं.]

मणियारे
सुन्दर, सुहावने, दर्शनीय।
वि.
[हिं. मणि + आर]
तिनहू माँझ अधिक छबि उपजत कमलनैन मणियारे-३१७५।

मढ़ना, मढ़नो
किसी को जबरदस्ती कोई दायित्व सौंपना या किसी पर दोषादि आरोपित करना।
क्रि. स.
[सं. मंडन]

मढ़ना, मढ़नो
टाँकना।
क्रि. स.
[सं. मंडन]

मढ़ना, मढ़नो
आरंभ होना।
क्रि. अ.

मढ़वाना, मढ़वानो
किसी को मढ़ने के काम में प्रवृत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. मढ़ना]

मढ़ा
मिट्टी का छोटा घर।
संज्ञा
[हिं. मढ़ी]

मढ़ाई
मढ़ने का काम या वेतन।
संज्ञा
[हिं. मढ़ना]

मढ़ाउ
जड़ दो, लगा दो, टाँक दो।
क्रि. स.
[हिं. मढ़ना]
पँचरंग रेसम लगाउ, हीरा मोतिनि मढ़ाउ बहु बिधि जरि करि जराउ ल्याउ रे बढ़ैया-१०-४१।

मढ़ाना, मढ़ानो
मढ़ने के काम में प्रवृत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. मढ़ना]

मढ़ीं
जिनके कुछ मढ़ा गया हो।
वि.
[हिं. मढ़ना]
खुर तांबै, रूपै पाठि. सनै सांग मढ़। दीन्हीं द्विजनि अनेक हरषि असीस पढ़ीं-१०-२४।

मढ़ी
छोटा मठ।
संज्ञा
[हिं. मठ]

मत
पूजा।
संज्ञा
[सं.]

मत
जिसकी पूजा की गयी हो।
वि.

मत
बुरा।
वि.

मत
न, नहीं।
क्रि. वि.
[सं. मा]

मतना, मतनो
राय या मत स्थिर करना।
क्रि. अ.
[सं. मति+ना]

मतना, मतना
नशे म चूर होना।
क्रि. अ.
[सं. मत्त]

मतरिया
माँ, माता।
संज्ञा
[हिं. माता]

मतरिया
मंत्र देनेवाला।
वि.
[सं. मंत्र]

मतलब
आशय, तात्पर्य।
संज्ञा
[अ.]

मतलब
अर्थ, माने।
संज्ञा
[अ.]

मता
सम्मति।
संज्ञा
[सं. मत]

मता
तात्पर्य।
संज्ञा
[सं. मत]

मति
बुद्धि, समझ।
संज्ञा
[सं.]
(क) त्य गति प्रान निरखि साटक-धतु गति-मति विकल सरीर-१-२९। (ख) आजु बिधाता मति मेरी गई भौन काज बिरमाई-2५३८। (ग) मल्लजुद्ध अति कंस कुटिल मति छल करि इअँ हँक रे-2 ५६९।

मति
सम्मति, राय।
संज्ञा
[सं.]
पारथ भीषम सौं मति पाइ-१-२७६

मति
इच्छा।
संज्ञा
[सं.]

मति
स्मृति।
संज्ञा
[सं.]

मति
चतुर, बुद्धिमान।
वि.

मति
मत, नहीं।
क्रि. वि.
(क) दुर वह्यौ, मनि करौ अन्य इ-१.८। (ख) कि अत डरय, महिं मति सापै, व्याकुल बचन वहंत-९-८३।

मतिधीर
धीर बुद्धिवाला, धीरवान।
वि.
[स. मति + धीर]
स्वयंभु के दुतिय पुत्र उत्तानपाद मति धी-बारा, ७१।

मतिधूत
धूर्त मति, दुष्टता, कुटिलता।
संज्ञा
[सं. मति + धूर्त]
गेंद दियैं ही पै बनै छाँड़ि देहु मति-धूत-५८९।

मतलब
स्वार्थ, निजी लाभ।
संज्ञा
[अ.]

मतलब
उद्देश्य।
संज्ञा
[अ.]

मतलब
संबंध, वास्ता।
संज्ञा
[अ.]

मतलबिया, मतलबी
स्वार्थी।
वि.
[हिं. मतलब]

मतली
मिचली।
संज्ञा
[हिं. मिचली]

मतवार, मतवारा, मतवाला
नशे में चूर।
वि.
[सं. मत्त+वाला,हिं. मतवाला]

मतवार, मतवारा, मतवाला
उन्मत्त, पागल।
वि.
[सं. मत्त+वाला,हिं. मतवाला]
जनु जल सोखि लयो से सविता जोबन गज मतवार-2०६२।

मतवार, मतवारा, मतवाला
अभिमानी, अहंकारी।
वि.
[सं. मत्त+वाला,हिं. मतवाला]

मतवारि, मतवारी, मतवाली
उन्मत्त, पागल।
वि.
[हिं. मतवाली]
सूर स्याम मेरे आगैं खेलत जोबन-मत-मतवारि-१०-३१४।

मतवारे, मतवारो, मतवाले, मतवालो
उन्मत, पागल।
वि.
[हिं. मतवाला]
(क) बारन छाँड़ि देत किन हमकौ तू जानत मतंग मतवारो-2५९०। (ख) रहु रहु मधुकर मधु मतवारे-2९९०।

मतीरा
तरबूज, कलींदा।
संज्ञा
[सं. मेट]

मतीस
एक बाजा।
संज्ञा
[देश.]

मते
सम्मति, सलाह।
संज्ञा
[सं. मत]
काहे कौ बादिहि बकति बावरी मानत कौन मते अब तेरे-पृ.३३१ (३)।

मतेई
विमाता।
संज्ञा
[सं. विमाता]

मतै
आशय, उद्देश्य, सम्मति।
संज्ञा
[सं. मत]
मानो दोउ एकहि मते-३०५०।

मतैक्य
मत की एकता।
संज्ञा
[सं.]

मतो, मतौ
सम्मति, सलाह, आशय।
संज्ञा
[सं. मत]
(क) मतो यह पूछत भूतलराइ-१-२६९। (ख) यामैं कछू खरचियतु नाहीं अपनो मतो न दीजै-2९०६। (ग) बैठि असुर सब सभा रुक्म सों मतौ बिचारयौ-१० उ०-८।

मत्त
मस्त।
वि.
[सं.]

मत्त
उनमत्त, मतवाला
वि.
[सं.]
(क) सुत कुबेर के मत्त मगन भए बिषै रस नैननि छाए (हो)-१-७। (ख) लट लटकनि मनु मत्त मधुपगन मादक मधुहिं पिए-१०-९९।

मत्तकाशिनी
उत्तम स्त्री।
संज्ञा
[सं.]

बादशाह
ताश का एक पत्ता।
संज्ञा
[फा.]

बादाम
एक सूखा मेवा।
संज्ञा
[फा.]

बादामी
बादाम के रंग-रूप का।
वि.
[हिं. बादाम]

बादामी
बादाम के रंग का घोड़ा।
संज्ञा
[हिं. बादाम]

बादि
व्यर्थ,निष्फल, निष्प्रयोजन।
अव्य.
[सं. वादि, हिं. वादि = हठ करके]
(क) माया-मद मैं मत्त, कत जनम बादि ही हारै -१-६३। (ख) छिन न चिंतत चरन अंबुज, बादि जीवन जाइ-१-३१५। (ग) बादि अभिमान जनि करौ कोई-८-१०।

बादित
बजाया हुआ।
वि.
[सं. वादन]

बादिहिं
व्यर्थ, वृथा।
क्रि. वि.
[सं. वाद = व्यर्थ]
जनम तौ बादिहिं गयौ सिराइ-१-१५५।

बादी
वायु-संबंधी।
वि.
[फ़.]

बादी
वायु-विकार संबंधी।
वि.
[फ़.]

बादी
वायु को विवश करनेवाला।
वि.
[फ़.]

मत्तता, मत्तताई
मरा या उन्मत्त होने का भाव।
संज्ञा
[सं. मत्तता]

था
माथा।
संज्ञा

था
सिर।
संज्ञा
मत्था टेकना - प्रणाम करना। मत्था मारना - बहुत सोंच - विचार या उलझन करना।

था
किसी चीज का ऊपरी भाग।
संज्ञा

मत्स
मछली, मत्स्य।
संज्ञा
[सं. मत्स्य]

मत्सर
ईर्ष्या।
संज्ञा
[सं.]

मत्सर
क्रोध।
संज्ञा
[सं.]

मत्सर
ईष्यालु, डाह करनेवाला।
वि.

मत्सरता
डाह, ईर्ष्या।
संज्ञा
[सं.]

मत्सरी
ईर्ष्यालु।
संज्ञा
[सं. मत्सरिन]

मतिमंत
बुद्धिमान, चतुर।
वि.
[स. मतिमंत्]
(क) दोन्हा सभा बनाय गंडु की मय माय गत अत। ताकूँ देख भ्रमे दुर्योधन महा माह मतिमत-७५९। (ख) त्रियाचरित मतिमत न समुझत उठि प्रछालि मुख धावत-९-३१।

मतिमंद
मंद बुद्धिवाला।
वि.
[सं. मति + मंद]
गोध्यौ दुष्ट हेम तस्कर ज्यौं अति आतुर मतिमंद-१-१०२।

मतिमान, मतिमाह
बुद्धिमान।
वि.
[सं. मतिमान]

मतिवंत
बुद्धिमान।
वि.
[स. मतिमंत्]

मतिहीनी
बुद्धिहीन, मूर्ख।
वि.
[सं. मति + हीन]
अब तो सहाय करौ तुम मेरी, हौं पामर मतिहीनी.-सारा. ७६६।

मती
बुद्धि।
संज्ञा
[सं. मति]

मती
सम्मति।
संज्ञा
[सं. मति]

मती
इच्छा।
संज्ञा
[सं. मति]

मती
स्मृति।
संज्ञा
[सं. मति]

मती
मत, न, नहीं।
क्रि. वि.

मथानी
काठ का वह दंड जिससे दही मथा जाता है।
संज्ञा
[हिं. मथना]
जब मोहन कर गही मथानी-१०-१४४।

मथि
बिलोकर, मथकर।
क्रि. स.
[हिं. मथना]
ज्ञान-कथा को मथि मन देखौ ऊधौ बहु धोपी।

मथि
हिलाकर एक में मिलाकर।
क्रि. स.
[हिं. मथना]
मथि मृगमद-मलय कपूर माथै तिलक किए-१०-२४।

मथि
नष्ट करके।
क्रि. स.
[हिं. मथना]
(क) अघ-अरिष्ट केसी काली मथि दावानलहिं पियौ-१-१२१। (ख) धनुष तोरि गज मारि मल्ल मथि किए निडर जदुबंस-३०१८।

मथिऐ
मथी जाती हैं।
क्रि. स.
[हिं. मथना]
नित प्रति सहस मथानी मथिऐ, मेघ-सब्द दधि-माट घमर कौ-१०-३३३।

मथित
मथा हुआ।
वि.
[सं.]

मथित
घोलकर मिलाया हुआ।
वि.
[सं.]

मथी
मथनेवाला।
वि.
[सं. मथिन्‌]

मथी
मथानी।
संज्ञा

मथुरा
ब्रज में यमुना के दाहिने किनारे पर बसा एक नगर जिसे मधु नामक दैत्य ने बसाया था जिससे उसका नाम 'मधुपुर' पड़ा। मथुरा की गणना सात पुरियों में है। कंस की यही राजधानी थी और श्रीकृष्ण ने यहीं उसका वध किया था।
संज्ञा
[सं. मधुपुर]
मारि कंस केसी मथुरा मैं मेट्यौ सबै दुराजैं-१-३३।

मथनहारि
मथने या बिलोनेवाली।
वि.
[सं. मथन + हि. हारि]
मथनहारि सब ग्वारि बुलाई-५२०।

मथना, मथनो
(दही आदि) बिलोना।
क्रि. स.
[सं. मंथन या मथन]

मथना, मथनो
चलाकर मिलाना।
क्रि. स.
[सं. मंथन या मथन]

मथना, मथनो
नष्ट करना।
क्रि. स.
[सं. मंथन या मथन]

मथना, मथनो
ढूँढ़ना, पता लगाना।
क्रि. स.
[सं. मंथन या मथन]

मथना, मथनो
एक ही क्रिया बार-बार करना।
क्रि. स.
[सं. मंथन या मथन]

मथना, मथनो
मथानी, रई।
संज्ञा
घूमि रहे जित तित दधि मथना सुनत मेघ ध्वनि लाजै री।

मथनियाँ, मथनिया, मथनी
वह मटका जिसमें दही मथा जाता है।
संज्ञा
[हिं. मथानी]
माखन चोरि फोरि मथनी को पीवत छाछ पराई सारा.-७४९।

मथनियाँ, मथनिया, मथनी
मथानी।
संज्ञा
[हिं. मथानी]
नंद जू के बारे कान्ह छाँड़ि दै मथनियाँ-१०-१४५।

मथवाह
हाथी का महावत।
संज्ञा
[हिं. माथा + वाह]

मत्स्य
मछली।
संज्ञा
[सं.]

मत्स्य
मीन राशि।
संज्ञा
[सं.]

मत्स्य
एक महापुराण।
संज्ञा
[सं.]

मत्स्य
विष्णु का पहला अवतार।
संज्ञा
[सं.]
यहैं कहि भए अँतरधान तब मत्स्य प्रभु, बहुरि नृप आपनौ कर्म साध्यौ-८-१६।

मत्स्यगंधा
ब्यास की माता सत्यवती।
संज्ञा
[सं.]

मथति
मथती या बिलोती है।
क्रि. स.
[हिं. मथना]
मथति दधि जसुमति-१०-६७।

मथन
मथने या बिलोने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[सं.]
( क ) को कौरव-सिंधु मथन करि या दुख पार उतरिहै-१-२९। (ख) मंदर डरत, सिंधु पुनि काँपत, फिरि जनि मथन करै-१०-१४२।

मथन
मारने या नाश करनेवाला।
वि.
मधुकैटभ-मथन मुर भौम केसी भिदन कंस कुल काल भनुसाल हारी।

मथनहार
मथने या बिलोने वाला।
वि.
[सं. मथन+हिं. हार]
सिंधु मनौ इह घोष उजागर। मथनहार हरि रतनकुमार-१०३७।

मथनहार
नाश करनेवाला।
वि.
[सं. मथन+हिं. हार]

मथुरापति
मथुरा का राजा।
संज्ञा
[सं.]
बज्रनाभ मथुरापति कीन्हौ-१-२८८।

मथुरापति
मथुरा का राजा कंस।
संज्ञा
[सं.]

मथुरिया
मथुरा से संबंधित।
वि.
[हिं. मथुरा+इया]

मथ
मथती या बिलोती है।
क्रि. स.
[हिं. मथना]
अपनै घर यौंहीं मथै-७१६।

मथौरी
माथे का एक कार का आभूषण।
संज्ञा
[हिं. माथा+औरी]

मथ्थ, मथ्था
भाल, ललाट।
संज्ञा
[हिं. माथा]

मथ्यौ
मथा, बिलोया।
क्रि. स.
[हिं. मथना]

मथ्यौ
नाश किया।
क्रि. स.
[हिं. मथना]
गज चानूर हते दव नास्यौ, ब्याल मथ्यौ भयहारे-१.२७।

मथ्यौ
मथा या बिलोया हुआ।
वि.
तुरत मथ्यौ दधि माखन आछौ खाहु देउँ सो आनि-४९४।

मदंध
गर्व से अंधा।
वि.
[सं. मदांध]

मदक
एक मादक पदार्थ।
संज्ञा
[सं. मद]

मदकची
मदक पीनेवाला।
वि.
[हिं. मदक + चो]

मदकल
मतवाला।
वि.
[सं.]

मदकल
पागल।
वि.
[सं.]

मदगल
मत्त, मतवाला, मस्त।
वि.
[सं. मदकल]

मदजल
मतवाले हाथी के मस्तक से बहनेवाला मद या दान।
संज्ञा
[सं.]

मदत, मदद
सहायता।
संज्ञा
[अ.]

मदत, मदद
मजदूर कारीगर आदि का समूह।
संज्ञा
[अ.]

मददगार
सहायता देनेवाला।
वि.
[फा.]

मदन
कामदेव।
संज्ञा
[सं.]
मनु मदन धनु-सर सँधाने, देखि घन-कोदंड-१-३०७।

मद
हर्ष, आनन्द।
संज्ञा
[सं.]

मद
मतवाले हाथी की कनपटी से बहनेवाला द्रव्य, दान।
संज्ञा
[सं.]

मद
मद्य।
संज्ञा
[सं.]

मद
मतवाला पन, नशा।
संज्ञा
[सं.]

मद
उन्मत्तता।
संज्ञा
[सं.]
सत्यवती मच्छोदरि नारी। गंगा तट ठाढ़ी सुकुमारी। तहाँ परासर रिषि चलि आए। बिबस होइ तिहिं कैं मद छाए-१-२२९।

मद
गर्व, अहंकार।
संज्ञा
[सं.]
भोजन करत माँगि घर उनकैं राजमान-मद धारत-१-१२।

मद
प्रमाद, मतिभ्रम।
संज्ञा
[सं.]

मद
कामदेव।
संज्ञा
[सं.]
मद पर आना - (१) युवा होना। (२) उमंग पर आना। (३) कामोन्मत्त होना।

मद
उन्मत्त, मतवाला।
वि.
मद गजराज द्वार पर ठाड़ो हरि कहेउ नेक बचाय।

मद
खाता, प्रसंग।
संज्ञा
[अ.]

मदन
कामक्रीड़ा।
संज्ञा
[सं.]

मदनगोपाल
श्रीकृष्ण का एक नाम।
संज्ञा
[सं. मदन+गोपाल]
मदनगोपाल देखियत हैं सब अब दुख-सोक बिसारी-2५६६।

मदनदमन
शिव जी।
संज्ञा
[सं.]

मदनमोहन
श्रीकृष्ण का एक नाम।
संज्ञा
[सं.]
जब तुम मदनमोहन करि टेरौ इहि सुनि कै घर जाऊँ।

मदन - लेख
प्रेम-पत्र।
संज्ञा
[सं.]

मदनांतक
शिव।
संज्ञा
[सं.]

मदनांध
काम-पीड़ित।
वि.
[सं. मदन +अंध]

मदनारि
शिव।
संज्ञा
[सं.]
गरल ग्रीव, कपाल उर इहिं भाइ भए मदनारि-१०-१६९।

मदपि, मदपी
शराबी।
वि.
[सं. मद्यप]

मदमत्त, मदमत्ता
मतवाला।
वि.
[सं. मदमत्त]

मदार
आकवृक्ष।
संज्ञा
[सं. मंदार]

मदारी
तमाशा करनेवाला
संज्ञा
[अ. मदार]

मदारी
भालू-बन्दर नचानेवाला।
संज्ञा
[अ. मदार]

मदालसा
एक गंधर्व कन्या।
संज्ञा
[सं.]

मदालापी
कोकिल।
संज्ञा
[सं.]

मदिर
मादक।
वि.
[सं.]

मदिर
मत्त।
वि.
[सं.]

मदिरा, मदी
शराब, मद्य।
संज्ञा
[सं. मदिरा]

मदीय
मेरा।
वि.
[सं.]

मदीला
नशीला।
वि.
[सं. मद+हिं. ईला]

बादर
प्रसन्न, हर्षित।
वि.
[देश.]

बादरायण
वेदव्यास का एक नाम।
संज्ञा
[सं.]

बादरिया, बादरी
बदली।
संज्ञा
[हिं. बदली]

बादल
मेघ, घन।
संज्ञा
[हिं. बादर]
बादल उठना (घिरना, चढ़ना) - घटा घिरना। बादल गरजना - मेघों का शब्द होना। बादल छँटना (फटना) - घटा का घिरा न रह जाना, मेघों का छितर-बितर हो जाना। बादल (बादलों) से बात करना - बहुत ऊँचा होना।

बादला
सोने-चाँदी का तार।
संज्ञा
[?]

बादली
बदली।
संज्ञा
[हिं. बदली]

बादशाह
शासक, राजा।
संज्ञा
[फा.]

बादशाह
सरदार।
संज्ञा
[फा.]

बादशाह
मनमौजी।
संज्ञा
[फा.]

बादशाह
शतरंज का एक मोहरा।
संज्ञा
[फा.]

मदमात, मदमाता
गर्व में चूर।
वि.
[सं. मदमत्त]
या देही कौ गरब करत धन-जोबन के मदमात-2-२२।

मदमात, मदमाता
मदोन्मत्त।
वि.
[सं. मदमत्त]
ज्यौं गज जूथ नेक नहिं बिछुरत सरद मदन मदमातौ-३३१९।

मदमाती
मतवाली, मदोन्मत्त।
वि.
[हिं. मद+माता]
जोबन मदमाती इतराती बेनि ढुरति कटि लौं छबि बाढ़-१०-३००।

मदमातो, मदमातौ
गर्व में चूर।
वि.
[हिं. मदमाता]

मदमातो, मदमातौ
मतवाला, मदोन्मत्त।
वि.
[हिं. मदमाता]

मदर
घेरना, मँड़राना।
संज्ञा
[सं. मंडल]

मदर
मदर करत है-मँड़राता है।
प्र.
ब्रज पर मदर करत है काम-१० उ.-९८।

मदरसा
पाठशाला।
संज्ञा
[अ. मदर्स:]

मदधि
मद से उन्मत्त।
वि.
[सं.]

मदार
हाथी।
संज्ञा
[सं.]

मध, मधि
बीच का भाग !
संज्ञा
[सं. मध्य]

मध, मधि
नीच।
वि.

मध, मधि
बीच का।
वि.

मध, मधि
में, बीच में।
अव्य.
(क) अंबर हरत द्रुपदतनया की दुष्ट सभा मधि लाज सम्हारी-१-२२। (ख) लोह तरैं मधि रूपा लायौ-७-७। (ग) कमल मधि अलि उड़त ३६०।

मधिम
बीच का।
वि.
[सं. मध्यम]

मधु
शहद।
संज्ञा
[सं.]
अब तो हैं हम निपट अनाथ। जैसें मधु तोरे की माखी त्यौं हम बिन ब्रजनाथ-2६९३।

मधु
मिसरी।
संज्ञा
[सं.]
माखन मधु मिष्ठान महर लै दियौ अक्रूर के हाथ-2५३४।

मधु
फूल का रस, मकरंद।
संज्ञा
[सं.]

मधु
वसंत ऋतु।
संज्ञा
[सं.]

मधु
चैत्र मास।
संज्ञा
[सं.]

मदोन्मत्त
मद से चूर।
वि.
[सं.]

मदोवै
मंदोदरी।
संज्ञा
[सं. मंदोदरी]

मद्धिम
बीच का।
वि.
[सं. मध्यम]

मद्धिम
मंदा।
वि.
[सं. मध्यम]

मद्धे
बीच में।
अव्य.
[सं. मध्ये]

मद्धे
संबंध में।
अव्य.
[सं. मध्ये]

मद्धे
लेखे में।
अव्य.
[सं. मध्ये]

मद्य
मदिरा, शराब।
संज्ञा
[सं.]

मद्यप
मद पीनेवाला, शराबी।
वि.
[सं.]

मद्यपान
मदिरा पीने की क्रिया।
संज्ञा
[सं.]

मधु
एक दैत्य जिसको मारने से विष्णु का नाम 'मधुसूदन' पड़ा।
संज्ञा
[सं.]
(क) धरनीधर बिधि बेद उधारयौ मधु सौं शत्रु हयौ-2२६४। (ख) एई माधो जिन मधु मारे री-2५६८।

मधु
मीठा।
वि.

मधु
स्वादिष्ट।
वि.
चारौ भ्रात मिलि करत कलेऊ मधु मेवा पकवाना।

मधु
सुन्दर, सुकुमार।
वि.
अंग सुभग सजि ह्वै मधु मूरति नैननि माँह समाऊँ-१०-४९।

मधुऋतु
वसंत ऋतु।
संज्ञा
[सं.]

मधुकंठ
कोयल, कोकिल।
संज्ञा
[सं.]

मधुकर
भौंरा।
संज्ञा
[सं.]
जिहिं मधुकर अंबुज-रस चाख्यौ क्यौं करील फल भाडै-१-६८।

मधुकर
कामी पुरुष।
संज्ञा
[सं.]

मधुकरि, मधुकरी
भ्रमरी।
संज्ञा
[सं. मधुकर]
सुनि मधुकरि भ्रम तजि कुमुदनि कौ राजिवबर की-आस-१-३३९।

मधुकरि, मधुकरी
भिक्षा जिसमें केवल पका हुआ भोजन हो।
संज्ञा
[सं. मधुकर]

मधुकैटभ
मधु और कैटभ नामक दो दैत्य जो विष्णु द्वारा मारे गये थे।
संज्ञा
[सं.]

मधुकोश, मधुकोष, मधुकोस
शहद की मक्खी का छत्ता।
संज्ञा
[सं. मधुकोष]

मधुप
भौंरा, भ्रमर।
संज्ञा
[सं.]
पिउ पद कमल कौ मकरंद। मलिन मति मन-मधुप परिहरि बिषय नीरस मंद-९-१०।

मधुप
मधु का पान करनेवाला।
वि.

मधुपति
भौंरा, भ्रमर।
संज्ञा
[सं.]
निसि दै द्वार कपाट सदल बधु मधुपति प्यावत परम चैन-१९७७।

मधुपति
श्रीकृष्ण।
संज्ञा

मधुपन, मधुपनि
अनेक भ्रमर।
संज्ञा
[सं. मधुप+नि]
(क) कुंचित केस सुबंधु सुबसु मनु उड़ि आए मधुपन के टोल-१३३०। (ख) बिन बिकसे कल कमल कोष तै मनु मधुपनि की माल-१०-२०७।

मधुपर्क
दही, घी, जल, शहद और शकर का घोल जो देवता पर चढ़ाया जाता है।
संज्ञा
[सं.]

मधुपायी
भौंरा।
संज्ञा
[सं. मधुपायिन्]

मधुपुर
मथुरा का प्राचीन नाम।
संज्ञा
[सं.]

मधुपुरि, मधुपुरी
मथुरा का प्राचीन नाम।
संज्ञा
[सं. मधुपुरी]
(क) कालिंदी कैं कूल बसत इक मधुपुरि नगर रसाला-१०-२। (ख) धनि कालिंदी मधुपुरी दरसन नासै पापु-४९२।

मधुबन
ब्रज का एक बन।
संज्ञा
[सं.]
मधुबन तुम कत रहत हरे-ना. ३८२८।

मधुबन
मथुरा।
संज्ञा
[सं.]
(क) गोपालहिं राखहु मधुबन जात-2५३१। (ख) मधुबन सब कृतज्ञ धरमीले-ना. ४२१२।

मधुबन
सुग्रीव का बाग।
संज्ञा
[सं.]
हनु, तै सबकौ काज सँवारयौ। .....। तरहिं गमन कियौ सागर तैं बीचहिं बाग उजारयौ। कीन्हौ मधुबन चौर चहूँदिसि माली जाइ पुकारयौ.-९-१०३।

मधुमंगल
श्रीकृष्ण का एक सखा गोप।
संज्ञा
[सं.]
अर्जुन भोजऽरु सुबल सुदामा मधुमंगल इक ताक-४६४।

मधुमक्खी, मधुमक्षिका
शहद की मक्खी।
संज्ञा
[सं. मधुमक्षिका]

मधुमती
समाधि की अवस्था जिसमें रज और तम गुणों के छूट जाने पर केवल सतगुण के प्रकाश का अनुभव होता है।
संज्ञा
[सं.]

मधुमाखि, मधुमाखी
शहद की मक्खी।
संज्ञा
[हिं. मधुमक्खी]
(क) ज्यौं मधुमाखी सँचति निरंतर बन की ओट लई-१-५०। (त्र) ज्यौं घेरि रही मधुमाखि मिलि झूमक हो-2४११।

मधुमास
चैत और वैसाख।
संज्ञा
[सं.]

मधुमासी
मधुमक्खी।
संज्ञा
[सं. मधु+हिं. मक्खी]

मधुर
मधु-जैसे स्वादवाला।
वि.
[सं.]

मधुर
जो सुनने में मीठा जान पड़े।
वि.
[सं.]
महा मधुर प्रिय बानी बोलत साखामृग तुम किहिं के तात-९-६९।

मधुर
सुन्दर, सुकुमार।
वि.
[सं.]

मधुर
प्रिय लगनेवाला।
वि.
[सं.]

मधुर
शांत।
वि.
[सं.]

मधुरई
मधुरता।
संज्ञा
[हिं. मधुर + ई]

मधुरई
मिठास।
संज्ञा
[हिं. मधुर + ई]

मधुरई
सुकुमारता।
संज्ञा
[हिं. मधुर + ई]

मधुरई
सुन्दरता।
संज्ञा
[हिं. मधुर + ई]

मधुरा
मधुर शब्द-योजना।
संज्ञा
[सं.]

मधरिपु
मधु' दैत्य को मारनेवाले विष्णु।
संज्ञा
[सं.]
(क) सूरदास अब क्यौं बिसरत है मधुरिपु कौ परितोष-पृ. ३३२ (१८)। (ख) वहाँ भेषज नाना बिधि को अरु मधुरिपु से हैं बैद-३०१३।

मधुरिमा
मिठास, मीठापन।
संज्ञा
[सं. मधुरिमन्]

मधुरिमा
मधुरता।
संज्ञा
[सं. मधुरिमन्]

मधुरिमा
कोमलता।
संज्ञा
[सं. मधुरिमन्]

मधुरिमा
सुन्दरता।
संज्ञा
[सं. मधुरिमन्]

मधुरी
जो सुनने में प्रिय या रुचिकर लगे।
वि.
[सं. मधुर]
तारी दै दै गावहीं मधुरं मृदु बानी-१०-१३४।

मधुरी
सुन्दरता।
संज्ञा
[सं. माधुर्य]

मधुरे
धीरे-धीरे।
क्रि. वि.
[सं. मधुर]
(क) सकुच सहित मधुरे करि बाल-७००। (ख) मधुरे दोउ रोवन लागे-2६२५। (ग) अस्तुति करी बहुत नाना बिधि मधुरे बेनु बजाये-सारा ०४८९।

मधुरै
मधुर स्वर में।
क्रि. वि.
[सं. मधुर]
जसुमति मधुरै गावैं-१०-४३।

मधुरै
धीरे-धीरे।
क्रि. वि.
[सं. मधुर]

मधुराई
मधुरता।
संज्ञा
[सं. मधुर+आई]

मधुराई
मिठास, मीठापन।
संज्ञा
[सं. मधुर+आई]

मधुराई
कोमलता।
संज्ञा
[सं. मधुर+आई]

मधुराई
सुन्दरता।
संज्ञा
[सं. मधुर+आई]

मधुराज
भौंरा।
संज्ञा
[सं.]

मधुराना, मधुरानो
मीठा होना।
क्रि. अ.
[हिं. मधुर आना]

मधुराना, मधुरानो
सुन्दर हो जाना।
क्रि. अ.
[हिं. मधुर आना]

मधुराना, मधुरानो
प्रिय या सुचिकर होला।
क्रि. अ.
[हिं. मधुर आना]

मधुरान्न
मिठाई।
संज्ञा
[सं.]

मधुरि
मधुर सुन्दरता।
संज्ञा
[सं.]

मधुरै
जो सुनने में भला लगे।
वि.
यह कहि कहि मधुरै सुर गावति केदारौ-१०-१९७। (ख) मधुरैं सुर गावत-१०-२४२। (ग) करत चले मधुरैं सुर गान-४३८।

मधुवन
ब्रज का एक वन।
संज्ञा
[सं.]

मधुवन
सुग्रीव का बन।
संज्ञा
[सं.]

मधुवन
मथुरा।
संज्ञा
[सं.]

मधुवन
प्रेमी-प्रेमिका का मिलन-स्थल।
संज्ञा
[सं.]

मधुवामन
भौरा, भ्रमर।
संज्ञा
[सं.]

मधुसूदन
मधु' दैत्य को मारनवाले विष्णु।
संज्ञा
[सं.]

मधुसूदन
श्रीराम।
संज्ञा
[सं.]

मधुसूदन
श्रीकृष्ण।
संज्ञा
[सं.]

मधुहंता
मधु' नामक दैत्य को मारनेवाले विष्णु।
संज्ञा
[सं. मधुहंतृ]

बाद
छट, कमीशन।
वि.

बाद
अतिरिक्त।
वि.

बाद
तस्व या सिद्धांत।
प्रत्य.
[सं. वाद]
मिथ्यावाद उपाधि रहित ह्वै बिमल-बिमल जस गावत-१- ३६०।

बादत
ललकारता है।
क्रि. अ.
[हिं. बादन]
बादत बड़े सूर की नाईं अबहीं लेत हौं प्रान।

बादति
बहस करती है।
क्रि. अ.
[हिं. बादना]
बादति है बिनु काज ही बृथा बढ़ावति रारि-५८९।

बादना
बरबाद करना।
क्रि. अ.
[सं. वाद]

बादना
बहस या हुज्जत करना।
क्रि. अ.
[सं. वाद]

बादना
ललकारना।
क्रि. अ.
[सं. वाद]

बादबान
(जहाज का) पाल।
संज्ञा
[फा.]

बादर
बादल, मेघ।
संज्ञा
[सं. वारिद, विपर्यय से 'बादरि’]
(क) बादर-छाँह, धूम - धौराहर, जैसे थिर न रहाहीं-१- ३१९। (ख) और सकल मैं देखे-ढूँढे, बादर की सी छाहीं-१- ३२३।

मधूक
महुए का पेड़ या फूल।
संज्ञा
[सं.]

मधुकड़ी, मधुकरी
मधुकरी।
संज्ञा
[सं. मधुकरी]

मध्य
बीच का भाग।
संज्ञा
[सं.]

मध्य
बीच का, मध्यम।
वि.

मध्यम
बीच या मध्य का।
वि.
[सं.]

मध्यस्थ
बीच में पड़कर झगड़ा या विवाद मिटानेवाला।
संज्ञा
[सं.]

मध्यस्थ
उदासीन, तटस्थ।
संज्ञा
[सं.]

मध्यमा
बीच की अँगुली।
संज्ञा
[सं.]

मध्यमा
प्रिय के अपराध पर कुछ मान करके शीघ्र ही प्रसन्न हो जानेवाली नायिका।
संज्ञा
[सं.]

मध्यस्थता
मध्यस्थ होने का भाव।
संज्ञा
[सं.]

मनई
आदमी, मनुष्य।
संज्ञा
[सं. मानव]

मनकना, माकनो
हाथ-पैर हिलाना-डूलाना।
क्रि. अ.
[अनु.]

मनकना, माकनो
विरोध या तर्क-वितर्क करना।
क्रि. अ.
[अनु.]

मनकरा
चमकदार।
वि.
[सं. मणि+हिं. कर]

मनका
माला या सुमिरनी की गुरिया।
संज्ञा
[सं. माणिक्य]

मनका
माला, सुमिरनी।
संज्ञा
[सं. माणिक्य]

मनकामना
इच्छा,अभिलाषा।
संज्ञा
[हिं. मन+कामना]
जोलौं मन-कामना न छूटै-2-१९।

मनगढ़ंत
जो कल्पित या गढ़ा हुआ हो।
वि.
[हिं. मन+गढ़ना]

मनगढ़ंत
कोरी कल्पना।
संज्ञा
[हिं. मन+गढ़ना]

मनचला
चंचल चित्तवाला।
वि
[हिं.मन+चलना]

मध्यान, मध्यान्ह, मध्याह्न
दोपहर का समय।
संज्ञा
[सं. मध्याह्न]
नृप, तुम हमसौं करौ लराई। कह्यो करौं मध्यान बिताई-९-१३।

मध्ये
संबंध में।
क्रि. वि.
[सं. मध्य]

मध्वाचार्य
एक प्रसिद्ध वैष्णव आचार्य जिनका समय बारहवीं शताब्दी है।
संज्ञा
[सं.]

मन
अंत:करण, चित्रा।
संज्ञा
[सं. मनस]
मन-बानी कौं अगम अगोचर सो जानै जो पावै-१-२।

मन
अंतःकरण की चार वृत्तियों में वह वृत्ति जिससे संकल्प-विकल्प होता है।
संज्ञा
[सं. मनस]
(किसी से ) मन अटकना (उलझना) - प्रेम होना। मन अटक्यौ - प्रेम हो गया। उ. - ता दिन ते मधुकर, मन मटक्यौ बहुत करी निकरै निकारयौ-३०३५। मन आना ( में आना ) - जँचना, समझ पड़ना। मन आई - इच्छा हुई, जँच गई। उ. - (क) नृपति रहूगन कैं मन आई। सुनियै ज्ञान कपिल सौं जाई-५- ४। ( ख ) जमुना तीर आजु सुख कीजै यह मेरैं मन आई-५८१। कहा मन आनी - यह क्या सूझी? ऐसा अनुचित विचार क्यों किया है ? उ. - इंद्र देखि इरषा मन मन लायौ। करिकै क्रोध न जल बरसायौ। रिषभदेव तबहीं यह जानी। कह्यो, इंद्र यह कहाँ मन आनी-५- २। मन करना - इच्छा करना। करत इहाँ को मन - यहाँ आने की इच्छा करते हैं। उ. - कबहुँक स्याम करत इहाँ को मन कैंघौ चित सुध्यो बिसराई-३११८। मन का (कौ) - प्रिय या रुचिकर। उ. - तेरे मन कौ यहाँ कौन है-१०- ३२०। मन (का) खराब होना - (१) मन फिरना। (२) अप्रसन्न होना। (३) बीमार होना। मन चलना - इच्छा होना। चलत कहाँ मन - मन कहाँ-कहाँ या किधर-किधर दौड़ता है। उ. - चलत कहाँ मन और पूरी तन जहाँ कछु लैन न दैन-४९१। मन चुराना (चोराना) - मोह लेना, मुग्ध कर लेना। मन लियौ चुराइ - मन मुग्ध कर लिया। उ. - कब देखौं वह मोहन मूरति जिन मन लियौ चुराई-६७९। चोरत मन - मन मुग्ध करते हैं। उ. - कछु दिन करि दधि - माखन चोरी अब चोरत मन मोर-७७६। मन टूटना - (१) निराश या हताश होना। (२) चारों ओर वेग से दौड़ना या लपकना। मन दसहूँ दिसि टूटै - दसों दिशाओं में मन दौड़ता या लपकता है। उ. - करनी और कहै कछु और मन दसहूँ दिसि टूटै-१-१९। मन ढरना - प्रेम या अनुराग होना। मन ढरयो - प्रेम हो गया, मन मुग्ध हो गया। उ. - रूपहीन कुलहीन कबरी तासौं मन जो ढरयो-३०९२। मन देना - (१) मन लगाना। (२) ध्यान देना। मन दीनौं - मन लगाया। उ. - भाव - भक्ति कछु हृदय न उपजी मन बिसया मैं दीनौं-१-६५। (किसी पर) मन धरना - (१) ध्यान देना। (२) मन लगाना। मन न धारै - चित्त नहीं लगाता है। उ. - सूरदास स्वामी मनमोहन तामें मन न धरै-४८३। मन तोड़ना - (१) निराश या हताश करना। (२) निराश या हताश होना, साहस छोड़ना। मनहिं तोरै - साहस छोड़ देता है। उ. - कहुँ रसना सुनत स्रवन देखत नयन सूर सब भेद गुन मनहिं तोरै। मन बँधना - मुग्ध, आसक्त या लीन होना। मन बँध्यौ - मुग्ध, आसक्त या लीन हुआ। उ. - सूरदास प्रभु को मन सजनी, बँध्यौ राग की डोरि-६५७। मन (में) बसना - अच्छा लगना, रुचिकर होना। उ. - सूरदास मन बसै तोतरे बचन बर-१०१५१। मन बाँधना - मुग्‍ध, आसक्त या लीन करना। मन बाँध्यौ - मुग्ध या आसक्त हुआ। उ. - कनक कामिनी सौं मन बाँध्यौ-१- ७४।

मन
मन वश में करना - मुग्ध या आसक्त कर लेना। बस कीन्हौ मन मेरौ - मेरा मन मुग्ध या आसक्त कर लिया है। उ. - रिसहिं उठी जहराइ, कह्यौ, यह बस कीन्हौं मन मेरौ-१९९९। मन बिगड़ना - (१) मन का हटना या उदासीन होना। (२) कै या मचली जान पड़ना। (३) झुंझलाना, क्रुद्ध होना। (४) चित अस्वस्थ होना। मन बढ़ना - साहस या उत्साह बढ़ना। मन बुझना - चित्त में उमंग या उत्साह न होना। मन बूझना - मन की थाह लेना। मन बढ़ाना - उत्साह था साहस बढ़ाना। मन बढ़ायौ - उमंग या उत्साह बढ़ाकर उ. - दियौ सिर पाँव नृपराउ ने महर को आप पहरावनी सब दिखाए। अतिहिं सुखपाइ कै लियौ सिर नाइ कै हरषि नँदराइकै मन बढ़ायौ। मन (का) बूझना (मानना) - चित्त में शांति या संतोष होना। मन का मारा - खिन्न या दुखित चित्त वाला। मन का मैला - खोटा, कपटी। मन की मन में रहना - इच्छा पूरी न होना। मन के लड्डूखाना - कोरी कल्पना का आनन्द लेना, व्यर्थ की या असंभव आशा पर प्रसन्न होना। मन खोलना - रहस्य प्रकट कर लेना। मन चलना - इच्छा होना। मन (को) टटोलना - मन की थाह लेना। मन डोलना - (१) चित्त का चंचल हो जाना। (२) लोभ हो आना, नियत डोलना। मन डोलाना - (१) चित्त को चंचल करना। (२) नियत डुलाना, लोभ करना। मन न डोलावै - चित्त को चंचल न करे। उ- भोजन करत गह्यौ कर रुक्मिनि सोइ देहु जो मन न डोलावै। मन देना - (१) ध्यान लगाना। (२) लीन या मुग्ध होना। मन फटना (फिर जाना) - घृणा या चिढ़ हो जाना। मन फिराना (फेरना) - चित्त हटाना। मन बहलाना - दुख भुलाने का प्रयत्न करना, खिन्न चित्त को प्रसन्न करना। मन भरना - (१) विश्वास होना। (२) तृप्ति, संतोष या समाधान होना। मन भर जाना - (१) अघा जाना, तुप्त हो जाना। (२) इच्छा या प्रवृत्ति न रह जाना। मन भाना - भला था रुचिकर लगना। मन भारी करना - खिन्न या उदास होना। मन मानना - (१) तृप्ति, संतोष या समाधान होना। (२) निश्चय या विश्वास होना। ( ३ ) भला या रूचिकर लगना, भा जाना। (४) प्रेम या अनुराग होना। मन मानत - संतुष्ट होता है। उ. - क्यों मन मानत है इन बातन-३०२५। कैसे मन मानै - कैसे संतोष हो सकता है? उ. - मधुकर कहि कैसैं मन मानै। जिनकौं इक अनन्य बत सूझै, क्यौं दूजौ उर आनै - ना. ४३३३। मन मान्यौ - अनुराग हो गया। उ. - (क) सखी री, स्याम सौं मन मान्यौ। नीकै करि चित कमल नैन सौं घालि एकठाँ सान्यौ-१२०२। (ख) नंदलाल सौं मेरौ मन मान्यौ कहा करैगौ कोई री.-१२०३। मन मिलना(१) प्रेम होना। (२) मित्रता होना। मन में आना - (१) प्रतिक्रिया - स्वरूप किसी विचार या भाव का उत्पन्न होना। (२) जान या समझ पड़ना। (३) भला या रुचिकर लगना। मन न आये - प्रतिक्रिया - स्वरूप कोई भाव जाग्रत न हुआ। उ. - तासों उन कटु बचन सुनाये। पै ताके मन कछु न आये। मन नहिं आवे - समझ या जान नहीं पड़ता। उ. - यह तनु क्यों ही दियौ न जावे। और देत कछु मन नहिं आवे। मन में आनना - सोचना, विचार करना। मन में जमना (१) उचित जान पड़ना। (२) ध्यान में आना। मन में ठानना - दृढ़ संकल्प करना। मन में धरना - (१) प्रकट न करना। (२) स्मरण रखना। (३) ध्यान देना, श्रद्धा या विश्वास रखना। न मन मैं धरै - ध्यान नहीं देता है, श्रद्धा या विश्वास नहीं रखता है। उ. - जज्ञ सराध न कोऊ करै। कोऊ धर्म न मन मैं धरै-१- २९०। मन मैं यह धरी - यह निश्चय या संकल्प किया है ! उ. - पै तुम बिनती बहु बिधि करी। तातै मैं मन मैं यह धरी-६.५। मन में बैठना - (१) ठीक जान पड़ना। (२) ध्यान में आना। मन में रखना - (१) प्रकट न करना। (२) स्मरण रखना। मन में भरना - हृदयंगम करना। मन में लाना - सोचना, विचार करना। मन में मानना - ध्यान देना, परवाह करना। मन मैं नहिं मान्यौ - कुछ परवाह था चिंता न की, ध्यान न दिया। उ. - छाक खाय जूठन ग्वालन की कछु मन मैं नहिं मान्यौ - सारा. ७५०।

मन
मन मारना - (१) खिन्न या उदास होना। (२) इच्छा या उमंग को दबाना। मन मानि - खिन्न या उदास होकर। उ. - भवन ही मन मारि बैठी सहज सखी इक आई। मन मारे - खिन्न, उदास। उ. - (क) आए नंद घरहिं मन मारे-५४१। (ख) प्रिया-बियोग फिरत मारे मन परे सिंधु तट आनि। मन मारैं - खिन्न या उदास होता है। उ. - भूसुत सत्रु थान किन हेरत लखत मोहिं मन मारैं। मन मसना - मन हरना। मूसे मन - मेरा मन रूपी धन हरकर। उ. - जात कहाँ बलि बाँह छँड़ाये मूसे संपति मेरी (मनसंपति सब मेरी)-१५०६। मन मिलना - (१) समान स्वभाव होना। (२) मित्रता या प्रेम होना। मन को मोहना - चित्त लुभाना या आकृष्ट करना। मन (को) मैला करना - खिन्न या अप्रसन्न होना। (किसी से) मन मोटा होना - अनबन होना। (किसी का) मन मोटा होना - विरक्त या तटस्थ होना। मन मोड़ना (१) चित्त को दूसरी ओर लगाना। (२) विरक्त या तटस्थ रहना। (किसीका) मन रखना - इच्छा या कामना पूरी करना। मन राखे काम - इच्छा पूरी करना ही उचित है। उ. - उनहीं को मन राखे काम-१९९४। मन (में) रखना - ध्यान में बसाना। मन राखत - ध्यान में रखते हैं। उ. - जिहि जिहिं भाँति ग्‍वाल सब बोलत, सुनि स्रवननि मन रखत-४९३। मन लगना - (१) तबियत लगना। (२) ध्यान बना रहना। (३) प्रेम या अनुराग होना। नहिं मन लागत - जी नहीं लगता है, तबियत घबराती है। उ. - (क) नैंकहूँ कहूँ मन न लागत काम धाम बिसारि-७७७। (ख) नेक नहीं घर मों मन लागत-११७५। मन लग्यो (लाग्यौ - प्रेम या अनुराग हुआ। उ. - (क)जाकौ मन लाग्यो नंदलालहिं ताहिं और नहिं भावै-2-१०। (ख) सूरदास चित ठौर नहीं कहुँ मन लाग्यो नँदलाहिं सौं-११८०। (ग) मेरो मन रसिक लग्यौ नँदलालहिं झखत रहत दिन रातौ-३११६। मन लगाना - (१) ध्यान देना, सोचना, विचारना। (२) जी बहलाना, विनोद करना। (३) प्रेम या अनुराग करना। मन नहिं अनत लगावै - दूसरी ओर ध्यान नहीं देता, कुछ और सोचता ही नहीं। उ. - ऐसे सूर कमल लोचन बिनु मन नहिं अनत लगावै हो.-2८०४। मन लाना - (१) जी लगाना, ध्यान देना। (२) प्रेम करना आसक्त होना। मन लायौ - प्रेम किया। उ. - मूरत, त पर - तिय मन लायो, इंद्रानी तजिकै ह्याँ आयौ-६- ८। मन से उतरना - (१) आदर भाव न रह जाना। (२) याद न रहना। मन से उतारना - आदर - भाव न रखना। (२) भुलाना, याद न रहना। मन हरना - मोह लेना, मुग्ध करना। मन हरि लियौ - मुग्ध कर लिया। उ. - मन हरि लियौ मुरारि-७६४। मन हरेउ - मन मुग्ध हो गया। उ. - सूरदास मेरौ मन वाकी चितवन देखि हरेउ री। मन हरयौ - मन मुग्ध कर लिया, मोह लिया। उ. - सूर स्याम मन हरयौ तुम्हारौ हम जानो इह बात बनाई-११८६। (किसी का) मन हाथ में करना (लेना) मन वश में करना। मन ही मन - चुपचाप, भीतर ही भीतर, बिना कुछ कहे - सुने। उ - (क) फरकत बदन उठाइ कै मन ही मन भावै-१०- ७२। (ख) रिसनि रहो झहराइ कै मन ही मन बाम --2१२६। मन हरा होना - चित्त प्रसन्न होना। मन हारना - साहस छोड़ना, उत्साह न रह जाना।

मन
इच्छा, इरादा, विचार।
संज्ञा
[सं. मनस]
मन करना - इच्छा करना। मन माना - इच्छानुसार। मन माने की बात - अपनी - अपनी रुचि या इच्छा है। उ. - ऊधौ मन माने की बात। दाख छुरा छाड़ि कै बिष कीरा बिस खात - ता० ४६३९। मन होना - इच्छा होना, जो चाहना।

मन
मन।
संज्ञा
[सं. मणि]

मन
चालीस सेर की एक तौल।
संज्ञा
[सं. मणि]

मनचला
रसिक।
वि
[हिं.मन+चलना]

मनचाहता
जो प्रिय लगे।
वि.
[हिं. मन+चाहना]

मनचाहता
जो मन के अनुकूल हो।
वि.
[हिं. मन+चाहना]

मनचाहा
इच्छित।
वि.
[हिं. मन+चाहना]

मनचीतना, मनचीतनो
अच्छा लगना।
क्रि. स.
[हिं. मन+चाहना]

मनचीता, मनचीते, मनचीत्यो
मन में चाहा या सोचा हुआ।
वि.
[हिं. मन+चेतना]
(क) घर डर बिसरेउ बढ़ेउ उछाह। मनचीते हरि पायो नाह। (ख) सूर स्याम दासी सुख सोवहु भयौ अभय मन चीत्यौ-2८८४।

मनजात
कामदेव।
संज्ञा
[हिं. मन+सं. जात]

मनन
चिंतन, विचार।
संज्ञा
[सं.]

मननशील
चिंतनशील।
वि.
[सं. मनन+शील]

मननाना, मननानो
गूँजना।
क्रि. अ.
[अनु. मन]

मनमथ
कामदेव।
संज्ञा
[सं. मन्मथ]
लटकन सीस कंठ मनि भ्राजत मनमथ कोटि वारनै गै री-१०-५५।

मनमथारि
शिवजी।
संज्ञा
[सं. मन्मथ + अरि]

मनमानना
मनचाहा।
वि.
[हिं. मन+मानना]

मनमाना
जो मन को रुचे।
वि.
[हिं. मन+मानना]

मनमाना
मन के अनुकूल।
वि.
[हिं. मन+मानना]

मनमाना
मनयाहा।
वि.
[हिं. मन+मानना]

मनमानै
जो रुचे या मन चाहे।
वि.
[हि, मन + मानना]
मनमानै सोऊ कहि डारौ-३००४।

मनमुखी
मनचाहा काम करनेवाला, स्वेच्छाचारी।
वि.
[हिं. मन + मुख्य]

मनमुटाव
बैर, वैमनस्य।
संज्ञा
[हिं. मन+मोटा]

मनमोदक
सुखदायी, परंतु कल्पित बात।
संज्ञा
[हिं. मन+मोदक]

मनबांछित
इच्छित, मनभाया।
वि.
[सं. मनोवांछित]
(क) मनवांछित फल सबहिन पायौ-सारा, १६५। (ख) माँगो सकल मनोरथ अपने मनबांछित फल पायो-सारा. ३६८।

मनभाया, मनभायो
जो मन को रुचे या भला लगे।
वि.
[हिं. मन+भाना]
सूरदास प्रभु रसिक सिरोमनि कियौ कान्ह ग्वालिनि मनभायौ।

मनभावता, मनभावतो
रुचने या प्रिय लगनेवाला।
वि.
[हिं. मन+भाना]

मनभावता, मनभावतो
प्रिय, प्यारा।
वि.
[हिं. मन+भाना]

मनभावन, मनभावनो
रुचने या प्रिय लगनेवाला।
वि.
[हिं. मन+भाना]
चरन धोइ चरनोदक लीनौ, कह्यौ माँगु मनभावन-८.१३।

मनभावन, मनभावनो
प्रिय, प्यारा।
वि.
[हिं. मन+भाना]
(क) जुग जुग जीवहु कान्ह सबही मन भावन रे। (ख) हित कै चित की मानत सबके जिय की जानत सूरदास मनभावन-१०-२५१।

मनभावनी
रुचनेवाली।
वि.
[हिं. मनभावना]
भाट बोलै बिरद नारी बचन कहैं मनभावनी।

मनभावनी
प्यारी।
वि.
[हिं. मनभावना]

मनमत
मतवाला।
वि.
[हि. मैमंत]

मनमति
मनमौजी, स्वेच्छाचारी।
वि.
[हिं. मन + मति]

मनमोहन, मनमोहना, मनमोहनो
मन को मोहने या लुभानेवाला, चित्ताकर्षक।
वि.
[हिं. मन+ मोहन]

मनमोहन, मनमोहना, मनमोहनो
(क) जाकौ मनमोहन अंग करै-१- ३७। (ख) स्यामा स्याम मिले ललितादिहि सुख पावत मनमोहनो-२२८०।
संज्ञा
(१) श्रीकृष्ण का एक नाम।

मनमौजी
मनमाना काम करनेवाला, स्वेच्छाचारी।
वि.
[हिं. मन+मौज]

मनरंज, मनरंजन
मन को आनंदित करने वाला, मनोरंजक।
वि.
[हिं. मन + रंजना]
(क) सिवबिरंचि खंजन मनरंजन छिन छिन करत प्रबेस-१-३३९। (ख) खंजन मनरंजन न होहिं ए कबहीं नहिं अकुलात-2७७७।

मनरंज, मनरंजन
मनोरंजन
संज्ञा

मनलाड़
सुखद कल्पना, मनमोदक।
संज्ञा
[हिं. मन + लड्डू]
काकी भूख गई मनलाड़ू सो देखहु चित चेत-३२५६।

मनवांछित
मनचाहा, अभीष्ट।
वि.
[सं. मनोवांछित]

मनवाना, मनवानो
मानने की प्रेरणा देना।
क्रि. स.
[हिं. मानना]

मनशा
इच्छा।
संज्ञा
[अ]

मनशा
तात्पर्य।
संज्ञा
[अ]

मनसना, मनसनो
इच्छा या विचार करना।
क्रि. स.
[हिं. मानस]

मनसना, मनसनो
संकल्प या निश्चय करना।
क्रि. स.
[हिं. मानस]

मनसना, मनसनो
जल लेकर संकल्प करके दान करना।
क्रि. स.
[हिं. मानस]

मनसब
पद।
सज्ञा
[अ]

मनसब
काम।
सज्ञा
[अ]

मनसबदार
जो किसी मनसब पर हो।
सज्ञा
[फा.]

मनसा
एक देवी।
संज्ञा
[सं.]

मनसा
इच्छा, कामना, अभिलाषा, मनोरथ।
संज्ञा
[सं. मानस]
(क) सूरदास ज्यौं मन तें मनसा अनत कहूँ नहिं जावै। (ख) सूर प्रभु कौ दरस दीजै नहीं मनसा और-३३८३।

मनसा
संकल्प, निश्चय।
संज्ञा
[सं. मानस]

मनसा
मन।
संज्ञा
[सं. मानस]
मनसा-बाचा-कर्म अगोचर सो मूरति नहिं नैन धरी-१-११५।

मनसा
बुद्धि।
संज्ञा
[सं. मानस]
(क) पांच कमल मधि जगल कमल लखि मनसा भई अपंग। (ख) सूर हरि की निरखि सोभा भई मनसा पंग-६२७।

मनसा
अभिप्राय, तात्पर्य।
संज्ञा
[सं. मानस]

मनसा
मन से उत्पन्न।
वि.

मनसा
मन का।
वि.

मनसा
मन में किया हुआ, मानसिक।
मनसा पाप लगै नहिं कोइ-१-२९०।

मनसा
मन से, मन के द्वारा।
क्रि.वि.

मनसाना, मनसानो
उमंग में आना।
क्रि. अ.
[हिं. मनसा]

मनसाना, मनसानो
संकल्प आदि पढ़कर या पढ़ाकर दान आदि कराना।
क्रि. स.
[हिं. मनसाना]

मनसानाथ
इच्छा पूरी करनेवाला।
वि.
[हिं. मनसा+सं. नाथ]
मनसानाथ मनोरथ पूरन सुख निधान जाकी मौज घनी-१.३९।

मनसायन
मन-बहलाव के लिए जाने का स्थान।
संज्ञा
[हिं. मानुस+आयन]

मनसिज
मन से।
क्रि. वि.
[हिं. मन]

मनसिज
कामदेव।
संज्ञा
[सं.]
तब को इंदु सम्हारि तुरत ही मनसिज साजि लियौ-३४७४।

मनसुखा
श्रीकृष्ण का सखा एक गोप।
संज्ञा
[हिं मन + सुख]
रैता पैता मना मनसुखा हलधर संगहिं रैहौं-४१२।

मनसूबा
युक्ति।
संज्ञा
[अ]

मनसूबा
इरादा।
संज्ञा
[अ]

मनसूर
एक सूफी साधु।
संज्ञा
[अ.]

मनस्क
मन (अल्पार्थक रूप)।
संज्ञा
[सं.]

मनस्ताप
आंतरिक दुख।
संज्ञा
[सं.]

मनस्ताप
पछतावा, अनुताप।
संज्ञा
[सं.]

मनस्वी
बुद्धिमान।
वि.
[सं. मनस्विन्]

बाधित
असंगत।
वि.
[सं.]

बाधित
प्रभावहीन, ग्रस्त।
वि.
[सं.]

बाधी
बाधा डालनेवाला।
वि.
[सं. बाधिन्]

बाधो
अड़चन, रुकावट।
संज्ञा
[हिं. बाधा]
मिलि ही में बिपरीत करी बिधि होत दरस को बाधो-2७५८।

बाध्य
रोका या दबाया जानेवाला, विवश।
वि.
[सं.]

बान
बाण, तीर।
संज्ञा
[सं. बाण]
अचरज कहा पार्थ जौ बेधै, तीन लोक इक बान-१-२६९।

बान
एक तरह की आतशबाजी।
संज्ञा
[सं. बाण]

बान
सजधज।
संज्ञा
[हिं.बनना]

बान
टेव, आदत।
संज्ञा
[हिं.बनना]

बान
रंग, आब, कांति।
संज्ञा
[सं. वर्ण]

मनहर
मन हरनेवाला।
वि.
[सं. मनोहर]
(क) बेनी लटकन मसिबंदा मुनि-मनहर-१०-१५१। (ख) बिनय बचननि सुनि कृपानिधि चले मनहर चाल-१०-२१८।

मनहर
घनाक्षरी छन्द।
संज्ञा

मनहरण, मनहरन
मन हरने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. मन+हरण]

मनहरण, मनहरन
मन हरनेवाला, मनोहर।
वि.

मनहार, मनहारि, मनहारी
सुंदर।
वि.
[हिं. मनोहारी]

मनहुँ, मनहूँ
मानो, जैसे।
अव्य.
[हिं. मानौ]

मनहूस
अशुभ।
वि.
[अ.]

मनहूस
जो देखने में बुरा लगे।
वि.
[अ.]

मनहूस
आलसी, निकम्मा।
वि.
[अ.]

मना
जिसको करने की आज्ञा न हो, वर्जित।
वि.
[अ.]

मना
मन, चित्त।
संज्ञा
[हिं. मन]
मना (मन) रे, माधव सौं करि प्रीति-१-३२५।

मना
श्री कृष्ण का सखा एक गोप।
संज्ञा
[हिं. मन]
रैता पैता मना मन सुखा हलधर सहिं रहौं-४१२।

मनाइए, मनाइये
प्रसन्न कीजिए, मान मोचन कीजिए।
क्रि. स.
[हिं. मनाना]
अति रिस कृष ह्वै रही किसोरी करि मनुहारि मनाइये-१६८८।

मनाई
सेवा-पूजा की या करके।
क्रि. स.
[हिं. मनाना]
(क) यह औसर कब ह्वैहै फिरि कै पायौ देव मनाई-१०-१८। (ख) जा सुख कौं सिव-गौरि मनाई तिय-ब्रत-नेम अनेक करी-१०-८०।

मनाई
न करने की आज्ञा।
संज्ञा
[हिं मनाही]

मनाऊ
सेवा-पूजा से प्रसन्न करूँ।
क्रि. स.
[हिं. मनाना]

मनाऊ
स्तुति या प्रार्थना करूँ।
क्रि. स.
[हिं. मनाना]
पुनि-पुनि देव मनाऊँ-सारा० ७८०।

मनाक, मनाक्, मनाग
थोड़ा, अल्प।
[सं. मनाक]

मनादी
ढिंढोरा, घोषणा।
संज्ञा
[अ. मुनादी]

मनाना, मनानो
दूसरे को मानने या स्वीकारने को प्रवृत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. मानना]

मनाना, मनानो
रूठे हुए को प्रसन्न या संतुष्ट करने के लिए अनुनय विनय या मीठी-मीठी बातें करना।
क्रि. स.
[हिं. मानना]

मनाना, मनानो
मनोरथ पूरा करने के लिए देवी-देवता आदि की पूजा, सेवा या प्रार्थना करना।
क्रि. स.
[हिं. मानना]

मनाना, मनानो
स्तुति या प्रार्थना करना।
क्रि. स.
[हिं. मानना]

मनाना, मनानो
कामना या इच्छा करना।
क्रि. स.
[हिं. मानना]

मनायो, मनायौ
मनोरथ पूरा करने के लिए देवी-देवता की प्रार्थना की।
क्रि. स.
[हिं. मनाना]
मुदित ह्वै गई गौरि मंदिर जोरि करि बहु बिधि मनायौ-१० उ०-१८।

मनावत
मीठी-मीठी बातें करके रूठे हुए को प्रसन्न करता है।
क्रि. स.
[हिं. मनाना]
ससि कौं देखि आइ हठि ठानी, करि मनुहार मनावत-सारा. ४३९।

मनावतिं
प्रार्थना या स्तुति करती हैं।
क्रि. स.
[हिं. मनाना]
ब्रज-जुवती स्यामहिं डर लावतिं। बारंबार निरखि कोमल तनु कर जोरहिं बिधि कौं जु मनावतिं-३९०।

मनावति
स्तुति या प्रार्थना करती है।
क्रि. स.
[हिं. मनाना]
कबहुँक कुल देवता मनावति-१०-११५।

मनावति
मनोरथ पूर्ण करने के लिए प्रार्थना करती है।
क्रि. स.
[हिं. मनाना]
(क) यह कहि कहि देवता मनावति। (ख) जोरि कर बिधि सों मनावति असीसै दै नाम-2५६५।

मनावन
मनाने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. मनाना]

मनिआ
माला का दाना, गुरिया।
संज्ञा
[हिं. मनिका]

मनिआ
कंठी, माला।
संज्ञा
[हिं. मनिका]
हौं करि रही कंठ में मनिआ निर्गुन कहा रसहिं ते काज-३३५२।

मनिका
माला का दाना, गुरिगा।
संज्ञा
[सं. मणि]

मनिधर
साँप, सर्प।
संज्ञा
[सं. मणिधर]
मानौं मनिधर मनि ज्यौं छाँड़्यौ फन तर रहत दुराए-६७५।

मनिमय
मणियों से युक्त।
वि.
[सं. मणि + हि. मय]

मनिमय
जिसमें मणियाँ जड़ी हों।
वि.
[सं. मणि + हि. मय]
मनिमय भूमि नंद के आलय-१०-१२१।

मनियाँ, मनिया
कंठी या माला में पिरोया जानेवाला दाना।
संज्ञा
[सं. माणिक्य]
अपने हाथ पोहि पहिरावत कान्ह कनक के मनियाँ-2८ ७९।

मनियाँ, मनिया
मोती या गजमोती आदि जो कठुला आदि में पिरोया जाय।
संज्ञा
[सं. माणिक्य]
कठुला कंठ मंजु गज मनियाँ-१०-१०६।

मनियाँ, मनिया
कंठी, माला।
संज्ञा
[सं. माणिक्य]
हौं करि रही कंठ में मनियाँ (मनिआ) निर्गुन कहा रसहिं ते काज-३३५२।

मनियार, मनियारा, मनियारो, मनियारौ
चमकीला।
वि.
[सं. मणि+आर]

मनावन
रूठे हुए को प्रसन्न करने की क्रिया या भाव; मनाने के लिए।
संज्ञा
[हिं. मनाना]
(क) स्याम मनावन मोहिं पठाई-2०२२।

मनावन
स्तुति या प्रार्थना करने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. मनाना]

मनावहिं
मीठी-मीठी बातें कहकर रूठे हुए को मनाते हैं।
क्रि. स.
[हिं. मनाना]
हम नाहिंन कमला सी भोरी करि चातुरी मनावहिं.-2९८५।

मनावहु
मनोरथ पूर्ण करने के लिए देवी-देवता की प्रार्थना करो।
क्रि. स.
[हिं. मनाना]
वह देवता मनावहु सब मिलि तुरत कमल जा देइ पठाइ-५३१।

मनावैं
स्तुति या प्रार्थना करती हैं।
क्रि. स.
[हिं. मनाना]
ब्रज जुवती हरि चरन मनावैं-६३१।

मनावै
मनोरथ पूर्ण करने के लिए देवी-देवता की प्रार्थना या स्तुति करती है।
क्रि. स.
[हिं. मनाना]
(क) सूरदास ऐसे प्रभु तजि कै घर-घर देव मनावै-१-३१। (ख) कबहिं घुटुरुवनि चलहिंगे कहिविधिहिं मनावै-१०-७४।

मनावै
कामना करता है।
क्रि. स.
[हिं. मनाना]
ऐसौ को ठाकुर जन-कारन दुख सहि भलौ मनावै-१-१२२।

मनाही
न करने की आज्ञा।
संज्ञा
[हिं. मना]

मनि
मणि, रत्न।
संज्ञा
[सं. मणि]

मनि
सर्प के मस्तक से प्राप्त (कल्पित) मणि।
निरखति रहौं फनिग की मनि ज्यौं-१०-२९६।

मनियार, मनियारा, मनियारो, मनियारौ
सुहावना, शोभायुक्त।
वि.
[सं. मणि+आर]

मनिहार
चूड़ी बनाने-बेचने वाला।
संज्ञा
[सं. मणिकार, प्रा. मनियार]

मनी
घमंड, गर्व।
संज्ञा
[हिं. मान = अभिमान]

मनी
मणि, रत्‍न।
संज्ञा
[सं. मणि]
कहा काँच संग्रह के कीने हरि जो अमोल मनी-८९४।

मनी
सर्प के मस्तक की मणि।
संज्ञा
[सं. मणि]
खाइ न सकै खरवि नहिं जानै ज्यौं भुवंग-सिर रहत मनी-१-३९।

मनी
श्रेष्ठतम व्यक्ति।
संज्ञा
[सं. मणि]
तिहूँ लोक के धनी मनी तुमही को सो है-१० उ०-८।

मनीषा
बुद्धि।
संज्ञा
[सं.]

मनीषि, मनीषी
पंडित, ज्ञानी।
वि.
[सं. मनीषि]

मनीषि, मनीषी
बुद्धिमान।
वि.
[सं. मनीषि]

मनु
ब्रह्मा के 'स्वायम्' आदि वे चौदह पुत्र जिनसे 'मानव' जाति का आरंभ माना जाता है।
संज्ञा
[सं.]
(क) पुनि दच्छादि प्रजापति भए। स्वयंभुव सो आदि मनु जए-३-८। (ख) स्वायंभू मनु के सुत दोइ-४-८।

मनुश्रेष्ठ
विष्णु।
संज्ञा
[सं.]

मनुष
मनुष्य।
संज्ञा
[सं. मनुष्य]
कह्यौ तिन तुम्हैं हम मनुष जानत नहीं।

मनुष
(स्त्री का) पति।

मनुषी
स्त्री, नारी।
संज्ञा
[सं. मनुष्य]

मनुष्य
आदमी।
संज्ञा
[सं.]
अबकी बेर मनुष्य देह धरि कियौ न कछ उपाइ-१-१५५।

मनुष्यता
मनुष्य होने का भाव।
संज्ञा
[सं.]

मनुष्यता
दया, करुणा।
संज्ञा
[सं.]

मनुष्यता
सभ्यता, शिष्टता।
संज्ञा
[सं.]

मनुष्यत्व
मनुष्य होने का भाव।
संज्ञा
[सं.]

मनुसा
मनुष्य।
संज्ञा
[सं. मनुष्य]

मनु
चौदह की संख्या।
संज्ञा
[सं.]

मनु
मानो, जैस।
अव्य.
[हिं. मानना]
(क) मनु संचित भू-भार उतारन चपल भए अकुलाए-१-२७३। (ख) मनु मदन धनु-सर सँवाने-१-३०७।

मनुआँ, मनुआ
मन।
संज्ञा
[हिं. मन]

मनुआँ, मनुआ
मनुष्य।
संज्ञा
[हिं. मानव]

मनुज
मनुष्य।
संज्ञा
[सं.]

मनुजात
मनु’ से उत्पन्न।
वि.
[सं.]

मनुजात
आदमी, मनुष्य।
संज्ञा

मनुजाद
मनुष्य को खानेवाला।
वि.
[सं.]

मनुजाद
राक्षस।
संज्ञा
[सं.]

मनुरंजन
मनोरंजन करनेवाला।
वि.
[हिं. मनोरंजन]
जगहित जनक-सुता मनुरंजन-९८२।

मनैं
मन में।
संज्ञा
[हिं. मन+ऐ]
यह हित मनैं कहत सूरज प्रभु इहिं कृति कौ फल तुरत चखैहौं-७-५।

मनैहैं
मनाकर, बिनती-प्रार्थना करके।
क्रि. स.
[हिं. मनाना]
जिन पुत्रनिहिं बहुत प्रतिपाल्यौ देवीदेव मनैहैं-१-८६ .

मनैहैं
मनायंगे, बिनती-प्रार्थना करेंगे।
क्रि. स.
[हिं. मनाना]
मेरे मारत काहि मनैहैं.-१०२४।

मनों
मानो, जैसे।
अव्य.
[हिं. माना]

मनोकामना
इच्छा।
संज्ञा
[हिं. मन +कामना]

मनोगत
मन का (विचार आदि)।
वि.
[सं.]

मनोगति
इच्छा, अभिलाषा।
संज्ञा
[सं.]

मनोज
कामदेव।
संज्ञा
[सं.]
सकल सुख की सीव कोटि मनोज सोभा हरनि-१०-१०९।

मनोज्ञ
सुंदर, मनोहर।
वि.
[सं.]

मनोज्ञता
संदरता, मनोहरता।
संज्ञा
[सं.]

मनुसाइ, मनुसाई
पुरुषार्थ, पराकम।
संज्ञा
[हिं. मानुस+आई]

मनुसाइ, मनुसाई
मनुष्यता, शिष्टता।
संज्ञा
[हिं. मानुस+आई]

मनुस्मृति
हिंदुओं का एक प्रसिद्ध धर्म शास्त्र जिसके रचयिता 'मनु' माने जाते हैं।
संज्ञा
[सं.]

मनुहार
अप्रसन्नता या मान दूर करने के लिए की गयी खुशामद या विनय।
संज्ञा
[हिं. मान + हरना]
(क) तुम्हरै हेत लियौ अवतार। अब तुम जाइ करौ मनुहार-७-२। (ख) ससि कौं देखि आर हरि टानी करि मनुहार मनावति-सारा.४३९। (ग) करि मनुहार, कोसिवै कैं डर भरि-भरि देति जसौदा मात-१०-३३१।

मनुहार
विनय, प्रार्थना।
संज्ञा
[हिं. मान + हरना]

मनुहार
आदर-सत्कार
संज्ञा
[हिं. मान + हरना]
बिदा करे निज लोक कौं इहि बिधि करि मनुहार-४९२।

मनुहारना, मनुहारनो
मनाना, खुशामा करना।
क्रि. स.
[हिं. मान+हरना]

मनुहारना, मनुहारनो
विनय या प्रार्थना करना।
क्रि. स.
[हिं. मान+हरना]

मनुहारना, मनुहारनो
आदर-सत्कार करना।
क्रि. स.
[हिं. मान+हरना]

मनुहारि, मनुहारी
मनावन, खुशामद।
संज्ञा
[हिं. मनुहार]
करि मनुहारि (मनुहारी) - (१) मीठो बातें कह कहकर, खुशासन करके, मनाकर। उ. - (क) करि मनुहारि कलेऊ दीन्हौ-१०-१६३। (ख) करि मनुहारि उठाइ गोद लै बरजति सुत कौं मात-१०- ३२६। करति मनुहरि - बिनती या प्रार्थना करती है। उ - सबै करति मनुहारि उधौ, कहियो हो जैसे गोकुल आवैं करी (कोल्ही) मनुहारी - बिनती - प्रार्थना की। उ - (क) चलियै विप्र जहाँ जग बेदी बहुत करी मनुहारी-८-१४। (ख) उन सबकी कीन्ही मनुहारी-१० उ०-१०५।

बाधक
हानिकारक।
संज्ञा
[सं.]

बाधकता
अड़चन।
संज्ञा
[सं.]

बाधकता
कठिनता।
संज्ञा
[सं.]

बाधन
विध्न डालना।
संज्ञा
[सं.]

बाधन
कष्ट देना
संज्ञा
[सं.]

बाधना
विघ्न-बाधा डालना।
क्रि. स.
[सं. बाध]

बाधा
रुकावट, अड़चन, विघ्न।
संज्ञा
[सं.]
चितैबौ छाँड़ि दै री राधा। हिलि-मिलि खेलि स्याम सुंदर सौं, करति काम कौ बाधा-७२१।

बाधा
कष्ट, दुख।
संज्ञा
[सं.]

बाधा
भय, आशंका।
संज्ञा
[सं.]
आजु ही प्रात इक चरित देख्यो नयो तबहिंतें मोहिं यह भई बाधा।

बाधित
जिसके कार्य या साधन में बाधा पड़ी हो।
वि.
[सं.]

मनोनीत
मन के अनुकून।
वि.
[सं.]

मनोनीत
चुना हुआ।
वि.
[सं.]

मनोभव
कामदेव।
संज्ञा
[सं.]

मनोभाव
मन का भाव।
संज्ञा
[सं.]

मनोभिराम
सुंदर, मनोहर।
वि.
[सं.]

मनोमालिन्य
मनमुटाव, बैर।
संज्ञा
[सं.]

मनोयोग
चिर-वृत्ति का निरोध।
संज्ञा
[सं.]

मनोरंजक
मन प्रसन्नकारी।
वि.
[सं.]

मनोरंजन
मन-बहलाब, मनोविनोद।
संज्ञा
[सं.]

मनोरथ
इच्छा, अभिलाषा।
संज्ञा
[सं.]

मनोवेग
मन में उत्‍पन्न भाव।
संज्ञा
[सं].

मनोसर
मनोविकार।
संज्ञा
[सं. मन]

मनोहर
मन हरनेवाला, सुन्दर।
वि.
[सं.]
(क) परम पंकज अति मनोहर सकल सुख के करन-१-३०८। (ख) तुम बिछुरत घनस्याम मनोहर हम अबला सरधाते-पृ. ४६०।

मनोहरता, मनोहरताई
मनोहर होने का भाव, सुंदरता।
संज्ञा
[सं. मनोहरता]

मनोहारि, मनोहारी
सुंदर।
वि.
[सं. मनोहारिन्]

मनौ
मानो, जैसे।
अव्य.
[हिं. मानना]
सूरदास भगवत-भजन दिनु मनौ ऊँट-बृष-भैंसौ-2-१४।

मनौति, मनौती
अप्रसन्न को मनाना।
संज्ञा
[हिं. मानना+औती]

मनौति, मनौती
कामना पूर्ण होने पर पुण्य कार्य विशेष करने का संकल्प देवी-देवता के समक्ष करना, मानता, मन्नत।
संज्ञा
[हिं. मानना+औती]

मनौवल
रूठे हुए को मनाने का भाव या कार्य।
संज्ञा
[हिं. मनाना]

मन्नत
मानता, मनौती।
संज्ञा
[हिं. मनाना]

मनोरथदाता
इच्छा पूरी करनेवाला।
वि.
[सं.]
मननानाथ मनोरथदाता हौ प्रभु दीनदयाल-१-१८९।

मनोरथपूरन
इच्छा पूरी करने वाला।
वि.
[सं मनोरथ + पूर्ण]
मनसानाथ मनोरथ पूरन सुख-निधान जाकी मीज घनी-१.३९।

मनोरम
सुंदर, मनोहर।
वि.
[सं.]

मनोरा
चित्र जो कार्तिक में गोबर से दीवार पर बनाकर पूजे जाते हैं।
संज्ञा
[सं. मनोहर]

मनोरा
मनोरा झूमक-एक गीत जो फागुन में गाया जाता है और जिसके अंत में मनोरा भूमक' पद्य रहता है।
यौ.
गोकुल सकल स्वालिनी ही घर घर खेलै फागु मनरा झूमक रो-2४०१।

मनोराज, मनोराज्य
मन की कल्पना।
संज्ञा
[सं. मनोगज्य]

मनोराज, मनोराज्य
मनमौजीपन।
संज्ञा
[सं. मनोगज्य]

मनोविकार
वह विचार या भाव जो मन की अवस्था-विशेष में उत्पन्न हो।
संज्ञा
[सं].

मनोविज्ञान
वह शास्त्र जिसमें मन की वृत्तियों का विवेचन हो।
संज्ञा
[सं].

मनोवृत्ति
मन की वृत्ति।
संज्ञा
[सं].

मन्मथ
कामदेव।
संज्ञा
[सं.]
(क) सखी संग की निरखति यह छबि भईं ब्याकुल मन्मथ की ढाढ़ी-७३६। (ख) अबला कहा जोग मत जानैं मन्मथ ब्यथा बिगोयौ-३४८२।

मन्वंतर
इकहत्तर चतुर्युगी का काल जो ब्रह्मा के एक दिन के चौदहवें भाग के बराबर होता है।
संज्ञा
[सं.]
(क) करौ मन्वंतर लौं तुम राज-७-२। (ख) मन्वंतर लौं कियौ जेहि राज-११-३।

मम
मेरा, मेरी।
सर्व.
[सं. 'अहं' का षष्ठी एक.]
महाराज, तुम तो हो साधु। मम मन्या तैं भयौ अपराध-९.३।

ममता
अपना’ समझने का भाव।
संज्ञा
[सं.]

ममता
मोह, लोभ।
संज्ञा
[सं.]
(क) हिंसा-मद ममता-रस भूल्यौ आसाहों लपटानौ-१-४७। (ख) ममता घटा, मोह की बूंदै-१-२०९।

ममत्व
मोह-ममता का भाव।
संज्ञा
[सं.]
(क) सुत-कलत्र कौं अपनौं जानै अरु तिनसौं ममत्व बहु ठानै-३-१३। (ख) रिषभ ममत्व देह कौ त्याग-५-२।

ममाखी
मधुमक्खी।
संज्ञा
[हिं. मधुमक्खी]

ममिया
मामा' के स्थान या संबंध का।
वि.
[हिं. मामा + इया]

ममोला
उत्साह, उमंग।
संज्ञा
[.हिं. मन+मोल ?]

मयंक
चंद्रमा।
संज्ञा
[सं. मृगांक]
मुख-मयंक मधु पियत करत कसि ललना तऊ न अघाति-१९२३।

मयंद
सिंह।
संज्ञा
[सं.मृगेंद्र]

मयंद
राम की सेना का एक बानर अधिनायक।
संज्ञा
[सं.मृगेंद्र]

मय
एक प्रसिद्ध दानव जो बड़ा शिल्पी था।
संज्ञा
[सं.]
मय मायामय कोट सँवारौ-७-७।

मय
युक्त, सहित।
अव्य.
खोवा मय मधुर मिठाई-१०-१८३।

मयगल
मस्त हाथी।
संज्ञा
[सं.मंदकल, प्रा. मयगल]

मयत्रय, मयत्रेय
एक ऋषि जो पराशर के शिष्य थे और जिनसे विष्णु पुराण कहा गया था।
संज्ञा
[सं.]
कहौ मयत्रेय सौं समुझाइ, यह तुम बिदुरहिं कहियौ जाइ-३.४।

मयन
कामदेव।
संज्ञा
[सं. मदन]

मयना
मैना।
संज्ञा
[हिं. मैना]

मयमंत, मयमत्त
मस्त, मदमत्त।
वि.
[सं. मदमत्त]
त्रिया-चरित् मयमंत (मतिमंत) न समुझत ९-३१।

मया
भ्रमजाल, माया।
संज्ञा
[सं. माया]

मया
संसार, जगत।
संज्ञा
[सं. माया]

मया
जीवन।
संज्ञा
[सं. माया]

मया
मोह-ममता, स्नेह।
संज्ञा
[सं. माया]
(क) बाबा नंद झखत किहिं कारन यह कहि मया मोह अरुझाई-५३१। (ख) हम पर बबा मया करि रहियौ सुन अपनी जिय जान-2६५८। (ग) हौं तौ धाइ तिहारे सुत की मया करत ही रहियो-2७०७।

मया
दया, कृपा।
(क) गुरुजन बिच मैं आँगन ठाढ़ी अति हित दरसन दियौ मया करि-१४६१। (ख) कहिधौं मृगी मया करि हमसौं कहिधौं मधुप मराल-१८०८। (ग) धन्य स्याम बृंदाबन कौ सुख संत मया तैं जान्यौ-१८५७।

मयार
दयालु, कृपालु।
वि.
[सं. मायालु]

मयारि, मयारी
वह डंडा जिस पर हिंडोले की रस्सी लटकायी जाती है।
संज्ञा
[देश.]
(क) कंचन खंभ मयारि मरुवा डाड़ी खचि हीरा बिच लाल प्रबाल-१०-८४। (ख) खंभ जंबुन दि सुबिद्रुम रची रुचिर मयारि-2२८९।

मयी
युक्त, सहित।
अव्य.
[हिं. मय]

मयूख
किरण।
संज्ञा
[सं.]

मयूख
प्रकाश।
संज्ञा
[सं.]

मयूर
मोर।
संज्ञा
[सं.]
सोभित सुमन मयूर चंद्रिका नील नलिन तनु स्याम-१०-१५४।

मयूष
किरण, रश्मि।
संज्ञा
[सं. मयूख]
लागत चंद-मयूष सु तौ तनु लता-भवन रंध्रनि मग आये-१५६२।

मयौ
युक्त, सहित।
अव्य.
[हिं. मय]
बारंबार नंद कैं आँगन लोटत द्विज आनंद मयौ-१०-२५०।

मरंद
मकरंद।
संज्ञा
[सं. मकरंद, प्रा. मरंद]

मरई
मरता है।
क्रि. अ.
[हिं. मरना]
याहिं मारि तोहिं और बिबाहौं अग्र-सोच क्यौं मरई-१०-४।

मरक
मृत्यु, मरण।
संज्ञा
[सं.]

मरक
संकेत
संज्ञा
[हिं. मड़क]

मरक
गूढ़ार्थ, गूढ़ उद्देश्य, विशेष आशय।
संज्ञा
[हिं. मड़क]

मरकट
बंदर।
संज्ञा
[सं. मर्कट]
खर कौं कहा अरगजा लेपन मरकट भूषन अंग-१-३३२।

मरकत
पन्ना।
संज्ञा
[सं.]
(क) यौं लपटाइ रहे उर उर ज्यौं मरकत मनि कंचन मैं जरिया-६८८। (ख) करौं न अंजन धरौं न मरकत मृगमद तनु न लगाऊँ-2१५०।

मरकना, मरकनो
दबकर टूटना, दबना।
क्रि. अ.
[अनु.]

मरकना, मरकनो
मुड़ना, मुड़कना।
क्रि. अ.
[अनु.]

मरकहा
सींग से मारनेवाला।
वि.
[हिं. मारना]

मरकाना, मरकानो
दबाकर तोड़ना।
क्रि. स.
[हिं. मरकना]

मरकाना, मरकानो
मोड़ना, मरोड़ना।
क्रि. स.
[हिं. मरकना]

मरगजना, मरगजनो
मल-मसल कर विकृत कर देना।
कि. स.
[हिं. मलना+गींजना]

मरगजा
दला-मला, मसला या गींजा हुआ।
वि.
[हिं. मलना+गींजना]

मरगजी
दली-मली, मसली या गींजी हुई।
वि.
[हिं. मरगजा]
(क) अंग मरगजी पटोरी राजति-१२३२। (ख) नागरि अंग मरगजी सारी-१५६७। (ग) सीधे अरगजी अरु मरगजी सारी-१५८२।

मरगजे, मरगजै
दला-मला, मसला या गींजा हुआ।
वि.
[हिं. मरगना]
(क) सूरदास प्रभु प्यारी राजत आबत भ्राजत बने हैं मगजे बागे-पृ. ३१५ (४९)। , (ख) सिथिल अंग मरगजे अंबर अतिहिं रूप भरे-१९२१। (ग) हरबराइ उठि आइ प्रात तें बिथुरो अलक अरु बसन मरगजै-११८३।

मरघट
वह घाट या स्थान जहाँ मुर्दे फूँके जाते हों, श्मशान, मसान।
संज्ञा
[हिं. मरना+घाट]

मरज
रोग।
संज्ञा
[अ. मर्ज]

मरजी
आज्ञा, स्वीकृति।
संज्ञा
[अ. मरज़ी]

मरजी
प्रसन्नता।
संज्ञा
[अ. मरज़ी]

मरजीवा
गोताखोर।
संज्ञा
[हिं. मरजिया]

मरण
मृत्यु, मौत।
संज्ञा
[सं.]

मरत
मरता है।
क्रि. अ.
[हिं. मरना]

मरत
मरत हौं-मरता हूँ।
प्र.
बिनती करत मरत हौं लाज-१-९६।

मरत
मरता हुआ, मरते समय।
वि.
मरत असुर चिकार पारयौ-४२७।

मरत
मौत, मरण, मृत्यु।
संज्ञा
[सं. मृत्यु]

मरतबा
पर।
संज्ञा
[अ. मर्तबः]

मरतबा
धार।
संज्ञा
[अ. मर्तबः]

मरज
बुरी लत।
संज्ञा
[अ. मर्ज]

मरजाद, मरजादा
सीमा, हद।
संज्ञा
[सं. मर्यादा]
(क) सौ जोजन मरजाद सिंधु को पल मैं राम बिलोयौ-१-४३। (ख) मनु मरजाद उलंबि अधिक बल उमँगि चली अति सुंदरताई-६१६।

मरजाद, मरजादा
प्रतिष्ठा, आदर।
संज्ञा
[सं. मर्यादा]
आइ सृगाल सिंह बलि चाहत यह मरजाद जात प्रभु तेरी-९.९३।

मरजाद, मरजादा
रीति, विधि।
संज्ञा
[सं. मर्यादा]
कलि-मरजाद जाइ नहिं कही-१-२३०।

मरजिया
जो मरने से बचा हो।
वि.
[हिं. मरना+जीना]

मरजिया
जो भरने के समीप हो, मरणासन्न।
वि.
[हिं. मरना+जीना]

मरजिया
जो मरने को उतारू हो।
वि.
[हिं. मरना+जीना]

मरजिया
अधमरा।
वि.
[हिं. मरना+जीना]

मरजिया
गोताखोर।
संज्ञा

मरजी
इच्छा।
संज्ञा
[अ. मरज़ी]

बादी
शरीर की वायु का विकार।
संज्ञा

बादी
अभियोग लगानेवाला।
संज्ञा
[सं. वादिन्, वादी]

बादी
शत्रु।
संज्ञा
[सं. वादिन्, वादी]

बादी
राग का प्रधान स्वर।
संज्ञा
[सं. वादिन्, वादी]

बादुर
चमगादड़।
संज्ञा
[देश.]

बाध
रुकावट, अड़चन।
संज्ञा
[सं.]

बाध
कष्ट।
संज्ञा
[सं.]

बाध
कठिनता।
संज्ञा
[सं.]

बाध
अर्थ का ठीक न बैठना।
संज्ञा
[सं.]

बाधक
बाधा डालनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

मरदानगी
वीरता।
संज्ञा
[फ़ा.]

मरदानगी
साहस।
संज्ञा
[फ़ा.]

मरदाना
पुरुष संबंधी।
वि.
[फा.]

मरदाना
पुरुष जैसा।
वि.
[फा.]

मरदाना
वीरों जैसा, वीरोचित।
वि.
[फा.]

मरदाना
साहस करना।
क्रि. अ.
[हिं. मरद]

मरदि
मसलकर, मईन करके।
क्रि. स.
[हिं. मरदना]
पृष्ट कौ गर्दि मरदि कै चानूर चुरकुट करयौ2६०९

मरन
मौत, मृत्यु।
संज्ञा
[सं. मरण]
तात मरल सिय हरन राम बन-बपु धरि बिपति भरै-१-२६४।

मरना, मरनो
मृत्यु होना।
क्रि. अ.
[सं. मरण]

मरना, मरनो
बहुत दुख सहना।
क्रि. अ.
[सं. मरण]
(किसी के लिए ) मरना - बहुत दुख सहना। (किसी पर) मरना - आसक्त होना। मरना पचना - बहुत दुख सहना। (किसी) बात पर (के लिए) मरना - किसी कारण बहुत दुख सहना।

मरना, मरनो
सूखना, मुरझाना।
क्रि. अ.
[सं. मरण]

मरना, मरनो
अत्यधिक लज्जा या संकोच होना।
क्रि. अ.
[सं. मरण]

मरना, मरनो
सजीवता या तेजी न रह जाना।
क्रि. अ.
[सं. मरण]
पानी मरना - पानी का दीवार या नींव आदि में घँसना। (२) दोष या कलंक आना।

मरना, मरनो
खेल में गोटी या गुइयाँ का पिटना या हारना।
क्रि. अ.
[सं. मरण]

मरना, मरनो
वेग का दबना या शाँत होना।
क्रि. अ.
[सं. मरण]

मरना, मरनो
जलना डाह करना
क्रि. अ.
[सं. मरण]

मरना, मरनो
पछताना।
क्रि. अ.
[सं. मरण]

मरना, मरनो
पराजित होना।
क्रि. अ.
[सं. मरण]

मरना, मरनो
मरने की क्रिया या भाव, मरण।
संज्ञा
तातैं साध-संग नित करना। जातैं मिटै जन्म अरु मरना-३-१३।

मरनि, मरनी
मौत, मृत्यु।
संज्ञा
[हिं. मरना]

मरतो, मरतौ
मरता, मृत्यु को प्राप्त होता।
क्रि. अ.
[हिं. मरना.]
पुनि जीतौ पुनि मरतौ-१-२०३।

मरद
आदमी।
संज्ञा
[फा. मई]

मरद
वीर।
संज्ञा
[फा. मई]

मरदई
मनुष्यता।
संज्ञा
[हिं. मरद+ई]

मरदई
वीरता, बहादुरी।
संज्ञा
[हिं. मरद+ई]

मरदन
नाश करनेवाले।
संज्ञा
[सं. मर्दन]
अध मरदन बक बदन बिदारन-९५४।

मरदाना, मरदनो
मसलना।
क्रि. स.
[सं. मर्दन]

मरदाना, मरदनो
नाश करना।
क्रि. स.
[सं. मर्दन]

मरदाना, मरदनो
माँड़ना, गूँधना।
क्रि. स.
[सं. मर्दन]

मरदनिया
तेल मलने वाला।
वि.
[हिं. मरदना]

मरनि, मरनी
मति भई मरनी-मरने की इच्छा हुई।
प्र.
सूर प्रभु के बचन सुनत, उगिनि कहयौ, जाहि अब क्यौं न, मति भई मरनी-५५१।

मरनि, मरनी
दुख, कष्ट।
संज्ञा
[हिं. मरना]

मरनि, मरनी
मृत्यु का शोक।
संज्ञा
[हिं. मरना]

मरनि, मरनी
मृत्यु पर किया जानेवाला क्रिया-कर्म।
संज्ञा
[हिं. मरना]

मस्मुक्खा
भूख का मारा हुआ।
वि.
[हिं. मरना+भूखा]

मस्मुक्खा
कंगाल।
वि.
[हिं. मरना+भूखा]

मरबे, मरबो
मरना, मृत्यु।
संज्ञा.
[हिं. मरना]
अपने मरबे ते न डरत है पावक पैठिजरै-2८०८।

मरम
भेद, रहस्य, तत्व।
संज्ञा.
[सं. मर्म]
(क) मैं मतिहीन मरम नहिं जान्यो परयौं अधिक करि दौर-१-४६। (ख) खोजत नाल किती जुग गयौ। तौहू मैं कछु मरम न लयौ २.३७।

मरमना, मरमनो
तत्व या रहस्य जानना-समझना।
क्रि. अ.
[सं. मम]

मरमर
मर मर शब्द।
संज्ञा
[अनु.]

मरमराना, मरमरानो
मर-मर' शब्द करना।
कि, अ.
[अनु.]

मरमराना, मरमरानो
मर-मर' शब्द करके बबना।
कि, अ.
[अनु.]

मरम्मत
टूटी-फूटी चीज को ठीक करने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[अ.]

मरयाद, मरयादा
मर्यादा।
संज्ञा
[सं. मर्यादा]

मरवाना, मरवानो
मारने को प्रवत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. मारना]

मरवाना, मरवानो
वध कराना।
क्रि. स.
[हिं. मारना]

मरसिया
शोक-काव्य।
संज्ञा
[अ.]

मरहट
मसान, श्मशान।
संज्ञा
[हिं. मरघट]

मरहट
मोठ (अनाज)।
संज्ञा
[देश.]

मरहम
दवा की तरह घाव पर लगाया जानेवाला गाढ़ा लेप।
संज्ञा
[अ.]

मरहिंगी
मर जायेँगी।
क्रि. अ.
[हिं. मरना]
जादवन को प्रलय सुनि वे मरहिंगी अकुलाइ-११-४।

मराई
मराने' की क्रिया।
संज्ञा
[हिं. मराना]

मराई
डारहु मराई-मरवा डालो।
प्र.
प्रथमहिं कमल कंस कौं दीजै डारहु हमहिं मराई-५३८।

मराना
मारने को प्रवृत करना।
क्रि. स.
[हिं. मारना]

मरायल
जो मारा-पीटा गया हो।
वि.
[हिं. मारना+आयल]

मरायल
शक्ति या सत्वहीन।
वि.
[हिं. मारना+आयल]

मरायल
घाटा, हानि।
वि.
[हिं. मारना+आयल]

मराल
हंस।
संज्ञा
[सं.]
(क) मनौ मधुर मराल-छौना किंकिनी कल राव-१०-३०७। (ख) मनौ मधुर मराल छौना बोलि बनै सिहात-१०.१८४।

मरिंद
मकरंद।
संज्ञा
[सं. मकरंद, प्रा. मरंद]

मरि
मर कर।
क्रि. अ.
[हिं. मरना]

मरु
रेगिस्तान।
संज्ञा
[स.]

मरु
मरुआ' पौधा।
संज्ञा
[स.]

मरुआ
एक पौधा।
संज्ञा
[सं. मरुव]
खूझा मरुआ कुद सौं कहै गाद पसारी-१८२२।

मरुआ
हिंडोले को लटकाने लकड़ी।
संज्ञा
[सं. मरुव]
कंचन खंभ मयारि मरुआ (मरुवा) डाँड़ी खचित हीरा बिच लाल प्रबाल-१०.८४।

मरुत, मरुत्
एक देवगण।
संज्ञा
[सं. मरुत्]

मरुत, मरुत्
वायु।
संज्ञा
[सं. मरुत्]

मरुत्सुत
हनुमान।
संज्ञा
[सं]

मरुत्सुत
भीम।
संज्ञा
[सं]

मरुथल
रेगिस्तान।
संज्ञा
[सं.मरुस्थल]

मरुधर
मारवाड़ देश।
संज्ञा
[सं.]

मरि
मरि जैहौं-भर जाऊँगा।
प्र.
मनौं हौं ऐसे ही मरि जैहौं-2५५०।

मरिऐ
मरता हूँ।
क्रि. अ.
[हिं. मरना]
इहिं लाजनि मरिऐ सदा, सब कोउ कहत तुम्हारी (हो)-१-४४।

मरिवो, मरिवौ
मरना, मृत्य, मरण।
संज्ञा
[हिं. मरना]
(क) सप्तम दिन मरिबौ निरधार-१-२९०। (ख) एक दाइँ मरिबो नंदनंदन के काजनि २८७२।

मरियत
मरता हूँ।
क्रि. अ.
[हिं. मरना]
(क) मरियत लाज पाँव पतितनि मैं हौं अब कहौ घटि कातैं-१-१३७। (ख) इनि बातनि के मारे मरियत-३२०२।

मरियल
बहुत दुबला-पतला।
वि.
[हिं मरना]

मरियै
मृत्यु को प्राप्त होइए।
क्रि. अ.
[हिं. मरना]
लाजन मरियै - अत्यंत ही लज्जित होइए। उ. - करियै कहा लाजन मरियै जब अपनी जाँघ उधारी-१-१७३।

मरिहैं
मरेंगे, मृत्यु को प्राप्त होंगे।
क्रि. अ.
[हिं. मरना]
मो देखत लछिमन क्यौं मरिहैं मोकौं आज्ञा दीजै-९-१४८।

मरिहै
मरेगा, मरेगी।
क्रि. अ.
[हिं. मरना]
भऐं अपमान उहाँ तू मरि-४-५।

मरिहौं
मरूँगा।
क्रि. अ.
[हिं. मरना]
जो मरिहौं तो सुरपुर जैहौं-६-५।

मरी
मरी हुई, मृतक समान।
वि.
[हिं. मरना]
ऐसौ चरित तुरतही कीन्हौं कुँवरि हमारी मरी जिवाई-७६१।

मरीचि
एक ऋषि जो ब्रह्मा के मानसिक पुत्र और सप्तर्षियों में एक माने गये हैं।
संज्ञा
[सं.]
ब्रह्मा सुमिरन करि हरि नाम। प्रगटे रिषय सप्त अभिराम। भृगु, मरीचि, अंगिरा बसिष्ठ। अत्रि, पुलह, पुलस्त्य अति सिष्ठ-३-८।

मरीचि
एक ऋषि जो कश्यप के पिता थे।
संज्ञा
[सं.]
रिषि मरीचि कश्यप उपजायौ-३-९।

मरीचि
किरण।
संज्ञा
[सं.]

मरीचि
कांति,ज्योति।
संज्ञा
[सं.]

मरीचि
मृगमरीचिका।
संज्ञा
[सं.]

मरीचिका
मृगतृष्णा।
संज्ञा
[सं.]

मरीचिका
किरण।
संज्ञा
[सं.]

मरीचिजल
मृगतृष्णा।
संज्ञा
[सं.]

मरीचि
जिसमें किरणें हों।
वि.
[सं. मरीचिन्]

मरीज
रोगी, बीमार।
वि.
[अ. मरीज]

मरुभूमि
रेगिस्तान।
संज्ञा
[सं.]

मरुरना, मरुरनो
ऐंठना,बल खाना।
क्रि. अ.
[हिं. मरोरना]

मरुव, मरुवा, मरुवो, मरुवौ
एक पौधा।
संज्ञा
[सं. मरुव]
फूले बेल निवारी फूल मरुवो मोगरो सेवती-2४०५।

मरुव, मरुवा, मरुवो, मरुवौ
लकड़ी जिसमें हिंडोला लटकाया जाता है।
संज्ञा
[सं. मरुव]
कंचन के खंभ मयारि मरुवा डाँड़ी खचित हीरा बिच लाल प्रबाल-१०-८४।

मरुस्थल
रेगिस्तान।
संज्ञा
[सं.]

मरूँगौं
मृत्यु को प्राप्त होऊँगा।
क्रि. अ.
[हिं. मरना]
रामचंद्र के हाथ मरूँगौं परम पुरुष फल जान्यौ-सारा. २६३।

मरू
कठिन, दुरुह।
वि.
[सं. मेरु या मरु]
मरु करि (करि कै) - बड़ी कठिनता से।

मरूर, मरूरा, मरूरो, मरूरौ
ऐंठन, मरोड़, बल।
संज्ञा
[हिं. मरोड़]
मरूर (मरूरो या मरूरौ) देना - ऐंठना, उमेठना। दियौ मरूर - ऐंठ, उमेठ या मरोड़ दिया। उ. - मुख पर पवन परस्पर सुखवत गहे पानि पिय जूरो। बूझति जानि मन्मथ चिनगी फिरि मानो दियौ मूरूर-2२८५।

मरैं
मृत्यु को प्राप्त हो।
क्रि. अ.
[हिं. मरना]
मरै नहिं देवता-८.८।

मरै
मृत्यु को प्राप्त हो।
क्रि. अ.
[हिं. मरना]
अति प्रचंड पौरुष बल पाऐं केहरि भूख मरै-१.१०५।

बान
कांतियुक्त, तेजपूर्ण।
वि.

बान
बाणासुर।
संज्ञा
[सं. बाण]
रुद्र भगवान अरु बान सांबुक भिरे कुंभाउ माँड़ी लराई-१० उ.-३५।

बानइत
बाना चलानेवाला।
वि.
[हिं. बानैत]

बानइत
बाण चलानेवाला।
वि.
[हिं. बाण]

बानइत
वीर, योद्धा
वि.
[हिं. बाण]

बानइत
पैदल सिपाही।
वि.
[हिं. बाण]

बानक
वेष, सजधज।
संज्ञा
[हिं. बनाना]
(क) या छबि की पटतर दीबे कौं सुकबि कहा टकटो है? देखत अंग-अंग-प्रति बानक, कोटि मदन-मन छोहै-१०-१५८। (ख) तुमहीं देखि लेहु अँग बानक एते पर क्यौं सही परै-2०१७। (ग) एक बयक्रम एकहिं बानक रूप-गुन की सींव-2०७२। (घ) आयु बिषमता तजि दोऊ सम भ बानक ललित त्रिभंग-३३२७।

बानगो
माल का नमूना।
संज्ञा
[हिं. बयाना]

बानत
किसी बात का निश्चय करता या ठानता है।
क्रि. स.
[हिं. बाना]
मेरे हृदय नाहिं आवत हौ, हे गुपाल, हौं इतनी जानत। कपटी, कृपन, कुचील,कुदरसन, दिन उठि बिसय बासना बानत-१-२१७।

बानना
किसी बात का बाना करना।
क्रि. स.
[हिं. बाना]

मरै
दुख या कष्ट सहे।
क्रि. अ.
[हिं. मरना]
याहि लागि को मरै हमारे बृंदाबन चरनन सौं ठेली-३१४४।

मरोड़, मरोर
ऐंठने या उमेठने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. मरोड़ना]
मरोड़ खाना - चक्कर खाना। मन में मरोड़ करना - कपट या दुराव करना। मरोड़ की बात - छल कपट या घुमाव फिराव की बात।

मरोड़, मरोर
ऐंठन, बल।
संज्ञा
[हिं. मरोड़ना]

मरोड़, मरोर
क्षोभ, व्यथा।
संज्ञा
[हिं. मरोड़ना]
मरोड़ खाना - उलझन में पड़ना।

मरोड़, मरोर
पेट में ऐंठन होना।
संज्ञा
[हिं. मरोड़ना]

मरोड़, मरोर
गर्व।
संज्ञा
[हिं. मरोड़ना]

मरोड़, मरोर
क्रोध।
संज्ञा
[हिं. मरोड़ना]
मर ड़ गहना - क्रोध करना।

मरोड़ना, मरोरना, मरोरनो
ऐठना, उमेठना।
क्रि. स.
[हिं. मोड़ना]
अंग मरोड़ना - अँगड़ाई लेना। दृग या भौंह मरोड़ना - (१) आँख से इशारा करना। (२) नाक - भौं चढाना।

मरोड़ना, मरोरना, मरोरनो
ऐंठकर तोड़ देना या नष्ट कर देना।
क्रि. स.
[हिं. मोड़ना]

मरोड़ना, मरोरना, मरोरनो
पीड़ा या दुख देना।
क्रि. स.
[हिं. मोड़ना]

मरोड़ना, मरोरना, मरोरनो
मींजना, मसलना।
क्रि. स.
[हिं. मोड़ना]
हाथ मरोड़ना - हाथ मलना या पछताना।

मरोड़ा, मरोरा
ऐंठन।
संज्ञा
[हिं. मरोड़ना]

मरोड़ा, मरोरा
पेट की पीड़ा जिसमें ऐठन सी जान पड़ती है।
संज्ञा
[हिं. मरोड़ना]

मरोड़ा, मरोरा
ऐंठन।
संज्ञा
[हिं. मरोड़ना]

मरोड़ा, मरोरा
गुत्थी।
संज्ञा
[हिं. मरोड़ना]

मरोड़त, मरोरत
ऐंठता है।
क्रि. स.
[हिं. मरोड़ना]
भौंह मरोरत - नाक-भौं चढ़ाता है। उ. - बदन सकोरत भौंह मरोरत नैननि मैं कछु टोना-१०३७।

मरोड़ि, मरोरि
ऐंठ या उमेठकर।
क्रि. स.
[हिं. मरोड़ना]
(क) घीचि मरोरि दियौ कागासुर मेरैं ठिग फटकारी-१०-६०। (ख) बाँह मरोरि जाहुगे कैसे मैं तुमको नीके करि चीन्हे-१५०७।

मरोड़ी, मरोरी
ऐंठ या उमेठ दी।
क्रि. स.
[हिं. मरोड़ना]
गुदी चाँपि लै जीभ मरोरी-१०-५७।

मरोड़ी, मरोरी
ऐंठन, घुमाव, बल।
संज्ञा
करत मरोरो - खींचातानी करता है। उ. - नख शिख लौं चित चोर सकल अँग चीन्हें पर कत करत मरोरी-१५०६।

मरोरै
ऐंठता-उमेठता है।
क्रि. स.
[हिं. मरोड़ना]
भौंह मरारै - आँख से कनखी मारता है। उ. - भौंह मरोर मटकि कैसे जमुना रोकत घाट-2४१३।

मर्द
नर।
संज्ञा
[फ़ा.]

मर्द
पति।
संज्ञा
[फ़ा.]

मर्दन
कुचलना, रौंदना।
संज्ञा
[सं. मद्‌र्दन]

मर्दन
मलना, रगड़ना।
संज्ञा
[सं. मद्‌र्दन]
(क) तेल लगाइ कियौ रुचि मर्दन-१-५२। (ख) आदर बहुत कियौ जादव पति मर्दन करि अन्हवायो-१० उ०-६५।

मर्दन
शरीर में तेल, उबटन आदि मलना या लगाना।
संज्ञा
[सं. मद्‌र्दन]
(क) अति सुगंध मर्दन अँग-अँग, ठनि बनि-बनि भूषन भेषति। (ख) अँग मर्दन करिबे कौ लागी उबटन तेल धरी-पृ.३३९ (८६)।

मर्दन
द्वंद्व युद्ध में परस्पर घस्सा लगाना।
संज्ञा
[सं. मद्‌र्दन]

मर्दन
नाश।
संज्ञा
[सं. मद्‌र्दन]
अधमर्दन विधि गर्बहत करत न लागी बार-४३७।

मर्दन
पीसना, घोटना।
संज्ञा
[सं. मद्‌र्दन]

मर्दन
नाश या संहार करने वाला।
वि.

मर्दना, मर्दनो
मालिश करना, मलना।
कि. स.
[सं. मईन]

मरोड़यो, मरोड़यौ , मरोरयो, मरोरयौ
ऐंठा, उमेठा।
क्रि. स.
[हिं. मरोड़ना]
भौंह मरोरयौ - नाक-भौं चढ़ायी। उ. - अधर कंप रिस भौंह मरोरयौ मन ही मन गहरानी-१८६५।

मर्कट
वानर, बंदर।
संज्ञा
[सं.]

मर्कत
पन्ना।
संज्ञा
[सं. मरकत]

मर्तबा
पद।
संज्ञा
[अ.]

मर्तबा
बार, दफा।
संज्ञा
[अ.]

मर्त्य
मनुष्य।
संज्ञा
[सं.]

मर्त्य
भूलोक।
संज्ञा
[सं.]

मर्त्यलोक
पृथ्वी।
संज्ञा
[सं.]

मर्द
आदमी।
संज्ञा
[फ़ा.]

मर्द
साहसी आदमी।
संज्ञा
[फ़ा.]

मर्दना, मर्दनो
उबटन तेल आदि मलना।
कि. स.
[सं. मईन]

मर्दना, मर्दनो
तोड़नाफाड़ना।
कि. स.
[सं. मईन]

मर्दना, मर्दनो
रौंदना, कुचलना।
कि. स.
[सं. मईन]

मर्दना, मर्दनो
नाश करना।
कि. स.
[सं. मईन]

मर्दाना
वीर।
वि.
[फा.]

मर्दाना
वीरोचित।
वि.
[फा.]

मर्दित
मला-मसला हुआ।
वि.
[सं. मर्द्दित]

मर्दित
नष्ट किया हुआ।
वि.
[सं. मर्द्दित]

मर्दुमी
पौरुष।
संज्ञा
[फा.]

मर्दुमशुमारी
जन-गणना।
संज्ञा
[फा.]

मर्द्यौ
नाश किया, मिटाया।
क्रि. स.
[हिं. मर्दना]
गिरि कर धारि इन्द्र मद मर्द्यौ दासति सुख उपजाए-१-२७।

मर्म
रहस्य, तत्व, भेद।
संज्ञा
[सं. मर्म्म]
(क) प्रेम के सिंधु कौ मर्म जान्यौ नहीं, सूर कहा भयौ देह बोरैं-१-२२२। (ख) ताकौ कछू न पायौ मर्म-१२१२।

मर्म
शरीर का वह स्थान जहाँ चोट पहुँचने से अधिक पीड़ा होती है।
संज्ञा
[सं. मर्म्म]

मर्मज्ञ
भेद या रहस्य का जाननेवाला।
वि.
[सं.]

मर्मज्ञ
गूढ़ाशय या तत्व समझने्वाला।
वि.
[सं.]

मर्मभिद्
हृदय पर आघात पहुँचानेवाला।
वि.
[सं.]

मर्मभेदी
हृदय पर आघात करने‍ या चोट पहुँचानेवाला।
वि.
[सं. मर्मभेदिन्‌]

मर्मबचन, मर्मवचन
हृदय पर आघात पहुंचाने वाली बात।
संज्ञा
[सं. मर्म+वचन]

मर्मस्थल, मर्मस्थान
हृदय, कंठ आदि कोमल अंग जहाँ चोट लगने से प्राणी मर तक सकता है।
संज्ञा
[सं.]

मर्मस्पर्शी
हृदय को छूनेवाला, मार्मिक।
वि.
[सं. मर्मस्पशिन्]

मर्मांतक
हृदय में चुभनेवाली।
वि.
[सं.]

मर्मी
रहस्य जाननेवाला।
वि.
[हिं. मर्म]

मर्याद, मर्यादा
सीमा, हद।
संज्ञा
[सं. मर्यादा]
(क) मनहु प्रेम समुद्र सूर सुख लै उपटित मर्याद-2४०७। (ख) मनहुँ सूर दोउ सुभग सरोवर उमँगि चले मर्यादा डारि-2७९५।

मर्याद, मर्यादा
नीति, व्यवस्था।
संज्ञा
[सं. मर्यादा]
(क) सूर स्याम मिलि लोक बेद की मर्यादा निदरी-पृ० ३३६ (५०)। (ख) पय पीवत जिन हती पूतना स्रुति-मर्यादा फोरी-2८६३।

मर्याद, मर्यादा
मान, प्रतिष्ठा।
संज्ञा
[सं. मर्यादा]
सदन जाहु मर्यादा है कह्यौ न काहे मानति-पृ. ३१७ (६२)।

मर्यादित
मर्यादा के अनुकूल।
वि.
[सं.]

मर्षण, मर्षन
रगड़, घर्षण।
संज्ञा
[सं. मर्षण]

मर्षण, मर्षन
नाशक।
वि.

मर्षण, मर्षन
दूर करनेवाले।
वि.

मर्षत
मला, लेप किया।
क्रि. स.
[हिं. मर्षना]
जातुधानि-कुच-गर मर्षत तब तहाँ पूनँता पाई-१-२१५।

मर्षना, मर्षनो
मलना, लेप करना।
क्रि. स.
[सं. मर्षण]

मलंग, मलंगा
घुसललान साधुओं का एक वर्ग।
संज्ञा
[फा. मलंग]

मल
मैल, कीट।
संज्ञा
[सं.]

मल
शरीर का विकार।
संज्ञा
[सं.]
राख्यो हो जठर महिं स्रोनित सौं सानि। जहाँ न काहू कौ गम, दुसह दारुन तम, सकल बिधि अगम खल मल खानि-१-७७।

मल
विष्टा।
संज्ञा
[सं.]
रुविर मेद मल-मूत्र कठिन कुच उदर-गंध गंधात-2 २४।

मल
पाप।
संज्ञा
[सं.]

मल
प्रकृति-दोष।
संज्ञा
[सं.]

मलकना, मलकनो
हिलना-डोलना।
क्रि. अ.
[हिं. मलकाना]

मलकना, मलकनो
इठलाना, इतराना।
क्रि. अ.
[हिं. मलकाना]

मलकाना, मलकानो
हिलानाडोलाना।
क्रि. स.
[अनु.]

मलबा
कूड़ा-करकट।
संज्ञा
[सं. मल]

मलमल
एक तरह का बढ़िया महीन कपड़ा।
संज्ञा
[सं. मलमल्लक]

मलमलाना, मलमलानो
स्पर्श कराना।
क्रि. स.
[हिं. मलना]

मलमलाना, मलमलानो
बार बार खोलना-मूँदना।
क्रि. स.
[हिं. मलना]

मलमलाना, मलमलानो
पुनः-पुनः आलिंगन करना।
क्रि. स.
[हिं. मलना]

मलमास
वह मास जिसमें संक्रांति न पड़े; इसे 'अधिक मास' भी कहते हैं।
संज्ञा
[सं.]

मलय
एक पर्वत जो पशिचपी घाट में है और जहाँ चंदन बहुत होता है।
संज्ञा
[सं. मलय = पर्वत]

मलय
चंदन, सफेद चंदन।
संज्ञा
[सं. मलय = पर्वत]
जद्यपि मलय बृच्छ जड़ काटै कर कुठार पकरै। तऊ सुभाव न सीतल छाँड़े, रिपु-तन-जाप हर-१-११७।

मलय
सुगंधित।
वि.
निंदत मूढ़ मलय चंदन कौं, राख अंग लपटावै-2-१३।

मलय
दक्षिणी (वायु)।
वि.

मलयगिरि, मलयगिरी
पश्चिमी घाट का वह पर्वत जहाँ चंदन अधिक होता है।
संज्ञा
[सं. मलयगिरि]

मलयगिरि, मलयगिरी
मलयगिरि का चंदन।
संज्ञा
[सं. मलयगिरि]

मलयज
चंदन।
संज्ञा
[सं.]

मलयाचल
मलय पर्वत जो पशिचमी घाट में है और जहाँ चंदन बहुत होता है।
संज्ञा
[सं.]

मलयानिल
मलय पर्वत से आने वाली वायु।
संज्ञा
[सं.]

मलयानिल
सुगंधित वायु।
संज्ञा
[सं.]

मलयानिल
वासंती पवन।
संज्ञा
[सं.]

मलराना, मलरानो
पुचकारना, दुलारना।
क्रि. स.
[हिं. मल्हाना]

मलरुचि
मल या दोष में रुचि रखने वाला।
वि.
[सं.]

मलरुचि
दोषो, पापी।
वि.
[सं.]

बानि
बनावट, सजधज।
संज्ञा
[हिं. बनना]
वा पट पीत की फहरानि। कर धरि चक्र चरन की धावनि नहिं बिसरति वह बानि-१-२७९।

बानि
आभा, कांति, चमक।
संज्ञा
[सं. वर्ण]

बानि
वचन, वाणी।
संज्ञा
[सं. वाणी]
करति कछु, न कानि, बकति है कटु बानि निपट निलज बैन बिलख हूँ।

बानिक
बनाव-सिंगार, सजधज।
संज्ञा
[हिं. बानक]

बानिज
व्यापार, व्यवसाय।
संज्ञा
[सं. वाणिज्य]

बानिया
वैश्य, बनिया।
संज्ञा
[सं. बणिक्]

बानी
वचन, शब्द।
संज्ञा
[सं. वाणी]
(क) जित देखति तित कोऊ नाहीं, टेरि कहति मृदु बानी-१-२५०। (ख) गर्ग कही यह बानी-१०२५६।

बानी
मनौती, प्रतिज्ञा।
संज्ञा
[सं. वाणी]

बानी
सरस्वती।
संज्ञा
[सं. वाणी]

बानी
उपदेश, शिक्षा।
संज्ञा
[सं. वाणी]

मलकाना, मलकानो
मटकाना, चमकाना।
क्रि. स.
[अनु.]

मलकाना, मलकानो
गढ़गढ़कर बातें करना।
क्रि. अ.

मलखंभ, मलखम
डंडा जिस पर चढ़ और उतर कर कसरत की जाती है।
संज्ञा
[सं. मल्ल+हिं. खंभा, हिं. मलखम]

मलगजा
मला-दला हुआ।
वि.
[हिं. मलना+गींजना]

मलन
मसलना। लेप करना।
संज्ञा
[सं.]

मलना, मलनो
मींजना, मसलना, रगड़ना।
क्रि. स.
[सं. मलन]
दलना-मलना-(१) पीसकर चूर्ण करना। (२) रगड़ना, मसलना। हाथ मलना-(१) पछताना। (२) क्रोध प्रकट करना।

मलना, मलनो
तेल आदि की मालिश करना
क्रि. स.
[सं. मलन]

मलना, मलनो
दबाकर मसलना।
क्रि. स.
[सं. मलन]

मलना, मलनो
ऐंठना, मरोड़ना।
क्रि. स.
[सं. मलन]

मलना, मलनो
क्रोध या आवेश में हाथ से रगड़ना।
क्रि. स.
[सं. मलन]

मलवाना, मलवानो
मलने को प्रवृत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. मलना]

मलाई
दूध दही की साढ़ी
संज्ञा
[देश.]
साज्यौ दही अधिक सुखदाई। ता ऊपर-पुनि मधुर मलाई-2३२१।

मलाई
सार, तत्व।
संज्ञा
[देश.]

मलाई
मलने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
संज्ञा
[हिं मलना]

मलान
मैला।
वि.
[सं. म्लान]

मलान
मुरझाया हुआ।
वि.
[सं. म्लान]

मलानि
मलिनता।
संज्ञा
[सं. म्लान]

मलार
एक राग।
संज्ञा
[सं. मत्लार]
मुरली मलार बजावहिंगे-2८८९।

मलारि, मलारी
वसंत' राग की एक रागिनी।
संज्ञा
[सं. मल्लारी]
गावत मलारी सुराग रागिनी गिरिधरन लाल छवि सोहनो-2२८०।

मलाल
दुख।
संज्ञा
[अ]

मलाल
उदासी।
संज्ञा
[अ]

मलाह
केवट।
संज्ञा
[हिं. मल्लाह]

मलिंद
भौंरा।
संज्ञा
[सं. मिलिंद]

मलि
रगड़-रगड़कर।
क्रि. स.
[हिं. मलना]
(क) तेल लगाइ कियो रुचि मर्दन बस्तर मलि मलि धोए-१-५२। (ख) हंस उज्जल' पंख निर्मल अंग मलि माल न्हाहिं-१-३३८।

मलि
तेल आदिमलकर।
क्रि. स.
[हिं. मलना]

मलिक
राजा।
संज्ञा
[अ.]

मलिक
राजा।
संज्ञा
[अ.]

मलिका
रानी।
संज्ञा
[अ.]

मलिका
स्वामिनी।
संज्ञा
[अ.]

मलिका
एक तरह का 'बेला'।
संज्ञा
[सं. मल्लिका]

मलिक्ष, मलिच्छ
म्लेच्छ।
संज्ञा
[सं. म्लेच्छ]

मलिक्ष, मलिच्छ
गंदा, मलिन।
वि

मलिन
मैला, गंदा।
वि
[सं.]

मलिन
बुरा, खराब।
वि
[सं.]
पिउ पद-कमल को मकरंद। मलिन मति मनमधुर परिहरि, बिषय नीरस मंद-९-१०।

मलिन
मटमैले या धूमिल रंग का।
वि
[सं.]

मलिन
पापी।
वि
[सं.]
भजन बिनु जीवत जैसे प्रेत। मलिन मंदमति डोलत घर-घर उदर भरन कै हेत-2-१५।

मलिन
धीमा, फीका।
वि
[सं.]

मलिन
खिन्न, उदास।
वि
[सं.]

मलिनता
मलिन' होने का भाव।
संज्ञा
[सं.]
प्राची अरुनानी धानि किरनि उज्यारी नभ छाई उडुगन चंद्रमा मलिनता लई-पृ. ३०० (८)।

मलिनाइ, मलिनाई
मलिनता।
संज्ञा
[हिं. मलिन]

मल्लजुद्ध, मल्लयुद्ध
कुश्ती।
संज्ञा
[सं. मल्लयुद्ध]

मल्लशाला
अखाड़ा।
संज्ञा
[सं.]

मल्लार
मलार' राग।
संज्ञा
[सं.]

मल्लारि, मल्लारी
वसंत राग की एक रगिनी।
संज्ञा
[सं. मल्लारी]

मल्लाह
केवट, धीवर, माझी।
संज्ञा
[अ.]

मल्लाही
मल्लाह संबंधी।
वि.
[फ़ा]

मल्लिका
बेला' फूल का एक प्रकार।
संज्ञा
[सं.]
जमुना पुलिन मल्लिका मनोहर सरद सुहाई जामिनी-१७३४।

मल्हराना, मल्हरानो
चुमकारना, पुचकारना।
क्रि. स.
[सं. मल्ह=गोस्तन]

मल्हरावति
चुमकारती-पुचकारती है।
क्रि. स.
[हिं. मल्हराना]
सूरदास-प्रभु सोए कन्हैया हलरावति मल्हरावति है-१०-७३।

मल्हाना, मल्हानो
चुमकारना,पुचकारना।
क्रि. स.
[हिं. मल्हराना]

मलै
चंदन !
संज्ञा
[सं. मलय]
(क) मिली कुबिजा मलै लैकै सो भई अरधंग-2६७२। (ख) मृग-मद मलै परस तनु तलफ़त जनु बिषम बिष पिए-३४५९।

मलोलना, मलोलनो
दुखी होना।
क्रि. अ.
[हिं. मलोला]

मलोलना, मलोलनो
पछताना
क्रि. अ.
[हिं. मलोला]

मलोला
अरमान।
संज्ञा
[अ. मलूल]

मलोला
दुख।
मलोला (मलोले) आना - दुख या पछतावा होना। मलोला (मलोले) खाना - दुख सहना। दिल का मलोला (के मलोले) निकालना - बकझक कर दुख दूर करना।

मल्ल
एक प्राचीन जाति।
संज्ञा
[सं.]

मल्ल
पहलवान।
संज्ञा
[सं.]
(क) रजक मल्ल चानूर दवानल दुखभंजन सुखदाई-१-१५८। (ख) कुवलिया मल्ल मुष्टिक चानूर से कियो मैं कर्म यह अति उदासा-2५५१।

मल्ल
एक प्राचीन देश का नाम।
संज्ञा
[सं.]

मल्ल
दीप।
संज्ञा
[सं.]

मल्लक्रीड़ा
कुश्ती।
संज्ञा
[सं.]

मलिनाना, मलिनानो
मैला होना।
क्रि. अ.
[हिं. मलिन]

मलीदा
चूरमा।
संज्ञा
[फा.]

मलीन
मैला, अस्वच्छ।
वि.
[सं. मलिन]

मलीन
उदास।
वि.
[सं. मलिन]
(क) दरस मलीन दीन दुरबल अति तिनकौं मैं दुखदानी-१-१२९। (ख) अति मलीन बृषभ सुकुमारी-३४२५।

मलीन
कांतिहीन।
वि.
[सं. मलिन]
बिधु मलीन रवि प्रभास गावत नर-नारी-१०-२०२।

मलीनता
मलिन’ होने का भाव, मैलापन।
संज्ञा
[सं. मलिनता]

मलूक
एक कीड़ा।
संज्ञा
[सं.]

मलूक
एक पक्षी।
संज्ञा
[सं.]

मलूक
सुंदर, मनोहर।
वि.
[देश.]

मलेक्ष, मलेच्छ, मलेछ
म्लेच्छ।
संज्ञा
[सं. म्लेच्छ]

मल्हावति
चुमकारती-पुचकारती है।
क्रि. स.
[हिं. मल्हाना]
बालकेलि गावति मल्हावति सुप्रेम भर-१०-१५१।

मल्हावै
चुमकारती-पुचकारती है।
क्रि. स.
[हिं. मल्हाना]
जसोदा हरि पालनैं झुलावै। हलराबै, दुलराइ मल्हावै जोइ-सोइ कछु गावै-१०-४३।

मल्हार
मलार' राग।
संज्ञा
[हिं. मलार]

मल्हारना, मल्हारनो
चुमकारता।
क्रि. स.
[हिं. मलहाना]

मवाद
सामान। पीक्ष। दिल का गुबार।
संज्ञा
[अ.]

मवास
रक्षा का स्थान, शरण !
संज्ञा
[सं.]
मवास करना - निवास करना।

मवास
किला, दुर्ग, गढ़।
संज्ञा
[सं.]

मवास
पेड़ जो दुर्ग के प्राकार पर होते हैं।
संज्ञा
[सं.]

मवासी
छोटा गढ़, गढ़ी।
संज्ञा
[हिं. मवास]
मवासी तोड़ना - (१) किला तोड़ना। (२) जीतना, विजय पाना।

मवासी
किलेदार, गढ़पति।
संज्ञा

मवासी
प्रधान, अधिनायक।
संज्ञा
गोरस चुराइ खाइ बदन दुराइ राखै मन न धरत बृंदावन कौ मवासी-१०४४।

मवासे
किले के प्राकार पर लगे वृक्ष।
संज्ञा
[सं. मवास]
जहाँ तहाँ होरी जरै हरि होरी है। मनहुँ मवासे आगि अहो हरि होरी है-2४२३।

मवेशी
पशु, ढोर।
संज्ञा
[अ. मवाशी]

मशक
मच्छड़।
संज्ञा
[सं.]

मशक
चमड़े का बड़ा थैला।
संज्ञा
[फा]

मशक्कत
परिश्रम।
संज्ञा
[अ. मशक्कत]

मशविरा
सलाह।
संज्ञा
[अ.]

मशहूर
प्रसिद्ध।
वि.
[अ.]

मशान
मरघट, मसान।
संज्ञा
[सं. श्मशान]
भूमि मशान बिदित ए गोकूल मनहु धाइ खाइ-2७००।

मशाल
जलाने की मोटी बत्ती।
संज्ञा
[अ.]

मशालची
मशाल जलानेवाला।
संज्ञा
[फ़.]

मश्क
अभ्यास।
संज्ञा
[अ]

मष
यज्ञ।
संज्ञा
[सं. मख]
(क) देवराज मष भंग जानि कै बरष्यो ब्रज पर आई-१-१२२। (ख) सगरराज मष पूरन कियौ-९-९।

मष्ट
उदासीन, मौन।
वि.
[सं. मष्ठ, प्रा. मष्ट =मटठा]
मष्ट करना - चुप रहना, मुँह न खोलना। मष्ट करि ( करु ) - चुप रह, बोल मत, मुँह मत खोल। उ. - (क) मष्ट करू, हँसैगे लोग, अँकवारि भरि भुजा पाई कहाँ स्याम मेरै-१०.३०७। (ख) सुनिहैं लोग मष्ट अबहूँ करि, तुमहिं कहाँ की लाज-७७५। मष्ट करो (करौ) - चुप रहो, बोलो मत। उ. - अबला कहा दशा दिगंबर, मष्ट करौ पहिचाने-३००६। मष्ट धारना - चुप्पी साधना। रहौ मष्ट धारे - चुप रहो, मौन साधो। उ. - कहा पिय कहत सुनिहै बात पौरिया, जाय कैहै, रहौ मष्ट धारे-2६२४। मष्ट मारना - चुप रहना।

मस
स्याही, रोशनाई।
संज्ञा
[सं. मसि]

मस
मच्छड़।
संज्ञा
[सं. मशक]

मस
मूँछ निकलने के पहले की रोमावली।
संज्ञा
[सं. श्‍मश्रु]
मस भींजना (भीजना) - (१) मूछ की रेखा दिखाई पड़ना। (२) युवावस्था आना।

मसक
भच्छड़।
संज्ञा
[सं. मशक]

मसक
चमड़े की 'मशक'।
संज्ञा
[फ़ा. मशक]
छूछी मसक पवन पानी ज्यौं तैसेई जन्म विकारी हो।

मसक
मसकने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[अनु.]

बहराना
फुसलाना।
क्रि. स.
[हि. बहलाना]

बहरावत
बाहर करते है, निकालते हैं।
क्रि. स.
[हिं. बहिरयाना]

बहरावत
अलग करते हैं, (समाज से) पृथक् करते हैं।
क्रि. स.
[हिं. बहिरयाना]
कह्यो, हम जज्ञ-भाग नहिं पावत। वैद्य जानि हमकौं बहरावत-९-३।

बहरावत
बहलाता है।
क्रि. स.
[हिं. बहलाना]

बहरावति
बहलाती या भुलावे में डालती है।
क्रि. स.
[हिं. बहलाना]
बातै बूझति यौं बहरावति-३४८५।

बहरिया
बाहर का, बाहरी।
वि.
[हिं. बाहर+इया]

बहरिया
वल्लभसंप्रदायी मंदिरों के छोटे कर्मचारी जो मंदिर के बाहर रहते हैं।
संज्ञा

बहरियाना
बाहर या बाहर की ओर होना।
क्रि. अ.
[हि. बाहर+इयाना]

बहरियाना
अलग होना।
क्रि. अ.
[हि. बाहर+इयाना]

बहरियाना
बाहर करना।
क्रि. स.
[हि. बाहर+इयाना]

बानना
कोई बात ठानना।
क्रि. स.
[हिं. बाना]

बानर
बंदर।
संज्ञा
[सं. वानर]

बाना
पोशाक, पहनावा, वेश।
संज्ञा
[हिं. बनाना]
माला-तिलक मनोहर बाना लै सिर छत्र धरै-६-६।

बाना
रीति, पद्धति, ढंग।
संज्ञा
[हिं. बनाना]

बाना
एक हथियार।
संज्ञा
[सं. बाण]

बाना
बुनावट।
संज्ञा
[सं. वयन - बुनना]

बाना
बुनावट का तागा जो आड़े ताने में भरा जाता है, भरनी।
संज्ञा
[सं. वयन=बुनना]

बाना
फैलाना, प्रसारित करना।
क्रि.
[सं. व्यापन]
(किसी वस्तु के लिए) मुँह बाना - उसे प्राप्त करने की इच्छा होना।

बानावरी
बाण चलाने की विद्या या रीति।
संज्ञा
[हिं. बाण + फा. प्रत्य. आवरी]

बानि
टेव, आदत, स्वभाव।
संज्ञा
[हिं. बनना]
(क) निरखि पतंग बानि नहि छाँड़त, जदपि जोति तनु तावत-१- २१०। (ख) सबै जोरि राखति हित तुम्हरैं मैं जानति तुम बानि-४९४। (ग) इहै करिहौं और तजिहाँ परी ऐसी बानि-८९५। (घ) सूपनखा ताड़का सँहारी स्याम सहज यह बानि।

मसकत
श्रम, परिश्रम।
संज्ञा
[हिं. मशक्कत]
तुम कब मासौं पतित उधारयौ। काहे को प्रभु बिरद बुलावत बिन मसकत को तारयौ-१-१३२।

मसकना, मसकनो
खिंचाव या इबाव से कपड़े के तंतु तोड़ना।
क्रि. स.
[अनु.]

मसकना, मसकनो
जोर से दबाना। ।
क्रि. स.
[अनु.]

मसकना, मसकनो
दबाकर फाड़ना।
क्रि. स.
[अनु.]

मसकना, मसकनो
खिंचाव या दबाव से कपड़े के तंतु टूटना।
क्रि. अ.

मसकना, मसकनो
दुखी या चिंतित होना।
क्रि. अ.

मसकरा
हँसोड़।
वि.
[हिं. मसखरा]

मसकला
धातु चमकाने का एक औजार।
संज्ञा
[अ. मस्कल]

मसकला
धातु चमकाने की क्रिया।
संज्ञा
[अ. मस्कल]

मसकि
दबाकर।
क्रि. स.
[हिं. मसकना]
वरन मसकि धरनी दली उरग गयौ अकुलाइ-५१९। लंपट ढीठ, गुमानी ढूँडक महा मसखरा रूखा-१-१८६।

मसकीन
दीन, दरिद्र।
वि.
[अ. मिसकीन]

मसकीन
साधु।
वि.
[अ. मिसकीन]

मसकीन
सुशील।
वि.
[अ. मिसकीन]

मसकीन
भोला।
वि.
[अ. मिसकीन]

मसखरा
हँसोड़, ठट्‍ठेबाज।
वि.
[अ. मसखरा]

मसखरापन
ठठोली।
संज्ञा
[हिं. मसखरा+पन]

मसखरी
हँसी, ठठोली।
संज्ञा
[हिं. मसखरा+ई]

मसखवा
माँस खाने वाला।
वि.
[हिं. मांस+खाना]

मसजिद
मुसलमानों का नमाज पढ़ने का स्थान।
संज्ञा
[फा. मस्जिद]

मसनंद, मसनद
बड़ा तकिया
संज्ञा
[अ. मसनद]

मसनंद, मसनद
अमीरों के बैठने की गद्दी।
संज्ञा
[अ. मसनद]

मसना, मसनो
गूँधना।
क्रि. स.
[हिं. मसलना]

मसमुंद
धक्कम-धक्का।
वि.
[हिं. मस+मुँदना]

मसयार, मसयारा
मशाल।
संज्ञा
[हिं. मशाल]

मसयार, मसयारा
मशालची।
संज्ञा
[हिं. मशाल]

मसरना, मसरनो
मसलना।
क्रि. स.
[हिं. मसलना]

मसल
कहावत, लोकोक्ति।
संज्ञा
[अ.]

मसलन
यथा, जैसे।
क्रि. वि.
[अ. मसलन्‌]

मसलना, मसलनो
रगड़ना, मलना।
क्रि. स.
[हिं. मलना]

मसलना, मसलनो
जोर से दबाना।
क्रि. स.
[हिं. मलना]

मसलना, मसलनो
आटा गूँथना।
क्रि. स.
[हिं. मलना]

मसला
कहावत।
संज्ञा
[अ. मसल]

मसला
विषय।
संज्ञा
[अ. मसल]

मसवासी
एक स्थान पर एक मास रहने वाला (साधु)।
वि.
[सं. मास+वासी]

मसवासी
एक व्यक्ति के पास एक मास रहनेवाली (वेश्या)।
वि.
[सं. मास+वासी]

मसविदा
लेख का पहला या कच्चा रूप।
संज्ञा
[अ. मुसविदा]

मसविदा
युक्ति।
संज्ञा
[अ. मुसविदा]

मसहरी
मच्छरों से बचने के लिए पलँग के चारों ओर लटकायी जाने वाली जाली (जालीदार कपड़ा)।
संज्ञा
[सं. मशक+हिं. हरना]

मसहार
माँसाहारी।
संज्ञा
[हिं. माँस+आहार]

मसहूर
प्रसिद्ध, विख्यात।
वि.
[अ. मशहूर]

मसा
शरीर पर उभरा हुआ मूँग, सरसों या बेर के बराबर दाना।
संज्ञा
[सं. माँस+कील]

मसा
मच्छड़।
संज्ञा
[सं. मशक]

मसान
मरघट।
संज्ञा
[सं. श्मशान]
मसान जगाना - श्मशान पर बैठकर शव या मुरदे की सिद्धि करना। मसान जगायो (जगायौ) - श्मशान पर शव की सिद्धि की या करने लगे। उ. - हम तौ जरि-बरि भस्म भए तुम आनि मसान जगायौ-६०६३। मसान पड़ना - बहुत सन्नाटा हो जाना।

मसनिया
मसान-संबंधी।
वि.
[हिं. मसान]

मसनिया
मसान पर रहनेवाला।
वि.
[हिं. मसान]

मसानी
श्मशान वासिनी, डाकिनी, पिशाचिनी आदि।
संज्ञा
[सं. श्मशानी]

मसानी
दावात |
संज्ञा
[सं. मसि+फा. दानी]
पुहुमि पत्र करि सिंधु मसानी गिरि मसि कौं लै डारै-१-१८३।

मसाल
मशाल।
संज्ञा
[अ. मशाल]

मसालची
मशालची।
संज्ञा
[फा. मशालची]

मसाला
सामग्री, सामान।
संज्ञा
[फ़ा. मसालह]

मसाला
साधन।
संज्ञा
[फ़ा. मसालह]

मसाला
तेल।
संज्ञा
[फ़ा. मसालह]

मसाला
हींग, मिर्च, धनिया आदि।
संज्ञा
[फ़ा. मसालह]

मसि
लिखने की स्याही।
संज्ञा
[सं.]
(क) कागद धरनि करै द्रुम लेखनि जल-सायर मसि घोरै-१-१२५। (ख) लोचन-जल कागद मसि मिलिकै हवै गई स्यामस्याम की पाती-2९७७।

मसि
काजल।
संज्ञा
[सं.]

मसि
कालिख।
संज्ञा
[सं.]

मसिदानी
दावात।
संज्ञा
[सं. मसि+ फ़ा. दानी]

मसिपात्र
दावात।
संज्ञा
[सं.]

मसिबुन्दा
काजल का टीका या दिठौना जो नजर से बचाने के लिए बच्चों के मुख पर लगाया जाता ह।
संज्ञा
[सं. मसिबिंदु]
उर बधनहा कंठ कठुला झँडूले बार। बेनी लटकन मसिबुन्दा मुनिमनहार।

मसिमुख
काले मुँह वाला, कलंकी।
वि.
[सं.]

मसियाना, मसियानो
खब भर जाना।
क्रि. अ.
[देश.]

मसिविंदु
काजल का टीका या दिठौना जो बच्चों को नजर से बचाने के लिए उनके मुख पर लगाया जाता है।
संज्ञा
[सं.]

मसी
स्याही।
संज्ञा
[सं. मसि]

मसी
कालिख।
संज्ञा
[सं. मसि]

मसीत, मसीद
मसजिद।
संज्ञा
[हिं. मसजिद]

मसीह, मसीहा
ईसा' का एक नाम।
संज्ञा
[अं.]

मसू
कठिनाई से।
संज्ञा
[हिं. गरू]
मसू करके - बड़ी कठिनाई से।

मसूड़ा
दाँतों के ऊपर-नीचे का माँस।
संज्ञा
[सं. श्मश्रु]

मसूर
एक अनाज।
संज्ञा
[सं.]
मूँग मसूर उरद चनदारी-३९६।

मसूरा
वेश्या।
संज्ञा
[सं.]

मसूरा
मसूर की बरी।
संज्ञा
[सं.]

मसूरी
मसूर' नाम का अन्न।
संज्ञा
[सं.]
अरु तैसियै गाल मसूरी-१०-१८३।

मसूस, मसूसन
कुढ़न।
संज्ञा
[हिं. मसूसना]
कीजै कहा चाव अपनी कत इहाँ मसूसन भरिए-2२७५।

मसूसना, मसूसनो
ऐंठना, उमेंठना।
क्रि. अ,
[हिं. मसोसना]

मसूसना, मसूसनो
निचोड़ना।
क्रि. अ,
[हिं. मसोसना]

मसूसना, मसूसनो
मनोवेग को दबाना।
क्रि. अ,
[हिं. मसोसना]

मसूसना, मसूसनो
कुढ़ना, खीझना।
क्रि. अ,
[हिं. मसोसना]

मसृण, मसृन
चिकना, मुलायम।
वि.
[सं. मसृण]

मसोसना, मसोसनो
कुढ़ना, खीझना।
क्रि. अ.
[फ़ा, अफसोस ?]

मसोसा
दुख, कष्ट।
संज्ञा
[हिं. मसोसना]

मस्त
मतवाला।
वि.
[फा.]

मस्त
सदा निश्चित रहने वाला।
वि.
[फा.]

मस्त
यौवन मद से भरा हुआ।
वि.
[फा.]

मस्त
जिसमें मद हो।
वि.
[फा.]

मस्त
अभिमानी।
वि.
[फा.]

मस्तक
सिर।
संज्ञा
[सं.]
रावन के दस मस्तक छेदे सर गहि सारँगपानि-१-१३५।

मस्ताना, मस्तानो
मस्त।
वि,
[फ़ा. मस्ताना]

मस्ताना, मस्तानो
मस्त-जैसा।
वि,
[फ़ा. मस्ताना]

मस्ताना, मस्तानो
मस्ती पर आना, मत्त होना।
क्रि. अ.

मस्तिष्क
बुद्धि का स्थान, दिमाग।
संज्ञा
[सं.]

मस्ती
मतवालापन।
संज्ञा
[फा.]
मस्ती उतरना (झड़ना)-मस्ती दूर होना। मस्ती उतारना (झाड़ना)-मस्ती दूर करना।

मस्ती
भोग की प्रबल कामना।

मस्ती
हाथी आदि का मद।

महँ
में।
अव्य.
[सं. मध्य]
घुटुरुनि चलत अजिर महँ बिहरत-१०-९७।

महँई
भारी, महान।
वि.
[सं. महा]

महँई
में।
अव्य.
[हिं. महँ]

महँगा
अधिक मूल्य का।
वि.
[सं. महार्घ]
पहिरि बिबिध पट मोलन महँगा-2४०२।

महँगाइ, महँगाई, महँगी
महँगे होने का भाव।
संज्ञा
[हिं. महँगा]

महँगाइ, महँगाई, महँगी
अकाल।
संज्ञा
[हिं. महँगा]

महंत
मठ का मुखिया।
संज्ञा
[सं. महत् = बड़ा]

बानी
बनिया।
संज्ञा
[सं. बणिक्]

बानी
आभा, कांति, चमक।
संज्ञा
[सं. वर्ण]

बानी
स्वभाव, आदत, टेव।
संज्ञा
[हिं. बान, बानि]
(क) मथतिं नंद-गृह सहस मथानी। ताकैं सुत चोरी की बानी-३९। (ख) यह नहिं भली तुम्हारी बानी-१००१।

बाने
अंगीकृत या ठानी हुई रीति या चाल।
संज्ञा
[हिं. बाना]
(क) जानिहौं अब बाने की बात। मोसौं पतित उधारौ प्रभु जौ, तौ बदिहौं निज तात-१-१७९। (ख) असुर-सँहारन, भक्तनि-तारन, पावन पतित कहावत बाने-३८०।

बाने
बनाव-सिंगार, वेश, सजधज।
संज्ञा
[हिं. बाना]
अंग-अंग सब सुभट सहायक बने बिबिध भूषन बाने बर-१९०६।

बानैं
पहनावा, भेस।
संज्ञा
[हिं. बाना]

बानैं
रूप।
संज्ञा
[हिं. बाना]
इनके गुन कैसे कोउ जानैं। औरै करत-और धरि बानै-७९९।

बानैत
बाना' नामक हथियार फेरनेवाला।
संज्ञा
[हिं. बान + ऐत (प्रत्य.)]

बानैत
तीर चलानेवाला।
संज्ञा
[हिं. बान + ऐत (प्रत्य.)]

बानैत
योद्धा, सैनिक, वीर।
संज्ञा
[हिं. बान + ऐत (प्रत्य.)]
(क) बाजि मनोरथ, गर्ब मत्त गज, असत-कुमत रथ-सूत। पायक मन, बानैत अधीरज, सदा दुष्टमति दूत-१-१४१। (ख) जहाँ बरन बरन बादर बानैत अरु दामिनि करि करि बार-१० उ०-2।

महंत
प्रधान, मुखिया।
वि.
सदा प्रबीन हमारे तुम हौ तुमतैं नहीं महंत-2९२१।

महंताई, महंती
महंत' का भाव या पद।
संज्ञा
[हिं. महंत]

मह
अति, बहुत।
वि.
[सं. महत्]

मह
श्रेष्ठ।
वि.
[सं. महत्]

महक
गंध, बास।
संज्ञा
[हिं. गमक]

महकना, महकनो
गंध देना।
क्रि. अ.
[हिं. महक]

महकमा
विभाग।
संज्ञा
[अ.]

महकान
गंध, बास।
संज्ञा
[हिं. महक]

महज
शुद्ध।
वि.
[अ. महज़]

महज
केवल, सिर्फ।
वि.
[अ. महज़]

महत
गौरव, मान, महत्व।
संज्ञा
[सं. महत्व]
(क) ऐसौ को अपने ठाकुर कौं इहि बिधि महत घटावै-१-१९२। (ख) बचन कठोर कहत कहि दाहत अपनो महत गवाँवत-३००८।

महतरिया
माता, मैया।
संज्ञा
[हिं. महतारी]
आए हरि यह बात सुनतहीं धाइ लए जसुमति महतरिया-१०-२४६।

महता
गर्व, घमंड।
संज्ञा
[सं. महत्ता]

महताव
चाँदनी।
संज्ञा
[फा.]

महतारी
माता, मैया।
संज्ञा
[सं. माता]
महतारी सुत दोउवै मग रोकत जाइ-१०७०।

महति, महती
मान, प्रतिष्ठा, महत्ता।
संज्ञा
[सं. महत्ता]
मातु पितु गुरु जननि जान्यो भली खाई महति-११८९।

महति, महती
बड़ी, बहुत, अधिक।
वि.

महतु
महिमा, बड़ाई।
संज्ञा
[सं. महत्व]
बृंदाबन ब्रज कौ महतु कापै बरन्यौ जाइ।

महतो
सम्मानसूचक संबोधन।
संज्ञा
[हिं. महत्ता]

महत्‌
बड़ा।
वि.
[सं.]

महत्‌
सर्वश्रेष्ठ।
वि.
[सं.]

महत्त
महिमा, बड़ाई।
संज्ञा
[सं. महत्ता]
जो कोउ काज करै बिन बूझे पेलि महत्त हरी री.-पृ. ३२७ (६७)।

महत्तत्व
पचीस तत्वों में से तीसरा जिससे अहंकार की उत्पत्ति होती है।
संज्ञा
[सं.]
त्रिगुन प्रकृति तै महत्तत्व महत्तत्व तैं अहंकार-2-३६।

महत्तम
सबसे श्रेष्ठ।
वि.
[सं.]

महत्तर
दो पदार्थों में श्रेष्ठ।
वि.
[सं.]

महत्ता
बड़ाई।
संज्ञा
[सं.]

महत्ता
श्रेष्ठता।
संज्ञा
[सं.]

महत्व
बड़ाई।
संज्ञा
[सं.]

महत्व
श्रेष्ठता।
संज्ञा
[सं.]

महन
मथने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[सं. मथन]

महना, महनो
मथना, बिलोना।
क्रि. स.
[हिं. मथना]

महना, महनो
मथानी, रई।
संज्ञा

महनिया
मथनेवाला।
संज्ञा
[हिं. मथनिया]

महनीय
पूज्य, पूजनीय।
वि.
[सं.]

महनु
मथनेवाला।
संज्ञा
[सं. मथन]

महनु
नाश करनेवाला, विनाशक।
संज्ञा
[सं. मथन]

महफिल
सभा, समाज।
संज्ञा
[अ. महफ़िल]

महफिल
नाच-रंग या मनोविनोद का स्थान।
संज्ञा
[अ. महफ़िल]

महबूब
प्रेम-पात्र।
संज्ञा
[अ.]

महबूबा
प्रेमिका।
संज्ञा
[अ.]

महभारथ
महाभारत का युद्ध।
संज्ञा
[सं. महाभारत]
जाकै संग सेत बँध कीन्हौं अरु जीत्यौ महभारथ-१-२८७।

महमंत
उन्मत्त, मदमत्त।
वि.
[सं. महा+मत्त]

महमद
मुहम्मद।
संज्ञा
[अ. मुहम्मद]

महमदी
मुहम्मद का अनुयायी।
वि.
[अ. मुहम्मदी]

महमह
सुगंध के साथ।
क्रि. वि.
[हिं. महकना]

महमहा
खुशबूदार, सुगंधित।
वि.
[हिं. महमह]

महमहाना, महमहानो
महकना।
क्रि. अ.
[हिं. महमह]

महमा
बड़ाई।
संज्ञा
[सं. महिमा]

महमा
श्रेष्ठता।
संज्ञा
[सं. महिमा]

महमान
अतिथि।
संज्ञा
[फा. मेहमान]

महमाना, महमानो
महक देना।
क्रि. अ.
[हिं. महमह]

महमानी
आतिथ्य।
संज्ञा
[फा. मेहमानी]

महमाय
पार्वती।
संज्ञा
[सं. महामाया]

महर
एक आदरसूचक शब्द या संबोधन।
संज्ञा
[सं. महत्]

महर
श्रीकृष्ण के पालक नंद जिनके लिए सम्मान सूचक शब्द 'महर' का प्रयोग किया जाता है।
संज्ञा
[सं. महत्]
पहुँचे जाइ महर मंदिर मैं मनहिं न संका कीनी-१०-४। (ख) माखन-मधु-मिष्टान्न महर लै दियौ अक्रूर के हाथ-३५३४।

महर
एक पक्षी।
संज्ञा
[सं. महत्]

महर
कहार, महरा।
संज्ञा
[सं. महत्]

महर
दयालु, दयावान्।
वि.
[फा. मेहर = दया]

महर
सुगन्धित।
वि.
[हिं. महक]

महरम
भेद का जानकार।
संज्ञा
[अ.]

महरम
अँगिया, अँगिया की कटोरी।
संज्ञा

महरा
कहार।
संज्ञा
[हिं. महत्ता]

महरा
बड़ा।
वि.

महरा
श्रेष्ठ।
वि.

महराइ, महराई
महाराज।
संज्ञा
[सं. महाराज]
राजा सौं अर्जुन सिर नाइ। कह्यौ, सुनौ बिनती महराइ-१-२८६।

महराइ, महराई
श्रेष्ठता, प्रधानता।
संज्ञा
[हिं. महरि]

महराज
महाराज।
संज्ञा
[सं. महाराज]

महराणा, महराना
महाराणा।
संज्ञा
[सं. महाराणा]

महरान, महराना, महराने
महरों' के रहने का स्थान।
संज्ञा
[हिं. महर+आना]
(क) गोकुल मैं आनंद होत है मंगल धुनि महराने टोल-१०-९४। (ख) तुमको लाज होत की हमको बात पर जो कहुँ महराने-११३६।

महराव
मेहराब।
संज्ञा
[अ. मेहराब]

महरि
स्त्रियों के लिए एक आदरसूचक संबोधन।
संज्ञा
[हिं. महर]

महरि
यशोदा जिनके लिए आदरसूचक 'महरि' का प्रयोग बराबर किया गया है।
संज्ञा
[हिं. महर]
(क) जागी महरि पुत्र-मुख देख्यौ, आनंद तूर बजायौ-१०-४। (ख) महरि पुत्र कहि सोर लगायो तरु ज्यों धरनि लुटाइ-2५३३।

महरि
घरवाली, गृहस्वामिनी।
संज्ञा
[हिं. महर]

महरि
ग्‍वालिन' नामक पक्षी।
संज्ञा
[हिं. महर]

महरी
ग्वालिन' नामक पक्षी।
संज्ञा
[देश.]

महरी
कहारिन।
संज्ञा
[हिं. महरा]

महरेटा
महर का पुत्र।
संज्ञा
[हिं. महर+ एटा]

महरेटा
श्रीकृष्ण जो नंदमहर के पुत्र थे।
संज्ञा
[हिं. महर+ एटा]

महरेटी, महरैटी
महर की पुत्री।
संज्ञा
[हिं. महरेटा]

महरेटी, महरैटी
राधा जो बृषभानु महर की पुत्री थी।
संज्ञा
[हिं. महरेटा]

महर्लोक
भू, भुव आदि चौदह लोक।
संज्ञा
[सं.]

महर्षि
बड़ा ऋषि।
संज्ञा
[सं. महा+ऋषि]

महल
राजप्रासाद।
संज्ञा
[अ.]
सुनत बुलाइ महल ही लावै सुफलक-सुत गयौ धाइ-2४६५।

महल
रनिवास, अंत:पुर।
संज्ञा
[अ.]

महलसरा
रनिवास।
संज्ञा
[अ. महल+फा. सरा]

महलियाँ
सुन्दर छोटा महल, महल जैसी सुन्दर कुटी।
संज्ञा
[अ. महल]
एक अनूपम भाल बनावति एक परस्पर बेनी गूँथति भ्राजत कुंज-महलियाँ-2०७२।

महसिल
कर उगाहनेवाला।
संज्ञा
[अ. मुहस्सिल]

महसूल
कर, लगान।
संज्ञा
[अ.]

महसूल
भाड़ा।
संज्ञा
[अ.]

महसूस
अनुभूत।
वि.
[अ.]

महसूसना, महसूसनो
अनुभव करना।
क्रि. स.
[हिं. महसूस]

महाँ
में।
अव्य.
[हिं. महँ]

महाँ
बड़ा।
वि.
[हिं. महा]

महाँ
श्रेष्ठ।
वि.
[हिं. महा]

महा
बहुत अधिक।
वि.
[सं.]

महा
बहुत बड़ा।
वि.
[सं.]
कोटिक करै एक नहिं मानौ सूर महा कृतधन कौं-१-९।

महा
सबसे बढ़कर।
वि.
[सं.]

महाअरंभ
बहुत अधिक शोर, कोलाहल या हलचल।
वि.
[सं. महा+रंभ - शोर]

महाई
मथने का काम, भाव या मजदूरी।
संज्ञा
[हिं. मथना+आई]

महाडत
महावत।
संज्ञा
[हिं. महावत]

बानैत
वेश बनानेवाला।
संज्ञा
[हिं. बाना]

बानो, बानौ
अंगीकृत धर्म, रीति या स्वभाव।
संज्ञा
[हिं. बाना]
(क) राम भक्त - बत्सल निज बानौ। जाति, गोत, कुल, नाम गनत नहिं रंक होय कै रानौ-१-११। (ख) भक्तबछल बानौ है मेरौ, बिरुदहिं कहा लजाऊँ-१०- ४।

बाप
पिता, जनक।
संज्ञा
[सं. वाप = बीज बोनेवाला]
(क) बीचहिं बोलि उठे हलधर तब याके माय न बाप-१०- २१४। (ख) बड़े-बाप के पूत कहावत, हम वै बसत इक बगरी-१०- ३१९।
बाप - दादा-पूर्वज। बाप तक जाना - माँ-बाप को गाली देना। बाप बनाना - (१) आदर करना। (१) चापलूसी करना। बाप-माँ - पालक, रक्षक।

बापिका
बड़ा चौड़ा कुआँ या जलाशय, वापी, बावली।
संज्ञा
[सं. वापिका]
नैन कमल-दल बिसाल, प्रीति-बापिका-मराल, मदन ललित बदन उपर कोटि वारि डारे-१०- २०५।

बापी
छोटा जलाशय, बावली।
संज्ञा
[सं. वापी]
सागर-सूर बिकार भरयौ जल, बधिक अजामिल बापी-१-१४०।

बापु
पिता।
संज्ञा
[हिं. बाप]

बापुरा
तुच्छ, नगण्य।
वि.
[सं. बर्बर]

बापुरा
दीन, असहाय, बेचारा।
वि.
[सं. बर्बर]

बापुरी
दीन, असहाय।
वि.
[हिं. बापुरा]
वै जलहर हम मीन बापुरी कैसे जिवहिं निनारे-१० उ.-८३।

बापुरे
दीन, असहाय।
वि.
[हिं. बापुरा]
देखौ प्रीति बापुरे पसु की आन जनम मानत नहिं हारि-१८४६।

महाउर
महावर।
संज्ञा
[हिं. महाबर]
(क) कहाँ महाउर पाग रँगाई यह सोभा इक न्यारी-१९९१। (ख) चंचल अंचल कतहिं दुरावति रूप रासि अति मानहु मोन महाउर धोए-2११२।

महाकल्प
वह समय जिसमें एक ब्रह्मा की आयु पूरी होता है।
संज्ञा
[सं.]

महाकाल
शिव का वह स्वरूप जिससे वे सृष्टि का अंत करते हैं।
संज्ञा
[सं.]

महाकाल
शिव के एक पुत्र का नाम।
संज्ञा
[सं.]

महाकाली
महाकाल-रूप शिव की पत्नी जिसके पाँच मुख और आठ भुजाएँ मानी गयी हैं।
संज्ञा
[सं.]

महाकाली
दुर्गा की एक मूर्ति।
संज्ञा
[सं.]

महाकाव्य
वह सर्गबद्ध प्रबंध काव्य जिसमें सभी रसों, ऋतुओं और प्राकृतिक दृश्यों का वर्णन हो।
संज्ञा
[सं.]

महाकाव्य
स्थायी महत्व का श्रेष्ठ काव्य।
संज्ञा
[सं.]

महाजन
श्रेष्ठ व्यक्ति।
संज्ञा
[सं.]

महाजन
धनी।
संज्ञा
[सं.]

महाजन
रुपये-पैसे का लेन-देन करने वाला।
संज्ञा
[सं.]

महाजन
बनिया।
संज्ञा
[सं.]

महाजन
भलामानुस, सदाचारी व्यक्ति।
संज्ञा
[सं.]

महाजनी
रुपये के लेन देन का काम।
संज्ञा
[हिं. महाजन]

महाजनी
एक लिपि।
संज्ञा
[हिं. महाजन]

महाजल
समुद्र।
संज्ञा
[सं.]
मलय तनु मिलि लसति सोमा महाजल गभीर।

महाजाननिराइ
अत्यंत चतुर श्रीकृष्ण।
संज्ञा
[सं. महा+ज्ञान + राय]
सूर प्रभु बस किये नागरि महाजाननिराइ-१७७३।

महातत्व
पचीस तत्वों में तीसरा जिससे अहंकार की उत्पत्ति होती है।
संज्ञा
[सं. महत्तत्व]
त्रिगुन तत्व ते महातत्व, महातत्व ते अहंकार। मन इंद्रिय सब्दादि पंची ताते किए बिस्तार।

महातम
महिमा, बड़ाई।
संज्ञा
[सं. माहात्म्य]
(क) सब सुख निधि हरि नाम महातम पायौ है नाहिंन पहिचानत। (ख) कमलनैन कौं छाँड़ि महातम और देव कौं ध्यावै-१-१६८।

महातल
चौदह भुवनों में पाँचवाँ जो पृथ्वी के नीचे है।
संज्ञा
[सं.]
अतल बितल अरु सुतल तलातल और महातल जान। पाताल और रसातल मिलि सातौ भुवन प्रमान-सारा. ३१।

महात्मा
जिसका आशय, आचरण आदि उच्च हो।
वि.
[सं. महात्मन्]

महात्मा
बड़ा साधु।
वि.
[सं. महात्मन्]

महादंड
यम का दंड।
संज्ञा
[सं.]

महादंडधारी
यमराज।
संज्ञा
[सं. महादंडधारिन्]

महादेव
बड़ा देवता।
संज्ञा
[सं.]

महादेव
शिव जी।
संज्ञा
[सं.]
ब्रह्मा महादेव तैं को बढ़ तिनकी सेवा कछु न सुधारी-१-३४।

महादेवी
दुर्गा।
संज्ञा
[सं.]

महादेवी
पटरानी।
संज्ञा
[सं.]

महाधन
बहुत मूल्यवान।
वि.
[सं.]
तहँ राजत निज वीर शेषनाग ताकें तर कूरम बरात महाधन धीर-सारा. ३२।

महाधन
बहुत धनी।
वि.
[सं.]

महान
बहुत बड़ा।
वि.
[सं. महान्]
ब्रज-जन-मन कौ महान संतन सुख दिए-४५०।

महानाभ
एक मंत्र जिससे शत्रु के शस्त्र व्यर्थ किये जाते हैं।
संज्ञा
[सं.]

महानिद्रा
मृत्यु, मरण।
संज्ञा
[सं.]

महानिधान
धातुभेदी पारा।
संज्ञा
[सं.]

महानिधि
अपार निधि।
संज्ञा
[सं.]
हरि सीता लै चल्यौ डरत जिय मानौं रंक महानिधि पाई-९-५९।

महानिर्वाण
परिनिर्वाण जिसके अधिकार केवल बुद्ध गण माने जाते हैं।
संज्ञा
[सं.]

महानुभाव
उच्चाशय वाला व्यक्ति।
संज्ञा
[सं.]
महानुभाव निकट नहिं परसे जान्यौ न कृत विधात्र-१-२१६।

महानुभावता
बड़प्पन।
संज्ञा
[सं.]

महान
बहुत बड़ा।
वि.
[सं.]

महापद्म
नौ निधियों में एक।
संज्ञा
[सं.]

महापात्र
महा ब्राह्मण जो मृतक-कर्म का दान लेता है।
संज्ञा
[सं.]

महापुरुष
श्रेष्ठ व्यक्ति।
संज्ञा
[सं.]
महापुरुष सब बैठे देखत केस गहत धरहरि न करी-१-२४९।

महाप्रतिहार
नगर या राजप्रासाद के रक्षकों या प्रतिहारों का प्रधान।
संज्ञा
[सं.]

महाप्रभु
बल्लभाचार्य जी की एक उपाधि।
संज्ञा
[सं.]

महाप्रलय
वह काल जब सारी सृष्टि का विनाश होकर केवल जल ही रह जाता है।
संज्ञा
[सं.]
अरु पुनि महाप्रलय जब होइ। मुक्ति स्थान पाइहै सोह-४-९।

महाप्रसाद
जगन्नाथ जी का चढ़ा हुआ भात।
संज्ञा
[सं.]

महाप्रसाद
मांस (व्यंग्य)।
संज्ञा
[सं.]

महाप्राण
देवनागरी वर्णमाला के प्रत्येक वर्ग का दूसरा और चौथा वर्षा (ख, घ, छ, झ, ठ, ढ, थ, ध, फ और भ) जिसके उच्चारण में प्राणवायु का विशेष व्यवहार किया जाता है।
संज्ञा
[सं.]

महाबल
बहुत बली।
बि.
[सं.]
अर्जुन भीम महाबल जोधा-१-२५४।

महाबल
बहुत वीर पुरुष।
सज्ञा
धरि अवतार महाबल काऊ एकहिं कर मेरो गर्व हरयौ-१०-५९।

महाबलि
आकाश।
सज्ञा
[सं.]

महाबलि
मन।
सज्ञा
[सं.]

महाबाहु
लंबी भुजावाला।
वि.
[सं.]

महाबाहु
वीर।
वि.
[सं.]

महाबाहु
एक राक्षस।
संज्ञा

महाब्राह्मण
वह ब्राह्मण जो मृतक-कर्म का दान ले।
संज्ञा
[सं.]

महाभाग
भाग्यवान, सौभाग्यशाली।
वि.
[सं.]

महाभागवत
परम भक्त।
संज्ञा
[सं.]

महाभागवत
परम वैष्णव।
संज्ञा
[सं.]

महाभागवत
श्रीमद्भागवत महापुराण।
संज्ञा
[सं.]

महाभारत
एक प्राचीन भारतीय महाकाव्य।
संज्ञा
[सं.]

महाभारत
कौरवों-पांडवों का महायुद्ध।
संज्ञा
[सं.]

महाभारत
कोई महायुद्ध।
संज्ञा
[सं.]

महाभूत
पंचतत्व-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश।
संज्ञा
[सं.]

महामति
बहुत बुद्धिमान।
वि.
[सं.]

महामना
अत्यंत उदार।
वि.
[सं. महामनस्]

महामनि
श्रेष्ठ मणि।
संज्ञा
[सं. महा+मणि]
सम करि गनै महामनि काँचै-2-११।

महामाइ, महामाई
दुर्गा।
संज्ञा
[सं. महा+हिं. माई]

महामाइ, महामाई
काली।
संज्ञा
[सं. महा+हिं. माई]

महामात्य
प्रधानमन्त्री।
संज्ञा
[सं.]

महामाया
दुर्गा।
संज्ञा
[सं.]

महामारी
भीषण संक्रामक रोग।
संज्ञा
[सं.]

महाय
बहुत, अधिक।
वि.
[सं. महा]

महायात्रा
मृत्यु. मरण।
संज्ञा
[सं.]

महादान
बौद्धों के तीन संप्रदायों में एक।
संज्ञा
[सं.]

महारंभ
जिसका प्रारम्भ कठिनता से हो।
वि.
[सं.]

महारथ, महारथि, महारथी
बहुत वीर योद्धा।
संज्ञा
[सं. महारथ]
स्पंदन खंडि महारथि खंडौं कपि-ध्वज सहित गिराऊँ-१-२७०।

महारस
बहुत अधिक रस या आनन्द।
संज्ञा
[सं.]
मदनदूत मोहिं बात सुनाई इनमैं भरचौ महारस भारो-११२२।

महाराज
राजाओं का भी राजा।
संज्ञा
[सं.]
लीजै पार उतारि सूर कौं महाराज ब्रजराज-१.१०८।

महाराज
आचार्य आदि पूज्य व्यक्तियों के लिए आदरसूचक संबोधन।
संज्ञा
[सं.]

महाराणा
मेवाड़, चित्तौड़ और उदयपुर के राजाओं की उपाधि।
संज्ञा
[सं. महा+हिं. राणा]

महारावल
जैसलमेर, डूँगरपूर आदि राज्यों के राजाओं की उपाधि।
संज्ञा
[सं. महा+हिं. रावल]

महाराष्ट्र
बड़ा राष्ट्र। ।
संज्ञा
[सं.]

महाराष्ट्र
दक्षिण एक प्रदेश।
संज्ञा
[सं.]

महाराष्ट्र
दक्षिणी महाराष्ट्र का निवासी।
संज्ञा
[सं.]

महालक्ष्मी
नारायण की एक शक्ति।
संज्ञा
[सं.]

महावट
माघ पूस या जाड़े की वर्षा।
संज्ञा
[हिं. माह = माघ + वट]

महावत
हाथीवान।
संज्ञा
[हिं. महामात्र]
(क) मानहुँ चंद महावत मुख पर अंकुस बेसरि लावै-८७६। (ख) माथे नहीं महावत सतगुरु अंकुस ध्यान कर टूटौ-३४०१।

महावरा
लाख से बना लाल रंग जिससे सौभाग्यवती स्त्रियों पैर रँगती-रँगाती है, यावक।
संज्ञा
[सं. महावर्ण]
नाइनि बोलहु नवरंगी (हो) ल्याउ महावर बेग-१०.४०।

महावरा
मुहावरा।
संज्ञा
[अ.]

महावरा
अभ्यास।
संज्ञा
[अ.]

महावरी
महावर' की टिकिया जिससे सौभाग्यवती स्त्रियां पैर रँगती-रँगाती हैं।
संज्ञा
[हिं. महावर]

महावीर
हनुमान।
संज्ञा
[सं.]

महावीर
जैनियों के चौबीसवेँ और अंतिम जिन या तीथँकर जिन्होंने ईसा से ५२७ वर्ष पूर्व निर्वाण प्राप्त किया था।
संज्ञा
[सं.]

महावीर
बहुत वीर।
वि.

महाशय
महात्मा, सज्जन।
संज्ञा
[सं.]

महिं
में।
अव्य.
[हिं. महँ]
राख्यौ हो जठर महिं स्रोनित सौं सानि-१-७६।

महि
पृथ्वी।
संज्ञा
[सं.]
(क) डोलत महि अधीर भयौ फनिपति-९-२६। (ख) गरू भए महि मैं बैठाए-१०-७८।

महिआँ
में।
अव्य.
[हिं. महँ]
(क) और कौन समान त्रिभुवन सकल गुन जेहि महिआँ-१७०२। (ख) कहत-सुनत समुझत मन महिआँ ऊधौ बचन तुम्हारे-३०३६।

महिख
भैसा।
संज्ञा
[सं. महिष]

बापू
पिता।
संज्ञा
[हिं. बाप]

बाफता
एक रेशमी कपड़ा।
संज्ञा
[फा. बाफ़ता]

बाबत
संबंध।
संज्ञा
[अ.]

बाबत
विषय।
संज्ञा
[अ.]

बाबरी
जुल्फ, पट्टा।
संज्ञा
[हिं, बबर = सिंह]

बाबा
पिता।
संज्ञा
[तु.]
(क) कहन लागे मोहन मैया-मैया। नंद महर सौं बाबा बाबा, अरु हलधर सौं भैया-१०-१५५। (ख) मोसौं कहौ बात बाबा यह, बहुत करत तुम सोच-बिचार-५३०।

बाबा
दादा, पितामह।
संज्ञा
[तु.]

बाबा
साधु के लिए आदरसूचक संबोधन।
संज्ञा
[तु.]

बाबा
बूढ़ा व्यक्ति।
संज्ञा
[तु.]

बाबा
बच्चों के लिए प्यार का संबोधन या शब्द।
संज्ञा
[तु.]

महिदेव
ब्राह्मण।
संज्ञा
[सं.]

महिधर
पर्वत।
संज्ञा
[सं. महीधर]

महिधर
शेष।
संज्ञा
[सं. महीधर]

महिपाल
राजा।
संज्ञा
[सं.महीपाल]

महिमा
महत्व, प्रताप।
संज्ञा
[सं. महिमन्]
(क) जासु महिमा प्रगटि केवट धोइ पग सिर धरन-१-३०८। (ख) सुक की महिमा सुक ही जानै-१-३४१। (ग) तै सिव की महिमा नहिं लही-४-५।

महिमा
आठ सिद्धियों में एक।
संज्ञा
[सं. महिमन्]

महियाँ
में।
अध्य
[हिं. महँ]
(क) बिडरति फिरतिं सकल बन महियाँ-६१२। (ख) सूरदास प्रभु तुमरे दास को आनँद होत ब्रज महियाँ-१००१। (ग) खेलत हँसत गए बन महियाँ-2३६७। (घ) कबहुँ कहत वा मुरली महियाँ लै लै बोलत हमरौ नाउँ-३४४८।

महिरावण, महिरावन
रावण का एक पुत्र जो पाताल में रहता था।
संज्ञा
[सं. महिरावण]
तुम्हें मारि महिरावन मारैं देहिं बिभीषन राई-९-१४०।

महिला
भले घर की स्त्री।
संज्ञा
[सं.]

महिष
भैंसा।
संज्ञा
[सं.]

महिष
एक राक्षस जिसे दुर्गा ने मारा था।
संज्ञा
[सं.]

महिषमर्दिनी
दुर्गा।
संज्ञा
[सं.]

महिषासुर
एक राक्षस जिसे दुर्गा ने मारा था।
संज्ञा
[सं.]

महिषी
भैंस।
संज्ञा
[सं.]

महिषी
रानी।
संज्ञा
[सं.]

महिषेश
महिषासुर।
संज्ञा
[सं.]

महिषेश
यमराज।
संज्ञा
[सं.]

महिसुत
पृथ्वी का पुत्र मंगल ग्रह।
संज्ञा
[सं. महीसुत]
महिसुत गति तजि जलसुत गति लै सिंधु-सुता-पति भवन न भावै-2२४५।

महिसुर
ब्राह्मण।
संज्ञा
[सं. महीसुर]

मही
पृथ्वी।
संज्ञा
[सं.]
जज्ञ मैं करत तब मेघ बरसत मही-४-११।

मही
मिट्टी।
संज्ञा
[सं.]

मही
मठा, छाँछ।
संज्ञा
[हिं. महना]
(क) ऐसी तू है चतुर बिबेकी पय तजि पियत मही। (ख) छिरकि लरिकनि मही सौं भरि ग्वाल दए चलाइ-१०-२८९। (ग) खाटी मही कहा रुचि मानै सूर खवैया घी को-३२५१।

महीदेव
ब्राह्मण।
संज्ञा
[सं.]

महीधर
पर्वत।
संज्ञा
[सं.]

महीधर
शेषनाग।
संज्ञा
[सं.]

महीन
पतला, झीना।
वि.
[सं. महा+हिं. झीन]
महीन काम - बहुत कारीगरी का काम।

महीन
कोमल, धीमा, मंद।
वि.
[सं. महा+हिं. झीन]

महीना
मास।
संज्ञा
[सं. मास]

महीना
मासिक वेतन।
संज्ञा
[सं. मास]

महीना
स्त्री का मासिक धर्म।
संज्ञा
[सं. मास]

महीप, महीपति, महीपाल
राजा।
संज्ञा
[सं.]
भागधपति बहु जीति महीपति कछु जिय मैं गरबाए-१-१०९।

महीपुत्र, महीसुत
मंगल ग्रह।
संज्ञा
[सं.]
भाग्य-भवन मैं मकर महीसुत बहु ऐस्वर्य बढ़ैहैं-१०-८६।

महीसुर
ब्राह्मण।
संज्ञा
[सं.]

महीसूनु
मंगल ग्रह।
संज्ञा
[सं. मही+सुवन]

महुँ
में।
अव्य.
[हिं. महँ]

महुअर, महुअरि, महुअरी
एक बाजा।
संज्ञा
[सं. मधुकर, प्रा. महुअर]
डफ बासुरी अरु महु अरि बाजत ताल मृदंग-2३९९।

महुआ
एक वृक्ष।
संज्ञा
[सं. मधूक, प्रा. महुअ]

महुर्छा, महुर्छो
महोत्सव।
संज्ञा
[सं. महोत्सव, प्रा. महोच्छव]

महुवरि
महुअर' बाजा।
संज्ञा
[हिं. महुअर]
सूर स्याम जानि चतुराई जेहि अभ्यास महुवरि को।

महुवा
महुआ’ वृक्ष।
संज्ञा
[हिं. महुआ]

महूँख
महुआ' वृक्ष।
संज्ञा
[सं. मधूक]

महूम
लड़ाई, युद्ध।
संज्ञा
[अ. मुहिम]

महूम
चढ़ाई, अभियान।
संज्ञा
[अ. मुहिम]

महूरत, महूरति
शुभ कार्य का समय।
संज्ञा
[सं. मुहूर्त]

महेंद्र
इन्द्र।
संज्ञा
[सं.]

महेंद्र
विष्णु।
संज्ञा
[सं.]

महेर, महेरा
झगड़ा, बखेड़ा।
संज्ञा
[देश.]

महेर, महेरा
दही में चावल या आटा पकाकर बनाया जाने वाला एक व्यंजन।
संज्ञा
[हिं. मही+एरा]

महेरि, महेरी
महेरा' व्यंजन।
संज्ञा
[हिं. महेरा]
मधुर महेरि सो गोपन प्यारी।

महेरि, महेरी
अड़चन डालने वाला।
वि.
[हिं. महेर]

महेला
सुन्दर, मनोहर।
वि.
[देश.]

महेश, महेस
शिव।
संज्ञा
[सं महेश]

महेश्वर, महेसुर, महेस्वर
शिव।
संज्ञा
[सं. महेश्वर]

महोख, महोखा
एक पक्षी।
संज्ञा
[सं. मधूक]

महोच्छव, महोछ, महोछा, महोत्सव
बड़ा उत्सव।
सज्ञा
[सं.महोत्सव]
बरस दिवस को महा महोत्सव को आवै को कौन सुनाई-९१३।

महोदधि
सागर, समुद्र।
संज्ञा
[सं.]

महोदय
महाशय, महानुभाव।
संज्ञा
[सं.]

महोल, महोला
हीला, बहाना।
संज्ञा
[अ. मुहेल]

महोल, महोला
धोखा, चकमा।
संज्ञा
[अ. मुहेल]

महयो, महयौ
छाँछ, मठा।
संज्ञा
[हिं. मही]
(क) प्रगट प्रताप ज्ञान गुरु गम तैं दधि मथि घृत लै तज्यो मह्यौ-2-८। (ख) मैं मतिहीन मर्म नहिं जान्यौ भूलो मथत महयौ-2८९४।

माँ
जननी।
संज्ञा
[सं. माता]
(क) दोउ भैया जेंवत माँ आगे। (ख) परसुराम सौं यौं कही माँ कौ बेगि सँहार-९-१४।

माँ
में।
अव्य.
[सं. मध्य]

माँखण, माखन
मक्खन।
संज्ञा
[हिं. माखन]

माँखना, माँखनो
क्रोध करना।
क्रि. अ.
[हिं. माखना]

माँखी
मक्खी।
संज्ञा
[हिं मक्खी]

माँग
माँगने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. माँगना]

माँग
खपत, चाह।
संज्ञा
[हिं. माँगना]

माँग
सिन के बालों को काढ़कर निकाली गयी रेखा, सीमंत।
संज्ञा
[सं. मार्ग?]

माँग
माँग-चोटी-केश शृंगार। माँगजली-विधवा।
यौ.
माँग - कोख से सुखी रहना (जुड़ाना) - स्त्री का सौभाग्य और संतानवती होना। माँग - पट्टी करना - केशों का शृंगार करना। माँग पारना (बाँधना) - बाल सँवारना।

माँग - टीका
माँग का एक गहना।
संज्ञा
[हिं. माँग+टीका]

माँगत
याचना करता है।
क्रि. स.
[हिं. माँगना]
(क) माँगत है सूर त्याग जिहिं तन-मन-राता-११२३। (ख) उलटे न्याउ सूर के प्रभु के बहे जात माँगत उतराई-३०५८।

माँगन
माँगने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. माँगना]

माँगन
माँगने के लिए।
संज्ञा
[हिं. माँगना]
(क) हरि कहयौ जज्ञ करत तहँ बाम्हन। जाहु उनहिं ढिग भोजन माँगन-८९६। (ख) परमहंस बिहंग देखतहिं आवत भिक्षा माँगन-३००१।

माँगन
भिखारी, भिक्षुक।
संज्ञा
[हिं. मंगन]

माँगना, माँगनो
याचना करना।
क्रि. स.
[सं मार्गण = याचना]

माँगना, माँगनो
इच्छा पूरी करने को कहना।
क्रि. स.
[सं मार्गण = याचना]

माँगफूल
माँग का एक गहना।
संज्ञा
[हिं. माँग+फूल]

मांगल गीत
शुभ अवसर पर गाया जानेवाला गीत।
संज्ञा
[सं. मांगल्य गीत]

मांगलिक
शुभ मंगलकारी।
वि.
[सं.]

मांगल्य
शुभ, मंगलकारक।
वि.
[सं.]

माँगा
मँगनी।
सज्ञा
[हिं. माँगना]

माँगा
माँग की।
क्रि. स.

माँगि
माँगकर।
क्रि. स.
[हिं. माँगना]

माँगि
माँगि पठैहै-मँगवा भेजेगा।
प्र.
जब चहिहै तब माँगि पठैहै जो कोउ आवत जातो-३१२२।

माँगे
माँगा हुआ।
वि.
[हिं. माँगना]
मुँह माँगे-फल जो तुम पावहु तौ तुम माँनहु मोहिं-९१५।

माँगे
माँगने का भाव, मँगनी।
संज्ञा

माँगै
कामना पूरी करने के लिए याचना करता है।
क्रि. स.
[हिं. माँगना]
भक्त अनन्य कछु नहिं माँगै-३-१३।

माँग्यो, माँग्यौ
माँगा है, याचना की।
क्रि. स.
[हिं. माँगना]
(क) राजा जल ता रिषि सौं माँग्यौ-१.२९० (ख) मोहन माँग्यौ अपनो रूप-३१८२।

माँग्यो, माँग्यौ
माँगा हुआ।
वि.
जो तुम मुँह माँग्यो फल पावहु-१०१६।

माँचना, माँचनो
शुरू या आरंभ होना।
क्रि. अ.
[हिं. मचना]

माँचना, माँचनो
प्रसिद्ध होना।
क्रि. अ.
[हिं. मचना]

माँचा
पलँग।
संज्ञा
[सं. मंच, हिं. मंझा]

माँचा
मचान।
संज्ञा
[सं. मंच, हिं. मंझा]

माँची
आरंभ हुई।
क्रि. अ.
[हिं. माँचना]

माँछ
मछली।
संज्ञा
[सं. मत्स्य]

माँछना, माँछनो
धँसना।
क्रि. अ.
[सं मध्य ?]

माँछर, माँछरी, माँछल, माँछली
मछली।
संज्ञा
[सं. मत्स्य]

माँछी
मक्खी।
संज्ञा
[हिं. मक्खी]

माँजना, माँजनो
रगड़ रगड़कर शरीर के अंगों का मैल छुड़ाना।
क्रि. स.
[सं. मज्जन]

माँजना, माँजनो
अभ्यास करना।
क्रि. अ.

बाबी
संन्यासिनी।
संज्ञा
[हिं. बाबा]

बाबुल
बाबा।
संज्ञा
[हिं. बाबा]

बाबुल
बाबू।
संज्ञा
[हिं. बाबा]

बाबू
पिता' के लिए संबोधन।
संज्ञा
[हिं. बापू]

बाबू
आदरसूचक संबोधन।
संज्ञा
[हिं. बापू]

बाबू
‘छैला' बने घूमने वाले लापरवाह व्यक्ति के लिए संबोधन (व्यंग्य)।
संज्ञा
[हिं. बापू]

बाभन
ब्राह्मण।
संज्ञा
[सं. ब्राह्मण]

बाम
बायाँ, दाहने का उलटा।
वि.
[सं. वाम]
बाम कर सौं पकरि, गरुड़ पर राखि हरि, छीर कैं जलधि तट धर्यौ ल्याई-८- ८।

बाम
पत्नी, भार्या।
संज्ञा
[सं. वामा]
गंगा तट आए श्री राम। तहाँ पषान रूप पग परसे, गौतम रिषि की बाम-९-२०।

बाम
स्त्री, नारी।
संज्ञा
[सं. वामा]
तीनि जने सोभा त्रिलोक की, छाँड़ि सकल सुरधाम। सूरदास-प्रभु-रूप चकित भए, पंथ चलत नरबाम-९- ४४।

माँजना, माँजनो
दोहराना।
क्रि. अ.

माँजर
हड्डियों की ठठरी।
संज्ञा
[हिं. पंजर]

माँजा
पहली वर्षा का फेन जो मछली के लिए मादक माना जाता है।
संज्ञा
[देश.]

माँझ
में, भीतर, बीच।
अव्य.
[सं. मध्य]
(क) सभा माँझ द्रौपदि पति राखी-१-११३। (ख) गोकुल माँझ जोग बिस्तारयौ-2९८२। (ग) सो यह परम उदार मधुप ब्रज बीथिन माँझ बहायौ-2९९८। (घ) जाप हृदय माँझ हरी-३२००।

माँझ
अंतर, फर्क।
संज्ञा

माँझा
पगड़ी का एक आभूषण।
संज्ञा
[सं. मध्य]

माँझा
वे पीले कपड़े जो वर-वधू को विवाह के दो-तीन दिन पहले हल्दी चढ़ाने पर पहनाये जाते हैं।
संज्ञा
[सं. मध्य]

माँझा
पतंग की डोरी को पैना बनाने के लिए बढ़ाया जानेवाला कलक।
संज्ञा
[हि. माँजना]

माँझा
डोरी जिस पर यह कलफ चढ़ा हो।
संज्ञा
[हि. माँजना]

माँझिल
बीच का।
क्रि. वि.
[सं. मध्य]

माँड़ना
मलना-मसलना।
क्रि. स.
[सं. मंडन]

माँड़ना
सानना, गूँधना।
क्रि. स.
[सं. मंडन]

माँड़ना
पोतना, लेपना।
क्रि. स.
[सं. मंडन]

माँड़ना
रचना, सजाना।
क्रि. स.
[सं. मंडन]

माँड़ना
मचाना, ठानना।
क्रि. स.
[सं. मंडन]

माँड़ना
'बाल' में से अनाज के दाने झाड़ना।
क्रि. स.
[सं. मंडन]

माँड़ना
चलना, गमन करना।
क्रि. अ.

माँड़नि, माँड़नी
गोट, किनारी।
संज्ञा
[सं. मंडन]
अँगिया नील माँड़नी राती निरखत नैन चुराई-१७३९। (ख) नील कंचुकी माँड़नि लाल। भुजन नवै आभूषन माल-१८२०।

माँड़नो
मलना, मसलना।
क्रि. स.
[सं. मंडन]

माँड़नो
सानना-गूँधना।
क्रि. स.
[सं. मंडन]

माँझी
नाव लेनेवाला।
संज्ञा
[सं. मध्य, हिं. माँझ ?]

माँझी
झगड़े का बीच-बचाव करनेवाला।
संज्ञा
[सं. मध्य, हिं. माँझ ?]

माँट
मटका, कुँडा।
संज्ञा
[सं. मट्टक]
मानौ नील माँट महँ बोरे लै जमुना जु पखारे।

माँट
अटा, अटारी।
संज्ञा
[सं. मट्टक]

माँठ
मटका, कुंडा।
संज्ञा
[सं. मट्टक]

माँठी
एक तरह की चूड़ी।
संज्ञा
[देश.]

माँड़
पकाये हुए चावल या भात का लसदार पानी।
संज्ञा
[सं. मंड]

माँड़
माड़ने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. माँड़ना]

माँड़
एक राग।
संज्ञा
[देश.]

माँड़ति
मचाती या ठानती है।
क्रि. स.
[सं. मंडन]
सुनहु सूर हम सों हठ माँडति कौन नफा करि लैहौ-१११८।

माँड़नो
पोतना, लेपना।
क्रि. स.
[सं. मंडन]

माँड़नो
रचना, सजाना।
क्रि. स.
[सं. मंडन]

माँड़नो
बाल' से अन्न के दाने झाड़ना।
क्रि. स.
[सं. मंडन]

माँड़नो
मचाना, ठानना।
क्रि. स.
[सं. मंडन]

माँड़हि
पोतती या लगाती है।
क्रि. स.
[हिं. माँड़ना]
एक मुख माँड़हि कुमकुमा मिलि झूमक हो-2४१०।

माँड़हि
मचाता या ठानता है।
क्रि. स.
[हिं. माँड़ना]
उ.-और मंत्र कछु डर जनि आनौ आजु सुकपि रन माँड़हि।

माँड़ि
किसी अन्न की 'बाल' से दाने झाड़कर।
क्रि. स.
[हिं. माड़ना]
माँड़ि माँड़ि खरिहान क्रोध कौ पोता भजन भरावै-१-१४२।

माँड़ी
मचायी, ठानी।
क्रि. स.
[हिं. माँड़ना]
रुद्र भगवान अरु बान सांबुक भिरे राम कुंभाउ माँड़ी लराई-१० उ-३५।

माँड़ौगी
ठानूँगी, मचाऊँगी।
क्रि. स
[हिं. माँड़ना]
सुन री कुल की कानि ललन सों मैं झगरौ माँड़ौगी-१५११।

माँडलिक
मंडल विशेष का शासक।
संज्ञा
[सं.]

माँड़ा
मचाया, ठाना।
क्रि. स.

माँड़ी
भात का पसावन, माँड़।
संज्ञा
[सं. मंड]

माड़े
मैदे की पतली पूरी, लुचई।
संज्ञा
[हिं. माड़]
काकी भूख गयी बयारि भखि बिना दूध-घृत-माड़े।

माँड़ो, माँड़ौ
विवाह का मंडप।
संज्ञा
[सं. मंडप]

माँड़यो, माँड़यौ
लीपा, पोता, लगाया।
क्रि. स.
[हिं. माड़ना]
देखा मैं बालक-बत छाँड़या। एक कहत अंगन दनि माँड़यो-१०५१।

माँड़यो, माँड़यौ
विवाह का मंडप, मँड़वा।
संज्ञा
[सं. मंड़प]
आए भाग द्वारका नीके रच्यो माँड़यो छाय। ब्याह केलि बिधि रची सकल मुख सौंज गनी नहिं जाय।

माँढ़ा
विवाह-मंडप।
संज्ञा
[हिं. माँड़व]

माँत
उन्मत्त।
वि.
[सं. मत्त]

माँत
दीवाना।
वि.
[सं. मत्त]

माँत
उदास
वि.
[सं. मंद]

माँड़व
विवाहादि शुभ कार्यों के लिए छाया जानेवाला मंडप।
संज्ञा
[सं. मंडप]

माँड़व
एक ऋषि जिन्हें बाल्यावस्था के अपराध के कारण यमराज ने शूली पर चढ़वाया था। इस पर ऋषि ने यमराज को शूद्र हो जाने का शाप दिया था; फलस्वरूप यमराज दासी के गर्भ से पांडु के यहाँ जन्मे और ’विदुर' कहलाये।
संज्ञा
[सं. माण्डव्य]
माँडव रिषि जब सूली दयौ। तब सो काठ हरौ ह्वै गयौ। माँडव धर्मराज पै आयौ। क्रोधवंत यह बचन सुनायौ।….। दासी पुत्र होहु तुम जाइ। सूर बिदुर भयो सो इहिं भाइ-३-५।

मांडवी
राजा जनक के भाई कुशध्वज की पुत्री जो भरत को ब्याही थी।
संज्ञा
[सं.]

मांडव्य
एक प्राचीन ऋषि।
संज्ञा
[सं.]

माँड़ा
मंडप, मँडवा।
संज्ञा
[सं. मंडप]

माँड़ा
मैदे की पतली रोटी जो घी में पकायी जाती है।
संज्ञा
[हिं. माँडना=गूँथना]

माँड़ा
पूरी, पराठा।
संज्ञा
[हिं. माँडना=गूँथना]

माँड़ा
गूँधा, साना।
क्रि. स.

माँड़ा
पोता, लगाया।
क्रि. स.

माँड़ा
रचा, सजाया।
क्रि. स.

माँत
पराजित।
वि.
[सं. मंद]

माँतना, माँतनो
उन्मत्त या बेसुध होना
कि. अ.
[सं. मत्त + हिं ना]

माँतना, माँतनो
दीवाना होना।
कि. अ.
[सं. मत्त + हिं ना]

माँता, माँती
उन्मत्त, दीवाना।
वि.
[सं. मत्त]

माँथ
माथा, मस्तक।
संज्ञा
[सं. मस्तक]

माँथबंधन
पराँदा,चोटी, चँदरी।
संज्ञा
[हिं. माथा+बंधन]

माँथबंधन
साफा, पगड़ी।
संज्ञा
[हिं. माथा+बंधन]

माँद
श्रीहीन, फीका।
वि.
[सं. मंद]

माँद
पराजित
वि.
[सं. मंद]

माँद
हिंसक जंतु की गुफा, खोह।
संज्ञा
[देश.]

माँस
शरीर का गोश्त।
संज्ञा
[सं.]

माँस
महीना
संज्ञा
[सं. मास]

माँसभक्षी
माँस खानेवाला।
वि.
[सं. माँसभक्षी]

माँसल
माँस मे युक्त।
वि.
[सं.]

माँसल
मोटा, पुष्ट।
वि.
[सं.]

माँसलता
माँसल होने का भाव।
संज्ञा
[सं.]

माँसलता
पष्टता और स्थूलता।
संज्ञा
[सं.]

माँसाहारी
माँस खानेवाला।
वि.
[सं. मांसाहारी]

माँसी
मौसी।
संज्ञा
[हिं. मौसी]

माँसु, माँसू
माँस, गोश्‍त।
संज्ञा
[सं. माँस]

माँदगी
रोग।
संज्ञा
[फा.]

माँदगी
कावट।
संज्ञा
[फा.]

माँदर
'मर्दल' नामक मृदंग।
संज्ञा
[हिं. मर्दल]

माँदा
थका हुआ।
वि.
[फा. मदः]

माँदा
बीमार।
वि.
[फा. मदः]

मांधाता
एक सूर्यवंशी चक्रवर्ती राजा जिसके पचास कन्याएँ थी।
संज्ञा
[सं मांतृ]
कह्यौ मांधाता सों जाइ। पुत्री एक देहु मोहिं नाइ ९.।

माँपना, माँपनो
नशे में चूर होना।
क्रि. अ.
[हिं. माँतना]

माँपना, माँपनो
नाप करना या लेना।
कि. स.
[हिं. मापना]

माँयँ
में, बीच।
अव्य.
[सं. मध्य, हिं, माँझ]

माँयँ
माता।
संज्ञा
[सं. माना]

माई
माई का लाल-उदार स्वभाव वाला।
यौ.

माई
वीर बली।
यौ.

माई
सखी अथवा बूढ़ी स्त्री के लिए आदरसूचक संबोधन।
संज्ञा
[सं. मातृ]
(क) जसुमति माई कहा सुत सिखयो हमको जैसे हाल कियौ-८१०। (ख) सखिरि बोलावधि टेरि दोरि आवहु री माई-2४१९। (ग) कोऊ-माई आवत है तन स्याम-2९५८। (घ) सुंदर स्याम कान्ह लिखि पठई आइ सुनो री माई.-2९६।

माख
अप्रसन्नता।
संज्ञा
[सं, मक्ष]

माख
पछतावा।
संज्ञा
[सं, मक्ष]

माखन
नवनीत, मक्खन।
संज्ञा
[हिं. मक्खन]
(क) कहिंधौं मधुप वारि मथि माखन काढ़ि जो भरी कमोरी-३०२८। (ख) हम अहीर माखन दधि बेचैं सबन टेक पकरी-३१०४। (ग) पर लिखिलखि जोग पठावत बिसरी माखन चोरी-३१११।

माखनचोर
श्रीकृष्ण।
संज्ञा
[हिं. माखन+चोर]

माखना, माखनो
अप्रसन्न होना।
क्रि. अ.
[हिं. माख]

माखा
अप्रसन्नता।
संज्ञा
[हिं. माख]

माखा
पछतावाा
संज्ञा
[हिं. माख]

बाम
कान का एक गहना।
संज्ञा
[सं. वामा]

बाम
कोठा, अटारी।
संज्ञा
[फा.]

बाम
कोठा, अटारी।
संज्ञा
[फा.]

बाम
ऊपरी छत।
संज्ञा
[फा.]

बामन
विष्णु का पाँचवाँ अवतार जो उन्होंने राजा बलि को छलने के लिए लिया था।
संज्ञा
[सं. वामन]

बामन
ब्राह्मण।
संज्ञा
[सं. वामन]

बामन
बौना, नाटा, छोटा।
वि.

बामा
पत्नी।
संज्ञा
[सं. वामा]

बामा
नारी।
संज्ञा
[सं. वामा]

बामी
दीमकों के रहने का मिट्टी का भीटा, बँबीठा।
संज्ञा
[हिं. बाँबी]
बामी ताकौं लियौ छिपाइ। तासौं रिषि नहि देइ दिखाइ-९-३।

माखा
बड़ी मक्खी।
संज्ञा
[हिं. माखी]

माखा
नर मक्खी।
संज्ञा
[हिं. माखी]

माखी, माखो
मक्खी।
संज्ञा
[सं. माक्षिक]
ज्यों माखी मृगमद मंडित तन परिहरि पूय परै-१-१९८।

माखी, माखो
शहद की मक्खी।
संज्ञा
[सं. माक्षिक]
अब तो हैं हम निपट अनाथ। जैसे मधु तोरे की माखी त्यौं हम बिन ब्रजनाथ-2६९३।

मागध
भाट, चारण।
संज्ञा
[सं.]

मागध
जरासंध का एक नाम।
संज्ञा
[सं.]
(क) मागध हत्यौ, मुक्त नृप कीन्हें-१-१७। (ख) मागध मगध देस तैं आयौ लीन्हें फीज अपार।

मागध
मगध देश का।
वि.
[सं. मगध]

मागधपति
मगध का राजा।
संज्ञा
[स.]

मागधपति
जरासंध !
संज्ञा
[स.]
मागधपति बहु जीति महीपति कछु जिय मैं घबराए-१-१०९।

मागधी
मगध की प्राचीन प्राकृत भाषा।
संज्ञा
[सं.]

माँह, माँहा, माँहि, माँही, माहें, माहैं
में, बीच भीतर, अंदर।
अव्य.
[सं मध्य]

माँ
लक्ष्मी।
संज्ञा
[सं.]

माँ
माता।
संज्ञा
[सं.]

माइँ, माई
छोटा पूआ जिससे 'विवाहआदि शुभ अवसरों पर कुलदेवी का पूजन किया जाता है।
संज्ञा
[सं. मातृ]
माइँ (माइँन या माई) में थापना - पितरों के समान आदर करना। माइँन मैं थपिहौं पितरौं के समान आदर करूँगी (करूँगा। उ. - जब लौं हौं जीवौं जीवन भर सदा नाम तव जपिहौं। दधि-ओदन दोना भरि दैहौं अरु म इँन (पाठां - भाइनि-भाई) मैं थपिहौं-९-१६४।

माइँ, माई
पुत्री, कन्या।
संज्ञा
[अनु.]

माइँ, माई
मामा की स्त्री, मामी।
संज्ञा
[हिं. मामा]

माइ
माता।
संज्ञा
[स. मातृ]
कबहुँक लछिमन पाइ सुमित्रा माइ-माइ कहि मोहिं सुनैहै-९-८१।

माइ
वृद्धा के लिए आदरसूचक संबोधन।
संज्ञा
[स. मातृ]

माइका
स्त्री के माता-पिता का घर नैहर।
संज्ञा
[सं. मातृ+गृह]

माई
माता, जननी।
संज्ञा
[सं. मातृ]

माटी
मिट्टी।
संज्ञा
[हिं. मिट्टी]
(क) उन तो वह कौन्हीं तब हमसौं ए रतन छँड़ाइ गहावत माटी-३०५६। (ख) माटी मैं ज्यौं कंचन परै-७-२१।

माटी
शरीर।

माटी
मत शरीर, शव।

माटी
पाँच तत्वों में 'पृथ्वी' नामक तत्व।

माटी
धूल।

माठी
मैदे की छोटी पकी हुई टिकिया को शकर में पाग कर बनायी गयी मिठाई।
संज्ञा
[हिं. मीठा]

माठी
मटकी, छोटा मटका।
संज्ञा
[हिं. मटकी]

माठा
छाँछ, मठा।
संज्ञा
[हिं. मठा]

माठा
कंजूस कृपण।
वि
[हिं.]

माठी
एक तरह की कपास।
संज्ञा
[देश.]
बेगि चलि सजि श्रृंगार काढ़ि माठी खगवारौ आइकै साज-2२०२

माघ
पूस के बाद का महीना।
संज्ञा
[सं.]
माघ तुषार जुवति अकुलाहीं ह्याँ कहुं नंद सुवन तौ नाहीं.-१९९।

माघ
संस्कृत का एक प्रसिद्ध कवि।
संज्ञा
[सं.]

माघ
कुंद का फूल।
संज्ञा
[सं. माध्य]

माघी
माघ की पूर्णिमा।
संज्ञा
[सं. माघ+हिं. ई]

माघी
माघ मास से सबंधित, माघ का।
वि.

माच
मचान, मंच।
संज्ञा
[हिं. मचान]
तुरत माच ते धरनि गिरायो २६३१।

माच
मार्ग, रास्ता।
संज्ञा
[सं.]

माचना, माचनो
शोर-गुल के साथ कार्यारंभ करना।
क्रि. स.
[हिं. मचाना]

माचना, माचनो
फैलाना, छा देना।
क्रि. स.
[हिं. मचाना]

माचल
हठी, जिद्दी।
वि.
[हिं. मचलना]
महा माचल मारिबे की सकुच नाहिंन मोहिं-१-१०६।

माचा
पीढ़ा।
संज्ञा
[सं. मंच]

माचा
मचान।
संज्ञा
[सं. मंच]

माची
पीढ़ी, मचिया।
संज्ञा
[सं. मंच]

माछ, माछर, माछा
मछली।
संज्ञा
[सं. मत्स्य]

माछ, माछर, माछा
मच्छड़।
संज्ञा
[हिं. मच्छड]

माछी
मछली।
संज्ञा
[सं. मत्स्य]

माछी
मक्खी।
संज्ञा
[सं. मक्षिका]

माजरा
वृत्तांत।
संज्ञा
[अ.]

माजरा
बठना।
संज्ञा
[अ.]

माट
मटका जिसमें दही आदि रखा जाता है।
संज्ञा
[हिं. मटका]
सिर दधि-माखन के माट गावत गीत नए।

मात
माँ, जननी।
संज्ञा
[हिं.माता]
(क) मात-पितु के बंद छोरे बासुदेव कुमार-2९७५। (ख) मात-पिता हित प्रीति निगम पंथ तजि दुख-सुख भ्रम नाख्यो-३०१४।

मात
हार, पराजय।
संज्ञा
[अ.]

मात
हारा हुआ, पराजित।
वि.

मात
मतवाला।
वि.
[सं. मत]

मात
मतवाला होकर।
कि.अ.
[हिं. मातना]
उमँगि अंगन मात कोऊ बिरध तरुन अरु बाल-2९५४।

मातना, मातना
मस्त होना।
कि.अ.
[सं. मत्त]

मातनि
माता से।
संज्ञा
[हिं. माता+नि]
निसि दिन स्रम-सेवा कराइ उठि अंत मिले पित-मातनि-३०२५।

मातम
शोक।
संज्ञा
[अ.]

मातम
मृत्यु-शोक।
संज्ञा
[अ.]

मातलि
इंद्र का सारथी।
संज्ञा
[सं.]

माड़
भात का पसेव, माँड़।
संज्ञा
[हिं. माँड़]

माड़ति, माड़ती
हाथ से मलती-मसलती है।
क्रि. स.
[हिं. माड़ना]
कोउ काजर कोउ बदन माड़ती हर्षहिं करहिं कलोल २४२७।

माड़ना, माड़नो
ठानना, मचाना।
क्रि. अ.
[हिं. माँड़ना]

माड़ना, माड़नो
मंडित या भूषित करना।
क्रि. स.
[सं. मंडन]

माड़ना, माड़नो
पहनना, धारण करना।
क्रि. स.
[सं. मंडन]

माड़ना, माड़नो
आदर करना।
क्रि. स.
[सं. मंडन]

माड़ना, माड़नो
पैर या हाथ से मलनामसलना।
क्रि. स.
[सं. मर्दन]

माड़ना, माड़नो
घूमना, फिरना।
क्रि. स.
[सं. मर्दन]

माड़व
मंडप।
संज्ञा
[सं. मंडप]

माड़ी
ठानी, मचायो।
क्रि. अ.
[हिं. माड़ना]
सुमति सुन्दरी परस प्रियारस लंपट माड़ो आरि १३५२।

माड़ो, माड़ौ
ठानो मचाओ।
क्रि. अ.
[हिं. माड़न]
हमहि मूरख बदति आपु ए ढंग सदति पाइ अब मदति हठ कतहिं माड़ौ-१२६९।

माड़ो, माड़ौ
मलो, मसलो, मर्दन करो।
क्रि. स.
एक कहै प्रिय को मुख माड़ौ। एक कहैं फगुवा लै छाँड़ौ-2४१५।

माढ़ी
मढ़ी।
संज्ञा
[हिं. मढ़ी]
अँगिया बनी कुचन सो माढ़ी।

माढ़ी
मंच।
संज्ञा
[सं. मंडप]

माढ़ी
मचिया।
संज्ञा
[सं. मंडप]

माणिक, माणिक्य
एक लाल रत्न, 'लाल', पद्मराग, चुन्नी।
संज्ञा
[सं. माणिक्य]

माणिक, माणिक्य
सर्वश्रेष्ठ, परम आदरणीय।
वि.

मातंग
हाथी।
संज्ञा
[सं.]

मातंग
चांडाल।
संज्ञा
[सं.]

मातंग
एक ऋषि जो पर्वत पर मौन रहा करते थे जिससे उसका नाम 'ऋष्यमूक' पड़ गया था।
संज्ञा
[सं.]

मातलिसूत
इंद्र।
संज्ञा
[सं.]

माता
जननी।
संज्ञा
[सं. मातृ]
माता पिता-बंधु-सुत तौ लगि जौ लगि जिहिं कौं काम-१-७६।

माता
पूज्या स्त्री।
संज्ञा
[सं. मातृ]

माता
लक्ष्मी।
संज्ञा
[सं. मातृ]

माता
शीतला, बेचक।
संज्ञा
[सं. मातृ]

माता
मतबाला, मदमस्त।
वि.
[सं. मत]

मातामह
नाना।
संज्ञा
[सं.]

माती
मतवाली, मद मस्त।
वि.
[हिं. माता= मत्त]
(क) वे यौवन मद की सब माती कहाँ मेरौ तनक कन्हाई-८६७। (ख) मुख मृदु बचन बिना सींचे अब जिबहिं प्रेम-रस-माती-2९८०।

मातु
माँ, जननी।
संज्ञा
[हिं. माता]
(क) जनम-कष्ट तैं मातु दुखित भई-१-२९१। (ख) ताके बीच बिघ्न करिबे को मातु-पिता पचि हारे.-३०३६।

मातुल
मामा।
संज्ञा
[स.]
मातुल को देखि हरि कहयो यो बिहँसि करि पंथ ते टारि गज को महाबत २५९५।

मातुल
धतूरा।
संज्ञा
[स.]
दुइ मृनाल मातुल उभै द्वै कदलीखंभ बिन पात-१६८२।

मातुला, मातुलानी, मातुलि, मातुली
मामी।
संज्ञा
[सं.]

मातूल
मामा।
संज्ञा
[सं. मातुल]

मातूल
धतूरा।
संज्ञा
[सं. मातुल]
कमलपत्र मातूल चढ़ावै। नयन मूँदि यह ध्यान लगावै।

मातृ
माता, जननी।
संज्ञा
[सं.]

मातृक
माता-संबंधी, माता का।
वि.
[सं.]

मातृत्व
माता होने का भाव।
संज्ञा
[सं.]

मातृभाषा
भाषा जो बालक अपनी माता से सीखता है।
संज्ञा
[सं.]

माते
मतवाले।
वि.
[हिं. माता= मतवाला]
हो हो हो हो लै लै बोलैं। गोरस कैरी माते डोलैं-2४३८।

मातो, मातौ
मतवाला, मदमस्त।
वि.
[हिं. माता= मतवाला]
मेरे जानि गह्यो चाहत हौं फेरिकि मागल मातो-३१३२।

बाह्मन
ब्राह्मण।
संज्ञा
[सं. ब्राह्मण]

बायँ
बायाँ।
वि.
[सं. वाम]
बायँ देना - (१) बचा जाना। (२) ध्यान न देना। (३) चक्कर देना।

बायँ
चूका हुआ।
वि.
[सं. वाम]

बाय
हवा, वायु।
संज्ञा
[सं. वायु]

बाय
वायुविकार, बाई।
संज्ञा
[सं. वायु]

बाय
बावली, वापिका।
संज्ञा
[सं. वापी]

बायक
कहने-बाँचनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

बायन
भेंट, उपहार।
संज्ञा
[सं. वायन]

बायन
पेशगी, अगाऊ।
संज्ञा
[अ. बयाना]
बायन देना - छेड़-कुछेड़ करना, छेड़ना।

बायबिडंग
एक औषध।
संज्ञा
[सं. बिडंग]

माच
भर, सिर्फ, केवल।
अव्य.
[सं.]
जात बिलै ह्वै छिनक मात्र मैं उघरत नैन किवार-2-३१।

मात्रा
परिमाण।
संज्ञा
[सं.]

मात्रा
बारह खड़ी' में स्वर-सूचक रेखा जो व्यंजन में लगती है।
संज्ञा
[सं.]

मात्रा
निश्चित अंश।
संज्ञा
[सं.]

मात्रिक
मात्रा-संबंधी।
वि.
[सं.]

मात्रिक
जो मात्रा के अनुसार हो।
वि.
[सं.]

माथ, माथा
मस्तक, भाल।
संज्ञा
[सं. मस्तक, हिं. माथा]
माथा कूटना - सिर पीटकर शोक मनाना। माथा घिसना - (१) नम्रता दिखाना। (२) खुशामद करना। माथा खपाना (खाली करना) - बहुत सोचना - विचारना। माथा झुकाना (टेकना या नवाना) - (१) नम्रता या अधीनता दिखाना। (२) सविनय प्रणाम करना। माथा ठनकना - भावी दुख, दुर्घटना आदि को पहले से ही आशंका होना। माथा धुनना या पीटना सिर पीटकर शोक मनाना। माथ धरना - अनुकूल आचरण के लिए करना। माथ थरि - अनुकूल आचरण के लिए स्वीकार करके। उ. - तात बचन रघुनाथ माथ घरि जब बन गौनि कियो-९- ४६।

माथ, माथा
माथा-पच्च, या पिट्ट‍न-बहुत बकना या समझाना।
यौ.

माथ, माथा
किसी चीज का अगला या ऊपरी भाग।
संज्ञा
[सं. मस्तक, हिं. माथा]

माथे, माथै
सिर या मस्तक।
क्रि. वि.
[हिं. माथा]
(क) माथे मोर मुकुट-2९५१। (ख) ते अब कहत जटा माथे पर बदलो नाम कन्हाई-३१०६।
माथे चढ़ाना या धरना - सादर स्वीकार करना। माथे धरौ - सादर-सविनय स्वीकार करो। उ. - मम आयसु तुम माथे धरौ। छल बल तजि मम कारज करौ। माथे टीका होना - अधिकता था विशेषता होना। माथे पड़ना - भार या दायित्व आ जाना। माथे पर चढ़ना - दुलार के कारण धृष्ट हो जाना। माथे पर बल पड़ना - भुख पर असंतोष या अप्रसन्नता के चिह्न दिखायी देना। माथे भाग होना - भाग्यवान होना। जाके माथे भागु - जो भाग्यवान है। उ. - ऊधौ जाके माथे भागु-३०९५। माथे मढ़ना - जबरदस्ती देना। माथे मानना - सादर स्वीकार करना। माथे मानि - सादर स्वीकार करके। माथे मानी - शिरोधायँ की। उ. - सूरदास प्रभु के जिय भावै आयसु माथे मान-३२५०। माथे मारना-उपेक्षा या तिरस्कार के साथ कुछ देना। (२) भरोसे, सहारे।

माथो, माथौ
सिर, मस्तक।
संज्ञा
[हिं. माथा]
सूर वाट जो माथो दीजै चलत आपनी गोहीं-३०५६।
माथौ नायौ - (२) सविनय प्रणाम किया। उ. - जामवंत अंगद हनू उठि माथो नायौ-९- ७२। (२) सर झुकाकर अर्थात् सविनय स्वीकार किया। उ. - तबै साप रिषि सौं नृप पायौ। तब रिषि चरननि माथौ नायौ-६- ७।

माद
गर्व।
संज्ञा
[स. मद]

माद
नशा।
संज्ञा
[स. मद]

मादक
जिससे नशा हो, नशीला।
वि.
[सं.]

मादकता
नशीलापन।
संज्ञा
[सं.]

मादन
मादक।
वि.
[सं.]

मादन
मस्त करनेवाला।
वि.
[सं.]

मादन
कामदेव के पाँच वाणों में एक।
संज्ञा

मादर, मादरिया
माता।
संज्ञा
[फ़ा. मादर]

मादा, मादिन, मादिनि, मादी, मादीन
स्त्री वर्ग का प्राणी।
संज्ञा
[फा. मादा]

माधुरई, साधुरई
मिठास।
संज्ञा
[सं. माधुरी]

माधुरता
मिठास।
संज्ञा
[सं.मधुरता]

माधुरि, मधुरिया, माधुरी
मिठास।
संज्ञा
[सं. माधुरी]

माधुरि, मधुरिया, माधुरी
शोभा, सुंवरता।
संज्ञा
[सं. माधुरी]
(क) सूर निरखि यह रूप माधुरी नारिकात मन डौ-2५९७। (ख) अग अंग प्रति अमित माधुरी-६६३।

माधुरि, मधुरिया, माधुरी
मदिरा, मछ।
संज्ञा
[सं. माधुरी]

माधुये
मधुरता।
संज्ञा
[सं.]

माधुये
सुंदरता।
संज्ञा
[सं.]

माधुये
मिठास।
संज्ञा
[सं.]

माधुये
काव्य का एक गुण जिसमें मधुर वर्णो की योजना रहती है।
संज्ञा
[सं.]

माधैया, माधो, माधोया, माधौ
श्रीकृष्ण।
संज्ञा
[सं. माधव]
(क) हरि हित मेरो मा्घैया। देहरी चढ़त परत गिरि कर पल्लव जो गहत है री मैया। (ख) माधौ जू, मन मायाबस कीन्हौ-१-४६। (ग) दुसह सँदेस सुनत माधो को गोपी-जन बिलखानी-2९८८। (घ) बरु माघौ मधुबन ही रहते कत जसुदा के आए-३०१९।

माद्‍दा
मूल तत्व।
संज्ञा
[अं.]

माद्‍दा
योग्यता, क्षमता।
संज्ञा
[अं.]

माद्‍दा
मवाद, पोक।
संज्ञा
[अं.]

माद्रि, माद्री
राजा पांडु की पत्नी जो नकुल और सहदेव की माता थी।
संज्ञा
[सं. माद्री]

माधव
विष्णु अथवा उनके रामकृष्ण अवतार।
संज्ञा
[सं.]
तुम मों से अपराधी माधव केतिक स्वर्ग पठाये हो-१-७३

माधव
वैशाख महीना।

माधव
वसंत ऋतु।

माधव
एक राग।

माधवी
एक सता।
संज्ञा
[सं.]

माधवी
एक रागिनी।
संज्ञा
[सं.]

माध्यम
साधन, उपाय।
संज्ञा
[सं.]

माध्व
वैष्णवों के बार मुख्य संप्रदायों में एक जिसके प्रवर्तक मध्वाचार्य थे।
संज्ञा
[सं.]

माध्वी
शराब, मदिरा।
संज्ञा
[सं.]

मान
किसी पदार्थ का भार, तौल आदि।
संज्ञा
[सं.]

मान
नापने-तौलने आदि का पैमाना।
संज्ञा
[सं.]

मान
गर्व, अहंकार।
संज्ञा
[सं.]
काको मान-परेखो कीजै बँधी प्रेम की डोरी-३१११।
मान मथना - गर्व चूर करना। मान मथि - गर्व चूर करके उ. - इन जरासंध मदअंध मम मान मथि बाँधि बिनु काज बल इहाँ आने।

मान
सम्मान, प्रतिष्ठा।
संज्ञा
[सं.]
भोजन करत माँगि घर उनकैं राज-मान मद टारत-१-१२।
मान रखना - सम्मान करना।

मान
रूठना, अप्रसन्न होना।
संज्ञा
[सं.]
हठ करि मान कियौ जब भामिनि तब गहि पाइ परे-६८९।
मान मनाना रूठे हुए को मनाना। मान मोरना - मान छोड़ देना, प्रसन्न हो जाना।

मान
सामर्थ्य, शक्ति।
संज्ञा
[सं.]

मान
विराम (संगीतशास्त्र)।
संज्ञा
[सं.]

मानना, माननो
अनुकूल होना, ठीक मार्ग पर आना।
क्रि. अ.
[सं.]

मानना, माननो
स्वीकार या अंगीकार करना।
क्रि. स.

मानना, माननो
आदर-सम्मान के योग्य समझना।
क्रि. स.

मानना, माननो
दक्ष या पारंगत समझना।
क्रि. स.

मानना, माननो
श्रद्धा या विश्वास करना।
क्रि. स.

मानना, माननो
मनौती करना।
क्रि. स.

मानना, माननो
ध्यान में लाना, समझना।
क्रि. स.

मानना, माननो
मानकर वैसा कार्य करना।
क्रि. स.

मानना, माननो
अनुक्त होना।
क्रि. स.

माननीय
मान्य, पूज्य, आदरणीय।
वि.
[सं.]

मानगृह
रूठकर बैठने का स्थान, कोपभवन।
संज्ञा
[सं.]
बैठी जाय एकांत भवन में जहाँ मानगृह चार।

मानचित्र
नक्‍शा, स्थान चित्र।
संज्ञा
[सं.]

मानत
समझता है।
क्रि. अ.
[हिं. मानना]
कोटि स्वर्ग सम सुखउ न मानत हरि समीप समता नहिं पावत-३१४२।
मन मानत - समझता है। उ. - क्यौं मन मानत है इन बातन-३०२५।

मानत
सम्मान या प्रतिष्ठा करता है।
क्रि. स.
मानत गिरि निदत्त सुरपति को-१०३९।

मानत
समझता या स्वीकार करता है।
क्रि. स.
(क) तिनका सौं अपने जन कौ गुन मानत मेरु समान १-८। (ख) सूरदास ए हटक न मानत लोचन हठी हमारे-३०३६। (ग) राजिव रवि को दोष न मानत ससि सौं सहज उदास-३२१९।

मानता
मनौती, मन्नत।
संज्ञा
[हिं. मन्नत]

मानति
समझती या स्वीकार करती है।
क्रि. अ.
[हिं. मानना]
जानति हौं तुम मानति नाही, तुमहूँ स्याम सँघाती-2९८१

मानना, माननो
स्वीकार या अंगीकार होना।
क्रि. अ.
[सं.]

मानना, माननो
मान लेना, कल्पना करना।
क्रि. अ.
[सं.]

मानना, माननो
ध्यान में लाना, समझना।
क्रि. अ.
[सं.]

मानवी, मानवीय
मानव-संबंधी।
वि.
[सं. मानवीय]

मानस
मन, हृदय।
संज्ञा
[सं.]

मानस
मानसरोवर।
संज्ञा
[सं.]

मानस
मनुष्य।
संज्ञा
[सं.]

मानस
दूत, चर।
संज्ञा
[सं.]

मानस
मन से उत्पन्न।
वि.

मानस
मन में सोचा हुआ।
वि.

मानस
मन या हृदय के द्वारा।
क्रि. वि.

मानसपूजा
पूजा के दो प्रकारों में एक, पूजा जो मन में ही की जाय।
संज्ञा
[सं.]

मानसर, मानसरोवर, मानससर,
हिमालय के उत्तरी भाग में स्थित एक झील।
संज्ञा
[सं. मानसरोवर]
मानसरोवर छाँड़ि हंस तट काग-सरोवर न्हावैं-2-१३।

मानमंदिर
कोपभवन।
संज्ञा
[सं.]

मानमंदिर
वेधशाला।
संज्ञा
[सं.]

मानमनौती
मानता, सनौती।
संज्ञा
[हिं. मान+मनौती]

मानमनौती
रूठने और-मनाने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. मान+मनौती]

मानमरोर
मन-मुटाव।
संज्ञा
[हिं. मान+मरोड़]

मानमोचन
रूठे हुए को मनाना।
संज्ञा
[सं.]

मानव
अनुष्य, मनुज।
संज्ञा
[सं.]

मानवता
मनुष्य होने की अवस्था भाव या गुण, मनुष्यता।
संज्ञा
[सं.]

मानवता
मनुष्य-जाति।
संज्ञा
[सं.]

मानवी
स्त्री, नारी।
संज्ञा
[सं.]

मानसिक
मन-संबंधी।
वि.
[सं.]

मानसी
पूजा जो मन ही मन में की जाय, मानसपूजा।
संज्ञा
[सं.]

मानसी
जो मन में ही की जाय।
वि.

मानसी
मन की।
वि.

मानसी गंगा
गोवर्धन पर्वत पर स्थित एक सरोवर।
संज्ञा
[सं.]

मानसी सेवा
सेवा जो मन ही मन में की जाय।
संज्ञा
[सं.]
मनसा और मानसी सेवा, दोउ अगाध करि जानौ-१-२११।

मानहानि
अपमान, अप्रतिष्ठा।
संज्ञा
[सं.]

मानहि
समझे।
क्रि. स.
[हिं. मानना]
नाम प्रकार कहा रुचि मानहि जो गोपाल उपासी-३१०९।

मानहिंगी
समझेंगी, स्वीकार करेंगी।
क्रि. स.
[हिं. मानना]
मानहिंगी उपकार रावरौ करौ कृपा बलबीर-७९२।

मानहुँ
मानों।
अव्य.
[हिं. मानों]
मानहुँ बहुरि बिचारि कछू मन सुफलकसुत आयौ ब्रज आज-2९६८।

बायब
वायव्य (कोण)।
संज्ञा
[सं. वायव्य]

बायबी
अज्ञात।
वि.
[सं. वायवीय]

बायबी
अज्ञात।
वि.
[सं. वायवीय]

बायस
काग, कौआ।
संज्ञा
[सं. वायस]

बायाँ
दाहिना' का उलटा।
वि.
[सं. वाम]
बायाँ देना - (१) बचा जाना। (२) छोड़ना, त्यागना। बायाँ पैर पूजना - बचने के लिए हार मान लेना।

बायाँ
जो सीधा न हो, उलटा।
वि.
[सं. वाम]

बायाँ
प्रतिकूल, विरुद्ध।
वि.
[सं. वाम]

बायु
पवन, हवा।
संज्ञा
[सं. वायु]

बायें
बायीं दिशा में।
क्रि. वि.
[हिं. बायाँ]

बायें
विपरीत, विरुद्ध।
क्रि. वि.
[हिं. बायाँ]
बायें होना - (१) रुष्ट होना। (२) विरुद्ध होना।

मानहु
समझो।
क्रि. स.
[हिं. मानना]
मैं कहौं सो सत्य मानहु-३११९।

मानहु
दक्ष या पारंगत समझना।
क्रि. स.
मुँह माँगे फल जो तुम पावहु तो तुम मानहु मोहिं-९१५।

मानहुगे
ध्यान में लाओगे।
क्रि. अ.
[हिं. मानना]
मेरे कहे बिलग मानहुगे कोटि कुटिल लै जोरै-३१७६।

माना
नापना, तौलना।
क्रि. स.
[हिं. मापना]

माना
जाँचना, परीक्षा करना।
क्रि. स.
[हिं. मापना]

माना
समाना, अमाना।
क्रि. अ.
[हिं. समाना]

माना
गर्व, अहंकार।
संज्ञा
[हिं. मान]

माना
गर्व, अहंकार।
संज्ञा
[हिं. मान]

माना
प्रतिष्ठा, सम्मान।
संज्ञा
[हिं. मान]

माना
समझ लिया। वाक्य-मान लिया कि।
क्रि. अ.
[हिं. मानना]

मानी
बड़ा, श्रेष्ठ, मानवाला।
वि.
[सं. मानिन्]
ऐसौ सूरदास जन हरि कौ सब अधमनि मैं मानी-१-१२९।

मानी
घड़ा, कुंभ।
संज्ञा
[सं.]

मानी
चक्की के ऊपरी पाट की लकड़ी जिसके छेद में कीली रहती है।
संज्ञा
[सं.]

मानी
छेद।
संज्ञा
[सं.]

मानी
स्वीकार या अंगीकार की।
क्रि. स.
[हिं. मानना]
मानी हार बिमुख दुरजोधन जाके जोधा हे सौ भाई-१-२४। (ख) सूर स्याम को बेगि मिलावहु हारि आपनी मानी-१६६६।

मानी
अनुकूल आचरण के लिए स्वीकार की।
क्रि. स.
[हिं. मानना]
(क) अब तो यह बात मन मानी-१.८७१ (ख) स्याम कही सोई सब मानी। पूजा की विधि हम अब जानी-१०२७।
आयसु माथे मानो - आज्ञा शिरोधार्य की। उ. - सूरदास प्रभु के जिय भावै आयसु माथे मानी-३२४९।

मानी
स्वीकार या ग्रहण कर ली।
क्रि. स.
[हिं. मानना]
स्याम कहत, पूजा गिरि मानी-९३३।

मानी
नायक जो नायिका से अपमानित होकर खीझ गया हो।
संज्ञा
[सं. मान]

मानी
अर्थ।
संज्ञा
[अ.]

मानी
तत्व।
संज्ञा
[अ.]

मानापमान
आदर और अनादर।
संज्ञा
[सं. मान + अपमान]
मानापमान परम परितोषन सुस्थल थिति मन राख्यौ-३०१४।

मानि
समझकर।
क्रि . स.
[हिं. मानना]
सो सुहृद मानि ईस्वर अंतर जानि-१-७७।

मानि
स्वीकार करके।
क्रि . स.
[हिं. मानना]
अपनो चूक मानि उर अंतर अब लागी दुख पावन-३१९६।

मानि
मानि लई-स्वीकार कर ली।
प्र.
(क) बहुत भाव करि भोजन अर्प्यौ, इह सब मानि लई मैं तेरी-९३५। (ख) सेवा मानि लई हरि तेरी-१४५७।

मानिक
पद्मराग, माणिक्य।
संज्ञा
[सं. माणिक्य]
मनि मानिक पाटंबर अंबर लेत न बनत विभूत-१०-३६।

मानिनि, मानिनी
गर्व या अभिमान से युक्त।
वि.
[सं. मानिनी]

मानिनि, मानिनी
रुठनेवाली।
वि.
[सं. मानिनी]

मानिनि मानिनी
यह नायिका जो नायक के अपराध पर रूठ जाय।
संज्ञा
मधुबन की मानिनी मनोहर तहीं जाहु जहाँ भाए हो-2९८६।

मानिये, मानियै
ध्यान दीजिए।
क्रि. स.
[हिं. मानना]
लोकलाज, कुलकानि मनियै उरियै बंधु पिता महतार-१२२९।

मानी
घमंडी, अहंकारी।
वि.
[सं. मानिन्]

माने
अर्थ, तात्‌र्य।
संज्ञा
[अ. मानी]

मानैं
दक्ष या पारंगत समझती हैं।
क्रि. स.
[हिं. मानना]

मानैं
आदर का पात्र समझती हैं।
क्रि. स.
[हिं. मानना]
एक ही संग भई सबै जोबन नई, अब होहु गुरू हम तुमहिं मानै-१२६८।

मान
समझता या ध्यान में लाता है।
क्रि. स.
[हिं. मानना]
(क) कोटिक करै एक नहिं मानै सूर महा कृतधन कौं-१-९। (ख) सीत-उष्न सुख-दुख नहिं मानै-2 ११।
मनमानै - मान समझ सकता या धैर्य रख सकता है। उ. - मधुकर, कहि कैसे मन मानै-३१३६। रुचि मानै - आनंद या स्वाद ले सकता है, पसंद कर सकता है। उ. - खाटी मही कहा रुचि मानै सूर खवैया घी कौ-३२५१।

मान
दक्ष या पारंगत समझता है।
क्रि. स.
[हिं. मानना]

मान
आदर या सम्मान का पात्र समझता है।
क्रि. स.
[हिं. मानना]
(क) और न काहू को वह मानै कछु सकुचत बल भैया-८६२। (ख)-सूरदास इह सब कोउ जानै, जो जाकौ सो ताकौ मानै-१०४२।

मान
विश्वास करता है।
क्रि. स.
[हिं. मानना]

मानो, मानों, मानौं
जैसे।
अव्य.
[हिं. मानना]
(क) मानौं मृगी बन जरति व्याकुल तुरत बरष्यो नीर-2९५५। (ख) मानों भरे दोउ एकहिं साँचे-३०५१। (ग) मध्य द्रुम है फूल मानो कवच कंचन चीर-३१८०।

मानो, मानों, मानौं
मानता या मानती हूँ।
क्रि. स.
[हिं. मानना]
या पै नेकु बिलग जिनि मानौं अँखिया नाहिंन हाथ-३२५८।

मानौंगी
समझूँगी, ध्यान दूँगी, परवाह करूँगी।
क्रि. स.
[हिं. मानना]
अब तो इहै वसी री माई नहिं मानौंगी त्राय-१२०४।

मानी
हेतु।
संज्ञा
[अ.]

मानु
रूठना।
संज्ञा
[सं. मान]
सूर स्याम सों मानु करै किन काहे बृथा मरै री-१६५७।

मानुख, मानुष, मानुस
मनुष्य।
संज्ञा
[सं. मानुष]
मानुष जनम पोत नकली ज्यौं मानत भजन-बिना निस्तार १-४१।

मानुख, मानुष, मानुस
मनुष्य का, मनुष्य संबंधी।
वि.

मानुखी, मानुषी, मानुसी
स्त्री, नारी।
संज्ञा
[सं. मानुषी]

मानुखी, मानुषी, मानुसी
मनुष्य का, मनुष्य-संबंधी।
वि.
[सं. मानुषीय]
आपुनौ कल्यान करि मानुषी तन पाइ-१-३१५।

माने
समझे।
क्रि. स.
[हिं. मानना]

माने
श्रद्धापूर्वक स्वीकार किये।
क्रि. स.
[हिं. मानना]

माने
दक्ष, कुशल या पारंगत समझे।
क्रि. स.
[हिं. मानना]

माने
रैहौ माने-श्रद्धा-सम्मान का पात्र समझे या मानते रहना।
प्र.
(क) खड़ो देव गिरिराज गोबर्धन इनै रहौ तुम माने-९३३। (ख) कान्ह तुम्हारो मोकी जानै। इनको रैहो तुम सब माने-१०३३।

मानौ
जैसे
अव्य.
[हिं. मानौ]
मानौ बग बगदाई प्रथम दिसि आठ-सात-दस नाखै-१-६०।

मानौ
श्रद्धापूर्वक विश्वास करो।
क्रि. स.
[हिं. मानना]
जो चाहौ ब्रज को कुसलाई तौ गोवर्धन मानौ-९१५।

मान्य
मानने या स्वीकारने योग्य।
वि.
[सं.]

मान्य
आदर-सम्मान के योग्य, पूज्य।
वि.
[सं.]
तुमरे मान्य बसुदेव-देवकी जीव दान इहि दीजै १०-४।

मान्य
प्रार्थनीय।
वि.
[सं.]

मान्यता
मान्य होने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[सं.]

मान्यता
अस्तित्व या अधिकार की स्वीकृति।
संज्ञा
[सं.]

मान्यो, मान्यौ
समझा,स्वीकार किया।
क्रि. स.
[हिं. मानना]
तुमरो दरसन पाइ आपनो जन्म सुफल करि मान्यो-2९७१।

मान्यो, मान्यौ
संबंध-विशेष को दृष्टि से देखा।
क्रि. स.
[हिं. मानना]
आगै मैं तुमको सुत मान्यौ।

मान्यो, मान्यौ
तदनुकूल आचरण के लिए शिरोधार्य किया।
क्रि. स.
[हिं. मानना]
(क) पाप-उजीर कह्यौ सोइ मान्यौ धर्म सुधन लुटयौ-१-६४ ! (ख) अपजस अति नकीब कहि टेरयौ सब सिर आयसु मान्यौ-१-१४१।
मन मान्यौ - प्रेम हुआ है। उ. - नंदलाल सो मेरो मन मान्यौ कहा करैगो कोई री-१२०३।

मामता
मोह, अपनापन।
संज्ञा
[सं. ममता]

मामलत, मामलति
व्यवहार की बात।
संज्ञा
[अ. मुआमिलत]

मामलत, मामलति
विवाद का विषय।
संज्ञा
[अ. मुआमिलत]

मामला
काम-धंधा।
संज्ञा
[अ, मुआमिला]

मामला
व्यवहार।
संज्ञा
[अ, मुआमिला]

मामला
विवाद का विषय।
संज्ञा
[अ, मुआमिला]

मामा
माता का भाई।
संज्ञा
[अनु.]

मामा
माता।
संज्ञा
[फ़ी.]

मामा
दासी।
संज्ञा
[फ़ी.]

मामी
दोष या आरोप पर ध्यान न देने का भाव।
संज्ञा
[सं. मा (विषेध)]
मामी पीना - दोष या आरोप पर ध्यान नहीं देती है। मामी पीवत या पीवै - दोष या आरोप पर ध्यान नहीं देता या देती है। उ. - (क) अहो जसादा महरि पूत की मामी पीवै-१०६२। (ख) सूर इते पर खुनसनि मरियत ऊबौ पीवन मामी-३०७९।

मापत
नापते (ही या समय)।
क्रि. स.
[हिं. मापना]
जै जैकार भयौ भुव मापत तीनि पैड़ भइ सारी-८-१४।

मापना, मापनो
नाप लेना।
क्रि. स.
[सं. मापन]

मापना, मापनो
मतवाला होना।
क्रि. अ.
[सं. मत्त]

माफ
जो क्षमा कर दिया गया हो।
वि.
[अ. माफ़]
माफ करना - क्षमा करना। माफ कीजै - क्षमा कीजिए। उ. - सूरदास की बीनती दस्तक कीजै माफ-१-१४३।

माफिक
अनुकूल।
वि.
[अ. मुआफिक]

माफिक
योग्य।
वि.
[अ. मुआफिक]

माफी
क्षमा।
संज्ञा
[अ. मफ़ी]

माफी
भूमि जो कर-रहित दी गयी हो।
संज्ञा
[अ. मफ़ी]

माम
अहंकार।
संज्ञा
[सं. माम्]

माम
शक्ति।
संज्ञा
[सं. माम्]

मामूली
नियमित।
वि.
[अ.]

मामूली
साधारण।
वि.
[अ.]

माय
माँ, माता।
संज्ञा
[सं. मातृ]
जसुमति माय लाल अपने को सुभदिन डाल डुलायो।

माय
किसी बूढ़ी या पूजनीया स्त्री के लिए आदर सूचक संबोधन।
संज्ञा
[सं. मातृ]

माय
माया।
संज्ञा
[सं. माया]

माय
में, माहिं।
अव्य.
[सं. मध्य]
बरुन कुबेर अग्नि जम मारुत स्व बस किये छिन माय।

माय
समाता है।
क्रि. अ.
[हिं. समाना]
सो सुख दुहूँ के उर न माय-2३२८।

मायक
माया रचनेवाला, मायावी।
संज्ञा
[सं.]

मायका
नैहर, पीहर।
संज्ञा
[सं. मातृ+का]

मायन
वह दिनजब विवाह आदि में मातृ-पूजन और पितृ-निमंत्रण होता है।
संज्ञा
[सं. भातृका+आनयन]

मायन
उस दिन का पूजन तथा कार्य।
संज्ञा
[सं. भातृका+आनयन]

मायनी
ठगिनी, कपटिन।
वि.
[सं. मायाविनी]

मायल
प्रवृत्त।
वि.
[फ़.]

मायल
मिश्रित।
वि.
[फ़.]

माया
धन-संपत्ति।
संज्ञा
[सं.]

माया
अज्ञानता,अविद्या।
संज्ञा
[सं.]
(क) हरि, तुव माया को न बिगायौ.-१-४३। (ख) तुम्हारी माया महाप्रबल जिहिं सब जग बस कीन्हो हो-१-४४।

माया
छल-कपट।
संज्ञा
[सं.]
धरि कै कपट भेष भिक्षुक को दसकंधर तहँ आयौ। हरि लीन्हों छिन में माया करि अपने रथ बैठायौ।

माया
सृष्टि की उत्पत्ति का कारण, प्रकृति।
संज्ञा
[सं.]
माया माहिं नित्य लै पावै। माया हरि पद माहिं समावैं।

माया
ईश्वर की शक्ति।
संज्ञा
[सं.]
रावन सौं नृप जात न जान्यो माया बियम सीस पर नाची-१-१८।

माया
जादू, इंद्रजाल।
संज्ञा
[सं.]

बार
किनारा, छोर।
संज्ञा
[हिं. बाड़]

बार
धार, बाढ़।
संज्ञा
[हिं. बाड़]

बार
केश, बाल।
संज्ञा
[हिं. बाल]
(क) उर बघनहाँ, कंठ कठुला, झँडूले बार-१०-१५१ (ख) बड़े बार सीमंत सीस के प्रेम सहित निरुवारति-७०४। ( ग ) सोहत घूँघरवारे बार - पृ. ३१५ (५०)।
बार खसना - बाल बाँका होना, कष्ट मिलना, अनिष्ट होना। जिनि बार खसै या बार खसो मत - जरा भी कष्ट या अनिष्ट न हो। उ. - (क) सूर असीस जाइ दैहौं जिनि न्हातहु बार खसै-2७०२। (ख) हम दिन देति असीस प्रात उठि बार खसो मत न्हातै-३०२४।

बार
भार, बोझ।
संज्ञा
[फा.]
जेहि जल तृन पशु बार बूड़ि अपने सँग बोरत। तेहि जल गाजत महाबीर सब तरत अंग नहि डोलत।

बार
बालक, वत्स।
संज्ञा
[हिं. बाल]
मुख चूमति जसुमति कहि बार-४९७।

बार
जो छोटा हो।
वि.

बार
जिसका उदय हाल ही में हुआ हो।
वि.

बार
युवती, बाला।
संज्ञा
[सं. बाला]

बारक
एक बार।
क्रि. वि.
[हिं. बार+एक]
(क) मृग-स्वरूप मारीच धर्यौ तब, फेरि चल्यौ बारक जो दिखाई-९- ५९। (ख) बारक जाइबो मिलि माधो-2७५८।

बारगह, बारगाह
डेवढ़ी।
संज्ञा
[फा. वारगाह]

माया
देव-लीला।
संज्ञा
[सं.]

माया
माँ, जननी।
संज्ञा
[हिं. माता]

माया
मोह-ममता, आत्मीयता का भाव।
संज्ञा
[हिं. ममता]
गोकुल रहौ जाहु जनि मथुरा झूठो माया मोह-३०६८।

मायापति
ईश्वर।
संज्ञा
[सं.]

मायावाद
दृश्य जगत को असत्य और अनित्य मानने का सिद्धांत।
संज्ञा
[सं.]

मायावादी
मायावाद' में विश्वास रखने वाला।
संज्ञा
[सं. मायावादिन्]

मायाविनि, मायाविनी
ठगिनी।
वि.
[सं]

मायावी
कपटी, छलिया।
संज्ञा
[सं. मायाविन्]

मायिक
बनावटी।
वि.
[सं.]

मायिक
मायावी।
वि.
[सं.]

मायूस
निराश, खिन्न।
वि.
[फा.]

मायूसी
निराशा, खिन्नता।
संज्ञा
[फा.]

मार
कामदेव।
संज्ञा
[सं.]
प्रबल-संत्र आहै-यह मार। यातै संतौ चलौ सँभार-१.२२९।

मार
मारने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. मारना]
नर-बपु धारि नाहिं जन हरि कौं जम की मार सो खैहै.-१-८६।

मार
चोट।

मार
मार-पीट।

मार
युद्ध।

मार
बहुत, अत्यंत।
अव्य.
सुनन द्वारावती मार उत्सव भयौ।

मार
माला, समूह।
संज्ञा
[हिं. माला]
दहिनावर्त देत मनो ध्रुव को मिलि नक्षत्र की मार-2०६२।

मारक
मार डालने वाला, संहारक।
वि.
[सं.]

मारना, मारनो
ठोंकना।
क्रि. स.
[सं. मारण]

मारना, मारनो
सताना, दुख देना।
क्रि. स.
[सं. मारण]

मारना, मारनो
पछाड़ना, हराना।
क्रि. स.
[सं. मारण]

मारना, मारनो
बंद करना।
क्रि. स.
[सं. मारण]

मारना, मारनो
शस्त्र फेकना।
क्रि. स.
[सं. मारण]

मारना, मारनो
आवेग या मनोविकार को रोकना।
क्रि. स.
[सं. मारण]

मारना, मारनो
शिकार करना।
क्रि. स.
[सं. मारण]

मारना, मारनो
किसी वस्तु को यों फेकना कि वह दूसरो से टकरा जाय।
क्रि. स.
[सं. मारण]
दे मारना - (१) पटकना। (२) पछाड़ना।

मारना, मारनो
छिपा लेना, गुप्त रखना।
क्रि. स.
[सं. मारण]

मारना, मारनो
संचालित करना।
क्रि. स.
[सं. मारण]
गाल मारना - बढ़-बढ़कर बातें करना। कुछ पढ़कर मारना - मंत्र पढ़कर कोई चीज किसी लक्ष्य पर फेंकना। जादू मारना - मंत्र-तंत्र करना। डींग मारना - बड़ी-बड़ी बातें करना, शेखी बघारना। मंत्र मारना - जादू करना।

मारक
प्रभाव नष्ट करनेवाला।
वि.
[सं.]

मारग
राह, रास्ता।
संज्ञा
[सं. मार्ग]
(क) कुसुमित धर्म-कर्म कौ मारग जउ कोउ करत बनाई-१-९३। (ख) एक कहत मारग नहिं पावति-१०५१।

मारग
कर्म, प्रकार।
संज्ञा
[सं. मार्ग]
पाप मारग जिते सबै कीन्हें तिते बच्यौ नहिं कोउ जहँ सुरति मेर-१-११०।
पारग मारना - राह में किसी को लूट लेना। मारग लगना - चला जाना।

मारगन
तीर, बाण।
संज्ञा
[सं. मार्गण]

मारण
मार डालना।
संज्ञा
[सं.]

मारण
एक तांत्रिक प्रयोग जो इस विश्वास से किया जाता है कि लक्षित व्यक्ति मर जायेगा।
संज्ञा
[सं.]

मारत
मारता है।
क्रि. अ.
[हिं. मारना]
औरन को सरबसु तै मारत आपुन भए अभंगी-2९९७।

मारन
मारने की क्रिया या भाव, मारने के लिए।
संज्ञा
[हिं. मारना]
(क) सिव-बिरंचि मारन कौं धाए यह गति काहू देव न पाई-१.३। (ख) भव भय हरन असुर मारन हित काल मधुपुरी आयो-2९९९।

मारना, मारनो
प्राण लेना, बध करना।
क्रि. स.
[सं. मारण]

मारना, मारनो
पीटना, आघात करना।
क्रि. स.
[सं. मारण]

मारना, मारनो
धातु आदि को जलाकर उसकी भस्म तैयार करना।
क्रि. स.
[सं. मारण]

मारना, मारनो
अनुचित रूप से हथिया लेना।
क्रि. स.
[सं. मारण]

मारना, मारनो
करना, लगाना।
क्रि. स.
[सं. मारण]

मारना, मारनो
खेल आदि में जीतना।
क्रि. स.
[सं. मारण]

मारना, मारनो
प्रभाव कम करना।
क्रि. स.
[सं. मारण]

मारना, मारनो
निर्जीव-सा कर देना।
क्रि. स.
[सं. मारण]

मारना, मारनो
काटना, डसना।
क्रि. स.
[सं. मारण]

मारना, मारनो
लगाना।
क्रि. स.
[सं. मारण]

मारपेच
धूर्तता।
संज्ञा
[हिं. मारना+पेच]

मारफत
द्वारा, जरिए से।
अव्य.
[अ. मार्फत]

मारिष
नाटक का सूत्रधार।
संज्ञा
[सं.]

मारिष
नाटक में किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति के लिए सम्मान सूचक संबोधन।
संज्ञा
[सं.]

मारी
भयानक संक्रामक रोग।
संज्ञा
[हिं मारना]

मारी
वध किया।
क्रि. स.
जिन पय पियत पूतना मारी-३२५०।

मारी
हत्या करनेवाला, घातक।
संज्ञा
[सं. मारिन्]

मारीच
एक राक्षस जिसने सोने का मृग बनकर राम और सीता को धोखा दिया था।
संज्ञा
[सं.]
मृग-स्वरूप मारीच धरयौ तब फेरि चल्यो बारक जो दिखाई-९-५९।

मारु
कामदेव।
संज्ञा
[सं. मार]

मारुत
वायु, पवन।
संज्ञा
[सं.]
(क) अब तौ है मारुत को गहिबा का सम मूठ लैहै ३०६५। (ख) दो मदन मारुत मिलि दसौ दिसि दुहाई-६५०।

मारुततनय, मारुतनंदन, मारुसुत, मारु सुवन
हनुमान।
संज्ञा
[सं. मारुत+तन्य, नंदन, सुत, सृवन]
भरमित भयौ देखि मारुतसुत दियो महाबल ईस-९ ७५।

मारुततनय, मारुतनंदन, मारुसुत, मारु सुवन
भीम।
संज्ञा
[सं. मारुत+तन्य, नंदन, सुत, सृवन]

मारा
जो मार डाला गया हो।
वि.
[हिं. मारना]
मारा मारा फिरना - ध्यर्थ घूमना।

मारा
कामदेव
संज्ञा
[सं. मार = काम]

मारामार
बहुत शीघ्रता से।
क्रि. वि.
[हिं. मारना]

मारि
मारना।
संज्ञा
[सं.]

मारि
मरी (रोग)।
संज्ञा
[सं.]

मारि
मारकर, वध करके।
क्रि. स.
(क) कंस मारि राजा करै आपहु सिर नावै-१-४। (ख) कंस नृप को मारि, छोड़्यो आपनो पितु मातु-2९७४।

मारित
जो मार डाला गया हो।
वि.

मारिबे, मारिबै
मारे जाने की।
संज्ञा
[हिं. मारना]
महा माचल मारिबे की सकुच नाहिंन मोहिं-१-१०६।

मारिबोइ, मारिबोई, मारिबौइ, मारिबौई
मारा-पीटा ही।
संज्ञा
[हिं. मारना]
तब तू मारि बोई करति १-२६६९।

मारियो, मारियौ
दंड देने के लिए (तुम ) मारना-पीटना।
क्रि. स.
[हिं. मारना]
मेरी सौं तुम याहि मारियौ जबहीं पावौ घात-१०-३३०।

मारुति
हनुमान।
संज्ञा
[सं.]

मारुति
भीम।
संज्ञा
[सं.]

मारू
एक राग जो युद्ध के समय गाया जाता है।
संज्ञा
[हिं. मारना]
दादुर मोर चानक पिक के जन सब मिलि मारू गायो-2८४०।

मारू
बहुत बड़ा नगाड़ा या धौंसा।
संज्ञा
[हिं. मारना]

मारू
मरुदेश का निवासी।
संज्ञा
[सं. मारु]

मारू
मारनेवाला।
वि.
[हिं. मारना]

मारू
बेधनेवाला, कटीला।
वि.
[हिं. मारना]

मारे
कारण से।
अव्य.
[हिं. मारता]

मारे
मारता है।
क्रि. स.

मारे
डारत मारे-मारे या बध किये डालता है।
प्र.
प्रेम-प्रीति की ब्यथा तप्त तनु सो मोहिं डारत मारे-३२५४।

मार्गी
मार्ग पर चलनेवाला।
वि.
[सं. मार्गित्]

मार्जन
स्वच्छ करना।
संज्ञा
[सं.]

मार्जन
सफाई, स्वच्छता।
संज्ञा
[सं.]

मार्जना, माजनो
स्वच्छ करना।
क्रि. स.
[सं मर्जत]

मार्जार
नर बिल्ली, बिलार।
संज्ञा
[सं.]

मार्जारी
बिल्ली।
संज्ञा
[सं.]

मार्जारी
कस्तूरी।
संज्ञा
[सं.]

मार्जित
स्वच्छ किया हुआ, शोधित।
वि.
[सं.]

मार्तंड
सूर्य।
संज्ञा
[सं.]

मार्तंड
ओक वृक्ष।
संज्ञा
[सं.]

मारेहु
मारे-पीटे जाने पर भी।
क्रि. स.
[हिं. मारना]
सूर स्याम को सिखवत हारा मारेहु लाज न आवत-८६५।

मारै
मारे या वधे जाने पर भी।
क्रि. स.
[हिं. मारना]
श्रीभगवान कृपा जिहिं करै। सूर सो मारै काके मरै-१-२८९।

मारौं
वध करुँ, प्राण हरूँ।
क्रि. स.
[हिं. मारना]
राखौं नहीं काहु, सब मारौं-१०४३।

मारौ
वध करो, प्राण हरो।
क्रि. स.
[हिं. मारना]
अस्वत्थामा न जब लगि मारौ, तब लगि अन्न न मुख मैं डारौ-१-२८८।

मारौ
करम कौ मारौ-अभागा, भाग्यहीन।
यौ.
तौ कहौ कहाँ जाइ करुनामय कृपिन करम कौ मारौ-१-१५७।

मार्कंड, मार्कंडेय
मृकंड ऋषि' के पुत्र जो तप बल से अमर माने जाते हैं।
संज्ञा
[सं. मार्कंडेय]
मार्कडेय की आयु - दीर्घायु।

मार्ग
रास्ता।
संज्ञा
[सं.]

मार्ग
अगहन मास।
संज्ञा
[सं.]

मार्गण, मार्गन
तीर, बाण।
संज्ञा
[सं. मार्गण]

मार्गशिर, मार्गशिरस्‌, मार्गशीर्ष
अगहन का महीना।
संज्ञा
[सं. मार्गशीर्ष]

बायौ
बाया, फैलाया, विस्तृत किया।
क्रि. स.
[हिं. बाना]
ब्यास-नारि तबहीं मुख बायौ। तब तनु तजि मुख माहिं समायौ-१-२२६।

बारंबार, बारंबारी
बार-बार, पुनः-पुनः।
क्रि. वि.
[सं. वारंबार, हिं. बारंबार]
सती सदा मम आज्ञाकारी। कहति जो या बिधि बारंबारी। दीखति है। कछु होवनहारी-४-५।

बार
काल, समय।
संज्ञा
[सं. वार]

बार
विलंब, देर।
संज्ञा
[सं. वार]
(क) घटै पल-पल, बढ़ै छिन-छिन, जात लागि न बार-१- ८८। (ख) आवौ बेगि न लावौ बार-४- ५। (ग) बान-बृष्टि सोनित करि सरिता, ब्याहत लगी न बार-९-१२४। (घ) भए भस्म कछु बार न लागी, ज्यौं ज्वाला पट-चीर-९१५८।

बार
दफा, मरतबा।
संज्ञा
[सं. वार]
अबकी बार मनुष्य-देह धरि कियौ न कछू, उपाइ-१-१५५।
बार-बार - फिर-फिर, पुनः-पुनः।

बार
द्वार, दरवाजा।
संज्ञा
[सं. वार]
बंदी-सूत अति करत कुतूहल बार-१०- २७।

बार
गृह बार - घर-द्वार, वासस्थान, गृहस्थी।
यौ.
मिथ्या तनु कौ मोह बिसार। जाहु रहौ भावै गृह-बार-३-१३।

बार
आश्रम, ठिकाना।
संज्ञा
[सं. वार]

बार
दरबार।
संज्ञा
[सं. वार]

बार
चारो ओर का घेरा।
संज्ञा
[हिं. बाड़]

मार्मिक
मर्मस्थान पर प्रभाव डालनेवाला।
वि.
[सं.]

मार्मिकता
मार्मिक होने का भाव।
संज्ञा
[सं.]

मार्मिकता
मर्म तक पहुँचने की योग्यता।
संज्ञा
[सं.]

मारथा, मारथौ
मारा, वध किया।
क्रि. स.
[हिं. मारना]
(क) धाइ चक्र लै ताहि उबारयौ, मारयौ ग्राह बिहंगा-१.२१। (ख ) को नृप भयो कंस किन मारयो-३०७९।

माल
कुश्ती लड़नेवाला, मल्ल।
संज्ञा
[सं. मल्ल]

माल
हार, माला।
संज्ञा
[सं. माला]
रुधिर पान करि आँत माल धरि जय जय सब्द पुकारी।

माल
पंक्ति, पाँती।
संज्ञा
[सं. माला]

माल
धन-संपत्ति।
संज्ञा
[अ.]
अल्प चोर बहु माल लुभात संगी सबन धराए।
"माल उड़ाना - (१) धन का अपव्यय करना। (२) किसी को धन-संपत्ति मार लेना। माल काटना (चोरना) - (१) किसी के धन से मौज करना। (२) किसी का धन हड़प लेना। माल मारना - दूसरे का धन दबा लेना।"

माल
सामान, सामग्री।
संज्ञा
[अ.]
तुम जानत मैं हूँ कछु जानत जा जा माल तुम्हारे-११०६।

माल
मालटाल या मालामात-माल असबाब।
यौ.

माल
बिक्री को वस्तु।
संज्ञा
[अ.]

माल
सुस्वादु भोजन।
संज्ञा
[अ.]
माल उड़ाना - सुस्वादु भोजन करना।

मालका
माला हार।
संज्ञा
[सं.]

मालकाश, मालकोस
एक राग।
संज्ञा
[सं. मानकोश]

मालगुजारी
कर, लगान।
संज्ञा
[फा.]

मालति, मालती
सफेद फूल की एक लता।
संज्ञा
[सं.]
(क) त्यागे फिरत। सकल कुसुमावलि मारति भौंर लए-2९-१। (ख) फूना माधवो मालती बेलि फूले ही मधुप करत हैं केलि-2४०७।

मालति, मालती
चाँदनी, चंद्रिका।
संज्ञा
[सं.]

मालदार
धनी, संपन्न।
वि.
[फ़ा.]

मालन
माली की स्त्री।
संज्ञा
[हिं. मालिन]

मालपुआ मालपूआ, मालपूवा
एक पकवान।
संज्ञा
[सं. पूव, हिं. मालपूआ]

मालव
मालवा देश।
संज्ञा
[स.]

मालव
एक राग।
संज्ञा
[स.]

मालव
मालव देश या जाति का।
वि.

मालवाई
एक राग।
संज्ञा
[सं. मालव]
मालवाई राग गौरी अरु आसावरि राग-2२७९।

माला
पंक्ति, पाँती।
संज्ञा
[सं.]

माला
हार,माला।
संज्ञा
[सं.]
(क) तव सुमिरन-छल दुर्भर के हित माला तिलक बनाई-१-२०७। (ख) केसरि को तिलक मोतिन की माला बृन्दावन को वासी-३०३०।
माला जपना (फेरना) - जप या भजन करना। जपति फिरी तेरे गुनन की माला - गुणों का स्मरण करती या उनको गातो फिरी। उ. - कुंज कुंज जपति फिरी तेरे गुनन की माला-१८१७।

माला
समूह झूंड।
संज्ञा
[सं.]

मालामाल
बहुत धनी और संपन्न।
वि.
[फ़.]

मालिक
ईश्वर।
संज्ञा
[अ.]

मालिक
स्वामी।
संज्ञा
[अ.]

मालिक
स्त्री का पति।
संज्ञा
[अ.]

मालिका
पंक्ति।
संज्ञा
[सं.]

मालिका
माला
संज्ञा
[सं.]
सूरदास कुसुमनि सुर बरसत कर संपुट करि मालिका-८०९।

मालिका
गले का एक आभूषण।
संज्ञा
[सं.]

मालिका
मालिन जाति की स्त्री।
संज्ञा
[सं.]

मालिन, मालिनि, मालिनी
‘माली' जाति की स्त्री।
संज्ञा
[हिं. माली]
लछिम-सी जँह मालिनि बोलै। बंदनमाल बाँधत डोलै-१०-३२।

मालिन्य
मलिनता, मैलापन।
संज्ञा
[सं.]

मालिश
मलने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[फ़.]

माली
बाग के पौधों की देख-रेख और सिंचाई करनेवाला।
संज्ञा
[सं. मालिन्‌‍, प्रा. मालिय]
की हौं मधुवन चार चहूँ दिसि माली जाइ पुकार्यो-९-१०३।

माली
फूल लगाने-बेचनेवाला।
संज्ञा
[सं. मालिन्‌‍, प्रा. मालिय]

मावली
दक्षिण की एक वीर जाति।
संज्ञा
[देश.]

मावस
अमावस।
संज्ञा
[हिं. अमावस]

मावा
माड़।
संज्ञा
[हिं. माँउ]

मावा
सार, सत्त।
संज्ञा
[हिं. माँउ]

मावा
चंदन का इत्र।
संज्ञा
[हिं. माँउ]

माशा
एक मान जो तोले का बारहवाँ भाग होता है।
संज्ञा
[सं. माष]

माशूक
प्रेमपात्र।
संज्ञा
[अ. माशूक]

माष
उड़द।
संज्ञा
[सं.]

माष
मसा।
संज्ञा
[सं.]

माष
क्रोध।
संज्ञा
[हिं. मास]

माली
जो माला पहने हो।
वि.

माली
धन-संबंधी, आर्थिक।
वि.
[फा. माल]

मालूम
जाना हुआ, ज्ञात।
वि.
[अ.]

मालूर
बेल का पेड़ या फल।
संज्ञा
[सं.]
(क) कमल-पत्र मालूर-पत्र फल नाना सुमन सुबास ७६६। (ख) कमल-पत्र मालूर चढ़ावै-७९९।

माल्य
फूल।
संज्ञा
[सं.]

माल्य
माला।
संज्ञा
[सं.]

माल्यवंत, माल्यवान
एक राक्षस जिसके भाई सुमाली की कन्या कैकसी रावण की माता थी।
संज्ञा
[स. माल्यवान]

माल्‍ह
माला।
संज्ञा
[सं. माला]

माल्‍ह
पंक्ति।
संज्ञा
[सं. माला]

मावत
महावत।
संज्ञा
[हिं. महावत]
दियौ पठाइ स्याम निज पुर को मावत सह गजराज।

माष
गर्व।
संज्ञा
[हिं. मास]

माषना, माषनो
अप्रसन्न होना।
क्रि. स.
[हिं. माखना]

माषि, माषी
मक्खी।
संज्ञा
[हिं. मक्खी]
राति ज्यों अक्रूर दिन अलि मदन दह मधु माषि- ३०४८।

मास
महीना।
संज्ञा
[सं.]
(क) महा कष्ट दस मास गर्भ बसि अधोमुख सीस रहाई-१.३१८। (ख) आठ मास चंदन पियो-१०-४०। (ग) चारि मास बर्षा के लीन्हे मुनिहु रहत इक ठौर-३०९०।

मास
माँस।
संज्ञा
[सं. माँस]

मासना, मासनो
मिलना।
क्रि. अ.
[हिं. मींसना]

मासना, मासनो
मिलाना, मिश्रित करना।
क्रि. स.

मासर
मौसी का पति।
संज्ञा
[हिं. मौसा]

मासिक
मास-संबंधी।
वि.
[सं.]

मासिक
मास में एक बार होने वाला।
वि.
[सं.]

मिंडना, मिंडनो
सटाया या चिपकाया जाना।
क्रि. अ.
[हिं. मोडना]

मिंडना, मिंडनो
साथ लगना या होना।
क्रि. अ.
[हिं. मोडना]

मिंडाई
मीजने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
संज्ञा
[हिं. मोड़ना]

मिंत
सखा, मित्र।
संज्ञा
[सं. मित्र]

मिचकना, मिचकनो
आँख खुलना और बंद होना।
क्रि. अ.
[हिं. मिचना]

मिचकना, मिचकनो
पलक झपकना।
क्रि. अ.
[हिं. मिचना]

मिचकाना, मिचकानो
आँख खोलना और बंद करना।
क्रि. स.
[हिं. मोचना]

मिचकाना, मिचकानो
पलक झपकाना।
क्रि. स.
[हिं. मोचना]

मिचकी
आँख मिचकाने की क्रिया।
संज्ञा
[हिं. मिचकना]

मिचकी
आँख का संकेत।
संज्ञा
[हिं. मिचकना]

माहिं
में भीतर
अव्य.
[सं. मध्य, प्रा. मज्झ]
(क) बरुन-पास ते ब्रजपतिहिं छन माहिं छुड़ावै -१-४। (ख) चरन सरोवर माहिं मीन मन रहत एक रस रीति-३२२९।

माहिं
अधिकरण कारकीय चिन्ह, में, पर।
अव्य.
[सं. मध्य, प्रा. मज्झ]
तब मन माहिं आनि बैराग-६-४।

माहिआँ
में, पर।
अव्य.
[हिं. माहिं]
और कौन स्याम त्रिभुवन मैं सकल गुन जेहि माहिआँ-१७०२।

माहिर
कुशल।
वि.
[अ.]

माहिर
जानकार।
वि.
[अ.]

माहिला
माँझी, केवट।
संज्ञा
[अ. मल्लाह]

माहिष्मती
दक्षिण भारत का एक प्राचीन नगर।
संज्ञा
[सं.]

माहीं
में, भीतर।
अव्य.
[हिं. माहिं]
बैस संधि सुख तजी सूर हरि गए मधुपुरो माहीं-३२४४।

माहुर
विष।
संज्ञा
[सं. मधुर, प्रा. महुर=विष]

मिंडना, मिंडनो
मोड़ा या मिलाया जाना।
क्रि. अ.
[हिं. मोडना]

मासी
माता की बहिन, मौसी।
संज्ञा
[सं. मातृष्वसा, पा. मातुच्छा, प्रा.माउच्छा]
कहा कहत मासी के आगैं जानत नानी-नानन।

माहँ
में, बीच, भीतर।
अव्य.
[सं. मध्य, प्रा. मज्झ]
(क) हित करि मिलै लेहु गोकुलपति अपने गोधन माहँ.-१५१। (ख) सूर उहै निज रूा स्याम को है मन माह समान्यौ-३१२७।

माह
माघ (मास)।
संज्ञा
[सं. माघ, प्रा. माह]

माह
मास, महीना।
संज्ञा
[फा.]

माहत
बड़ाई, महत्व।
संज्ञा
[सं. महत्व]

माहना, माहनौ
उमड़ना।
क्रि. अ.
[हिं. उमाहना]

माहली
अंत:पुर का सेवक।
संज्ञा
[हिं. महल]

माहवार
प्रतिमास।
क्रि. वि.
[फ़ा.]

माहवार
हर महीने का, मासिक।
वि

माहाँ
में, सध्य, भीतर।
अव्य.
[हिं. महँ]

बहलाव
चित्त का रुचिकर था मनोरंजक काम में लगाना।
संज्ञा
[हिं. बहलना]

बहली
रथ-जैसी बैलगाड़ी।
संज्ञा
[सं. वहन]

बहल्ला
आनंद, प्रमोद।
संज्ञा
[हिं. बहलना]

बहस
वाद, तर्क।
संज्ञा
[अ.]

बहस
विवाद, झगड़ा, तर्क-वितर्क।
संज्ञा
[अ.]

बहस
होड़, बाजी, स्पर्धा।
संज्ञा
[अ.]

बहसना
वाद-विवाद या तर्क-वितर्क करना।
क्रि. स.
[हि. बहस]

बहसना
होड़ या शर्त लगाना।
क्रि. स.
[हि. बहस]

बहाइ
(हवा) चलती है।
क्रि. अ.
[हिं. बहना]
मंद सुगंध बयार बहाइ-१० उ०-१४३।

बहाइ
बहाकर।
क्रि. स.
[हिं. बहाना]

बारन
वारने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. वारना]

बारना
रोकना, मना करना।
क्रि. अ.
[सं. वारण]

बारना
जलाना, बालना।
क्रि. स.
[हिं बालना]

बारनि
‘बारी' जाति की स्त्री जो शुभ अवसरों पर बंदनवार आदि बाँधती है, मालिन।
संज्ञा
[हिं. पुं. बारी]
अच्छत दूब लिये रिषि ठाढ़े, बारनि बंदनवार बँधाई-१०-१९।

बारबधू, बारबधूटी
वेश्या।
संज्ञा
[सं. वारवधू]
कहुँ नर्तत सब बारबधू और कहुँ गँधरब गुनगान-सारा. ६६८।

बारबारै
पुनः पुनः, फिर फिर।
क्रि. वि.
[हिं. बार]
कबहुँ बैठत बारबारै-१८७२।

बारमुखी
वेश्या।
संज्ञा
[सं. बारमुख्या]

बारह
दस और दो की संख्या।
संज्ञा
[सं . द्वादश, प्रा. वारस, अप. बारह]
बारह बाट करना (घालना) - तितर-बितर या छिन्न-भिन्न कर डालना। बारह बाट जाना (होना) - छिन्न-भिन्न या नष्ट-भ्रष्ट होना।

बारहखड़ी, बारहखरी
अ' से ‘अः' तक के स्वरों की मात्राओं से युक्त व्यंजन रूप।
संज्ञा
[सं. द्वादश +अक्षरी]

बारहखड़ी, बारहखरी
प्रारंभिक अक्षर-ज्ञान।
संज्ञा
[सं. द्वादश +अक्षरी]
सूर सकल षट दरसन वै हौं बारहखरी पढ़ाऊँ-३४६६।

मिटत
दूर होता है. नष्ट हो सकता है।
क्रि. अ.
[हिं. मिटना]
ये उतपात मिटत इनहीं पै-६००।

मिटन
मिटने की क्रिया।
संज्ञा
[हिं. मिटना]

मिटन
न मिटन पाई-चिन्ह बना रहा।
प्र.
झाईं न मिटन पाई-८-५।

मिटना, मिटनो
अंकित चिह्न का दूर हो जाना।
क्रि. अ.
[सं. मृष्ट, प्रा. मिट्ट]

मिटना, मिटनो
नष्ट हो जाना।
क्रि. अ.
[सं. मृष्ट, प्रा. मिट्ट]

मिटना, मिटनो
खराब हो जाना।
क्रि. अ.
[सं. मृष्ट, प्रा. मिट्ट]

मिटना, मिटनो
रद्‍द हो जाना।
क्रि. अ.
[सं. मृष्ट, प्रा. मिट्ट]

मिटाइ
कुप्रभाव आदि दूर करके।
क्रि. स.
[हिं. मिटाना]
आइ अजर निकसी नँदरानी बहुरी दोष मिटाइ-५४०।

मिटाइए
दूर कीजिए।
क्रि. स.
[हिं. मिटाना]
या ल क के उपहास आपुन ताहि बरजि मिटाइए-१० उ०-2४।

मिटाई
दूर की।
क्रि. स.
[हिं. मिटाना]

मिचना, मिचनो
आँख बंद होना।
क्रि. अ.
[हिं. मोंवना]
आँख मीचना - मर जाना।

मिचलाना, मिचलानो
कै, मतली या उबकाई आना।
क्रि. अ.
[हिं. मचलाना]

मिचलो
मतली।
संज्ञा
[हिं. मिचलाना]

मिचवाना, मिचवानो
आँख बंद करने या कराने को प्रवृत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. मिचाना]

मिचौनी, मिचौली
आँख मींचने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. मीचना]

मिचौनी, मिचौली
आँख मिचौनी-बालकों का एक खेल जिसमें एक की आँख मूँदी जाती है और बाकी लड़के इधर-उधर छिपते हैं।
यौ.

मिचौहाँ
मुँदने या बंद होनेवाला।
वि.
[हिं. मिचना]

मिजाज
स्वभाव।
संज्ञा
[अ. मिजाज]

मिजाज
तबियत।
संज्ञा
[अ. मिजाज]
मिजाज खराब होना (बिगड़ना) - (१) अप्रसन्नता होना। (२) चित्त स्वस्थ न होना। मिजाज खराब करना (बिगाड़ना) - अप्रसन्न करना। मिजाज में आना - समझ में आना। मिजाज ठीक (सीधा) होना - (१) दंड आदि मिलने पर सुधार जाना। (२) प्रसन्न होना।

मिजाज
घमंड, अभिमान।
संज्ञा
[अ. मिजाज]
मिज़ाज (में)आना (होना) - घमंड करना, नखरे दिखाना। मिजाज न मिलना - घमंड के मारे बात भी न करना।

मिटाई
डारौ मिटाई-दूर कर दो।
प्र.
कृपा करि रारि डारौ मिटाई-८-९।

मिटाऊँ
दूर कर दूँ, निकाल डालूँ।
क्रि. स.
[हिं. मिटाना]
अपने जिय की खुटक मिटाऊँ-2४५९।

मिटाऊँ
रद्द कर दूँ।
क्रि. स.
[हिं. मिटाना]
मुनिवर साप मिटाऊँ-३८२।

मिटाना, मिटानो
चिह्न आदि दूर करना।
क्रि. स.
[हिं. मिटना]

मिटाना, मिटानो
न रहने देना।
क्रि. स.
[हिं. मिटना]

मिटाना, मिटानो
चौपट करना।
क्रि. स.
[हिं. मिटना]

मिटाना, मिटानो
रदद करना।
क्रि. स.
[हिं. मिटना]

मिटायो, मिटायौ
रद्द किया, न माना।
क्रि, स.
[हिं. मिटाना]

मिटायो, मिटायौ
न जात मिटायौं-मानना या स्वीकारना पड़ता है।
प्र.
यह उपकार न जात मिटायौ-४-९।

मिटारो
नष्ट या दूर किया।
क्रि. स.
[हिं. मिटाना]
सूर सुभेंटि सुदामा हरि दुख दरिद्र मिटारो-१० उ०-७७।

मिटि
जाहि मिटि-दूर हो जाय।
प्र.
सूर हरि कौ सुजस गावौ जाहि मिटि भव-भार-१-२९४।

मिटिया
मटकी।
संज्ञा
[हिं. मिट्टि]

मिटिया
मिट्टी।
संज्ञा
[हिं. मिट्टि]

मिटियाना, मिटियानो
मिट्टी लगाकर साफ करना।
क्रि. स.
[हिं. मिट्टी+आना]

मिटी
दूर हो गयी।
क्रि. अ.
[हिं. मिटना]
नैननि की मिटी प्यास-८-५।

मिटी
रह न गयी।
क्रि. अ.
[हिं. मिटना]
मिटी सब लीला-३४३७।

मिटै
दूर या नष्ट हो।
क्रि. अ.
[हिं. मिटना]
और भजे तें काम सरै नहिं, मिटै न भव-जंजार-१-६८।

मिट्टी
भूमि।
संज्ञा
[सं. मृत्तिका, प्रा. मिट्टिआ]

मिट्टी
धूल।
संज्ञा
[सं. मृत्तिका, प्रा. मिट्टिआ]
मिट्टी करना - चौपट या बरवाद करना। मिट्टी के मोल - बहुत सस्ता। मिट्टी डालना - (१) छोड़ देना। (२) दोष को छिपाना। मिट्टी देना - कब्र में गाड़ना। मिटटी छ्‌ने (पकड़ने) से सोना होना - साधारण काम में भी बहुत लाभ होना। मिट्टी में मिलना - नष्ट होना। मिट्टी में मिलाना - नष्ट कर देना। मिट्टी होना - (१) मैला हो जाना। (२) नष्ट होना। (३) स्वाद या आनंद रहित होना।

मिट्टी
मिट्टी का पुतला (की सूरत)-मानव शरीर। मिट्टी के माधव-भोंदू। मिट्टी खराब होना-दुर्दशा होना।
यौ.

मिटावति
नष्ट या दूर करती है।
क्रि. स.
[हिं. मिटाना]
बालक को यह दोष मिटावति-१०१०।

मिटावन
मिटाने की क्रिया।
संज्ञा
[हिं. मिटाना]

मिटावन
मिटावन लायक-दूर करने में समर्थ।
यौ.
तुम बिन ऐसी कौन नंद-सुत यह दुख दुसह मिटावन लायक-९५४।

मिटावना, मिटावनो
चिह्न आदि दूर करना।
क्रि. स.
[हिं. मिटाना]

मिटावना, मिटावनो
न रहने देना।
क्रि. स.
[हिं. मिटाना]

मिटावना, मिटावनो
नष्ट करना।
क्रि. स.
[हिं. मिटाना]

मिटावना, मिटावनो
रद्ध करना।
क्रि. स.
[हिं. मिटाना]

मिटावहि
दूर करता है।
क्रि. स.
[हिं. मिटाना]
नाउँ मिटावहि - चिह्न आदि भी न रहने दे। उ. - इन्द्रहिं पेलि करी गिरि पूजा सलिल बरषि ब्रज नाउँ मिटावहि-९४७।

मिटावहु
दूर करो।
क्रि. स.
[हिं. मिटाना]
कहा करत ए बोलत नाहीं पिय, यह खेल मिटावहु-पृ. ३१२ (१३)।

मिटि
दूर होकर।
क्रि. अ.
[हिं. मिटना]

मिट्टी
मृत शरीर, शव।
संज्ञा
[सं. मृत्तिका, प्रा. मिट्टिआ]
मिट्टी ठिकाने लगना - शव की अंतिम क्रिया हो जाना। मिट्टी ठिकाने लगाना - शव की अंतिम क्रिया करना।

मिट्टी
शरीर की बनावट या गठन।
संज्ञा
[सं. मृत्तिका, प्रा. मिट्टिआ]
मिट्टी ढढ जाना - अधिक आयु या रोग के कारण शरीर की गठन या बनावट बिगड़ जाना।

मिट्ठा
जिसमें मिठास हो।
वि.
[हिं. मीठा]

मिट्‍ठी
बच्चे का चुंबन।
संज्ञा
[हिं. मीठा]

मिट्‍ठू
मीठा बोलनेवाला।
वि.
[हिं. मीठा]
अपने मुँह मियाँ - मिट्‍ठू बनना - अपनी बड़ाई स्वयं करना।

मिटयो, मिटयौ
नष्ट हो गया, दूर हो गया।
क्रि. अ.
[हिं. मिटना]
आनँद मिट्यो-३४-३७।

मिटयो, मिटयौ
मर गया।
क्रि. अ.
[हिं. मिटना]
कहा बापुरो कंस मिट्यो तब मन संस करत है जो को-2५५६।

मिठ
मीठा' का संक्षित रूप जो प्रायः किसी शब्द के पूर्व, यौगिक रूप बनाने को जुड़ता है।
वि.
[हिं. मीठा]

मिठबोला
मधुरभाषी।
वि.
[हिं. मीठा+बोलना]

मिठलोना
जिसमें नमक कम हो।
वि.
[हिं. मीठा= कम+लोन]

मिठाई
मिठास, माधुरी।
संज्ञा
[हिं. मीठा + आई]

मिठाई
खाने की मीठी चीज, वह जिसमें मीठा पड़ा हो।
संज्ञा
[हिं. मीठा + आई]
(क) खोवामय मधुर मिठाई-१०-१८३। (ख) मानहुँ मूक मिठाई के गुन कहि न सकत मुख, सीस डुलावत-६४८। (ग) दई कोटि कलस भरि बारुन बहुत मिठाई पान हो-2४४९।

मिठाना, मिठानो
मीठा होना।
क्रि. अ.
[हिं मीठा]

मिठास
मीठे होने का भाव, मीठापन।
संज्ञा
[हिं. मीठा+आस]

मिठास
मीठी चीज, मिठाई।
संज्ञा
[हिं. मीठा+आस]
बहिरौ तान स्वाद कहा जानै गूँगो खात मिठास

मिठौना
मीठा।
वि
[हिं. मीठा]

मिठौरि, मिठौरी
उड़द या चने की बरी या बड़ियाँ।
संज्ञा
[हिं. मीठा+बरी]

मितंग
हाथी।
संज्ञा
[सं. मितंगम्]

मित
जो सीमा में हो।
वि.
[सं.]

मित
थोड़ा।
वि.
[सं.]

मितभाषी
कम बोलनेवाला।
वि.
[सं. मितभाषिन्]

मितव्यय
कम खर्च करना।
संज्ञा
[सं.]

मितव्ययी
कम खर्चनेवाला।
वि.
[सं. मितव्ययिन्]

मिताई
मित्रता।
संज्ञा
[हिं. मीत+आई]
(क) हमसौं-तुमसौं बाल मिताई-१-२९८। (ख) हम अहीरि मतिहीन बावरी हरकतहू हठि करहिं मिताई-३११८। (ग) मुख देखे को कौन मिताई-३३१०।

मिति
सीमा, हद।
संज्ञा
[सं.]
(क) तुम गुन की जैसे मिति नाहिंन, हौं अध कोटि बिचरतौ-१-२०३। (ख) इत लोभी उत रूप परम निधि कोउ न रहत मिति मानि-१४३०।

मिति
परिमाण।
संज्ञा
[सं.]

मिति
काल की अवधि।
संज्ञा
[सं.]

मिती
तिथि, तारीख।
संज्ञा
[सं. मिति]

मिती
सीमा, हद।
संज्ञा
[सं. मिति]
रहत अवज्ञा होइ गुनाई चलत न दुखहिं मिती-१० उ.-१०३।

मिती
दिन, विवस।
संज्ञा
[सं. मिति]

मिती
समय को अवधि।
संज्ञा
[सं. मिति]

मित्र, मित्त, मित्तर
दोस्त, सखा।
सज्ञा
[सं. मित्र]

मित्र, मित्त, मित्तर
सूर्य।
सज्ञा
[सं. मित्र]

मित्रता
दोस्ती।
संज्ञा
[सं.]

मित्रता
मित्र का धर्म।
संज्ञा
[सं.]

मित्रपन
मित्रता।
संज्ञा
[सं. मित्र+हिं. पन]

मित्रबिंदा, मित्रविंदा
श्रीकृष्ण को एक पत्नी !
संज्ञा
[सं.]
हरहिं मित्रबिंदा चित ध्यायो.-१०- उ०-2८।

मित्राइ, मित्राई
मित्रता, मित्र का धर्म, मित्रता का निर्वाह।
संज्ञा
[सं. मित्र+हिं. आई]
(क) हमसौं तुमसौं बाल-मिताई। हमसौं कछु न भई मित्राई.-१-२८९। (ख) देखि माघौ की मित्राई-2७१८।

मिथि, मिथिल
राजा जनक का एक नाम।
संज्ञा
[सं.]
दीनो दान बहुत द्विजन कौं राजा मिथिल-नरेस-सारा. २३४।

मिथिला
वर्तमान तिरहुत जहाँ प्राचीन काल में राजा जनक का राज्य था।
संज्ञा
[सं.]

मिथुन
स्त्री-पुरुष का युग्म।
संज्ञा
[सं.]

मिथुन
संयोग, समागम।
संज्ञा
[सं.]

मिथुन
एक राशि।
संज्ञा
[सं.]

मिथ्या
झूठ, असत्य।
वि.
[सं]
मिथ्यावाद विवाद छाँड़ि दै-१-३१२।

मिथ्या
सार या आधार हीन, जिसमें वास्तविकता या स्थायित्व न हो।
बल विद्या धन धाम रूप गुन और सकल मिथ्या सौंजाई-१-२४।

मिथ्याचार
कपटपूर्ण व्यवहार।
संज्ञा
[सं]

मिथ्याध्यवसिति
एक काव्यालंकार।
संज्ञा
[सं]

मिथ्याबाद, मिथ्यावाद
संसार को असत्य समझने का सिद्‍धांत।
संज्ञा
[सं. मिथ्या+वाद]
मिथ्या बाद उपाधि रहित ह्वै बिमल बिमल जस गावत-2-१७।

मिथ्याबादी, मिथ्यावादी
झूठा।
वि.
[सं. मिथ्यावादिन्]

मिथ्वाभास
आभास जो वास्तविक स्थिति के विरुद्ध हो।
संज्ञा
[सं]

बारहदरी
बैठक जिसमें बारह द्वार हों।
संज्ञा
[हिं. बारह +फा. दर]

बारहबान
एक तरह का सोना (स्वर्ग) जो बहुत बढ़िया होता है।
संज्ञा
[सं. द्वादशवर्ण]

बारहबाना
सूर्य के समान चमक-दमक वाला।
वि.
[हिं. बारहबान]

बारहबाना
खरा, चोखा।
वि.
[हिं. बारहबान]

बारहबानि, बारहबानी
सूर्य-सी कांति वाला।
वि.
[हिं. बारहबान]

बारहबानि, बारहबानी
खरा-चोखा।
वि.
[हिं. बारहबान]
सोहत लोह परसि पारस ज्यौं सुबरन बारहबानि।

बारहबानि, बारहबानी
दोष या कलंक रहित।
वि.
[हिं. बारहबान]

बारहबानि, बारहबानी
पूर्ण, पक्का (व्यंग्य)।
वि.
[हिं. बारहबान]
हरि के चरित सबै उहि सीखे दोऊ हैं वे बारहबानी-१२८४।

बारहबानि, बारहबानी
सूर्य की कांति या चमक।
संज्ञा

बारहबाने
खरे, चोखे।
वि.
[हिं. बारहबाना]
सूरदास प्रभु हम हैं खोटी, तुम तौ बारहबाने हो-३० ०५।

मिदुराना, मिदुरानो
मृदु, मधुर या कोमल हो जाना।
क्रि. अ.
[सं. मृद]

मिनकना, मिनकनो
(किसी के) दबाव में आकर बहुत धीरे से बोलना।
क्रि. अ.
[अनु. मिनमिन]

मिनती
विनय, प्रार्थना।
संज्ञा
[हिं. बिनती]

मिनमिन
नाक से निकलने वाले धीमे या महीन स्वर में।
क्रि. वि.
[अनु.]

मिनमिना
नाक से धीमें या महीन स्वर में बोलनेवाला।
वि.
[अनु.]

मिनमिनाना, मिनमिनानो
नाक से धीमे स्वर में बोलना।
क्रि. अ.
[अनु.]

मिन्नत
प्रार्थना।
संज्ञा
[अ.]

मिन्नत
दीनता।
संज्ञा
[अ.]

मिमियाना, मिमियानो
बकरी की तरह बोलना।
क्रि. अ.
[अनु.]

मियाँ
स्वामी।
संज्ञा
[फा.]

मियाँ
पति।
संज्ञा
[फा.]

मियाँ
महाशय।
संज्ञा
[फा.]

मियाँ
मुसलमान।
संज्ञा
[फा.]

मियाँ - मिट्‍ठू
मिठबोला।
संज्ञा
[फ़ा. मियाँ + हिं. मिटठू]

मियाँ - मिट्‍ठू
अपनी बड़ाई स्वयं करनेवाला।
संज्ञा
[फ़ा. मियाँ + हिं. मिटठू]
अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना - स्वयं अपनी बड़ाई करना।

मियाँ - मिट्‍ठू
मूर्ख व्यक्ति।
संज्ञा
[फ़ा. मियाँ + हिं. मिटठू]

मियाँ - मिट्‍ठू
तोता।
संज्ञा
[फ़ा. मियाँ + हिं. मिटठू]
मियाँ मिट्‍ठू बनना - बिना समझे रटना। मियाँ मिठ्ठू बनाना - बिना समझाए रटाना।

मियाद
निश्चित अवधि।
संज्ञा
[अ. मीयाद]

मिरग
हिरन, मृग।
संज्ञा
[स. मृग]
कहै मिरग सौं नारा-१-२२१।

मिरगछाला
हिरन की खाल।
संज्ञा
[सं. मृगछाला]

मिरगी
एक मानसिक रोग।
संज्ञा
[सं. मृगी]

मिरच, मिरचा, मिरची, मिरिच, मिरिचा, मिर्च
लाल मिर्च।
संज्ञा
[सं. मरिच]
(क) तिहि सठ-मिरिच रुचि नाई-१०-१८३। (ख) बरा कौर मेलत मुख भीतर मिरिच दसन टकटौरे। तीछन लागो नैन भरि आए रोवत बाहर दौरे-१०-२२४। (ग) हींग मिरच पीपरि अजबाइन ये सब बनिज कहावैं-११०८।

मिरच, मिरचा, मिरची, मिरिच, मिरिचा, मिर्च
काली मिर्च।
संज्ञा
[सं. मरिच]

मिरजई
बंददार बास्कट।
संज्ञा
[फ़. मिरज़ा]

मिरजा
शहजादों' की उपाधि।
संज्ञा
[अ. मिरज़ा]

मिरदंग, मिर्दंग
मृदंग।
संज्ञा
[सं. मृदंग]

मिरदंगी मिर्दंगी
छोटा मृदंग।
संज्ञा
[सं. मृदंग]

मिखना, मिखनो
मिलाना।
क्रि. स.
[हिं. मिलाना]

मिलक
जमीदारी।
संज्ञा
[अ. मिल्क]

मिलक
जागीर।
संज्ञा
[अ. मिल्क]
ब्रज की भूमि इंद्र तैं मानौ मदन मिलक (मिलिक) करि पाई-2८३६।

मिलना, मिलनो
दो पदाथों का अंतर मिटकर एक होना।
क्रि. अ.
[सं. मिलन]

मिलना, मिलनो
सम्मिलित होना।
क्रि. अ.
[सं. मिलन]

मिलना, मिलनो
जुड़ना, चिपकना।
क्रि. अ.
[सं. मिलन]

मिलना, मिलनो
गुण, आकृति आदि समान होना।
क्रि. अ.
[सं. मिलन]

मिलना, मिलनो
भेंटना, छाती से लगाना।
क्रि. अ.
[सं. मिलन]

मिलना, मिलनो
भेंट या मुलाकात होला।
क्रि. अ.
[सं. मिलन]

मिलना, मिलनो
मेल-मिलाप होना।
क्रि. अ.
[सं. मिलन]

मिलना, मिलनो
पक्ष-विशेष में हो जाना।
क्रि. अ.
[सं. मिलन]

मिलना, मिलनो
लाभ होना।
क्रि. अ.
[सं. मिलन]

मिलना, मिलनो
पता या खोज लगाना।
क्रि. अ.
[सं. मिलन]

मिलकना, मिलकनो
जलना।
क्रि. अ.
[देश.]

मिलकी
जमीदार।
संज्ञा
[हिं. मिलक]

मिलकी
धनी।
संज्ञा
[हिं. मिलक]

मिलते
दर्शन देते।
क्रि. स.
[हिं. मिलना]
मनसा करि सुमिरत है जब-जब, मिलते तब तबहीं-१.२८३।

मिलन
मिलाप, भेंट !
कि. स.
[सं.]
मिलन आस तनु प्रान रहत है दिन दस मारग चैहौं-2५५०।
मिलन कहियौ - बराबर वालियों से सप्रेम प्रणाम - नमस्कार आदि कहना, प्रणाम नमस्कार - सूचक मिलना या भेंटना कहना। उ. - या वर प्यारी आवति रहियौ। महरि हमारी बात चलावति ? मिलन हमारौ कहियौ-७२७।

मिलन
मिलन गए-मिलने, भेंटने या दर्शन करने गये।
प्र.
जिनकौं मिलन गए पति तेरे सो ठाकुर ये बिदित तुम्हारे-१-२४१।

मिलन
मिलन न पाई-मिल भेंट न सकी, दर्शन न कर सकी।
नंदनंदन के चलत सखी हे तिनको मिलन न पाई-2५६८।

मिलनसार
हेलमेल या प्रेम का व्यवहार रखने वाला।
वि.
[हिं. मिलन+सार]

मिलनसारी
हेलमेल या प्रेम का व्यवहार।
संज्ञा
[हिं. मिलनसारी]

मिलना, मिलनो
मिश्रित होना।
क्रि. अ.
[सं. मिलन]

मिलना, मिलनो
सुर ठीक होना।
क्रि. अ.
[सं. मिलन]

मिलना, मिलनो
दूध दुहना।
क्रि. स.
[देश.]

मिलनि, मिलनी
विवाह की एक रीति जिसमें विवाह के पूर्व अथवा पश्चात कन्या के संन्निकट संबंधियों से गले मिलते और नकद भेंट देते हैं।
संज्ञा
[हिं. मिलन]

मिलनि, मिलनी
मिलने की क्रिया या भाव, भेंट, मिलन।
संज्ञा
[हिं. मिलन]
(क) धन्य यह मिलनि धन्य यह बठनि धन्य अनुराग नहीं यह थोरी-पृ० ३१० (४)। (ख) वह हिलनि-मिलनि-खिलन की तेरे प्रेम प्रीति जताई-2१०७।

मिलनि, मिलनी
प्रेम-पूर्ण संबंध या व्यवहार; मिलना-जुलना।
संज्ञा
[हिं. मिलन]
जब बारे तब वैसी मिलनी की बड़े भए इहै देखो-३१००।

मिलवत
मिश्रित या सम्मिलित करते हो।
क्रि. स.
[हिं. मिलाना]
मिलवत कहाँ कहाँ की बातें हँसत कहति अति उर सकुचाई.-११६३।

मिलवत
मिलते-जुलते हो।
क्रि. स.
[हिं. मिलाना]
मुँह ही की हमसों मिलवत - मिलने-भेंटने की कोरी बातें ही करते हो, हमसे मिलने-जुलने की केवल बातें करते हो (हृदय से वैसा नहीं चाहते), मुँह से तो हमसे मिलने-जुलने की बात करते हो (पर मन कहीं और है)। उ. - मुँह ही की हमसों मिलावत जिय बसत जहाँ मन मोहनि-2०१४।

मिलवति
मिश्रित या सम्मिलित करती है।
क्रि. स.
[हिं. मिलाना]

मिलवति
इधर-उधर की बातें जोड़ती है।
क्रि. स.
[हिं. मिलाना]
मैं जानति उनके ढंग नीके बातें मिलवति जोरि-८६७।

मिलवति
(इधर की उधर ) लगाती है।
क्रि. स.
[हिं. मिलाना]
उतकी इत इत की उत मिलवति समुझसि नाहिंन प्रीति-रीति-2०४६।

मिलवना, मिलवनो
मिलाना।
क्रि. स.
[हिं. मिलाना]

मिलवाई
मिलवाने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
संज्ञा
[हिं. मिलवाना]

मिलवाना, मिलवानो
मिलने को प्रवृत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. मिलाना]

मिलवाना, मिलवानो
भेंट या परिचय करना।
क्रि. स.
[हिं. मिलाना]

मिलवाना, मिलवानो
मेल कराना।
क्रि. स.
[हिं. मिलाना]

मिलाइ
मिश्रित करके, घोलकर।
क्रि. स.
[हिं. मिलाना]
सलिल कौं सब रंग तजि कै एक रंग मिलाइ-१-७०।

मिलाई
मिलाने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
संज्ञा
[हिं. मिलाना]

मिलान
मिलाने की क्रिया।
संज्ञा
[हिं. मिलाना]

मिलान
समता, तुलना।
संज्ञा
[हिं. मिलाना]

मिलान
ठीक होने की जाँच।
संज्ञा
[हिं. मिलाना]

मिलाना, मिलानो
मिश्रित करना।
क्रि. स.
[सं. मिलन]

मिलाना, मिलानो
अंतर मिटाकर एक करना।
क्रि. स.
[सं. मिलन]

मिलाना, मिलानो
सम्मिलित करना।
क्रि. स.
[सं. मिलन]

मिलाना, मिलानो
जोड़ना, चिपकाना।
क्रि. स.
[सं. मिलन]

मिलाना, मिलानो
ठीक होने की जाँच करना।
क्रि. स.
[सं. मिलन]

मिलाना, मिलानो
भेंट या परिचय करना।
क्रि. स.
[सं. मिलन]

मिलाना, मिलानो
मेल या संधि करना।
क्रि. स.
[सं. मिलन]

मिलाना, मिलानो
पक्ष-विशेष में करना।
क्रि. स.
[सं. मिलन]

मिलाना, मिलानो
सुर ठीक करना।
क्रि. स.
[सं. मिलन]

मिलाप
मिलने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. मिलाना]

मिलोना, मिलोनो
मिलाना।
क्रि. स.
[हिं. मिलाना]

मिलोना, मिलोनो
दूध दुहना।
क्रि.स.
[देश.]

मिलौनी
मिलाने की क्रिया या भाव, मिलावट।
संज्ञा
[हिं. मिलना]

मिलौनी
मिलाने के बदले में मिला हुआ धन।
संज्ञा
[हिं. मिलना]

मिल्यो, मिल्यौ
मिला, प्राप्त हुआ।
क्रि. स.
[हिं. मिलना]
जिहिं तन हरि भजिबौ न कियो। ….। तिन्हैं न मिल्यौ हियौ-2-१६।

मिश्र
मिश्रित।
वि.
[सं.]

मिश्र
श्रेष्ठ।
वि.
[सं.]

मिश्र
ब्राह्मणों का एक वर्ग।
संज्ञा

मिश्रण
मेल, मिलावट।
संज्ञा
[सं]

मिश्रण
कई चीजों का मिला हुआ घोल।
संज्ञा
[सं]

मिलिंद
भौंरा, भ्रमर।
संज्ञा
[सं.]

मिलि
मिलकर, संगति करके।
क्रि. स.
[हिं. मिलना]
धन-मद-मूढ़नि अभिमानिनि मिलि लोभ लिए दुर्बचन सहै-१-५३।

मिलिक
जमीदार।
संज्ञा
[अ. मिल्क]

मिलिक
जागीर।
संज्ञा
[अ. मिल्क]
इह ब्रज भूमि सकल सुर-संतति सो मदन मिलिक करि पाई-2८३६।

मिलित
मिला हुआ, युक्त।
वि.
[सं.]

मिलिबे, मिलिबो, मिलिबौ
मिलने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. मिलना]
मिलिबे की तरसनि-१०-९६

मिलिहौ
मिलोगे, दर्शन करोगे।
क्रि. स.
[हिं. मिलना]
जीते जनम बिरोध करि मोकौं मिलिहौ आई-३-११।

मिलीं
संयुक्त हुई, एक हो गयीं।
क्रि. स.
[हिं. मिलना]
मुक्तामाल मिलीं मानौ द्वै सुरसरि एकै संग-६२८।

मिलै
मिश्रित करके।
क्रि. स.
[हिं. मिलाना]
बेसन मिलै सरस मैदा सौं अति कोमल पूरी है भारी-१०-२४१।

मिलै
स्वर ठीक करके, सुर मिलाकर।
क्रि. स.
[हिं. मिलाना]
गौरी राम मिले सुर गावत-५०६।

बारगह, बारगाह
तंबू।
संज्ञा
[फा. वारगाह]

बारजा
कोठा, अटारी, दालान।
संज्ञा
[हिं. बार]

बारण
मनाही।
संज्ञा
[सं. वारण]

बारण
रुकावट।
संज्ञा
[सं. वारण]

बारण
हाथी।
संज्ञा
[सं. वारणः]

बारता
वृत्तांत।
संज्ञा
[सं. वार्ता]

बारता
विषय, प्रसंग, मामला।
संज्ञा
[सं. वार्ता]

बारता
बातचीत।
संज्ञा
[सं. वार्ता]

बारति
जलाती-बलाती है।
क्रि. स.
[हिं. बालना]
नीराजन बहु बिधि बारति हैं ललितादि ब्रजनार।

बारन
हाथी।
संज्ञा
[सं. वारणः]

मिलाप
मेल, मित्रता।
संज्ञा
[हिं. मिलाना]

मिलाप
भेंट, मुलाकात।
संज्ञा
[हिं. मिलाना]
रानी सौं मिलाप तहें भयौ-४-१२।

मिलाव
मिलावट।
संज्ञा
[हिं. मिलना]

मिलाव
मिलाप।
संज्ञा
[हिं. मिलना]

मिलावट
मिलाये जाने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. मिलाना]

मिलावट
अच्छी में बुरी का मेल।
संज्ञा
[हिं. मिलाना]

मिलावत
अच्छी चीज में बुरी या एक में दूसरी मिलाता है।
क्रि. स.
[हिं. मिलावना]
देखौ आइ पूत के करतब दूध मिलावत पानी-१०-३३७।

मिलावना, मिलावनो
मिलाना।
क्रि. स.
[हिं. मिलाना]

मिलावै
भेंट करा दे।
क्रि. स.
[हिं. मिलावना]
ऐसो कोऊ नाहिंनै सजनी जो मोहनै मिलावै-2७४५।

मिलाहीं
मिलते हैं, भेंटते या छाती से लगाते हैं।
क्रि. स.
[हिं. मिलना]
बरषत मेह मेदनी के हित प्रीतम हरषि मिलाहीं-2१९४।

मिश्रित
मिलाया हुआ।
वि.
[सं]

मिश्री
दोबारा साफ करके जमायी गयी चीनी।
संज्ञा
[हिं. मिसरी]
मिश्री सानि चटावै-१०-८४।

मिष
छल-कपट।
संज्ञा
[सं.]

मिष
हीला-बहाना।
संज्ञा
[सं.]

मिष्ट
मीठा, मधुर।
वि.
[सं.]
अगनित तरु-फल सुगंध मृदुल मिष्ट खाटे-९-९६।

मिष्टभाषी
मिठबोला।
वि.
[सं. मिष्टभाषिन्]

मिष्टान्न, मिष्ठान्न
मिठाई।
संज्ञा
[सं. मिष्टान्न]
माखन मधु मिष्ठान्न महर लै दियौ अक्रूर के हाथ-2५३४।

मिस
हीला, बहाना।
संज्ञा
[सं. मिष]
(क) दधि-मिस आपु बँधायौ दाँवरि-१-२५। (ख) मिस दिगबिजय चहूँ दिसि गयौ-१-२९०। (ग) आवति सूर उरहने के मिस-१०-३११।

मिस
नकल, स्वाँग।
संज्ञा
[सं. मिष]

मिसकना, मिसानो
धीरे बोलना।
क्रि. अ.
[अनु.]

मिसकी
धीरे बोलने की क्रिया।
संज्ञा
[हिं. मिसकना]

मिसकी
धीमे स्वर से गाना।
संज्ञा
[हिं. मिसकना]

मिसकीन
दीन, निर्धन।
वि.
[अ. मिस्कीन]

मिसकीनता
दीनता, गरीबी।
संज्ञा
[हिं. मिसकीन]

मिसना, मिसनो
मिश्रित होना।
क्रि. अ.
[सं. मिश्रण]

मिसना, मिसनो
मीसा जाना।
क्रि. अ.
[हिं. मीसना]

मिसरा
कविता का एक चरण।
संज्ञा
[अ. मिसरअ]

मिसरी
दोबारा साफ करके जमाई गयी चीनी, मिश्री।
संज्ञा
[देश.]

मिसहा
बहानेबाज।
वि.
[हिं. मिस]

मिसहा
कपटी।
वि.
[हिं. मिस]

मिसाल
उपमा।
संज्ञा
[अ]

मिसाल
नमूना।
संज्ञा
[अ]

मिसि
बहाना।
संज्ञा
[सं. मिष]
सुंदर स्याम पाहुने के मिसि मिलि न जाहु दिन चार-2७६९।

मिसिरी
दोबारा साफ करके जमायी गयी चीनी।
संज्ञा
[हिं. मिसरी]
(क) सद दधि-माखन धौं आनी। ता पर मधु मिसिरी सानी-१०-१८३। (ख) दूध औट्यो आनि, अधिक मिसिती सानि-४४०।

मिसिल
समान, तुल्य।
वि.
[अ. मिस्ल]

मिसी
बहाना, हीला।
संज्ञा
[हिं. मिस]

मिस्री
मिसरी।
संज्ञा
[हिं. मिसरी]

मिस्रित
मिला हुआ।
वि.
[सं. मिश्रित]

मिस्रित
मिस्रित करि-मिलाकर।
प्र.
(क) मिस्रो दधि-माखन मिस्रित करि मुख नावत छबि धनिया-१०-२३८। (ख) घृत मिष्टान्न खीर मिस्रित करि परुसि कृष्न हित ध्यान लगायौ-१०-२४८।

मिस्सा
कई दालों का मिला हुआ आटा।
संज्ञा
[हिं. मीसना]

मींजी
हाथ से मली-मसली।
क्रि. स.
[हिं. मींजना]
काल्हि धोखैं कान्ह मेरी पीठि मींजी आइ-७८०।

मींड़
संगीत में एक स्वर से दूसरे पर इस कौशल से जाना कि स्वरों का संबंध तो स्पष्ट हो परंतु कोई व्यवधान न जान पड़े।
संज्ञा
[सं. मीड़म्]

मींड़त
मलता-मसलता है।
क्रि. स.
[हिं. मींड़ना]
हम अस्नान करति जल-भीतर मींड़त पीठि कन्हाई-७७०।

मींड़ना, मोड़नो
मलना, मसलना।
क्रि.स.
[हिं. माँड़ना]

मीच
मौत, मृत्यु।
सज्ञा
[हिं. मीच]
(क) ताकैं मूँड़ चढ़ी नाचति है भीचति नीच नटी-१.९८। (ख) सिर पर मीच, नीच नहिं चितवत-१-१४९।

मीचना, मीचनो
आँख मूँदना।
क्रि. स.
[हिं. मूँदना]

मीचि
(आँख) मुंद या बद कर।
क्रि. स.
[हिं. मींचना]
कह्यौ, आँखि अब मीचि तू-८-१६।

मीचु
मौत, मृत्यु।
संज्ञा
[सं. मृत्यु, प्रा. मिच्च]
जो पै यह कियो चाहत है मीचु बिरह सर घात-2५०२।

मीचत
मीचता है, मीचते (ही), मीचते (हुए)।
क्रि. स.
[हिं. मीचना]
ठाढ़ी कुँअरि राधिका लाचन मीचत तहँ हरि आए-६७५।

मीचै
बंद करता है।
क्रि. स.
[हिं. मीचना]
हौं यह जानति बानि स्याम की अँखियाँ मीचै बदन चलावै-१०-२३१।

मिस्सा
मिस्सा-कुस्सा-मोटा अनाज।
यौ.

मिस्सी
एक मंजन जिससे दाँत काले होकर सुंदर लगते हैं।
संज्ञा
[फ़ा. मिसी = ताँबे का]
मिस्सी - काल करना - शृंगार करना।

मिहचना, मिहचनो
मूँदना।
क्रि. स.
[हिं. मचना]

मिहर
कृपा, दया।
संज्ञा
[अ. मेह्र]

मिहानी
मथानी।
संज्ञा
[हिं. मथानी]

मींगी
बीज की भीतरी गिरी।
संज्ञा
[सं. मुद्ग]

मींजत
मलता-मसलता है, मलते-मसलते (ही)।
क्रि. स.
[हिं. मींजना]
मींजत पीठि प्रीति अति बाढ़ी-७९९।

मींजना, मीजनो
हाथ से मलना-मसलना।
क्रि. स.
[हिं मींजना]

मींजना, मीजनो
कुचलना, दलना, मर्दन करना।
क्रि. स.
[हिं मींजना]

मींजि
मल या मसलकर।
क्रि. स.
[हिं. मींजना]
मींजि कर - हाथ मल-मलकर, बहुत दुखी होकर। उ. - यह सुनत जल नैन ढारत मींजि कर पछिताहिं-2६७२।

मीजत
मलता-मसलता है।
क्रि. स.
[हिं. मीजना]
फिरि देखैं तौ कुँवर कन्हाई मोजत रुचि सौं पीठि-७६८।

मीजना मीजनो
मलना, मसलना।
क्रि. स.
[हिं. मींजना]

मीजान
संख्याओं का योग।
संज्ञा
[अ.]

मीठा
मधुर।
वि.
[सं. मिष्ट, प्रा. मिट्ट]

मीठा
स्वादिष्ट।
वि.
[सं. मिष्ट, प्रा. मिट्ट]

मीठा
धीमा, मंद।
वि.
[सं. मिष्ट, प्रा. मिट्ट]

मीठा
मामूली, साधारण।
वि.
[सं. मिष्ट, प्रा. मिट्ट]

मीठा
हलका,मंद। ।
वि.
[सं. मिष्ट, प्रा. मिट्ट]

मीठा
बहुत सीधा।
वि.
[सं. मिष्ट, प्रा. मिट्ट]

मीठा
प्रिय,चिकर।
वि.
[सं. मिष्ट, प्रा. मिट्ट]

मीठा
मिठाई।
संज्ञा

मीठा
गुड़।
संज्ञा

मीठि, मीठी
मधुर।
वि.
[हिं. मीठा]

मीठि, मीठ
कटु-मीठि-कड़ुआ और मीठा, बुरा और भला।
यौ.
सूर स्याम सुंदर रस अटके नहिं जानत कटु-मीठि-पृ. ३३४ (३६)।

मीठी छुरी
ऊपर से मित्र, भीतर से शत्रु।
संज्ञा
[हिं. मीठ +छुरी]

मीठी छुरी
कपटी, कुटिल।
संज्ञा
[हिं. मीठ +छुरी]

मीठी मार
ऐसी चोट जो ऊपर से तो दिखायी न दे पर भीतर पीड़ा पहुँचाये।
संज्ञा
[हिं. मीठी+मार]

मीठे
प्रिय, रुचिकर।
वि.
[हिं. मीठा]
सूरदास-प्रभु-हरि गुन मीठे नित प्रति सुनियत कान १-१६९।

मीठे
जिनमें मिठास हो, मधुर।
वि.
[हिं. मीठा]
सबरी कटुक बेर तजि मीठे चाखि गोद भरि लाई-१-१३।

मीठे
जूठो खइए मीठे कारन-कोई अनुचित काम तभी किया जाय जब उससे कम से कम कोई स्वार्थ या लाभ तो होता हो।
प्र.
जूठो खइए मीठे कारण आपुहिं खात लड़ात-पृ० ३३१ (६)।

मीठैं तेल
मीठे तेल में, तिल के तेल में।
संज्ञा
[हिं. मीठा+तेल]
मीठैं तेल चना की भाजी-३९६।

मीड़त
मलता-मसलता है।
क्रि. स.
[हिं. मींड़ना]
कर या हाथ मोड़त - हाथ मलता या पछताता है। उ. - (क) हरि बिनु को पुरवै मो स्वारथ। मोड़त हाथ सीस धुनि ढोरत रुदन करत नृप, पारथ-१- २८७। (ख) मोड़त हाथ सकल गोकुलजन बिरह बिकल बेहाल-2५३६। (ग) सूरदास प्रभु तुमहिं मिलन को कर मीड़त पछितात-३३५०। पलक मीड़त रही - दूर तक देखने के लिए आँख या पलक मलकर तैयार होने के यत्न में लगी रही। उ. - जौ लगि पानि पलक मोड़त रही तौ लगि चलि गए दूरि-2६९३।

मीड़ति
मलती है।
क्रि. स.
[हिं. मींड़ना]
कर मीड़ति पछिताति मनहिं मन क्रम क्रम करि समुझावै-३०९८।

मीड़ना, मोड़नो
मलना, मसलना।
क्रि. स.
[हिं. मोड़ना]

मीड़ना, मोड़नो
कुचलना, दलना, मर्दन करना।
क्रि. स.
[हिं. मोड़ना]

मीड़ैं
मलते-मसलते हैं।
क्रि. स.
[हिं. मीड़ना]
ताहि कोऊ उपचार न लागत कर मीड़ैं सहचरि पछिताइ-७४८।

मीत
मित्र, सखा।
संज्ञा
[सं. मित्र]
(क) गोबिंद गाढ़े दिन के मीत-१-३१। (ख) सखीरी, काके मीत अहीर-२६८६। (ग) मधुकर काके मीत भए-२९९२।

मीत
प्रेमी।
संज्ञा
[सं. मित्र]

मीतता
मित्रता।
संज्ञा
[हिं. मीत+ता]

मीता, मीते
मित्र, सखा।
संज्ञा
[हिं. मीत]
सूरदास प्रभु बहुरि कृपा करि मिलहु सुदामा मीते-2८९३।

मीता, मीते
प्रिय, प्रियतम।
संज्ञा
[हिं. मीत]
तिनको कहा परखो कीजै कुबिजा के मीता को-३३७६।

मीन
मछली।
संज्ञा
[सं.]
(क) मीन बियोग न सहि सकै (रे) नीर न पूछै बात-१.३२५। (२) बारहवीं और अंतिम राशि। (३) बारहवीं और अंतिम लग्न।

मीनकेत, मीनकेतन, मीनकेतु
कामदेव जिसकी ध्वजा पर मीन अंकित कही गयी है।
संज्ञा
[सं. मीन+केतन, केतु]
मीनकेत अंबुज आनंदित ताते ता हित लहियत-2८५६।

मीनता
मीन' का गुण, या स्वभाव, मीनपन।
संज्ञा
[सं. मीन+ता]
सूरदास मीनता कछ्‌क जल भरि कबहूँ न छाँड़त-2७७७।

मीन - मार्ग
हठ-योग की साधना का रूप जो (जल में मछली के मार्ग के समान) गुप्त रहता है।
संज्ञा
[सं.]

मीन-मेख, मीन-मेष
आगा-पीछा, सोच-विचार।
संज्ञा
[सं. मीन+मेष (राशियाँ)]

मीन-मेख, मीन-मेष
छोटे-मोटे दोष निकालना।
संज्ञा
[सं. मीन+मेष (राशियाँ)]

मीना
रंगीन पत्थर।
संज्ञा
[फ़.]

मीना
एक नीला पत्थर।
संज्ञा
[फ़.]

मीना
कीमिया।
संज्ञा
[फ़.]

बाराह
सुअर (पशु)।
संज्ञा
[सं . वाराह]

बाराह
विष्णु का तीसरा अवतार।
संज्ञा
[सं . वाराह]
मच्छ, कच्छ, बाराह बहुरि नरसिंह रूप धरि-2-३६।

बारि
जल, पानी।
संज्ञा
[सं. वारि]

बारि
अवसर, पारी, बारी।
संज्ञा
[हिं. बारी]
दीनानाथ अब बारि तुम्हारी-१-११८।

बारि
बाग।
संज्ञा
[सं. प्रखर]
हरि भजन की बारि कर लै उबरै तेरौ खेत-१-३११।

बारि
किनारा, तट।

बारि
पैनी चीज की धार।

बारि
बाग।
संज्ञा
[सं. वारी]

बारि
क्यारी।
संज्ञा
[सं. वारी]

बारिगर
सान चढ़ानेवाला।
संज्ञा
[हिं. बारी+गर]

मीना
सोने के आभूषण
संज्ञा
[फ़.]

मीना
सोने के आभूषण आदि पर किया जानेवाला रंगीन काम।
संज्ञा
[फ़.]

मीनाक्ष
मछली जैसे सुंदर नेत्रवाला।
वि.
[सं.]

मीनाक्षी
जिसके नेत्र मछली-जैसे हों।
वि.
[सं.]

मीनालय
समुद्र।
संज्ञा
[सं.]

मीन्ही
मीन, मछली।
संज्ञा
[सं. मीन]
सूर स्याम के रंगहि राधी टरत नहीं जल तें ज्यौं मीन्ही-१४३६।

मीमांसक
मीमांसा करनेवाला।
वि.
[सं.]

मीमांसक
मीमांसा शास्त्र का ज्ञाता।
वि.
[सं.]

मीमांसा
तत्व का विवेचन या निर्णय।
संज्ञा
[सं.]

मीमांसा
भारतीय छह दर्शनों में दो जो 'पूर्व' और 'उत्तर' मीमांसा कहलाते हैं।
संज्ञा
[सं.]

मुंचना, मुंचनो
मुक्त होना।
क्रि. अ.
[सं. मोचन]

मुंचना, मुंचनो
मुक्त करना।
क्रि. स.
[सं. मोचन]

मुंज
मूँज।
संज्ञा
[सं.]

मुंड
सिर।
संज्ञा
[सं.]

मुंड
कटा हुआ सिर।
संज्ञा
[सं.]

मुंड
शुंभ दैत्य का सेनापति।
संज्ञा
[सं.]

मुंड
मुंडे हुए सिर बाला।
वि.

मुंड
नीच।
वि.

मुंडन
सिर को मूंड़ने की क्रिया।
संज्ञा
[सं.]

मुंडन
द्विजातियों में बालक का एक संस्कार जो सामान्यतया पाँचवें वर्ष किया जाता है।
संज्ञा
[सं.]

मीर
प्रधान नेता।
संज्ञा
[फ़ा.]

मीर
धर्माचार्य।
संज्ञा
[फ़ा.]

मीरग, मीरगा
हिरन।
संज्ञा
[सं. मृग]

मीलन
बंद करना, मूँदना।
संज्ञा
[सं.]

मीलन
संकुचित करना।
संज्ञा
[सं.]

मीलित
बंद किया हुआ।
वि.
[सं.]

मीलित
सिकोड़ा या संकुचित किया हुआ।
वि.
[सं.]

मीलित
एक अलंकार।
संज्ञा

मुँगरा
नमकीन बूँदी।
संज्ञा
[हिं. मोगरा]

मुँगैछी, मुँगौछी, मुँगौरी
मूँग की बरी।
संज्ञा
[हिं. मूँग+बरी]

मुँडना, मुँडनो
सिर के बालों का मूँड़ा जाना।
क्रि. अ.
[सं मुंडन]

मुँडना, मुँडनो
लूटा या ठगा जाना।
क्रि. अ.
[सं मुंडन]

मुँडना, मुँडनो
हानि उठाना।
क्रि. अ.
[सं मुंडन]

मुंडमाल, मुंडमाला
कटे हुए सिरों की माला जो शिव या काली के गले में रहती है।
संज्ञा
[सं. मुंडमाला]
मुंडमाल सिव-ग्रीवा कैसी।...। मुंडमाल कैसी तव ग्रीवा-१-२२६।

मुंडमालिनि, मुंडमालिनी
देवी काली।
संज्ञा
[सं.]

मुंडमाली
शिव जी।
संज्ञा
[सं. मुडमालिन्]

मुंडली
जिसका सिर मुँड़ा हो।
संज्ञा
[हिं. मुंडा]
मुंडली पाटी पारन चहै।

मुंडा
जिसका सिर मुँड़ा हो।
वि.
[सं. मुंड]

मुंडा
जिस (पशु) के सींग न हों।
वि.
[सं. मुंड]

मुंडा
एक लिपि जिसमें मात्राऐ आदि नहीं होती।
संज्ञा

मुँडाइ, मुँड़ाई
मूँड़ने की क्रिया, भाव या मजदूरी।
संज्ञा
[हिं. मुँडना]

मुँड़ाना, मुँड़ानो
मुंडन कराना।
क्रि. स.
[सं. मुंडन]

मुँड़ाना, मुँड़ानो
मूँड़ा जाना।
क्रि. अ.

मुँड़ाना, मुँड़ानो
धोखे में धन गँवाना, ठगा जाना।
क्रि. अ.

मुँड़ासा
साफा, पग्‍गड़।
संज्ञा
[हिं. मूँड]

मुड़ित
मुड़ा हुआ।
वि.
[सं.]

मुड़िया
सिर, मूँड़।
संज्ञा
[हिं. मूँड़]

मुड़िया
वह जो सिर मुँड़ाकर किसी जोगी का चेला बन गया हो।
संज्ञा
[हिं. मूँड़ना]
जिनके जोग जोग यह ऊधौ ते मुँड़िया बसैं कासी।

मुंडी
स्त्री जिसका सिर मुड़ा हो।
संज्ञा
[हिं. मूँड़ना]

मुंडी
विधवा।
संज्ञा
[हिं. मूँड़ना]

मुंडी
साधु जिसका सर मुँड़ा हो।
संज्ञा

मुँडेरि, मुँड़ेरी
दीवार का ऊपरी भाग जो छत से कुछ उठा रहता है।
संज्ञा
[हिं. मुँडेरा]

मुँडेरा
दीवार का वह ऊपरी भाग जो छत से कुछ उठा रहता है।
संज्ञा
[हिं. मूँड]

मुंडो
स्त्री जिसका सर मुँड़ा हो।
संज्ञा
[हिं. मुंडी]

मुंडो
विधवा, राँड़।
संज्ञा
[हिं. मुंडी]

मुँदना, मुँदनो
बंद होना।
क्रि. अ.
[सं. मुद्रण]

मुँदना, मुँदनो
छिपना, लुप्त होना।
क्रि. अ.
[सं. मुद्रण]

मुँदना, मुँदनो
(छेद आदि) भर जाना।
क्रि. अ.
[सं. मुद्रण]

मुदरा
कुंडल जो जोगी कान में पहनते हैं।
संज्ञा
[सं. मुद्रा]

मुदरा
कान का एक आभूषण।
संज्ञा
[सं. मुद्रा]

मुँह
मुँह बनवाना--किसी बड़े कार्य या बड़ी प्राप्ति की पात्रता अपने में लाना (व्यंग्य)। मुँह बनाना--आकृति से असंतोष सूचित करना। मुँह बिगाड़ना-(१) चेहरे (विशेषतः शव के चेहरे) की आकृति खराब होना। (२) चेहरे पर अप्रसन्नता या असंतोष का भाव आना। (दूसरे का मुँह बिगाड़ना)--बहुत मारना-पीटना। (अपना ) मुँह बिगाड़ना--असंतोष या अप्रसन्नता का भाव झलकाना। मुँह बुरा बनाना असंतोष या अप्रसन्नता सूचित करना। मुँह में कालिख पुतना ( लगना)-बहुत बदनामी होना, कलंक लगना। मुँह में कालिख पोतना (लगाना) कलंक लगाना, बहुत बदनामी करना। (अपना) मुँह मोड़ना-(१) उपेक्षा प्रकट करना। (२) किसी ओर से ध्यान हटा लेना। (३) अस्वीकार कर देना। दूसरे का मुँह मोड़ना - पराजित कर हेना। (किसी के ) मुँह लगना--- (१) किसी का बहुत लाड़-प्यार देखकर शोख या उद्दंड हो जाना। (२) सवाल-जबाब या तर्क-कुतर्क करना। मुँह लगाना--(१) लाड़-प्यार करके शोख या उद्दंड बनाना। (२) ध्यान देना, सहर्ष स्वीकार करना। मुँह न लगाईं--ध्यान भी न दिया, सर्वथा उपेक्षा की। उ.---अष्टसिद्धि बहुरी सहँ आई। रिषभदेव ते मुँह न लगाई-५-२। मुँह लपेटकर पड़ना (पड़े रहना )-बहुत दुखी हो जाना। मुँह लाल करना-(१) मुँह पर कई थप्पड़ या चाँटे मारना। (२) पान से सत्कार करना। मुँह लाल होना--क्रोध से चेहरा तमतमा जाना। मुँह सफेद होना-भय या लज्जा से चेहरे का रंग उड़ जाना। मुँह सिकोड़ना - अप्रसन्नता या असंतोष प्रकट करना। (अपना) मुँह सुजाना-असंतोष या अप्रसन्नता सूचित करने के लिए मौन हो जाना। (किसी का) मुँह सुजाना--मुँह पर बहुत थप्पड़ मारना। मुँह सुर्ख होना-क्रोध से चेहरा उदास हो जाना। मुँह सूखना--भय, लज्जा या अपमान से चेहरा उदास हो जाना।

मुँह
किसी वस्तु का ऊपरी खुला हुआ भाग।
संज्ञा
[सं. मुख]

मुँह
छेद, सूराख।
संज्ञा
[सं. मुख]

मुँह
लिहाज, मुरव्वत।
संज्ञा
[सं. मुख]
मुँह करना-लिहाज या मुरव्वत करना। मुँह देखे का-ऊपरी मन का, दिखावटी। मुँह पर जाना-लिहाज या मुरव्वत करना। मुँह मुलाहषे का - जान-पहचान का। मुँह रखना-लिहाज या मुरव्वत करना।

मुँह
योग्यता, सामर्थ्य।
संज्ञा
[सं. मुख]
(अपना) मुँह तो देखो - अपनी योग्यता या पात्रता का ध्यान तो रखो (व्यंग्य)। मुँह देखकर बात करना - योग्यता या पात्रता समझकर वैसी ही बात करना।

मुँह
हिम्मत, साहस।
संज्ञा
[सं. मुख]
मुँह पड़ना - हिम्मत या साहस होना।

मुँह
ऊपर की सतह या किनारा।
संज्ञा
[सं. मुख]
मुँह तक आना (भरना ) - लबालब भरना।

मुँह
छोटे मुँह बड़ी बात कहत (कहौ)-अपनी अवस्था, स्थिति या योग्यता को भुलाकर लंबी चौड़ी बातें करता है।
लोकोक्ति
(क) छोटे मुँह बड़ी बात कहत, अबहीं मरि जैहै-५८९। (ख) छोटे मुँह बड़ी बात कही किनि आपु सँभ रे-१०१६।

मुह अखरी
जबानी, मौखिक।
वि.
[हिं. मुँह+अक्षर]

मुँह चोर
सामने न आनेवाला।
वि.
[हिं. मुँह+चोर]

मुँदरिया, मुँदरी
उँगली में पहनने का छल्ला।
संज्ञा
[सं. मुद्रा]

मुँदरिया, मुँदरी
अँगूठी।
संज्ञा
[सं. मुद्रा]
(क) आज्ञा होइ, देउँ कर मुंदरी, कहौं संदेसौ पति कौ-९-८४। (ख) लाख मुंदरिया जाइगी कान्ह तुम्हारो मोल-११२७। (ग) हाथ पहुँची बीर कानन जरित मुंदरी भ्राजई-१० उ०-2४।

मुँदाई
बंद करवायी।
क्रि. स.
[हिं. मुँदाना]
हरि तब अपनी आँखि मुँदाई-१०-२४०।

मुँदाए
बंद कराये।
क्रि. स.
[हिं. मुँदाना]
नैंकु धीरज धरौ, जियहिं कोउ जिनि डरौ, कहा इहिं सरौ, लोचन मुँदाए-५९६।

मुंशी
लेखक।
संज्ञा
[अ.]

मुंशी
मुहर्रिर।
संज्ञा
[अ.]

मुँह
मुख का विवर।
संज्ञा
[सं. मुख]
मुँह आना - मुँह में छाले पड़ना। (१) मुँह का कच्चा - जिसकी बात का विश्वास न हो। (२) जो किसी बात को गुप्त न रखकर सबसे कह देता हो। मुँह का कड़ा - उद्दंडता पूर्वक बातें करनेवाला। मुँह किलना - मुँह से बात या बोल न निकलना ! मुँह कीलना - मुँह से बात न निकालने देना। मुँह की बात छिनना - जो बात स्वयं कहने जा रहे हों, वही दूसरे के द्वारा कही जाना। मुँह की बात छीनना - जो दूसरा कहने को हो, वहीं स्वयं कह देना। मुँह की मक्खी न उड़ा सकना - बहुत ही दुर्बल या अपाहिज होना। मुँह की मिलाना - मुँह देखी या चापलूसी की बातें करना। मुँह मिलवत (हौ) - मुँह देखी या चापलूसी की बातें करते हो। उ. - (क) मोसो तुम मुँह की मिलवत हौ भावति है वह प्यारी-१८६४। (ख) मुँह ही की हमसौं मिलवत, जिय बसत जहाँ मन मोहनि-2०१४। मुँह खराब करना - (१) स्वाद बिगाड़ना। (२) गंदी बात कहना। मुँह खराब होना - (१) स्वाद बिगइना। (२) गंदी बातें कही जाना। मुँह खुलना - (१) बोलना। (२) उद्दंडता की बात कहने का आदी होना। मुँह खुलवाना - (१) बोलने को प्रवृत्त करना। (२) कड़ी या उइंडता की बात कहने को बाध्य करना। मुँह खोलकर रह जाना - कुछ कहने को होना, पर लज्जा, संकोच या भय से न कह पाना। मुँह खोलना - (१) बोलना। (२) बुरी या उद्दंडता भरी बातें कहना ! किसी के मुँह चढ़ना - (१) कोई बात हर समय याद आ जाना। (२) किसी के प्यार-दुलार के फलस्वरूप उद्दंड हो जाना। (किसी को) मुँह चढ़ाना - (१) अत्यधिक प्यार दुलार से किसी को उद्दंड था धृष्ट करना। (२) बहुत प्रिय बनाना। मुँह चलना - (१) खाया जाना। (२) व्यर्थ की बातें या दुर्वचन कहा जाना। मुँह चलाना - (१) भोजन करना। (२) बोलना। (३) गाली देना। (४) काट लेना। मुँह चिढ़ाना - किसी की आकृति या उसके हाव-भाव की नकल बनाकर हँसी उड़ाना या उसको खिझाना। मुँह चूम कर छोड़ देना - लज्जित करके छोड़ देना। मुँह छूना - (१) ऊपरी मन से या नाम मात्र को करना। (२) दिखावटी बात करना। मुँह (कड़ुआ) जहर होना - मुँह में कड़ुआहट होना। मुँह जुठारना (जूठा करना) - बहुत ही कम खाना। मुँह जोड़ना (जोरना) - कानाफूसी करना। मुँह डालना (किसी पशु आदि का) खाने के पदार्थ को एक-दो कौर खाकर जूठा कर देना। मुँह तक आना-कहने को होना। मुँह थकना - बहुत बोलने से थक जाना। मुँह थकाना - बहुत बोलकर जबान थका देना। मुँह देना - (१) (किसी पशु आदि का) खाद्य पदार्थ को एक-दो कौर खाकर जूठा कर देना। (२) बहुत लाड़-प्यार करना। मुँह न दीजिए - बहुत लाड़ प्यार न कीजिए। उ. - कबहूँ बालक मुँह न दीजिए मुँह न दीजिए नारि-१०९९। मुँह पकड़ना - कुछ बोलने न देना। मुँह पर न रखना - जरा भी न खाना। मुँह पर बात आना - (१) कुछ कहने की इच्छा होना। (२) सामने ही या उपस्थिति में कोई प्रसंग उठना या चर्चा चलना। (३) कुछ कहना। मुँह पर मोहर करना - बोलने न देना। मुँह पर लाना - (१) वर्णन करना। (२) कहने को होना। मुँह पर हाथ रखना - बोलने न देना। मुँह पसारकर दौड़ना - कुछ पाने के लालच में आगे बढ़ना। मुँह पसारकर रह जाना - (१) बहुत चकित या हक्का-बक्का रह जाना। (२) लज्जित होकर रह जाना। मुँह पाना - लाड़-प्यार पाना, पार्श्ववर्ती और प्रिय बनना। मुँह-पेट चलना - कै दस्त होना। मुँह फटना - (१) मुँह का बहुत ज्यादा खुलना। (२) चुने आदि से मुँह कट जाना। मुँह फाड़कर कहना - बेहया बनकर कहना। मुँह फैलाना - (१) मुँह को बहुत खोलना। (२) जँम्हाई लेना। (३) अपनी ही भूल - चूक के होने पर भी निर्लज्जता से हँस देना। (४) भद्दे ढंग से हँसना। (५) अधिक प्राप्ति की इच्छा या हठ करना। मुँह फोड़कर कहना - निर्लज्ज बनाकर कहना। मुँह बंद करना - बोलने न देना। मुँह बंद कर लेना - कुछ न बोलना। मुँह बंद होना - चुप हो जाना। मुँह बाँधकर बैठना - कुछ न बोलना।

मुँह
मुँह बांधना (बाँध देना) - बोलने न देना। मुँह बाना - (१) मुँह को बहुत खोलना या फैलाना। (२) जम्हाई लेना। (३) अपनी भूल-चूक होने पर भी निर्लज्जता से हँस देना। (४) भद्दे ढंग से हँसना। (५) अधिक प्राप्ति के लिए इच्छा या हठ करना। फिरत रहत मुँह बाए-अधिकाधिक ( धन की) प्राप्ति के चक्कर में फिरता रहता है। उ. - निसि दिन फिरत रहत मुँह बाए अहमिति जनम बिगोइसि-१- ३३३। मुँह बिगड़ना - मुँह का स्वाद खराब होना। मुँह बिगाड़ना - मुँह का स्वाद खराब करना। मुँह भर आना - (१) किसी चीज को देखकर ललचा जाना। (२) जी मिचलाना। मुँह तक (भरकर) - (१) ऊपर तक, लबालब। (२) जितना जी चाहे। (३) भली भाँति। मुँह भर बोलना - प्यार - सम्मान से बात करना। मुँह भरना - (१) खिलाना। (२) रिश्वत देना। (३) बोलने से रोकना। मुँह मारना - (१) खाने की चीज में मुँह लगाकर जूठा कर देना। (२) दाँत से काट लेना। (किसी का) मुँह मारना - (१) बोलने न देना। (२) रिश्वत देना। (३) बढ़कर होना। मुँह मीठा करना - (१) मिठाई खिलाना। (२) कुछ देकर प्रसन्न होना। मुँह मीठा होना - (१) खाने को मिठाई मिलना। (२) लाभ या प्राप्ति होना। (३) मँगनी होना। (बात) मुँह में आना - कहने की इच्छा होना। मुँह में खून या लहू लगना - चाट या चस्का पड़ना। मुँह में जबान होना - कहने में समर्थ होना, कहने का साहस होना। मुँह में तिनका दबाना (लेना) - बहुत दीनता से बोलना। मुँह में पड़ना - खाने को मिलना। (बात का) मुँह में पड़ना - मुँह से कुछ कहा जाना। मुँह में पानी भर आना - (१) कोई आकर्षक, स्वादिष्ट था अच्छी पोज देखकर उसको पाने के लिए बहुत ललचाना। (२) ईर्ष्या होना। मुँह में बात करना ( कहना या बोलना ) - इतना धीरे बोलना कि किसी को सुनायी न देना। मुँह में लगाम देना - समझ-बूझकर बोलना। मुँह में लगाम न होना - बिना सोचे-समझे जो मुँह में आये कह डालना। मुँह लगाना - खाना, चखना। मुँह सँभालना - (१) सोच समझकर मुँह से बात निकालना। (२) गाली-गलौच न करना। मुँह सीना-बिलकुल चुप रहना। मुँह सूखना - बहुत प्यास लगना। मुँह से दूध की बू आना (टपकना) - वयस्क का बालक-जैसा अनजान बनना। मुँह से निकालना- कहना। मुँह से फूटना--कहना (व्यंग्य या खिझलाहट)। मुँह से फूल झड़ना--(१) सुंदर और प्रिय बातें करना। (२) असुंदर और अप्रिय बात कहना ( व्यंग्य या खिझलाहट )। मुँह से बाते छीनन--जो दूसरा कहने जा रहा हो, वह स्वयं कह देना। मुँह से बात न निघालना--लपजा, क्रोध या अय से कुछ बोल न सकना। मुँह से भाप (तक) न निकलना-भय के मारे चूँ तक न कर सकना। मुँह से लार गिरना (चूना, टपकना, बहना) --कोई सुंदर, स्वादिष्ट या आकर्षक वस्तु देखकर उसे पाने को बहुत लालायित होना। मुँह से लाल उगलना---(१) त्रिय और रुचिकर बात कहना। (२) अप्रिय और अरुचिकर बात कहना (व्यंग्य या खिझलाहट)।

मुँह
चेहरा, मुखमंडल।
संज्ञा
[सं. मुख]
अपना सा मुँह लेकर रह जाना - लज्जित होकर चुपं या निश्चेष्ट हो जाना। इतना सा मुँह निकल आना - (१) बहुत सुस्त होना। (२) हानि, दुख, लज्जा आदि के कारण बहुत उदास होना। मुँह अँधेरे - बहुत सबेरे। (किसी के) मुँह आना - किसी से तर्क कुतर्क या गाली - गलौज करना। मुँह उजला होना - बात या इज्जत बनी रह जाना। मुँह उजाले (उठे) - बहुत सवेरे। मुँह उठना - किसी ओर चलने की इच्छा होना। मुँह उठाये चले जाना - बेधड़क चले जाना। मुँह उठाकर कहना - बिना सोचे - समझे बक देना। मुँह उतरना - (१) दुर्बलता या रोग से चेहरा सुस्त होना। (२) हानि या दुख से उदास हो जाना। (अपना) मुँह काला करना- अपनी बदनामी करना। (दूसरे का) मुँह काला करना - उपदेश दे कर त्यागना। मुँह की खाना - (१) दुर्दशा या बेइज्जती कराना। (२) मुँहतोड़ उत्तर सुनना। (३) लज्जित या शर्मिंदा होना। (४) धोखा खाना। (५) बुरी तरह पराजित होना। मुँह के बल गिरना - ठोकर खाना, आघात सहना।

मुँह
मुँह खोलना - घूँघट या परदा हटाना। मुँह चढ़ाना - आकृति से अप्रसन्नता या असंतोष प्रकट करना। मुँह चाटना - खुशामद या चापलूसी करना। मुँह छिपाना - लज्जा के कारण किसी के सामने न आना। मुँह झटक जाना - रोग या दुर्बलता से चेहरा सुस्त होना। मुँह झुलसना - लपट या लू आदि से चेहरा बहुत मलिन हो जाना। मुँह झुलसाना - (१) लपट या आग से चेहरा फूँकना (गाली)। (२) शव का दाह-कर्म करना। (३) कुछ ले देकर झगड़ालू व्यक्ति से पीछा छुड़ाना। (अपना) मुँह टेढ़ा करना - अप्रसन्नता या असंतोष का भाव चेहरे पर लाना। ( दूसरे का ) मुँह टेढ़ा करना - (१) बहुत मारना - पीटना। (२) कटु बात कहना या उत्तर देना। मुँह ढाँकना - किसी संबंधी के मरने पर शोक करना। (किसी का ) मुँह ताकना - (१) एकटक देखना। (२) कुछ पाने की आशा से देखना आश्रित था सहारे होना। (३) विवशता से देखना। (४) चकित होकर देखना। मुँह ताकना - काम-काज छोड़ कर चुपचाप बैठा रहना। मुँह तोड़कर जवाब देना - कटु या चुभती हुई बात कहना। मुँह तोड़ना - (१) बहुत मारना-पीटना। (२) कटु या चुभती हुई बात कहना। मुँह थुथाना - अप्रसन्न या असंतुष्ट होकर किसी से न बोलना। मुँह दिखाना - सामने आना। मुँह देखकर उठना - सोकर उठते ही किसी का दर्शन पाना। मुँह देखकर बात कहना - खुशामद करना। (किसी का) मुँह देखना - (१) किसी के सामने जाना। (२) चकित होकर देखना। (किसी का) मुँह देखकर - (१) किसी के सहारे या बल - बूते पर। (२) किसी को प्रसन्न या संतुष्ट करने के उद्देश्य से। मुँह धो रखना - प्राप्ति के संबंध में कोई आशा न रखना (व्यंग्य)। मुँह न देखना - घृणा या क्रोध के कारण कभी न मिलना-जुलना। मुँह न फेरना (मोड़ना) - (१) बढ़ता के सामने डटे रहना। (२) अस्वीकार न करना। (इतना सा) मुँह निकल आना - (१) रोग या दुर्बलता से चेहरा सुस्त हो जाना। (२) हानि, दुख या अपमान से उदास हो जाना। मुँह पर - सामने ही। मुँह पर चढना-सामना या मुकाबला करना। मुँह पर थूकना-बहुत अपमानित और लज्जित करना। मुँह पर नाक न होना-बहुत निर्लज्ज होना। मुँह पर पानी फिर जाना-(१) चेहरे पर रौनक या तेज आ जाना। (२) प्रसन्नता या संतोष का भाव प्रकट होना। मुँह पर फेंकना ( फेंक मारना)-बहुत अप्रसन्न या असंतुष्ट होकर कोई चीज देना। मुँह पर से बरसना ---आकृति से जान पड़ना या प्रकट होना। मुँह पर बसंत खिलना ( फूलना)-(१) चेहरा पीला पड़ जाना। (२) भयभीत या उदास हो जाना। मुँह पर मारना (मार देना)-बहत असंतुष्ट या अप्रसन्न होकर कोई चीज देना। मुँह दर मुँह -- आमने-सामने। मुँह पर मुरदनी छाना (फिरना)-(१) चेहरा पीला पड़ जाना। (२) भयभीत, लज्जित या उदास होना। (३) अंत समय निकट होना। मुँह पर हवाई उड़ना (छूटना)-भय, लज्जा या अपमान से चेहरा बहुत उदास हो जाना। (किसी का ) मुँह पाना-किसी को अपने अनुकूल समझना, सम्मान और प्रेम का व्यवहार पाना। मुँह पाइ - लाड़-प्यार और सम्मान पाकर, अनुकूल समझकर। उ.--नेक ही मुँह पाइ फूला अति गई इतराइ--२६८०। मुँह पावति - सम्मान और प्रेम का व्यवहार पाती है, अनुकूल समझती है। उ.--मुँह पावति तब ही लौं आवति और लावति मोहिं--७२३। मुँह पीट लेना-बहुत अधिक क्रोध, दुख, पराजय या असफलता की स्थिति में होना। मुँह फक होना--भय या आशंका से चेहरा बहुत उदास हो जाना। मुँह फिरना (फिर जाना)---सामने से हट या भाग जाना। मुँह फुलाकर बैठना (फुलाना) - असंतोष या अप्रसन्न होकर चुप बैठना। मुँह फूँकना-(१) मुँह में आग लगाना (गाली)। (२) शव का दाह-कर्म करना। (३) किसी झगड़ालू को कुछ ले देकर हटाना। मुँह फूलना - असन्नता या असंतोष होना। (किसी का) मुँह फेरना-पराजित कर देना। (अपना) मुँह फेरना-(१) उपेक्षा करना। (२) किसी की ओर से ध्यान हटा लेना। मुँह बन जाना (बनना)-चेहरे से असंतोष या अप्रसन्नता प्रकट होना।

मुँहछुआई
ऊपर मन से या केवल नाम को कुछ कहना।
संज्ञा
[हिं. मुँह+छूना]

मुँहछुट
जो मन में आ जाय वही बेसमझे-बूझे कह डालने वाला।
वि.
[हिं. मुँह+छूटना]

मुँहजोर
बकवादी।
वि.
[हिं. मुँह + जोर]

मुँहजोर
मुँहफट।
वि.
[हिं. मुँह + जोर]

मुँहजोर
शीघ्र ही वश में न आनेवाला, उद्दंड।
वि.
[हिं. मुँह + जोर]

मुँहजोरी
मुँहजोर' होने का भाव।
वि.
[हिं. मुँहजोर]

मुँहदिखराई, मुँहदिखरावनी,मुँहदिखाई,मुँहदेखनी, मुँहदेखरावनी
नयी वधू का मुँह देखने की क्रिया, भाव या उसके फलस्वरूप दिया जानेवाला धन।
संज्ञा
[हिं. मुँह+दिखाई]

मुँहदेखा
जो हृदय से न हो, दिखावटी, ऊपरी भाव का।
वि.
[हिं. मुँह+देखना]

मुँहपड़ा
प्रसिद्ध।
वि.
[हिं. मुँह+पड़ना]

मुँहफट
बेसमझे-बूझे जो भी मन में आ जाय, कह देनेवाला।
वि.
[हिं. मुँह+ फटना]

मुँहबोला
जिससे रक्त का नहीं, केवल वचन या बात का संबंध हो।
वि.
[हिं. मुँह+बोलना]

मुँहभराई
मुँह भरने की क्रिया, भाव या पारिश्रमिक।
संज्ञा
[हिं. मुँह+भरना]

मुँहभराई
रिश्वत, घूस।
संज्ञा
[हिं. मुँह+भरना]

मुँहमाँगा
मनचाहा।
वि.
[हिं. मुँह + माँगना]

मुँहमाँगे
इच्छा के अनुकूल।
वि.
[हिं. मुँहमाँगा]
तो देखत बलि खाइगो, मुँहमाँगे फल देइ-९०८।

मुँहमाग्यो, मुँहमाग्यौ
मनचाहा, इच्छानुकूल।
वि.
[हिं. मुँहमाँगा]
( क ) जो तुम मुँहमाँग्यौ फल पावहु-१०१६। (ख ) आजु हरि पायौ है मुँह माग्यो-१९७२।

मुँहा-चाही
देखा-देखी।
संज्ञा
[हिं. मुँह+चाहना]

मुँहामुँह
लबालब, भरपूर।
क्रि. वि.
[हिं. मुँह+ मुँह]

मुँहासा
मुँह पर युवावस्था में निकलनेवाली फुंसियाँ।
संज्ञा
[हिं. मुँह+आसा]

मुअना, मुअनो
मरना, मृत होना।
क्रि. अ.
[हिं. मरना]

बारहों
मृत्यु से बारहवाँ दिन।
संज्ञा
[हिं. बारह]

बारा
जो सयाना न हो, छोटा।
वि.
[सं. बाल]

बारा
बालक, लड़का।
संज्ञा

बारा
काल, समय।
संज्ञा
[सं. बार]

बारा
देर, विलंब।
संज्ञा
[सं. बार]
अबहीं और की और होत कछु लागै बारा।

बारा
बार, दफा, मरतबा।
संज्ञा
[सं. बार]
यहि ब्रज जन्म लियौ कै बारा-१०७०।

बारात
वरयात्रा।
संज्ञा
[सं . वरयात्रा, प्रा. बरयत्ता]

बारात
सजे-धजे समाज की बाजे-गाजे के साथ यात्रा।
संज्ञा
[सं . वरयात्रा, प्रा. बरयत्ता]

बारादरी
बैठक जिसमें बारह दर या खंभे हों।
संज्ञा
[हिं. बारहदरी]

बारानसि, बारानसी
काशी का प्राचीन नाम जो वरुणा और असी नदियों के कारण अथवा 'पवित्र जल वाली' (वर+अनस् +जल) होने के कारण पड़ा था। 'उत्तम रथों वाली' होना भी इस नाम के पड़ने का कारण माना जाता है। 'बनारस' के स्थान पर 'काशी' का उक्त प्राचीन नाम पुनः प्रचलित हो गया है।
संज्ञा
[सं. वाराणसी]
बन बारानसि मुक्तिछेत्र है, चलि तोकौं दिखराऊँ-१- ३४०।

मुई
नष्ट हो गयी, रह न गयी।
क्रि. अ.
[हिं. मुअना]
हरि-दरसन की साध मुई.-१४३३।

मुए
मर गये।
क्रि. अ.
[हिं. मुअना]
(क) बूड़ि मुए, कै कहुँ उठि गए.-१-२८४। (ख) अर्जुन कहयौ, सबै लरि मुए-१-२८८।

मुऐं
मरने (पर), मर जाने (से)।
क्रि. अ.
[हिं. मुअना]
उनके मुऐं हिऐं सुख होइ-१-२८९।

मुकट
मुकुट।
संज्ञा
[सं. मुकुट]

मुकटा
रेशमी धोती।
संज्ञा
[देश.]

मुकतई
मुक्ति, मोक्ष।
संज्ञा
[सं. मुक्त]

मुकतई
छुटकारा।
संज्ञा
[सं. मुक्त]

मुकता
मोती।
संज्ञा
[सं. मुक्ता]

मुकता
बहुत, अधिक, पर्याप्त।
वि.
[हिं. अ+मुकना]

मुकताइ, मुकताई
मुक्त होने का भाव।
संज्ञा
[सं. मुक्ति]

मुकताइ, मुकताई
मुक्ति पाने की पात्रता।
संज्ञा
[सं. मुक्ति]

मुकताफल, मुकताहल
मोती।
संज्ञा
[सं. मुक्ताफल]
सूरदास मुकताहल भोगी हंस ज्वारि को चुनही-३०१३।

मुकति
मुक्ति, मोक्ष।
संज्ञा
[सं. मुक्ति]

मुकति
छुटकारा।
संज्ञा
[सं. मुक्ति]

मुकदमा
अभियोग।
संज्ञा
[अ. मुकदमा]

मुकना, मुकनो
हाथीजिसके दाँत न हों।
संज्ञा
[हिं. मकना]

मुकना, मुकनो
पुरुष जिसके मूँछ न हो।
संज्ञा
[हिं. मकना]

मुकना, मुकनो
मुक्त होना।
क्रि. अ.
[सं. मुक्त]

मुकरना
कही हुई बात या काम से हट जाना, नटना।
क्रि. अ.
[सं. मा= न, नहीं+करना]

मुकरना
कुछ कहकर मुकर जान्नेवाला।
वि.

मुकरनी
मुकरने या नटने की क्रिया।
संज्ञा
[हिं. मुकरना]

मुकरनी
चार चरणों की एक कविता जिसके तीन चरणों का आशय दो जगह घट सकता है और चौथे चरण में किसी अन्य आशय को सूचित करके या अन्य पदार्थ का नाम लेकर, कही हुई बात से जैसे 'मुकरा' जाता है।
संज्ञा
[हिं. मुकरना]

मुकरनो
कही हुई बात या काम से हट जाना।
क्रि. अ.
[हिं. मुकरना]

मुकरनो
कुछ कहकर मुकर जानेवाला।
वि.

मुकरवा
कहकर मुकर या नट जाने वाला।
वि.
[हिं. मुकरना]
लोभी, लौंद, मुकरवा, झगरू, बड़ी पढ़ैलौ, लूटा-१-१८६।

मुकराए
मुक्त करवा दिया।
क्रि. स.
[हिं. मुकराना]
(क) हमैं नंदनंदन मोल लिए। जम के फंद काटि मुकराए, अभय अजाद किए.-१-१७१। (ख) अस्वत्थामा कौं गहि ल्याए। द्रौपदि, सीस मूँड़ि मुकराए-१-२८९।

मुकराना, मुकरानो
मुकरने को प्रवृत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. मुकरना]

मुकराना, मुकरानो
मुक्त करना।
क्रि. स.
[सं. मुक्त + हिं. करना]

मुकरायो, मुकरायौ
मुक्त कराया, छुटकारा दिलाया।
क्रि. स.
[हिं. मुकराना = मुक्त करना]
(क) ग्राह गहे गजपति मुकरायौ, हाथ चक्र ले धायो-१-१०। (ख) बरुन पास अजपति मुकरायो-१-१७।

मुकरावन
मुक्त कराने वाले।
वि.
[हिं. मुकराना - मुक्त कराना]
गजहित धावन, जन-सुकरावन, बेद बिमल जस गावत-८-४।

मुकरि, मुकरी
चार चरण की एक कविता जिसके प्रथम तीन चरणों के दो आशय होते हैं और चौथे चरण में एक का नाम लेकर दूसरे से जैसे मुकरा जाता है।
संज्ञा
[हिं. मुकरना, मुकरी]

मुकर्रर
निश्चित।
वि.
[अ. मुकर्रर]

मुकर्रर
नियक्त।
वि.
[अ. मुकर्रर]

मुकलाना, मुकलानो
खोलना।
क्रि. स.
[सं. मुक्त या मुकलित ?]

मुकलाना, मुकलानो
छोड़ना।
क्रि. स.
[सं. मुक्त या मुकलित ?]

मुकाना, मुकानो
मुक्त कराना, छुड़ाना।
क्रि. स.
[सं. मुक्त]

मुकाना, मुकानो
समाप्त या खत्म कराना।
क्रि. स.
[सं. मुक्त]

मुकाना, मुकानो
छूटना।
क्रि. अ.

मुकलाना, मुकलानो
समाप्त होना।
क्रि. अ.

मुकाबला
मुठभेड़।
संज्ञा
[अ. मुक़ाबला]

मुकाबला
बराबरी।
संज्ञा
[अ. मुक़ाबला]

मुकाबला
तुलना।
संज्ञा
[अ. मुक़ाबला]

मुकाबला
मिलान।
संज्ञा
[अ. मुक़ाबला]

मुकाबला
लड़ाई।
संज्ञा
[अ. मुक़ाबला]

मुकाम
पड़ाव।
संज्ञा
[अ. मुकाम]

मुकाम
ठहरना।
संज्ञा
[अ. मुकाम]

मुकित
स्वतंत्र, मुक्त।
वि.
[सं. मुक्त]

मुकियाना, मुकियानो
हलके हल्के मुक्के या घूँसे लगाकर शरीर के अंगों की शिथिलता दूर करना।
क्रि. स.
[हिं. मुक्की+इयाना]

मुकियाना, मुकियानो
आटा गूँधकर मुक्कियों से दबाना।
क्रि. स.
[हिं. मुक्की+इयाना]

मुकियाना, मुकियानो
घूँसे मारना।
क्रि. स.
[हिं. मुक्की+इयाना]

मुकुलित
खिला हुआ।
वि.
[सं.]

मुकुलित
कुछ कुछ खुलता हुआ।
वि.
[सं.]
मुकुलित कुसुम नैन निद्रा तजि रूप-सुधा सियराइ-2८११।

मुकुलित
भपकता हुआ (नेत्र)।
वि.
[सं.]

मुकुलित
बिखरा या खुला हुआ।
वि.
[सं.]
(क) मुकुलित कच तन घन कि ओट ह्वै अँसुबन चीर निचोवति-१८००। (ख) मुकुलित केस सुदेस देखिअत नील बसन लपटाए-१० उ०-३८।

मुकुलित
खिलती या बढ़ती हुई (आयु)।
वि.
[सं.]
मुकुलित वय नव किसोर-2३६२।

मुकुली
जिसमें कलियाँ आयी हों।
वि.
[सं. मुकुलिन्]

मुकुले
खिले, विकसित हुए।
क्रि. अ.
[हिं. मुकुलना]
मुकुले कमल-१६०८।

मुकेरना, मुकेरनो
नियंत्रण में रखना।
क्रि. स.
[देश.]

मुकेरैं
रोके, नियंत्रित किये।
क्रि. स.
[हिं. मुकेरना]
मन बस होत नाहिंनैं मेरौं। ....। कहा करौं यह चरयौ बहुत दिन अंकुस बिना मुकेरैं-१-२०६।

मुक्का
घूँसा।
संज्ञा
[सं. मुष्टिका]
मुक्का (सा) लगना - हृदय पर किसी-अप्रिय बात या कार्य का आघात लगना।

मुकुता
राधा की एक सखी का नाम।
संज्ञा
कहि राधा किन हार चोरायो।...। अमला अबला कंजा मुकुता हीरा नीला प्यारी-१५८०।

मुकुति
मुक्‌ति, मोक्ष।
संज्ञा
[सं. मुक्ति]

मुकुति
छुटकारा।
संज्ञा
[सं. मुक्ति]

मुकुर
आइना, दर्पण।
संज्ञा
[सं.]

मुकुल
कली।
संज्ञा
[सं.]

मुकुलना, मुकुलनो, मुकुलाना, मुकुलानो
(कली का ) खिलना।
क्रि. अ.
[हिं, मुकुल]

मुकुलना, मुकुलनो, मुकुलाना, मुकुलानो
बिखरना, छितरना।
क्रि. अ.
[हिं, मुकुल]

मुकुलित
खिलता है।
क्रि. अ.
[हिं. मुकुलना]

मुकुलित
मुकुलित भए-खिल गये।
प्र.
मुकुलित भए कमल-जाल-६१९।

मुकुलित
जिसमें कलियाँ आयी हों।
वि.
[सं.]

मुकुंद
मुक्तिदाता विष्णु।
संज्ञा
[सं.]
सूरदास प्रभु सब सुख-दाता दीनानाथ मुकुंद मुरारी-१-२२।

मुकुंद
मुक्‍‌‍ति देनेवाले।
वि.

मुकु
मुक्ति।
संज्ञा
[सं.]

मुकु
छुटकारा।
संज्ञा
[सं.]

मुकुट
राजाओं का शिरोभूषण।
संज्ञा
[सं.]
(क) कुंडल-मुकुट प्रभा न्यारी-१-६९। (ख) मुकुट कुंडल पीत पट छबि अनुज भ्राता स्याम-2५६५।

मुकुटी
जो मुकुट पहने हो।
वि.
[सं. मुकुटिन्]

मुकुटेश्वर
एक शिवलिंग।
संज्ञा
[सं.]

मुकुटेश्वर
एक तीर्थ।
संज्ञा
[सं.]

मुकुता
स्वतंत्र, मुक्त।
वि
[सं. मुक्त]

मुकुता
मोती।
संज्ञा
[सं. मुक्ता]
निरखि कोमल चारु मूरति हृदय मुकुता दाम-2५६५।

मुक्की
घूँसा।
संज्ञा
[हिं. मुक्का]

मुक्की
गूँधे हुए आटे को मुटि‌ठयों से दबाना।
संज्ञा
[हिं. मुक्का]

मुक्त
जिसे मुक्ति या मोक्ष मिल गयी हो।
वि.
[सं.]

मुक्त
बंधन से छूटा हुआ।
वि.
[सं.]
मागध हत्यौ मुक्त नृप कीन्है-१-१७।

मुक्त
मोती।
संज्ञा
[सं. मुक्ता]
कोटि मुक्त वारौं मुसुकनि पर-३१५४।

मुक्तकंठ
चिल्लाकर बोलनेवाला।
वि.
[सं.]

मुक्तकंठ
निसंकोच कहनेवाला।
वि.
[सं.]

मुक्तकंठ
शुद्ध हृदय से कहनेवाला।
वि.
[सं.]

मुक्तक
एक अस्त्र।
संज्ञा
[सं.]

मुक्तक
स्फुट या उद्भट काव्य जो प्रसंग से पूर्ण हो।
संज्ञा
[सं.]

मुक्तता
मुक्त होने का भाव।
संज्ञा
[सं.]

मुक्तहस्त
खुले हाथ से देनेवाला, बहुत उदार और बड़ा दानी।
वि.
[सं.]

मुक्ता
मोती।
संज्ञा
[सं.]

मुक्ताहल
मोती।
संज्ञा
[सं.]

मुक्तामाल, मुक्तामाला
मोती को माला।
संज्ञा
[सं. मुक्ता+माला]
कंठ मुक्तामाल-१-३०७।

मुक्तावन
मुक्त करनेवाले।
वि.
[सं. मुक्त]
भक्त हेत देह धरन, पुहुमी कौ भार हरन जनम जनम मुक्तावन-१०-२५१।

मुक्तावलि, मुक्तावली
मोती की माला।
संज्ञा
[सं. मुक्‌ता+अवलि]
कंचन मुकुट कंठ मुक्तावलि मोर पंख छवि छावै-१५४९।

मुक्ताहल
मोती।
संज्ञा
[सं. मुक्ताफल]
मूरी के पातन के बदले को मुक्ताहल दैहै-३१०५।

मुक्ति
बंधन आदि से छूटने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[सं.]

मुक्ति
दायित्व आदि से छुटने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[सं.]

बारहमासा
वह गीत जिसमें बारह महीनों की दशा, स्थिति आदि का वर्णन हो।
संज्ञा
[हिं. बारह+मास]

बारहमासी
जो बारहों महीनों फूलता-फलता हो।
वि.
[हिं. बारह+मास]

बारहमासी
बारहों महीने चलता रहने या होनेवाला।
वि.
[हिं. बारह+मास]
कुबिजा कमलनैन मिलि खेलत बारहमासी फाग-३०९५।

बारहवाँ
गिनती में ११ के बादवाला।
वि.
[हिं. बारह]

बारहसिंगा
एक पशु।
संज्ञा
[हिं. बारह + सींग]

बारहीं
जन्म से बारहवाँ दिन।
संज्ञा
[हिं. बारह]

बारहीं
मृत्यु से बारहवाँ दिन।
संज्ञा
[हिं. बारह]

बारहाँ
वीर, बहादुर।
वि.
[देश.]

बारहा
कई बार।
क्रि. वि.
[फा.]

बारहों
जन्म से बारहवाँ दिन।
संज्ञा
[हिं. बारह]

मुक्ति
जन्म-मरण से छूटने का भाव, मोक्ष।
संज्ञा
[सं.]
अद्भुत राम-नाम के अंक। धर्म-अँकुर के पावन द्वै दल मुक्ति-नधू ताटंक-१-९०।

मुक्तिक्षेत्र, मुक्तिछेत्र
काशी, वाराणसी।
संज्ञा
[सं. मुक्तिक्षेत्र]

मुक्तिक्षेत्र, मुक्तिछेत्र
जहाँ मुक्ति प्राप्त हो सके।
वि.
बन बारानसि मुक्तिक्षेत्र है-१-३४०।

मुक्तेश्वर
एक शिवलिंग।
संज्ञा
[सं.]

मुख
मुँह, आनन।
संज्ञा
[सं.]
अपने ही मुख बड़े कहाना - अपनी प्रशंसा स्वयं करना। अपने ही मुख बड़े कहावत - अपनी बड़ाई आप ही करते हो, अपने मुँह ही मियाँ मिट्‍ठू बनते हो। उ. - अपने ही मुख बड़े कहावत हमहूँ जानति तुमकौं-2४९५। जीवत मुख चितए - मुख देखकर ही जीवित रहता है। उ. - चिरंजीव रहौ सूर नंद-सुत जीवत-मुख चितए-३१४१। मुख जोना - आश्रित या सहारे होना। विषयिनि के मुख जोए - विलास-वासना में ही लिप्त रहा। उ. - तिलक बनाइ चले स्वामी ह्वै विषयिनि के मुख जोए-१- ५२। मुख जोवै - मुँह ताकता है। उ. - समुझि समुझि गृह आरति अपनी धर्मपुत्र मुख जोवै-१- २५९। (किसी के) मुख न समाना - रोक न पाना, किसी का मुख बंद न कर पाना। काहू मुख न समाउँ - किसी का मुख बंद नहीं कर पाती। उ. - सुनि न जात घर घर को घेरा काहू मुख न समाउँ-१२२२। मुख मोड़ना (मोरना) - मुँह फेर लेना, पूर्व संबंध की जरा भी परवाह न करके बिलकुल ध्यान हटा लेना। मोरि रहै मुख-मुख मोड़ लेती है, पूर्व संबंध को बिलकुल भुलाकर सर्वथा उपेक्षा करती है। उ. - चलत न कोऊ संग चलै, मोरि रहै मुख नारि-2- २९। मोरि मुख - संबंध को सर्वथा भुलाकर, उपेक्षा करके। उ. - चलत रही चित चोरि, मोरि मुख, एक न पग पहुँचायौ-2- ३०। अब न बनै मुख मोरै - अब उपेक्षा नहीं कर सकते. अब उपेक्षा करने से काम नहीं बन सकता। उ. - जुग-जुग बिरद यहै चलि आयौ, सत्य कहत अब हो रे। सूरदास प्रभु पछिले खेवा अब न बनै मुख मोरे-४८८। मुख सँभाल कर बोलना - परिस्थिति और व्यक्ति देखकर उचित बात करना। मुख सँभारि बोलत नहिं बात - परिस्थिति और व्यक्ति देखकर उचित बात नहीं करती, मर्यादा और शिष्टाचार का ध्यान रखकर नहीं बोलती। उ. - ये सब ढीठ गरब गौरस कैं, मुख सँभारि बोलति नहिं बात-१०- ३०८।

मुख
द्वार, दरवाजा।
संज्ञा
[सं.]

मुख
द्वार, दरवाजा।
संज्ञा
[सं.]

मुख
नाटक की एक संधि।
संज्ञा
[सं.]

मुख
आदि, आरंभ।
संज्ञा
[सं.]

मुख
किसी वस्तु के आगे या पहले भानेवाली वस्तु।
संज्ञा
[सं.]

मुखरित
बोलती या बजती हुई।
वि.
[सं. मुखर]
कटि पट पीत मेखला मुखरित, पाइनि नूपुर सोहै-४५१।

मुखरित
मुखरित है-(स्वर) निकलता है, बोलता है।
प्र.
मनु मधुकर बैठ्यौ अंबुज पर मुखरित है सुर भीनौ-सारा० १०५५।

मुखवासिनी
सरस्वती।
संज्ञा
[सं.]

मुखस्थ
जो कंठ हो, कंठस्थ।
वि
[सं.]

मुखाग्र
कंठ हो, कंठस्थ।
वि.
[सं.]

मुखापैक्षी
दूसरों के सहारे या आश्रित रहनेवाला, पराश्रित।
वि.
[सं. मुखापेक्षिन्‌]

मुखारी
मुख-शुद्धि के लिए दतौन आदि करने की क्रिया।
संज्ञा
[सं. मुख]
(क) दतवनि लै दोउनि करी मुखारी-४०७। (ख) करी मुखारी अतुरई-१५४०।

मुखिया
नेता, प्रधान, अगुआ।
संज्ञा
[सं. मुख्य+इया]

मुखिया
बल्लभ-संप्रदायी मंदिरों में पूजन करने और भोग लगानेवाला व्यक्ति।
संज्ञा
[सं. मुख्य+इया]

मुख्य
प्रधान, श्रेष्ठ।
वि.
[सं.]

मुख्यता
प्रधानता, श्रेष्ठता।
संज्ञा
[सं.]

मुगदर, मुग्दर
लकड़ी की 'जोड़ी' जिसे घुमाकर व्यायाम किया जाता है।
संज्ञा
[सं. मुग्दर]

मुगध
मोह या भ्रम में पड़ा हुआ।
वि.
[सं. सुग्ध]

मुगध
आसक्त, मोहित।
वि.
[सं. सुग्ध]
वै किसोर कमनीय मुगध मैं लुबधत हूँ न डरी-१४५०।

मुगल
मुसलमानों का एक वर्ग।
संज्ञा
[फ़ा. मुगल]

मुगलई, मुगलाई
मुगल-जैसा।
वि.
[हिं. मुगल]

मुगलानी
मुगल स्त्री।
संज्ञा
[हिं. मुगल]

मुगुध
मोह या भ्रम में पड़ा हुआ, मूढ़।
वि.
[सं.]
सुनु री ग्‍वारि मुगुध गँवारि-११९१।

मुग्धम
जो (बात) धीरे या संकेत से कही जाय, जो (काम) कम खर्चे में चुपचाप कर लिया जाय।
वि.
[देश.]

मुग्ध
भ्रम या मोह में पड़ा हुआ, मूढ़।
वि.
[सं.]
(क) मूरख मुग्ध अजान मूढ़मति नाहीं कोऊ तेरौ-१-३१९। (ख) ऐसे प्रिय सौ मान करति है तो सौ मुग्ध न दूजी-2२७५।

मुख
मुख्य, प्रधान।
वि.

मुखड़ा
मुख, आनन।
संज्ञा
[सं. मुख+हिं. ड़ा]

मुखपट
घूँघट, अवगुंठन।
संज्ञा
[सं.]

मुखबंध, मुखबंधन
ग्रंथ की भूमिका।
संज्ञा
[सं.]

मुखभूषण, मुखभूषन
पान।
संज्ञा
[सं. मुखभूषण]

मुखमाँगा, मुखमाँगो
जो माँगा गया हो, इच्छित, अभीष्ट।
वि.
[सं. सुख+हिं. माँगना]
मुखमाँगो पैहौ सूरज प्रभु साहुहिं आनि दिखावहु-३३४०।

मुखर
अप्रिय या कटु भाषी।
वि.
[सं.]

मुखर
बोलनेवाला, बोलता हुआ।
वि.
[सं.]

मुखरना, मुखरनो
बोलना।
क्रि. स.
[सं. मुखर]

मुखरा
मुख, आनन।
संज्ञा
[हिं. मुखड़ा]

मुग्ध
सुंदर।
वि.
[सं.]

मुग्ध
नया।

मुग्ध
आसक्त, मोहित।

मुग्धकर
मुग्ध करनेवाला, मोहक।
वि.
[सं.]

मुग्धता
मूढ़ता।
संज्ञा
[सं.]

मग्धता
सुंदरता।
संज्ञा
[सं.]

मग्धता
मोहित या आसक्त होने का भाव।
संज्ञा
[सं.]

मुग्धा
नायिका जो युवती तो हो पर जिसमें काम-चेष्टा न हो।
संज्ञा
[सं.]

मुचकुन्द, मुचुकुन्द
मांधाता का पुत्र जो देवताओं से गहरी निद्रा का वर माँगकर बहुत समय तक एक गुफा में सोता रहा। जब श्री कृष्ण का पीछा करता हुआ, जरासंध का सहायक कालयवन वहाँ आया, तब श्रीकृष्ण उसे अपना पीताम्बर उढ़ाकर चले गये। कालयवन ने सोते हुए मुचुकुंद को श्री कृष्ण समझ कर लात मारी। निद्रा से इस प्रकार जगाये जाने से क्रुद्ध होकर मुचुकुंद ने इस प्रकार कालयवन को देखा कि वह वहीं भस्म हो गया। उ.-कालजवन मुचुकुंदर्हि सौं हरि भसम करायौ-ना. ४९८१।
संज्ञा
[सं. मुचुकुंद]

मुचना, मुचनो
मुक्त होना।
क्रि. स.
[सं. मोचन]

मुचना, मुचनो
अंग में मोच आना।
क्रि. अ.
[हिं. मोच]

मुचाई
(आँख) बंद करवायी।
क्रि. स.
[हिं. मूँदना]

मुचाई
(आँख) मुँदाने की क्रिया।
संज्ञा

मुचाई
आँखि मुचाई-आँख मूँदने का खेल, आँख मिचौनी।
यौ.
इहँ हरि खेलत आँख मुचाई-३४०९।

मुछन्दर
बड़ी बड़ी मूँछोंवाला।
वि.
[हिं. मूँछ]

मुजरा
धन जो किसी धनराशि से काट लिया गया हो।
संज्ञा
[अ.]

मुजरा
बड़े को किया गया अभिवादन।
संज्ञा
[अ.]

मुजरा
वेश्या का गान जिसमें वह नृत्य न करे।
संज्ञा
[अ.]

मुजरिम
अभियुक्त, अपराधी।
संज्ञा
[अ.]

मुझ
'मैं' का रूप जो कर्ता और संबंध के अतिरिक्त अन्य कारकों में विभक्ति लगाने के पूर्व दिया जाता है।
सर्व.
[हिं. मुझे]

मुझे
'मैं' का वह रूप जो उसे कर्म और संप्रदान कारकों में प्राप्त होता है।
सर्व
[सं. मह्यम, प्रा. मज्झम]

मुटका
एक तरह की रेशमी धोती।
संज्ञा
[हिं. मोटा]

मुटका
मोटा-ताजा।
वि
[हिं. मोटा]

मुटाई
मोटापन।
संज्ञा
[हिं. मोटा+ई]

मुटाई
घमंड, अहंकार।
संज्ञा
[हिं. मोटा+ई]
मुटाई चढ़ना - धन आदि का घमंड होना। मुटाई झाड़ना - घमंड चूर करना।

मुटाना, मुटानो
मोटा या स्थूल होना।
क्रि. अ.
[हिं. मोटा+आना]

मुटाना, मुटानो
घमंडी होना।
क्रि. अ.
[हिं. मोटा+आना]

मुटिया
बोझा ढोनेवाला।
संज्ञा
[हिं. मोट]

मट्ठा
उतना पूला जो मुट्ठी में आ सके।
संज्ञा
[हिं. मूठ]

मट्ठा
चंगुल भर वस्तु।
संज्ञा
[हिं. मूठ]

मट्ठा
छड़ी आदि का मुट्ठी से पकड़ा जानेवाला भाग।
संज्ञा
[हिं. मूठ]

मुट्‍ष्ठी
बंद या बँधी हुई हथेली।
संज्ञा
[सं. मुष्टिका, प्रा. मुट्ठिआ]

मुट्‍ष्ठी
उतनी चीज जो हथेली बंद करने पर आ सके।
संज्ञा
[सं. मुष्टिका, प्रा. मुट्ठिआ]
मुट्ठी एक प्रथम जब लीन्हें खान लगे जदुनाथ-सारा, ८१५।
मुट्ठी में - वश या अधिकार में। मुट्ठी गरम करना - (१) धन देना। (२) रिश्वत देना। मुट्ठी बंद या बंधी होना - भेद या रहस्य प्रकट न होना। मुट्ठी में रखा होना - पास या समीप होना।

मुठभेड़
टक्कर, भिड़ंत।
संज्ञा
[हिं. मूठ+भिड़ना]

मुठभेड़
भेंट, सामना।
संज्ञा
[हिं. मूठ+भिड़ना]

मुठि, मुठिका
मुट्ठी।
संज्ञा
[हिं. मुट्टी]

मुठि, मुठिका
धूँसा, मक्का
संज्ञा
[हिं. मुट्टी]

मुठिया
दस्ता, बेंट।
संज्ञा
[सं. मुष्टिका]

मुठिया
छड़ी आदि का हाथ में पकड़ा जानेवाला भाग।
संज्ञा
[सं. मुष्टिका]

मुठियाना, मुठियानो
मुट्ठी में लेकर धीरे धीरे दबना।
क्रि. स.
[हिं. मुट्ठी]

मुठी
मुट्ठी।
संज्ञा
[हिं. मुट्ठी]
मुठी भरि लियौ सब नाइ मुख हीं दियौ सूर प्रभु पियौ दव ब्रज जन बचायो-५९६।

मुड़क
मुड़कने या मुरकने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. मुरकना]

मुड़कना, मुड़कनो
झुकना, मुड़ना।
क्रि. अ.
[हिं. मुड़ना]

मुड़कना, मुड़कनो
फिर या धूम जाना।
क्रि. अ.
[हिं. मुड़ना]

मुड़कना, मुड़कनो
वापस होना।
क्रि. अ.
[हिं. मुड़ना]

मुड़कना, मुड़कनो
अंग का मोच खाना।
क्रि. अ.
[हिं. मुड़ना]

मुड़कना, मुड़कनो
रुकना, हिचकना।
क्रि. अ.
[हिं. मुड़ना]

मुड़कना, मुड़कनो
चौपट होना।
क्रि. अ.
[हिं. मुड़ना]

मुड़ना, मुड़नो
झुकना, घुमाव लेना।
क्रि. अ.
[सं. मुरण]

मुड़ना, मुड़नो
फिर या घूम जाना।
क्रि. अ.
[सं. मुरण]

मुड़ना, मुड़नो
किसी अन्य दिशा की ओर बढ़ना।
क्रि. अ.
[सं. मुरण]

मुड़ना, मुड़नो
लौटना।
क्रि. अ.
[सं. मुरण]

मुड़ना, मुड़नो
मूँड़ा जाना।
क्रि. अ.
[हिं. मुँड़ना]

मुड़ना, मुड़नो
ठगा जाना।
क्रि. अ.
[हिं. मुँड़ना]

मुड़ला, मुड़ला
जिसके सिर पर बाल न हों, मुंडा।
वि.
[हिं. मुंडा, मुँडला]

मुडली, मुड़ली
जिस (स्त्री) के सिर पर बाल न हों, मुंडी।
वि.
[हिं. मुडला]
मुडली पटिया पारि सँवारै कोढ़ी लावै केसरि-३०२६।

मुडवाना, मुडवानो, मुड़वाना, मुड़वानो
बाल मूँड़ने को प्रवृत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. मूंड़ना]

मुडवाना, मुडवानो, मुड़वाना, मुड़वानो
ठगने को प्रवृत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. मूंड़ना]

मुडवाना, मुडवानो, मुड़वाना, मुड़वानो
मुड़ने, झुकने, घूमने या लौटने को प्रवृत्त करना।
क्रि. स.
[हिं. मुड़ना]

मुड़वारी
दीवाल का सिरा, मुंडेरी।
संज्ञा
[हिं. मूँड़+वारी]

बारी
कान की बाली।
संज्ञा
[हिं. बाली]

बारी
जौ-गेहूँ आदि की बाली।
संज्ञा
[हिं. बाल]

बारी
जल, पानी।
संज्ञा
[सं. वारि]

बारीक
महीन, पतला।
वि.
[फ़ा.]

बारीक
छोटा, सूक्ष्म।
वि.
[फ़ा.]

बारीक
महीन कणवाला।
वि.
[फ़ा.]

बारीक
जिसमें बहुत सूक्ष्मता हो।
वि.
[फ़ा.]

बारीक
जिसमें बहुत गूढ़ता हो।
वि.
[फ़ा.]

बारीकी
महीन या सूक्ष्म होने का भाव।
संज्ञा
[हिं. बारीक]

बारीकी
सूक्ष्म गुण या विशेषता।
संज्ञा
[हिं. बारीक]

मुड़वारी
सिर की दिशा, सिरहाना।
संज्ञा
[हिं. मूँड़+वारी]

मुड़हर
साड़ी या दुपट्टे का वह भाग जो सिर पर रहता है।
संज्ञा
[हिं. मूँड़+हर]

मुडाना, मुडानो, मुड़ाना, मुड़ानो
सिर के सब बाल साफ कर देना।
क्रि. स.
[सं. मुंडन]

मुडिया
वह (साधु, सन्यासी या जोगी) जिसका सिर मुंडा हआ हो।
संज्ञा
[हिं. मूँडना]
यह निर्गुन लै ताहि सुनावहु जे मुड़िया बसैं कासी-३१०८।

मुहतरी
मोती की कंठी या माला।
संज्ञा
[हिं. मोती+सं. श्री]
ग्रीव मुतसिरी तोरि कै अँचरा सों बाँध्यौ-१५४१।

मुतियनि
मोतियों से।
संज्ञा
[हिं. मोती]
चंदन आँगन लिपाइ मुतियनि चौकें पुराइ-१०-९५।

मुतिलाड़ू
मोतीचूर का लड्डू।
संज्ञा
[हिं. मोती+लड्डू]
मुतिलाडू हैं अति मीठे।

मुतिहरा, मुतेहरा
कलाई का एक गहना।
संज्ञा
[हिं. मोती+हार]

मुत्तिय, मुत्ती
मोती।
संज्ञा
[सं. मुक्ता]

मुद
हर्ष, प्रसन्नता।
संज्ञा
[सं.]

मुदगर
मुगदर।
संज्ञा
[हिं. मुगदर]

मुदगर
एक प्राचीन अस्त्र जिसके सिरे पर गोल पत्थर लगा होता था।
संज्ञा
[हिं. मुगदर]
मुसल मुदगर हनत-१-१२०।

मुदना, मुदनो
प्रसन्न होना।
क्रि. अ.
[सं. मोद]

मुदर्रिस
पाठशाला का अध्यापक।
संज्ञा
[अ.]

मुदवंत
प्रसन्न, हर्षित।
वि.
[सं. मोद+हिं. वंत]

मुदा
प्रसन्नता, हर्ष।
संज्ञा
[सं.]

मुदा
तात्पर्य यह कि।
अव्य.
[अ मुद्दआ]

मुदा
लेकिन, परंतु।
अव्य.
[अ मुद्दआ]

मुदाम
सदा।
क्रि.वि.
[फ़ा.]

मुदाम
निरंतर।
क्रि.वि.
[फा]

मुदामी
सब कालों में बना रहनेवाला।
वि.
[फ़ा.]

मुदित
प्रसन्न आनंदित।
वि.
[सं.]
सेमर-फूल सुरँग अति निरखत मुदित होत खगभूप-१-१०२।

मुदिता
वह परकीया नायिका जो पर पुरुष-प्रीति की आकस्मिक प्राप्ति से सुखी हो।
संज्ञा
[सं.]

मुदिता
प्रसन्नता।
संज्ञा
[सं.]

मुदिता
आनंदिता, प्रसन्नमना।
वि.

मुदिर
बादल, मेघ।
संज्ञा
[सं.]

मुद्गर
कसरत करने की 'जोड़ी'।
संज्ञा
[सं.]

मुद्गर
एक प्राचीन अस्त्र जिसके सिरे पर गोल पत्थर लगा होता था।
संज्ञा
[सं.]

मुद्दई
दावा करनेवाला।
संज्ञा
[अ.]

मुद्दई
शत्रु, बैरी।
संज्ञा
[अ.]

मुद्दत
अवधि।
संज्ञा
[अ.]

मुद्दत
बहुत दिन।
संज्ञा
[अ]

मुद्ध
मूढ़।
वि.
[सं. मुग्ध]

मुद्ध
आसक्‍त।
वि.
[सं. मुग्ध]

मुद्रण
छपाई।
संज्ञा
[सं.]

मुद्रांक
चिन्ह जो मुद्रा पर हो।
संज्ञा
[सं.]

मुद्रांकन
मुद्रा अंकित करने का काम।
संज्ञा
[सं.]

मुद्रांकन
छापने का काम।
संज्ञा
[सं.]

मुद्रांकित
जिस पर मुद्रा अंकित हो।
वि.
[सं.]

मुद्रांकित
जिस (वैष्णव) के शरीर पर विष्णु के विभिन्न आयुध अंकित हों।
वि.
[सं.]

मुद्रा
नाम की छाप या मोहर।
संज्ञा
[सं.]

मुद्रा
सिक्का।
संज्ञा
[सं.]

मुद्रा
अँगूठी, मुद्रिका।
संज्ञा
[सं.]
बनचरकौन देस तैं आयो। कहँ वै राम कहाँ वै लछिमन क्यौं करि मद्रा पायौ-९.८८।

मुद्रा
काँच या स्फटिक का बना एक आभूषण जिसे गोरखपंथी साधु कान की लौ के बीच में छेद करके पहनते हैं।
संज्ञा
[सं.]
(क) सृंगी मुद्रा कनक खपर लै करिहौं जोगिन भेस-2७५४। (ख) मुद्रा भस्म बिषान त्वचा मृग व्रज जुवतिन मन भाए-2९९१। (ग) मुद्रा न्याय अंग-अंग भूषन पति व्रत तें न टरौं-३०२७।

मुद्रा
हाथ, पाँव, मुख आदि की कोई स्थिति।

मुद्रा
मुख की आकृति।

मुद्रा
विष्णु के आयुधों के चिन्ह जो वैष्णव अपने शरीर पर गुदवाता है।

मुद्रा
हठ योग का विशेष अंग-विन्यास।

मुद्रा
एक काव्यालंकार।

मुद्राचक
विष्णु के आयुधों के चिन्ह जो वैष्णव बाहु तथा अन्य अंगों पर गुदवाते हैं। यह मुद्रा दो प्रकार की होती है-शीतल और तप्त। शीतल मुद्रा चंदन आदि से की जाती है। पर तप्त मुद्रा तपे हुए ठप्पों से सामान्यतया द्वारका में दागी जाती है।
संज्ञा
[सं.]
मूँड़यौ मूँड, कंठबन माला मुद्रा-चक्र दिये-१-१७१।

मुद्रा कान्हड़ा
एक राग।
संज्ञा
[सं.]

मुद्रा टोरी
एक रागिनी।
संज्ञा
[सं.]

मुद्रावलि, मुद्रावली
कमर का एक आभूषण।
संज्ञा
[सं. मुद्रा+अवलि]
खसि मुद्रावलि चरन अरुझी गिरी धरनि बलहीन-३४५१।

मुद्रावलि, मुद्रावली
चिन्ह, मुद्रा।
संज्ञा
[सं. मुद्रा+अवलि]
राजति रुचिर कपोल महावर रद मुद्रावलि नाह दई री-2११५।

मुद्रिक, मुद्रिका
अँगूठी।
संज्ञा
[सं. मुद्रिका]
(क) कनक बलय मुद्रिका मोदप्रद-१-६९। (ख) अब परतीतिं भई मन मोरै संग मुद्रिका लाए.-९-९०।

मुद्रिक, मुद्रिका
कुश की अँगूठी जिसे अनामिका में पहन कर पितृ-कार्य या तर्पण किया जाता है, पवित्री, पैंती।

मुद्रिक, मुद्रिका
मुद्रा, सिक्का।

मुदित
अंकित किया हुआ।
वि.
[सं.]

मुदित
मुँदा हुआ, बंद।
वि.
[सं.]
(क) निसि मुद्रित प्रातहिं ए बिगसत, ए बिगसत दिनराति-१३४९। (ख) नैन मुद्रित सकुच जैसे उदय ससि जलजात-३१३०।

मुदित
छोड़ा या त्यागा हुआ।
वि.
[सं.]

मुधा
व्यर्थ, वृथा।
क्रि. वि.
[सं.]

मुधा
व्यर्थ का।
वि.

मुधा
मिथ्या।
वि.

मुधा
वह जो सत्य न हो, असत्य।
संज्ञा

मुनक्का
एक तरह की बड़ी किशमिश या सूखा हुआ अंगूर।
संज्ञा
[अ. मुनक्का]

मुनरा
कान का एक गहना।
संज्ञा
[सं. मुद्रा]

मुनरी
अँगूठी, मुँवरी।
संज्ञा
[हिं. मुँदरी]

मुनादी
घोषणा, ढिंढोरा, डुग्गी।
संज्ञा
[अ.]

मुनाफा
लाभ, नफा।
संज्ञा
[अ. मुनाफ़ा]

मुनार, मुनारा
मीनार।
संज्ञा
[हिं. मीनार]

मुनीश, मुनीश्वर, मुनीस, मुनीस्वर
मुनियों में श्रेष्ठ।
संज्ञा
[सं. मुनीश, मुनीश्वर]

मुनैयनि
लाल' पक्षी की मादाएँ।
संज्ञा
[हिं. मुनियाँ]
मनु लाल मुनैयनि पाँति पिंजरा तोरि चली-१०-२४।

मुन्ना, मुन्नूँ
छोटों के लिए स्नेह सूचक शब्द या संबोधन।
संज्ञा
[देश.]

मुफ्त
बिना दाम का।
वि.
[अ. मुफ़्त]

मुबारक
शुभ, मंगलमय।
वि.
[अ.]

मुमकिन
जो हो सकता हो, संभय।
वि.
[अ.]

मुमुक्षा
मोक्ष की इच्छा।
संज्ञा
[सं.]

मुमुक्षु
मोक्ष की इच्छा रखनेवाला।
वि.
[सं.]

मुयो, मुयौ
मर गया।
क्रि. अ.
[हिं. मुवना]
मुयौ असुर सुर भए सुखारी-७-२।

मुरंडा, मुरंदा
भुने हुए गेहूँ के दानों को गुड़ में मिलाकर बनाया गया लड्डू।
संज्ञा
[देश. मुरंदा]

मुरंडा, मुरंदा
सूखा हुआ।
वि.
मुरंडा होना - सूखकर काँटा होना।

मुर
बेठन।
संज्ञा
[सं.]

मुर
एक दैत्य जिसे मारने से विष्णु मुरारि' कहलाये।
संज्ञा
[सं.]
मधु-कैटभ मथन मुर भौम केसी भिदन कंस कुल काल अनुसाल हारी-१० उ०-५०।

मुरक
मुड़ने-मुँड़कने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[हिं. मुरकना]

मुरकना, मुरकनो
झुकना, मुड़ना।
क्रि. अ.
[हिं. मुड़नी]

मुरकना, मुरकनो
घूम या फिर जाना।
क्रि. अ.
[हिं. मुड़नी]

मुरकना, मुरकनो
वापस होना।
क्रि. अ.
[हिं. मुड़नी]

मुरकना, मुरकनो
अंग का मोच खाना।
क्रि. अ.
[हिं. मुड़नी]

मुरकना, मुरकनो
रुकने लगना, हिचकना।
क्रि. अ.
[हिं. मुड़नी]

मुरकाना, मुरकानो
नष्ट या चौपट करना।
क्रि. स.
[हिं. मुरकना]

मुनासिब
उचित।
वि.
[अ.]

मुनिंद्र
मुनियों में श्रेष्ठ।
संज्ञा
[सं. मुनि+इंद्र]

मुनि
मननशील महात्मा, त्यागी, तपस्वी।
संज्ञा
[सं.]
मुनि सराप तै भए जमलतरु-१-७।

मुनि
सात की संख्या।
संज्ञा
[सं.]

मुनिजनियाँ
अनेक मुनि।
संज्ञा
[सं. मुनि + जन]
सूर स्याम की अदभुत लीला नहिं जानत मुनिजनियाँ-१०-८३।

मुनियाँ
लाल' पक्षी की मादा।
संज्ञा
[देश.]

मुनींद्र
मुनियों में श्रेष्ठ।
संज्ञा
[सं.]

मुनी
तपस्वी महात्मा।
संज्ञा
[सं. मुनि]

मुनीब, मुनीम
नायब, सहायक।
संज्ञा
[अ. मुनीब]

मुनीब, मुनीम
हिसाब-किताब लिखनेवाला।
संज्ञा
[अ. मुनीब]

बारिज
कमल।
संज्ञा
[सं. वारिज]
मनु सीपज घर कियौ बारिज पर-१०-९३।

बारिद
मेघ, बादल।
संज्ञा
[सं. वारिद]

बारिधर
बादल, मेघ।
संज्ञा
[स. वारिधर]
(क) बरषि छबि नव बारिधर तन, हरहु लोचन प्यास १०-२१८। (ख) हृदय हरिनख अति बिराजत, छबि न बरनी जाइ। मनौ बालक बारिधर नव चंद दियौ दिखाइ-१०-२३४।

बारिधि
समुद्र।
संज्ञा
[सं. वारिधि]

बारिश
बर्षा।
संज्ञा
[फ़ा.]

बारिश
वर्षाऋतु।
संज्ञा
[फ़ा.]

बारिबाह
बादल।
संज्ञा
[सं. वारि+वाह]

बारी
वह स्थान जहाँ पेड़ लगाये गये हों, बगीचा।
संज्ञा
[सं. वाटी, हि. बाटिका = बगीचा, घेरा, घर]
जगत-जननी करी बारी, मृगा चरि चरि जाइ-९-६०।

बारी
क्यारी।

बारी
घर।

मुरकाना, मुरकानो
झुकाना, मोड़ना।
क्रि. स.
[हिं. मुरकना]

मुरकाना, मुरकानो
फेरना, घुमाना।
क्रि. स.
[हिं. मुरकना]

मुरकाना, मुरकानो
वापस लौटाना।
क्रि. स.
[हिं. मुरकना]

मुरकाना, मुरकानो
अंग में मोच लाना।
क्रि. स.
[हिं. मुरकना]

मुरकाना, मुरकानो
रोकना,हिचकाना।
क्रि. स.
[हिं. मुरकना]

मुरकाना, मुरकानो
नष्ट या चौपट करना।
क्रि. स.
[हिं. मुरकना]

मुरकी
रुकी, हिचकने लगी।
क्रि. अ.
[हिं. मुरकना]
लोचन भरि भरि दोऊ माता कनछेदन देखत जिय मुरकी-१०-१८०।

मुरकी
कान में पहनने की बाली।
संज्ञा

मुरखाइ, मुरखाई
मूर्खता।
संज्ञा
[सं. मूर्ख]

मुरगा
एक प्रसिद्ध पक्षी।
संज्ञा
[फा. मुर्ग]

मुरगाबी
एक पक्षी।
संज्ञा
[फा. मुरगाबी]

मुरचंग, मुरचंगा
ताल देने का एक बाजा, मुँहचंग।
संज्ञा
[हिं. मुहचंग]

मुरचा
लोहे पर लगने वाला जंग, मोरचा।
संज्ञा
[हिं. मोरचा]

मुरचा
दर्पण पर जमा हुआ मैल।
संज्ञा
[हिं. मोरचा]

मुरछना, मुरछनो
शिथिल होना।
क्रि. अ.
[सं. मूर्छन]

मुरछना, मुरछनो
अचेत, बेसुध या बेहोश होना।
क्रि. अ.
[सं. मूर्छन]

मुरछल, मुरछला
मोर पंख का बना हुआ चँवर।
संज्ञा
[हिं. मोरछल]

मुरछा
बेहोशी।
संज्ञा
[सं. मूर्छा]

मुरछाइ, मुरछाई
मूर्छित होकर।
क्रि. अ.
[हिं. मुरछाना]
सैन्य के लोग पुनि बहुत घायल किये लरयो ध्वजा धरि घर परयो मुरछाइ.-१० उ.-५६।

मुरछाना, मुरछानो
अचेत होना।
क्रि. अ.
[स. मूर्च्छा]

मुरछायो, सुरछायौ
मूर्छित हुआ
क्रि. अ.
[हिं. मुरछाना]
लगत त्रिसूल इन्द्र मुरछायौ-६-५।

मुरछावत
बेहोश, अचेत।
वि.
[सं. मुर्छा+वंत]

मुरछि
मूर्छित होकर।
क्रि. अ.
[हिं. मुरछना]
सुनि नंद ब्याकुल ह्वै परे मुरछि धरनी-2६६२।

मुरछित, मुरछी
अचेत, बेहोश।
वि.
[सं. मूर्च्छित]
जो देखे द्रुम के तरे मुरछी सुकुमारी-१७९९।

मुरछे
सुप्त, सोता हुआ।
वि.
[सं. मूर्च्छित]
इहिं बिधि बच सूनाय स्याम घन मुरछे मदन जगावते.-2७३५।

मुरज
मृदंग, पखावज।
संज्ञा
[सं.]
ताल मुरज रबाब बीना किन्नरो रस सार-१७४५।

मुरझना, मुरझनो
अचेत होना।
क्रि. अ.
[सं. मूर्च्र्छन]

मुरझना, मुरझनो
कुम्हलाना।
क्रि. अ.
[सं. मूच्र्छन]

मुरझना, मुरझनो
उदास होना।
क्रि. अ.
[सं. मूच्र्छन]

मुरझाइ
मूर्छित होकर।
क्रि. अ.
[हिं. मुरझाना]
(क) आनि अँचयौ जल जमुन कौ तबहिं गए मुरझाइ-५०४। (ख) धरनि परी मुरझाइ जसोदा-५४४।

मुरझाइ
खिन्न या उदास होकर।
क्रि. अ.
[हिं. मुरझाना]

मुरझाइ
रहे मुरझाइ-अत्यन्त खिन्न या उदास हो गये हैं।
प्र.
मदनगुपाल लाल के बिछुरे प्रान रहें मुरझाइ-३१५०।

मुरझाई
मूर्छित या मृत होकर।
क्रि. अ.
[हिं. मुरझाना]
पय सँग प्रान ऐंचि हरि लीनौ, जोजन एक परी मुरझाई-१०-५१।

मुरझाई
खिन्न या उदास होकर।
क्रि. अ.
[हिं. मुरझाना]

मुरझाई
गई मुरझाई-बहुत खिन्न या उदास हो गयीं।
प्र.
ब्रज जुवती अति गई मुरझाई.-११४३।

मुरझाई
गए मुरझाई-बहुत खिन्न या उदास हो गये।
प्र.
सुनत सूर यह बात चकित पिय अतिहिं गए मुरझाई-2०१९

मुरझात
खिन्न या उदास होता है।
कि, अ.
[हिं. मुरझाना]
जहाँ खेलन को ठौर तुम्हारे, नंद देखि मुरझात-३४३३।

मुरझान
मूर्छित हो गया।
क्रि. अ.
[हिं. मुरझाना]
सूर सकत जैसे लछिमन तत्र बिह्वल होई मुरझान-2७८८।

मुरझाना
मूर्छित होना।
क्रि. अ.
[सं. मूच्‌र्छन]

मुरझाना
कुम्हलाना, सूखने पर होना।
क्रि. अ.
[सं. मूच्‌र्छन]

मुरड़
गर्व, अभिमान।
संज्ञा
[हिं.]

मुरड़की
ऐंठन, मरोड़।
संज्ञा
[हिं. मरोड़]

मुरत
मुड़ता या हिलता डोलता है।
क्रि. अ
[हिं. मुड़ना]
इत-उत अंग मुरत झकझोरत-१०-३००।

मुरत
मुड़ता, हटता, फिरता या लौटता है।
क्रि. अ
[हिं. मुड़ना]
(क) एक ते एक रणबीर जोधा प्रबल मुरत नहिं नेंक अति सबल जी के। (ख) रुकत न पौन मह,वत पै मुरत न अंकुश मोरे-2८१८।

मुरदर
श्रीकृष्ण।
संज्ञा
[सं.]

मुरझाना
सुस्त होना।
क्रि. अ.
[सं. मूच्‌र्छन]

मुरझाने
अचेत या बेसुध हो गये।
क्रि. अ.
[हिं. मुरझाना]
रति रन जुद्ध जाम तत्र नीके सेज परे उठि पुनि मुरझाने.-१६०७।

मुरझानो
अचेत या बेसुध‍ होना।
क्रि. अ.
[सं. मूच्‌र्छन]

मुरझानो
कुम्हलाना।
क्रि. अ.
[सं. मूच्‌र्छन]

मुरझानो
उदास होना।
क्रि. अ.
[सं. मूच्‌र्छन]

मुरझायो, मुरझायौ
मूर्छित, अचेत या बेसुध हो गया।
क्रि. अ.
[हिं. मुरझाना]
लगत त्रिसूल इंद्र मुरझायौ-६-५।

मुरझायो, मुरझायौ
कुम्हला गया, सूख गया।
क्रि. अ.
[हिं. मुरझाना]
पौढ़ि रहे धरनी पर तिरछे बिलखि बदन मुरझायौ-३५६।

मुरझि
अचेत या बेसुध होकर।
क्रि.अ.
[हिं. मुरझना]
सूरदास प्रभु पठै मधुपुरी मुरझि परीं ब्रजबाल-2५४०।

मुरभैया
अचेत या बेसुध होकर।
क्रि.अ.
[हिं. मुरझना]
पुनि यह कहति मोहिं परमोधत धरनि गिरी मुरझैया-५६०।

मुरझ्‍यो, मुरझ्यौ
सोया हुआ, सुप्त।
वि.
[हिं. मुरझाना]
अति बिपरीत भई सुनि सूर प्रभु मुरझ्यो मदन जगायो-१४६७।

बारी
खिड़की।

बारी
तट, किनारा, छोर।
संज्ञा
[सं. अवार]

बारी
घेरा, बाड़ा।
संज्ञा
[सं. अवार]

बारी
पैनी चीज की धार।
संज्ञा
[सं. अवार]

बारी
एक जाति जो दोने-पत्तल बनाती है।
संज्ञा

बारी
अवसर, पारी।
संज्ञा
[हिं. बार]
बारी बँधना-क्रम निश्चित होना। बारी बाँधना-क्रम निश्चित करना। बारी-बारी से-क्रमशः।

बारी
लड़की जो सयानी न हो।
संज्ञा
[हिं. बारा = छोटा]
अबै तनक तू भई सयानी, हम आगे की बारी-१२४४।

बारी
बेटी, पुत्री।
संज्ञा
[हिं. बारा = छोटा]
कुँवर-कर गह्यौ बृषभानु-बारी-६८४।

बारी
नवयौवना।
संज्ञा
[हिं. बारा = छोटा]

बारी
थोड़ी अवस्था की, छोटी।
वि.

बारो, बारौ
बालक, बच्चा।
संज्ञा
[सं. बाल]
भक्त परीच्छित हरि कौ प्यारौ। गर्भ-मँझार हुतौ जब बारी-१- २९०।

बारो, बारौ
जलाओ, प्रज्वलित करो।
क्रि. स.
[हिं. बालना]

बारो, बारौ
छोटा, अबोध।
वि.
(क) सखियनि मंगन गवाइ, बहु बिधि बाजे बजाइ, पौढ़ायौ महल जाइ, बारौ रे कन्हैया-१०- ४१। (ख) बालक दामिनि मानौ ओढ़े बारौ बारिधर-१०-१५१।

बाल
बालक, लड़का।
संज्ञा
[सं.]

बाल
पशु का बच्चा।
संज्ञा
[सं.]

बाल
अबोध व्यक्ति।
संज्ञा
[सं.]

बाल
युवती।
संज्ञा
[हिं. बाला]

बाल
नारी।
संज्ञा
[हिं. बाला]

बाल
जो छोटा हो।
वि.

बाल
जो हाल ही में उगा या उदित हुआ हो।
वि.

बहरियाना
अलग करना।
क्रि. स.
[हि. बाहर+इयाना]

बहरी
एक शिकारी चिड़िया।
संज्ञा
[अ.]

बहरी
जिसे सुनायी न दे।
वि.
[हि. बहरा]

बहरो, बहरौ
न सुननेवाला।
वि.
[हिं. बहरा]

बहल
रथ जैसी बैलगाड़ी।
संज्ञा
[सं. बहन]

बहलना
उबाने या दुख देने वाली बात से चित्त हटाकर दूसरी ओर लगाना।
क्रि. अ.
[हि. बहलाना]

बहलना
चित्त प्रसन्न होना।
क्रि. अ.
[हि. बहलाना]

बहलाना
उबाने या दुख देने बाली बात से चित हटाकर दूसरी ओर ले जाना।
क्रि. स.
[फ़ा. बहाल]

बहलाना
चित्त प्रसन्न करना।
क्रि. स.
[फ़ा. बहाल]

बहलाना
भुलावा देना।
क्रि. स.
[फ़ा. बहाल]

बारीस
समुद्र।
संज्ञा
[सं. वारीश]

बारुणी, बारुनी
मदिरा।
संज्ञा
[सं. वारुणी]
प्रेम पिये बर बारुनी बलकत बल न सँभार-११८२।

बारू
रेत, बालू।
संज्ञा
[हिं. बालू]

बारूत, बारूद
एक तरह का चूर्ण जिसकी गोली बंदूक से चलती है और जिसकी आतिशबाजी आदि बनती है।
संज्ञा
[तु. बारूत]

बारे
पुत्र, बेटा।
संज्ञा
[सं. बाल]
(क) परम प्रान-जीवन-धन मेरे तुम बारे-१०- २०५। (ख) नंद जू के बारे कान्ह छाँड़ि दै मथनियाँ-१०-१४५।

बारे
बचपन।
संज्ञा
[सं. बाल]
बारे तैं सुत ये ढँग लाए, मनहीं मनहिं सिहात-१०- ३२८।

बारे
अबोध, अज्ञान।
वि.
वारौं ऐसी रिस जो करति सिसु बारे पर-३६२।

बारे
अंत को।
क्रि. वि.
[फ़ा.]

बारेक
एक बार।
संज्ञा
[हि. बार+एक]
बारेक हमैं दिखावौ अपने बालापन की जोरी-१०. . उ.-११५।

बारे में
विषय में।
अव्य.
[फ़ा. बारः+हि. में]

बाल
लोम, केश।
संज्ञा
[सं]
बाल बाँका न होना (न बाँकना)–कष्ट या हानि न होना। न्हात बाल न खसना (खिसना) - कष्ट या हानि न पहुँचना। बाल पकना - बूढ़ा या अनुभवी होना। (किसी काम में) बाल पकाना - काम करते-करते बूढ़ा या अनुभवी हो जाना। बाल बराबर - बहुत महीन। बाल बराबर न समझना - बहुत ही तुच्छ समझना। बाल-बाल बचना - कष्ट या विपत्ति आने में जरा सी ही कसर रह जाना।

बाल
गेहू-जौ की बाली।
संज्ञा

बालक
पुत्र।
संज्ञा
[सं.]

बालक
शिशु।
संज्ञा
[सं.]

बालक
अबोध व्यक्ति।
संज्ञा
[सं.]

बालक
(किसी) पशु का बच्चा।
संज्ञा
[सं.]

बालकताइ, बालकताई
बाल्यावस्था।
संज्ञा
[सं. बालकता]

बालकताइ, बालकताई
नासमझी, लड़कपन।
संज्ञा
[सं. बालकता]

बालकपन
बालक होने का भाव।
संज्ञा
[हिं. बालक + पन]

बालकपन
नासमझी, लड़कपन।
संज्ञा
[हिं. बालक + पन]

बालकाल
बाल्यावस्था, बचपन।
संज्ञा
[सं.]

बालकृमि
जूँ।
संज्ञा
[सं.]

बालकृष्ण
बाल्यावस्था के कृष्ण।
संज्ञा
[सं.]

बालकेलि, बालक्रीड़ा
बच्चों का खेल
संज्ञा
[सं.]

बालकेलि, बालक्रीड़ा
बहुत सरल और साधारण काम।
संज्ञा
[सं.]

बालखिल्य
ब्रह्मा के रोएँ से उत्पन्न साठ हजार ऋषि जिनमें प्रत्येक एक अँगूठे के बराबर था।
संज्ञा
[सं.]

बालगुपाल, बालगोपाल
बाल्यावस्था के कृष्ण।
संज्ञा
[सं. बालगोपाल]

बालगुपाल, बालगोपाल
बाल-बच्चे।
संज्ञा
[सं. बालगोपाल]

बालगुबिंद्, बालगुबिंदा, बालगोबिंद बालगोबिंदा
कृष्ण का बालक-स्वरूप, बाल कृष्ण।
संज्ञा
[सं. बालगोबिंद]
खेलन चलौ बालगोबिंद-१०-११८।

बालग्रह
बालकों के प्राणघाती नौ ग्रह।
संज्ञा
[सं.]

बालाधि, बालधी
पूँछ, दुम।
संज्ञा
[सं. बालधि]

बालना
जलाना, सुलगाना।
क्रि. स.
[सं. ज्वलन]

बालना
प्रज्वलित करना।
क्रि. स.
[सं. ज्वलन]
क्रि. स.

बालपन, बालपना, बालपनों, बाजपनौ
बालक या अबोध होने का भाव।
संज्ञा
[सं. बाल+हिं. पन]

बालपन, बालपना, बालपनों, बाजपनौ
बचपन, लड़कपन।
बालपनौ गए ज्वानी आवै-७- २।

बालब्रह्मचारी
बाल्यावस्था से ही ब्रह्मचर्य का पालन करनेवाला।
संज्ञा
[सं.]

बालभोग
प्रातःकाल का भोग।
संज्ञा
[सं.]

बालभोग
जलपान, कलेवा।
संज्ञा
[सं.]

बालम
पति।
संज्ञा
[सं. वल्लभ]

बालम
प्रेमी।
संज्ञा
[सं. वल्लभ]

बालमुकुंद
बाल्यावस्था के श्रीकृष्ण, बालकृष्ण, घुटनों के बल चलती श्रीकृष्ण की मूर्ति।
संज्ञा
[सं.]
सुभग बालमुकुंद की छबि बरनि कापै जाइ-१०-२२५।

बाललीला
बालकों की क्रीड़ा।
संज्ञा
[सं.]

बालसँघाती
बचपन का साथी।
संज्ञा
[हिं. बाल्य+साथी]
सुनहु सूर ए बालसँघाती प्रेम बिसारि मिले ढरि स्याम-१०६१।

बाला
सोलह-सत्रह वर्ष की युवती।
संज्ञा
[सं.]
आदि ब्रह्म-जननी सुर-देवी, नाम देवकी बाला। दई बिवाहि कंस बसुदेवहिं, दुख-भंजन, सुख-माला-१०- ४।

बाला
पत्नी, भार्या।
संज्ञा
[सं.]

बाला
स्त्री, नारी।
संज्ञा
[सं.]

बाला
पुत्री।
संज्ञा
[सं.]

बाला
ऊँचा, ऊपर उठा हुआ।
वि.
[फा.]
बाल-बाला - अलग-अलग, चुपचाप। बोल बाला होना - आदर-सत्कार होना।

बाला
बहुत सीधा-सादा।
वि.
[हिं. बाल]

बालापन, बालापनौ
लड़कपन, बचपन।
संज्ञा
[सं. बाल +हिं. पन]
बालापन खेलत ही खोयौ, जुवा बिषय-रस मात-१-११८।

बालि
सुग्रीव का बड़ा भाई जो किष्किंधा का राजा था।
संज्ञा
[सं.]

बालि
गेहुँ-जौ आदि की ‘बाली'।
संज्ञा
[हिं. बाली]
बालि छाँड़ि कै सूर हमारे अब नरवाई को लुनै-३१५८।

बालिका
कन्या।
संज्ञा
[सं.]

बालिका
पुत्री।
संज्ञा
[सं.]

बालिकुमार
बालि-पुत्र अंगद।
संज्ञा
[सं.]

बालिग
वयस्क।
संज्ञा
[अ.]

बालिश
अबोध, अज्ञान।
वि.
[सं.]

बाली
कान का एक गहना।
संज्ञा
[सं. बालिका]

बाली
जौ-गेहूँ आदि की बाल।
संज्ञा
[हिं. बाल]

बाली
वानरराज बालि।
संज्ञा
[सं. बालि]

बालुका
रेत, बालू।
संज्ञा
[सं.]

बालू
रेत, रेणुका।
संज्ञा
[सं. बालुका]
बालू की दीवार (भीत) - ऐसी चीज जो शीघ्र ही ढह जाय।

बालूसाही
एक मिठाई।
संज्ञा
[हिं. बालू+साही = अनुरूप]

बाल्य
बालक का।
वि.
[सं.]

बाल्य
बचपन का।
वि.
[सं.]

बाल्यावस्था
लड़कपन।
संज्ञा
[सं.]

बाव
वायु।
संज्ञा
[सं.]

बाव
बाई।
संज्ञा
[सं.]

बावड़ी
बावली।
संज्ञा
[हिं. बावली]

बावन
विष्णु।
संज्ञा
[सं. वामन]

बावन
विष्णु का पाँचवाँ अवतार जो राजा बलि को छलने के लिए अदिति के गर्भ से हुआ था।
संज्ञा
[सं. वामन]

बावन
विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण।
संज्ञा
[सं. वामन]
जसुमति धनि यह कोखि, जहाँ रहे बामन रे-१०-२८।

बावन
पचास और दो की संख्या।
संज्ञा
[सं. द्विपंचाशत, या द्विपण्णासा, प्रा. बिवण्णा]
बावन तोले पाव रत्ती - सभी तरह से ठीक। बावन वीर - बड़ा वीर।

बावना
बौना, ठिगना।
वि.
[हिं. बौना]

बावभक
पागलपन।
संज्ञा
[हिं. बाव+अनु. भक]

बावर, बावरा
पागल, सनकी।
वि.
[हिं. बावला]

बावर, बावरा
मूर्ख, बुद्धिहीन।
वि.
[हिं. बावला]

बावरि, बावरी
बड़े चौड़े मुँह का कुआँ जिसमें सीढ़ियाँ बनी हों।
संज्ञा
[हिं. बावली]

बावरि, बावरी
छोटा तालाब, जिसमें सीढ़ियाँ बनी हों।
संज्ञा
[हिं. बावली]

बावरि, बावरी
पगली, विक्षिप्त, सनकी।
वि.
[हिं. पुं. बावला]
(क) टेरि-टेरि मैं भई बावरी, दोउ भैया तुम रहे लुकाई-४६२। (ख) स्याम बिनु कछु न भावै रटत फिरत जैसे बकत बावरी-३४३२।

बावरि, बावरी
मूर्ख, बुद्धिहीन।
वि.
[हिं. पुं. बावला]
कहा डर करौं इहिं फनिग कौ बावरी-५५१।

बावरि, बावरी
मतवाली, उन्मत्त।
वि.
[हिं. पुं. बावला]
एक तौ लालन लाड़नि लड़ाई दूजो यौवन बावरी-2७४९।

बावरे
पागल।
वि.
[हिं. बावरा]

बावरे
मूर्ख।
वि.
[हिं. बावरा]
बारन हीं करौ बारन सहित फटकिहौं बावरे बात कहि मुख सँभारौ-2५९०।

बावला
पागल, मूर्ख।
वि.
[सं. वातुल, प्रा. बाउल]

बावली
छोटा तालाब।
संज्ञा
[सं. वाय+ली]

बावली
पगली, मूर्ख।
वि.
[हिं. बावला]

बावाँ
बायीं दिशा का।
वि.
[सं. वाम]

बावाँ
विरुद्ध।
वि.
[सं. वाम]

बाष्प
भाप।
संज्ञा
[सं. वाष्प]

बाष्प
आँसू।
संज्ञा
[सं. वाष्प]

बासंतिक
बसंत का, बसंत-संबंधी।
वि.
[सं.]

बासंतिक
बसंत ऋतु में होनेवाला।
वि.
[सं.]

बासंती
बसंत-संबंधी।
वि.
[हिं. बसंत]

बासंती
बसंत ऋतु में होनेवाली।
वि.
[हिं. बसंत]

बास
रहने-बसने की क्रिया या भाव।
संज्ञा
[सं. वास]

बास
रहने का स्थान।
संज्ञा
[सं. वास]

बास
गंध, महक।
संज्ञा
[सं. वास]
(क) ज्यौं मृगा कस्तूरि भूलै, सु तौ ताकैं पास। भ्रमत हीं वह दौरि ढुँढ़ै, जबहिं पावै बास-१७०। (ख) जोजन-गंधा काया करी। मच्छ-बास ताकी सब हरी-१- २२९। (ग) पदुम-बास सुगंध सीतल लेत पाप नसाहिं-१- ३३८।

बास
वस्त्र।
संज्ञा
[सं. वास]

बास
इच्छा, कामना।
संज्ञा
[सं. वासना]